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'पहली कविता' का दसवाँ अंक







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन (विशेषांक)




विषय - पहली कविता

अंक - अट्ठाइस (भाग-३)

माह - अगस्त २००९






हम लोग जहाँ 62वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं वहीं नये/पुराने कवियों की पहली कविताओं का दौर जारी है। पिछले महीने "पहली कविता" की दूसरी शृंखला शुरू करने की उद्घोषणा करने के बाद इसमें देश-विदेश से हमारे पाठकों का योगदान लगातार बढ़ रहा है। इस विशेष अंक में अब तक हम १६० से अधिक कवितायें प्रकाशित कर चुके हैं। इन विशेष कविताओं की अगली कड़ी लेकर हम हाजिर हैं।

जैसे जैसे हमें और कवितायें मिलती जायेंगी, हम 20-20 कविताओं के साथ आपके समक्ष उपस्थित होते रहेंगे। हमारे पाठकों ने हमें भूमिका भी लिख भेजी है जिसे हम कविता के साथ ही प्रकाशित कर रहे हैं। अलग अलग अनुभवों पर लिखी गईं वो चंद पंक्तियाँ आज हमारे इस मंच का हिस्सा बन रही हैं। हम आशा करते हैं इससे हमारे अन्य पाठकों को भी प्रेरणा मिलेगी और वे हमें कविता लिख भेजेंगे। चलिये पढ़ते हैं 20 कवियों की पहली कवितायें।
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हमें आप अपनी "पहली कविता" kavyapallavan@gmail.com पर भेज सकते हैं।

आपको हमारा यह आयोजन कैसा लग रहा है और आप इसमें किस तरह का बदलाव देखना चाहते हैं, कॄपया हमें ईमेल के जरिये जरूर बतायें।

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उन दिनों प्रादेशिक चित्रगुप्त महासभा की प्रांतीय कार्यकारिणी की बैठक के लिए नागदा गया था. प्रांतीय संगठन मंत्री था. एक स्थानीय मित्र श्री रमेश सक्सेना के निवास पर समाचार पत्र पढ़ा. किसी समाचार के साथ शीर्षक था 'दर्पण मत तोड़ो'. यह मन को छू गये और एक गीत धीरे-धीरे कलम के सहारे कागज़ पर उतर गया. इसके पहले कुछ तुकबन्दियाँ ज़ुरूर की थीं पर वे याद नहीं. यह गी आठवें दशक के अंत में रचा गया होगा. यह मुझे हमेशा प्रिय रहा. बहुत कम स्वरचित रचनाएं याद हैं..यह उनमें ही है.
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दर्पण मत तोड़ो...

अपना बिम्ब निहारो दर्पण मत तोड़ो,
कहता है प्रतिबम्ब की दर्पण मत तोड़ो.
स्वयं सरह न पाओ, मन को बुरा लगे,
तो निज रूप संवारो,दर्पण मत तोड़ो....
शीश उठाकर चलो झुकाओ शीश नहीं.
खुद से बढ़कर और दूसरा ईश नहीं.
तुम्हीं परीक्षार्थी हो तुम्हीं परीक्षक हो,
खुद को खुदा बनाओ, दर्पण मत तोड़ो....
पथ पर पग रख दो तो मंजिल पग चूमे.
चलो झूम कर दिग्-दिगंत-वसुधा झूमे.
आदम हो इंसान बनोगे प्रण कर लो,
पंकिल चरण पखारो, दर्पण मत तोड़ो.
बांटो औरों में जो भी अमृतमय हो.
गरल कंठ में धारण कर लो निर्भय हो.
वरन मौत का कर जो जीवन पायें 'सलिल'.
इवन में उन्हें उतारो, दर्पण मत तोड़ो.

--संजीव वर्मा 'सलिल'


यह मेरी सबसे पहली कविता है जिसे मैंने ०७/१०/१९९१ को अपने सबसे छोटे भाई धीरज के लिए लिखी थी...उसके विद्यालय में कोई समारोह था, शायद हिंदी दिवस... उस वक़्त मैं कक्षा ११ का विद्यार्थी था...

स्वतंत्र हम-
भारत के जन-गण
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बापू नेहरू के
भारत में जीते हैं क्या?
सत्य-अहिंसा- पंचशील
पुस्तकेषु सिद्धांत हैं।
पदवी-पैरवी में है रेस
लाठी वाले की है भैंस।
मूल्यों का कोई मूल्य नहीं
कुर्सी के सब ग्राहक हैं।
समाजवादी- समाजसेवी
जग-जाहिर रंगे सियार है।
राजनेता धर्मवक्ता
रामराज्य के प्रवक्ता हैं
पर राम राज्य का साधन है।
कौन जनता का दुःख हरता है?
इन झंझटों में कौन फंसता है।
राजनीति और धर्म-
इन दो पाटों के बीच
केवल घुन ही पिसता है।

--नीरज कुमार


बात तब की है जब बारहवी कक्षा में पढ़ता था (सन २००१-०२ ). उस समय म०प्र० में बिजली बहुत कटती थी . मजबूरन पढाई लालटेन के उजाले में करनी पड़ती थी . एक दिन यूँ ही लालटेन के उजाले में कुछ शब्दों को पिरोया तो आर्श्चय का ठिकाना न रहा की मैंने एक कविता लिख डाली थी . दूसरे दिन स्कूल में जब दोस्तों को दिखाया तो किसी ने विश्वास न किया. फिर अपने आप को साबित करने के लिए मैंने फिर दूसरी कविता लिखने शुरू किया और दोस्तों के प्रोत्साहन से आज लगभग ३०० से भी अधिक कवितायेँ लिख चूका हूँ.

