काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन
विषय - चित्र पर आधारित कवितायें
चित्र - अनुज अवस्थी
अंक - छब्बीस
माह - मई 2009
इस बार के काव्यपल्लवन के लिये अनुज अवस्थी ने जिस चित्र को भेजा उस चित्र को देखते ही कईं शे’र, कईं गीत याद आ जाते हैं। एक नज़र डालें..
नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के..ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की..इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की..
और यह गीत तो सभी को याद होगा..
नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ...
रिक्शा चलाते बच्चों का चित्र एक दयनीय स्थिति दिखला रहा है। जिसमें आज की सच्चाई और बदसूरत भविष्य नजर आ रहा है। क्या आज की तारीख में इस तरह के गाने लिखे जाते हैं? क्या बच्चों का बचपन अब समाप्त हो चुका है? जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनके ऊपर अपने अभिभावकों की उम्मीदों का बोझ होता है और जो नहीं जा सकते वो? वे मजबूरी का बोझ ढोते हैं। उपर्युक्त गीत उन बच्चों को समर्पित हैं जिन्हें हम अपने देश का भविष्य कहते हैं। 25 प्रतिशत बच्चों को देख कर हम समझते हैं कि हम भारत-निर्माण कर रहे हैं पर 75 प्रतिशत को पता ही नहीं होता कि बचपन क्या है!!
तभी तो कवि भी बच्चों के इन हालातों पर ऐसी पंक्तियाँ लिख बैठते हैं:
बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम जैसे हो जायेंगे...
या फिर...
घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये...
हमारे पाठकों व कवियों ने भी मासूम बच्चों के ऊपर चंद पंक्तियाँ लिखकर अपनी भावनायें व्यक्त की हैं। लेकिन आप लोगों से एक गुजारिश है। आप केवल लिखे या पढ़े नहीं। इस देश के लिये कुछ ऐसा करें कि इन बच्चों का भविष्य सँवर सके। सरकार को दोष न दें। हमें स्वयं उठना होगा। हम चाहते हैं कि इस तरह के चित्र पर कभी काव्यपल्लवन न हो!!!

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।
*** प्रतिभागी ***
मुकेश कुमार तिवारी | मनु ’बेतखल्लुस’ | एम ऐ शर्मा " सेहर" | रचना श्रीवास्तव | मुहम्मद अहसन | शन्नो अग्रवाल | सीमा सिंघल | रवि मिश्रा | संगीता सेठी | सुरिंदर रत्ती | सजल प्यासा | मंजू गुप्ता | सौरभ कुमार । अनुज शुक्ला | परवीन अग्रवाल ।
~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~
मैंने,
इन्हें नही देखा कभी स्कूल जाते
रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे
पीठ पर लादे हुये बोझ
या दौड़ते तितलियों के पीछे
पेट भर खाने के बाद
मैंने
जब भी देखा इन्हें
तो सीखते मिले जिन्दगी की पाठशाला में
पीठ पर कैसे लादा जा सकता है बोझ
और कितनी दूर तक ढोया जा सकता है
एक ही साँस में बिना रूके
बाप,
के कदमों की छाप पर
रखते हुये पैर
सीखा रास्ता घर से कितनी दूर तक जाता है
और कैसे लौटता है
जब सूरज उबासिया ले रहा होता है
या चूल्हे में मचल रही होती हैं लकड़ियाँ
माँ,
के हाथों की लकीरों को
यह पढ रही होती हैं
गोबर की छाप में कंडों(उपलो) पर
या लिख रही होती हैं अपना नाम
राख के ढेर में उंगली से उकेरते हुये
और ढाल रही होती हैं
आदत,
बर्तन मांजते हुये
बचपन,
शायद इसी को कहते होंगे
ऐसा यह भी समझते हैं
और मैं भी
हो सकता है आप नही?
--मुकेश कुमार तिवारी

कोई बोले नेता कल के,
और कोई बतलाये मवाली
खस्ता बचपन देख के सोचा
क्या हरियाली, क्या खुशहाली
हो सकता है अब दिन बदलें,
है सरकार बदलने वाली
पेट को सूखी रोटी दूभर
आँखों में पकवान खयाली
खेंप नए वोटर की है ये,
जिस्म उघाडे, पेट सवाली
--मनु ’बेतखल्लुस’

