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यह देवालय का छल है


हिंद-युग्म के पाठक सत्यप्रसन्न जी से भली-भाँति परिचित हैं।  इनकी कविताएँ हिंद-युग्म पर लम्बे समय से प्रकाशित हो रही हैं और ये जून 2010 मे यूनिकवि भी रह चुके हैं। इनकी छांदस कविताओं को पाठकों की विशेष सराहना मिलती रही है और इनकी कविताएँ यूनिकवियों की प्रतिनिधि कविताओं के प्रकाशित संकलन ’संभावना डॉट कॉम’ का हिस्सा भी बनी हैं। इनकी पिछली कविता जुलाई माह मे प्रकाशित हुई थी। अक्टूबर माह मे इनकी प्रस्तुत कविता ग्यारहवें स्थान पर रही है।

कविता: यह देवालय का छल है ! 

            कितनी आशंकाएँ मन में;
            घेर रहे कितने संशय।
            मेरी ही परछाई मुझसे;
            पूछ रही मेरा परिचय।

                              फटते और बरसते हर पल;
                              भय के स्याह घने बादल।
                              जला रही खुद मेरी सांसें;
                              बनकर मुझको दावानल।

            हर रिश्ते पे शक होता है;
            संदेहों  में  हर   यारी।
            रात जाग कर करता हूँ मैं;
            अपनी   ही   पहरेदारी।

                              है उन्माद हवा में कैसा,
                              कितना ज़हरीला मौसम।
                              घोंप रहा है खंजर वो ही;
                              जो कल था मेरा हमदम।

            है निर्दोष आचमन जिसमें;
            केवल जल, तुलसीदल है।
            बता रहा भय मेरा मुझको'
            यह देवालय का छल है।

                              मैं रहता हूँ वहाँ; जहाँ है,
                              विश्वासों की बंद गली।
                              मेरे अपने हाथों में है;
                              मेरी ही ग़रदन पतली।

अधमरे हो गये गाँव के गाँव हैं


जून 2010 की यूनिप्रतियोगिता में दूसरी स्थान की कविता सत्यप्रसन्न की है। सत्यप्रसन्न जून 2009 के यूनिकवि रह चुके हैं। इनकी कविताएँ बहुत बार हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हुई है। 38 यूनिकवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' में भी इनकी कविताएँ संकलित हैं।

पुरस्कृत कविताः मंत्र अक्षर हैं

मंत्र अक्षर हैं, लो शब्द को प्राण दो;
इस तमस को उजाले का वरदान दो।
वो लिखो जिससे अग-जग में हलचल मचे;
लेखनी को नया कोई अभियान दो।

व्यर्थ तौलो न ऐसी हवा को जिसे;
बाँध रखना अभी तक तो सीखा नहीं।
प्यास है अँजुरी में उलीचो नदी,
ओस से भी अरे कंठ भीगा कहीं।

आग है किन्तु; क्यों आँच आती नहीं;
एक तिनका भी वो क्यों जलाती नहीं।
शून्य होने लगी सारी संवेदना;
चोट कैसी भी मन को रुलाती नहीं।

आज के हाथ में कल की तलवार है;
जंग खाई हुई कुंद सी धार है।
रात की कोख़ में पल रहा है जो कल;
जन्म लेने से पहले ही बीमार है।

हैं उखड़ती चली जा रहीं सब जड़ें;
डँस रहीं हर दिशा से चपल नागिनें।
है समंदर ज़हर से भरा सामने;
कौन सी डोर को थाम साँसें गिनें।

बाड़ निर्भीक हो खेत को चर रही;
चाँदनी भी स्वयं चाँद से डर रही।
बाग़ के फूल तक तो अराजक हुए;
चूमते ही जिन्हें तितलियाँ मर रहीं।

एक काँटों भरी राह पर पाँव हैं;
क्या गहें; जल रही आज हर छाँव है।
हो गये हैं भयातुर नगर के नगर;
अधमरे हो गये गाँव के गाँव हैं।

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

जीने भर का जी चुका हूँ मैं


कवि सत्यप्रसन्न समकालीन बोध की छांदस कविताएँ लिखते हैं। आज हम उनकी जो कविता प्रकाशित कर रहे हैं, उसने फरवरी माह की प्रतियोगिता में दसवाँ स्थान बनाया और थोड़ा बहुत तुक की तरफ झुकाव भी है।

पुरस्कृत कविताः जी चुका हूँ मैं

शिथिल नहीं हुईं पेशियाँ,
नासिका रंध्रों की
अभी तक।
पहचान ही लेती हैं वे;
देह गंध तुम्हारी
अभी भी।
मंद नही हुई है तनिक भी;
श्रवण शक्ति
अभी तक;
सुन ही लेते हैं कान,
ख़नक तुम्हारी चूड़ियों की
अभी भी।
दृष्टि में भी दम-खम
इतना तो बाकी है
अभी तक;
कि दिख ही जाती है,
तुम्हारे माथे पर
बार- बार झुक आती वो
एक लट चाँदी की,
जिसे जब तब हटाने की
अपनी नाकाम कोशिश में,
लगा बैठती हो;माथे पर
बेसन या आटा
अभी भी।
स्पर्श की संवेदना भी;
महफ़ूज़ है अभी तक;
कि; काँपतें हैं ओंठ मेरे
अल सुबह
तुम्हारी तर्जनी के
प्रथम हस्ताक्षर से
अभी भी।
लरज़ते नहीं हैं पाँव;
उठ ही जाते हैं,
दृढ़ता से
लेकर सहारा तुम्हारे कंधे का
अभी तक।
और चढ़ जाते हैं सीढ़ियाँ
देवालय की;
करने साक्षात्कार ईश्वर से;
रोज शाम,
अभी भी।
इसीलिये तो जिंदा है
चहल क़दमी साँसों की
अभी तक,
वर्ना जीने भर के लिये तो;
कब का जी चुका हूँ मैं।


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

छिपकली


दीवाल की चिकनी सतह पर,
छिपकली के क्रियाकलाप;
मुझमें बड़ा कुतूहल जगाते हैं।
जिसे देख;
मेरे मन में
कई विचार आते हैं; जाते हैं।
चिंतन की इस प्रक्रिया में;
न जाने कब,
दीवाल कुर्सी में बदल जाती है,
और
छिपकली की जगह;
नेता की तस्वीर नज़र आती है।
कुर्सी हो या दीवाल;
चिपके रहना ही दोनों की नियति है,
पकड़ का छूटना;
दोनों के लिये पतन है, अवनति है।
सधी हुई चाल, सतर्क निगाहें,
एवं;
मौका पाते ही झपट्टा मार कर
शिकार कर लेना दोनों को भाता है,
और
खतरा देखते ही;
अपनी-अपनी पूँछ छोड़ कर भाग जाना;
दोनों को भली-भांति आता है।
दोनों में वही लिज़लिज़ापन,
वही ज़हरीलापन और वही काँइयाँपन है।
किसी छिपकली में नेतापन हो या न हो,
हर नेता में छिपकलीपन अवश्य है।
हर नेता में छिपकलीपन अवश्य है।

