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Tuesday, February 22, 2011

बसंत-बसंत




फ़ाल्गुन माह आरंभ हो चुका है। प्रतियोगिता की छठी कविता भी मौसम के बदलाव की ओर इशारा करती है और प्रतीक्षा के सकारात्मक पहलू पर जोर देते हुए जीवन के लिये आवश्यक आशावाद को शब्द देती है। वसंत का स्वागत करती इस कविता की रचनाकार डिम्पल मलहोत्रा की हिंद-युग्म पर यह दूसरी कविता है। इससे पहले उनकी एक कविता जुलाई माह मे दसवें स्थान पर प्रकाशित हुई थी।

पुरस्कृत कविता: बसंत-बसंत

सूना-सूना सा आकाश
बसा है मकानों की छतों पे अभी..
परदें हटाओ गर
तो खिड़कियों पे..
दिखती है खामोशी की परछाइयाँ..
लिपटी पड़ी है उदासी सी
सीखचों पे भी..
मगर कभी गुटका करेंगे
कांपते कबूतर रोशनदानों में..
सर्द कागज़ पर बर्फ से लफ्ज़
पिघल निकलेंगे..
हरी हवा उगने लगेगी
पतझड़ी समय में..
डार परिंदों की निकलेगी बतियाते हुए..
नज़र थिरकेगी हर शैय पे आते जाते हुए..
गुनगुनी धूप सहलाएगी सारी फ़िज़ा को..
जमा-रुका सा कुछ मन में
दस्तक देगा..
खुले दरीचों में से दिखने लगेगी
..बसंत-बसंत..
____________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।


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26 कविताप्रेमियों का कहना है :

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

सुंदर रचना के लिए डिम्पल जी को बधाई

Navin C. Chaturvedi का कहना है कि -

वसंत से शुरू हो कर मानवीय सरोकारों को बतियाती सुंदर कविता| 'पतझड़ी समय' का प्रयोग सरहनीय डिम्पल जी| बधाई स्वीकार करें|

गौतम राजरिशी का कहना है कि -

डिम्पल की कवितायें हमेशा से मुझे भाती रही है...मेरे ब्लौग के शुरूआती दिनों से। हिंदी-युग्म पर इन कविताओं को देखकर अच्छ लग रहा है।

और अच्छा लग रहा है देखकर कि हिंदी-युग्म विजेता कवियों को पुस्तक-पुरूस्कार के रूप में कविता को जिस तरह से बढ़ाव दे रही है। साधुवाद!!

Anonymous का कहना है कि -

मियाँ ये कोई कविता हे ? ......


व्याकरण की गलती ,

बसंत तो पुलिंग हे फिर कैसे "लगेगी" कहूओ ?

और भी हे........



पहले सही लिखो फिर छापो



एक पाठक

manu का कहना है कि -

डिम्पल जी की कविता बेहद पसंद आयी...


सर्द काग़ज़ पर बर्फ जैसे हर्फ़..हरी हवा...पतझड़ी समय.....
और परिंदों की बतियाती डार भी...

कितने सुहाने शब्दों का प्रयोग एक ही कविता में देखने को मिला है..कि बस................
बसंत का सही आनंद आ गया..



एनी माउस जी सही कहते हैं..बसंत है तो पुल्लिंग ही ..लेकिन इस समय स्त्रीलिंग में भी सुहा रहा है.....

शायद बसंत-बहार की कविता का प्रभाव हो...

manu का कहना है कि -

डिम्पल जी की कविता बेहद पसंद आयी...


सर्द काग़ज़ पर बर्फ जैसे हर्फ़..हरी हवा...पतझड़ी समय.....
और परिंदों की बतियाती डार भी...

कितने सुहाने शब्दों का प्रयोग एक ही कविता में देखने को मिला है..कि बस................
बसंत का सही आनंद आ गया..



एनी माउस जी सही कहते हैं..बसंत है तो पुल्लिंग ही ..लेकिन इस समय स्त्रीलिंग में भी सुहा रहा है.....

शायद बसंत-बहार की कविता का प्रभाव हो...

manu का कहना है कि -

डिम्पल जी की कविता बेहद पसंद आयी...


सर्द काग़ज़ पर बर्फ जैसे हर्फ़..हरी हवा...पतझड़ी समय.....
और परिंदों की बतियाती डार भी...

कितने सुहाने शब्दों का प्रयोग एक ही कविता में देखने को मिला है..कि बस................
बसंत का सही आनंद आ गया..



