फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

प्रवासी होते हुये



मुकेश कुमार तिवारी हिंद-युग्म के पुराने और लोकप्रिय कवियों मे से हैं। अप्रैल 2009 के यूनिकवि रहे मुकेश जी की इस माह हिंद-युग्म पर लम्बे समय के बाद वापसी हुई है। इससे पहले उनकी एक कविता ’ये लड़कियाँ’ नवंबर 2009 मे प्रकाशित हुई थी। मुकेश जी हिंद-युग्म के यूनिकवियों के प्रकाशन ’संभावना डॉट कॉम’ का हिस्सा भी रह चुके हैं। इनकी कवितायेँ अक्सर मानवीय जीवन के बढते मशीनीकरण के बीच क्षरित होती संवेदनाओं के स्रोत को बचाने का यत्न करती हैं। प्रस्तुत कविता मार्च माह मे छठे पायदान पर रही है।


पुरस्कृत कविता: प्रवासी होते हुये
एक,
सालिम अली थे,
उनसे मैंने जाना था
अपने गाँव की चौपाल पर
पहली बार किसी डॉक्यूमेन्ट्री में कि
पंछी प्रवासी होते हैं
खैर तब तक तो
मुझे प्रवासी होने का भी अर्थ नही पता था
अलबत्ता, पंछियों से खासी पहचान थी
हमारे गाँव से
कोई आदमी बाहर नही जाता था
और पंछी उतने ही थे
जिन्हें मैं पहचानता था
नाम रख छोड़े थे मैंने, उनके
फिर,
न जाने क्यों?
जो लोग कभी गाँव से गये थे
लौटे किसी तीज-त्यौहार पर
और उनका यह लौटके आना
बन ही गया दस्तूर
अब हर मौके पे
लौटते हैं यह लोग गाँव
अपने साथ लिये चमकती कामयाबी में
खामोश नाकामियों
जिसे बिखेर जाते हैं खेत में बीज़ की जगह
और अगली फसल के कटने पर
कोई और छोड़ देता है गाँव
चौंधियाते हुये
इन्हें भी अगली बार लौटने के लिये
साथ तो चाहिये किसी का
अब,
मैं समझने लगा हूँ
प्रवास और प्रवासी दोनों को
लेकिन, अब वो पंछी
जिन्हें सालिम अली कहते थे
हमारे मेहमान नज़र नही आते हैं
आदमी जरूर मेहमान सा
लौटता है कुछ देर के लिये घर
रिश्तों में दीमके लग चुकी है
मियादों की
इस,
फागुन में जब लौटगे वो
महुए,
अब भी उबाले जा रहे होंगे
देर रात तक
सुबह,
पहली धार से मिटाकर तड़प
मदमाती हो जायेगी
लाली फैल जायेगी होंठों से फिसलकर
गालों तक
यूँ लगेगा कि
सूरज कुछ देर के लिये ही सही
ठहर गया हो यहीं आस-पास
और ताक रहा हो
बौराये यौवन को फागुनी बयार में
भीगते / जलते हुये
मांदल की थाप पर
सनसनी दौड़ने लगी है देह में
बालियों में पक रहा है गेंहू /
यौवन संदली बदन में /
और मन में कई ख्वाब
रात लगती ही नही कि खत्म होगी कभी
होली की आँच में
गर्म हो रही होंगी कई हथेलियाँ मेहंदी रची हुई
और पसीना बस सरक रहा होगा
गर्दन से फिसलते हुये
सीने के करीब
या और थोड़ा नीचे....
बस,
एक दो दिन के बाद
लौटके किसी भीड़ में बदल जायेंगे ये
गाँव में पीछे
कोई कर रहा होगा
फसल पकने का इंतजार
___________________________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।


हिन्द-युग्म का वार्षिकोत्सव और विश्व पुस्तक मेला



'सम्भावना डॉट कॉम' का विमोचन करते केदारनाथ सिंह, आनंद प्रकाश और शैलेश भारतवासी

आप इस पूरे कार्यक्रम को सुन भी सकते हैं, आपको ऐसा प्रतीत होगा कि आप भी कार्यक्रम में उपस्थित हैं। नीचे के प्लेयर से सुनें-

कुल प्रसारण समय- 1 घंटा 37 मिनट । अपनी सुविधानुसार सुनने के लिए यहाँ से डाउनलोड करें।


19वाँ विश्व पु्स्तक मेला के दौरान 6 फरवरी 2010 को हिन्द-युग्म ने अपना वर्ष 2009 के वार्षिकोत्सव का आयोजन किया, जिसमें वर्ष 2009 में मासिक प्रतियोगिता यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता से चुने गये 12 यूनिकवियों को सम्मानित किया गया, 38 यूनिकवियों की प्रतिनिधि कविताओं के संग्रह 'सम्भावना डॉट कॉम' का विमोचन हुआ और कुछ यूनिकवियों का काव्यपाठ भी हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी के मूर्धन्य कवि केदारनाथ सिंह ने की। 'सम्भावना डॉट कॉम' पर टिप्पणी करने के लिए प्रसिद्ध आलोचक आनंद प्रकाश और कवि मदन कश्यप मौज़ूद थे। संचालन निखिल आनंद गिरि ने किया।

इंटरनेटीय समूह हिन्द-युग्म दिसम्बर 2008 से वार्षिकोत्सव मनाना आरम्भ किया है। इस आयोजन के माध्यम से हिन्द-युग्म अपनी गतिविधियों से इंटरनेट के बाहर की दुनिया को परिचित कराना चाहता है। वर्ष 2008 के वार्षिकोत्सव में हिन्द-युग्म ने उपस्थित दर्शकों को हिन्दी (यूनिकोड) टाइपिंग, ब्लॉग मेकिंग के बारे में जानकारी दी थी। वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव को मुख्य अतिथि बनाया था ताकि वे भी हिन्दी की इंटरनेटीय परम्परा का करीब से साक्षात्कार कर सकें और हिन्द-युग्म को उनका मार्गदर्शन मिल सके कि इसे किस तरह से आगे बढ़ना चाहिए।

चूँकि हिन्द-युग्म साल 2010 के विश्व पुस्तक मेले में शिरकत कर ही रहा था तो तय किया गया कि इसी दौरान वर्ष 2009 का वार्षिकोत्सव मनाया जाय ताकि बहुत बड़े जन समुदाय तक अपनी पहुँच बनाई जा सके। हिन्द-युग्म ने 'इंटरनेटीय साहित्य गैरस्तरीय है' मिथक को तोड‌़ने के लिए hindyugm.com पर पिछले 4 सालों में प्रकाशित 38 सम्भावनाशील कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को 'सम्भावना डॉट कॉम' को प्रकाशित किया, जिसका लोकार्पण वार्षिकोत्सव में ही किया जाना तय किया गया।

कार्यक्रम की औपचारिक शुरूआत अतिथियों को पुष्पगुच्छ और स्मृति-चिह्न भेंट करके हुई। इसके बाद यूनिकवि अखिलेश श्रीवास्तव ने काव्यपाठ किया। अखिलेश श्रीवास्तव ने अपनी 'बहन' और 'विदर्भः कर्जे में कोंपल' कविताओं का पाठ किया। इसके पश्चात संचालक निखिल आनंद गिरि ने आकांक्षा पारे को काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया। आकांक्षा ने 'मुक्तिपर्व', 'औरत के शरीर में लोहा' आदि कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम के अगले चरण में 'सम्भावना डॉट कॉम' का विमोचन वरिष्ठ कवि केदरानाथ सिंह, प्रसिद्ध आलोचक आनंद प्रकाश और इस संग्रह के संपादक शैलेश भारतवासी ने किया। इस संग्रह में 38 नेटारूढ़ी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को संकलित किया गया है। इस संग्रह में हिन्द-युग्म पर प्रकाशित 6 नेपाली कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित किया गया है।

