हिंद-युग्म के समस्त पाठक-वर्ग को नववर्ष की ढेरों मंगलकामनाएँ। प्रतियोगिता की बाकी बची कविताओं की तरफ़ चलते हैं। रंजना डीन की सघन अनुभूतियों से सजी एक कविता ’मै टूटे बर्तन के जैसी लगातार रिसती जाती हूँ’ हमारे पाठक नई माह मे ही परिचित हो चुके हैं। इनकी प्रस्तुत कविता भी मनोभावों के वैसे ही गाढ़े रसायन मे घुलती जाती है। इसने नवंबर माह मे बारहवाँ स्थान बनाया है।
कविता: दूर तक मैंने बटोरे रौशनी के कारवां
दूर तक मैंने बटोरे
रौशनी के कारवां
था मुझे शायद पता
ये रात की शुरुवात है
मै लबों से कह दूँ
ये उम्मीद न करना कभी
है समुन्दर से भी गहरी
मेरे दिल की बात है
हम भरोसे के भरोसे
खा चुके हैं ठोकरें
कर भी क्या सकते थे
आखिर आदमी की ज़ात है
कम नहीं थे हौसले
न हिम्मतों में थी कमी
बदनसीबी की लकीरों से
सजे ये हाथ हैं
छलनी है सीना मगर
गाता रहा मीठी ग़ज़ल
बांसुरी के जैसा शायद
मेरे दिल का साज़ है
लोग कहतें है मेरी मुस्कान
है मीठी है बहुत
उनको क्या मालूम
ये तो दर्द की सौगात है




प्रतियोगिता की पाँचवीं कविता की रचयित्री रंजना डीन दूसरी बार यूनिकवि प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही हैं, लेकिन पहली बार प्रकाशित हो रही हैं। रंजना डीन पिछले तीन वर्षों से लखनऊ (उ॰प्र॰) के एक प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। व्यावसायिक रूप से कलाकार हैं। इन्हें प्राकृतिक सौंदर्य, फोटोग्राफी, कला एव कविता लेखन में बेहद रूचि है।

