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सपने टूटे: राजेंद्र स्वर्णकार की कविता


यूनिप्रतियोगिता की पाँचवीं कविता के रचनाकार राजेंद्र स्वर्णकार हैं। हिंद-युग्म से उनका जुड़ाव पिछले माह की प्रतियोगिता से ही हुआ है, जबकि उनकी कविता नवें पायदान पर रही थी। मूलत: छंदबद्ध कविताएं रचने वाले राजेंद्र जी अपने गीतों व ग़ज़लों को सुरबद्ध कर विभिन्न मंचों व आकाशवाणी पर सस्वर पाठ भी कर चुके हैं। अभी तक एक हजार से ऊपर गीत, ग़ज़ल, कविताएँ आदि का प्रकाशन हो चुका है व दो काव्य-संग्रह भी प्रकाशित हैं।

प्रस्तुत कविता कचरा बीनने वाले बच्चों के बहाने निर्धन बचपन की कठोर विषमताओं और उसके प्रति उपेक्षापूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण की करुण कथा कहती है।

पुरस्कृत कविता: सपने टूटे

छूटे हमसे अपने छूटे !
मासूमों के सपने टूटे !!

भद्दी गाली, झापड़, घुड़की !
बचपन की क़िस्मत में झिड़की !
सब दरवाजे बंद; चिढ़ाए
हमको हर घर की हर ख़िड़की !
नज़र हमें आते हैं जब तब
हाथ-हाथ में पांच अंगूठे !!

किस-किस से की हाथापाई !
बीन के कचरा, रोटी खाई !
सिक्के चार हाथ में आए;
हाय! छीन ले पुलिस कसाई !
ऊपर से थाने ले जा कर
नंगा कर के बेंत से कूटे !!

बाबूजी कुछ काम दिला दें !
गाड़ी धो दूं, चाय पिला दें !
भले-भले लोगों की हरकत ?
हैवानों के हृदय हिला दें !
इज़्ज़त वाले अवसर पा'
बेबस बचपन की अस्मत लूटे !!

खूटे जग से सच्चे खूटे !
बाकी रह गए लम्पट झूठे !
हमसे ईश्वर-अल्ला रूठे !
भाग हमारे बिल्कुल फूटे !
गड़ते जाएंगे छाती में
इक-इक दिन में सौ-सौ खूँटे !!
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

खचाखच भर चुकी होगी पृथ्वी


अप्रैल माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की नौवीं कविता के रचनाकार बीकानेर (राज॰) निवासी राजेन्द्र स्वर्णकार काव्य की सभी विधाओं, रंगों-रसों में राजस्थानी, हिंदी और उर्दू में ( ब्रज, भोजपुरी और अंग्रेजी में भी ) मुख्यतः छंदबद्ध के सृजनकर्म में समलग्न हैं। लगभग ढाई हज़ार से अधिक गीत, ग़ज़ल, नवगीत, कवित्त, सवैयों, कुंडलियों सहित दोहों, सोरठों, कविताओं का सृजन कर चुके हैं। लगभग ढाई सौ से भी अधिक स्वयं की मौलिक धुनों का निर्माण कर चुके राजेन्द्र ने मंच के मीठे गीतकार और लोकप्रिय ग़ज़लकार के रूप में लगभग चालीस शहरों, कस्बों, गावों में कवि सम्मेलन, मुशायरों में ससम्मान काव्यपाठ किया है। आकाशवाणी से भी निरंतर रचनाओं का प्रसारण। देश भर में लगभग सवा सौ पत्र-पत्रिकाओं में एक हज़ार से अधिक रचनाएँ ससम्मान प्रकाशित। अनेक महत्वपूर्ण संकलनों में परिचय और रचनाएँ संकलित। गीत-ग़ज़ल के शीर्षस्थ हस्ताक्षरों द्वारा इनके कृतित्व की प्रशंसा हुई है। अब तक दो पुस्तकें (रूई मांयी सूई {राजस्थानी ग़ज़ल संग्रह/ प्रकाशन वर्ष 2002} और आईनों में देखिए { हिंदी ग़ज़ल संग्रह/ प्रकाशन वर्ष 2004 }) प्रकाशित। अनेक सम्मानों से सम्मानित।

पुरस्कृत कविताः शरण कहाँ मिलेगी

मूल्य
संस्कार
नैतिकता
मर्यादा
आत्म विवेचन
और
जीव ऐसे ही कुछ अन्य …
विलुप्त जातियों के !

नहीं बन सके जो
केंद्र आकर्षण का
युग के बच्चों में ,
डायनासोर के समकक्ष…!

न ही जगा सके अकुलाहट भरी उत्सुकता
कमरों की चिटकनियाँ
भीतर से बंद किये बैठी
नवयौवनाओं में,
आँखों से चिपके
कंप्यूटर स्क्रीन पर तैरती
पोर्न साइट्स की तरह…!

नहीं हुए ये शोध का विषय
पुरातत्ववेत्ताओं के लिए
समुद्र में संभाव्य द्वारिका के समान…!

सरक लेती है
इन सफ़्हों को पढ़ने से
गुरेज़ करती
फुहड़ाती-नंगाती
ऐंचक-भैंचक पीढ़ी भावी कर्णधारों की …!

रोती है रोना, तो बस…
बुढ़ाई बेबस हड्डियाँ
लोथ लाशें कुछ,
…आँखों के सामने
देखते हुए
अपहरण ज़बरज़िना और क़त्ल
इन कलेजों के टुकड़ों का!

परंतु,

निग़ल ली गई है संभावना
सावित्री के सत्यवान के पुनर्जीवित होने की…
पाताललोक की आवारा मछली द्वारा
शकुंतला की अंगूठी की तरह…,
और,
बिसर चुका है काल-दुष्यंत
मूल्य
संस्कार
नैतिकता
मर्यादा
आत्म विवेचन
आदि-आदि!

होगा भी क्या,
कभी मिल भी गए जीवाश्म
इनके यदि…,
संस्कृति के समुद्र में
बंसी लटकाने आए
किसी शौक़िया सैलानी को?

… … …
चल रहा है घुटरुन अभी तलक
विज्ञान - शिशु ... ... ...

पता नहीं कब
कैसे बचकर पंजों से बटुकभोगियों के,
रखेगा क़दम वह
परिपक्व यौवन की दहलीज़ पर ?
और,
पाएगा अपनी पूर्णता को !

रह भी पाएगा भला नामलेवा कोई इनका
तब तक?

फूँक भी दिए गए प्राण यदि,
एकत्र किए हुए अवशेषों में
किसी तरह …

शरण कहां मिलेगी!?

खचाखच भर चुकी होगी पृथ्वी
और भी विषैले-भयावह जीवों से
तब तक … … … … !


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।