एक दिन मैं सड़क से जा रहा था।
मन में कुछ गुनगुना रहा था ।
इतने में एक सरकारी स्कूल मिला।
सोचा , चलो चलाये टाइम पास का सिलसिला
टीचर अंग्रेजी यूँ पढा रहे थे ,
मानो अंग्रेजी की धज्जिया उड़ा रहे थे।
बोले बच्चो होता है एल फॉर लालटेन
ये सुन मैं हो गया बैचैन
मैंने कहा एल फॉर लाइट के ज़माने में लालटेन पढा रहे हो,
क्या कंप्यूटर युग में भी टाईपराइटर चला रहे हो ।
टीचर बोले - एल फॉर लाइट ही नहीं रहेगी तो कंप्यूटर कंहा से चलेगा ?
जब तक होगी विद्युत कटौती तब तक हर बच्चा एल फॉर लालटेन ही पढेगा ।

--मुकेश पांडे "चन्दन"


एक छवि मेरे यादों में आई है
फिर से उसकी शक्ल सामने छाई है।
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मेरे सामने वाले प्रांगन में
कुछ बच्चे आते हैं अक्सर
शस्य श्यामला भारत माता
के कहलाते कनक िशखर
नंगे तन, सांवले रंग
सहज छबीले मतवाले अंग।
मिट्टी से मटमैले पट में
फिरते हैं ये मारे-मारे
इधर-उधर जा भाग दौड़
चुनते रहते बेमोल रतन
सिगरेट, शराब के खाली डब्बों में
बुनते रहते वे अपने सपने
और बचपन की सारी खुशियाँ वे,
कूड़ों के बीच गंवाते हैं।
अरमानों को रौंद बेच कर
रोटी का मोल चुकाते हैं।
निकले हैं कहॉं जाने को ये
पहुंचे हैं कहॉ मालूम नहीं
उनके भटकते कदमों को
मंजिल का निशां मालूम नहीं ।
अपना नहीं कोई उनका
जो है सब पराया है
हर तरफ उनके लिए बस
बेबसी का साया है।
मानवता के नाते बरबस
यूं ही सोचने लगता हूं
किसने छीना इनका बचपन
क्यों ये कूड़ों में बसते हैं
कल के भावी गौरव ये
क्या ऐसे ही बिखरे रहते हैं

--संदीप कुमार श्रीवास्तव


जब पहली कविता की ही बात है तो मैं वास्तव में अपनी पहली कविता भेज रहा हूँ। ये कविता मैंने तब लिखी थी जब मैं १२ साल का था और छठवीं में पढता था। मैं उस समय क्रिश्चियन इंटर कालेज में पढ़ता था, ये कालेज फर्रुखाबाद में है और ६ से १२ तक का है। हमारे कालेज में एक पत्रिका निकलती थी 'प्रकाश वाहक' उसके लिए छात्रों से रचनायें माँगी जाती थी। मैंने भी कविता लिखी और ज्योति स्वरूप अग्निहोत्री जो संपादक मंडल में थे के पास ले गया। मेरी खुशी का ठिकाना तब नहीं रहा जब उन्होंने पहली बार में ही मेरी कविता स्वीकार कर ली। तब से आज तक मैं सैकडो कविताये लिख चूका हूँ और बहुत सी पत्रिकयों और पत्रों में प्रकाशित भी हो चुकी हैं, पर वो ख़ुशी अलग ही थी

नाम मेरा है भ्रष्टाचार...
जहाँ न कोई आचार विचार
दुनिया भर में व्याप्त हूँ मैं
पर एक जगह अभिशप्त हूँ मैं,
रहना मना छोटे घर बार,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
पुलिस, डाक्टर ,नेता हो,
सारी दुनिया का चहेता हो ,
होगा मेरा आज्ञा कर ,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
इर्ष्या गुस्सा दादा दादी,
बेटा बेटी खून बर्बादी ,
चोरी चपलता रिश्तेदार,,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
रिश्वत बाई बीबी मेरी …।
धन से मेरी प्रीत घनेरी ,,,,
है भरा पूरा मेरा परिवार,,,,
नाम मेरा है भ्रष्टाचार
काले गोरे का भेद न मुझको
हार जीत का खेद न मुझको …
नीचे से ऊपर तक मेरी सरकार …॥
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,
ऊँचे नीचे वेतन भोगी,
छात्र अध्यापक या उद्योगी,
सब पर मेरा सामान अधिकार
नाम मेरा है भ्रष्टाचार,

--प्रवीण शुक्ला


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आज एक और दिन दुखी होने का,
एक और दिन रोने का,
लोग खुश होते है,
उनके हँसने पर.
हमे तो,हमे तो अब उनकी हँसी भी
रोने को उकसाती है.

आज जब हम मिले
तो शायद लोगों को लगा की हम मिल रहे है.
पर शायद हम जुड़ा हो रहे थे;
और वो खफा हो रहे थे...

ग़लती शायद दोनो की थी,
या सिर्फ़ मेरी,
पर ग़लती तो ग़लती थी
प्रेम एक बंधन है,
पर ये एक जकड़न बन गया,
इन बेड़ियों से निकलना ही बेहतर था,
शायद यही भाग्य का
इशारा था

काश वो जहाँ भी जाए,
हमे याद ना कर पाए,
क्यूंकी कहीं हमारी याद
उनकी आँखो से ना बह निकले;
क्यूंकी कहीं हमारी याद
उनकी आँखो से ना बह निकले;
और एक नया 'अनूप' बन जाए."

--अनूप कुमार गुप्ता


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प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध" जी की पहली रचना.... पुलिस पत्रिका वर्ष ३ अंक ११ नवम्बर १९४९ के पृष्ठ १ पर प्रकाशित यह रचना मिली ...पत्रिका के कोनो में दीमक लग रही थी ...शुक्रिया काव्य पल्लवन का कि अब यह रचना चिर सुसंचित रह सकेगी ....

आरक्षी दल के सिपाही से
चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध
सिपाही तुम स्वदेश की शान!

तुम पर आधारित जनता के अरमान
शांति व्यवस्था और सुरक्षा का तुम पर भार पड़ा है
तुम खुद को छोटा मत समझो, छोटे का अधिकार बड़ा है
तुम से है समाज संचालित, तुम समाज के प्राण
सिपाही तुम स्वदेश की शान!

बूंद बूंद जल के मिलने से सागर का निर्माण हुआ है
सच्चे सदा सिपाही दल से ही स्वदेश बलवान हुआ है
कर्म निष्ठ बन, धर्म निष्ठ बन राखो अपनी आन
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

सत्य धैर्य औ नीति निपुणता सदा तुम्हारा प् दिखलायें
किन्तु शत्रु के लिये निठुरता पौरुष तुम में आश्रय पाये
भारत के विद्रोही जग में रह न सकें सप्राण
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

वर्षों का फैला अंधियारा मानस मंदिर से मिट जाये
मातृ प्रेम का विषद दीप अब जन मन में प्रकाश फैलाये
मां का मान न घटने पाये, हो चाहे बलिदान
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

बस अपने कर्तव्य प् के तुम निधड़क राही बन जाओ
देख हठीली विपदाओ को भी
न तनिक तुम घबराओ
कर दो अंकित मेरु शिखर पर भी निज चरण निशान
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

राष्ट्र ध्वजा लहरा लहरा कर तुम से रोज कहा करती है
शाम सबेरे बिगुल तुम्हारी रोज पुकार यही करती है
कदम कदम बढ़े चलो भारत के अभिमान
सिपाही तुम स्वदेश की शान !