एनी माउस जी सही कहते हैं..बसंत है तो पुल्लिंग ही ..लेकिन इस समय स्त्रीलिंग में भी सुहा रहा है.....

शायद बसंत-बहार की कविता का प्रभाव हो...

Priya का कहना है कि -

Mr.Anonymous Dimple ji ya hindyum waalon ne bola hai kya ki negative comment ke liye... naam na diya jaaye.....Naam ke saath aate to achcha lagata

Priya का कहना है कि -

Dimple, hamein Bhaav bahut achche lage....baaki kavita ka zyada gyaan to nahi hai hamein...N you know I liked your writing :-)

गौतम राजरिशी का कहना है कि -

श्रीमान "एक पाठक" जी को इतनी खूबसूरत कविता में बस गलती ही नजर आयी...नहीं?

लिंग की ये गलती टंकन-त्रुटि भी हो सकती है। लेकिन नहीं, आलोचना के लिये कुछ न कुछ कहना जो चाहिये? है ना एक पाठक जी!

Anonymous का कहना है कि -

पहली बात तो बच्चो , कविता में vyakaran की गलती हे... उसे मानो...

गलती के साथ छापना बड़ी गलती हे.. उसे भी मानो..
सम्पादन करना सरल काम नहीं हे... उसे भी मनो...
साहित्य का सम्पादन करना कठिन हे, उसे भी मानो ------
भाषा और साहित्य का मान करना क्स्चाहिये , उसे मानो,
गलती सुधारकर छापो दो और कविता को अच्छा बना दो यद्=ही हमरी मांग हे...और कुछ नहीं ,,,,,

हिन्दी युग्म से मोहित बच्चो , सुधर जाओ.....
आपका बाप हूँ मई इसा क्षेत्र में....यह भी मनो

एक पढ़क

सुनील गज्जाणी का कहना है कि -

सुंदर रचना के लिए डिम्पल जी को बधाई

Anonymous का कहना है कि -

कौन है यहाँ का सम्पादक ?

जवाब दो अन्य्मोउस का
सही कह रहे हैं एनी मौस
कविता नहीं नए रंग के बिगड़ी रचना है जिसे पुरस्कृत करना सही नहीं है
सम्पादक व्यापार ना करके स्पष्टीकरण dijiye

Navin C. Chaturvedi का कहना है कि -

टिप्पणी देते वक्त ये बात मेरे जेहन में भी आई थी पर साथ ही ये दो वाक्य भी आए

वसंत ऋतु किसे अच्छी नहीं लगती
वासंती मौसम के क्या कहने

फिर भी आलोचना का स्वागत करते हुए डिम्पल जी और प्रबंधन को उत्तर देना चाहिए|

आलोचक कोई भी हो, हमें उस की अभिव्यक्ति का सम्मान करते हुए अपना पक्ष रखना ही चाहिए|

बहुत बार आलोचक, वाकई हमारी गलतियाँ सुधारने में मददगार साबित होते हैं| और यदि हम सही हैं तो आलोचक लोगों को इसे स्वीकार करते हुए भी देखा है हम सभी ने|

इसे स्वस्थ वार्तालाप की तरफ मोड देना ही साहित्य के हित में है|

दर्पण साह का कहना है कि -

http://www.youtube.com/watch?v=jq3bb33sElU

PS:कंप्यूटर स्लो है...
वापिस आता हूँ...

प्रिया का कहना है कि -

kisne inkaar kiya galti manane se, hamara bhi bas yahi vinamr anurodh hai ....ki yadi inhe kavita ka itna gyaan hai....aur ye itni badi hast hain jaisa ki inhone (bachcho ka pita shri) kaha.. to apna parichay den....sach bolne mein dar kaisa.......ham sabhi bachche inka shishya banane ke liye taiyaar hain
@Navin C. Chaturvedi aapki baat ka samarthan karte hain ham...Lekin inse bhi to boliye....apna parichay dene ko

दर्पण साह का कहना है कि -

जबकि ऊपर वाली टिप्पणी के एक गीत में पहले ही बसंत आ चुकी है तो स्थूल स्तर पर तो विवाद यहीं ख़त्म हुआ चाहता है !

तो इश्यू गलत सही शब्दों के चयन का नहीं मुद्दा कुछ और है! अस्तु...

बेहतरीन से बेहतरीन कविता, ग़ज़ल भी पहले से ही गढ़े जा चुके शब्दों का पर्म्युटेशन-कॉम्बिनेशन ही तो है! अस्तु...

