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Friday, May 21, 2010

माँ ने बना लिया है ब्लॉग, पैदा कर लिए हैं ईमेल-पते


संगीता सेठी के कविता के पात्र सामान्तयाः स्त्रियाँ ही होती हैं। इनकी कविताएँ हमारे निर्णायकों को भी पसंद आती हैं। इन सभी बातों का ताज़ा उदाहरण अप्रैल माह में छठवाँ स्थान बना चुकी इनकी यह कविता है-

पुरस्कृत कविताः नहीं बाँच सकती कोई माँ

वो ज़माना चिट्ठी पत्री का
जब बांच नहीं सकती थी माँ
ज़माने भर की चिट्ठियाँ
बस रखती थी सरोकार
अपने बेटों की चिट्ठियों से
जो दूर देश गया था कमाने
सुन लेती थी अपने पति कि बाणी में
या घर की सबसे पढी लिखी बहू से
पर फिर भी उन्हें आँचल में छिपाकर
सुनने जाती थी
पड़ौस की गुड्डी या शन्नो से
तृप्त हो जाती थी आत्मा
और फिर से आँखें ताकती थी हर शाम
उस डाकिए को

इस कमजोरी से उबरी
माँ अब साक्षर होने लगी
चिट्ठियों के लफ्ज़ पह्चानने लगी
इधर बेटे बेटियों के लफ्ज़
होने लगे और गहरे
माँ को नमस्ते ! पापा को राम-राम !
और बाकी बातें
पढे लिखे भाई-बहनों के लिए
लिखी जाने लगी
माँ उन दो पंक्तियों को आँखों में समाए
संजोने लगी चिट्ठियाँ
एक लोहे के तार में
और जब तब निकाल कर पढ लेती
वो दो पंक्तियाँ
डाकिए का इंतज़ार रहता
अब भी आँखों में

माँ ने पढना लिखना शुरु किया
गहरे शब्दों के मर्म को जाना
बेटे-बेटियों की चिट्ठियाँ
अब उसकी समझ के भीतर थी
पर ये शब्द जल्द ही
एस.एम.एस.में बदल गए
मोबाइल उसकी पहुँच से
बाहर की चीज़ बन गया
अब हर रिंगटोन पर
अपने पोते से पूछती
किसका एस.एम.एस ?
क्या लिखा ?
कुछ नही
कम्पनी का है एस.एम.एस
आप नहीं समझोगी दादी माँ!

माँ को और ज़रूरत हुई
बच्चों को समझने की
उसने जमा लिए हाथ
की-बोर्ड पर
माउस, क्लिक और लैपटॉप की
बन गई मल्लिका
जान लिए इंटरनेट से जुड़्ने के गुर
पैदा कर लिए अपने ई-मेल पते
बना लिए ब्लॉग
मेल और सैण्ड पर क्लिक
हो गया है
उसके बाएँ हाथ का खेल
भेजने लगी अपने इंटरनेटी दोस्तों को
मेल और सुन्दर संदेश

बच्चे बड़े हो गए हैं
चले गए गए हैं परदेस
माँ अपने ई-मेल पते देती है
बेटा सॉफ्ट्वेयर इंजीनीयर है
बेटी आर्कीटेक्चर के कोर्स में
है व्यस्त
हर रोज़ अपने लैपटॉप
पर देखती है स्क्रीन
आज तो आया होगा
कोई लम्बा संदेश
उसकी आँखें थक रही हैं
स्क्रीन के रेडिएशन पर
नज़र जमाए
पर नहीं आया कोई मेल
माँ चिट्ठी के ज़माने में
पहुँच गई है
जहाँ नहीं बाँच सकती कोई माँ
अपने बच्चों की चिट्ठियाँ


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

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8 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

वाकई माँए बदल रही हैं जमाने और जरूरत के अनुसार. यह शुभ लक्षण है
सुन्दर रचना

ranjana का कहना है कि -

bahut hi sundar, adhunik rachna. aap ki soch prabhavit karti hai...subhkamnayen

rama shanker singh का कहना है कि -

इन्टरनेट के इस युग में कुछ दूरियां ज्यादा बढती जा रही हैं
माँ से बढ़ने वाली दूरी कहीं ज्यादा हो गयी है .
दिल को छू जाने वाली कविता ,विशेषकर इन्टरनेट आधारित साहित्य के दीवानों के लिए.
रमा शंकर सिंह

sumita का कहना है कि -

सच कहा है मां बदल रही है अपने बच्चों के लिए ही तो...संगीता जी को बधाई !

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

नए दौर की मां को ई-सलाम...

sada का कहना है कि -

बहुत ही खूबसूरत शब्‍दों के साथ भावपूर्ण रचना
आभार ।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

samay ki mang hai ye to ... maaon ka badlna laazmi bhi hai .. behad achhi nazm hai

jayesh sharma का कहना है कि -

सकारात्मक है , परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है , नारी शक्ति का पढा लिखा होना जरूरी है

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