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ग्रहण का सच


अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की शीर्ष 10 कविताओं से आगे बढ़ते हैं। 11वीं सुमीता प्रवीण केशवा की है। सुमीता इससे पहले भी हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं।

कविताः यह ग्रहण नहीं, है पाणिग्रहण

हाँ, चाँद हूँ मैं...
जैसे चन्द्रमुखी थी एक
और हे सूर्यदेव, देवदास हो तुम!
कभी पूरब तो कभी पश्चिम
थोड़े उत्तर तो थोड़े दख्खिन की ओर
लड़खड़ाते फिरते हो तुम !
प्रेम के पुजारी हो तुम !
हे देव, पृथ्वी जब पारो बनकर
तुम्हें अपने बाहुपाश में जकड़ लेती है
तो लोग आतंकित हो उठ्ते हैं
तरह-तरह की बातें किया करते हैं
लेकिन उस वक्त....
मैं हौले से मूंद लेती हूँ अपनी आँखों को
स्वीकार कर लेती हूँ तुम्हारे प्रेम प्रसंग को
लीन हो जा्ते हो तुम पारो की आगोश में
मुझे भूलकर .....
नहीं है आपत्ति मुझे इस पर
क्योंकि हे देव, तुम्हीं तो हो
पारो के प्रथम पुरुष!!
प्रेम के नशे में मदमस्त रहने वाले
हे दिव्य पुरुष
तुम नहीं जानते
तुम्हारी ऊर्जा है कोटि अनंत
जिसके एक अंश भर से यह संसार चलायमान है
और हे देव...
जब तुम प्रेम में रत रहते हो
तब...तब तुम्हारी ऊर्जा
अपना दायरा तोड़ती हुई
छलछला उठती है
तुम संभाल नहीं पाते अपनी ऊर्जा को...
तुम्हारी अनंत ऊर्जा को समाहित कर लेती हूँ मैं अपने में
ताकि भस्म न कर दे इस संसार को तुम्हारी अपार ऊर्जा!!
और हे दिव्य पुरुष
लोग फिर भी हमारे प्रणय को देखने की गलती कर बैठते हैं
और ग्रहण नहीं कर पाते तुम्हारी धधकती हुई ऊर्जा को
इसलिए हमारे मिलन को वे अशुभ कहते हैं
लेकिन वे भूल जाते हैं
यह ग्रहण नहीं, है पाणिग्रहण !
दो प्रेमी का है मधुर मिलन
है प्रकृति का यह खास नियम
रतिक्रिया का जब हो अनुगमन
तब है निषेध वह अवलोकन...
तब है निषेध वह अवलोकन!!!

मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द


सुमीता प्रवीण केशवा कई विधाओं में एक साथ लेखन में सक्रिय हैं। हिन्द-यु्ग्म को खूब पढ़ती भी हैं। हर आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। इस बार प्रतियोगिता से इनकी एक कविता प्रकाशित कर रहे हैं, जिसका प्रतियोगिता में नौवाँ स्थान हैं।

पुरस्कृत कविता: शब्द

हाँ, शब्दों से खेलती हूँ मैं
कभी यहाँ, तो कभी वहाँ
शब्दों ठेलती हूँ मैं।
नये-नये शब्दों को पिरोकर
एक नई रचना में
अपनी बादशाहत समझती हूँ मैं।
......समझती हूँ नई रचना रची है मैंने,
लेकिन वह रचना
जिसे गढ़ने का दावा करती हूँ मैं..
खोल-खोल देते हैं मुझे..
बोल-बोल देते हैं मुझे...
रेशा-रेशा मेरा शब्दों के भीतर से
झाँक-झाँक उठता है....
मुझे ही ठेले जाने का क्रम चलता रहता है...
अपने को ही पाती हूँ मैं उन शब्दों के कारवाँ में,
जिन्हें गढ़ने का दंभ पाले रखती हूँ मैं
जबकि सच तो यह है कि
मुझे ही गढ़ देते हैं मेरे ही शब्द!!!


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

तुम स्वार्थी थे या संत?