ये देश के नंगे ,भूखे बच्चे
कुम्हलाये सहमे बदरंग से बच्चे
खाने का ठिकाना ना पहनने की सुध
नादाँ अनबूझ पहेली से बच्चे......
जरा इनके चेहरे की रौनक तो देखो
हर हाल मुस्कुराता ये जीवन तो देखो
हँसी शरारत ये मौज ये मस्ती
मासूमियत का ये मंज़र तो देखो......
ममता के आँचल को तरसते सिसकते
सहारे को इक हाथ ढूढते झिझकते
गर इक हाथ हम ही हैं बढाते
क्या देश के ये किसी काम न आते ??
--एम.ए. शर्मा

जीवन की जरूरतों से खेलता हूँ में
धुप के साये में
पलता हूँ मैं
बह न जाये आँखों से दर्द मेरा
मुस्कान एक चेहरे पर
ओढ़ लेता हूँ मै
अर्ध नंग्न है भविष्य भारत का
हुक्मरानों से ये बे खौफ
कहता हूँ मै
चिपका के बच्चों को जब ठंडे मे सोते हो तुम
चिल चिलाती धुप में तब
ठेला खीचता हूँ मै
सपने सूख के जब झड़ने लगते हैं
उम्मीद की नमी से
उनको सीच लेता हूँ मै
आज हो जायेंगे दवा के पूरे पैसे शायद
यही सोच हर रोज
घर से निकलता हूँ मै
जेब खाली पेट खाली फिर भी
नेताओं और ललित को
सलूट करता हूँ मै
देख मेरी तस्वीर कविता लिखने वालों
कुछ उम्मीद तो
तुम से भी रखता हूँ मै
--रचना श्रीवास्तव

तस्वीर में ही नहीं हम तो सदा साथ रहते हैं,
मुश्किलें कितनी भी आयें सदा हंसते रहते हैं ।
कोई आकर हमें अभी डांट भी जाएगा पर हम,
इन बातों को अब दिल से नहीं लिया करते हैं ।
पल कैसे भी नाजुक हों नन्हीं सी मुस्कान से,
हम अपने संग सब को बहला लिया करते हैं ।
कोई सपना अधूरा ना रहे साथ विश्वास के,
एक कदम लक्ष्य की ओर बढ़ा लिया करते हैं ।
वंदन संग अभिनन्दन मातृभूमि का खेल खेल में,
साथियों को अपने सदा सिखला दिया करते हैं ।
--सीमा सिंघल

खींसें निपोर लो
मसखरी कर लो
हंस लो
उचक फांद लो दो चार साल
अंततः तो जिंदगी की गाडी में जुतना ही है
किसी दफ्तर में चपरासी
कोई छोटी मोटी दूकान
कोई छोटा मोटा धंधा
कोई छोटी मोटी अपराध की जिंदगी
क्षुद्र जीवन , क्षुद्र संघर्ष
शादी ब्याह बच्चे
और बहुत जल्दी यह चक्र भी पूरा
दर असल मेरे कहने के पीछे एक कारण है
देश की किसी पिछली गली के गड्ढे में
उगे बच्चे चमत्कार नहीं करते है ,
सशक्त हस्ताक्षर नहीं बनते हैं ,
कहीं हजारों में ही कभी कोई विराट बरगद हो पाता है
देश के जनतंत्र को सलाम !
परन्तु परम्परागत व्यवस्था में ,
चपरासी का बेटा अमूमन चपरासी ही होता है,
धूल से धूल ही उगती है ,
और गोबर से गोबर ,
फोटोग्राफर साहेब के लिए भी तो तुम मात्र
फोटोग्राफी का ही तो एक अच्छा विषय हो ,
'मलिन बस्ती के हंसते कौतुक पूर्ण बच्चे '
न इस से अधिक न इस से कम
--मुहम्मद अहसन

