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हिज्र का भी नसीब होता है



जनवरी माह की चौथे पायदान की रचना सुवर्णा शेखर दीक्षित की है। सुवर्णा का जन्म छिंदवाड़ा मे हुआ। बैंकिंग व्यवसाय से संबद्ध सुवर्णा की हिंद-युग्म पर प्रथम रचना है।



पुरस्कृत रचना: गज़ल

दिल का रिश्ता अजीब होता है
दूर  है जो,  करीब होता है।

तन्हा रातों में चाँद भी तनहा
हिज्र का भी  नसीब होता है।

जानो दिल से जिसे भी चाहोगे
खुलूसे दिल का रक़ीब होता है।

देख लेगा  बिना  बहे  आँसू
माँ का दिल भी अजीब होता है।

शाख़े-गुल आँधियों में टूटेगी
सबका अपना सलीब होता है।

ख्वाब में रोटियाँ ही दिखती हैं
आदमी जब  ग़रीब होता है।

यूँ तो दिखता नहीं है वो ‘इबरत’
फिर भी मेरे क़रीब  होता है।
__________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

हाहाकार


तकरीबन ३० वर्ष से स्रजनकर्म से जुड़ी संगीता सेठी हिंद-युग्म की नियमित पाठिका हैं। हिंद-युग्म की यूनिप्रतियोगिता की स्थाई प्रतिभागी संगीता जी की रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख पत्रिकाओं और समाचार पत्रों मे प्रकाशित हो चुकी हैं। युनिप्रतियोगिता मे कई बार इनकी कविताएँ शीर्ष दस कविताओं मे शुमार रही हैं तथा पिछली प्रतियोगिता मे इनकी एक कविता सातवें स्थान पर रही थी। जनवरी माह मे इनकी इस कविता ने तेरहवाँ स्थान प्राप्त किया है।

कविता: हाहाकार

हाहाकार
मचा है मन में
मै कौन ?
मैं क्यों ?
किसके निमित्त ?
क्या करने आई हूँ पृथ्वी पर ?
प्रश्न दर प्रश्न बढती जाती हूँ
दिल के हर कोने में पाती हूँ
मचा है हाहाकार

चलती जाती हूँ सड़क पर
शोर गाड़ियों का
घुटन धुएँ की
चिल्ल-पौं हॉर्न की
सबको जल्दी
आगे जाने की
उलझे हैं सारथी, हर गाड़ी के
देते हुए गालियाँ, एक दूसरे को
देख रही हूँ मैं
एयरकंडीशन कार में बैठी
मचा है सड़क पर
हाहाकार

चलती हूँ हाई-वे पर
दौड़्ते दृश्यों में
एक बस्ती के बाहर
ज़मीन से ऊपर सिर उठाए
नल के नीचे
बाल्टियों की कतारें
अपनी बारी के इंतज़ार मे
तितर-बितर लोग
उलझते एक दूसरे से
कि नहीं है सहमति
एक घर से दो बाल्टी की
मेरे घर के बाहर
एक बालिश्त घास का टुकड़ा
पी जाता है ना जाने
कितना गैलन पानी
और यहाँ बस्ती में
एक बाल्टी पानी के लिए
मचा है
हाहाकार

पिज़्ज़ा पर बुरकने के लिए
चीज़
केक को सजाने के लिए
क्रीम
डेयरी बूथ पर रोकी कार मैंने
देखकर लम्बी कतार सड़क तक
थोड़ी धक्कमपेल में ठिठकी मैं
कोई झगड़ा
कोई फसाद
आशंका मन में
कतार के सबसे पीछे खड़े
मफलर में लिपटे चेहरे को पूछा
“आज क्या है इस डेयरी पर ”
मूँग की दाल
मिल रही है कंट्रोल रेट पर
बहनजी !
आप भी ले आओ राशन कार्ड
एक धक्के से खिसक गया वो
और पीछे
मचा है यहाँ भी
हाहाकार !