एक तरफ़ मौलिकता के अभाव की बात होती है, दूसरी तरफ़ मुद्दा रूढ़िवादिता का है! अस्तु...


हिंदी, उर्दू को साहित्य में बचाए रखने के लिए इसका वैश्विक होना आवश्यक है. फ़िर उसकी खातिर 'Thou' के बदले 'You' का और 'किन्कर्त्व्यविमुध' (देखा ठीक से टाइप भी नहीं होता) के बदले 'कन्फ्यूज्ड' प्रयोग किया जाए तो क्या गलत है? (यकीन कीजिये में भी मानता हूँ कि थीं तो लैटिन और संस्कृत भी अच्छी भाषाएँ हीं.)

तो नए शब्दों को गढ़ना ही सबसे अधिक मौलिकता कही जानी चाहिए. और इसकी तारीफ़ ही होनी चाहिए ! सोचता हूँ पहली बार किसने निर्धारित किया होगा कि अमुक एक इश्वर का नाम होगा अमुक एक गाली !
"I am having 1 pen." कहता हूँ तो अंग्रेजी सिखाने वाली मैम कहती है, " 'हेव' स्टैटिक वर्ब है. इसमें ing नहीं लग सकता. हैविंग का अर्थ खाना ! कोई पेन खा सकता है क्या?"
...उनके ही ये क्यूँ समझ नहीं आता कि कोई पेन खा सकता है क्या? (कोई हमको ये समझाए कि समझायेंगे क्या?) . भाषा यदि व्याकरण की मोहताज हो जाय तो हिंदी दिल्ली और बौलीवुड में ही रहे. और अगर आप कहते हैं कि साहित्य में इसका ख्याल रखा जाना चाहिए तो 'कसप' और 'मैला आँचल' जैसी रचनाएँ साहित्यिकता कि कसौटी पर तो क्या हिंदी कि कसौटी पर ही खरी ना उतरें. तब भी जब गुलज़ार के इतर भी कोई पानियों में छीटें उड़ायें ! वैसे मुझे आज तक पढ़े गए आलेख में सबसे ज़्यादा मौलिक जो लगा वो है.....
http://www.funny-potato.com/read-this.html

शब्दों का सफ़र एक ब्लॉग है, बड़ा भाता है मुझे, कैसे किसी शब्द कि उत्पत्ति हुई उसने कैसे और कौन कौन से सफ़र तय किये कि वो आज अपने 'वर्तमान' रूप में है...
...सर जी आप भी कुछ शब्दों के वर्तमान स्वरुप और मौलिक स्वरुप के मध्य अंतर देख के चक्कर खा जायेंगे. भाषा के विवाद में तो 'रिंगा रिंगा रोज़ेज़' से लेकर 'जन गण मन' तक हैं....
किन्तु इतना मान लेना और समझ लेना काफी नहीं की पहला नर्सरी राइम है प्लेग से मरने वालों के लिए मर्सिया नहीं. और दूसरा राष्ट्र गान है रानी की स्तुति नहीं ? फ़िर देखिये कैसे आप को भी याद आता है अपना बचपन 'रिंगा रिंगा रोज़ेज़' से, कैसे आप के भी रोयें खड़े होते हैं राष्ट्र गान में, कैसे आप भी भावुक होते हैं बसंत के गीत में !
PS:बेशक मेरी इस टिप्पणी से मेरे पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का आभास हो सकता है. किन्तु यदि पूर्वाग्रह से ही निर्णय होता हो तो पूर्वाग्रह अच्छा है !

vijaymaudgill का कहना है कि -

Anonymous ji pehli baat apne jo baap hone ka aaham pal rakha hai use kripya tyaag dijiye. kyuki duniya main bina baap ka koi nahi hota aur baap ban'na naseeb ki baat hoti hai.
aur apki jigyasa ko shant karne k liye main apse vinati karta hu ki ek baar fir se rachna ko parhiye

apko har shabd main aur pankti main shuru se lekar ant tak basant hi nazar ayegi par uska roop basant mosam ka bakhaan na hokar basant bahaar ke agman ka chitran hai aur bahaar striling hi hai. vaise bhi kavi ko aam bolchaal ki bhasha main likhne ka adhikaar to hona hi chahiye. kyuki agar kavi bhi zameen shorh de to phir kaun sambhalega lok bhasha ko?
vaise jaha tak mujhe ummed hai apne basant par ye lok muhawra to suni hi hoga.
aayi basant, pala udant

jab sadiyo se ye aamjan ki bhasha hai to fir kavi kyu nahi likh sakta?

