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Friday, March 11, 2011

सपना मकान का



जनवरी माह की ग्यारहवीं कविता अनवर सुहैल की है। अनवर सुहैल की ख्याति एक सक्षम कथाकार की है और उनके कथा संग्रह भी खासे चर्चित रहे हैं मगर उनकी कविताएं भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रहती हैं। हिंद-युग्म पर भी उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं और उनकी पिछली कविता गत जुलाई माह मे आयी थी।

कविता: सपना मकान का 

सपना मकान का
अपने मकान का
कैसे हो पूरा
खाली पेट
लंगोटी बांधे
सोच रहा है घूरा
सोच रहा है घूरा कैसे
कटेगी ये बरसात
पैताने बैठा है कुत्ता
नहीं छोडता साथ
घरवालों की होती इज़्ज़त
चाहे हों आवारा
बेघर और बेदर को समझे
चोर ज़माना सारा
खाते पीते लोगों को ही
बैंकों से मिलता लोन
जिनका कोई नाथ न पगहा
उनके लिए सब मौन
काहे देखे घूरा सपना
काहे दांत निपोरे
कह दो उससे नंगा-बूचा
धोए क्या निचोडे......
सपना मकान का
देख रहा है घूरा!


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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य का कहना है कि -

खाते पीते लोगों को ही
बैंकों से मिलता लोन
जिनका कोई नाथ न पगहा
उनके लिए सब मौन.

सच कहा आपने .......

बधाई....कविता अपना सन्देश छोड़ने में सफल रही है.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

खाते पीते लोगों को ही
बैंकों से मिलता लोन
जिनका कोई नाथ न पगहा
उनके लिए सब मौन
बिलकुल सही कहा । चिन्ताजनक स्थिती है
धन दौलत हो जेब मे ,हो जाते सब काम
कलयुग के इस दौर मे चुप बैठे हैं राम
शुभकामनायें।

Unknown का कहना है कि -

...व्यथा और दिली इच्छा साथ साथ व्यक्त करने की कला इस कविता में साफ झलकती है!...बधाई!

‘सज्जन’ धर्मेन्द्र का कहना है कि -

सुंदर रचना, बधाई

Shanno Aggarwal का कहना है कि -

ये है जिंदगी की मौन सचाई
वो क्या समझे पीर पराई
जाके पैर ना गयी विंवाई...

Gabriella Jackson का कहना है कि -

There are some interesting points in time in this article but I don’t know if I see all of them center to heart. There is some validity but I will take hold opinion until I look into it further. Good article, thanks and we want more! Added to FeedBurner as well

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