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ककून



अरसा हुआ
एक गम में जागते हुए,
आँख बंद न हो
तो जल्दी ही
जलने भी लगती है,
मेरी जलती हुई ऑंखें तो
पिघलने भी लगीं,
पिघल कर बहने भी लगीं
बहने का दायरा
पहले पहल तो
गालों तक ही था
अब यह बढ़ गया है
सर से ले के पाँव
कृष्ण की खीर ने तो
उनके तलवे छोड़ दिए थे,
मेरे आंसुओं ने तलवों
को भी ढँक लिया है ..
एक खोल सा बन गया है
मेरे ऊपर,
इक ककून सा दिखने लगा हूँ
इन दिनों मैं..
शायद नए जनम का मेरे वक्त हो गया.....

कवि: स्वप्निल तिवारी ’आतिश’


चलो गंगा में फिर मुझको बहा दो ।




उजालों की ये सब बकबक बुझा दो
मुझे लोरी सुना कर माँ सुला दो 

तुम्हे हम धूप सा माने हुए हैं
मेरे मन का ये अँधेरा मिटा दो 

दिया हूँ मैं दुआ के वास्ते तुम,
चलो गंगा में फिर मुझको बहा दो ।

खुशी गम होश बेहोशी सभी हैं,
चलो जीवन से अब जलसा उठा दो ।

ये पानी है तसव्वुर का जो ठहरा,
तुम अपनी याद का कंकर गिरा दो ।

रहे क़ायम रवायत ये दुआ की,
मेरी ऐसी दुआ है, सब दुआ दो ।

तुम्हारी याद की बस्ती में हूँ फिर,
मुसाफिर मान कर पानी पिला दो ।

लो इसकी आंच कम होने लगी है,
ये आतिश एक मसला है, हवा दो ।

यूनिकवि: स्वप्निल आतिश


आँखों का मन पानी है जी




 इनमे भी  नादानी है  जी
 आँखों का मन पानी है जी

 माज़ी मुझमे  ठहरा है  तो
 मुझमे  एक रवानी है  जी

 मेरे घर  की  दीवारें  तो
 बच्चों की शैतानी है जी
 
 धूप सुखाने  सूरज आया
 पानी  को  हैरानी  है जी

 बच्चों मे  जा बैठा है  वो
 वो भी  एक कहानी है जी

 साहिल पर ही डूब गया जो
 सहरे का  सैलानी है  जी

 'आतिश' आंच हैं सच्ची दुनिया
 बाकी जो है   फानी है  जी



यूनिकवि: स्वप्निल ’आतिश


दिसंबर यूनिप्रतियोगिता के परिणाम


   हमारे निर्णायकों की कुछ निहित व्यस्तताओं के चलते दिसंबर माह की प्रतियोगिता के परिणामों को प्रकाशित करने मे कुछ विलम्ब हुआ, जिसके लिये हम पाठकों और प्रतिभागियों से क्षमाप्रार्थी हैं। कविता अपने समय से संवाद करने और उसकी धड़कनों को अपने जेहन के दस्तावेज मे दर्ज करने की सशक्त माध्यम है। तो यूनिप्रतियोगिता हमारे प्रतिभागियों के लिये कविता की कला को समझने और अपने आप को मांजने का महत्वपूर्ण माध्यम रही है। इसी वजह से तमाम कवि/कवियत्रियाँ परिणाम की फ़िक्र किये बिना निरंतर हर माह इसमे भाग लेते हैं।
   दिसंबर माह का संस्करण इस प्रतियोगिता के अबाध आयोजन की अड़तालिसवीं कड़ी था। प्रतियोगिता मे इस बार कुल 40 कविताएं शामिल हुई थीं। जिन्हे कि पांच निर्णायकों द्वारा दो चरणों मे आंका गया। पहले चरण के 3 निर्णायकों की पसंद के आधार पर 20 कविताओं ने दूसरे चरण मे जगह बनाई जिसमे दो निर्णायकों ने अपनी कसौटी पर उनको परखा। अंतिम अंक सूची के आधार पर कविताओं का वरीयता क्रम निर्धारित किया गया। निर्णायकों के मुताबिक इस माह कई अच्छी कविताओं के शामिल होने से शीर्ष कविताओं का क्रम निर्धारित कर पाना एक कठिन काम भी रहा, जो हमारे लिये खुशी की बात है। अंतिम अंक-तालिका के आधार पर स्वप्निल कुमार आतिश की कविता ’सड़क’ को इस बार की यूनिकविता का गौरव हासिल हुआ है। आतिश पिछले कई माह से युनिप्रतियोगिता के अहम हिस्सा रहे हैं और उनकी तमाम गज़लें और नज़्में पहले भी शीर्ष दस मे शामिल हुई हैं। मगर अभी तक उनकी कविताएं यूनिकविता बनने के पायदान से कुछ पीछे रह जाती थीं। मगर इस बार की उनकी कविता को सभी जजों ने शीर्ष पर रखा और इस तरह पिछले साल की अंतिम प्रतियोगिता के यूनिकवि का खिताब आतिश को हासिल हुआ है।