--प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध"


बचपन के दिनों से हो कुछ लिखने की आदत बनती जा रही थी-
देखी-सुनी चीजों के प्रति मासूम अभिव्यक्ति । पहली कविता , जिसे मैंने सुब्बू को याद करते हुए लिखा। पास में ही रहनेवाली वह तीन-चार साल की बच्ची मेरे पास अक्सर आया करती थी। एक दिन सुबह-सुबह सामूहिक रुदन की आवाज़ पर मैं दौड़ती हुई पहली बार सुब्बू के घर पहुँची-........ सुब्बू भगवान् को प्यारी हो गई थी। कई दिनों तक अन्यमनस्क रहने के बाद मैंने लिखा-

दो दिन के लिए
एक फूल खिला
दो पल हंसकर
मुरझा भी गया
यह जीवन एक तमाशा है
जाते-जाते समझा भी गया !
यही है दुनिया का क्रम देखो
कोई आता है,कोई जाता है
कोई हंसकर शीश उठाता है
कोई सर धुनकर पछताता है
जग है अद्भुत मायानगरी
यहाँ अपना और पराया क्या !
हम तो जाते हैं वो देखो
लाखों कलियाँ हैं निकल रही
वीरान न होता बाग़ कभी
दुनिया किसके हित विकल रही
मत सोच वृथा तू कर पगले
कैसी ममता ,कैसी माया !

--सरस्वती प्रसाद


सरिता

तुम कितनी हो चंचल
तुम कितनी हो चंचल
फिर भी हो तुम निश्छल
कितनी पावन व निर्मल
आज रुको पल दो पल
विश्राम करो क्षण दो क्षण
सरिता
इठलाकर,
बल खाकर कहती
चल हट
आज नहीं...
कल कल.
कल कल..
कल कल...
8 अगस्त 1973
--सुरेश तिवारी


बादलों के देश से

बारह वर्ष की थी
कक्षा में विषय मिला बादल
कविता लिखनी थी
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कुछ ने रुई के फाहों से सफ़ेद बादलों को चुना
मुझे उमड़ते-घुमडते काले बादल मन भाए
आज भी बड़े मित्रवत लगते हैं
बचपन से जानती हूँ इन्हें

पहाड़ों की कोख में जन्मी
प्रकृति प्रेम सहज था
आसान जान पड़ा लिखना
तुकबंदी ही कविता होती हैं
ऐसा कुछ भ्रम था
सुंदर तुक मिलान की भरपूर कोशिश
बन गई सहज सरल पहली कविता
पुरुस्कार स्वरुप मिला
प्रशस्ति-पत्र कलम व
प्रधानाचार्य के स्नेहिल शब्द
मेरे मानस पटल पर आज भी अंकित हैं

"कलम प्रिय सखी साबित होगी लिखते रहना "
खुशी के क्षण बाँटना आसान है
दुख के पलों में लिखना भाता है मुझे
चाहे वो निरीह प्राणी के क्रंदन का हो
आज बादलों के देश से दूर
मीठी यादों को संजो
जब कुछ लिखना चाहती हूँ
अनायास ही होठ बुदबुदा उठते हैं
"कलम परम मित्र प्रिय सखी मेरी "
और कागज़ पर शब्द उकेरना आसान हो जाता है

--एम.ए.शर्मा ’सेहर’


ऐ मोहब्बत् अगर तू ना होती
तो मेरी जिन्दगी मे विरानिया ना होती
ना होता खुशियो का इन्तजार मुझे
क्योकि मेरी जिन्दगी में उदासी ना होती।

ना होता तुझसे बिछङने का डर
क्यो किं मै तेरे इन्तजार मे ना होता
ना बहते मेरे आंखो से अश्क के धारे
अगर मुझे तेरे जाने का गम ना होता।
ऐसा भी क्या हुआ कि तुमने मुझे ठुकरा दिया
जब पूछा मैने तो तुमने मुझे बेवफा ठहरा दिया।

ऐ मोहब्बत अगर तू ना होती
शरारत ना होती, शिकायत ना होती
नैनो मे किसी की नजाकत ना होती
ना होती बेकारी ना होते हम तन्हा
किसी को चाहने की तमन्ना ना होती
दिल भी ना होता तन्हा ना रोता दिवानो सा
अपनी ये हालत ना होती
ऐ मोहब्बत् अगर तू ना होती।।

--मिथिलेश दुबे


उस समय जब मैं स्नातक में था और मैं कुछ मायूस सा था, तब मेरे मन में कुछ लिखने का विचार आया और परिणामस्वरूप यह कविता बन गयी.यह मेरी पहली कविता है क्योंकि गद्य तो मैंने पहले लिखा हुआ था और कुछ शेर-ओ-शायरी भी की थी परन्तु कविता नहीं लिखी थी.
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है
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लाख आएँगी मुश्किलें
तेरे इस सफर में

और अकेलेपन के लम्हे
डरायेंगे तुझे इस सफर में

ऐ राही तुझे नही डरना है
सिर्फ़ आगे बढ़ना है

आगे बढ़कर भी अगर
ना मिले मंजिलों के रास्ते

मत समझ लेना भूल कर
ये आखिरी हैं रास्ते
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है ......

हमसफ़र बनकर आ भी जाए
अगर कोई इस सफर में

मत समझ लेना भूल कर
वो साथ निभाएगा तेरा हरा सफर में
ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है .....

मंजिलें तो बनी हैं पाने के लिए
उन्हें तो एक दिन मिलना ही है
पर ऐ राही तुझे आगे बढ़ना है

--अनिल कान्त



तू सुबह की पहली किरणों मे
तू रात को तारों की चादर मे
फिर सुबह सुबह के ख्वाबों मे
रहती तू मेरी बातो मे
तू भंवरो की "गुंजन" में है
हर महक फूल मे तेरी है,
तू मौसम की अंगड़ाई मे भी ,
ये रंग कहे तू मेरी है....
ये जीवन मे उलझन है मेरी ,
या साँझ की हेराफेरी है,
शायद ना कह पाऊँ तुझे पर तू मेरी है बस मेरी है ..