'सम्भावना डॉट कॉम' पर टिप्पणी करते हुए प्रसिद्ध आलोचक आनंद प्रकाश ने कहा कि निश्चित रूप से मेरे लिए यह नया अनुभव है। अब तक हम कविताओं को या तो किसी संकलन में पढ़ते थे या किसी पत्रिका में, लेकिन मेरे लिए यह पहली बार है कि ये कविताएँ पहले से ही नेट पर प्रकाशित हैं और हम इसे पुस्तक के रूप में देख रहे हैं। आमतौर पर लोग नये का विरोध करते हैं, लेकिन मैं इस नये प्रयोग का स्वागत करूँगा। इंटरनेट तकनीक में असीमित संभावनाएँ हैं और मेरे ख्याल से इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाना होगा ताकि वे भी अपनी रचनाओं को बड़े पाठकवर्ग तक पहुँचा सकें।

उन्होंने कहा कि मैं इसी संग्रह की भूमिका से कुछ बातों का उल्लेख करना चाहूँगा जिससे मेरी बात आगे बढ़ेगी। उन्होंने भूमिका में लिखित एक वाक्य 'बाज़ार का शिकार मनुष्य' पर अपनी मतभिन्नता भी व्यक्त की और कहा कि यदि हम खुद को बाज़ार का शिकार कहते हैं तो इसका मतलब यह है कि बाज़ार एक बाहरी तत्व है, वो हमसे अलग है। मेरे ख्याल से इस पर दुबारा सोचने की ज़रूरत है।

आनंद प्रकाश ने 38 के 38 यूनिकवियों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि और कार्यक्षेत्र का बकायदा उल्लेख करते इस बात को रेखांकित किया कि इस संग्रह में संकलित लगभग सभी कवि हिन्दी साहित्य से पाठ्यक्रम के तौर पर नहीं जुड़े हैं। इसका मतलब की संवेदना की खेती करने का अधिकार केवल विश्वविद्यालयों के हिन्दी प्रोफेसरों या लिटरेचर के विद्यार्थियों को नहीं है और इस बात की पुष्टि इस संग्रह में संकलित कविताएँ करती भी हैं। आनंद प्रकाश जी ने कुछ कविताओं की पंक्तियों को पढ़कर उनकी तारीफ की और आलोचक की दृष्टि से कुछ सवाल खड़े किये, जिसमें अखिलेश श्रीवास्तव की 'विदर्भः कर्जे में कोंपल;, 'हँसी', अनुराधा श्रीवास्तव की 'नारी क्यों मौन रहती है', अपूर्व शुक्ल की 'समय की अदलत में', 'इक्कीसवीं सदी का भविष्य' आदि कविताओं की पंक्तियों का उल्लेख किया।

निखिल आनंद गिरि ने मनीष वंदेमातरम् की एक कविता 'इस फागुन मेरे गाँव ज़रूर से ज़रूर आना' का पाठ किया। कार्यक्रम को एकरसता की स्थिति से बचाने के लिए संभाषणों के बाद काव्यपाठ रखा गया था। गौतम राजरिशी ने अपनी ग़ज़ल 'चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से' को गाकर प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम के मध्य में इस कार्यक्रम के एक और अतिथि कवि मदन कश्यप का आना हुआ। उनके स्वागत के बाद कार्यक्रम आगे बढ़ा। इसके तुरंत बाद साल 2009 के यूनिकवियों का सम्मान हुआ। सम्मान-पत्र स्वीकार करने के लिए मुकेश कुमार तिवारी, अखिलेश कुमार श्रीवास्तव, अपूर्व शुक्ल और रवीन्द्र शर्मा 'रवि' उपस्थित थे। सभी यूनिकवियों को यह सम्मान-पत्र शिवना प्रकाशन, सिहोर (म॰प्र॰) द्वारा दिया गया। सभी कवियों को सम्मान-पत्र के साथ-साथ उपहार-पत्रक भी दिये गये, जिन्हें सिहोर वापिस भेजकर यूनिकवि रु 1000 मूल्य तक की पुस्तकें इनाम स्वरूप प्राप्त कर सकते हैं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि मैं इन कविताओं को एक आस्वादक(रसिक) के रूप में पढ़ना चाहूँगा। युवा कवियों का नया संकलन देखो तो जल्दी मत करो। प्रतीक्षा करो, उन्हें फलने दो, बढ़ने दो। आलोचना के मूल्य और मापदंड प्रतीक्षा करें। ये कविताएँ इक्कीसवीं सदी की आवाज़ें हैं, नई आवाज़ें हैं, मैं इन्हें उँगली नहीं दिखाऊँगा, मैं इनका स्वागत करूँगा।

केदारनाथ जी ने आगे कहा पिछले साठ-पैसठ वर्ष से मैं कविता को देख-पढ़-समझ रहा हूँ, लेकिन जब मैंने इन कविताओं की भाषा और उसके तेवर को देखा तो थोड़ा चौका कि जो प्रसाद-पंत-निराला के समय की भाषा थी, और जो आपकी भाषा है, कितनी लम्बी छलांग है। हिन्दी भाषा तो पिछले 100 सालों में बनी है, कविता की भाषा तो अब तैयार हुई है। मुझे लगता है कि आपके पास कविता लिखने के लिए भाषा तैयार है। आपकी कविताओं का तेवर अलग है, कहने के अंदाज़ में थोड़ा नयापन है, पृथक हैं आप। इस संग्रह में कई धरातल की कविताएँ हैं। कई तरह की शैलियाँ हैं। जब कविताएँ आपका हाथ पकड़ लें, जाने न दें तो समझो कि कविता सफल है। इस संग्रह की कई कविताओं ने मुझे रोका-टोका। कुछ ऐसे कवि जिनमें खास तरह की प्रौढ़ता दिखाई पड़ती है। नाम तो कई हैं, लेकिन मैं खास तौर से गौरव सोलंकी की चर्चा करना चाहूँगा। इनकी कविताओं में क्षितिज तक पहुँचने के बाद की प्रौढ़ता का एहसास होता है।

अपने वक्तव्य में केदारनाथ सिंह ने गौरव सोलंकी की कविता 'जरा सी अनपढ़ता और बहुत सारी बेवकूफी के लिए' और पावस नीर की कविता 'जुलाई का पहला हफ्ता' को उपस्थित दर्शकों को पढ़कर भी सुनाया। (अपनी टिप्पणियों के साथ)

कार्यक्रम के अगले चरण में उमेश पंत ने 'कश्मीर' कविता, अपूर्व शुक्ल ने 'समय की अदालत में' कविता और देवेन्द्र कुमार पाण्डेय ने 'आयल वेलेन्टाइन' कविता का पाठ किया।

अंत में हिन्द-युग्म के वरिष्ठ सदस्य प्रेमचंद सहजवाला ने उपस्थित अतिथियों और दर्शकों को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम में हिन्द-युग्म के सदस्यों के अलावा हास्य कवयित्री सरोजिनी प्रीतम, विदेश से हिन्दी साहित्य साधना में रत युवा कवयित्री कविता वाचक्नवी जैसे गणमान्य लोग भी उपस्थित थे।

तस्वीरों में-


कार्यक्रम की शुरूआत पहले मंच सजाते हिन्दयुग्मी


संचालक निखिल आनंद गिरि


कार्यक्रम की शुरूआत में उपस्थित दर्शक


मंच पर अतिथियों को बिठाते सफादक शैलेश भारतवासी


केदारनाथ सिंह और आनंद प्रकाश


दर्शक


दर्शक


मुख्य अतिथि केदारनाथ सिंह को स्मृति-चिह्न और पुष्पगुच्छ भेंट करतीं नीलम मिश्रा


मुख्य वक्ता आनंद प्रकाश को स्मृति-चिह्न और पुष्पगुच्छ भेंट करतीं आकांक्षा पारे


काव्यपाठ करते यूनिकवि अखिलेश कुमार श्रीवास्तव


काव्यपाठ करतीं युवाकवयित्री आकांक्षा पारे


विमोचनोपरांत सम्भावना डॉट कॉम पर अपने हस्ताक्षर दर्ज करते मुख्य अतिथि और मुख्य वक्ता


सम्भावना डॉट कॉम की सहस्ताक्षरित प्रति ग्रहण करते युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी


अपना वक्तव्य देते आनंद प्रकाश


काव्यपाठ करते मेजर गौतम राजरिशी


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते मुकेश कुमार तिवारी


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते अपूर्व शुक्ल


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते रवीन्द्र शर्मा रवि


यूनिकवि सम्मान ग्रहण करते अखिलेश कुमार श्रीवास्तव


काव्यपाठ करते देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

यह, लड़कियाँ.........


