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सपना मकान का



जनवरी माह की ग्यारहवीं कविता अनवर सुहैल की है। अनवर सुहैल की ख्याति एक सक्षम कथाकार की है और उनके कथा संग्रह भी खासे चर्चित रहे हैं मगर उनकी कविताएं भी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित होती रहती हैं। हिंद-युग्म पर भी उनकी कविताएं प्रकाशित हुई हैं और उनकी पिछली कविता गत जुलाई माह मे आयी थी।

कविता: सपना मकान का 

सपना मकान का
अपने मकान का
कैसे हो पूरा
खाली पेट
लंगोटी बांधे
सोच रहा है घूरा
सोच रहा है घूरा कैसे
कटेगी ये बरसात
पैताने बैठा है कुत्ता
नहीं छोडता साथ
घरवालों की होती इज़्ज़त
चाहे हों आवारा
बेघर और बेदर को समझे
चोर ज़माना सारा
खाते पीते लोगों को ही
बैंकों से मिलता लोन
जिनका कोई नाथ न पगहा
उनके लिए सब मौन
काहे देखे घूरा सपना
काहे दांत निपोरे
कह दो उससे नंगा-बूचा
धोए क्या निचोडे......
सपना मकान का
देख रहा है घूरा!


स्मार्ट बच्चे


प्रतियोगिता की 14वीं कविता अनवर सुहैल की है। अनवर सुहैल की कविताएँ लगभग सभी बड़ी पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं। हिन्द-युग्म में भी इनकी कविताएँ प्रकाशित हुई हैं।

पुरस्कृत कविताः स्मार्ट बच्चे

हमें कुंद बच्चे पसंद नहीं
हमें चाहिए स्मार्ट बच्चे
जो हों सिर्फ अपने घर में
बाकी सारे बच्चे हों भोंदू

बच्चों को बना दिया हमने
अंक जुटाने की मशीन
सौ में सौ पाने के लिए
जुटे रहते हैं बच्चे

माँ-बाप के अधूरे सपनों को
पूरा करने के चक्कर में
बच्चे कहाँ रह पाते हैं बच्चे!
वज़नदार किताबों के
दस प्वाइंट के अक्षरों से जूझते बच्चों को
इसीलिए लग जाता चश्मा
होता अक्सर सिर-दर्द!

बच्चे नहीं जानते
उन्हें क्या बनना है
माँ-बाप, रिश्तेदार और पड़ोसी
दो ही विकल्प तो देते हैं
इंजीनियर या डॉक्टर
बच्चा सोचता है
सभी बन जाएँगे इंजीनियर और डॉक्टर
तो फिर कौन बनेगा शिक्षक,
गायक, चित्रकार या वैज्ञानिक

बच्चे चाहते ऊधम मचाना
लस्त हो जाने तक खेलना
चाहते कार्टून देखना
या फिर सुबह देर तक सोना
बच्चे नहीं चाहते जाना स्कूल
नहीं चाहते पढ़ना ट्यूशन
नहीं चाहते होमवर्क करना

तथाकथित स्मार्ट बच्चों ने
नहाया नहीं कभी झरने के नीचे
( इसमें रिस्क जो है )
तालाब किनारे कीचड़ में
लोटे नहीं स्मार्ट बच्चे
अमरूद चोरी कर खाने का
इन्हें अनुभव नहीं

स्मार्ट बच्चे सिर्फ पढ़ा करते हैं
स्मार्ट बच्चे गली-मुहल्ले में नहीं दिखा करते
स्मार्ट बच्चे टीचरों के दुलारे होते हैं
स्मार्ट बच्चों पर सभी गर्व करते हैं
शिक्षक, माता-पिता और नगरवासी!

बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती स्मार्ट बच्चों को
वही बच्चे जब बनते ओहदेदार
ओढ़ लेते लबादा देवत्व का
नहीं रह पाते आम आदमी

इस बाज़ारू-समाज में भला
कौन आम-आदमी बनने का विकल्प चुने?
कौन असुविधाओं को गले लगाए?

पिता का बूढा होना


प्रतियोगिता की पंद्रहवीं कविता अनवर सुहैल की है। अनवर साहब की एक कविता इसी साल के फरवरी महीने में प्रकाशित हुई थी।

पुरस्कृत कविता: पिता:दो चित्र

पिता: एक

तुम बुड्ढे हो गए पिता
अब तुम्हें मान लेना चाहिए
आने वाला है ‘द एण्ड’

तुम बुड्ढे हो गए पिता
कि तुम्हारा इस रंगमंच में
बचा बहुत थोड़ा-सा रोल
ज़रूरी नहीं कि फिल्म पूरी होने तक
तुम्हारे हिस्से की रील जोड़ी ही जाए

इसलिए क्यों इतनी तेज़ी दिखाते हो
चलो बैठो एक तरफ
बच्चों को करने दो काम-धाम...

तुम बुड्ढे हो गए पिता
अब कहाँ चलेगी तुम्हारी
खामखाँ हुक्म देते फिरते हो
जबकि तुम्हारे पास कोई
फटकता भी नहीं चाहता

तुम बुड्ढे हो गए पिता
रिटायर हो चुके नौकरी से
अब तुम्हें ले लेना चाहिए रिटायरमेंट
सक्रिय जीवन से भी...
तुम्हें अब करना चाहिए
सत्संग, भजन-पूजन
गली-मुहल्ले के बुड्ढों के संग
निकालते रहना चाहिए बुढ़भस

तुम बुड्ढे हो गए पिता
भूल जाओ वे दिन
जब तुम्हारी मौजूदगी में
कांपते थे बच्चे और अम्मा
डरते थे
जाने किस बात नाराज़ हो जाएं देवता
जाने कब बरस पड़े
तुम्हारी दहशत के बादल...