मेरे चाचा का इकलौता बेटा
सड़क दुर्घटना में सो गया
सदा के लिए
चीखों-पुकार
करुण-क्रन्दन
नोच गया दिल
पोस्ट्मार्टम के इंतज़ार में
खड़े हम
अस्पताल के पोर्च में
प्रसव वेदना से तड़पती
माँ ने दम तोड़ दिया
छ्ठा बच्चा था उसका
“अब इतने जनेगी तो
मरेगी ही ना ”
लोगों के जुमले
मचा रहे थे
मन में मेरे हाहाकार

हैती में आया है भूकम्प
ले ली है जानें
कितने लोगों की
रोते, बिलखते, उजड़ते, बिखरते
लोगों के चेहरे
पिछली सारी यादों को गडमड करते
कभी सुनामी, कभी बाढ
कभी भूकम्प, कभी सूखा
और नहीं तो
तूफान-भंवर
इससे भी नहीं थमा
धरती-सागर
तिल-तिल बढती ग्लोबल वार्मिंग
मच रहा हैं
हाहाकार

धरती से ऊपर क्षितिज पर
आसमान में
कभी बादलों का रोना वर्षा से
कभी सूरज का सोखना धरती से
कभी छेद है ओज़ोन परत में
और धरती के पार
आकाश गंगा के रास्ते
सौर मण्डल के अपने दर्द
कभी सूर्य को ग्रहण
कभी चन्द्र को ग्रहण
कभी टूटता तारा
कभी उल्का पिण्ड
अलग होते आकाश से
मचा है खगोल में भी
हाहाकार

उठती हूँ नींद से
मचा है
हाहाकार
अब भी मन में
उथल-पुथल
नख से शिख तक
करता हुआ
आँखे नम
कौन हूँ ?
क्यों हूँ ?
कहाँ से ?
कब आई हूँ ?
अपना ये हाहाकार
कुलबुलाता है
धरती पर
बिसरते लोगों से लेकर
धरती के पार तक
उनके हाहाकार से
छोटा हो गया है
मेरा हाहाकार

चाँद


प्रतियोगिता की बारहवीं कविता मेयनुर खत्री की है। गुजरात से तअल्लुक रखने वाली मेयनुर युनिप्रतियोगिता के स्थायी प्रतिभागियों मे रही हैं। इससे पहले इनकी कविताएँ पिछले वर्ष जुलाई माह मे नवें और अगस्त माह मे छठे स्थान पर रह चुकी हैं।

कविता: चाँद

चाँद रोज़ ही निकलता है,
जाने किसको ढूंढता है,
तभी तो,
हर खिड़की,
हर छत,
वो घूमता है,

जब वो निकलता है,
बहुत छोटा होता है,
फिर जैसे जैसे
उसकी तलाश
उसे मिलने की उसकी आस
बढती जाती है,
वो भी हर रात बड़ा होता जाता है,
और,
नहीं मिलने पर, हर रात छोटा,

और
तब वो थक जाता है,
बिलकुल उदास सा हो जाता है,
एक रात,
निकलता ही नहीं ढूंढने को,

उसी रात,
उसका दिल उसे,
फिर से आस बंधाता है,
और वो फिर चला आता है,
तलाश में किसी की,

किसी रात जरा
तुम अपनी खिड़की खुली रख देना,
चाँद ने बताया है,
वो तो फलक का चाँद है,
और ज़मीं के चाँद की,
उसे तलाश है.