--जयवर्धन तिवारी


आयो रे आयो रे, घनघोर सावन आयो रे
रिमझिम बूंदों का सागर, तपती धरा की प्यास बुझाने आयो रे
झुलसी कलियों में नव संचार, पुष्पों की मुस्कान खिलाने आयो रे
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माटी की सुगंध, भवरों का गुंजन, हर शाख पे नूतन ले आयो रे
कल-कल, चल-चल करती बुँदे, नदियों का कोलाहल ले आयो रे
नृत्य में लय, सुर में ताल, मृदंग बजाता आयो रे
कवियों में सृजन, संगीत में नव गीत सजाने आयो रे
योवन में तरंग, प्रेम में सतरंग, उमंगों में उल्लास ले आयो रे
चेतन मन में हर्षोल्लास, चंचल चितवन में मधु पराग भरने आयो रे
मृत जीवन के कण-कण में, प्राण रूपी अमृत भरने आयो रे
बन प्रेमिका सावन की, झुमो नाचो गाओ रे
हर बूंद पे गीत सजाओ रे
सावन की रिमझिम बूंदों का भी एक त्यौहार मनाओ रे
आयो रे आयो रे, घनघोर सावन आयो रे

--वीरेन्द्र अग्रवाल


मैंने अपनी लेखनी का सफर १९९३ यानी १५ साल कि उम्र से तय किया, सचमुच मेरे अन्दर ना जाने कोन सा दर्द है जिसे मैं आज तक खुद भी नहीं समझ पाया, मगर मैंने अपने दर्द को कलम का सहारा देकर कागज पर उतारना शुरू कर दिया, और ०९/०३/१९९५ में मैंने इस ग़ज़ल को लिखा, जिसे मैं रजिस्टर के पहले पन्ने पर आज तलक सँजोकर रखा हूँ. I

बहुत दिनों से बात जहन में,
ऐंसे पडी जैंसे चाँद ग्रहन में.
बहुत दिनों से बात जहन में,
फूल सघन थे रंग-बिरंगे,
मुश्क नहीं थी फिर भी चमन में.
बहुत दिनों से बात जहन में,
वो मजबूर था या अभिमानी,
शायद वक़्त रही हो महन में.
बहुत दिनों से बात जहन में,
जख्म थे ज्यादा जीवन थोडा,
रखते रहे हर सांस कफ़न में.
बहुत दिनों से बात जहन में,

--''कवि'' जगन्नाथ विश्वकर्मा


हे दोस्त....
गमो के समन्दर मे बहती हुई मेरी ज़िंदगी को सवारने के लिए,
तुम तिनका बनकर मेरे ज़िंदगी मे आए.
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तुमने मुझे इशारा किए अपना तन्हा हाथ मेरे तरफ बढाया.
मैने भी अपना बेबस हाथ तुम्हारे तन्हा हाथों मे देकर, अपने आप को मेहफ़ूज़ समझा.
कितना बेवकूफ था मै, बेवकूफ......
तुमने मेरे जख्मो को सहलाकर उन्हे मरहम लगाने का वादा किया.
मैने सोचा...औरो की तरह तुम भी अपना वादा तोड दोगे,
पर नहीं, मै गलत था....
तुम अपने वादे के पक्के हो...
तुमने मेरे जख्मो पर मरहम लगाया...पर...
पर तुम्हारे मरहम से मेरे जख्म और ताजा हो गए.
तुम मुझे अंधेरो की जंजीरों से छुडाकर रोशनी के महफिल मे लाये,
एक ऐसी महफिल, जिसकी रौनक तुम हो, सिर्फ तुम...
पर तुम्हारी इस महफिल की तपती रोशनी से मेरी खुदगर्जी जल कर राख होने लगी है....
ईससे तो कई ज्यादा अच्छा मेरा वो विरान अंधेरा था. कम से कम मै वहा आराम तो पाता था. झुठा ही सही, सकुन तो पाता था…..
मैने तुम्हे अपने ख्यालो की किताब के वो पन्ने पढकर सुनाएं...
जो पन्ने कभी मैने अपने आप को भी पढ सुनाए नही थे.
पर क्यूँ ? क्यूँ मै इस झमेले मे उलझ रहा हुं....
यह जानते हुए की इसका अंजाम मेरी बरबादी है...
सिर्फ बरबादी....
हां ! हां... मै इस झमेले मे उलझना चाहता हूँ...
मै बरबाद होना चाहता हूँ......बरबाद कर दो मुझे....
बरबाद कर दो....
हे दोस्त,, मैने तुम्हे तिनका समझा था... तिनका.....
मेरी डूबती हुई जिंदगी को सहारा देनेवाला तिनका....
पर नहीं.. मै गलत था... गलत था मै...
तुम तो सिर्फ एक आरी निकले...
मेरे चेहरे पर रेंगनेवाली तनहाई की जड काटनेवाली आरी....
सिर्फ एक आरी... आरी.............
तुम खुश रहो...........

--कवि जयेश मेस्त्रि


यह कविता मैनें नौवीं कक्षा में लिखी थी. अपने दोस्तो को समर्पित यह मेरी पहली कविता थी.

ऐ मित्र !
क्यों भटक रहे हो,
मंजिल की तलाश में ।
मंजिल ?
मंजिल तो तुम्हारे सामने है,
फिर क्यों भटक रहे हो तलाश में ।
कायरता त्यागो,
लकीर के फ़कीर मत बने रहो,
जगाओ अपने पुरूषत्व को,
सारे पंच तत्व है तुममें ।
बस !
एक बार देखो कोशिश करके,
अम्बर झुक जायेगा ,
कदमों में तुम्हारे ।
तुम्हीं हो नभ के तारे,
तुम्हीं हो वसुंधरा के पुत्र ।
गर्व करेगा सारा जनमानस,
ऐ भारत के धीर वीर ।
(22 जून 1999)

--चन्दन कुमार झा.