यूनिकवि: स्वप्निल कुमार ’आतिश’

   युवा कवि आतिश की पैदाइश गाजीपुर (उ.प्र.) की रही। घर मे पहले से ही पढ़ने-लिखने का माहौल था और साहित्यिक संस्कार और समझ अपनी माँ से हासिल हुए। दिल्ली मे ग्रेजुएशन के लिये आये और तब से इसी शहर के हो कर रह गये। आतिश ने बायोटेक से स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। पहली बार जगजीत सिंह की गायी मिर्जा ग़ालिब की ग़ज़लें सुनते हुए ग़ालिब को समझने की ललक जागी। फिर उनकी शायरी का सफ़हा-दर-सफ़हा खूबसूरत सफ़र इतना दिलचस्प और मानीखेज लगा कि शायरी से गहरा रिश्ता कायम हो गया। उसके बाद रही कसर गुलज़ार साहब की नज़्मों ने पूरी कर दी। तब से गज़लों, नज्मों और कविताओं से शुरू हुआ सिलसिला बदस्तूर जारी है। गुलज़ार के अलावा निदा फ़ाज़ली, दुष्यंत कुमार, बच्चन और कुँअर बेचैन की रचनाओं ने भी गहरा असर डाला है। आतिश नज्मों-कविताओं के अलावा स्क्रिप्ट राइटिंग, अनुवाद वगैरह से भी जुड़े हैं। कई गज़लें-नज़्में पत्र-पत्रिकाओं मे प्रकाशित भी हुई हैं। किसी दिन मुम्बई जा कर खुद की स्क्रिप्टों पर काम करने की ख्वाहिश है। साथ ही अपनी मातृभाषा भोजपुरी को भी कला-साहित्य मे इज्जत दिलाने का मंसुबा भी रखते हैं। फिलहाल अपनी पहचान बनाने की कोशिश और तलाश जारी है। हिंद-युग्म पर एक कवि और पाठक के तौर पर खासे सक्रिय रहे हैं।
प्रस्तुत कविता सड़क को सरकारी विकास के प्रतीक के रूप मे इस्तेमाल करती है और इसी बहाने विकास के किसी समाज के भविष्य से कायम अनसुलझे रिश्ते की गिरहें खोलने की कोशिश करती है।
सम्पर्क:  8826308023

यूनिकविता: सड़क

अब पक्की हो गयी है,
कच्ची थी तो तन्नी सा
बरम बाबा के पास
रुक जाती थी,
अब भी रूकती है
पता है उसे
कि कच्चियै हो जायेगी
फिर एक दिन ..!

सड़क जब कच्ची थी
त फेंकूआ के घर
लड़का हुआ था,
सड़क पक्की होते होते
बच्चे का नाम
घूरा धरा गया,
नहीं बदलता
नाम रखने का तरीका
सड़क पक्की होने से...!