ओ बाबू, ओ साहिब, ओ मेम साहिब
कब से यहाँ इन्तजार कर रहे हैं
किसी सवारी का
क्या आपको है कहीं जाना
अरे आप इधर आइये ना
बस कुछ पैसे मिल जाएँ तो
ले चलेंगे हम आपको
जहाँ भी है आपको जाना.
मेरा बापू घर पर बैठा रहता है बेकार
दिनभर फूंकता है बीडी
माँ कराहती है बीमारी से
भाई-बहन सभी मुझ पर हैं निर्भर
दवा के बिना, कभी अन्न के बिना
भूखे पेटों को मसोस कर हमें
जीना पड़ता है कभी-कभी
मेरे ही कन्धों पर टिका है सारा घर.
जिन्दगी घिसटती रहती है और
हमारी उम्मीदों का सूरज
हर सुबह उगता है पर
हर शाम के संग डूब जाता है
दो बख्त रोटी के लिये
ही तो मुस्कुराते हैं
इन रोटियों से जिंदगी चलने का
कितना अजीब सा नाता है.
बसंत- बहार आती है ऋतुओं में
हमारे जीवन में तो
आंधी, शीत और पतझर
हमेशा ही बने रहते हैं
पसीना टपकता है माथे से
नंगे पैरों, हांफते हुए
मेहनत-मजदूरी करते हैं
सबकी सुनते और सहते हैं.
दहकते हुए सूरज के नीचे
तपती दुपहरी और आंधी में
झम-झम बरसते पानी में
तरबतर भीगते हैं
अध ढंके गात लिये अरमानों
की सौगात लिये
हम पेट की खातिर ही तो
सारा दिन इतना बोझ खींचते हैं.
--शन्नो अग्रवाल

सलाम साहब
हमारा सलाम क़ुबूल करें
सलाम साहब
ये सलामी है नंगी तकदीर की
भूख झलकाती भारत की तस्वीर की
जो सालों में हमारे लिए गढ़ी गई है
पंचवर्षीय योजनाओं के तहत रची गई है
सलाम साहब................
आप आये तो अच्छा लगा
लेकिन आप को क्यों मै बच्चा लगा
मेरी उम्र तो उतनी पुरानी है
जितनी पुरानी इस गणतंत्र की कहानी है
सलाम साहब...............
ज्यादा कहां शिकायत है
शिकायत के कहां हम लायक हैं
कुछ खाने को लाते तो अच्छा लगता
अब बातों से पेट नहीं भरता
सलाम साहब...............
वैसे इस लोकतंत्र में हम सलामी ठोक जीने के रास्ते बनाते हैं
सो जनतंत्र में हम जनता सिर झुकाकर ही इसे बचाते है
हम भी झुका रहे हैं
मजबूरी है फिर भी मुस्कुरा रहे हैं
सलाम साहब.............
इस बार हमारी गलियों में कुछ लोग आये
भरोसे और वादे की नई खुराक़ खिला गये
गोदी में भी उठाया, प्यार से पुचाकारा
नीचे उतारा, फिर उन के नाम का बुलंद हुआ नारा
उनको भी , सलाम साहब..........
कह गये है फिर आयेंगे
जीत जायेंगे, सरकार बनायेंगे, हमारी ग़रीबी मिटायेंगे
है अब बस यही एक आस
कि पांच सालों बाद जब वो आएं
तब तक हम नरकंकालों में बची रहे सांस
तबतक के लिए .................
सलाम साहब............
--रवि मिश्रा

ऐ देशवासिओं इन्हें संभालो
ऐ देशवासिओं
इन्हे संभालो
इन नन्हे नाज़ुक बच्चों को
जो बच्चे भूखे मरते हैं
जो बच्चे घर-घर फिरते हैं
जो बच्चे अंधियारे में है
ऐ देशवासिओं
इन्हें संभालो
यही देश की आन है
यही देश की शान है
यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा
--संगीता सेठी

आज़ादी के बाद भी, इन्कलाब न हो सका,
हमारे बच्चों के वास्ते, एहतसाब न हो सका
मासूम भला क्या जानें, हयात की दुशवारियाँ,
कलम, दवात, किताब का, हिसाब न हो सका
एक मासूमियत ही, झलकती चेहरे पे,
किसी हरे-भरे चमन का, गुलाब न हो सका
ज़िन्दगी तीरगी में, क्या होगा हासिल,
अपने घर को रौशन करे, वो आफताब न हो सका
एक रद्दी चीज़ कोई, जैसे किसी घर की,
सड़क पर पड़ा संग, दुरे नायाब न हो सका
माना के ये वक़्त, बच्चों की मस्ती का,
बिना तालीम के कोई, कामयाब न हो सका
आज भी बरहनगी, देखी तंग गलियों में,
बदन ढकने का पूरा, खवाब न हो सका
मेरे मुल्क की तरक्की में, कई परेशानियां "रत्ती"
तालीम का बड़ा दायरा, दस्तयाब न हो सका
शब्दार्थ:
एहतसाब = प्रजा की रक्षा के लिये व्यवस्था करना, हयात = जीवन
दुशवारियाँ = कठिनाईयाँ, तीरगी = अन्धकार, आफ़ताब = सूर्य, संग = पत्थर
दुरे नायाब = अमूल्य मोती, तालीम = शिक्षा, बरहनगी = नग्नता,
दस्तयाब = प्राप्त
--सुरिंदर रत्ती