कस्बे से लड़कियाँ,
किसी के ब्याह में ही
या किसी और मौके पर
जब शहरों में आती हैं
तो तलाशती हैं अपने होने को
चकाचौंध और
शहरी लड़कियों के बीच कहीं ।

ये लड़कियाँ,
कुछ ज्यादा ही झिझकती हैं
शायद इसलिये अभी तक नहीं सीख पायी हैं
नेट/चैट और डेट का ककाहरा
शहर में होते हुये भी
खुद को कैद कर लेती हैं
रसोई में
और दिखाती हैं क्या सीखा है अब तक
कैसे आटा गूंथना है
रोटी / पराठों और पूड़ियों के लिये अलहदा
कैसे चूल्हा फूंकना है
और दाल का अधहन देखना भी है नम आँखों से।

ये लड़कियाँ,
नहीं भूलती हैं कि
पहली कुचैया (अध-पकी रोटी) देना है गौ-माता को
फिर भगवान जी का भोग लगाना है
यदि कोई तीज-त्यौहार है
या यूँ ही बनाये हैं पकवान तो
भोग पितृ-देवता को भी लगाना है
अगियार करना है / आचमन करना है
फिर सबको भोजन कराना है
पूरी श्रद्धा के साथ ।

ये लड़कियाँ,
जब चौके से फुरसत पाती हैं तो
लेकर ढोलक बैठ जाती हैं
भजन से लगाकर
बन्ना-बन्नी / सौहर / दादरा तक
ना जाने और
क्या-क्या गा-गवा लेती हैं
नाचती भी हैं खूब
और नचवाती भी हैं खूब।

ये लड़कियाँ,
किसी के कहने का इंतजार नहीं करतीं
जब भी वक्त मिलता है पकड़ लेती है अगला काम
चाहे वो आँगन लीपने के लिये गोबर खोजना हो
या दरवाजों पर बनाने हो मांड़ने
या कलश के लिये गोंठना हो जौ गोबर के साथ
या सजाना हो कलश बारात की अगवानी पर
या करना हो नटकौरा*
ये लड़्कियाँ बारात में नही जाती हैं।
*(एक प्रकार का स्वांग जो लड़के की बारात जाने के बाद घर की महिलाओं द्वारा किया जाता है)

ये लड़कियाँ,
जानती हैं मेंहदी लगाना खूब
और बड़ी ही शिद्दत से सजाना शहरी लड़कियों के हाथ
फिर रूई के फाहों से लगाना नीलगिरी का तेल
या मुल्तानी मिट्टी / हल्दी से बनाना उबटन
और चेहरे में रौनक भरना।

ये लड़कियाँ,
जब भी आती हैं शहर
बस सिमटी रह जाती हैं
घर में / रसोई में / रिश्ते निभाने में
और जबकि शहरी लड़कियाँ चुन रही होती हैं
अपने लिये मैचिंग्स / नये हेयर कलर्स
ये लड़कियाँ,
कूट रही होती हैं शिकाकाई
उनके लिये
कल ही का तो दिन है बारात जो आनी है
और फिर इतना सारा काम सिर पर पड़ा है
अच्छा बाकी बातें कल करेंगे
बस ऐसे ही किसी जुमले पर खत्म कर लेती हैं
कुछ भी पूछा जाये उनके बारे में।
-------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी

मेरे अपने पैरों में


मैं,
जब सीख रहा था
अपने कदमों को जमाना
धरती के सीने पर
तब मेरे पास
अपने पैर थे धरती से जुड़े हुये /
अपना अनुभव था /
अपने विचार थे

कोई,
ठोकर सिखाती थी
एक सबक टीस के साथ
कोई कांटा जब चुभता था
तो छोड़ जाता था अनुभव
अपने पीछे
ज्ञान को,
पैरों के तलुओं में जमा कर लेते थे
छाले

वक्त,
के साथ मैनें सीख लिया
अपने पैरों को जमाना
और चढना बुलंदियों की ओर
अनुभव की उंगलियाँ थाम कर
तब भी मेरा नाता
ज़मीन से जुड़ा हुआ था
मैं,
महसूस करता था
हवा को मेरे चेहरे पर स्पर्श करते
एक इंसान की तरह

ऊँचाईयों ,
ने धीरे-धीरे मेरे पैरों को
बदल दिया पंखों में
अब मुझे अच्छा लगने लगा
हवा में तैरना /
हवा में ही गोते लगाना
और फिर लौट आना अपनी जगह पर
बिना थके हुये
मैं,
कटने लगा ज़मीन से
अब मुझे ज़मीन से जुड़े आदमी
अच्छे नही लगते थे
पसीने की बू आती है
उनके पास से

मुझे,
कुछ दिन तो अच्छा लगा
एकदम विशिष्ट हो जाना
ज़मीन पर रेंगते आम इंसानों से अलहदा
फिर कोफ्त होने लगी
आसमान में टंगे हुये
जहां दिन में सूरज
नाप लेता था मेरी औकात को
और रात में तारे बंधाते थे हौंसला
कुछ देर को ही सही
आसमान तुम्हारी मुट्ठी में आयेगा जरूर
मैंने पाया
मेरे हाथ हवा में विलीन हो रहे थे
आसमान रच रहा था
मेरे खिलाफ कोई साजिश

मुझे,
घुटन होने लगी है
इन ऊँचाईयों पर
पंखों की बैशाखियों से
अनुभव पराया सा लगने लगा है
ऐसा लगता है कि
जैसे कि
मुझे फिर से
शुरूआत करनी है
वही सब सीखने की
ज़मीन से जुड़ने की
हे, प्रभु
मेरे पंखों को फिर से बदल दो
पैरों में
मेरे अपने पैरों में
------------------------------------
मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : २९-मई-२००९ / समय : ११:३४ रात्रि / घर

बच्चे-देश का भविष्य । चित्र और रचना (भाग-6)







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - अनुज अवस्थी

अंक - छब्बीस

माह - मई 2009






इस बार के काव्यपल्लवन के लिये अनुज अवस्थी ने जिस चित्र को भेजा उस चित्र को देखते ही कईं शे’र, कईं गीत याद आ जाते हैं। एक नज़र डालें..

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के..ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की..इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की..

और यह गीत तो सभी को याद होगा..

नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ...

रिक्शा चलाते बच्चों का चित्र एक दयनीय स्थिति दिखला रहा है। जिसमें आज की सच्चाई और बदसूरत भविष्य नजर आ रहा है। क्या आज की तारीख में इस तरह के गाने लिखे जाते हैं? क्या बच्चों का बचपन अब समाप्त हो चुका है? जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनके ऊपर अपने अभिभावकों की उम्मीदों का बोझ होता है और जो नहीं जा सकते वो? वे मजबूरी का बोझ ढोते हैं। उपर्युक्त गीत उन बच्चों को समर्पित हैं जिन्हें हम अपने देश का भविष्य कहते हैं। 25 प्रतिशत बच्चों को देख कर हम समझते हैं कि हम भारत-निर्माण कर रहे हैं पर 75 प्रतिशत को पता ही नहीं होता कि बचपन क्या है!!