जब सडक कच्ची थी
गांव का एगो आसिक
सोचता था
“रख दें एक अँजूरी
जो भैंसही का पानी आसमान में
त फलानी
आजो चाँद देख लेगी,
सड़क पक्की हो गयी
पर ऊ
आजो वइसहीं सोचता है...!

सुदेसर बिदेसर के जाल में
आजो कुछ नहीं फंसता,
नदी में मछरी
सड़क पक्की हो जाने से
थोरही आ जायेगी ..!

चहेंटुआ पहले ठाकुर साब किहाँ
काम करता था
सड़क बनते ही
बम्बई भाग गया
अब बर्तन धोता है
एगो होटल में...!

सड़क पक्की होने से
खाली सड़क पक्की होती है
नहीं पक्का होता गांव का भाग्य,
हाँ
बढ़ जाता है खतरा
गांव के सहर चले जाने का
या सहर के गांव में आ जाने का ।
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पुरस्कार और सम्मान-   विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता तथा हिन्द-युग्म की ओर से प्रशस्ति-पत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

  इसके अतिरिक्त दिसंबर माह के शीर्ष 10 के अन्य कवि जिनकी कविताएं हम यहाँ प्रकाशित करेंगे और जिन्हे समयांतर की वार्षिक सदस्यता दी जायेगी, उनका क्रम निम्नवत है

सौरभ राय ’भगीरथ’
अनिल कार्की
नरेंद्र तोमर
सुरेंद्र अग्निहोत्री
डॉ नागेश पांडेय ’संजय’
धर्मेंद्र कुमार सिंह
वसीम अकरम
ऋतु वार्ष्णेय
डॉ अनिल चड्डा

  शीर्ष दस के अतिरिक्त हम जिन चार अन्य कविताओं का प्रकाशन इस प्रतियोगिता के अंतर्गत करेंगे, उनके रचनाकारों के नाम हैं

सुधीर गुप्ता ’चक्र’
संगीता सेठी
चारु मिश्रा ’चंचल’
राजेश पंकज

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 7 फ़रवरी 2011 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

  हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। प्रतियोगिता मे भाग लेने वाले शेष कवियों के नाम निम्नांकित हैं

अश्विनी कुमार राय
स्वामी आनंद प्रसाद मनसा
रिक्की पुरी
नूरैन अंसारी
सुधांशु शेखर पांडेय ’प्रफ़ुल्ल’
मृत्युंजय श्रीवास्तव साधक
पुष्पेंद्र पटेल
डिम्पल मलहोत्रा
शन्नो अग्रवाल
स्नेह सोनकर ’पीयूष’
बोधिसत्व कस्तुरिया
डाँ ज्योति शोनक
विवेक जैन
धर्मेंद्र मन्नू
जोमयिर जिनि
अनिरुद्ध यादव
सनी कुमार
नीरज पाल
दीपक कुमार
अनामिका घटक
विमला किशोर
मनोज सिंह भावुक
विनय मलिक
सीमा स्मृति मलहोत्रा
प्रदीप वर्मा
अनवर सुहैल


एक क़ुबूलनामा


स्वप्निल तिवारी ’आतिश’ एक सक्षम कवि और सक्रिय पाठक के तौर पे हिंद-युग्म पर जाने जाते हैं। इनकी गज़लें और नज़्में अक्सर प्रतियोगिता के अंतर्गत प्रकाशित होती हैं और पाठकों का प्रतिसाद पाती हैं। इनकी पिछली रचना अगस्त माह मे प्रकाशित हुई थी। नवंबर माह मे इनकी प्रस्तुत रचना आठवें स्थान पर रही है।

पुरस्कृत रचना: एक क़ुबूलनामा 

समुन्दर पी लेता है मुझे
और हो जाता है और गहरा,
मेरी छाँव में आते जाते
घटती बढती रहती हैं
कलाएं चाँद की,
मेरी कई तासीरों मे से एक
मांगकर बरस लेते हैं बादल,
कायनात की हर शय “मैं” हूँ,
बस ये धरती है जो मैं नहीं हो पाया,
वामन बन कर कोशिश भी की
कि नाप लूँ एक कदम मे इसे
और खुद हो जाऊं धरती
ताकते जब्त* मगर मुझमे नहीं इस जैसी |

इंसान ने
पुराने रिवाजों की जंज़ीर की तरह
काट दिए पेड,
मेरा ही नाम अलग अलग तरह
रख कर
लड़ रहा है आपस मे
मेरे सही नाम के लिए,
लम्हा-लम्हा क़तरा-क़तरा
निगल रहा है धरती को....