गरीब...नाम तो सुना होगा,
बड़ी आसानी से तुम स्वीकार गये,
की बड़े बड़े देशों मे ऐसी
छोटी छोटी बातें होती रहती है,
ये गरीबी,भूखमरी,ये कंगाली
एक आदत बन चुकी है,
तुम्हारे लिये भी,मेरे लिये भी,
हमे इस कदर आदत हो गयी है,
आज गरीबी दिखती है
हमारी नज़र में,हमारे अंदाज़ में,
और तुमको आदत पड़ चुकी है
इसको आदतन नज़र अंदाज़ करने की।
लेकिन क्या करूँ हाय
हमारे भी दिल में कुछ कुछ होता है,
ये बेहया सी अभिलाषाएँ,बेशरम से सपने,
हमारी झोंपड़ियों में,कभी बंजर पड़े खेतों मे
बेरोकटोक आते जाते रहते है,
और जब ये ख्वाब छटपटाते है,
तो हमारे बाबा हमे बताते है,
ये गरीबी अपने लिये आज
एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है,
इस समाज ने हमे ऐसा रावण बना डाला है
जो लाख चाहे,ये रेखा पार नही कर पाता।
इंसान एक बार जीता है,एक बार मरता है,
कहते है बस एक बार प्यार करता है,
इसी तरह एक ही बार आता है बचपन,
बचपन,एक ऐसा जादूगर,
जो जागी आँखों से ख्वाब दिखाता है,
बचपन एक ऐसा सम्मोहन,
जो हमे हमारी सीमाएँ भुलाता है,
एक गरीब और एक अमीर बच्चे के लिये
ज़मीं और आसमाँ की दूरी में फ़र्क नही होता,
ये बचपन ही तो है जो
अभाव रहित और अभाव सहित दोनो जीवन मे
उड़ान और उत्थान के अरमान जगा सकता है,
इसी माया,इसी मोहपाश,इसी सम्मोहन,इसी जादू
मे हम जकड़े हुए है,छूटना भी नही चाहते,
कयोंकि ऐसे ही खुश है हम,
कभी ये सोचके की हम खुश है,
कभी ये सोचके की कभी हम खुश होंगे।
हाय हाय रे हाय ये इंसा,हाय हाय रे हाय,
तुम कौन होते हो फ़ैसला करने वाले,
कि हम जीवन भर खुश नही रह सकते,
मूर्ख अमीरजादे! कमी हममे नही,
तुममे, तुम्हारी व्यवस्था में है,
देश का भविष्य हम भी है
पर नंगे खड़े है,बेआबरू से,
लेकिन ये बचपन हमे याद दिलाएगा,
हम भी चहकना,मुस्काना जानते थे,
कल अगर रोटी ना मिली तो आज को याद करेंगे,
जन भूखे पेट खेतों में भागते खेलते रहते है।
कोई भारत उदय हमे फ़ील गुड नही करवाएगा,
हमारे मन की शांति हमारे मन मे है,
आसमाँ की छत के नीचे बैठा हर इंसान
एक,दो,तीन,चार कितनी भी रोटियाँ खाने वाला,
खुश रहेगा,हंसेगा,इस खिलखिलाते बचपन की तरह,
कुछ कुछ होता है दोस्त...
तुम नही समझोगे !!
--सजल प्यासा

भारत माता के हम हैं लाल
मस्त बेफिक्र अल्हड़ सा है जीवन
फूल सा खिलखिलाया बचपन
नफरत भेदभाव न करते हम
एकता का सौरभ लुटाए हम
भारत माता के हम हैं लाल
हमीं में छिपे गांधी इंदिरा लाल
सम्प्रदायों की तोड़ें दीवार
धर्मनिरपेक्षता की हम हैं शान
संसार के हम हैं सूरज चॉंद
भारत माता के हम हैं लाल
गाँवों में बसा है हिंदुस्तान
मैत्री की रिक्शा पर हम सवार
पैट्रोल बचत का रच इतिहास
प्रदूषण मुक्ति का दे पैगाम
भारत माता के हम हैं लाल
इनके जज़्बे को मंजु करे प्रणाम
जयहिंद का गा रहें जयगान
भविष्य की प्रगति विकास के प्राण
इनसे बनता प्यारा हिंदुस्तान
--मंजू गुप्ता