अब वहां कोई पीपल नहीं उगेगा



जनवरी माह की यूनिप्रतियोगिता के ग्यारहवे स्थान पर काबिज कविता के रचनाकार सुरेंद्र अग्निहोत्री हैं। लखनऊ के निवासी सुरेंद्र जी की हिंद-युग्म पर प्रकाशित यह प्रथम कविता है।


अब हम गायेंगे मातमी गीत
क्योंकि पीपल नहीं रहा
इस लिये चिट्ठी नहीं लायेंगे पंक्षी
पंक्षी के रहने को पीपल जरूरी था
हमने अपने हाथों घासलेट डालकर
आग के हवाले कर दिया
अब वहां कोई पीपल नहीं उगेगा
न कोई वहाँ पंक्षी गाना गाएगा
न कोई खुशियों की सौगात लायेगा
अपने हाथों अपनी अनवरत सांसों को रोका है
हमने अपने हाथों अपना घरौंदा फूँका है
लाक्षागृह को आग लगाने वाले कौरव हमीं है
कल की खुशियों के झरोखे और रोशनदान बन्द कर दिये
चीख गूँज रही चारों ओर
पूरा मंजर उदास है
हमारी देह अन्धी सुंरग में बदहवास है !!

नयी सदी की औरत


यूनिकवि प्रतियोगिता के जनवरी 2010 अंक की दसवीं कविता की रचनाकारा अनुपम अनुपम अपूर्व, अनुपम मोंगा और अनुपम मेहता नामों में से किसी एक नाम को इस्तेमाल करती हैं। सिरसा(हरियाणा) में जन्मीं 35 वर्षीय अनुपम ने कुरुक्षेत्र यूनीवर्सिटी से 1996 में अंग्रेजी में स्नातकोतर, हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी से बी.एड. और चौ. देवीलाल युनिवर्सिटी से एम .फिल॰ कर चुकी हैं। एम एल एस एम कॉलेज सुंदरनगर (हिमाचल प्रदेश), मुम्बई के सी.एम.के. कॉलेज व चौ. देवी लाल यूनिवर्सिटी सिरसा में बतौर प्रवक्ता अध्यापन कर चुकीं अनुपम इन दिनों पूर्ण कालिक लेखन व गृहसंचालन कर रही हैं। लिखने पढने का शौक हमेशा से ही रहा। प्रकाशित करवाने में अधिक रुचि नहीं रही। बीच-बीच में स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ और गजलें प्रकाशित हुईं तो सिरसा के मशहूर ग़ज़लकारों यथा डॉ. जी. डी. चौधरी व डॉ. राज कुमार निजात आदि का प्रोत्साहन व सहयोग मिला। पहला कविता संग्रह प्रकाशित करवाने के लिए तैयार है "ग़ज़ल के साथ साथ"(ग़ज़ल संग्रह), शब्द शब्द आक्रोश"(कविता संग्रह), जर्जर कश्ती(पत्रिका)आदि में कविताएँ प्रकाशित। कभी-कभी पत्रिका "चम्पक" में भी बाल कविताएँ प्रकाशित। सी.ए.पति की व्यस्तता व तबादले, बच्चों की जिम्मेदारियों के चलते कैरिएर को प्राथमिकता नहीं दी। अब मुंबई में रिहाइश है व स्थानीय स्कूल में अध्यापिका बनने की कोशिश में हैं।

पुरस्कृत कविता: नयी सदी की औरत

अब मैं वो पेड़ नहीं बन सकती
कि तुम पत्थर मारो
और मैं फल दूँ तुमको
मैं वो नाव नहीं बन सकती
कि तुम जिधर को खेओ
मैं खिचती चली जाऊँ
मैं वो फूल नहीं बन सकती
कि तुम पत्ती-पत्ती करके मसलो
और मैं बेशर्मी से महकती रहूँ
नहीं मैं वो काँटा भी नहीं हूँ
कि बिना तुम्हारे छेड़े
चुभ जाऊँ हाथों में
पर वो बादल भी नहीं हूँ
कि किसी को प्यासा देख इतना बरसूँ
कि खुद खाली हो जाऊँ
तुम्हें छाया चाहिए
फल चाहिए
तो मुझे भी खाद पानी देना होगा
तुम्हें पार लगाने का दायित्व मेरा सही
पर मुझे लहरों की दिशा में तो खेना होगा
मेरा रंग, गंध, स्पर्श तुम ले लो
पर मुझे डाली के साथ तो लगे रहने देना होगा
स्वीकार सको तो स्वीकारो
मुझे मेरे समस्त गुणों-अवगुणों
और तमाम शर्तों के साथ
वरना मैं खुश हूँ
सिर्फ मैं होने में ही