कवि- सत्यप्रसन्न

मन बोन्साई


कहाँ गई संवेदना, कहाँ गया है नेह।
सबकी आँखों में भला, क्यों दिखता संदेह॥

नयी पौध ने गढ़ लिये, नये-नये प्रतिमान।
रिश्तों के वट वृक्ष का, टूट गया अभिमान॥

विष कोई पीता रहा, हर क्षण आठों याम।
किसी और को ही मिला, नीलकंठ का नाम॥

वही दक्ष क़ाबिल वही, वो ही चतुर सुजान।
छल प्रपंच के शास्त्र का; जिसे असीमित ज्ञान॥

क्यों बगिया में है नहीं; अब वो मधुर सुगन्ध।
फूलों से क्यों आ रही; है बारूदी गंध॥

चींटी के पर क्या उगे, सिर पर चढ़ा गुमान।
उसे लगा आकाश को; वही रखे है थाम॥

जंगल-जंगल जंग है, जंगल लहूलुहान।
रही न कौड़ी मूल्य की, अब आदम की जान॥

सड़कों से तो ना रही, अब कोई भी आस।
पगडंडी में ही करें; मंज़िल नयी तलाश॥

विश्वासों के गढ़ ढहे, आस्था के कंगूर।
जो जितना ही पास था; वो अब उतनी दूर॥

काट-छाँट करते रहे; तना डालियाँ मूल।
मन बोन्साई हो गया, आगे बढ़ना भूल॥

"सत्यप्रसन्न"
कोरबा (छत्तीसगढ़)

कमसिन मछलियों का शहर


चलो तारों को तोड़ें, और अपना घर सजाएँ,
नदी की हर लहर पे एक पगडंडी बनाएँ।
हवा को कस के भींचें आज अपनी बाजुओं में;
समंदर को सुखाएँ और फिर फ़सलें उगाएँ।

हथेली पर रखें सूरज, उछालें आसमाँ में,
चलो बादल उतारें शाम को इक बाँस ताने।
उजाले को करें हम कैद; अपनी मुठ्ठियों में;
अँधेरे को कहें अब जोर अपना आजमाने।

खुदा से पूछ आएँ रास्ता; ज़न्नत की गलियों का;
चलो मेला लगाएँ आज रेगिस्तां में कलियों का।
समेटें ओस की बूँदे; सहेजें कुछ रुमालों में ;
बसाएँ इक शहर तालाब में कमसिन मछलियों का ।

बुनें चेहरों पे अपने मकड़ियों के चंद जाले;
चलो फिर से लगाएँ हर जु़बां पे सात ताले ।
कोई तस्वीर जाकर खोल ना दे राज़ कोई ;
करें तजवीज़ हर इक पाँव में पड़ जाएँ छाले ।

चलो बालों की नोचें खा़ल, उसपे नाम लिख्खें;
उठा कर धूप के टुकड़े को उस पर शाम लिख्खें ।
कहीं कोई आईना; गुस्ताख़ ना हो जाए फिर से;
चलो हर आईने के नाम इक-इक जा़म लिख्खें।

कवि- सत्यप्रसन्न

कुछ मैं सोचूँ, कुछ तू सोच


झूठ दौड़ता सरपट लेकिन; सच के पाँवों में है मोच,
कैसा मरहम कौन लगाये, कुछ मैं सोचूँ, कुछ तू सोच।

जिसके हाथों ख़ून हुआ था, वही न्याय की कुर्सी पर,
कैसे हो निष्पक्ष फैसला, कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

नहीं रोशनी कोई भीतर; बाहर कोई आग नहीं;
कैसे होगा दूर अंधेरा; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

माली की ख़ुदगर्जी थी; या बाग बगावत कर बैठा;
काँटे ही काँटे क्यों बिखरे; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

बरसा मेघ टूट कर बरसा; अग-जग पानी-पानी है;
फिर भी धरती प्यासी क्यों है; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

इतना सा तो दिल है इसमें; कितने यादों के जंगल;
अपनी दुनिया कहाँ बसायें; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

आस्तीन के साँपों से तो; फिर भी बचना मुमकिन है;
अपने विष का तोड़ कहाँ है; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

आदमख़ोरों की बस्ती में; रहना कोई खेल नहीं,
कैसे फिर भी जिंदा हैं हम; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

तेरे पाँवों के छालों की, पीड़ा मेरे पाँव सहें;
अपना सुख-दु:ख कैसे बाँटें; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

अपना घर तो शीशे का है; उनके हाथों में पत्थर;
कैसे बीतेगा कल अपना; कुछ मैं सोचूँ कुछ तू सोच।

--सत्यप्रसन्न

पांव के नीचे गगन


पांव के नीचे गगन, सिर पे धरा हो,
इस तरह की सोच भी तो कुछ जरा हो।

क्यों न पश्चिम से उगे सूरज सबेरे,
क्यों न बरसे मोतियों से ये सितारे,
क्यों न इस पागल हवा का थाम आंचल,
बांध दें चुपचाप सब बादल घनेरे।
मिर्च मीठी, मधु चखें तो चरपरा हो,
इस तरह की सोच भी तो कुछ जरा हो ।

क्यों न बरसे बर्फ़ सा अंगार नभ से,
क्यों न लहरें जा समायें, तल में धप से ।
क्यों न बिन बोले भी लगता हो कि जैसे,
हो रही हो बात सबसे जाने कब से ।
शोर से खामोशियों का घर भराब हो,
इस तरह की सोच भी तो कुछ जरा हो ।

पांव का चूसें अंगूठा, पेट भर लें,
तर्जनी से जीभ छू लें प्यास हर लें ।
पेड़ की फुनगी से पंछी की तरह ही;
क्यों न हम भी आज एक परवाज भर लें ।
जिंदगी का फिर नया एक तबसरा हो,
इस तरह की सोच भी तो कुछ जरा हो ।

क्यों न पेड़ों पे फलें कलदार सिक्के,
क्यों न आए हाथ हरदम तीन इक्के ।
क्यों न झूले के बिना ही पींग भरकर;
मार आयें चाँद को दो चार धक्के ।
कोई तो मेरे भी जैसा सिरफिरा हो;
इस तरह की सोच भी तो कुछ जरा हो ।

