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फिर से प्यार


प्रतियोगिता मे सातवें स्थान पर अभिषेक कुशवाहा की कविता रही। हिंद-युग्म पर इनकी रचना इस बार कुछ अरसे के बाद प्रकाशित हो रही है। इससे पहले गत नवंबर माह मे अभिषेक की एक कविता दूसरे स्थान पर आयी थी व काफ़ी प्रशंसित रही थी। भाषा-विज्ञान के विद्यार्थी अभिषेक कविताओं मे बिंब-विधान को ले कर प्रयोगधर्मी रहते हैं तथा प्रचिलित संदर्भो के अलावा रोजमर्रा के प्रतीकों का प्रयोग कर कविता को एक सामयिक कलेवर भी देते हैं।

पुरस्कृत कविता: फिर से प्यार

चलो छॊड़ो जाने दो
अब वह बड़ा वाला प्रेम ,
वो सच्चा और गहरा वाला प्रेम ,
वो निर्मल वर्मा और अज्ञेय वाला प्रेम ,
वो इमली ब्रान्टॆ और लारेन्स वाला प्रेम ,
चलो छोड़ो , रहने भी दो
वह तो हो चुका अब हमसे ।

आओ चलो !
शाम को टहलते हुये
क़ाफी पीने चलते हैं ।
नेस्कफे में किनारे वाली बेन्च पर
आमने सामने बैठते हैं ।
लंका के अरोमा प्रोविजन से
आते वक्त खरीदी गयी
वनीला पेस्ट्री व चाकलॆट पास्ता के बाद
दो गरम गरम झाग भरी कापचीनो मंगाते हैं ।
आसपास बैठे
चूं चूं करते, परस्पर निमग्न
एकदम जोरदार व जबरदस्त प्रेम करनेवालों से
बिलकुल अलग
बहुत देर तक बिना किसी भाव के
अनुद्विग्न, शून्य
हम
एक दूसरे से
हल्की-हल्की ढेर सारी बातें बतियाते हैं ।
बातें, साबुन के बड़े बड़े फुग्गों सी बातें
जो अपने आप में
एकदम पूरी होती हैं ,
कुछ देर तक मन के व्योम में
हौले हौले तैरती रहती हैं
और फिर पीछे अपने
सिवास हल्की सी नमी के
और कुछ नहीं छोड़ती ! ! !

तो इस तरह बतियातें हैं ।

बतियानें में यदा कदा
एक दूसरे को देख भी लेते हैं
जैसे अनवरत वर्षों से
एक दूसरे को ही देख रहे हॊं
या जैसे
एक पेड़ दूसरे पेड़ को देखा करता है ----
चुपचाप ---बिना किसी भाव के
बस एक अनभिव्यक्त अन्तःप्रेरणा से ।


आओ चलो ! ज्यादा न सोचो !
न तुम अमृता प्रीतम हो सकती हो
और न मैं इमरोज़ .
सिर्फ किताबें पढ़ने से कुछ नहीं होता ।
देखॊ ! सद्य प्रसूता स्त्री सी जीर्ण,
सिक्त व तुष्ट उदासी लिये इस पीली सांझ की
अलसायी हवा में
शान्त, गाढ़े हरे, कतारबद्ध खड़े
इन विशाल रहस्यमयी पेड़ों के लिये
शिशिर का सन्देश है ।
अगर मैं कवि होता
तो इस पर एक अच्छी कविता लिखता,
तुम्हें
इन रम्य वृन्तों पर खिले
प्रगल्भ रक्तिम पुष्प
और स्वयं को
तुम्हारे आसपास की
स्नेहिल हवा लिखता ! !
लेकिन छोड़ो ! !
न मैं लारेन्स का पाल मारल हूं
न तुम मिरियम ।
चलो, अन्धेरा काफी हो गया है
अब नेस्कफे बन्द होगा ।

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पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

परहेज़ करना कोई गीत गाने से


प्रतियोगिता की चौथी कविता एम वर्मा की है। इनका जुड़ाव हिंद-युग्म से काफ़ी पुराना है और इनकी कविताएँ हमेशा निर्णायकों और पाठकों का ध्यान आकृष्ट कराने मे सफ़ल रही हैं। एम वर्मा फ़रवरी माह के यूनिकवि रहे हैं तथा पिछली प्रतियोगिता मे भी इनकी कविता दसवें स्थान पर रही थी। कवि ही नही वरन्‌ एक नियमित पाठक के तौर पर भी हिंद-युग्म पर इनकी सक्रियता सराहनीय रही है। इनकी कविताएँ मूलतः सामयिक विषयों पर केंद्रित होती हैं और सामाजिक विसंगतियों के प्रति मुखर विरोध कविताओं मे साफ़ नज़र आता है।

