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मैं स्वतंत्र हूँ


ऋषभ कुमार मिश्र 'निशीथ' पिछले महीने से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं। इनकी एक कविता पिछले महीने प्रकाशित हुई थी। अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता ने 12वाँ स्थान बनाया है।

कविताः तुम्हें क्या

तुम्हें क्या!
कुटिल मुस्कान और कुछ नशीली बातें,
ये तुम्हारे लिए बस एक मज़ाक है|
लेकिन मैं,
इन मुस्कान और इन बातों से,
सपनों का संसार बुनता हूँ,
जीता हूँ,
लेकिन भूल जाता हूँ,
सपने तो टूटते हैं...........
तुम्हारी आहट मुझे जगाती है,
याद दिलाती है, कि
यह प्रीत तो,
अवयस्क किशोरी की नाजायज़ संतान है,
जिसे तुमने वैधता नहीं दी है,
वैधता और मान्यता तो वस्तुनिष्ठता के शब्द जाल हैं|
मुझे तुम्हारी वैधता नहीं चाहिए,
और न,
तुम्हारे समाज की मान्यता,
वैधता और मान्यता क्या कभी मुक्ति दिलाते हैं?
ये तो वस्तुनिष्ठता के भंवर में फँसाते हैं|
मैं हूँ,
हाँ मैं हूँ,
और मेरी प्रीत है|
तुम हो,
या नहीं हो,
यह निर्णय तुम्हारा है|
मैं स्वतंत्र हूँ,
तुम्हारे निर्णय से परे हूँ,
प्रीत के उन्मुक्त गगन में,
उड़ चला
मुक्त लघु कण हूँ|

ग्रहण का सच


अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की शीर्ष 10 कविताओं से आगे बढ़ते हैं। 11वीं सुमीता प्रवीण केशवा की है। सुमीता इससे पहले भी हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं।

कविताः यह ग्रहण नहीं, है पाणिग्रहण

हाँ, चाँद हूँ मैं...
जैसे चन्द्रमुखी थी एक
और हे सूर्यदेव, देवदास हो तुम!
कभी पूरब तो कभी पश्चिम
थोड़े उत्तर तो थोड़े दख्खिन की ओर
लड़खड़ाते फिरते हो तुम !
प्रेम के पुजारी हो तुम !
हे देव, पृथ्वी जब पारो बनकर
तुम्हें अपने बाहुपाश में जकड़ लेती है
तो लोग आतंकित हो उठ्ते हैं
तरह-तरह की बातें किया करते हैं
लेकिन उस वक्त....
मैं हौले से मूंद लेती हूँ अपनी आँखों को
स्वीकार कर लेती हूँ तुम्हारे प्रेम प्रसंग को
लीन हो जा्ते हो तुम पारो की आगोश में
मुझे भूलकर .....
नहीं है आपत्ति मुझे इस पर
क्योंकि हे देव, तुम्हीं तो हो
पारो के प्रथम पुरुष!!
प्रेम के नशे में मदमस्त रहने वाले
हे दिव्य पुरुष
तुम नहीं जानते
तुम्हारी ऊर्जा है कोटि अनंत
जिसके एक अंश भर से यह संसार चलायमान है
और हे देव...
जब तुम प्रेम में रत रहते हो
तब...तब तुम्हारी ऊर्जा
अपना दायरा तोड़ती हुई
छलछला उठती है
तुम संभाल नहीं पाते अपनी ऊर्जा को...
तुम्हारी अनंत ऊर्जा को समाहित कर लेती हूँ मैं अपने में
ताकि भस्म न कर दे इस संसार को तुम्हारी अपार ऊर्जा!!
और हे दिव्य पुरुष
लोग फिर भी हमारे प्रणय को देखने की गलती कर बैठते हैं
और ग्रहण नहीं कर पाते तुम्हारी धधकती हुई ऊर्जा को
इसलिए हमारे मिलन को वे अशुभ कहते हैं
लेकिन वे भूल जाते हैं
यह ग्रहण नहीं, है पाणिग्रहण !
दो प्रेमी का है मधुर मिलन
है प्रकृति का यह खास नियम
रतिक्रिया का जब हो अनुगमन
तब है निषेध वह अवलोकन...
तब है निषेध वह अवलोकन!!!