यूनिकवि- सत्यप्रसन्न

58 कवियों में से सत्यप्रसन्न और हज़ारों पाठकों में से फ़‌राज़ विजयी


समीरलाल (उड़नतश्तरी) की पुस्तक के विजेता

पिछले 2-3 माह से हिन्द-युग्म पर पाठकों और लेखकों का आवागमन जिस तेज़ी से बढ़ा है उससे हमें बहुत संतोष और खुशी है कि इंटरनेट पर हिन्दी और हिन्द-युग्म के प्रति हिन्दी प्रेमियों का रुझान बढ़ रहा है। जून 2009 की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता में प्रतिभागी कवियों और पाठकों की संख्या अब तक की अधिकतम संख्या तक पहुँच गई। जून माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में कुछ 58 कवियों ने भाग लिया। इससे पहले पिछले वर्ष विश्व पुस्तक मेला, नई दिल्ली में हमारी प्रतिभागिता के बाद यह संख्या प्राप्त हुई थी।

इससे भी बड़ी खुशी की बात यह है कि इस प्रतियोगिता से नये पाठक और कवि जुड़ते जा रहे हैं, जिससे रचनाओं में नई सुंगंध तो है ही पठनीयता में भी ताज़ापन है। मुद्रित पत्रिकाओं में कविताओं की खातिर लगातार घटता स्पेस कवियों और पाठकों को इंटरनेट की तरफ खींच रहा है।

जून माह की यूनिकवि प्रतियोगिता का निर्णय 2 चरणों में 7 निर्णयकर्ताओं द्वारा करवाया गया। पहले चरण में 3 तथा अंतिम चरण में 4 जज रखे गये। पहले चरण से 58 में से 33 कविताएँ चुनी गईं। अंतिम चरण में प्राप्त अंकों और पहले चरण में प्राप्त अंकों के औसत के आधार पर सत्यप्रसन्न की कविता 'एक सोच की चिंगारी' को यूनिकविता चुना गया।

यूनिकवि- सत्यप्रसन्न

सत्यप्रसन्न मूलतः तेलगू भाषी हैं। आंध्र प्रदेश राज्य के श्रिकाकुलम जिले में 3 मई 1949 को जन्मे सत्यप्रसन्न की शिक्षा-दीक्षा पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश एवं वर्तमान छत्तीसगढ़ के सरगुजा, रायपुर तथा रायगढ़ जिले में हुई। बी.एस.सी. करने के बाद मेकैनिकल इंजिनीयरिंग में पत्रोपाधि प्राप्त किया, उसके के पश्चात छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल में, कनिष्ठ अभियंता, सहायक अभियन्ता, कार्यपालन अभियन्ता एवं अधीक्षण अभियन्ता के पद पर ३४ वर्ष तक कार्य किया। 31 मई 2007 को सेवानिवृत्त हो गये। 5 भाईयों और 5 बहिनों में सबसे बड़े सत्यप्रसन्न को कविताओं तथा कहानियों से बचपन से ही लगाव है। लिखना वर्ष 1980 से प्रारंभ किया। कविता तथा लघु कथाओं से विशेष प्रेम। विभिन्न सन्ग्रहों में प्रकशित और आकाशवाणी, दूरदर्शन से प्रसारित। इससे पहले भी हिन्द-युग्म की इसी प्रतियोगिता में लगातार दो बार इनकी कविताएँ ( विषधरों से डर नहीं है, पेड़ आम का) शीर्ष 10 में स्थान बनाने में सक्षम रही हैं।

पुरस्कृत कविता- एक सोच की चिंगारी

कहीं सूख ना जाए सागर इससे पहले,
चलो बांध कर लहरें कुछ मुठ्ठी में धर लें।
कहीं रात की थम ना जाए सासें देखो,
चलो अंजुरी में कुछ ज़िंदा जुगुनू भर लें।

किसी गै़र से मुठ्ठी भर अपनापन मांगें,
ग़म की हर खूँटी पे एक खुशी भी टांगें।
विश्वासों की टूटी डोर हाथ में ले कर;
घोड़े के आगे हम जोतें अपने तांगे।

अपना नाम लिखें पानी में और मिटायें;
झुक आया आकाश ठेल कर परे हटायें ।
अभी झील को थोड़ा भी अहसास नहीं है;
क्या कुछ करने वाली हैं गुस्ताख़ घटायें।

चलो एक तिल लेकर उसको ताड़ बनाएँ ;
हरी दूब का वंश बदल कर झाड़ बनाएँ।
समझौतों के हाथों रिश्ते गिरवी रख कर;
उदासीनता के कांटों की बाड़ लगाएँ।

कहीं सोच पर लग ना जाएँ कल सौ ताले;
बीज मान कर एक शब्द तो आओ रोपें।
कहीं न सूरज ही मर जाए इससे पहले;
एक सोच की चिंगारी तो कल को सौंपें।



प्रथम चरण मिला स्थान- दूसरा


द्वितीय चरण मिला स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- शिवना प्रकाशन, सिहोर (म॰ प्र॰) की ओर से रु 1000 के मूल्य की पुस्तकें तथा प्रशस्ति-पत्र। जुलाई माह के अन्य तीन सोमवारों की कविता प्रकाशित करवाने का मौका।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें हम समीर लाल की पुस्तक 'बिखरे मोती' की एक-एक प्रति भेंट करेंगे, उनके नाम हैं-

स्वप्निल कुमार "आतिश"
मनोज सिंह
आलोक उपाध्याय
ऋतू सरोहा
अनुज शुक्ला
अमित अरुण साहू
जीष्णु
मुकुल उपाध्याय
सचिन जैन


पिछली बार हमने कुल 19 कविताओं का प्रकाशन किया था। इस बार भी हम 19 कविताओं को प्रकाशित करने का निश्चय किया है। अन्य जिन 9 कवियों की कविताएँ एक-एक करके प्रकाशित होंगी, उनके नाम हैं-

अनिरुद्ध शर्मा
दीपा पन्त
दीपाली आब
गिरिजेश राव
दीपाली पंत तिवारी
कुलदीप जैन
तरव अमित
रवि कान्त अनमोल
जितेन्द्र दवे


उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 31 जुलाई 2009 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

इस बार पाठकों में भी बहुत घमासान रहा। हमारे पुराने सम्मानित पाठकों ने तो नियमित पढ़ा ही लेकिन साथ ही साथ मंजू गुप्ता, शामिख फ़राज़ और अम्बरीष श्रीवास्तव में पढ़ने की होड‌़ रही। शायद ही हमारे किसी भी मंच की कोई पोस्ट शामिख़ फ़राज़ और मंजू गुप्ता की नज़रों से बची हो। लेकिन मंजू गुप्ता ने अधिकाधिक टिप्पणियाँ रोमन-हिन्दी में की, वहीं शामिख ने लगभग सभी देवनागरी-हिन्दी में। चूँकि हिन्द-युग्म देवनागरी (हिन्दी) के प्रोत्साहन के लिए भी इस प्रतियोगिता का आयोजन करता है। इसलिए हम शामिख़ फ़राज़ को यूनिपाठक का खिताब दे रहे हैं। पिछले महीने के यूनिपाठक मोहम्मद अहसन भी पहले रोमन-हिन्दी में टिप्पणियाँ करते थे, लेकिन हमारे आग्रह पर इन्होंने देवनागरी में करना शुरू किया। यही आग्रह हम मंजू गुप्ता से भी करेंगे।