ek aur example
upkaar film bhi apne dekhi hi hogi aur uska lokpriye gana bhi apne gungunaya hoga
aayi jhoom k basant
jhumo sang sang main

manu का कहना है कि -

ये वाले माउस खुद अपनी संतान के बाप नहीं लगते.....ये महज युग्म से इर्ष्या करने वालों में से एक हैं...इनकी समस्या का कोई उपाय कम से कम अंतरजाल पर तो उपलब्ध नहीं है.....

कृपया इनके हाल पर रहम खाया जाए...

manu का कहना है कि -

ये वाले माउस खुद अपनी संतान के बाप नहीं लगते.....ये महज युग्म से इर्ष्या करने वालों में से एक हैं...इनकी समस्या का कोई उपाय कम से कम अंतरजाल पर तो उपलब्ध नहीं है.....

कृपया इनके हाल पर रहम खाया जाए...

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) का कहना है कि -

@दर्पण:

खडे होकर तुम्हारे लिये ताली बजा रहा हूँ.. जो ऊँचा सुनते हैं उनके लिये धमाके की जरूरत होती ही है। अंग्रेजी में भी एक one liner है कि words should be simple but message should be strong :-)

डिम्पल की इस कविता में मुझे अर्नेस्ट हेनली की ’इनविक्ट्स’ की झलक दिखती है। कविता की शुरुआत एक सूने अँधेरे कमरे में घूमती सी लगती है और धीरे धीरे कदम दर कदम वो उस रोशनी की तरफ़ बढती जाती है जिसे कवियित्री ने यहाँ बसंत कहा है। निर्मल की दस लंबी कहानियों का कवर याद आ गया उसमें भी एक बच्चा अँधेरे कमरे से बाहर धूप की तरफ़ बढ रहा है..

ढेरों बधाईयां डिम्पल। बहुत सारी शुभकामनायें। लिखो.. खूब लिखो..

Navin C. Chaturvedi का कहना है कि -

@ प्रिया जी -

ये अनामी महानुभाव पहले भी कई दफा अनाम होते हुए या सनाम परन्तु अनुपस्थित होते हुए मुझे भी मशविरा देते रहे हैं, मैंने सदैव इन का सम्मान करते हुए अपना पक्ष रखा और बस ....................... अपना काम करता रहा| नतीजा आप सभी के सामने है|

मैं जहां एक तरफ स्वस्थ वार्तालाप का पक्षधर हूँ, वहीं विवादों से बच के भी रहता हूँ| कल इन टिप्पणियों ने मुझे आहत किया इसलिए ही अपना पक्ष रखा था|

आज एक तरफ तो साहित्य से जुडने वाले, उस में भी अच्छे साहित्य से जुडने वाले लोग सीमित होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर किन्तु-परन्तु टाइप क्रिया-कलाप भी हम लोगों के सामने उपस्थित हो रहे हैं| एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं हम लोग जहां हमें कई सारी बातों का ध्यान एक साथ ही रखना पड़ रहा है| समतोल होने के लिए हम लोगों को वाकई संघर्ष करना पड़ रहा है|

अंत में वही दोहराना चाहूँगा की अपना अपना पक्ष रखते हुए, इस चर्चा को एक स्वस्थ वार्तालाप की तरफ मोड देना ही साहित्य के हित में है|

Anonymous का कहना है कि -

कुछ ऐसा होना कहिये था .......

खुले दरीचों में से दिखने लगेगी
..बसंत-बसंत..

के बजाय

खुले दरीचों में से दिखने लगेगा
..बसंत-बसंत..

और

सीखचों पे भी..

के बजाय

सीखचों पर भी..



गलती सम्पादक की है, काम ही नहीं करते छाप देते हे....

बात ख़त्म करो .. माफ़ी अगर गलत लफ्ज इस्तेमाल हुया...

मई कविता के क्षेत्र का नव शिशु हूँ बाप नही,,

अलविदा

सदा का कहना है कि -

वाह ...बहुत ही सुन्‍दर ।

manu का कहना है कि -

@ मई कविता के क्षेत्र का नव शिशु हूँ बाप नही,,



:)


ये गलती सम्पादक कि हो सकती है...हमारी नहीं...

:)

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