तभी तो कवि भी बच्चों के इन हालातों पर ऐसी पंक्तियाँ लिख बैठते हैं:

बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम जैसे हो जायेंगे...

या फिर...

घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये...

हमारे पाठकों व कवियों ने भी मासूम बच्चों के ऊपर चंद पंक्तियाँ लिखकर अपनी भावनायें व्यक्त की हैं। लेकिन आप लोगों से एक गुजारिश है। आप केवल लिखे या पढ़े नहीं। इस देश के लिये कुछ ऐसा करें कि इन बच्चों का भविष्य सँवर सके। सरकार को दोष न दें। हमें स्वयं उठना होगा। हम चाहते हैं कि इस तरह के चित्र पर कभी काव्यपल्लवन न हो!!!



आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
मुकेश कुमार तिवारी | मनु ’बेतखल्लुस’ | एम ऐ शर्मा " सेहर" | रचना श्रीवास्तव | मुहम्मद अहसन | शन्नो अग्रवाल | सीमा सिंघल | रवि मिश्रा | संगीता सेठी | सुरिंदर रत्ती | सजल प्यासा | मंजू गुप्ता | सौरभ कुमार । अनुज शुक्ला | परवीन अग्रवाल ।

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






मैंने,
इन्हें नही देखा कभी स्कूल जाते
रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे
पीठ पर लादे हुये बोझ
या दौड़ते तितलियों के पीछे
पेट भर खाने के बाद

मैंने
जब भी देखा इन्हें
तो सीखते मिले जिन्दगी की पाठशाला में
पीठ पर कैसे लादा जा सकता है बोझ
और कितनी दूर तक ढोया जा सकता है
एक ही साँस में बिना रूके

बाप,
के कदमों की छाप पर
रखते हुये पैर
सीखा रास्ता घर से कितनी दूर तक जाता है
और कैसे लौटता है
जब सूरज उबासिया ले रहा होता है
या चूल्हे में मचल रही होती हैं लकड़ियाँ

माँ,
के हाथों की लकीरों को
यह पढ रही होती हैं
गोबर की छाप में कंडों(उपलो) पर
या लिख रही होती हैं अपना नाम
राख के ढेर में उंगली से उकेरते हुये
और ढाल रही होती हैं
आदत,
बर्तन मांजते हुये

बचपन,
शायद इसी को कहते होंगे
ऐसा यह भी समझते हैं
और मैं भी
हो सकता है आप नही?

--मुकेश कुमार तिवारी




कोई बोले नेता कल के,
और कोई बतलाये मवाली
खस्ता बचपन देख के सोचा
क्या हरियाली, क्या खुशहाली
हो सकता है अब दिन बदलें,
है सरकार बदलने वाली
पेट को सूखी रोटी दूभर
आँखों में पकवान खयाली

खेंप नए वोटर की है ये,
जिस्म उघाडे, पेट सवाली

--मनु ’बेतखल्लुस’




ये देश के नंगे ,भूखे बच्चे
कुम्हलाये सहमे बदरंग से बच्चे
खाने का ठिकाना ना पहनने की सुध
नादाँ अनबूझ पहेली से बच्चे......
जरा इनके चेहरे की रौनक तो देखो
हर हाल मुस्कुराता ये जीवन तो देखो
हँसी शरारत ये मौज ये मस्ती
मासूमियत का ये मंज़र तो देखो......
ममता के आँचल को तरसते सिसकते
सहारे को इक हाथ ढूढते झिझकते
गर इक हाथ हम ही हैं बढाते
क्या देश के ये किसी काम न आते ??

--एम.ए. शर्मा




जीवन की जरूरतों से खेलता हूँ में
धुप के साये में
पलता हूँ मैं
बह न जाये आँखों से दर्द मेरा
मुस्कान एक चेहरे पर
ओढ़ लेता हूँ मै
अर्ध नंग्न है भविष्य भारत का
हुक्मरानों से ये बे खौफ
कहता हूँ मै
चिपका के बच्चों को जब ठंडे मे सोते हो तुम
चिल चिलाती धुप में तब
ठेला खीचता हूँ मै
सपने सूख के जब झड़ने लगते हैं
उम्मीद की नमी से
उनको सीच लेता हूँ मै
आज हो जायेंगे दवा के पूरे पैसे शायद
यही सोच हर रोज
घर से निकलता हूँ मै
जेब खाली पेट खाली फिर भी
नेताओं और ललित को
सलूट करता हूँ मै
देख मेरी तस्वीर कविता लिखने वालों
कुछ उम्मीद तो
तुम से भी रखता हूँ मै

--रचना श्रीवास्तव




तस्‍वीर में ही नहीं हम तो सदा साथ रहते हैं,
मुश्किलें कितनी भी आयें सदा हंसते रहते हैं ।

कोई आकर हमें अभी डांट भी जाएगा पर हम,
इन बातों को अब दिल से नहीं लिया करते हैं ।

पल कैसे भी नाजुक हों नन्‍हीं सी मुस्‍कान से,
हम अपने संग सब को बहला लिया करते हैं ।

कोई सपना अधूरा ना रहे साथ विश्‍वास के,
एक कदम लक्ष्‍य की ओर बढ़ा लिया करते हैं ।

वंदन संग अभिनन्‍दन मातृभूमि का खेल खेल में,
साथियों को अपने सदा सिखला दिया करते हैं ।

--सीमा सिंघल




खींसें निपोर लो
मसखरी कर लो
हंस लो
उचक फांद लो दो चार साल
अंततः तो जिंदगी की गाडी में जुतना ही है
किसी दफ्तर में चपरासी
कोई छोटी मोटी दूकान
कोई छोटा मोटा धंधा
कोई छोटी मोटी अपराध की जिंदगी
क्षुद्र जीवन , क्षुद्र संघर्ष
शादी ब्याह बच्चे
और बहुत जल्दी यह चक्र भी पूरा

दर असल मेरे कहने के पीछे एक कारण है
देश की किसी पिछली गली के गड्ढे में
उगे बच्चे चमत्कार नहीं करते है ,
सशक्त हस्ताक्षर नहीं बनते हैं ,
कहीं हजारों में ही कभी कोई विराट बरगद हो पाता है

देश के जनतंत्र को सलाम !
परन्तु परम्परागत व्यवस्था में ,
चपरासी का बेटा अमूमन चपरासी ही होता है,
धूल से धूल ही उगती है ,
और गोबर से गोबर ,

फोटोग्राफर साहेब के लिए भी तो तुम मात्र
फोटोग्राफी का ही तो एक अच्छा विषय हो ,
'मलिन बस्ती के हंसते कौतुक पूर्ण बच्चे '
न इस से अधिक न इस से कम

--मुहम्मद अहसन




ओ बाबू, ओ साहिब, ओ मेम साहिब
कब से यहाँ इन्तजार कर रहे हैं
किसी सवारी का
क्या आपको है कहीं जाना
अरे आप इधर आइये ना
बस कुछ पैसे मिल जाएँ तो
ले चलेंगे हम आपको
जहाँ भी है आपको जाना.

मेरा बापू घर पर बैठा रहता है बेकार
दिनभर फूंकता है बीडी
माँ कराहती है बीमारी से
भाई-बहन सभी मुझ पर हैं निर्भर
दवा के बिना, कभी अन्न के बिना
भूखे पेटों को मसोस कर हमें
जीना पड़ता है कभी-कभी
मेरे ही कन्धों पर टिका है सारा घर.

जिन्दगी घिसटती रहती है और
हमारी उम्मीदों का सूरज
हर सुबह उगता है पर
हर शाम के संग डूब जाता है
दो बख्त रोटी के लिये
ही तो मुस्कुराते हैं
इन रोटियों से जिंदगी चलने का
कितना अजीब सा नाता है.

बसंत- बहार आती है ऋतुओं में
हमारे जीवन में तो
आंधी, शीत और पतझर
हमेशा ही बने रहते हैं
पसीना टपकता है माथे से
नंगे पैरों, हांफते हुए
मेहनत-मजदूरी करते हैं
सबकी सुनते और सहते हैं.