यूनिपाठक- शामिख़‌ फ़राज़

24 फरवरी 1987 को पीलीभीत (उ॰प्र॰) में जन्मे शामिख फ़राज़ वर्तमान में बरेली के एक कॉलेज से एम॰सी॰ ए॰ (कम्प्यूटर अनुप्रयोग में परास्नातक) की पढ़ाई कर रहे हैं। पीलीभीत शहर में खुद का डिजीटल फोटोग्राफी का काम करते हैं। इन्हें वैज्ञानिक सोच के पिता और धार्मिक स्वभाव की माँ से अच्छा व्यवहारिक ज्ञान मिला। इन्होंने लेखन की शुरुआत वर्ष २००२ में की थी। इनका पहला लेख क्षेत्रीय अख़बार अमर उजाला में प्रकाशित हुआ और अब तक कई लेख विभिन्न अख़बारों में प्रकाशित हो चुके हैं। बचपन से ही कहानियों के प्रति रुझान था. इसी कारण हिन्दी लेखकों के अलावा विदेशी लेखकों लियो टअलसटॉय, अन्तोन चेखव, मैक्सिम गोर्की, ओ हेनरी को भी पढ़ा।

इन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ये एक कवि भी बनेंगे लेकिन 19 सितम्बर 2007 को ज़िन्दगी एक ऐसे इन्सान से मिला गई जिसने इन्हें कवि बना दिया।

साहित्य के अतिरिक्त ग्राफिक्स एंड एनीमेशन, आत्मकथाएं पढ़ना, ऐतिहासिक नगरों को घूमना और सूक्तियां एकत्रित करने का शौक़ रखने वाले शामिख की अब तक तीन कविताएँ शीर्ष 10 में स्थान बना चुकी हैं। (पुरस्कृत कविताएँ- अम्मी, मेरी कविता के अक्षर, कुछ काव्यरचनाओं को न जाने कैसे ये बातें मालूम पड़ गईं)

पुरस्कार और सम्मान- समीरलाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।

दूसरे स्थान पर ज़ाहिर तौर हम मंजू गुप्ता को, तीसरे स्थान पर अम्बरीष श्रीवास्तव को रखना चाहेंगे। चौथे स्थान के लिए हमने चुना है सदा को। इन तीनों विजेताओं को भी समीरलाल के कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी।

इनके अलावा हम दीपाली आब, स्वप्न मंजूषा 'अदा', दिशा, अनुपम अग्रवाल, निर्मला कपिला, ओम आर्य, अर्चना तिवारी इत्यादि में भी यूनिपाठक पुरस्कार जीतने की ऊर्जा है। हम उम्मीद करते हैं कि जुलाई माह की प्रतियोगिता में ये सभी यूनिपाठक बनने का भी प्रयास करेंगे और हमें प्रोत्साहित करेंगे।

जो पाठक लगातार पढ़ रहे हैं और यूनिपाठक का पुरस्कार जीत चुके हैं वे वार्षिक हिन्द-युग्म पाठक सम्मान के प्रतिभागी बनते जा रहे हैं। इसलिए पढ़ने में कोई कसर न छोड़ें।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें।

प्रशान्त कुमार (काव्यांश)
कुलदीप "अंजुम
अकेलामुसाफिर
के के यादव
कमलप्रीत सिंह
मुहम्मद अहसन
अनुपम अग्रवाल
सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न'
अम्बरीष श्रीवास्तव
संजय अग्रवाल
अखिलेश श्रीवास्तव
शेली खत्री
डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
नीरज वशिष्‍ठ
स्वप्ना कोल्हे
मंजु महिमा
अक्षय-मन
उधव्व उधव
सजल प्यासा
नीति सागर
सोनिया उपाध्याय
शामिख़ फ़राज़
अमित श्रीवास्तव
आर सी सोनी
आलोक
मोनाली
प्रशांत सोनी
राहुल अग्रवाल
प्रियंका चित्रांशी "प्रिया"
महिमा बोकारिया
संगीता सेठी
निलेश माथुर
सीमा सिंघल
शिवानी दानी
प्रकाश पंकज
दीपक कुमार वर्मा
सुमित वत्स
मंजू गुप्ता
रवि शंकर शर्मा

मैं कविता हूँ


मैं ही तांडव मैं प्रलयंकर, मैं वीणा वादिनी का गायन,
मैं रचना हूँ रचने वाले; करते हैं मेरा पारायण।
मैं ही पर्वत मैं सरिता हूँ, मैं कविता हूँ।


मैं ही कोमलता फूलों की, मैं ही दधीचि का अस्थि वज्र,
मैं सागर की गहराई हूँ, मैं ही विस्तॄत यह नभ निरभ्र |
मैं ही माणिक मैं मुक्ता हूँ ,मैं कविता हूँ।


मैं नियति नटी का नर्तन हूँ , मैं ही प्रतिपल का परिवर्तन,
मेरे अंतस में दावानल, मुझसे ही सारा आलोड़न।
मैं विरत नहीं अनुरक्ता हूँ, मैं कविता हूँ।


मैं ही अबला के हूँ आंसू, मैं ही कृषकों का स्वेद बिन्दु ,
मैं ही शिशु का वह चपल हास्य , मैं ही यौवन की अगम सिन्धु ।
मैं पूर्ण चन्द्र, मैं सविता हूँ , मैं कविता हूँ।


मैं मजदूरिन की कुटिया हूँ , मैं मेहनतकश़ की हूँ रोटी ,
मैं प्रेमगीत प्रेमीजन का, मैं ही सुहाग यामिनी छोटी।
मैं मौन नहीं मैं वक्ता हूँ , मैं कविता हूँ।


मैं क्षमा क्षेम मैं ही क्षमता , मैं महाशक्ति मैं ही ममता ,
मैं सदा व्याप्त हूँ दिग-दिगंत, मुझमें ही जड़ चेतन रमता।
मैं लघुता में ही गुरुता हूँ , मैं कविता हूँ।


मैं ही मंदिर की शंख ध्वनि, मैं ही मस्जि़द की हूँ अजा़न ,
मैं ही ईसा मैं ही नानक, मुझमें ही अंतर्निहित ज्ञान।
मैं वेद मंत्र की शुचिता हूँ , मैं कविता हूँ।


मैं स्वयं परिधि , मैं स्वयं केंद्र, मैं स्वतः सिद्ध मैं ही असाध्य ,
मैं ही पूजा, मैं ही अर्चन, मैं ही आराधन, मैं अराध्य।
मैं कर्म नहीं, मैं कर्ता हूँ ,मैं कविता हूँ।