तुम बुड्ढे हो गए पिता
अब क्यों खोजते हो
साफ धुले कपड़े
कपड़ों पर क्रीज़
कौन करेगा ये सब तुम्हारे लिए
किसके पास है फालतू समय इतना
कि तुमसे गप्प करे
सुने तुम्हारी लनतरानियां
तुम इतना जो सोचो-फ़िक्र करते हो
इसीलिए तो बढ़ा रहता है
तुम्हारा ब्लड-प्रेशर...
अस्थमा का बढ़ता असर
सायटिका का दर्द
सुन्न होते हाथ-पैर
मोतियाबिंद आँखें लेकर
अब तुमसे कुछ नहीं हो सकता पिता
तुम्हें अब आराम करना चाहिए
सिर्फ आरा....म!

पिता: दो

मैं भी हो जाऊँगा
एक दिन बूढ़ा
मैं भी हो जाऊँगा
एक दिन कमज़ोर
मैं भी हो जाऊँगा
अकेला एक दिन
जैसे कि हो गए हैं पिता
बूढ़े, अकेले और कमज़ोर
मैं रहता हूँ व्यस्त कितना
नौकरी में
बच्चों में
साहित्यकारी में
बूढ़ा होकर क्या मैं भी हो जाऊँगा
बातूनी इतना कि लोग
कतराना चाहेंगे मुझसे
बच कर निकलना चाहेंगे मुझसे
मैं सोचता नहीं हूँ
कि मैं कभी बूढ़ा भी होऊँगा
कि मैं कभी अशक्त भी होऊँगा
कि मैं कभी अकेला भी होऊँगा
तब क्या मैं पिता की तरह
रह पाऊंगा खुद्दार इतना
कि बना सकूँ रोटी अपनी खुद से
कि धो सकूँ कपड़े खुद से
कि रह सकूँ किसी भूत की तरह
बड़े से घर में अकेले
जिसे मैंने अपने पिता की तरह
बनवाया था बड़े शौक से
पेट काटकर
बैंक से लोन लेकर
शहर के हृदय-स्थल में!
पता नहीं
कुछ भी सोच नहीं पाता हूं
और नौकरी में
बीवी, बाल-बच्चों में
साहित्यकारी में रखता हूँ खुद को व्यस्त
मेरे सहकर्मी भी
नहीं सोच पाते
कि कभी होएंगे वे बूढ़े, कमज़ोर और अशक्त
अक्सर वे कहते हैं
कि ऐसी स्थिति तक आने से पहले
उठा लें भगवान
तो कितना अच्छा हो...

बड़ी विडम्बना है जनाब


प्रतियोगिता की आठवीं कविता अनवर सुहैल की है। 09 अक्टूबर, 1964 को नैला जांजगीर छत्तीसगढ़ में जन्मे अनवर सुहैल अंसारी की कहानियों और कविताओं का प्रकाशन देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में होता रहा है। कुंजड़-कसाई, ग्यारह सितम्बर के बाद,चहल्लुम (कहानी संग्रह), और थोड़ी सी शर्म दे मौला! (कविता संग्रह), पहचान, दो पाटन के बीच (उपन्यास) इनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। 21 वर्ष कोल इण्डिया लि. की सेवा और विगत पांच वर्षों से बहेराबांध भूमिगत खदान में सहायक खान प्रबंधक के रूप में कार्यरत अनवर साहित्यिक पत्रिका ‘संकेत’ का सम्पादन भी कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता: जितना ज्यादा

जितना ज़्यादा बिक रहे
गै़र-ज़रूरी सामान
जितना ज्यादा आदमी
खरीद रहा शेयर और बीमा
जितना ज्यादा लिप्त इंसान
भोग-विलास में
उतना ज्यादा फैला रहा मीडिया
प्रलय, महाविनाश, आतंकी हमले
और ‘ग्लोबल वार्मिक’ के डर!
ख़त्म होने से पहले दुनिया
इंसान चखना चाहता सारे स्वाद!

आदमी बड़ा हो या छोटा
अपने स्तर के अनुसार
कमा रहा अन्धाधुन्ध
पद, पैसा और पाप
कर रहा अपनों पर भी शक
जैसे-जैसे बढ़ती जा रही प्यास
जैसे-जैसे बढ़ती जा रही भूख
वैसे ही बढ़ता जा रहा डर

टीवी पर लगाए टकटकी
देखता किस तरह होते क़त्ल
देखता किस तरह लुटते संस्थान
देखता किस तरह बिकता ईमान

एक साथ उसके दिमाग में घुसते
वास्तुशास्त्र, तंत्र-मंत्र-जाप,
बाबा रामदेव का प्राणायाम
मधुमेह, रक्तचाप और कैंसर के इलाज
कामवर्धक, स्तम्भक, बाजीकारक दवाएं
बॉडी-बिल्डर, लिंगवर्धक यंत्र
मोटापा दूर करने के सामान
बुरी नज़र से बचने के यत्न
गंजेपन से मुक्ति के जतन

इसी कड़ी में बिकते जाते
करोड़ों के सौंदर्य प्रसाधन
अनचाहे बाल से निजात
अनचाहे गर्भधारण का समाधान
सुडौल स्तन
स्लिम बदन के साथ
चिरयुवा बने रहने के सामान
बेच रहा मीडिया...

बड़ी विडम्बना है जनाब
आज का इंसान
होना नहीं चाहता बूढ़ा
होना नहीं चाहता बीमार
और किसी भी क़ीमत में मरना नहीं चाहता...


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।