दहकते हुए सूरज के नीचे
तपती दुपहरी और आंधी में
झम-झम बरसते पानी में
तरबतर भीगते हैं
अध ढंके गात लिये अरमानों
की सौगात लिये
हम पेट की खातिर ही तो
सारा दिन इतना बोझ खींचते हैं.

--शन्नो अग्रवाल




सलाम साहब
हमारा सलाम क़ुबूल करें
सलाम साहब
ये सलामी है नंगी तकदीर की
भूख झलकाती भारत की तस्वीर की
जो सालों में हमारे लिए गढ़ी गई है
पंचवर्षीय योजनाओं के तहत रची गई है
सलाम साहब................
आप आये तो अच्छा लगा
लेकिन आप को क्यों मै बच्चा लगा
मेरी उम्र तो उतनी पुरानी है
जितनी पुरानी इस गणतंत्र की कहानी है
सलाम साहब...............
ज्यादा कहां शिकायत है
शिकायत के कहां हम लायक हैं
कुछ खाने को लाते तो अच्छा लगता
अब बातों से पेट नहीं भरता
सलाम साहब...............
वैसे इस लोकतंत्र में हम सलामी ठोक जीने के रास्ते बनाते हैं
सो जनतंत्र में हम जनता सिर झुकाकर ही इसे बचाते है
हम भी झुका रहे हैं
मजबूरी है फिर भी मुस्कुरा रहे हैं
सलाम साहब.............
इस बार हमारी गलियों में कुछ लोग आये
भरोसे और वादे की नई खुराक़ खिला गये
गोदी में भी उठाया, प्यार से पुचाकारा
नीचे उतारा, फिर उन के नाम का बुलंद हुआ नारा
उनको भी , सलाम साहब..........
कह गये है फिर आयेंगे
जीत जायेंगे, सरकार बनायेंगे, हमारी ग़रीबी मिटायेंगे
है अब बस यही एक आस
कि पांच सालों बाद जब वो आएं
तब तक हम नरकंकालों में बची रहे सांस
तबतक के लिए .................
सलाम साहब............

--रवि मिश्रा




ऐ देशवासिओं इन्हें संभालो

ऐ देशवासिओं
इन्हे संभालो
इन नन्हे नाज़ुक बच्चों को
जो बच्चे भूखे मरते हैं
जो बच्चे घर-घर फिरते हैं
जो बच्चे अंधियारे में है
ऐ देशवासिओं
इन्हें संभालो
यही देश की आन है
यही देश की शान है
यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा

--संगीता सेठी




आज़ादी के बाद भी, इन्कलाब न हो सका,
हमारे बच्चों के वास्ते, एहतसाब न हो सका
मासूम भला क्या जानें, हयात की दुशवारियाँ,
कलम, दवात, किताब का, हिसाब न हो सका
एक मासूमियत ही, झलकती चेहरे पे,
किसी हरे-भरे चमन का, गुलाब न हो सका
ज़िन्दगी तीरगी में, क्या होगा हासिल,
अपने घर को रौशन करे, वो आफताब न हो सका
एक रद्दी चीज़ कोई, जैसे किसी घर की,
सड़क पर पड़ा संग, दुरे नायाब न हो सका
माना के ये वक़्त, बच्चों की मस्ती का,
बिना तालीम के कोई, कामयाब न हो सका
आज भी बरहनगी, देखी तंग गलियों में,
बदन ढकने का पूरा, खवाब न हो सका
मेरे मुल्क की तरक्की में, कई परेशानियां "रत्ती"
तालीम का बड़ा दायरा, दस्तयाब न हो सका
शब्दार्थ:
एहतसाब = प्रजा की रक्षा के लिये व्यवस्था करना, हयात = जीवन
दुशवारियाँ = कठिनाईयाँ, तीरगी = अन्धकार, आफ़ताब = सूर्य, संग = पत्थर
दुरे नायाब = अमूल्य मोती, तालीम = शिक्षा, बरहनगी = नग्नता,
दस्तयाब = प्राप्त

--सुरिंदर रत्ती




गरीब...नाम तो सुना होगा,
बड़ी आसानी से तुम स्वीकार गये,
की बड़े बड़े देशों मे ऐसी
छोटी छोटी बातें होती रहती है,
ये गरीबी,भूखमरी,ये कंगाली
एक आदत बन चुकी है,
तुम्हारे लिये भी,मेरे लिये भी,
हमे इस कदर आदत हो गयी है,
आज गरीबी दिखती है
हमारी नज़र में,हमारे अंदाज़ में,
और तुमको आदत पड़ चुकी है
इसको आदतन नज़र अंदाज़ करने की।
लेकिन क्या करूँ हाय
हमारे भी दिल में कुछ कुछ होता है,
ये बेहया सी अभिलाषाएँ,बेशरम से सपने,
हमारी झोंपड़ियों में,कभी बंजर पड़े खेतों मे
बेरोकटोक आते जाते रहते है,
और जब ये ख्वाब छटपटाते है,
तो हमारे बाबा हमे बताते है,
ये गरीबी अपने लिये आज
एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है,
इस समाज ने हमे ऐसा रावण बना डाला है
जो लाख चाहे,ये रेखा पार नही कर पाता।
इंसान एक बार जीता है,एक बार मरता है,
कहते है बस एक बार प्यार करता है,
इसी तरह एक ही बार आता है बचपन,
बचपन,एक ऐसा जादूगर,
जो जागी आँखों से ख्वाब दिखाता है,
बचपन एक ऐसा सम्मोहन,
जो हमे हमारी सीमाएँ भुलाता है,
एक गरीब और एक अमीर बच्चे के लिये
ज़मीं और आसमाँ की दूरी में फ़र्क नही होता,
ये बचपन ही तो है जो
अभाव रहित और अभाव सहित दोनो जीवन मे
उड़ान और उत्थान के अरमान जगा सकता है,
इसी माया,इसी मोहपाश,इसी सम्मोहन,इसी जादू
मे हम जकड़े हुए है,छूटना भी नही चाहते,
कयोंकि ऐसे ही खुश है हम,
कभी ये सोचके की हम खुश है,
कभी ये सोचके की कभी हम खुश होंगे।
हाय हाय रे हाय ये इंसा,हाय हाय रे हाय,
तुम कौन होते हो फ़ैसला करने वाले,
कि हम जीवन भर खुश नही रह सकते,
मूर्ख अमीरजादे! कमी हममे नही,
तुममे, तुम्हारी व्यवस्था में है,
देश का भविष्य हम भी है
पर नंगे खड़े है,बेआबरू से,
लेकिन ये बचपन हमे याद दिलाएगा,
हम भी चहकना,मुस्काना जानते थे,
कल अगर रोटी ना मिली तो आज को याद करेंगे,
जन भूखे पेट खेतों में भागते खेलते रहते है।
कोई भारत उदय हमे फ़ील गुड नही करवाएगा,
हमारे मन की शांति हमारे मन मे है,
आसमाँ की छत के नीचे बैठा हर इंसान
एक,दो,तीन,चार कितनी भी रोटियाँ खाने वाला,
खुश रहेगा,हंसेगा,इस खिलखिलाते बचपन की तरह,
कुछ कुछ होता है दोस्त...
तुम नही समझोगे !!