मैं नव वसंत की मादकता, मैं पावस की रिमझिम फुहार,
मैं शिशिर , शरद की अल्हड़ता, मैं प्राण दायिनी हूँ बयार।
मैं क्रांतिधात्रि हूँ , गीता हूँ, मैं कविता हूँ।


सत्यप्रसन्न

सब कहते हैं- कटवा दो न, सूखी लकड़ी छँटवा दो न


पिछली बार की प्रतियोगिता में 'विषधरों से डर नहीं है' कविता को दूसरा स्थान प्राप्त हुआ था। इस कविता के कवि सत्यप्रसन्न की ही कविता मई महीने की यूनिकवि प्रतियोगिता में भी दूसरे स्थान पर है। इस माह के एक अन्य सोमवार को भी सत्यप्रसन्न की कविता प्रकाशित होगी। कल विश्व पर्यावरण दिवस है। ऐसे में इस कविता की एक और प्रासंगिकता भी है।

पुरस्कृत कविता- पेड़ आम का

है आँगन के ठीक बीच में,
एक पुराना पेड़ आम का।
एक शाख ही हरी बची है,
शेष नहीं है किसी काम का।

होगा कोई सौ सालों का;
है गवाह सब जंजालों का।
किया सामना उसने अब तक,
डटकर सब आँधी पालों का।

दादाजी का बाल सखा है;
किसने उसको पाल रखा है?
या उसने भी दादा जैसा
अमृत कोई ढाल रखा है।

उसकी शाखें भी दादा की
सांसों सी खड़-खड़ करती हैं।
उखड़ी-उजड़ी उसकी सूरत;
आँखों में गड़ती रहती है।

उसके तन का नब्बे प्रतिशत;
दीमक कब के चाट चुके हैं।
दादा के विरसे को जैसे;
बेटे-पोते बाँट चुके हैं।

जिस पल और नहीं झपकेंगी;
दादाजी की सूनी आँखें।
ठीक तभी शायद टूटेंगी,
उसकी भी सब सूखी शाखें।

सब कहते हैं- कटवा दो न;
सूखी लकड़ी छँटवा दो न।
हरी शाख बकरी खा लेगी,
शेष सभी में बँटवा दो न।

दादाजी बस चुप रहते हैं;
पर आँखें सब कह जाती हैं,
उनके मन की सारी पीड़ा;
आँसू बनकर बह जाती है।


प्रथम चरण मिला स्थान- पाँचवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- दूसरा


पुरस्कार- राकेश खंडेलवाल के कविता-संग्रह 'अंधेरी रात का सूरज' की एक प्रति।

कट गया जो, सर रहा हूँ


प्रतियोगिता की दूसरी कविता के रचयिता सत्यप्रसन्न पहली बार हिन्द-युग्म की प्रतियोगिता में भाग ले रहे हैं और मूलतः तेलगू भाषी हैं। आंध्र प्रदेश राज्य के श्रिकाकुलम जिले में 3 मई 1949 को जन्मे सत्यप्रसन्न की शिक्षा-दीक्षा पूर्ववर्ती मध्यप्रदेश एवं वर्तमान छत्तीसगढ़ के सरगुजा, रायपुर तथा रायगढ़ जिले में हुई। बी.एस.सी. करने के बाद मेकैनिकल इंजिनीयरिंग में पत्रोपाधि प्राप्त किया, उसके के पश्चात छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत मंडल में, कनिष्ठ अभियंता, सहायक अभियन्ता, कार्यपालन अभियन्ता एवं अधीक्षण अभियन्ता के पद पर ३४ वर्ष तक कार्य किया। 31 मई 2007 को सेवानिवृत्त हो गये। 5 भाईयों और 5 बहिनों में सबसे बड़े सत्यप्रसन्न को कविताओं तथा कहानियों से बचपन से ही लगाव है। लिखना वर्ष 1980 से प्रारंभ किया। कविता तथा लघु कथाओं से विशेष प्रेम। विभिन्न सन्ग्रहों में प्रकशित और आकाशवाणी, दूरदर्शन से प्रसारित।

पुरस्कृत कविता- विषधरों से डर नहीं है

विषधरों से डर नहीं है
केंचुओं से डर रहा हूँ।
था बरी मैं जिस सज़ा से
वो सज़ा ही भर रहा हूँ।
जो चढ़े शिखरों पे उनकी
जीत का अवसर रहा हूँ ।
आग थी औरों की लेकिन
राख़ सा मैं झर रहा हूँ ।

थी जहाँ भी हार निश्चित
मैं वहाँ अक्सर रहा हूँ।
आसमाँ की सोच पाले
मैं हमेशा घर रहा हूँ।
रास्ते मुझसे ही गुजरे
मैं तो केवल दर रहा हूँ।
थी नहीं परवाज़ मेरी
मैं तो केवल, पर रहा हूँ।

भोथरी थी धार तो क्या
कट गया जो, सर रहा हूँ।
हैं बने मुझसे समंदर
मैं तो क़तरा भर रहा हूँ ।
काफ़िले बढ़ते गये हैं
मील का पत्थर रहा हूँ।
हर पुरस्कृत गीत के
हर शब्द का अक्षर रहा हूँ।

आज जिनके हाथ में है
मैं उन्हीं का कल रहा हूँ ।
आचमन कर देखिए तो
मैं भी गंगाजल रहा हूँ ।



प्रथम चरण मिला स्थान- दूसरा


द्वितीय चरण मिला स्थान- दूसरा


पुरस्कार- अनुराग शर्मा तथा अन्य 5 कवियों के कविता-संग्रह 'पतझड़ सावन बसंत बहार' की एक प्रति।

नेता, चुनाव, राजनीति, लोकतंत्र, वोट और 13 कवि







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - लोकसभा चुनाव-लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव

अंक - पच्चीस

माह - अप्रैल २००९






३० अप्रैल २००९। आज हम सबसे बड़े लोकतंत्र के महोत्सव के तीसरे पड़ाव तक पहुँच गये हैं। ११ राज्यों के करोड़ों लोग लम्बी कतारों में खड़े होकर हमारे देश के भविष्य को चुन रहे हैं। और यहाँ हमारे कवि भी इसी चिन्तन में हैं कि किस तरह से हमारे देश को हर तरह से सम्पन्न बनाया जाये, एक क्रांति लाई जाये और हर कोई गर्व से कह सके "मेरा भारत महान"। जिस तरह हम नेताओं को उनका फ़र्ज याद दिलाते रहते हैं हम भी समझें कि वोट डालना हमारा अधिकार भी है और फ़र्ज़ भी। हमारे कवि "जूतों" के बारे में भी कह रहे हैं, राजनीति में घुस रहे बाहुबलियों की बातें भी कर रहे हैं। पिछले दिनों ही ’आवाज़’ के संचालक सजीव सारथी ने भी चुनावों के मद्देनजर अपनी बात रखी। आइये आज पढ़ते हैं हमारे कवियों को। मनाते हैं "लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव"।