कैसे हों ?
वो रूठकर चल दिए , अब हम खुशगवार कैसे हों
नेवीगेशन विकल्प
संजीव वर्मा 'सलिल'
नीरज कुमार
मुकेश पांडे "चन्दन"
संदीप कुमार श्रीवास्तव
प्रवीण शुक्ला
अनूप कुमार गुप्ता
प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध"
सरस्वती प्रसाद
सुरेश तिवारी
एम.ए.शर्मा ’सेहर’
मिथिलेश दुबे
अनिल कान्त
जयवर्धन तिवारी
वीरेन्द्र अग्रवाल
''कवि'' जगन्नाथ विश्वकर्मा
जयेश मेस्त्रि
चन्दन कुमार झा
कुलदीप जैन 'भावुक'
अमिता कौंडल
अंशलाल पंद्रे
अपने विचार दें
फिर से पढ़ें

उजड़ चुका ये चमन , अब फिर सदाबहार कैसे हों ?
सावन गया घटाए बिखरी , अब बारिश कैसे हों
राहें अलग , रस्ते छूटे, अब साथ चलने की गुजारिश कैसे हों ?
वो हमारी, हम उनके हुनर की तारीफ किया करते थे
जब से गैर आये,हुस्न-अ-महफ़िल में हमारी फ़रमाइश कैसे हों ?
एक उन्ही के जख्मो ने हमें घायल कर दिया
आप सलाह न दे,अब कही और दिल्लगी कैसे हों ?
रोज घड़ी भर बतियाए बिना उन्हें चैन कहाँ था
मगर आज वो पास से गुजरे, तो पूछा भी नहीं ..कैसे हों ?

--कुलदीप जैन 'भावुक'


यह मेरी पहली कविता है जिसे मैंने जब बहरावी कक्षा मैं पढ़ती थी तब कलमबद्ध किया था. उस समय मेरे मामा जी की असामयिक मृत्यु से जब मेरी मामीजी का संसार उजड़ गया था और समाचार पत्रों मैं रोज नारी उत्पीडन की खबरें पढ़ कर जब मन ब्यथित हो गया तब मैंने यह कविता कलमबद्ध की थी.

नारी जीवन
नारी जीवन है क्या
रोना और रोना,
पाकर हर चीज़
खोना और खोना,
हंसाती है सबको
पर जाती है रुलाई
बनाती है सबको अपना
पर कहलाती है पराई,
जन्म देती है जग को
पर बन जाती है बला
रूप है दुर्गा का
पर समझी जाती है अबला
वो माँ है, बहन है,पत्नी है
पर कोई नहीं कहता वो अपनी है,
माँ बाप संग रह न पाई
ससुराल ह्रदय न समाई
तो फिर आखिर किसने है अपनाई,

--अर्डमोर अमेरिका
--अमिता कौंडल


जननी भारत माता
......
तेरी जय जय, तेरी जय जय
नेवीगेशन विकल्प
संजीव वर्मा 'सलिल'
नीरज कुमार
मुकेश पांडे "चन्दन"
संदीप कुमार श्रीवास्तव
प्रवीण शुक्ला
अनूप कुमार गुप्ता
प्रो.चित्र भूषण श्रीवास्तव "विदग्ध"
सरस्वती प्रसाद
सुरेश तिवारी
एम.ए.शर्मा ’सेहर’
मिथिलेश दुबे
अनिल कान्त
जयवर्धन तिवारी
वीरेन्द्र अग्रवाल
''कवि'' जगन्नाथ विश्वकर्मा
जयेश मेस्त्रि
चन्दन कुमार झा
कुलदीप जैन 'भावुक'
अमिता कौंडल
अंशलाल पंद्रे
अपने विचार दें
फिर से पढ़ें


तेरी जय जय, तेरी जय जय
रोज हैं खिलते गोद में तेरी, फूल हजारों ऐसे
अकबर, गांधी, भगत, जवाहर चांद सितारों जैसे
चांद सितारों जैसे जननी भारत माता
......
चाहे धर्म कोई भी हो, हैं सब भाई भाई
मां भारत की हैं संताने, है सब में तरुणाई
है सब में तरुणाई
जननी भारत माता
......
उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम की आभा है न्यारी
भिन्न भिन्न भाषा औ प्रांतो की शोभा है प्यारी
की शोभा है प्यारी
जननी भारत माता
.....
गंगा यमुना ब्रह्मपुत्र और कावेरी का पानी
पी हम पानी वाले करते दुश्मन पानी पानी
दुश्मन पानी पानी
जननी भारत माता

--अंशलाल पंद्रे


बच्चे-देश का भविष्य । चित्र और रचना (भाग-6)







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - अनुज अवस्थी

अंक - छब्बीस

माह - मई 2009






इस बार के काव्यपल्लवन के लिये अनुज अवस्थी ने जिस चित्र को भेजा उस चित्र को देखते ही कईं शे’र, कईं गीत याद आ जाते हैं। एक नज़र डालें..

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के..ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की..इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की..

और यह गीत तो सभी को याद होगा..

नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ...

रिक्शा चलाते बच्चों का चित्र एक दयनीय स्थिति दिखला रहा है। जिसमें आज की सच्चाई और बदसूरत भविष्य नजर आ रहा है। क्या आज की तारीख में इस तरह के गाने लिखे जाते हैं? क्या बच्चों का बचपन अब समाप्त हो चुका है? जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनके ऊपर अपने अभिभावकों की उम्मीदों का बोझ होता है और जो नहीं जा सकते वो? वे मजबूरी का बोझ ढोते हैं। उपर्युक्त गीत उन बच्चों को समर्पित हैं जिन्हें हम अपने देश का भविष्य कहते हैं। 25 प्रतिशत बच्चों को देख कर हम समझते हैं कि हम भारत-निर्माण कर रहे हैं पर 75 प्रतिशत को पता ही नहीं होता कि बचपन क्या है!!

तभी तो कवि भी बच्चों के इन हालातों पर ऐसी पंक्तियाँ लिख बैठते हैं:

बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम जैसे हो जायेंगे...

या फिर...

घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये...

हमारे पाठकों व कवियों ने भी मासूम बच्चों के ऊपर चंद पंक्तियाँ लिखकर अपनी भावनायें व्यक्त की हैं। लेकिन आप लोगों से एक गुजारिश है। आप केवल लिखे या पढ़े नहीं। इस देश के लिये कुछ ऐसा करें कि इन बच्चों का भविष्य सँवर सके। सरकार को दोष न दें। हमें स्वयं उठना होगा। हम चाहते हैं कि इस तरह के चित्र पर कभी काव्यपल्लवन न हो!!!



आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
मुकेश कुमार तिवारी | मनु ’बेतखल्लुस’ | एम ऐ शर्मा " सेहर" | रचना श्रीवास्तव | मुहम्मद अहसन | शन्नो अग्रवाल | सीमा सिंघल | रवि मिश्रा | संगीता सेठी | सुरिंदर रत्ती | सजल प्यासा | मंजू गुप्ता | सौरभ कुमारअनुज शुक्ला | परवीन अग्रवाल

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






मैंने,
इन्हें नही देखा कभी स्कूल जाते
रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे
पीठ पर लादे हुये बोझ
या दौड़ते तितलियों के पीछे
पेट भर खाने के बाद

मैंने
जब भी देखा इन्हें
तो सीखते मिले जिन्दगी की पाठशाला में
पीठ पर कैसे लादा जा सकता है बोझ
और कितनी दूर तक ढोया जा सकता है
एक ही साँस में बिना रूके

बाप,
के कदमों की छाप पर
रखते हुये पैर
सीखा रास्ता घर से कितनी दूर तक जाता है
और कैसे लौटता है
जब सूरज उबासिया ले रहा होता है
या चूल्हे में मचल रही होती हैं लकड़ियाँ

माँ,
के हाथों की लकीरों को
यह पढ रही होती हैं
गोबर की छाप में कंडों(उपलो) पर
या लिख रही होती हैं अपना नाम
राख के ढेर में उंगली से उकेरते हुये
और ढाल रही होती हैं
आदत,
बर्तन मांजते हुये

बचपन,
शायद इसी को कहते होंगे
ऐसा यह भी समझते हैं
और मैं भी
हो सकता है आप नही?

--मुकेश कुमार तिवारी




कोई बोले नेता कल के,
और कोई बतलाये मवाली
खस्ता बचपन देख के सोचा
क्या हरियाली, क्या खुशहाली
हो सकता है अब दिन बदलें,
है सरकार बदलने वाली
पेट को सूखी रोटी दूभर
आँखों में पकवान खयाली

खेंप नए वोटर की है ये,
जिस्म उघाडे, पेट सवाली

--मनु ’बेतखल्लुस’




ये देश के नंगे ,भूखे बच्चे
कुम्हलाये सहमे बदरंग से बच्चे
खाने का ठिकाना ना पहनने की सुध
नादाँ अनबूझ पहेली से बच्चे......
जरा इनके चेहरे की रौनक तो देखो
हर हाल मुस्कुराता ये जीवन तो देखो
हँसी शरारत ये मौज ये मस्ती
मासूमियत का ये मंज़र तो देखो......
ममता के आँचल को तरसते सिसकते
सहारे को इक हाथ ढूढते झिझकते
गर इक हाथ हम ही हैं बढाते
क्या देश के ये किसी काम न आते ??

--एम.ए. शर्मा




जीवन की जरूरतों से खेलता हूँ में
धुप के साये में
पलता हूँ मैं
बह न जाये आँखों से दर्द मेरा
मुस्कान एक चेहरे पर
ओढ़ लेता हूँ मै
अर्ध नंग्न है भविष्य भारत का
हुक्मरानों से ये बे खौफ
कहता हूँ मै
चिपका के बच्चों को जब ठंडे मे सोते हो तुम
चिल चिलाती धुप में तब
ठेला खीचता हूँ मै
सपने सूख के जब झड़ने लगते हैं
उम्मीद की नमी से
उनको सीच लेता हूँ मै
आज हो जायेंगे दवा के पूरे पैसे शायद
यही सोच हर रोज
घर से निकलता हूँ मै
जेब खाली पेट खाली फिर भी
नेताओं और ललित को
सलूट करता हूँ मै
देख मेरी तस्वीर कविता लिखने वालों
कुछ उम्मीद तो
तुम से भी रखता हूँ मै

--रचना श्रीवास्तव




तस्‍वीर में ही नहीं हम तो सदा साथ रहते हैं,
मुश्किलें कितनी भी आयें सदा हंसते रहते हैं ।

कोई आकर हमें अभी डांट भी जाएगा पर हम,
इन बातों को अब दिल से नहीं लिया करते हैं ।

पल कैसे भी नाजुक हों नन्‍हीं सी मुस्‍कान से,
हम अपने संग सब को बहला लिया करते हैं ।

कोई सपना अधूरा ना रहे साथ विश्‍वास के,
एक कदम लक्ष्‍य की ओर बढ़ा लिया करते हैं ।

वंदन संग अभिनन्‍दन मातृभूमि का खेल खेल में,
साथियों को अपने सदा सिखला दिया करते हैं ।

--सीमा सिंघल




खींसें निपोर लो
मसखरी कर लो
हंस लो
उचक फांद लो दो चार साल
अंततः तो जिंदगी की गाडी में जुतना ही है
किसी दफ्तर में चपरासी
कोई छोटी मोटी दूकान
कोई छोटा मोटा धंधा
कोई छोटी मोटी अपराध की जिंदगी
क्षुद्र जीवन , क्षुद्र संघर्ष
शादी ब्याह बच्चे
और बहुत जल्दी यह चक्र भी पूरा

दर असल मेरे कहने के पीछे एक कारण है
देश की किसी पिछली गली के गड्ढे में
उगे बच्चे चमत्कार नहीं करते है ,
सशक्त हस्ताक्षर नहीं बनते हैं ,
कहीं हजारों में ही कभी कोई विराट बरगद हो पाता है

देश के जनतंत्र को सलाम !
परन्तु परम्परागत व्यवस्था में ,
चपरासी का बेटा अमूमन चपरासी ही होता है,
धूल से धूल ही उगती है ,
और गोबर से गोबर ,

फोटोग्राफर साहेब के लिए भी तो तुम मात्र
फोटोग्राफी का ही तो एक अच्छा विषय हो ,
'मलिन बस्ती के हंसते कौतुक पूर्ण बच्चे '
न इस से अधिक न इस से कम

--मुहम्मद अहसन




ओ बाबू, ओ साहिब, ओ मेम साहिब
कब से यहाँ इन्तजार कर रहे हैं
किसी सवारी का
क्या आपको है कहीं जाना
अरे आप इधर आइये ना
बस कुछ पैसे मिल जाएँ तो
ले चलेंगे हम आपको
जहाँ भी है आपको जाना.