--सजल प्यासा




भारत माता के हम हैं लाल
मस्त बेफिक्र अल्हड़ सा है जीवन
फूल सा खिलखिलाया बचपन
नफरत भेदभाव न करते हम
एकता का सौरभ लुटाए हम
भारत माता के हम हैं लाल
हमीं में छिपे गांधी इंदिरा लाल
सम्प्रदायों की तोड़ें दीवार
धर्मनिरपेक्षता की हम हैं शान
संसार के हम हैं सूरज चॉंद
भारत माता के हम हैं लाल
गाँवों में बसा है हिंदुस्तान
मैत्री की रिक्शा पर हम सवार
पैट्रोल बचत का रच इतिहास
प्रदूषण मुक्ति का दे पैगाम
भारत माता के हम हैं लाल
इनके जज़्बे को मंजु करे प्रणाम
जयहिंद का गा रहें जयगान
भविष्य की प्रगति विकास के प्राण
इनसे बनता प्यारा हिंदुस्तान

--मंजू गुप्ता




अधनंगी तलवारे
जीवन रथ पे
खड़े शहर के
अधनंगी तलवारे देखो.
भारत माँ को
बेशर्म हाथों से आये बचाने
नए सहारे देखो.
सोच नयी है, रंग नया है
छा जाने का ढंग नया है
सागर में अभी जैसे
फूट पड़े फ़व्वारे देखो.
सरकारे तुम आ जाते हो
दान हमारे ले जाते हो
अ़ब न सोचो ये सब होगा
हमने आँखे खोल रखी है
हाथों में बारूद भरी है
तुम नजराने अब नए हमारे देखो..

--सौरभ कुमार




बचपन
आधे भारत का सच है,
पाश कालोनियो के पीछे से होकर -
एक गली जाती है, जहाँ
गंदगियो के बिच, जिन्दगी की -
जद्दोजहद जारी रहती है जीवन पर्यन्त........
बार - बार कोशिश करते है कि-
कब हम , झुग्गियो से सेक्टरो और
अपार्टमेन्टो मे पहुन्च जाये सदा- सदा के लिये
इन गलियो को लाँघकर .
पर ,
हर कोशिश बेकार जाती है
दिल्ली वालो तक - आवाज नही पहुँच पाती है
१० के राष्ट्रकुल खेलो और रक्छा सौदो कि -
तैयारियो के शोर के बीच
आवाज
दबकर रह जती है.
मन्त्रालयो राहत की बाट जोहते,
कब निकल जाता है
बचपन
कूड़ा बीनते , रिक्शा खींचते........................

--अनुज शुक्ला




बदल रहा हे हिंदुस्तान, क्या तुमने कही देखा हे!
बदल रही हे तस्वीर गाँव की, क्या तुमने कही देंखी हे!
खो गया हे बचपन मेरा, क्या तुमने कही देखा हे!
कहाँ सो गयी तकदीर हमारी, क्या तुमने कही देंखी हे!
आती हे लहरें समुद्र में, क्यूँ पहुचती नहीं मुझ तक!
कहाँ खो जाती हे वो, या रास्ते में ही सो जाती हैं वो!
सरकार बनती हेई योजनाय बहुत, पर क्या तुमने उनको देखा हे!
क्या में कभी पढ़ पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
क्या में कभी तन डाख पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
लगता हे सारा बचपन यूँही नंगा गुजरेगा!
वक़्त तो गुजरेगा बहुत, पर गरीबी की जगह सिर्फ एक और गरीब ही गुजरेगा!
क्यूँ नहीं बुलाते तुम उसको, जो तन पर हमारे कपडा दे!
इस बुखे पेटको बहरने को, जो हमको थोडा खाना दे!
नहाने और धोने को एक गुसलखाना दे!
पर पक्की इत्टो का, छोटा मगर एक आशियाना दे!
यही सोचकर दोस्तों में यह रिक्शा लेकर जाता हूँ!
अपनी रूठी किस्मत को जगाकर लाता हूँ!
अपनी और तुम्हारी आँखों की उम्मीद बुलाकर लाता हूँ!
पर बतलाना सही-सही क्या तुमने हमारी अछि तकदीर को अपनी इन आँखों से देखा हे!

--परवीन अग्रवाल



माँ, बुनती है सपने


माँ
बुनती है सपनें
किसी भी वक्‍त दिन हो या रात
बस एक जरा सी झपकी लगी हो
या यूँ ही आँख बंद कर लेटी हो

माँ
की आँखें मुझे
कभी भट्टी सी लगती हैं
जहाँ सपनें फुदकते है लगातार फुटानों की तरह
या कभी सूने झरने सी
जहाँ आंसुओं के बादल पर सपने छाये रहते हैं
सतरंगे इन्द्रधनुष की तरह

बात
कैसी भी हो
आस-पास की
दूर जहान की
अपनों की
परायो की
या ऐसी कोई बात
जिसका ना कोई सिर ना पैर
पा लेती है ठौर माँ की आँखों में
और बदलने लगती है
सपनों में

माँ
के सपनों में आता हूँ मैं
कभी श्रवण की तरह
कभी किसी नालायक की तरह
माँ
सोते-जागते ना जाने
क्या सोचते रहती है?

माँ
कमोबेश रोज़ सुबह की शुरूआत करती है
रात देखे सपने की किस्सागोई से
या कल दोपहर आये ख्वाब की बातों से
तकरीबन हर बार कुछ नया होता है
माँ के सपनों में
कुछ अनोखा
कुछ अनूठा
कुछ अचंभा
कुछ कौतुहल सा

यूनिकवि- मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : १३-जुलाई-२००८ / समय : १२;२५ दोपहर / घर

साँसों में गर्माती आँच


आदत,
धीरे-धीरे पड़ ही जाती है
अब कोई तकलीफ नहीं होती है
मुझे देख कर कोई कितनी भी बातें करे
या फिकरे कसे
वो लोग,
जिनके दिन भर की जुगाली हूँ मैं
जानते हैं मेरी दिनचर्या को
कि कब शाम ढले मैं निकलूँगी बाहर?
क्या पहने हुये?
या घर से कितने पहले उतरूँगी?
कब लौटूँगी देर रात दबे पाँव?

वो लोग,
नहीं आते मेरे घर देखने कि
चूल्हा कब जला था पिछली बार?
क्यों कनस्तरों में रखती हूँ भूख छिपाकर?
बिजली का कट जाना
जहाँ मेरी जान पर आता है
वो,
सोचते हैं यह मेरी पेशागत सहूलियत है
सच तो यह है कि
मेरी परेशानियों का हल
उनकी निगाहों से बचकर गुजरते मेरे धैर्य में है

मुझे भी,
अच्छे नहीं लगते
वो लोग जो उन्हीं में से कोई होते हैं
जिनके साँसों से बदबू आती है
पसीने की नमकीन बू फैली होती है बांहों के दायरों में
दाढ़ी इतनी बढ़ी हुई की चुभन होती हो

तब,
घर की दीवारों में पड़ती दरारें /
बच्चों के फटे यूनीफार्म /
बकाया किराया / राशन का उधार
जकड़ लेते हैं मेरा वजूद वहीं
और,
फिर सब वही होता है
जो बाहर लोग बातें करते हैं
मुझे,
साँसों में गर्माती आँच महसूस होती है
मेरी सिसकियों से
चूल्हा जलने की सरसराहट सुनाई देती

यूनिकवि मुकेश कुमार तिवारी

वह गँवार नहीं है


उन
बस्तियों में जहाँ दिन में भी
अंधेरा होता है घरों में /
और चिमनियों में तेल बचाने की जद्दोजहद
बच्चे पढ़ने नहीं जाते

सभी
समझते हैं बस्ती में
बच्चे बहुत कुछ सीख सकते हैं
जिससे सीधे-सीधे रोटी पैदा हो सकती है
स्कूल जाने पर
ना जाने क्या पढ़ेंगे /
ना जाने क्या सीखेंगे

स्कूल,
नहीं जाने के बाद भी
वो बच्चे,
नहीं भूल पाते हैं स्कूल और पढ़ना लिखना
जितना भी जानते हैं
यह स्कूल की दीवारों पर
देखने को मिलता है
जहाँ अक्सर वो लिखा मिल जाता है
जिसे हम बोलचाल में गालियाँ कह लेते हैं
और पढ़ने के बाद नाक भौं सिकोड़ते हैं