हर रस्ते की एक कहानी लगती है


स्वप्निल तिवारी 'आतिश' हिन्द-युग्म पर अत्यंत सक्रिय हैं। ग़ज़लें लिखते हैं। अब तक इनकी 3 कविताएँ प्रकाशित है। आज हम जो कविता प्रकाशित करने जा रहे हैं, उसने अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में 10वाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविताः सीधी सादी एक कहानी लगती है

ये जोड़ी इक राजा रानी लगती है
सीधी सादी एक कहानी लगती है

दिल भी कितनी बार सुने, झेले इसको
धड़कन की हर बात पुरानी लगती है

जंगल, वादी, सहरा दरिया ..सब सहरा
मुझको तेरी गोदी धानी लगती है

बात बुजुर्गों की सुनता है कौन भला
बच्चों की बातें, नादानी लगती है

आवाजों के जमघट में सन्नाटा है
कुछ तो इसने मन में ठानी लगती है

मुझे खबर है, खुदा है, वो ना आयेगा
उसकी "हाँ" भी "आनाकानी" लगती है

आज समन्दर ने उसको कुछ यूँ देखा
नदिया शर्म से पानी-पानी लगती है

दिल के सेहन में शब भर महकी जाती है
बात तुम्हारी रात की रानी लगती है

चौराहों पर मिल कर कहते सुनते हैं
हर रस्ते की एक कहानी लगती है

थोड़ी आँच ज़रा रौशनी और धुआँ
"आतिश" की हर इक शय फानी लगती है


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

खचाखच भर चुकी होगी पृथ्वी


अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की नौवीं कविता के रचनाकार बीकानेर (राज॰) निवासी राजेन्द्र स्वर्णकार काव्य की सभी विधाओं, रंगों-रसों में राजस्थानी, हिंदी और उर्दू में ( ब्रज, भोजपुरी और अंग्रेजी में भी ) मुख्यतः छंदबद्ध के सृजनकर्म में समलग्न हैं। लगभग ढाई हज़ार से अधिक गीत, ग़ज़ल, नवगीत, कवित्त, सवैयों, कुंडलियों सहित दोहों, सोरठों, कविताओं का सृजन कर चुके हैं। लगभग ढाई सौ से भी अधिक स्वयं की मौलिक धुनों का निर्माण कर चुके राजेन्द्र ने मंच के मीठे गीतकार और लोकप्रिय ग़ज़लकार के रूप में लगभग चालीस शहरों, कस्बों, गावों में कवि सम्मेलन, मुशायरों में ससम्मान काव्यपाठ किया है। आकाशवाणी से भी निरंतर रचनाओं का प्रसारण। देश भर में लगभग सवा सौ पत्र-पत्रिकाओं में एक हज़ार से अधिक रचनाएँ ससम्मान प्रकाशित। अनेक महत्वपूर्ण संकलनों में परिचय और रचनाएँ संकलित। गीत-ग़ज़ल के शीर्षस्थ हस्ताक्षरों द्वारा इनके कृतित्व की प्रशंसा हुई है। अब तक दो पुस्तकें (रूई मांयी सूई {राजस्थानी ग़ज़ल संग्रह/ प्रकाशन वर्ष 2002} और आईनों में देखिए { हिंदी ग़ज़ल संग्रह/ प्रकाशन वर्ष 2004 }) प्रकाशित। अनेक सम्मानों से सम्मानित।

पुरस्कृत कविताः शरण कहाँ मिलेगी

मूल्य
संस्कार
नैतिकता
मर्यादा
आत्म विवेचन
और
जीव ऐसे ही कुछ अन्य …
विलुप्त जातियों के !

नहीं बन सके जो
केंद्र आकर्षण का
युग के बच्चों में ,
डायनासोर के समकक्ष…!

न ही जगा सके अकुलाहट भरी उत्सुकता
कमरों की चिटकनियाँ
भीतर से बंद किये बैठी
नवयौवनाओं में,
आँखों से चिपके
कंप्यूटर स्क्रीन पर तैरती
पोर्न साइट्स की तरह…!

नहीं हुए ये शोध का विषय
पुरातत्ववेत्ताओं के लिए
समुद्र में संभाव्य द्वारिका के समान…!

सरक लेती है
इन सफ़्हों को पढ़ने से
गुरेज़ करती
फुहड़ाती-नंगाती
ऐंचक-भैंचक पीढ़ी भावी कर्णधारों की …!