मेरा बापू घर पर बैठा रहता है बेकार
दिनभर फूंकता है बीडी
माँ कराहती है बीमारी से
भाई-बहन सभी मुझ पर हैं निर्भर
दवा के बिना, कभी अन्न के बिना
भूखे पेटों को मसोस कर हमें
जीना पड़ता है कभी-कभी
मेरे ही कन्धों पर टिका है सारा घर.

जिन्दगी घिसटती रहती है और
हमारी उम्मीदों का सूरज
हर सुबह उगता है पर
हर शाम के संग डूब जाता है
दो बख्त रोटी के लिये
ही तो मुस्कुराते हैं
इन रोटियों से जिंदगी चलने का
कितना अजीब सा नाता है.

बसंत- बहार आती है ऋतुओं में
हमारे जीवन में तो
आंधी, शीत और पतझर
हमेशा ही बने रहते हैं
पसीना टपकता है माथे से
नंगे पैरों, हांफते हुए
मेहनत-मजदूरी करते हैं
सबकी सुनते और सहते हैं.

दहकते हुए सूरज के नीचे
तपती दुपहरी और आंधी में
झम-झम बरसते पानी में
तरबतर भीगते हैं
अध ढंके गात लिये अरमानों
की सौगात लिये
हम पेट की खातिर ही तो
सारा दिन इतना बोझ खींचते हैं.

--शन्नो अग्रवाल




सलाम साहब
हमारा सलाम क़ुबूल करें
सलाम साहब
ये सलामी है नंगी तकदीर की
भूख झलकाती भारत की तस्वीर की
जो सालों में हमारे लिए गढ़ी गई है
पंचवर्षीय योजनाओं के तहत रची गई है
सलाम साहब................
आप आये तो अच्छा लगा
लेकिन आप को क्यों मै बच्चा लगा
मेरी उम्र तो उतनी पुरानी है
जितनी पुरानी इस गणतंत्र की कहानी है
सलाम साहब...............
ज्यादा कहां शिकायत है
शिकायत के कहां हम लायक हैं
कुछ खाने को लाते तो अच्छा लगता
अब बातों से पेट नहीं भरता
सलाम साहब...............
वैसे इस लोकतंत्र में हम सलामी ठोक जीने के रास्ते बनाते हैं
सो जनतंत्र में हम जनता सिर झुकाकर ही इसे बचाते है
हम भी झुका रहे हैं
मजबूरी है फिर भी मुस्कुरा रहे हैं
सलाम साहब.............
इस बार हमारी गलियों में कुछ लोग आये
भरोसे और वादे की नई खुराक़ खिला गये
गोदी में भी उठाया, प्यार से पुचाकारा
नीचे उतारा, फिर उन के नाम का बुलंद हुआ नारा
उनको भी , सलाम साहब..........
कह गये है फिर आयेंगे
जीत जायेंगे, सरकार बनायेंगे, हमारी ग़रीबी मिटायेंगे
है अब बस यही एक आस
कि पांच सालों बाद जब वो आएं
तब तक हम नरकंकालों में बची रहे सांस
तबतक के लिए .................
सलाम साहब............

--रवि मिश्रा




ऐ देशवासिओं इन्हें संभालो

ऐ देशवासिओं
इन्हे संभालो
इन नन्हे नाज़ुक बच्चों को
जो बच्चे भूखे मरते हैं
जो बच्चे घर-घर फिरते हैं
जो बच्चे अंधियारे में है
ऐ देशवासिओं
इन्हें संभालो
यही देश की आन है
यही देश की शान है
यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा

--संगीता सेठी




आज़ादी के बाद भी, इन्कलाब न हो सका,
हमारे बच्चों के वास्ते, एहतसाब न हो सका
मासूम भला क्या जानें, हयात की दुशवारियाँ,
कलम, दवात, किताब का, हिसाब न हो सका
एक मासूमियत ही, झलकती चेहरे पे,
किसी हरे-भरे चमन का, गुलाब न हो सका
ज़िन्दगी तीरगी में, क्या होगा हासिल,
अपने घर को रौशन करे, वो आफताब न हो सका
एक रद्दी चीज़ कोई, जैसे किसी घर की,
सड़क पर पड़ा संग, दुरे नायाब न हो सका
माना के ये वक़्त, बच्चों की मस्ती का,
बिना तालीम के कोई, कामयाब न हो सका
आज भी बरहनगी, देखी तंग गलियों में,
बदन ढकने का पूरा, खवाब न हो सका
मेरे मुल्क की तरक्की में, कई परेशानियां "रत्ती"
तालीम का बड़ा दायरा, दस्तयाब न हो सका
शब्दार्थ:
एहतसाब = प्रजा की रक्षा के लिये व्यवस्था करना, हयात = जीवन
दुशवारियाँ = कठिनाईयाँ, तीरगी = अन्धकार, आफ़ताब = सूर्य, संग = पत्थर
दुरे नायाब = अमूल्य मोती, तालीम = शिक्षा, बरहनगी = नग्नता,
दस्तयाब = प्राप्त