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द


सुमीता प्रवीण केशवा कई विधाओं में एक साथ लेखन में सक्रिय हैं। हिन्द-यु्ग्म को खूब पढ़ती भी हैं। हर आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। इस बार प्रतियोगिता से इनकी एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं, जिसका प्रतियोगिता में नौवाँ स्थान हैं।

पुरस्कृत कविता: शब्द

हाँ, शब्दों से खेलती हूँ मैं
कभी यहाँ, तो कभी वहाँ
शब्दों ठेलती हूँ मैं।
नये-नये शब्दों को पिरोकर
एक नई रचना में
अपनी बादशाहत समझती हूँ मैं।
......समझती हूँ नई रचना रची है मैंने,
लेकिन वह रचना
जिसे गढ़ने का दावा करती हूँ मैं..
खोल-खोल देते हैं मुझे..
बोल-बोल देते हैं मुझे...
रेशा-रेशा मेरा शब्दों के भीतर से
झाँक-झाँक उठता है....
मुझे ही ठेले जाने का क्रम चलता रहता है...
अपने को ही पाती हूँ मैं उन शब्दों के कारवाँ में,
जिन्हें गढ़ने का दंभ पाले रखती हूँ मैं
जबकि सच तो यह है कि
मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द!!!


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

बड़ी विडम्बना है जनाब


प्रतियोगिता की आठवीं कविता अनवर सुहैल की है। 09 अक्टूबर, 1964 को नैला जांजगीर छत्तीसगढ़ में जन्मे अनवर सुहैल अंसारी की कहानियों और कविताओं का प्रकाशन देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में होता रहा है। कुंजड़-कसाई, ग्यारह सितम्बर के बाद,चहल्लुम (कहानी संग्रह), और थोड़ी सी शर्म दे मौला! (कविता संग्रह), पहचान, दो पाटन के बीच (उपन्यास) इनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। 21 वर्ष कोल इण्डिया लि. की सेवा और विगत पांच वर्षों से बहेराबांध भूमिगत खदान में सहायक खान प्रबंधक के रूप में कार्यरत अनवर साहित्यिक पत्रिका ‘संकेत’ का सम्पादन भी कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता: जितना ज्यादा

जितना ज़्यादा बिक रहे
गै़र-ज़रूरी सामान
जितना ज्यादा आदमी
खरीद रहा शेयर और बीमा
जितना ज्यादा लिप्त इंसान
भोग-विलास में
उतना ज्यादा फैला रहा मीडिया
प्रलय, महाविनाश, आतंकी हमले
और ‘ग्लोबल वार्मिक’ के डर!
ख़त्म होने से पहले दुनिया
इंसान चखना चाहता सारे स्वाद!

आदमी बड़ा हो या छोटा
अपने स्तर के अनुसार
कमा रहा अन्धाधुन्ध
पद, पैसा और पाप
कर रहा अपनों पर भी शक
जैसे-जैसे बढ़ती जा रही प्यास
जैसे-जैसे बढ़ती जा रही भूख
वैसे ही बढ़ता जा रहा डर

टीवी पर लगाए टकटकी
देखता किस तरह होते क़त्ल
देखता किस तरह लुटते संस्थान
देखता किस तरह बिकता ईमान

एक साथ उसके दिमाग में घुसते
वास्तुशास्त्र, तंत्र-मंत्र-जाप,
बाबा रामदेव का प्राणायाम
मधुमेह, रक्तचाप और कैंसर के इलाज
कामवर्धक, स्तम्भक, बाजीकारक दवाएं
बॉडी-बिल्डर, लिंगवर्धक यंत्र
मोटापा दूर करने के सामान
बुरी नज़र से बचने के यत्न
गंजेपन से मुक्ति के जतन

इसी कड़ी में बिकते जाते
करोड़ों के सौंदर्य प्रसाधन
अनचाहे बाल से निजात
अनचाहे गर्भधारण का समाधान
सुडौल स्तन
स्लिम बदन के साथ
चिरयुवा बने रहने के सामान
बेच रहा मीडिया...