रोती है रोना, तो बस…
बुढ़ाई बेबस हड्डियाँ
लोथ लाशें कुछ,
…आँखों के सामने
देखते हुए
अपहरण ज़बरज़िना और क़त्ल
इन कलेजों के टुकड़ों का!

परंतु,

निग़ल ली गई है संभावना
सावित्री के सत्यवान के पुनर्जीवित होने की…
पाताललोक की आवारा मछली द्वारा
शकुंतला की अंगूठी की तरह…,
और,
बिसर चुका है काल-दुष्यंत
मूल्य
संस्कार
नैतिकता
मर्यादा
आत्म विवेचन
आदि-आदि!

होगा भी क्या,
कभी मिल भी गए जीवाश्म
इनके यदि…,
संस्कृति के समुद्र में
बंसी लटकाने आए
किसी शौक़िया सैलानी को?

… … …
चल रहा है घुटरुन अभी तलक
विज्ञान - शिशु ... ... ...

पता नहीं कब
कैसे बचकर पंजों से बटुकभोगियों के,
रखेगा क़दम वह
परिपक्व यौवन की दहलीज़ पर ?
और,
पाएगा अपनी पूर्णता को !

रह भी पाएगा भला नामलेवा कोई इनका
तब तक?

फूँक भी दिए गए प्राण यदि,
एकत्र किए हुए अवशेषों में
किसी तरह …

शरण कहां मिलेगी!?

खचाखच भर चुकी होगी पृथ्वी
और भी विषैले-भयावह जीवों से
तब तक … … … … !


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

चिड़िया भूखी थी भूखी है पौ-बारह सरपंचों की


अवनीश सिंह चौहान हिन्द-युग्म की प्रतियोगिता में पहली बार भाग ले रहे है और इनकी कविता ने आठवाँ स्थान बनाया है। 4 जून 1979 को जन्मे अवनीश की कविताएँ, कहानियाँ, आलेख, समीक्षाएँ इत्यादि अमर-उजाला, हिंदुस्तान, देश-धर्म, डी एल ए, उत्तर-केसरी, प्रेस-मेन, नए-पुराने, अभिनव-प्रसंगवश, संकल्प-रथ, यदि, गोलकोंडा-दर्पण, आश्वस्त, युग-हलचल, साहित्यायन, आदि मैं हिंदी गीत, कहानियां, समीक्षाएं प्रकाशित होती रही हैं। साथ ही इनकी आधा दर्जन अंग्रेजी किताबें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पढ़ी-पढायीं
जा रहीं है। नए-पुराने (अनियतकालिक) पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं। वर्तमान में इटावा (उ॰प्र॰) के एक महाविद्यालय में अंग्रेजी के व्याख्याता हैं।

पुरस्कृत कविताः जलती समिधाएँ

अटीं-पटीं दीवारें रहतीं
विज्ञापन के पर्चों से

गयी कमाई दाल-भात में
ले डूबी कभी दवाई
सुरसा-सा मुँह बाये बैठी
आँगन-द्वारे महँगाई

प्याज झरप भर रहा आँख में
तीखा ज्यादा मिर्चों से

किया जतन पर जोड़ न पाये
मिल-जुलकर दाना-पानी
एक तिहाई तेल निकलता
पिर करके पूरी घानी
कद्दा लागत जोड़-घटा कर
उबर न पाये खर्चों से

छुप गयी हकीकत नारों में
करतूतें सब मंचों की
चिड़िया भूखी थी भूखी है
पौ-बारह सरपंचों की
धूँ-धूँ-कर जलतीं समिधाएँ
देवालय तक चर्चों से


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

बादल खोल के मेरी आरजुएँ देखना तुम


अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की सातवीं कविता ऋतु सरोहा द्वारा रचित है। ऋतु की कविताएँ इससे पहले दो और बार इस प्रतियोगिता के शीर्ष 10 में स्थान बना चुकी हैं।

पुरस्कृत कविताः अजनबी

तुम्हें याद है ना
मेरी आरज़ुओं को आदत थी
तुम्हारे फलक के
रंगीन सितारे तकने की,
इन दिनों ये मुरझाईं-सी हैं ...
यूँ करो एक रोज़
अपना फलक
एक डिबिया में रख के
भेज दो ना.....

हवा से माँगता नहीं हैं दिल
साँस की एक भी लहर क्यूँकि
अब हवाओं के दिल में इश्क नहीं,
धडकनों में ना घुट के मर जाये
तेरी चाहत की नब्ज़ का जरिया...
हवा का एक पुर-इश्क क़तरा
अपनी मुट्ठी में बाँध कर फेंको...