--सुरिंदर रत्ती




गरीब...नाम तो सुना होगा,
बड़ी आसानी से तुम स्वीकार गये,
की बड़े बड़े देशों मे ऐसी
छोटी छोटी बातें होती रहती है,
ये गरीबी,भूखमरी,ये कंगाली
एक आदत बन चुकी है,
तुम्हारे लिये भी,मेरे लिये भी,
हमे इस कदर आदत हो गयी है,
आज गरीबी दिखती है
हमारी नज़र में,हमारे अंदाज़ में,
और तुमको आदत पड़ चुकी है
इसको आदतन नज़र अंदाज़ करने की।
लेकिन क्या करूँ हाय
हमारे भी दिल में कुछ कुछ होता है,
ये बेहया सी अभिलाषाएँ,बेशरम से सपने,
हमारी झोंपड़ियों में,कभी बंजर पड़े खेतों मे
बेरोकटोक आते जाते रहते है,
और जब ये ख्वाब छटपटाते है,
तो हमारे बाबा हमे बताते है,
ये गरीबी अपने लिये आज
एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है,
इस समाज ने हमे ऐसा रावण बना डाला है
जो लाख चाहे,ये रेखा पार नही कर पाता।
इंसान एक बार जीता है,एक बार मरता है,
कहते है बस एक बार प्यार करता है,
इसी तरह एक ही बार आता है बचपन,
बचपन,एक ऐसा जादूगर,
जो जागी आँखों से ख्वाब दिखाता है,
बचपन एक ऐसा सम्मोहन,
जो हमे हमारी सीमाएँ भुलाता है,
एक गरीब और एक अमीर बच्चे के लिये
ज़मीं और आसमाँ की दूरी में फ़र्क नही होता,
ये बचपन ही तो है जो
अभाव रहित और अभाव सहित दोनो जीवन मे
उड़ान और उत्थान के अरमान जगा सकता है,
इसी माया,इसी मोहपाश,इसी सम्मोहन,इसी जादू
मे हम जकड़े हुए है,छूटना भी नही चाहते,
कयोंकि ऐसे ही खुश है हम,
कभी ये सोचके की हम खुश है,
कभी ये सोचके की कभी हम खुश होंगे।
हाय हाय रे हाय ये इंसा,हाय हाय रे हाय,
तुम कौन होते हो फ़ैसला करने वाले,
कि हम जीवन भर खुश नही रह सकते,
मूर्ख अमीरजादे! कमी हममे नही,
तुममे, तुम्हारी व्यवस्था में है,
देश का भविष्य हम भी है
पर नंगे खड़े है,बेआबरू से,
लेकिन ये बचपन हमे याद दिलाएगा,
हम भी चहकना,मुस्काना जानते थे,
कल अगर रोटी ना मिली तो आज को याद करेंगे,
जन भूखे पेट खेतों में भागते खेलते रहते है।
कोई भारत उदय हमे फ़ील गुड नही करवाएगा,
हमारे मन की शांति हमारे मन मे है,
आसमाँ की छत के नीचे बैठा हर इंसान
एक,दो,तीन,चार कितनी भी रोटियाँ खाने वाला,
खुश रहेगा,हंसेगा,इस खिलखिलाते बचपन की तरह,
कुछ कुछ होता है दोस्त...
तुम नही समझोगे !!

--सजल प्यासा




भारत माता के हम हैं लाल
मस्त बेफिक्र अल्हड़ सा है जीवन
फूल सा खिलखिलाया बचपन
नफरत भेदभाव न करते हम
एकता का सौरभ लुटाए हम
भारत माता के हम हैं लाल
हमीं में छिपे गांधी इंदिरा लाल
सम्प्रदायों की तोड़ें दीवार
धर्मनिरपेक्षता की हम हैं शान
संसार के हम हैं सूरज चॉंद
भारत माता के हम हैं लाल
गाँवों में बसा है हिंदुस्तान
मैत्री की रिक्शा पर हम सवार
पैट्रोल बचत का रच इतिहास
प्रदूषण मुक्ति का दे पैगाम
भारत माता के हम हैं लाल
इनके जज़्बे को मंजु करे प्रणाम
जयहिंद का गा रहें जयगान
भविष्य की प्रगति विकास के प्राण
इनसे बनता प्यारा हिंदुस्तान

--मंजू गुप्ता




अधनंगी तलवारे
जीवन रथ पे
खड़े शहर के
अधनंगी तलवारे देखो.
भारत माँ को
बेशर्म हाथों से आये बचाने
नए सहारे देखो.
सोच नयी है, रंग नया है
छा जाने का ढंग नया है
सागर में अभी जैसे
फूट पड़े फ़व्वारे देखो.
सरकारे तुम आ जाते हो
दान हमारे ले जाते हो
अ़ब न सोचो ये सब होगा
हमने आँखे खोल रखी है
हाथों में बारूद भरी है
तुम नजराने अब नए हमारे देखो..

--सौरभ कुमार




बचपन
आधे भारत का सच है,
पाश कालोनियो के पीछे से होकर -
एक गली जाती है, जहाँ
गंदगियो के बिच, जिन्दगी की -
जद्दोजहद जारी रहती है जीवन पर्यन्त........
बार - बार कोशिश करते है कि-
कब हम , झुग्गियो से सेक्टरो और
अपार्टमेन्टो मे पहुन्च जाये सदा- सदा के लिये
इन गलियो को लाँघकर .
पर ,
हर कोशिश बेकार जाती है
दिल्ली वालो तक - आवाज नही पहुँच पाती है
१० के राष्ट्रकुल खेलो और रक्छा सौदो कि -
तैयारियो के शोर के बीच
आवाज
दबकर रह जती है.
मन्त्रालयो राहत की बाट जोहते,
कब निकल जाता है
बचपन
कूड़ा बीनते , रिक्शा खींचते........................

--अनुज शुक्ला




बदल रहा हे हिंदुस्तान, क्या तुमने कही देखा हे!
बदल रही हे तस्वीर गाँव की, क्या तुमने कही देंखी हे!
खो गया हे बचपन मेरा, क्या तुमने कही देखा हे!
कहाँ सो गयी तकदीर हमारी, क्या तुमने कही देंखी हे!
आती हे लहरें समुद्र में, क्यूँ पहुचती नहीं मुझ तक!
कहाँ खो जाती हे वो, या रास्ते में ही सो जाती हैं वो!
सरकार बनती हेई योजनाय बहुत, पर क्या तुमने उनको देखा हे!
क्या में कभी पढ़ पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
क्या में कभी तन डाख पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
लगता हे सारा बचपन यूँही नंगा गुजरेगा!
वक़्त तो गुजरेगा बहुत, पर गरीबी की जगह सिर्फ एक और गरीब ही गुजरेगा!
क्यूँ नहीं बुलाते तुम उसको, जो तन पर हमारे कपडा दे!
इस बुखे पेटको बहरने को, जो हमको थोडा खाना दे!
नहाने और धोने को एक गुसलखाना दे!
पर पक्की इत्टो का, छोटा मगर एक आशियाना दे!
यही सोचकर दोस्तों में यह रिक्शा लेकर जाता हूँ!
अपनी रूठी किस्मत को जगाकर लाता हूँ!
अपनी और तुम्हारी आँखों की उम्मीद बुलाकर लाता हूँ!
पर बतलाना सही-सही क्या तुमने हमारी अछि तकदीर को अपनी इन आँखों से देखा हे!

--परवीन अग्रवाल