बड़ी विडम्बना है जनाब
आज का इंसान
होना नहीं चाहता बूढ़ा
होना नहीं चाहता बीमार
और किसी भी क़ीमत में मरना नहीं चाहता...


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

आओ मेरे बूढ़े देश की जवान बेटियो


प्रतियोगिता की सातवीं कविता तरुण ठाकुर की है। युवा कवि तरुण की एक कविता पिछले महीने भी प्रकाशित हुई थी।

पुरस्कृत कविता: अलग अदा से

किसी रुचिका या आरुशी
के मरने पर
प्रतिक्रिया करता समाज
बँट जाता है
कई खानों में
हर खंड से
मगर
एक सी गंध
आती है
पुरुष के
लम्पट
दुराग्रह,
व्यभिचार,
और
अपने अतीत को
न्यायसंगत
ठहराने की ...
अपनी बेटी
बेटी है
औरों की
भोग्या
और
इसी दुर्भाव
को
पुष्ट करते
कराते
माध्यम रूपी
श्वान
हड्डियाँ
निकाल लाते हैं
उपेक्षित कब्रों से
और
हम
अभिशप्त हैं
उनकी
फैलाई गंध में
श्वास लेने और
बीमार होने को
आओं मेरे
बूढ़े देश की
जवान बेटियो
बचा सकती हो
तो बचा लो
भविष्य की
नगरवधुओं को
और
अवसर मत दो
किसी पुरुष को
तुम्हारे
उद्धार का
क्यूँकि
उनकी मलिन
अमर्यादित
अपेक्षाओं और
कुंठाओं
को
तुम ही तो
जमीन देती हो!

इस दुनिया की
सारी सचारित्रता
तुम्हारे आधार ही
खड़ी है

झटक दो ज़रा
अपना कान्धा
इस बार
कुछ
अलग अदा से
कि तुम्हारे साथ
उद्धार हो जाए
मानवता का
जो
कट गयी थी
जन्म से
गर्भनाल की तरह...


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

माँ उपमा नहीं होती


मृत्युंजय साधक की एक कविता प्रतियोगिता के माध्यम से प्रकाशित हो चुकी हैं। आज हम इनकी जो कविता प्रकाशित कर रहे हैं, उसने जनवरी 2010 माह की प्रतियोगिता में छठवाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: मां उपमा नहीं होती

माँ हिमालय से भी ऊंची होती है
लेकिन
पाषाण की तरह कठोर नहीं
सागर से भी गहरी होती है मां
लेकिन
सागर जैसी खारी नहीं
भगवान को भी जन्म देती है माँ
लेकिन
भगवान की तरह दुर्लभ नहीं होती
माँ तो वायु से भी ज्यादे गतिशील है
पर
अदृश्य बिल्कुल नहीं
दिखती रहती है हरदम
हम सब के बीमार होने पर
गुमसुम
बैठी सिरहाने
माथे पर हाथ फेरते.....
लम्बी उम्र की कामना करते ....
यह शाश्वत सत्य है...
मां उपमा नहीं हो सकती
क्योंकि
कोई नहीं है
मां के समान
किससे करें हम उपमा उसकी............
मां...
मां ...होती है
सिर्फ मां ....
मां उपमा नहीं होती


