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Saturday, February 27, 2010

मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द


सुमीता प्रवीण केशवा कई विधाओं में एक साथ लेखन में सक्रिय हैं। हिन्द-यु्ग्म को खूब पढ़ती भी हैं। हर आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। इस बार प्रतियोगिता से इनकी एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं, जिसका प्रतियोगिता में नौवाँ स्थान हैं।

पुरस्कृत कविता: शब्द

हाँ, शब्दों से खेलती हूँ मैं
कभी यहाँ, तो कभी वहाँ
शब्दों ठेलती हूँ मैं।
नये-नये शब्दों को पिरोकर
एक नई रचना में
अपनी बादशाहत समझती हूँ मैं।
......समझती हूँ नई रचना रची है मैंने,
लेकिन वह रचना
जिसे गढ़ने का दावा करती हूँ मैं..
खोल-खोल देते हैं मुझे..
बोल-बोल देते हैं मुझे...
रेशा-रेशा मेरा शब्दों के भीतर से
झाँक-झाँक उठता है....
मुझे ही ठेले जाने का क्रम चलता रहता है...
अपने को ही पाती हूँ मैं उन शब्दों के कारवाँ में,
जिन्हें गढ़ने का दंभ पाले रखती हूँ मैं
जबकि सच तो यह है कि
मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द!!!


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द!!!
शब्दों को गढना और फिर शब्दो द्वारा खुद को गढा जाना
सुन्दर अभिव्यक्ति

tina का कहना है कि -

Hello Ms. Keshwa,
yeh ek bohot hi pyaari kavita hai.. mujhe yakin hai ki mujhe jaise kai log kahi na kahi apni zindagi ko mahsoos karte hai...
ati sundar..

शोभा का कहना है कि -

मुझे ही ठेले जाने का क्रम चलता रहता है...
अपने को ही पाती हूँ मैं उन शब्दों के कारवाँ में,
जिन्हें गढ़ने का दंभ पाले रखती हूँ मैं
जबकि सच तो यह है कि
मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द!!!
अच्छा लिखा है। होली की शुभकामनाएं।

Mohit का कहना है कि -

बहुत बधाई सुमीता जी..सच लिखने में कितनी मुश्किल होती है...लेकिन आपने सुन्दर कविता द्वारा सबके मन की बात कह दी..आभार!

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

लेकिन वह रचना
जिसे गढ़ने का दावा करती हूँ मैं..
खोल-खोल देते हैं मुझे..
बोल-बोल देते हैं मुझे...
रेशा-रेशा मेरा शब्दों के भीतर से
झाँक-झाँक उठता है....

ऐसा अक्सर होता है..जब हम कुछ नई रचना करने जाते है उससे पहले खुद को एक बार टटोलना भी पड़ता है..सुंदर अभिव्यक्ति...बधाई सुमीता जी इस बढ़िया प्रस्तुति के लिए!!

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