नज़र पाँवों की धुँधलाई पड़ी है
थकन के खूब सारे अश्कों से,
चलते हैं ना देख पाते हैं,
वो वादा हमकदम हो जाने का
वो वादा आज फिर से भेजो ना
इन्हें रस्ता दिखे चलने लगे ये

कानों को बहुत शिकायत है
ना आवाज़ लाती हूँ तुम्हारी
ना ही परोसती हूँ वो हँसी
जिनकी आदत-सी पड़ी गयी थी इन्हें ...
हँसी की आज नन्ही बूँद कोई
लबों पे रख के इधर भेजो ना

तुम्हारे मस का स्वाद हाथों को
एक मुद्दत हुई, नहीं आया
तो अब हर शय का लम्स हाथों को
बहुत बेस्वाद सा लगने लगा है ..
एक एहसास तुम अपनी छुवन का
अपनी खुशबु में भर के भेजो ना ...

बहुत मुश्किल है ना
मुझको ये सब भेजना,
तो यूँ करती हूँ मैं
बादल की एक बोरी में
आरजू, दिल, कान, पाँव अपने
हाथ के साथ बाँध देती हूँ
रेशमी लहरों के इक धागे से
और भेज देती हूँ तुमको ..

बादल खोल के
मेरी आरजुएँ देखना तुम
उन्हें रखना शब भर अपने फलक पर
तुम्हारे तारों का उनको ज़रा तो साथ मिले ..

तुम अपनी छत पे
खुली-सी हवा में
जहाँ पे इश्क इश्क मौसम हो
मेरे दिल को टाँग देना बस,
कि दम भर साँस ले
चाहत तेरी रखे जिंदा ..

एक वो हमकदम होने का वादा
मेरे पाँवो को ऐसे दे देना
जैसे पोंछी हो तुम ने आँखें भी
और वो देख पायें रास्ते भी ,
चाहे ये थोड़ी देर ही क्यूँ हो..

मेरे कानों को रखना जेब में तुम
कि तुम किसी से भी हम-सुखन होगे
इनके पेट को भरते रहोगे ..

हाथ को रखना तुम
हथेली पर ही अपनी
तुम्हारे मस की खुशबू
जब तलक भर जाये ना इनमे ...

मगर
तुम अजनबी हो अब मुझसे
तो क्या इक अजनबी के लिए तुम
इतना सब कुछ कर भी पाओगे?


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

माँ ने बना लिया है ब्लॉग, पैदा कर लिए हैं ईमेल-पते


संगीता सेठी के कविता के पात्र सामान्तयाः स्त्रियाँ ही होती हैं। इनकी कविताएँ हमारे निर्णायकों को भी पसंद आती हैं। इन सभी बातों का ताज़ा उदाहरण अप्रैल माह में छठवाँ स्थान बना चुकी इनकी यह कविता है-

पुरस्कृत कविताः नहीं बाँच सकती कोई माँ

वो ज़माना चिट्ठी पत्री का
जब बांच नहीं सकती थी माँ
ज़माने भर की चिट्ठियाँ
बस रखती थी सरोकार
अपने बेटों की चिट्ठियों से
जो दूर देश गया था कमाने
सुन लेती थी अपने पति कि बाणी में
या घर की सबसे पढी लिखी बहू से
पर फिर भी उन्हें आँचल में छिपाकर
सुनने जाती थी
पड़ौस की गुड्डी या शन्नो से
तृप्त हो जाती थी आत्मा
और फिर से आँखें ताकती थी हर शाम
उस डाकिए को

इस कमजोरी से उबरी
माँ अब साक्षर होने लगी
चिट्ठियों के लफ्ज़ पह्चानने लगी
इधर बेटे बेटियों के लफ्ज़
होने लगे और गहरे
माँ को नमस्ते ! पापा को राम-राम !
और बाकी बातें
पढे लिखे भाई-बहनों के लिए
लिखी जाने लगी
माँ उन दो पंक्तियों को आँखों में समाए
संजोने लगी चिट्ठियाँ
एक लोहे के तार में
और जब तब निकाल कर पढ लेती
वो दो पंक्तियाँ
डाकिए का इंतज़ार रहता
अब भी आँखों में

माँ ने पढना लिखना शुरु किया
गहरे शब्दों के मर्म को जाना
बेटे-बेटियों की चिट्ठियाँ
अब उसकी समझ के भीतर थी
पर ये शब्द जल्द ही
एस.एम.एस.में बदल गए
मोबाइल उसकी पहुँच से
बाहर की चीज़ बन गया
अब हर रिंगटोन पर
अपने पोते से पूछती
किसका एस.एम.एस ?
क्या लिखा ?
कुछ नही
कम्पनी का है एस.एम.एस
आप नहीं समझोगी दादी माँ!