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

मैं और मेरी संवेदना का अंतर


प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता प्रतियोगिता में दूसरी बार भाग ले रहे और हिन्द-युग्म पर पहली बार प्रकाशित हो रहे उमेश्वर दत्त "निशीथ" की है। 9 सितम्बर 1962 को बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में जन्मे उमेश्वर दत्त मिश्र "निशीथ" बड़ोदा उत्तर प्रदेश ग्रामीण बैंक में प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। एम.कॉम.,सी.ए.आई.आई.बी.,बैंकिंग उन्मुख हिन्दी प्रमाण पत्र, सी.आई.सी, सी.डब्लू.डी.एल. जैसी शिक्षा प्राप्त कर चुके निशीथ की कविताएँ राष्ट्रीय स्तर के कई काव्य-संग्रहों में स्थान पा चुकी हैं। प्रमुख रूप से हास्य-व्यंग्य एवं गीत, छंद, लिखने वाले उमेश्वर ने कई काव्य-संग्रहों के संपादन में सहयोग भी दिया है। उमेश्वर कई साहित्यिक और गैरसाहित्यिक संस्थाओं से भी सम्बद्ध हैं।

पुरस्कृत कविता: मेरी संवेदना

जब सूरज
छुप गया कुहरे के डर से,
नहर पुल पर
काँप रही थी इस्त्री करती लड़की
झीने वस्त्रों में
चस्पा हो जाती हर एक नजर।
रेल की छुक-छुक के साथ
मूंगफली, रेवड़ी,
या गुटखा की आवाज लगाता बचपन।
काँपती हथेली फैला देता
लाठी के सहारे खड़ा बुढ़ापा।
ढाबे के कोने में
बर्तन मलता छोटू,
चुपके से गटक लेता जूठे पनीर का टुकड़ा।
रात के धुंधलके में
चौराहे के छोर पर,
इशारे से रोक कर कार,
बैठ जाती किसी घर की इज्जत।
तब मेरी संवेदना
पढ़ लेती है
विवशता की भाषा,
पर क्यों नहीं समझता मैं
संवेदना की भाषा
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

स्वर्ग के नये दरवाजे की चाभी समलैंगिकों ने हथिया ली थी


अरविन्द श्रीवास्तव ने लम्बा समय साहित्य को दिया है। पिछले माह से हिन्द-युग्म पर भी सक्रिय हैं। यूनिकवि प्रतियोगिता के जनवरी 2010 अंक में इनकी कविता ने चौथा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविता: समलैंगिक कार्यक्रम के प्रति

न्यूनतम साझे कार्यक्रम की प्रचलित परंपरा
अपनी जिम्मेदाराना चुप्पी तोड़ते हुए
हत्यारे के पक्ष में
क्षमा की याचना करते
निर्वस्त्र झुकी है
यह जानते हुए कि धरती
एक पौधे की अपेक्षा नहीं रख सकती
समलैंगिकों से
ऐसे समय में जब धरती पर
शूरवीर और पराक्रमी जनों की आवश्यकता
शिद्दत से महसूस की जा रही थी,
अभी कई-कई ग्रहों को भेदना शेष था
नैसर्गिकता के कथित दमघोंटू पचड़े के विरुद्ध
स्वर्ग के नये दरवाजे की चाभी
समलैंगिकों ने हथिया ली थी
सभ्य राष्ट्रों में उनकी लामबंदी और
लीगल राइट के खबरों पर
दुनिया के दूसरे हिस्से में ‘सभ्य’ बनने की
होड़ मची थी, जिसके तहत
टोले-नगर, महानगर बन रहे थे जंगल
जिसके लिए जीवन शैली की नयी परिभाषा
गढ़ी जा रही थी
जिसमें नैतिकता को रूढ़िवादी सोच के खाते में
डाला गया था
साझे कार्यक्रम की सफलता
चुप्पी पर आधारित थी
एचआईवी तरह की जोखिमों को देखते हुए
जुबान पर कंडोम की सिफारिश थी और
इसे लोकप्रिय बनाने की सहमति
आम होते जा रही थी
किसी बहसबाजी पर ह्यूमेन राइट अब
अधिक चौकन्ना दिख रहा था
कुछ और नस्लें लुप्त होने वाली थीं
कुछ वायरस अश्व गति से करीब आ रहे थे
साझे कार्यक्रम के मुख्य एजेंडे मे
निर्धारित था जिनका राज्याभिषेक
कूँ-कूँ करती कुछ आवाजें
दबोच ली गयी थीं
कुछ आँखें नाटक कर रही थीं
अंधा होने का।
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

चीनी, दाल, चावल और गेहूँ


अखिलेश श्रीवास्तव हिंद-युग्म के ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं ने हिंदी के प्रखर आलोचकों का भी आकृष्ट किया है. इन्होंने जब भी यूनिकवि प्रतियोगिता में भाग लिया शीर्ष १० में स्थान बनाया है. जनवरी माह की प्रतियोगिता में भी इनकी कविता ने तीसरा स्थान बनाया है.