प्रतियोगिता की 12वीं कविता की रचनाकार सुमीता प्रवीण केशवा जन्म हल्द्वानी (नैनिताल, उत्तराखंड) में हुआ,लेकिन फिलहाल मुम्बई में निवास रही हैं। लेखन का शौक बचपन से ही रहा। बिजनेस संभालने के साथ ही लेखन का शौक पूरा किया। फ्रीलान्स पत्रकार, विभिन्न पेपरों में राजनीतिक कॉलम। कुछ कविताएँ प्रकाशित कुछ प्रकाशनार्थ। साथ ही कई कविताओं का मंचन, 'पापुलर प्रकाशन' के साथ बच्चों की कई अंग्रेज़ी कॉमिक्सों का हिन्दी में अनुवाद। 'मैं स्वयंसिद्धा' कहानी, किराये की कोख पर आधारित उपन्यास 'एक पहल ऐसी भी', समलैंगिक सम्बंधों पर आधारित नाटक 'सम-बंध'। फिल्म राइटर्स एसोसोएशन की एसोसिएट सदस्य।

कविता- स्वार्थी कहूं या संत तुम्हें...

क्योंकि स्वार्थी हो गये थे तुम...
अपने में ईश्वर को भी नहीं पहचान पाये तुम !
तुम्हीं तो थे जो साथ लिए मुझे..
मंदिर में जाया करते
ईश्वर को सच्चे प्यार का विश्वास दिलाया करते
तब...तब मैं भाव विभोर हो देखा करती तुम्हें...
कितने लीन होकर तुम उस परम पिता को
साक्षी बना रहे थे अपने प्यार का !
और हाँ..... वह साक्षी बना भी
हर बार की तरह वह मुस्कराकर
आशीर्वाद देता भी।
तुम कितने निश्पाप मन से
ईश्वर से मुझको मांगा करते
तब उस वक्त मैं तुम्हारी आंखों में प्रेम की
निर्मल धारा बहते देखती और...
उतर जाती उस ईश्वर की प्यास में
चली जाती तुम्हारे साथ उस ईश्वर की आस में
ईश्वर को छलते तुम या मुझको छलते ?
मै तो ईश्वर को पा रही थी तुम्हारे साथ चलते !
बैखौफ़ सी उन पगडंडियों में चली जा रही थी मैं
जिनके सपने तुम दिखा रहे थे मुझे
सपनों की दुनिया में उड़ रही थी बिन पंख लगाये
द‍ृष्टा बनना था मुझे...बन गयी द‍ृष्टिहीन
छोड आये तुम मुझे उस अन्तहीन छोर पर
जहां से आगे न मंजिल थी न कोई डगर
अब...अब तो मैं हूं अकेली
पथराई पहेली सी..
लौट आई फ़िर वहीं...
जहां छला जाना ही औरत की नियति है
लेकिन जानती है.....फिर भी चलना जानती है
प्यार में ठोकर मिले तो क्या ?
प्यार में कुछ क्षण ईश्वर को तो पा ही लेती है !
तुम्हें नहीं आया ईश्वर को पाना तो क्या....
ये तुम्हारी बदनसीबी है
आज तुम मुझसे प्यार करने की गलती का प्रायश्चित कर रहे हो
और मैं...तप्त...शांत...गहरी झील सी..
औरत की तरह प्यार करके तो देखो....
ईश्वर को सच्चा मान कर तो देखो....
वह महसूस कराता है
अपने को तुम्हारे भीतर रहकर!
अब दर्द नहीं कोई गिला नहीं
न छले जाने का कोई दुख !
....फ़िर भी तुम्हारी शुक्रगुजार हूं मैं
क्योंकि किसी एक क्षण में जब मैं ईश्वर में थी...
उस तक पहुंचने का माध्यम तुम्हीं तो थे !
हां तुम्हीं...!
ऋणी रहूंगी तुम्हारी उस एक पल के लिए
जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ.....
और उस कान्हा से प्यार हुआ.......
सुना है संत ही ईश्वर के दर्शन कराते हैं....
उस तक पहुंचने का रास्ता बताते हैं...
तुम्हीं कहो उस तक पहुंचने के लिए
स्वार्थी कहूं या संत तुम्हें....?