माँ को और ज़रूरत हुई
बच्चों को समझने की
उसने जमा लिए हाथ
की-बोर्ड पर
माउस, क्लिक और लैपटॉप की
बन गई मल्लिका
जान लिए इंटरनेट से जुड़्ने के गुर
पैदा कर लिए अपने ई-मेल पते
बना लिए ब्लॉग
मेल और सैण्ड पर क्लिक
हो गया है
उसके बाएँ हाथ का खेल
भेजने लगी अपने इंटरनेटी दोस्तों को
मेल और सुन्दर संदेश

बच्चे बड़े हो गए हैं
चले गए गए हैं परदेस
माँ अपने ई-मेल पते देती है
बेटा सॉफ्ट्वेयर इंजीनीयर है
बेटी आर्कीटेक्चर के कोर्स में
है व्यस्त
हर रोज़ अपने लैपटॉप
पर देखती है स्क्रीन
आज तो आया होगा
कोई लम्बा संदेश
उसकी आँखें थक रही हैं
स्क्रीन के रेडिएशन पर
नज़र जमाए
पर नहीं आया कोई मेल
माँ चिट्ठी के ज़माने में
पहुँच गई है
जहाँ नहीं बाँच सकती कोई माँ
अपने बच्चों की चिट्ठियाँ


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

मै टूटे बर्तन के जैसी लगातार रिसती जाती हूँ


प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता की रचयित्री रंजना डीन दूसरी बार यूनिकवि प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही हैं, लेकिन पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। रंजना डीन पिछले तीन वर्षों से लखनऊ (उ॰प्र॰) के एक प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। व्यावसायिक रूप से कलाकार हैं। इन्हें प्राकृतिक सौंदर्य, फोटोग्राफी, कला एव कविता लेखन में बेहद रूचि है।

पुरस्कृत कविताः मैं टूटे बर्तन के जैसी

कुछ सूनापन कुछ सन्नाटा
मन ने नहीं किसी से बाँटा
दर्द न जाने क्यों होता है
दीखता नहीं मुझे वो काँटा।

गुमसुम-सी खिड़की पर बैठी
आते जाते देखूँ सबको
अपने से सारे लगते हैं
तुम बोलो पूजूँ किस रब को।

पुते हुए चेहरों के पीछे का
काला सच दिख जाता है
दो रूपए ज़्यादा दे दो
तो यहाँ ख़ुदा भी बिक जाता है।

नहीं लोग अपने से लगते
नहीं किसी से कह सकते सब
सब इंसा मौसम के जैसे
जाने कौन बदल जाये कब?

दौड़ में ख़ुद की जीत की ख़ातिर
कितने सर क़दमों के नीचे
हुनर कोई भी काम न आया
सारे दबे नोट के नीचे।

मेहनत की चक्की में पिस कर
दिन पर दिन घिसती जाती हूँ
मै टूटे बर्तन के जैसी
लगातार रिसती जाती हूँ।


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

आज तुम लटके मिले हो फाँसी पर


युवा कवि दीपक मशाल अपनी लेखनी को लगातार परिपक्व करते जा रहे हैं। सितम्बर 2009 का यूनिकवि सम्मान प्राप्त कर चुके दीपक की एक कविता ने अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में चौथा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविताः बीज

और आज तुम लटके मिले हो फाँसी पर
मगर फिर भी शहीद ना बन पाए

अनगिन ख्वाबों के बीज अनगिनत
तुमने रोपे मेरी आँखों में
और चले गए बिन सींचे ही
मैंने कई बार सोचा
भून डालूँ इन बीजों को
अपने गुस्से की आग में

कई बार पूछना चाहा
कब सोना उगलेगी ज़मीन
कब अनाज से भरेंगे खलिहान
कब खिंच पायेगा ग्राफ
हक़ीक़त के सरकारी कागज़ पर
खालीपन से संतृप्तता की तरफ बढ़ता हुआ