पुरस्कृत कविता: महंगाई- चीनी / दाल / चावल / गेहूँ

चीनी:
पिता जी चिल्लाकर
कर रहे हैं रामायण का पाठ
बेटा बिना खाए गया है स्कूल
छुटकी को दी गयी है नाम कटा
घर बिठाने की धमकी
माँ एकादसी के मौन व्रत में
बड़बड़ाते हुए कर रही है
बेगान-स्प्रे का छिड़काव
हुआ क्या है?
कुछ नहीं ...
कल रात
चिटियाँ ढो ले गयी हैं
चीनी के तीन दाने
रसोई से।


दाल :
बीमार बेटे को
सुबह का नुख्सा और
दोपहर का काढ़ा देने के बाद
वो घोषित कर ही रहा होता है
अपने को सफल पिता
कि
वैद्य का पर्चा डपट देता है उसे
सौ रुपये की दिहाड़ी में कहाँ से लायेगा
शाम को
दाल का पानी


चावल :
आध्यात्मिक भारत बन गया है
सोने की चिड़िया
और चुग रहा है मोती
पर छोटी गौरैया की
टूटे चोच से रिस रहा है खून
जूठी पर
साफ़ से ज्यादा साफ़
थालियों में आज भी
नहीं मिल पाया चाउर खुद्दी का
इक भी दाना
बेहतर होता
अम्मा की नज़र बचा
खा लेती
नाली के किनारे के
दो चार कीड़े।


गेहूँ:
तैतीस करोड़ देवताओ में
अधिकांश को मिल गए हैं
कमल व गुलाब के आसन
पर लक्ष्मी तो लक्ष्मी है
वो क्षीर सागर में लेटे
सृष्टिपालक विष्णु के
सिरहाने रखे
गेहूँ की बालियों पर
विराजमान हैं।
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

पेड़ो, तुम जंगल में ही रहना


जनवरी 2010 की दूसरी कविता नवम्बर 2009 माह के यूनिकवि रह चुके रवीन्द्र शर्मा 'रवि' की है। रवि अपनी ख़ास किस्म की ग़ज़लों के लिए भी हिन्द-युग्म के पाठकों के मध्य पहचाने जाते हैं।

पुरस्कृत कविता: पेड़

तुमने उसी दिन रहन रख दी थी अपनी अस्मिता
जिस दिन तुमने आदमी को
जंगल के बीच में से होकर
गुजरने का अधिकार दे दिया था .....
तब नहीं सोचा था तुमने
कि पैरों में इतनी आग लिए घूमता है आदमी
और वनफूलों को इतना ताप सहने की आदत नहीं है
अब हाल ये है कि
जंगल तो शहर में ले आया है आदमी
पगडंडियाँ तब्दील हो गयी हैं
तारकोली सड़कों में
और तुम किसी अनपढ़ देहाती की तरह
भूल बैठे हो
अपने ही गाँव की
सीधी-साधी पगडण्डी का पता
और समझ नहीं पाते हो
शहर की दोमुँही सड़कों का भूगोल
जहाँ आदमी
फिर फिर वहीं आ जाता है
जहाँ से फिर कोई
अपने गाँव लौट नहीं पाता है .....

