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Thursday, June 10, 2010

सपने टूटे: राजेंद्र स्वर्णकार की कविता


यूनिप्रतियोगिता की पाँचवीं कविता के रचनाकार राजेंद्र स्वर्णकार हैं। हिंद-युग्म से उनका जुड़ाव पिछले माह की प्रतियोगिता से ही हुआ है, जबकि उनकी कविता नवें पायदान पर रही थी। मूलत: छंदबद्ध कविताएं रचने वाले राजेंद्र जी अपने गीतों व ग़ज़लों को सुरबद्ध कर विभिन्न मंचों व आकाशवाणी पर सस्वर पाठ भी कर चुके हैं। अभी तक एक हजार से ऊपर गीत, ग़ज़ल, कविताएँ आदि का प्रकाशन हो चुका है व दो काव्य-संग्रह भी प्रकाशित हैं।

प्रस्तुत कविता कचरा बीनने वाले बच्चों के बहाने निर्धन बचपन की कठोर विषमताओं और उसके प्रति उपेक्षापूर्ण सामाजिक दृष्टिकोण की करुण कथा कहती है।

पुरस्कृत कविता: सपने टूटे

छूटे हमसे अपने छूटे !
मासूमों के सपने टूटे !!

भद्दी गाली, झापड़, घुड़की !
बचपन की क़िस्मत में झिड़की !
सब दरवाजे बंद; चिढ़ाए
हमको हर घर की हर ख़िड़की !
नज़र हमें आते हैं जब तब
हाथ-हाथ में पांच अंगूठे !!

किस-किस से की हाथापाई !
बीन के कचरा, रोटी खाई !
सिक्के चार हाथ में आए;
हाय! छीन ले पुलिस कसाई !
ऊपर से थाने ले जा कर
नंगा कर के बेंत से कूटे !!

बाबूजी कुछ काम दिला दें !
गाड़ी धो दूं, चाय पिला दें !
भले-भले लोगों की हरकत ?
हैवानों के हृदय हिला दें !
इज़्ज़त वाले अवसर पा'
बेबस बचपन की अस्मत लूटे !!

खूटे जग से सच्चे खूटे !
बाकी रह गए लम्पट झूठे !
हमसे ईश्वर-अल्ला रूठे !
भाग हमारे बिल्कुल फूटे !
गड़ते जाएंगे छाती में
इक-इक दिन में सौ-सौ खूँटे !!
_________________________________________________
पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

संजय कुमार चौरसिया का कहना है कि -

bahut umda rachna
taareef main shabd kam hain

http://sanjaykuamr.blogspot.com/

प्रवीण पाण्डेय का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर कविता है ।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

swarnkar ji ...bahut achhi kavita hai ..aapne un bachon ki taqleef ko shabd de diya hai .. :)

Deepali Sangwan का कहना है कि -

rajendra ji

मासूमों के सपने टूटे !!
bahut hi prabhshaali misra raha yeh


भद्दी गाली, झापड़, घुड़की !
बचपन की क़िस्मत में झिड़की !
bahut sach kaha

सब दरवाजे बंद; चिढ़ाए
हमको हर घर की हर ख़िड़की !
नज़र हमें आते हैं जब तब
हाथ-हाथ में पांच अंगूठे !!

किस-किस से की हाथापाई !
बीन के कचरा, रोटी खाई !
सिक्के चार हाथ में आए;
हाय! छीन ले पुलिस कसाई !
ऊपर से थाने ले जा कर
नंगा कर के बेंत से कूटे !!

waah.. shaandar

बाबूजी कुछ काम दिला दें !
गाड़ी धो दूं, चाय पिला दें !
भले-भले लोगों की हरकत ?
हैवानों के हृदय हिला दें !
इज़्ज़त वाले अवसर पा'
बेबस बचपन की अस्मत लूटे !!

bahut marmsparshi raha yeh bandd
खूटे जग से सच्चे खूटे !
बाकी रह गए लम्पट झूठे !
हमसे ईश्वर-अल्ला रूठे !

bahut hi behtareeen , seedhe shabdon mein bahut kuch keh diya
भाग हमारे बिल्कुल फूटे !
गड़ते जाएंगे छाती में
इक-इक दिन में सौ-सौ खूँटे !!


dil ko chhut gai aapki yeh rachna..
bahut badhai

अमिताभ मीत का कहना है कि -

सुन्दर !