अम्मा की कपड़े धोने वाली उस मुगरी से
जब पहली बार गेंद को पीटा था
तो झन्नाटेदार तमाचा मिला था इनाम तुमसे
इस कड़े निर्देश में पाग के कि
किसान का बेटा बनेगा सिर्फ किसान
और एकदिन झोंका गया था बल्ले को चूल्हे की आग में
जब जीत के लाया था मैं
मौजे के सबसे बेहतर बल्लेबाज़ का खिताब

अंकुरित होने से पहले ही
तुमने कर दी थी गुड़ाई उन बीजों की
जो सहमे से छिपाए थे खुद में
अस्तित्व एक उभरते खिलाड़ी का
फिर उन्हीं में जबरन बो दिए
जग के अन्नदाता बनने के सपने वाले बीज
ये समझा के कि बीज ही है आत्मा किसान की
बीज ही है जान इस जहान की..

दिन-बा-दिन बारिश बिना लीलती रही ये सूखी ज़मीन
हमारी खाद, हमारी आत्मा
और हर अगले साल
पुरानी को छोड़े बगैर पकड़ते गए हम
क़र्ज़ के काँटों वाली एक नयी डाली

खुशियाँ फिसलती गयीं
कभी अचार के तेल में सनी चम्मच की तरह

कभी गीले हाथ से निकलते साबुन की तरह
ना जाने क्यों लगा था तुम्हें
हमारे उगाये करोड़ों और अरबों ये दाने

हमें बना देंगे अन्नदाता दुनिया का

क्यों लगा कि वो उपज
बेहतर होगी किसी खिलाड़ी के बल्ले से उपजे
चार, पांच या छः छक्कों से
और बदले में मिल जायेंगे तुम्हें भी
लाखों नहीं तो कुछ हज़ार रुपये ही
जो आयेंगे काम चुकाने को क़र्ज़
चलाने को जीवन।

हरक्युलिस की तरह
कर्जों की धरती का बोझ तुम मुझसे कहे बगैर
मिरे काँधों पर कर गए स्थानांतरित

और आज तुम लटके मिले हो फाँसी पर
मगर फिर भी शहीद ना बन पाए...


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

गायब हो जाता है


हिन्द-युग्म के अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता के तीसरे स्थान की कविता की कवयित्री नीरा त्यागी ने पहली बार इस प्रतियोगिता में भाग लिया है। नई दिल्ली में जन्मीं नीरा मिरांडा हाऊस, दिल्ली यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक हैं। ब्रिटेन के सरकारी प्रोजेक्ट्स में मैनेजर की नौकरी कर रही हैं। पिछले कुछ समय से ब्रिटेन की हिंदी बिरादरी और हलचल में कविताओं और कहानियों के
जरिये कोशिश। कवयित्री मानती हैं कि लिखना सिर्फ आसमान और वज़ूद की तलाश नहीं है, जमीन और जड़ों से जुड़ने का प्रयास भी है। 'काहे को ब्याहे बिदेस' नाम से ब्लॉग भी लिखती हैं।

पुरस्कृत कविताः गायब हो जाता है

दिन
मुझे ठगता है
हर राहगीर में एक चेहरा दिखा
अँधेरे में जा छिपता है

शाम
मुझे नंगे पाँव
बर्फ पर दौड़ाती है
यादों के पेड़ पर लिखा एक नाम
पत्ते-पत्ते पर पढवाती है

अंगुलियाँ
जबरन बटन दबा
उसे पास बुलाती हैं

धड़कने
दिन भर उसे कोस
रात को खुशबू में
उसकी
चुपचाप सो जाती हैं

वजूद मुझे
अंगूठा दिखा
उसका हाथ पकड़
इतराता है

दिल के भीतर
तिजोरी तोड़
वो मेरा चैन
रेजगारी समझ ले जाता है

मुझे तुमसे महब्बत है
मेज़ पर जमी धुल
पर लिख
वो फिर गायब हो जाता है।


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

कोखजने का दम तोड़ना


एम वर्मा कई बार हिन्द-युग्म की प्रतियोगिता में भाग ले चुके हैं और लगभग हर बार ही इनकी कविताओं ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया है। जनवरी 2010 के यूनिकवि सम्मान से सम्मानित हैं। अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी कविता ने दूसरा स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविताः कोखजने का दम तोड़ना