पेड़,
सड़क की बीच वाली पटरी पर खड़े तुम
गैस चेम्बर में पड़े कैदी की मानिंद
जब भी छटपटाते हो
तभी अपना कोई हिस्सा
शरीर से कटा पाते हो
तुम ये बार-बार भूल जाते हो
कि यह जंगल नहीं है
यहाँ के अपने नियम होते हैं
और यहाँ
एक निश्चित दायरे से बाहर हाथ बढ़ाना
अपराध है
यहाँ तुम्हारे चारों ओर जंगल नहीं
जंगला है
तुम्हें उसी के हिसाब से बढ़ना है
किसी मासूम बच्चे सी बेल को
किसी वृद्ध पीपल के कन्धों पर
किलकारी मार कर नहीं चढ़ना है
पेड़,
तुम क्यों नहीं समझते
कि बदल चुके हैं
तुम्हारी स्नेहिल छाया के सन्दर्भ
पत्थर के बदले परछाई का सिद्दांत
अब बेवकूफी की निशानी है
और मेहनतकश आदमी तथा बदहवास आदमी के पसीने में
फर्क होता है ........
अपना विस्तार रोको पेड़
चिमनियों के शिरों को ऊंचा जाने दो
गगनचुम्बी इमारतों में बैठे आदमी को
पता लगाने दो
कि बादल
अब बहुत नीचे तक क्यों नहीं आते
और सतरंगा इन्द्रधनुष
गाँव के गंवार लोगों के पास क्यों धरा है अब तक ....
इन्हें पता लगाने दो पेड़
कि गाँव के मिटटी गारे से बने पुश्तैनी घर
अब तक कैसे खड़े हैं ज्यों के त्यों
और हर बरसात में
उनके बूढ़े शरीरों से
सोंधी महक क्यों आती है
और यहाँ
गारंटीशुदा सीमेंट से बन रही खूबसूरत इमारत
बनने से पहले क्यों गिर जाती है ......
इन्हें तुम नहीं समझा पाओगे पेड़
कि मकान के खड़े रहने का सम्बन्ध
मन से है
धन से नहीं
और महकने के लिए
मिट्टी से जुड़ा होना बहुत आवश्यक है
अब संध्या के समय
बसों -कारों के कलरव में
बातूनी चिडियों का इंतज़ार
बहुत बेमानी हो गया है
अब शायद न ही बौराएँ तुम्हारी डालियाँ
क्योंकि उन्हें पहले ही
बौनी मानसिकता के हिसाब से
काट दिया जाएगा
और कटे हुए कन्धों पर सर रखने
क्षितिज कभी नहीं आएगा
ऐसे में
तुम्हारा जी तो बहुत घबराएगा
पर पेड़ करना इंतज़ार उस दिन का
जब कोई भूला भटका परिंदा
रुकेगा तुम्हारे पास
कुछ देर के लिए
और जाते जाते दे जायेगा ढेरों यादें
जंगल की अल्हड सावनी सभ्यता की...
तब कर तो कुछ नहीं पायोगे तुम
पर इतना ज़रूर कहना
पेड़ो तुम जंगल में ही रहना
शहर जंगल से अधिक भयानक है .
पेड़ हों या परिंदे
किसी का भी पक्की सड़कों की तरफ आना
खतरे से खाली नहीं है
कौवों की रियासत में कोयल के लिए
एक भी आरक्षित डाली नहीं है
यहाँ आम का अमलतास से लिपटना
संक्रमण या अतिक्रमण
कुछ भी हो सकता है
प्रेम प्रकरण नहीं हो सकता
आतंक की त्रासदी जी रहे शहर में
आम अमलतास के साथ नहीं सो सकता
यहाँ केवल
बौने दरबारी पेड़ ही चलते हैं
चुनावों के मौसम में
ख़ास-ख़ास क्षेत्रों में फलते हैं
शेष या तो काट दिए जाते हैं
या बिना जल के
तिल-तिल जलते हैं ...
इसलिए पेड़ो
तुम जंगल में ही रहना
यहाँ पैरों में बहुत आग लिए घूमता है आदमी
और वनफूलों को
इतना ताप सहने की आदत नहीं है
पेड़ो तुम जंगल में ही रहना ......
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।