फटाफट (25 नई पोस्ट):

Friday, April 30, 2010

मैं खो गया हूँ


मार्च 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की तेरहवीं यानी अंतिम कविता ऋषभ कुमार मिश्र 'निशीथ' की है। कवि मूलतः जौनपुर (उ॰ प्र॰) के निवासी हैं। इन्होने अपनी स्नातक स्तर तक की शिक्षा जौनपुर जनपद में पूर्ण की है। इस समय ये दिल्ली के शिक्षक शिक्षा के उच्च संस्थान ' केंद्रीय शिक्षा संस्थान' ( शिक्षा विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ) में शिक्षारत हैं। ये समाज की विभिन्न गतिविधियों एवं समस्याओ के प्रति अत्यंत गंभीर एवं संवेदनशील हैं। यही इन्हें शब्दों को आकार देने के लिए प्रेरित करते हैं। प्रस्तुत कविता इनकी प्रथम प्रकाशित कविता है। आज कल ये अपने प्रकाश्य संग्रह 'पहचान की पुकार' को पूर्ण करने में संलग्न हैं।

पुरस्कृत कविताः मैं कहाँ हूँ

मै कहाँ हूँ!
वहाँ हूँ,
जहाँ भीड़ है|
क्योंकि
भीड़ से अलग होने में डर लगता है|
डर,
समाज से अस्वीकृति का,
लेकिन भीड़ में 'मैं'
नहीं हूँ|
मेरा मुखौटा है,
जिसे समाज ने गढ़ा है|
मैं तो खो चुका हूँ|
जब चोट खाता हूँ,
जब छला जाता हूँ,
जब जग की भूल भुलैया में
राह भटक जाता हूँ;
या फिर,
जीवन संग्राम मे थक कर बैठ जाता हूँ
तब सोचता हूँ,
मै कहाँ हूँ?
प्रतियोगिता और बाज़ार के इस युग मे,
झूठे मूल्यों और नैतिकता के,
इस कालिख पुते उजले भवन में,
मैं खो गया हूँ|
अपने झूठे अस्तित्व कि रक्षा के लिए
'मैं' ने
समाज और बाज़ार से समझौता कर लिया है,
और समझौते के अनुसार,
अचेतन कि कोठारी मे टूटे दर्पण सा पड़ा हूँ|
हर टुकड़े मे मैं वही रूप देखता हूँ,
जो मुझे समाज और बाज़ार दिखाता है,
लेकिन सही अर्थो मे,
मैं खो गया हूँ|

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

10 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

खोया हुआ व्यक्ति हमेशा भीड़ में ही मिलता है
सुन्दर रचना

Srijan का कहना है कि -

सुन्दर रचना

RATAN का कहना है कि -

वाह मैने तो ऐसी सुन्दर कविता कभी पढ़ा ही नहीं| वास्तव में इस कविता को पढने वाला कविता पढने के बाद यही कहेगा कि "मै खो गया हूँ"| ऐसी ही रचनाओ को पुरस्कृत किया जाना चाहिए |

himani का कहना है कि -

main kho gya hun ....yahan to dinia ki bhid itni badhti ja rahi ki har shaqs hi khota ja rha hai ...shayad hae imandar insan agar apne bhavo ko vyakt karta to kuch isi tarh karta ....achi kavita likhi hai

pintu का कहना है कि -

"मैं खो गया हूँ"..........वाह क्या बात है!!
कितनी सुन्दर रमणीय रचना | इस छोटी सी उम्र में इतनी गहरी सोच,मालुम पड़ता है कि "भीड़ में खोया हुआ व्यक्ति ने" स्वयं ही इस कविता रचना की गई है!!!
कवि की इस प्रथम रचना के लिए बहुत-बहुत शुभकामनाएँ और आशिर्वाद |

अपूर्व का कहना है कि -

यकीनन खूबसूरत और ईमानदार कविता..भीड़ सुरसा के मुख की तरह हमारी पहचान निगल जाती है..और हमारा ’मै’ इस आपाधापी के युग की सबसे बड़ी कैज्युअलिटी होता है..
अच्छी कविता के लिये बधाई

दिगम्बर नासवा का कहना है कि -

भीड़ में खुद का अस्तित्व तलाश करती ... अच्छी रचना है ...

Meera का कहना है कि -

Behad sudar prakaar se bhaavon ki abhivyakti aur shabdon ka santulit prayog !!!!


It has reminded me of one of my poem...

जब जब हाथ में कलम थामी,
दुनिया ने कुछ नए की चाह की ..
कहाँ से लाऊं रोज़ इक नया दर्द?
जिसे रखदूं कागज़ पे उतारकर ..

vd blessings,
madhu_priya :)

om pandey का कहना है कि -

bahut khoob...... sunder rachana hai

v k kanvaria का कहना है कि -

nice kavitaa........... keep it up :)

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)