वो,
बच्चे बड़े होने तक सीख जाते हैं
चोरी करना / बूट पॉलिश करना /
जेब कतरना / या भीख माँगना
फिर भी स्कूल नहीं भूल पाते हैं
जब भी खाली होते हैं तो
किसी पब्लिक शौचालय को नहीं छोड़ते
चाहे ट्रेन में हो या किसी चौराहे पर
उनके सामने की दीवार बदल आई होती हैं
ब्लैक-बोर्ड में और कलम
या तो कोयला होता है /
या ईंट को पीसकर बनाया हुआ चूरा
जिसमें थूंक कर
वो सब लिखा जा सकता है
या बनाये जा सकते हैं वो चित्र
जिन्हें देखकर यह लगे कि
अभी-अभी किसी प्रोफेसर ने पढ़ायी हो ह्यूमन फिजियोलॉजी
प्रजनन तंत्र की एनाटॉमी के साथ
और बोर्ड को बिना पोंछे ही छोड़ दिया हो
छात्रों के पुर्नअभ्यास के लिये
जिसे देखकर हम मुँहभर के गाली दे लेते हैं
स्साले! गँवार के गँवार
और अपने बेड़रूम में छोड़ नही पाते हैं
लोभ किसी बल्यू फिल्म का

यही,
वो सब दोहराता है
हमारे मुँह पर तमाचा मारते हुये
कि
बता सके कि वह गँवार नही है
और जानता है
पढ़ना-लिखना
भले ही यह हमें ठीक लगे या नहीं

यूनिकवि मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०६-मई-२००९

ये रहे अप्रैल महीने की प्रतियोगिता के परिणाम


साहित्य समय का दस्तावेज होता है। हिन्द-युग्म समय का यही दस्तावेजीकरण पिछले 32 महीनों से इंटरनेट पर कर रहा है। सहेजने की इस प्रक्रिया में हमें कई तरीकों से और कई माध्यमों से सहयोग मिला। साहित्य-प्रस्फुटन का एक मार्ग हमने यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता को भी चुना, जिसका आयोजन जनवरी 2007 से अनवरत प्रत्येक माह हो रहा है।

इस प्रतियोगिता के माध्यम से हमारा उद्देश्य भाषा-संरक्षण के नव-उपायों के प्रयोग को प्रोत्साहित करना तो था ही, साथ ही साथ नव रचनाधर्मिता और पठनीयता का समर्थन भी था। एक-एक करके इस प्रयास-गुच्छ में 28 पुष्षों का पल्लवन हुआ। अभी 3 दिन पहले ही हमने यह घोषणा कि इस प्रतियोगिता के भावी यूनिकवियों को रु 1000 के मूल्य तक की पुस्तकें और शेष विजेताओं को गीतकार राकेश खंडेलवाल के काव्य-पुस्तक की एक-एक प्रति दी जायेगी।

आज हम काव्य-उपवन के 28वें प्रकोष्ठ के मालियों और भ्रमरों की बात करने जा रहे हैं। अप्रैल महीने की प्रतियोगिता में कुल 40 कविता-प्रविष्टियाँ प्राप्त हुईं। निर्णय दो चरणों में कराया गया। प्रत्येक चरण में तीन जजों ने भाग लिया। पहले चरण से कुल 22 कविताएँ दूसरे चरण के निर्णय के लिए भेजी गईं। यह स्पष्ट कर देना भी उचिता जान पड़ता है कि किसी भी निर्णयकर्ता को न तो यह ज्ञात होता है कि शेष निर्णयकर्ता कौन-कौन हैं और न ही यह कि कौन सी रचना का कौन रचनाकार। पहले चरण के तीन निर्णायकों द्वारा मिले अंकों का औसत दूसरे चरण के निर्णायकों के औसत में भी जुड़ता है। मतलब यूनिकविता को कम से कम 6 जजों की कसौटी पर खरा उतरना होता है।

इस बार यह स्थान बनाया है मुकेश कुमार तिवारी की कविता 'सिमटते आँगन.......बंटती दहलीज' ने। मुकेश कुमार तिवारी पिछले 1-2 महीनों से हिन्द-युग्म से जुड़े हैं। मार्च माह की प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया था।

यूनिकवि- मुकेश कुमार तिवारी


कवि का जन्म इंदौर (म॰प्र॰) के एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ, जहाँ ज़रुरतें जेब से बड़ी और समझदारी उम्र से ज्यादा बड़ी होती है और उस पर चार भाई-बहनों में सबसे बड़ा होने के नाते कुछ ज्यादा ही समझदारी का बोझ ढोते जवान हो गये। कवि ने करीब से जिन्दगी के लगभग सभी रंगों में देखा, जहाँ अभावों ने सदा हौसला बढाया कि हासिल करने को और भी मुकाम हैं सा सबक हर कदम पर याद रहा। कविता इन्हें लगातार उर्जा देती है और अपनी मुश्किलों से जूझने का हौसला भी। बी.एस.सी., बी.ई.(मेकेनिकल), ए.आई.सी.डब्ल्यू.ए.(इण्टर) इत्यादि की शिक्षा प्राप्त मुकेश फिलहाल काईनेटिक मोटर कम्पनी लिमिटेड में असिस्टेंट जनरल मैनेजर (परचेस) कार्यरत हैं। इनकी रचनाएँ साहित्य-कुंज, स्वर्गविभा इत्यादि अंतरजालीय पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हैं। ईमेल संपर्क- mukuti@gmail.com ; mukeshtiwari@webdunia.com

पुरस्कृत कविता- सिमटते आँगन.......बंटती दहलीज

बच्चे,
पैदा होने के बाद की
खुशियाँ खत्म होते ही
बदलने लगते हैं जिम्मेदारियों में
और आज-कल बांटे जाने लगते हैं तेरे-मेरे हिस्से में
पहले हमारे जमाने में
या उससे भी पहले जब आदमी सीख चुका था
आग, पानी और हवा में भेद
और रोटी कैसे पैदा करना है
तब भी बच्चे अकस्मात ही आ जाते थे
जिन्दगी में
और यूँ ही पाले भी जाते थे
जब,
बच्चे अपने आकार और वजन से
गोद में भारी लगने लगे तो
उतार दिये जाते थे जमीन पर
चलना सीखने के लिये
तब,
घरों में जमीन थी / बड़ा सा आँगन था
और छोटे दरवाजों पर ऊँची दहलीज थी
इतना सब था कि
बच्चा,
बस फुदकता रहता था जमीन पर
अपने से बाहर कहीं जा ही नही सकता था
हम उसे हमारी तय हदों से
ज्यादा चलना सिखाना ही नहीं चाहते थे
फिर,
घरों में लोग बदलने लगे भीड़ में
आँगन सिमटे / दीवारें ऊँची होने लगीं
और दहलीज इतने हिस्सों में बंटी कि
नहीं बचा पाई अस्तित्व
तब बच्चे के पैर में बांध कर डोरी
हमने तय कर लिया कि कितना चलना है
और कहाँ तक
इस जमाने में,
घर को ही जमीन नसीब नहीं होती
हवा में बने होते हैं इसलिये शायद
रिश्तों में भी गहराइयाँ नहीं रहीं
अब,
जो बच्चे हम देख रहे हैं
किसी तय प्लान के मुताबिक ही पैदा हुये हैं
यह तय है कि
कितनी देर किसे गोद में लेना है/
किसे खेलना है बच्चे के साथ कब तक/
कौन छोड़ेगा क्रेच में कौन लेकर आयेगा/
तब से अब के,
बीच इतना सच तो है कि
हम ने कभी नहीं चाहा
बच्चे खुद सीखें चलना/
चुनें राहें / तय करें अपनी मंजिलें/
देखे दुनिया अपनी नजरों से
हमने, उसे
दहलीज से ज्यादा ऊँचा हौंसला दिया ही नहीं कभी
रोशनदानों से जो दिखता है वही दुनिया है सिखाया है
उसके पैरों में डाली हैं डोरियां कठपुतली सा नचाया है
उसकी आँखों पर थोपा है नजरिया अपना
फटकारों के डर से अपने सच की रस्सी पर चलाया है
मुझे,
लगता है कि
बच्चे अगर नहीं कर सकते
वो सब,
जो करना चाहते है अपने तरीके से
तो हमें पैदा करना चाहिये
नन्हें बूढ़े,
और छोड़ देना चाहिये उन्हें उनके हाल पर