इंसान से धरती को बचाने की खातिर
मैंने तूफानों मे ज्यादा हवा भरी,
पानी की शक्ल भी बाढ़ की तरह
भयानक की,
कितने ही ज्वालामुखियों में
वक़्त-बेवक़्त  फूँक मारी है मैंने
ताकि मर जाएँ इंसान
इससे पहले कि धरती मर जाये
मगर बार-बार ये बचा लेती है इन्हें
छिपा के अपने आँचल में
....माँ की तरह !
और माँ के सामने तो मैं भी बेबस हूँ,
सच, मैं धरती होता तो
घूम गया होता उल्टा,
क़यामत के वक्त
न ले जाने दी होती
मनु को वो नाव
या नूह को वो कश्ती
और खत्म हो जाने दी होती
इंसानी तहज़ीब,
मगर अफ़सोस
मैं धरती नहीं हूँ
मैं खुदा हूँ
जो आता है बन कर सुनामी
मगर धरती कर देती है जिसे चुप
उतरे हुए बाढ़ के पानी की तरह ... !
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की चर्चित पत्रिका समयांतर की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।
    


तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है


जुलाई माह की सातवीं कविता एक ग़ज़ल है। इसके रचयिता स्वप्निल तिवारी आतिश की ग़ज़लें लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होती रही हैं।

पुरस्कृत कविता- ग़ज़ल

वो इक कागज़ के टुकड़े को सफीना* मान लेता है
फ़क़त हँसने-हँसाने को वो जीना मान लेता है

हवस इंसान के सर चढ़ के जिस पल बोलती है तब
वो इक बीमार कुतिया को हसीना मान लेता है

मई ओ जून में हम सब दुआएँ माँगते हैं जो
उन्हें झट से दिसम्बर का महीना मान लेता है

अगर दिल के ग़मों को मुहज़बानी ना बताये माँ
तो बेटा आँसुओं को भी पसीना मान लेता है

पढ़े गुलज़ार को कोई, उन्हीं पे जान देता है
वो उनके गाँव "दीना" को मदीना मान लेता है

फ़क़त इक आँच ही तारीफ कुछ उसकी अगर कर दे
तो आतिश खुद को इक महँगा नगीना मान लेता है

(सफीना- नाव)

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

ये नए दौर के उजाले हैं



स्वप्निल तिवारी ’आतिश
’ की गज़लें विगत कुछ माहों से यूनिप्रतियोगिता का अभिन्न हिस्सा रही हैं और ऊँचे पायदानों पर अपनी जगह बनाती रही हैं। पिछले माह भी इनकी एक ग़ज़ल दूसरा स्थान बनाने मे सफ़ल रही थी। जून माह की प्रतियोगिता मे उनकी ग़ज़ल तीसरे स्थान पर रही है।


पुरस्कृत ग़ज़ल

आस्तीनों में पलने वाले हैं
ये नए दौर के उजाले हैं

आप कहते थे " कौडियाले* हैं"
आज ये सब नसीब वाले हैं

फूल शाया* हुए हैं पौधों पर
लो बहारों के ये रिसाले* हैं

एक सरकारी दफ्तर है दुनिया
आओ गर जेब में हवाले* हैं

मज़हबी बंदिशें अभी भी हैं
कुछ जगह पानियों पे ताले हैं

बारिशें पड़ गयी हैं नीली अब
बादलों ने तो सांप पाले हैं

ये दिल मेरा कुछ सियासी* है
इसने मसले बहुत उछाले हैं

यूँ तो दुनिया अंधेर नगरी है
आंच आतिश हैं तो उजाले हैं

(कौडियाले - विषैले जीव जंतु, शाया - प्रकाशित, रिसाले - पत्रिका, हवाले - सिफारिश, सियासी- राजनीतिक)
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

