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Sunday, May 30, 2010

मैं स्वतंत्र हूँ


ऋषभ कुमार मिश्र 'निशीथ' पिछले महीने से हिन्द-युग्म पर सक्रिय हैं। इनकी एक कविता पिछले महीने प्रकाशित हुई थी। अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता ने 12वाँ स्थान बनाया है।

कविताः तुम्हें क्या

तुम्हें क्या!
कुटिल मुस्कान और कुछ नशीली बातें,
ये तुम्हारे लिए बस एक मज़ाक है|
लेकिन मैं,
इन मुस्कान और इन बातों से,
सपनों का संसार बुनता हूँ,
जीता हूँ,
लेकिन भूल जाता हूँ,
सपने तो टूटते हैं...........
तुम्हारी आहट मुझे जगाती है,
याद दिलाती है, कि
यह प्रीत तो,
अवयस्क किशोरी की नाजायज़ संतान है,
जिसे तुमने वैधता नहीं दी है,
वैधता और मान्यता तो वस्तुनिष्ठता के शब्द जाल हैं|
मुझे तुम्हारी वैधता नहीं चाहिए,
और न,
तुम्हारे समाज की मान्यता,
वैधता और मान्यता क्या कभी मुक्ति दिलाते हैं?
ये तो वस्तुनिष्ठता के भंवर में फँसाते हैं|
मैं हूँ,
हाँ मैं हूँ,
और मेरी प्रीत है|
तुम हो,
या नहीं हो,
यह निर्णय तुम्हारा है|
मैं स्वतंत्र हूँ,
तुम्हारे निर्णय से परे हूँ,
प्रीत के उन्मुक्त गगन में,
उड़ चला
मुक्त लघु कण हूँ|

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

तुम हो,
या नहीं हो,
यह निर्णय तुम्हारा है|
मैं स्वतंत्र हूँ,
तुम्हारे निर्णय से परे हूँ,
जायज और नाजायज सापेक्ष हैं. शब्दजाल इन्हें उलझाते हैं.

सुन्दर रचना

पलक का कहना है कि -

पुरुष की आंख कपड़ा माफिक है मेरे जिस्‍म पर http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/05/blog-post_9338.html मेरी नई पोस्‍ट प्रकाशित हो चुकी है। स्‍वागत है उनका भी जो मेरे तेवर से खफा हैं

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

Kai tippaniyan likh kar mita deen..ab bas yahi kehna hai...kavita bahut achhi hai dost..

sada का कहना है कि -

सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

seema gupta का कहना है कि -

यह प्रीत तो,
अवयस्क किशोरी की नाजायज़ संतान है,
जिसे तुमने वैधता नहीं दी है,
वैधता और मान्यता तो वस्तुनिष्ठता के शब्द जाल हैं|
मुझे तुम्हारी वैधता नहीं चाहिए,
और न,
तुम्हारे समाज की मान्यता,
वैधता और मान्यता क्या कभी मुक्ति दिलाते हैं?
ये तो वस्तुनिष्ठता के भंवर में फँसाते हैं|
" सुन्दर रचना "

regards

डा.राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

यह प्रीत तो,
अवयस्क किशोरी की नाजायज़ संतान है,
जिसे तुमने वैधता नहीं दी है,
वैधता और मान्यता तो वस्तुनिष्ठता के शब्द जाल हैं|
मुझे तुम्हारी वैधता नहीं चाहिए,
और न,
तुम्हारे समाज की मान्यता,
वैधता और मान्यता क्या कभी मुक्ति दिलाते हैं?
संतान नाजायज़ नही होती केवल वैधता की चाह ही उसे नाजायज बनाती है. इससे मुक्त हो जाने पर ही प्रीत है, किन्तु प्रीत के लिये सन्तान का फ़ल आवश्यक तो नही.

Deepali Sangwan का कहना है कि -

यह प्रीत तो,
अवयस्क किशोरी की नाजायज़ संतान है,
जिसे तुमने वैधता नहीं दी है,
वैधता और मान्यता तो वस्तुनिष्ठता के शब्द जाल हैं|
मुझे तुम्हारी वैधता नहीं चाहिए,

कविता का येः भाग ख़ास पसंद आया, सुन्दर रचना

Deep

Anonymous का कहना है कि -

मैं स्वतंत्र हूँ,
तुम्हारे निर्णय से परे हूँ,
प्रीत के उन्मुक्त गगन में,
उड़ चला
मुक्त लघु कण हूँ|



bhaavbheeni khoobsurat rachna :)
prem ka asli paath padhaati rachna ,,
kya frq padta h , jo aaj tu bhi nhi h to ..
maine to "swayam" me hi tumhe paa lia hai ..

hamesha yunh likhte rhein , dost.
apki agli rachna ka intezar rahega :)

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