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।



*** प्रतिभागी ***
सत्यप्रसन्न | मंजू गुप्ता | मुकेश कुमार तिवारी | प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध | शन्नो अग्रवाल | मुहम्मद अहसन | विवेकरंजन श्रीवास्तव | रचना श्रीवास्तव | संगीता स्वरूप | मनु ’बेतखल्लुस’ | डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी | आलोक गौड़ । -डा नीरज जैन । -सुरिंदर रत्ती

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






जमी झील में कंकड़ी, फेंक रहे हैं लोग।
क्यों हिलोर उठती नहीं, लगा रहे अभियोग॥
रोटी ठंडी आग पे, सेंक रहे अख़बार।
चाकू रखकर जेब में, बेच रहे बस धार॥
जिनके कांधे है पड़ी, उनकी अपनी लाश।
वे भी दावा कर रहे, बदलेंगे इतिहास॥
करवट ली है वक्त ने, रही न अब वो बात।
जीत रहे खरगोश अब, कछुए खातॆ मात॥
गठबंधन तो हो गया, पर रिश्ते बेमेल।
चली छोड़कर पटरियां, सम्बंधों की रेल॥
कल तक जो हरते रहे, संविधान की चीर।
वो फिर लिखने जा रहे , हम सबकी तकदीर॥
कीचड़ में लिपटे हुए ,चेहरे सभी समान।
किससे हैं महफूज़ हम, सांसत में है जान॥
हर अंधे धृतराष्टृ को, सिंहासन की चाह।
होता हो फिर क्यों नहीं, चाहे देश तबाह॥
संदेहों की जेल में, आशाएं हैं कैद।
तिस पर दुर्दिन हैं खड़े. पहरे पर मुस्तैद॥
असमंजस में आज है, फिर से अपना देश।
चुन लें ख़ूनी सन्त या, फिर डाकू दरवेश॥

--सत्यप्रसन्न





देखो आता पाँच साल बाद चुनाव
होती नाव उम्मीदवार की आर पार
आया भारत के लोकतंत्र का महापर्व
हमें इस हथियार पर होता महागर्व

सत्ता और विरोधी निर्दलीय करें प्रचार
आपस में कटू वाणियों में करते प्रहार
जूता फेंक का देखो आया है व्यवहार

रैलियों में भीड़ जुटाने आते फिल्मी स्टार
भाषण में भूल जाते उम्मीदवार का नाम
पार्टियों का उड़ाते खूब माल
वोट नोट की खेलते चाल

करो मंजु सही मतदान
बने सर्वश्रेष्ठ सरकार
जिससे हो देश का विकास
दूर हो भ्रष्टाचार बेरोजगार

--मंजू गुप्ता





प्रजातंत्र के पर्व पर, होत शाही स्नान ।
सभी प्रजाति कूद पड़ी, खूब रचावै स्वांग ॥

लाऊडस्पीकर पर हो रहा, यश-कीर्ती गान ।
छुटभैये गाल बजाकर, पा रहे सम्मान ॥

लालू पीले हो गये, हुये मुलायम सख्त ।
दोऊ लारि टपिका रहे, देखि ताज-ओ-तख्त ॥

पासवान पांसे चले, अमर चलावै दांव ।
शरद हूँकारी भर रहै, होवत कांव-कांव ॥

माया ठहरी मायावी, खूब अलापै राग ।
छींके पर अटकी नज़रें, कब जागेगें भाग्य ॥

सांप सूंघ गया वाम को, हुआ तीसरा फैल ।
चौथे की तैयारियाँ, खूब चला यह खेल ॥

अड़वाणी रथ लै भटिकै, छेड़े अपनी तान ।
भैरों रूठे रह गये, वरूण चलावै बाण ॥

हाथ हैं तरसे साथ को, कितै ना दीखे ठौर ।
सत्ता सुख की चाह में, भटकै चारो ओर ॥

राहुल धूल फांक रहै, हुईं सोनिया त्रस्त ।
राजनीति भगवान बचाये, रहैं मुकेश मस्त ॥

ढोल बजै ताली बजी, गलियन होय पुकार ।
नेता देहरी लाँघ रहैं, होवे जय-जयकार ॥

खुद ही माला पहनकर, जोड़े दोनो हाथ ।
वोट माँगते फिर रहैं, जिनके सिर पर ताज ॥

साड़ी बँटी दारू बँटी, और कम्बल का ढेर ।
चला रहै सब दांव-पेंच, ये कुर्सी के शेर ॥

नोट-वोट का घाल-मेल, चलेहिं सालों साल ।
नेता गब्बर हो गये, जनता भई कंगाल ॥

वादों की बौछार है, नारों की बरसात ।
यह मौसम की बात है, बाद किसे है याद ॥

फिर बारी पर ठगी गई, जनता देखे राह ।
लूटने फिर अईहैं, पाँच बरस के बाद ॥

जाति पाँत भाषा धर्म, ने बाँट दयौ इंसान ।
वोटरलिस्ट में सिमट गई, अब उसकी पहचान ॥

भाग्य बंद पेटी हुआ, उपर चढती साँस ।
रोज मनौती कर रहे, डगमग है विश्वास ॥

लात चली घूंसे चले, हो जूतम-पैजा़र ।
हिस्ट्रीशीटर देश के, बन गईले सरकार ॥

--मुकेश कुमार तिवारी




राजनीति से उड़ गया, देश प्रेम का रंग
छिड़ी हुई है दलों में सिर्फ स्वार्थ की जंग

खेल कर रहे सभी दल चुप जनता के साथ
करते बस बातें बड़ी दे भाषण दिन रात

पिछले अनुभव से गया खो मन का विश्वास
बातों मे सच्चाई कम है ज्यादा बकवास

लोगों में क्यों रुचि रहे या श्रद्धा के भाव
वादे तो मीठे मधुर मन में मगर दुराव

स्वार्थ नीति ही प्रमुख है राजनीति में आज
उदासीन है लोग सब बेबस सकल समाज

देखा है जब जब हुये जहां भी कहीं चुनाव
सभी दलों में आपसी बढ़ जाते टकराव

जन सेवा औ " समझ का कहीं न सही प्रचार
सुनने आते प्रलोभन औ" बीमार विचार

धोखे ही खाने मिले हर चुनाव के बाद
मत दाता का मत हुआ बार बार बेकार

दुनियां बस उनकी बसी जिनकी हो गई जीत
काम किये सबने सदा वादों के विपरीत

है चुनाव चक्कर अजब इसमें फंसकर लोग
पाल लिये करते सभी लेन देन का रोग

लोकतंत्र की भावना का दिखता विद्रूप
पावन होते तंत्र भी घिस पिट हुआ कुरूप

इसी लिये मिलती खबर जूता मारी खून
जिसकी लाठी साथ हो उसका ही कानून

--प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध




ना चाहकर भी कुछ यहाँ
हम भी कहना चाहते हैं
हो रहा है कितना हल्ला
बस यह बताना चाहते हैं.