आँच चिढ़ाती है आतिश


मई माह की यूनिप्रतियोगिता मे दूसरा स्थान स्वप्निल कुमार ’आतिश’ की ग़ज़ल ने पाया है। आतिश पिछले कुछ समय से ही हिंद-युग्म से जुड़े हैं, मगर कवि और पाठक के तौर पर उनकी सक्रियता उदाहरण के योग्य रही है। इनकी पिछली गज़लें भी यूनिप्रतियोगिता मे ऊपर के पायदानों पर रही हैं और उन्हे पाठकों की भी काफ़ी सराहना मिली है। पिछले माह की प्रतियोगिता मे इनकी एक ग़ज़ल दसवें स्थान पर रही थी। आतिश की ग़ज़लों की सबसे खास बात उनका सरल और सहजग्राह्य होना है। विषय और भाषा की बोधगम्यता के कारण उनकी गज़लों को सामान्य पाठकों मे भी आसानी से पैठ बना पाती हैं। वहीं ग़ज़लों के प्रचिलित उपमानों का सर्वथा नवीन संदर्भों मे प्रयोग उनकी गज़लों को नया और सामयिक कलेवर भी देता है।

पुरस्कृत ग़ज़ल

तन्हाई को टा टा कर
कुछ तो सैर सपाटा कर

फटे पुराने चाँद को सी
अपनी रातें काटा कर

आवाज़ों में से चेहरे
अच्छे सुर के छाँटा कर

बेचैनी को चैन बना
दिल के ज्वार को भाटा कर

दिल की बातें सुननी हैं?
दिल में ही सन्नाटा कर

आवारा बन जा, नज़रें
खिड़की-खिड़की बाँटा कर

माना कर सारी बातें या
सारी बातें काटा कर

आँच चिढ़ाती है "आतिश "
तू लौ बन कर डाँटा कर
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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

हर रस्ते की एक कहानी लगती है


स्वप्निल तिवारी 'आतिश' हिन्द-युग्म पर अत्यंत सक्रिय हैं। ग़ज़लें लिखते हैं। अब तक इनकी 3 कविताएँ प्रकाशित है। आज हम जो कविता प्रकाशित करने जा रहे हैं, उसने अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता में 10वाँ स्थान बनाया है।

पुरस्कृत कविताः सीधी सादी एक कहानी लगती है

ये जोड़ी इक राजा रानी लगती है
सीधी सादी एक कहानी लगती है

दिल भी कितनी बार सुने, झेले इसको
धड़कन की हर बात पुरानी लगती है

जंगल, वादी, सहरा दरिया ..सब सहरा
मुझको तेरी गोदी धानी लगती है

बात बुजुर्गों की सुनता है कौन भला
बच्चों की बातें, नादानी लगती है

आवाजों के जमघट में सन्नाटा है
कुछ तो इसने मन में ठानी लगती है

मुझे खबर है, खुदा है, वो ना आयेगा
उसकी "हाँ" भी "आनाकानी" लगती है

आज समन्दर ने उसको कुछ यूँ देखा
नदिया शर्म से पानी-पानी लगती है

दिल के सेहन में शब भर महकी जाती है
बात तुम्हारी रात की रानी लगती है

चौराहों पर मिल कर कहते सुनते हैं
हर रस्ते की एक कहानी लगती है

थोड़ी आँच ज़रा रौशनी और धुआँ
"आतिश" की हर इक शय फानी लगती है


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

मेरी बहनें बाँध जाती हैं


सभी पाठकों को रक्षाबंधन की बधाइयाँ। आज हम इस अवसर लेकर आये हैं, इसी विषय पर एक कविता, जिसके रचनाकार हैं स्वप्निल तिवारी ' आतिश'। स्वप्निल की कविताएँ पिछले 2 महीनों से हम लगातार प्रकाशित कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- मेरी बहनें

जैसे इक
काँच की आवाज़ से
रंगा गया हो उन्हें,
उड़ती हैं तितलियों सी
तो पंख बजते हैं,
कितनी रंगीन आवाजें
उभर के आती हैं,
आसमां तक जो ये पहुंचें
तो धनक बनता है ...
चमन-चमन
वो बहती हैं
हवाओं की तरह,
पहली बरसात के
पानी की तासीर लिए ...

