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Saturday, May 29, 2010

ग्रहण का सच


अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता की शीर्ष 10 कविताओं से आगे बढ़ते हैं। 11वीं सुमीता प्रवीण केशवा की है। सुमीता इससे पहले भी हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हो चुकी हैं।

कविताः यह ग्रहण नहीं, है पाणिग्रहण

हाँ, चाँद हूँ मैं...
जैसे चन्द्रमुखी थी एक
और हे सूर्यदेव, देवदास हो तुम!
कभी पूरब तो कभी पश्चिम
थोड़े उत्तर तो थोड़े दख्खिन की ओर
लड़खड़ाते फिरते हो तुम !
प्रेम के पुजारी हो तुम !
हे देव, पृथ्वी जब पारो बनकर
तुम्हें अपने बाहुपाश में जकड़ लेती है
तो लोग आतंकित हो उठ्ते हैं
तरह-तरह की बातें किया करते हैं
लेकिन उस वक्त....
मैं हौले से मूंद लेती हूँ अपनी आँखों को
स्वीकार कर लेती हूँ तुम्हारे प्रेम प्रसंग को
लीन हो जा्ते हो तुम पारो की आगोश में
मुझे भूलकर .....
नहीं है आपत्ति मुझे इस पर
क्योंकि हे देव, तुम्हीं तो हो
पारो के प्रथम पुरुष!!
प्रेम के नशे में मदमस्त रहने वाले
हे दिव्य पुरुष
तुम नहीं जानते
तुम्हारी ऊर्जा है कोटि अनंत
जिसके एक अंश भर से यह संसार चलायमान है
और हे देव...
जब तुम प्रेम में रत रहते हो
तब...तब तुम्हारी ऊर्जा
अपना दायरा तोड़ती हुई
छलछला उठती है
तुम संभाल नहीं पाते अपनी ऊर्जा को...
तुम्हारी अनंत ऊर्जा को समाहित कर लेती हूँ मैं अपने में
ताकि भस्म न कर दे इस संसार को तुम्हारी अपार ऊर्जा!!
और हे दिव्य पुरुष
लोग फिर भी हमारे प्रणय को देखने की गलती कर बैठते हैं
और ग्रहण नहीं कर पाते तुम्हारी धधकती हुई ऊर्जा को
इसलिए हमारे मिलन को वे अशुभ कहते हैं
लेकिन वे भूल जाते हैं
यह ग्रहण नहीं, है पाणिग्रहण !
दो प्रेमी का है मधुर मिलन
है प्रकृति का यह खास नियम
रतिक्रिया का जब हो अनुगमन
तब है निषेध वह अवलोकन...
तब है निषेध वह अवलोकन!!!

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3 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

है प्रकृति का यह खास नियम
रतिक्रिया का जब हो अनुगमन
तब है निषेध वह अवलोकन...
पाणिग्रहण और ग्रहण में अंतर कर सकने की समझ और शक्ति दोनों पैदा करने की जरूरत है.

सुन्दर रचना

Girdhari khankriyal का कहना है कि -

shiv aur parvati ke pranya kal ko darshaane ki sunder prayas kiya gaya hai. shiv aur paarvati ke rati kaal mein hi gano dwar awlokan karne par rusht hokar shiv ka tej prithivi par aa gira aur eske paschat chkor ke muh mein aur phir shetalta grahn karne keliye yeh tej nadi mein ja gira phalatah kartikeya ka janm . ishi ko shayad aapne sajone ki koshish ki hai.

Safarchand का कहना है कि -

Chayaawadi parampara ka ek pragatisheel aur prayogdharmi kavita....Kya baat hai Prakriti aur Purush ko nisarg mein dekhna...lekin Rahu aur Ketu kyon vismrit ho gaye ? Bahut badhai Sumeeta ji....

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