मैंने देखा है
अपने जवान पश्नों को
उन बज्र सरीखे दीवारों से टकराकर
सर फोड़ते हुए
जिसके पीछे अवयस्क बालाएँ
अट्टहासों की चहलकदमी के बीच
यंत्रवत वयस्क बना दी जाती है
और
बेशरम छतें भरभराकर ढहती भी नहीं हैं

मैनें देखा है
आक्सीजन की आपूर्ति बन्द कर देने के कारण
अपने नवजात, नाजुक और अबोध
प्रश्नों को दम तोड़ते हुए
अक्सर मैं इनके शवों को
कुँवारी की कोख से जन्मे शिशु-सा
कंटीली झाड़ियों के बीच से उठाता हूँ

बहुत त्रासद है
कोखजने को दम तोड़ते हुए देखना
और फिर खुद ही दफनाना
हिचकियाँ भी तो प्रश्नों का रूपांतरण ही हैं
तभी तो मैं इन्हें जन्म ही नहीं लेने देता
और आँसुओं की हर सम्भावना का
गला घोट देता हूँ

जी हाँ! यही सच है
अब मैं अपने तमाम प्रश्नों का गला
मानस कोख में ही घोट देता हूँ
मेरा अगला कदम
उस कोख को ही निकाल फेंकना है
जहाँ से इनका जन्म सम्भावित है


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

मुंगेर मेल से हिन्द-युग्म पहुँचा अप्रैल 2010 का यूनिकवि


हमें बहुत खेद है कि हम अप्रैल 2010 की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणाम अभी तक नहीं प्रकाशित कर पाये। असल में निर्णायकों ने जिस कविता को यूनिकवि चुना, उस कवि ने अपनी कविता को मुंगेर (बिहार) से स्कैन करके भेजा था और कविता के साथ अपना कोई फोन/मो॰ नं॰ भी नहीं छोड़ा था। हमने शनिवार 1 मई को यूनिकवि को ईमेल किया कि कृपया आप अपना परिचय और फोटो ईमेल करें ताकि हम सोमवार 3 मई 2010 को परिणाम प्रकाशित कर सकें। लेकिन अभी तक कवि का कोई उत्तर नहीं आया। गौरतलब है कि यूनिकवि प्रतियोगिता के लिए प्राप्त प्रविष्टियों को पहले यूनिकोड में टाइप किया जाता है (यदि कविताएँ यूनिकोड में टंकित नहीं हैं तो), उसके बाद कविता से कवियों का नाम व तखल्लुस इत्यादि हटाकर दो या तीन चरणों में 5 से 6 निर्णायकों को भेजा जाता है। निर्णयोंपरांत विजेताओं को ईमेल से सूचित किया जाता है और उनसे परिचय, चित्र और डाक का पता इत्यादि माँगे जाते हैं। इस बार की यूनिकविता के रचनाकार ने बहुत सुदूर क्षेत्र से अपनी कविता भेजी है, इसलिए हमें यह यूनिकवि प्रतियोगिता की एक ऊँची छलांग भी लगी। इससे यह सीख भी मिली कि प्रतियोगिता के अन्य अंकों से प्रतिभागियों द्वारा शुरू में ही परिचय और चित्र मँगवा लिये जाय।

कुछ निर्णायकों ने कहा कि यदि उत्तर नहीं मिल रहा तो दूसरे स्थान के रचनाकार को यूनिकवि घोषित कर सकते हैं। लेकिन फिर सर्वसम्मति से यह तय हुआ कि कवि के डाक के पते पर इस परिणाम के संदर्भ में एक चिट्ठी भेजी जाय और बिना कवि के परिचय और चित्र के कविता प्रकाशित की जाय। हिन्द-युग्म रचना का कद रचनाकार से ऊँचा मानता है और रचना को ही रचनाकार की पहचान।


इसलिए अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता के परिणाम, पहली कविता हम केवल कवि के नाम के साथ प्रकाशित कर रहे हैं। अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में कुल 54 कवियों ने भाग लिया। पहले चरण में 3 जज और दूसरे चरण में 2 जज शामिल किये गये।