यह जोश, यह चीखना सब
बस केवल चुनावी बुखार है

जनता की भावनायों पर
यह एक सीधा प्रहार है.

हर किसी ने बना लिया है
यहाँ पर अपना-अपना hero
रात-दिन चीखते हैं मिलकर
इनमें कुछ अकल के zero.

कभी-कभी कुछ उम्मीदवार भी
उनके साथ प्रकट हो जाते हैं
पक्ष में करने को अपने वह
जनता के निकट हो जाते हैं.

भीड़ में घुसकर कभी वह
बच्चों की नाक पूँछ देते हैं
कभी रोते बच्चों को माँ की
गोद से लेकर चूम लेते हैं.

इस जानी-मानी सी कला में
यह सब लोग कितने दक्ष हैं

दिखाकर यह सारे कारनामें
जीत लेते जनता का पक्ष हैं.

कोई कहता इनमें बार-बार
'रामलला हम फिर आयेंगे
वादा करके जाते हैं आकर
मंदिर फिर यहीं बनायेंगें'.

या गरीब के घर रोटी खाने
कोई आंधी जैसा है आता
जगह बनाकर उसके दिल में
भगवान के जैसा बस जाता.

ना भूलो यह झूठे वादों से
दिल तोड़ने में माहिर हैं
समय आने पर भूल जायेंगे
सबको यह बात जाहिर है.

पता नहीं कहाँ-कहाँ से यह
इतने चमचे बटोर लाते हैं
फिर खुली जीपों में खड़े होकर
सब गला फाड़कर चिल्लाते हैं.

झूठे वादों से फुसलाकर यह
जनता को खूब फ़ूल बनाते हैं
उनके दिल जीत लेने के बाद
अपने वादों को भूल जाते हैं.

जेल में जाते हैं तब भी तो
इनका नाम ऊंचा ही होता है
वहीँ से ही बैठे-बैठे चमचों से
उन सबका सारा काम होता है.


वोट जिस किसी का भी हो
इतना भी सस्ता ना होगा
फिर भी आजमाने के लिए
कोई और रास्ता भी ना होगा.

--शन्नो अग्रवाल




सूरज सुबह उगता है
सुबह सुहानी लगती है
भारत बुलंद है

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल मुस्कराते हैं
भारत बुलंद है

आस्था हो न हो
मंदिर हैं , मस्जिद है
भारत बुलंद है

बिजली हो न हो
बिल तो आता ही है
भारत बुलंद है

सड़कें हो न हों
मंजिलें तो हैं
भारत बुलंद है

शिक्षक आये न आयें
शालायें हैं , छात्र भी
भारत बुलंद है

रोजगार मिले न मिले
स्वरोजगार योजना जो है
भारत बुलंद है

अपराध बढ़ते है तो बढ़ें
पुलिस है , अदालतें भी
भारत बुलंद है

उद् घाटन की नौबत आये न आये
शिलान्यास तो हो रहे हैं न
भारत बुलंद है

आबादी आबाद हो न हो
६०० करोड़ वाले नेता आबाद हैं
भारत बुलंद है

मंहगाई घटे न घटे
मुद्रा स्फिति की दर तो घट रही है
भारत बुलंद है

आमदनी हो न हो
कर्ज लो ,खर्च करो
भारत बुलंद है

उम्मीदवार पसंद हो न हो
वोटर हो तो वोट करो
भारत बुलंद है

--विवेक रंजन श्रीवास्तव




नेता बुद्धिमान हत्यारे होते हैं
वो शारीर नहीं मारते
बड़ी चालाकी से
लेलेते है हमारा वो समय
हमारे वो शब्द ,हमारी वो आवाज़
जिसमे हम रहते हैं .

हमारे छोटे छोटे सुखों की
छाँव ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं
हमारे दुखो और जरूरतों की गुमटियाँ
बिठा देते हैं पहरे
उसके मुहाने पर

सब्ज बाग कुछ यूँ दिखाते हैं
स्वर्ग यहीं होगा
हम मान जाते हैं
वादों को
कपट जाल तले बिछाते हैं
किस्मत के मारे
हम जब इसमें फस जाते हैं
तब पर हमारे क़तर देते हैं

कहते हैं झूठ
पर कुछ इस तरह
के वो हमारी ही
अवाज लगने लगता है
सत्ता में आते ही
उनका सच होता है बेनकाब
और ठगी जनता
तलाशती है नया सहारा

हमारे शब्द
यदि उनके खिलाफ हों
उसका फंदा वो हम पर ही कसते है
और उसी से कर देते हैं
हमारी हत्या

--रचना श्रीवास्तव




लोकतंत्र का उत्सव
मना रहे इस बार
जनता नेताओं से
खाये बैठी है खार .
जनता के हाथ में
आ गया एक हथियार
जूते से हैं लैस सब
चलाने को तैयार .
नेताजी अब सोच रहे
कैसे होगा बेडा पार
भरी सभा में डर रहे
क्या रखें अपने विचार ?
जनता से कर धोखा
और करके अत्याचार
आज खड़े हैं आ कर वो
जूते का पहने हार .
त्रस्त हुई अब जनता
नेताओं पर कर विश्वास
पर नेताजी घूम रहे
लेकर जीत की आस .
कोई नहीं है ऐसा नेता
जो सुने जनता की पुकार
जनता तो ठगी ही जायेगी
आये कोई भी सरकार ..

--संगीता स्वरूप




रैली ,परचम और नारों से कर डाला बदरंग
शहर वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल
कैसे छांटें इन चेहरों में अपनी मर्जी का लीडर
जीत के बाद सभी कर देते हैं पब्लिक का दम बेहाल

--मनु ’बेतखल्लुस’




ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

नेता पहुंचें गली गली बात बनावें बड़ी बड़ी
रात का सपना दिन माँ दिखलावें, लगाएं वोट की गुहार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बाँट बाँट के जाति बिरादरी सब अपना उल्लू सीधा कीन्हिन
खड़ी किहिन दौलत कोठी अपनी लै के वोटवा हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

जस त्यौहार खतम चलिहैं नेता जी दिल्ली, बनिहैं मंतरी
कोठी बंगला गाडी छोड़ के फिर कहाँ झोपड़ी माँ हमार !
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बीत गयी उमरिया अपनी देखत सब चुनाव का हाल
न गाँव माँ कछु बदला न बदली किस्मतिया हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