डा.राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

छूटे हमसे अपने छूटे !
मासूमों के सपने टूटे !!
सपने टूटना सबसे खतरनाक होता है,
सपनों को बचाये रखना बहुत जरूरी है.

girish pankaj का कहना है कि -

sundar geet. prerak bhi. aise daur mey jab chhand-virodhi peerhee taiyaar ho rahi hai, kahi bhi chhandas rachanaaye dekhata hoon to khushi hoti hai. fir rajendra swarnakaar ka geet to baal majdoori par kendrit hai. poora geet apne samay ki sachchai ko bayaan karata hai. sashkta rachanaa ke prakashan k liye badha.

तिलक राज कपूर का कहना है कि -

जब, इस विषय पर, विभिन्‍न राज्‍यों की व राष्‍ट्रीय नीति देखें तो यह कविता मनगढ़त लगती है, जब इस दिशा में विभिन्‍न सरकारों द्वारा किये जा रहे व्‍यय को देखें तो तो यह कविता मनगढ़त लगती है, लेकिन यह कविता एक ऐसे सच का स्‍पष्‍ट चित्रण कर रही है जो कहीं भी देखा जा सकता है।
अगर ये कविता कुछ ऐसे लोगों को सही दिशा दे सके जो तत्‍संबंधी क्रियान्‍वयन से जुड़े हैं तो सार्थक हो सकेगी।

PRAN SHARMA का कहना है कि -

SHRI SWARNKAR NE KAVITA MEIN SAHAJ
AUR SUNDAR BHAVON KE SAATH -SAATH
LAY YANI SANGEET KAA JO TAAL-MEL
BITHAAYAA HAI VAH MUN AUR MASTISHK
KO BHARPOOR SPARSH KARTA HAI.UTTAM
KAVITA.

हरकीरत ' हीर' का कहना है कि -

सबसे पहले पांचवें स्थान के लिए राजेंद्र जी को बहुत बहुत बधाई ....!!

इतने जजों की नज़रों के बीच से गुज़र कर जब कविता पांचवे स्थान पर आई है तो निश्चित रूप से कविता उत्कृष्ट होगी ....!!

दुआ है ये स्वर के अद्भुत फनकार अगली बार पहला स्थान भी ग्रहण करें .....!!

Rajendra Swarnkar का कहना है कि -

हिंद-युग्म का हृदय से आभारी हूं , मुझे लगातार दूसरे माह भी छापने के लिए !

…और आप सब के स्नेह , आशीर्वाद तथा उत्साहवर्द्धन के समक्ष नतमस्तक हूं …
संजय कुमार चौरसिया जी , प्रवीण पाण्डेय जी , स्वप्निल कुमार जी'आतिश' , Deepali Sangwan ji , अमिताभ जी मीत ,डा.राष्ट्रप्रेमी जी, girish pankaj ji , तिलक राज जी कपूर , PRAN SHARMA ji , हरकीरत जी ' हीर'साहिबा … आप सदैव मेरे साथ अपनत्व भाव बनाए रखें , और मेरी रचनाओं पर अपनी बहुमूल्य राय प्रदान करते रहें , ताकि मुझे उत्तरोतर श्रेष्ठ सृजन की प्रेरणा मिलती रहे ।
पुनः हार्दिक आभार आप सभी का !

- राजेन्द्र स्वर्णकार
शस्वरं

akhilesh का कहना है कि -

aapke agli rachna ki praticha mein

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