अधनंगी तलवारे
जीवन रथ पे
खड़े शहर के
अधनंगी तलवारे देखो.
भारत माँ को
बेशर्म हाथों से आये बचाने
नए सहारे देखो.
सोच नयी है, रंग नया है
छा जाने का ढंग नया है
सागर में अभी जैसे
फूट पड़े फ़व्वारे देखो.
सरकारे तुम आ जाते हो
दान हमारे ले जाते हो
अ़ब न सोचो ये सब होगा
हमने आँखे खोल रखी है
हाथों में बारूद भरी है
तुम नजराने अब नए हमारे देखो..
--सौरभ कुमार

बचपन
आधे भारत का सच है,
पाश कालोनियो के पीछे से होकर -
एक गली जाती है, जहाँ
गंदगियो के बिच, जिन्दगी की -
जद्दोजहद जारी रहती है जीवन पर्यन्त........
बार - बार कोशिश करते है कि-
कब हम , झुग्गियो से सेक्टरो और
अपार्टमेन्टो मे पहुन्च जाये सदा- सदा के लिये
इन गलियो को लाँघकर .
पर ,
हर कोशिश बेकार जाती है
दिल्ली वालो तक - आवाज नही पहुँच पाती है
१० के राष्ट्रकुल खेलो और रक्छा सौदो कि -
तैयारियो के शोर के बीच
आवाज
दबकर रह जती है.
मन्त्रालयो राहत की बाट जोहते,
कब निकल जाता है
बचपन
कूड़ा बीनते , रिक्शा खींचते........................
--अनुज शुक्ला

बदल रहा हे हिंदुस्तान, क्या तुमने कही देखा हे!
बदल रही हे तस्वीर गाँव की, क्या तुमने कही देंखी हे!
खो गया हे बचपन मेरा, क्या तुमने कही देखा हे!
कहाँ सो गयी तकदीर हमारी, क्या तुमने कही देंखी हे!
आती हे लहरें समुद्र में, क्यूँ पहुचती नहीं मुझ तक!
कहाँ खो जाती हे वो, या रास्ते में ही सो जाती हैं वो!
सरकार बनती हेई योजनाय बहुत, पर क्या तुमने उनको देखा हे!
क्या में कभी पढ़ पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
क्या में कभी तन डाख पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
लगता हे सारा बचपन यूँही नंगा गुजरेगा!
वक़्त तो गुजरेगा बहुत, पर गरीबी की जगह सिर्फ एक और गरीब ही गुजरेगा!
क्यूँ नहीं बुलाते तुम उसको, जो तन पर हमारे कपडा दे!
इस बुखे पेटको बहरने को, जो हमको थोडा खाना दे!
नहाने और धोने को एक गुसलखाना दे!
पर पक्की इत्टो का, छोटा मगर एक आशियाना दे!
यही सोचकर दोस्तों में यह रिक्शा लेकर जाता हूँ!
अपनी रूठी किस्मत को जगाकर लाता हूँ!
अपनी और तुम्हारी आँखों की उम्मीद बुलाकर लाता हूँ!
पर बतलाना सही-सही क्या तुमने हमारी अछि तकदीर को अपनी इन आँखों से देखा हे!
--परवीन अग्रवाल





कवि का जन्म इंदौर (म॰प्र॰) के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ, जहाँ ज़रुरतें जेब से बड़ी और समझदारी उम्र से ज्यादा बड़ी होती है और उस पर चार भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के नाते कुछ ज्यादा ही समझदारी का बोझ ढोते जवान हो गये। कवि ने करीब से जिन्दगी के लगभग सभी रंगों में देखा, जहाँ अभावों ने सदा हौसला बढाया कि हासिल करने को और भी मुकाम हैं सा सबक हर कदम पर याद रहा। कविता इन्हें लगातार उर्जा देती है और अपनी मुश्किलों से जूझने का हौसला भी। बी.एस.सी., बी.ई.(मेकेनिकल), ए.आई.सी.डब्ल्यू.ए.(इण्टर) इत्यादि की शिक्षा प्राप्त मुकेश फिलहाल काईनेटिक मोटर कम्पनी लिमिटेड में असिस्टेंट जनरल मैनेजर (परचेस) कार्यरत हैं। इनकी रचनाएँ साहित्य-कुंज, स्वर्गविभा इत्यादि अंतरजालीय पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हैं। ईमेल संपर्क- mukuti@gmail.com ; mukeshtiwari@webdunia.com
जन्म तिथि- 9 दिसम्बर