--मुहम्मद अहसन




लोक सभा चुनाव
लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव
चुनाव आयोग सशक्त,
आचार-संहिता तोड़ते
राजनीति के भक्त,
चुनाव-घोषणा पत्र
जनता रूपी प्रेमिका को
बेबफा-प्रेमी नेता का प्रेम-पत्र
तारे तोड़कर लाने के वादे,
लूटकर प्रेमिका को,
प्रेमी वादे भुला दे,
बेच दे उसको, वैश्यालय पहुँचा दे।
चुनाव-उत्सव
होली का त्योहार,
रंग-बिरंगे रंगों का उपहार,
सभी उड़े रंग
जनता रह गयी दंग
बचा केवल रंग काला
चुनाव-गंगा बन गई नाला
सभी दल फँसे दल-दल में,
नेताओं के चेहरों पर
पुती है कालिख
आओ वोटर!
वोट बेच, कीमत वसूल
थोड़ी कालिख,
अपने चेहरे पर भी मल
अब नहीं रहा तू नाबालिग
वोट डाल चुनाव से हों फारिग।
संसदीय चुनाव
दीपावली का त्योहार
दीपों का उपहार,
दीपक का तेल हुआ गुमनाम,
स्विस बैंक के खातों में,
वोटर आते बातों में,
बाती को भी हड़पने की लगी,
नेताओं में होड़
तू टिकिट के लिए लगा दे दौड़,
जनता को छोड़।
दीपावली है,
चुनाव का जुआ खेल,
बाती को लगा दे दाँव पर,
जरा सा लगा के तेल
भारतीय, नारी, संस्कृति व विचार,
बचे हैं दाव पर लगाने को यार,
पश्चिमी-पारदर्शी-आकर्षक-नग्नता के आवरण में लपेट,
लगा दाव पर, भर ले अपना पेट।
संसदीय चुनाव,
रक्षाबंधन का त्योहार,
बाँधकर रक्षासूत्र,
जनता सौंपती लोकतंत्र की रक्षा का भार,
नेताओं के लिए रक्षासूत्र,
चुनाव तक की दरकार,
तोड़ देंगे चुटकी में,
बस बन जाए सरकार।
रक्षासूत्र ही बनेगा कामसूत्र,
रक्षासूत्र बाँधने वाली को ही
अंकशायिनी बनने को कर देंगे मजबूर,
वस्त्रों को कर तार-तार,
इसी के कर-कमलों से पहनेंगे,
जीत के हार।
विजयादशमी होगी,
चुनाव-परिणामों की घोषणा,
वोटर की मजबूरी है,
किसी ना किसी को,
वोट देना जरूरी है
यदि बहुमत नहीं मिलेगा,
सभी हो जायेंगे सवार
तभी सत्ता का रथ चलेगा
सभी एक-दूसरे के गले लगेंगे,
हम मिलकर सहयोग करेंगे,
यूपीए,राजग,तीसरा,चौथा या पाँचवा मोर्चा,
और सभी दल स्वतंत्र,
दल ही नहीं निर्दलीय उम्मीदवार भी
लोक को छोड़ पीछे,
अपनायेंगे सत्ता-तंत्र।
सभी का धर्म एक है,
सत्ता सभी की टेक है।
तंत्र पहनायेगा,
इन्हें जीत के हार,
जनता भले ही हो बेजार,
ये धर्म की रखेंगे लाज,
धार्मिक पर्यटन बढ़ायेंगे,
धार्मिक-स्थलों पर शराब पार्टी मनायेंगे,
होगें नग्न-नृत्य,
सभी वोटर बन जायेंगे भृत्य,
इनकी तिजोरी देखना,
वही होंगे इनके कृत्य,
जनता का हो राम नाम सत्य।

--डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी




हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

तब कि बातें और थी तब लोगों को ज्ञान था
कथनी और करनी का अंतर गाँधी जी को ध्यान था
बच्चे से गुड़ खाना छोड़ो उस दिन तक ना बोले थे
जिसदिन तक गुड़ खाने का खुद बापू को अरमान था

अब लालटेन वाले नेता बैठें एसी दरबार में
साइकिल वाले नेता भी चलते हैं मोटर कार में
अब काटें भी मिलते हैं कुछ फूलों के हार में
अब पंजे तक से पिसता है बस वोटर हर सरकार में

चिकनी चुपड़ी बात करे जो कभी करे न काम

जगह से अपनी हिले नहीं जो मिले न जबतक दाम
पांच साल में एक बार जो करता हो सलाम
याद नहीं रखता उनको जो आते उसके काम
पहचान ही जिसकी ये हो जो नहीं आदमी आम
अपनों तक का सगा नहीं जो नेता उसका नाम

भरे पेट जो रोज़ लगाते नैतिकता के नारे
और सबको ये बतलाते हैं कि क्या अच्छा है प्यारे
वो शायद ना चल पाएँ खुद अपनी ही बोली राह पर
गर मिल ना पाए उनको उनका खाना उनकी चाह पर
भूखे रहना क्या होता है जबतक नहीं नेता जानेगें
क्या भूख से लड़ने वालों की बातों को वो मानेगें

हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

--आलोक गौड़




रथ बताते फिर रहे चालाक मोटर की जगह
राजनेता फिट हुये हैं आज जोकर की जगह
दृशय मिश्रण आ गया है अब नई तकनीक में
ले रहे हैं 'गांधी' मुरली मनोहर की जगह
शुष्क रेगिस्तान की संभावना दिखने लगी
इस चमन की बुलबुलों को अब सरोवर की जगह
पोल क्या खोलेंगे पोलिंगबूथ शिक्षा के बिना
कुछ भगत सिंह चाहिये हैं आज वोटर की जगह

--डा नीरज जैन



भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

मुँह उठाये फिर चले आये,
छुटभैये, चमचों से पर्चे बटवाये,
रंग-बिरंगे झण्डे फहराये,
इक्के-दुक्के काम गिनवाये,
मांग रहे हमसे मतदान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

पुराने वादे न दोहराओ,
घिसे-पिटे भाषण न सुनाओ,
धर्म का ज़हर न फैलाओ,
पाँच साल का हिसाब बताओ,
कितने किये अच्छे काम,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

भाजप, कांग्रेस, समाजवादी,
ओढे रहो भईया सफेद खादी,
हर काम की तुमको आज़ादी,
होती है होने दो बर्बादी,
इसका है किसी को अनुमान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

सुस्त क़ानून व्यवस्था हमारी,
तिस पर महंगायी, बेरोजगारी,
सुरक्षा, शिक्षा की कमी भारी,
रिश्वत भी लाइलाज बिमारी,
पिस रही जनता हैं सब परेशान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

फेल हो तुम चौथा दर्जा,
फिर भर दिया तुमने पर्चा,
कौन भरेगा चुनाव का खर्चा,
देश पर बढेगा भारी कर्जा,
ख़ूब रौशन किया भारत का नाम,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

कौन सुखी है बोलो आज,
एक सपना है रामराज,
राम भरोसे सब कामकाज,
खीझ है मन में, हैं सब नाराज़,
"रत्ती" बचाये सबको भगवान,
भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

--सुरिंदर रत्ती