हर एक गुल पे
बैठ-बैठ के
थक जाती है जब,
धनक से होते हुए
और बारिशों को छुए
लिए कांच की तितलियाँ
ये मेरी बहनें
बाँध जाती हैं
आके मेरी कलाई पे तब,
जैसे राखी के धागों से
उन्हें बुना हो खुदा ने........


प्रथम चरण मिला स्थान- प्रथम


द्वितीय चरण मिला स्थान- आठवाँ


पुरस्कार और सम्मान- सुशील कुमार की ओर से इनके पहले कविता-संग्रह 'कितनी रात उन घावों को सहा है' की एक प्रति।

काई काई चाँद हुआ


स्वप्निल तिवारी "आतिश" की एक रचना पिछले महीने प्रकाशित हुई थी, लेकिन यह पहला अवसर है जब इनकी कविता शीर्ष 10 में स्थान बना पाई है।

पुरस्कृत कविता

सिमटी सी शर्मीली रात
भोली छैल छबीली रात

काई काई चाँद हुआ
जब भी आई गीली रात

चाँद किनारे खड़ा रहा
जब जी आया बह ली रात

चाँद सितारों की गिरहें हैं
फिर भी है कुछ ढीली रात

साया जब खोया मेरा तब
पैराहन में सी ली रात

यादों की परतें बिखरी हैं
मैंने कितनी छीली रात

खाबों में तू ठिठुरी थी
कल थी जब बर्फ़ीली रात

आधा ही महताब बचा है
तू भी है खर्चीली रात

हम भी क्या सुकरात से कम?
हमने तन्हा पी ली रात

अब तब हैं इसकी साँसें
दुबली, पतली, पीली रात

"आतिश" काली शब का मारा
आँच, परी सी, नीली रात



प्रथम चरण मिला स्थान- पहला


द्वितीय चरण मिला स्थान- दूसरा


पुरस्कार- समीर लाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति।

कमरे में कितने मच्छर, कहाँ आदमी तन्हा है


स्वप्निल कुमार "आतिश" इन दिनों दिल्ली में हैं, लेकिन पैदाइश गाजीपुर(उत्तर प्रदेश)की है। B.Sc biotechnology की पढ़ाई कर चुके स्वप्निल के परिवार में इस तरह का माहौल रहा कि शायरी और साहित्य से रिश्ता बन गया। बचपन से लिखते रहे हैं। स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं में कुछ ग़ज़लें/ नज्में प्रकाशित हो चुकी हैं और हिंद युग्म पे पहली बार प्रकाशित हो रहे हैं।

कविता

ये सहरे का सपना है
देखो कितना गीला है

मुझसे मिलता-जुलता है
सन्नाटे का चेहरा है

नन्ही आँख की डिबिया में
ख्वाब हींग सा महक़ा है

अपने घर के कोने में
गीली आँखें रखता है

मुझको दुनिया रास कहाँ
मकड़ी का घर कोना है

पूरी शब आकाश पढ़ो
सबका कच्चा चिट्ठा है

कमरे में कितने मच्छर
कहाँ आदमी तन्हा है

आइने की खिड़की पे
चेहरा दस्तक देता है

चाँद के रौशन माथे पर
लगा दीए का टीका है

शोहरत की आवाज़ सुने
इंसा कितना बहरा है

आँच लगी तो पता चला
आतिश सच्चा सोना है


प्रथम चरण मिला स्थान- चौथा


द्वितीय चरण मिला स्थान- ग्यारहवाँ