पुरस्कृत कविता

सुनो !
मैने खिड़कियाँ बन्द कर दी है
तुम खोलना मत
और सुनो !
ऊँची आवाज में
तुम बोलना मत,
यूँ तो इस कमरे में
तुम्हारे साँस लेने के लिये
पर्याप्त हवा है
पर जब दम घुटने लगे तो
ऊपर वाले रोशनदान को
थोड़ा सा खोल लेना,
और हाँ !
इस कमरे में
यहाँ से वहाँ तक जहाँ चाहों
बेझिझक डोल लेना,
तुम संकोच मत करना
फ्रिज़ में रखी चीजे खाने से
बस्स, परहेज़ करना
कोई गीत गाने से,
लौटकर जब आऊँगा तो
तुम्हें मैं
बाहर की दुनिया के बारे में बताऊँगा
और तुम्हारे लिये
सूर्य रश्मियों से ढँके
ऊँचे पहाड़ की तस्वीरें लाऊँगा

ओ प्यारी बेटी !
ओ प्यारी बेटियाँ !

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ये नए दौर के उजाले हैं



स्वप्निल तिवारी ’आतिश
’ की गज़लें विगत कुछ माहों से यूनिप्रतियोगिता का अभिन्न हिस्सा रही हैं और ऊँचे पायदानों पर अपनी जगह बनाती रही हैं। पिछले माह भी इनकी एक ग़ज़ल दूसरा स्थान बनाने मे सफ़ल रही थी। जून माह की प्रतियोगिता मे उनकी ग़ज़ल तीसरे स्थान पर रही है।


पुरस्कृत ग़ज़ल

आस्तीनों में पलने वाले हैं
ये नए दौर के उजाले हैं

आप कहते थे " कौडियाले* हैं"
आज ये सब नसीब वाले हैं

फूल शाया* हुए हैं पौधों पर
लो बहारों के ये रिसाले* हैं

एक सरकारी दफ्तर है दुनिया
आओ गर जेब में हवाले* हैं

मज़हबी बंदिशें अभी भी हैं
कुछ जगह पानियों पे ताले हैं

बारिशें पड़ गयी हैं नीली अब
बादलों ने तो सांप पाले हैं

ये दिल मेरा कुछ सियासी* है
इसने मसले बहुत उछाले हैं

यूँ तो दुनिया अंधेर नगरी है
आंच आतिश हैं तो उजाले हैं

(कौडियाले - विषैले जीव जंतु, शाया - प्रकाशित, रिसाले - पत्रिका, हवाले - सिफारिश, सियासी- राजनीतिक)
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अधमरे हो गये गाँव के गाँव हैं


जून 2010 की यूनिप्रतियोगिता में दूसरी स्थान की कविता सत्यप्रसन्न की है। सत्यप्रसन्न जून 2009 के यूनिकवि रह चुके हैं। इनकी कविताएँ बहुत बार हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हुई है। 38 यूनिकवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में भी इनकी कविताएँ संकलित हैं।

पुरस्कृत कविताः मंत्र अक्षर हैं

मंत्र अक्षर हैं, लो शब्द को प्राण दो;
इस तमस को उजाले का वरदान दो।
वो लिखो जिससे अग-जग में हलचल मचे;
लेखनी को नया कोई अभियान दो।

व्यर्थ तौलो न ऐसी हवा को जिसे;
बाँध रखना अभी तक तो सीखा नहीं।
प्यास है अँजुरी में उलीचो नदी,
ओस से भी अरे कंठ भीगा कहीं।

आग है किन्तु; क्यों आँच आती नहीं;
एक तिनका भी वो क्यों जलाती नहीं।
शून्य होने लगी सारी संवेदना;
चोट कैसी भी मन को रुलाती नहीं।

आज के हाथ में कल की तलवार है;
जंग खाई हुई कुंद सी धार है।
रात की कोख़ में पल रहा है जो कल;
जन्म लेने से पहले ही बीमार है।

हैं उखड़ती चली जा रहीं सब जड़ें;
डँस रहीं हर दिशा से चपल नागिनें।
है समंदर ज़हर से भरा सामने;
कौन सी डोर को थाम साँसें गिनें।

बाड़ निर्भीक हो खेत को चर रही;
चाँदनी भी स्वयं चाँद से डर रही।
बाग़ के फूल तक तो अराजक हुए;
चूमते ही जिन्हें तितलियाँ मर रहीं।

एक काँटों भरी राह पर पाँव हैं;
क्या गहें; जल रही आज हर छाँव है।
हो गये हैं भयातुर नगर के नगर;
अधमरे हो गये गाँव के गाँव हैं।

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