यूनिकवि- संजीव कुमार सिंह

पता- कंठ कॉलोनी, अरगड़ा रोड
लल्लू पोखर, मुंगेर (बिहार)- 811201

पुरस्कृत कविता- जलाई गई औरत

वह कौन है
अपरिचिता
सर से पाँव तक
जली हुई औरत
वस्त्र के नाम पर एक पतला कमरबंद
बगल में सोया बच्चा
भंगिमा ऐसी
जैसे गाँधी मृत कस्तूरबा का हाथ थामे
स्थिर चपुचाप बैठे हों
टपकते आँसू
जुंबिश केवल होंठों में
वह औरत कैसे जल गई
या जलाई गई
यह प्रश्न कोतवाली से चक्कर
काटता हुआ
कचहरी की अंधी गलियों में
गुम हो चुका है
मेरे सामने वह
पत्थर में उकेरी गई उत्तर-सी बैठी है
वह स्थिर है
जैसे एक मादा भ्रूण
भारतमाता के गर्भ से टपका हो
आपादमस्तक
रोमविहीन, लाल-गुलाबी चमड़ी
वह ठोस है
नज़रों को धिक्कारती हुई
मरघट में राख बन जाने पर
दो दिन बाद वह
अखबार के अक्स में उतर जायेगी
चाय की चुस्की के साथ
आदतन आह में सिमट जायेगी,
पितृसत्तात्मक दुनिया का इतिहास
लालच और हिंसा
वर्जित फल की तरफ लपकते
कदमों के नीचे कुचले जा रहे बीज
गीली कुंठा का आवेग
गर्भ की मर्दाना मॉनोपली
कितने प्रश्नों का उत्तर
यहाँ है
इस अल्पविराम की आकृत्ति में
बैठी हुई एक जली हुई औरत
यहाँ पर
कोई पूर्णविराम नहीं।

पुरस्कार और सम्मान- समयांतर, की ओर से पुस्तकें तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की ओर से पुस्तकें प्रेषित की जायेंगी, उनके नाम हैं-

एम वर्मा
नीरा त्यागी
दीपक 'मशाल'
रंजना डीन
संगीता सेठी
ऋतु सरोहा
अवनीश सिंह चौहान
राजेन्द्र स्वर्णकार
स्वप्निल तिवारी 'आतिश'


हम शीर्ष 10 के अतिरिक्त भी बहुत सी उल्लेखनीय कविताओं का प्रकाशन करते हैं। इस बार हम निम्नलिखित 2 कवियों की कविताएँ भी एक-एक करके प्रकाशित करेंगे-

सुमीता केशवा
ऋषभ मिश्रा


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 7 जून 2010 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

हिन्द-युग्म दिसम्बर 2010 में वार्षिकोत्सव का आयोजन करेगा, जिसमें वर्ष भर के 12 यूनिकवियों के साथ-साथ 4 पाठकों को भी सम्मानित किया जायेगा। वार्षिक पाठक सम्मान के लिए फिलहाल एम वर्मा पहले दावेदार के रूप में दिखाई दे रहे हैं। अन्य पाठकों से अनुरोध है कि वे हिन्द-युग्म पर प्रकाशित सभी रचनाओं पर समीक्षात्मक टिप्पणी करें और यूनिपाठक सम्मान के हकदार बनें।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। इस बार शीर्ष 12 कविताओं के बाद की कविताओं का कोई क्रम नहीं बनाया गया है, इसलिए निम्नलिखित नाम कविताओं के प्राप्त होने से क्रम से सुनियोजित किये गये हैं।

बोधिसत्व कस्तूरिया
अंतराम पटेल
अनामिका घटक
धमेन्द्र मन्नु
विजय आनंद
पारुल माहेश्वरी
कमलप्रीत सिंह
अंजनी गिरि
मंजू गुप्ता
प्रवेश सोनी
अलका मेहता
डॉ॰ अजमल खान
अरुणा कपूर
तरुण ठाकुर
नीरज पाल
जयेश चांदवानी
रतन कुमार शर्मा
जोमयीर जीनी
मृत्युंजय साधक
नज़र द्विवेदी
सुधीर गुप्ता 'चक्र'
हेमा चंदानी
अजय दुरेजा
दिगम्बर नासवा
गोपाल दत्त देवतल्ला
देवेश पाण्डेय
शिखा गुप्ता
अंजु गर्ग
देव कुमार
रेणू दीपक
राज कुमार शर्मा 'राजेशा'
अमृत सागर
सुमन 'मीत'
दीपक कुमार
पीयूष दीप राजन
स्नेह “पीयूष”
शामिख फ़राज़
सुलभ जायसवाल
आलोक उपाध्याय 'नज़र'
आशीष पंत
राजेश्वर 'अकेला'
शील निगम