प्रथम चरण मिला स्थान- बारहवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- अनुराग शर्मा तथा अन्य 5 कवियों के कविता-संग्रह 'पतझड़ सावन बसंत बहार' की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें इनाम देंगे, उनके नाम हैं-

सत्यप्रसन्न
प्रदीप वर्मा
दिबेन
अनुराधा शर्मा
पुरु मालव
आलोक कुमार उपाध्याय 'नज़र इलाहाबादी'
रवि कांत ’अनमोल’
मनु बेतखल्लुस
अमित साहू

नोट- दूसरे से पाँचवें स्थान के कवियों को अनुराग शर्मा तथा अन्य 5 कवियों के कविता-संग्रह 'पतझड़ सावन बसंत बहार' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी। छठवें से 10वें स्थान के कवियों को विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र' के व्यंग्य-संग्रह 'कौआ कान ले गया' की एक-एक प्रति भेंट की जायेगी।

इनके अतिरिक्त हम निम्नलिखित दो कवियों की कविताएँ भी प्रकाशित करेंगे-
तरूण सोनी
प्रदीप कुमार पाण्डेय

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 31 मई 2009 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

पाठकों की बात करें तो एक पाठक ने हमें जितना पढ़ा, उतना शायद ही किसी और ने पढ़ा होगा। कम से कम एक महीने के अंदर इतनी सारी बातें कमेंट में पक्के तौर पर किसी और पाठक नहीं कही। हमारे स्थाई पाठक तो समझ ही गये होंगे कि हम किसकी चर्चा कर रहे हैं। जी हाँ वे हैं शन्नो अग्रवाल

यूनिपाठिका- शन्नो अग्रवाल

जन्म तिथि- 9 दिसम्बर
शिक्षा- M.A. (अंग्रेजी साहित्य में)
रुचि- पढना और शब्दों के संग खेलकर काल्पनिक चीज़ें लिखना.
साथ- आजकल तो हिन्दयुग्म के ही साथ अधिक बिताती हैं। जब भी समय मिलता है। इस नयी दुनिया से जब से पहचान हुई है तब से इनकी कल्पना को और भी पर लग गये है। और उसे शब्दों में उकेर कर उड़ान भरती रहती हैं जब-तब। या फिर यह कह सकते हैं कि जैसे बंधे पानी को प्रवाह मिल गया हो।

इनका जन्म भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के जिला पीलीभीत के पास एक छोटे से क़स्बा पूरनपुर में हुआ। परिवार में सभी की लाडली थीं। प्यार से भर-पूर बचपन बीता। पढ़ने के विषय में माता-पिता सभी की तरफ से बहुत प्रोत्साहन मिला। कहानियां-कवितायेँ पढ़ने का बहुत शौक था, इतना कि हर दिन एक कहानी की किताब पढ़े बिना बेचैनी चरम सीमा पर पहुँच जाती थी। घर में मेरे लिए काफी किताबें लायी जाती थीं। शिक्षा आदि प्राप्त करते हुए जीवन के वह अनमोल दिन पता नहीं कैसे गुजर गए और फिर एक दिन शादी हुई और परिवार से दूर होकर विदेश में आना पड़ा। अपने को एक नए रास्ते पर पाया। जीवन ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि हिंदी-साहित्य से दूर हो गयीं। अब इतने दिनों बाद कुछ ऐसा संयोग हुआ कि हिन्दयुग्म के संपर्क में आकर जीवन में कुछ नयी लहरियां उठने लगीं।

पुरस्कार और सम्मान- अनुराग शर्मा तथा अन्य 5 कवियों के कविता-संग्रह 'पतझड़ सावन बसंत बहार' की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।

इनके अतिरिक्त मोहम्मद अहसन ने भी हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा। हालाँकि इनकी टिप्पणियाँ रोमन-हिन्दी में अधिक थीं, लेकिन हम उम्मीद करते हैं कि निकट भविष्य में इनकी भी सभी टिप्पणियाँ देवनागरी-हिन्दी में आने लगेंगी।

संगीता पुरी हिन्द-युग्म की हरेक गतिविधि पर नज़र रखती हैं और बहुत छोटे से वाक्य में आलोचना-प्रोत्साहन करती-रहती हैं।

हम इन दोनों पाठको को भी मसि-कागद की ओर से पुस्तकें भेंट करेंगे।

जो पाठक लगातार पढ़ रहे हैं और यूनिपाठक का पुरस्कार जीत चुके हैं वे वार्षिक हिन्द-युग्म पाठक सम्मान के प्रतिभागी बनते जा रहे हैं। इसलिए पढ़ने में कोई कसर न छोड़ें।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें।

मनोज 'भावुक'
संजीव वर्मा 'सलिल'
अलका मिश्रा
कवि दीपेन्द्र
राजीव रंजन मिश्र
डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
अवनीश तिवारी
मुहम्मद अहसन
महेश द्विवेदी
केशव कुमार कर्ण
कुलदीप यादव
सोनिया उपाध्याय
संदीप कुमार
अभिषेक ताम्रकार
सुरिन्दर रत्ती
कमलप्रीत सिंह
अमित श्रीवास्तव
बलराज
डॉ॰ अनिल चड्डा
सुधीर कुमार मेश्राम
हिमांशु शेखर त्रिपाठी 'चाँद'
मंजू गुप्ता
विद्या सागर आचार्य
अम्बरीष श्रीवास्तव
आलोक गौड़
मुकेश सोनी
तपन शर्मा
अजय कुमार

नेता, चुनाव, राजनीति, लोकतंत्र, वोट और 13 कवि







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - लोकसभा चुनाव-लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव

अंक - पच्चीस

माह - अप्रैल २००९






३० अप्रैल २००९। आज हम सबसे बड़े लोकतंत्र के महोत्सव के तीसरे पड़ाव तक पहुँच गये हैं। ११ राज्यों के करोड़ों लोग लम्बी कतारों में खड़े होकर हमारे देश के भविष्य को चुन रहे हैं। और यहाँ हमारे कवि भी इसी चिन्तन में हैं कि किस तरह से हमारे देश को हर तरह से सम्पन्न बनाया जाये, एक क्रांति लाई जाये और हर कोई गर्व से कह सके "मेरा भारत महान"। जिस तरह हम नेताओं को उनका फ़र्ज याद दिलाते रहते हैं हम भी समझें कि वोट डालना हमारा अधिकार भी है और फ़र्ज़ भी। हमारे कवि "जूतों" के बारे में भी कह रहे हैं, राजनीति में घुस रहे बाहुबलियों की बातें भी कर रहे हैं। पिछले दिनों ही ’आवाज़’ के संचालक सजीव सारथी ने भी चुनावों के मद्देनजर अपनी बात रखी। आइये आज पढ़ते हैं हमारे कवियों को। मनाते हैं "लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव"।

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।



*** प्रतिभागी ***
सत्यप्रसन्न | मंजू गुप्ता | मुकेश कुमार तिवारी | प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध | शन्नो अग्रवाल | मुहम्मद अहसन | विवेकरंजन श्रीवास्तव | रचना श्रीवास्तव | संगीता स्वरूप | मनु ’बेतखल्लुस’ | डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी | आलोक गौड़ । -डा नीरज जैन । -सुरिंदर रत्ती

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






जमी झील में कंकड़ी, फेंक रहे हैं लोग।
क्यों हिलोर उठती नहीं, लगा रहे अभियोग॥
रोटी ठंडी आग पे, सेंक रहे अख़बार।
चाकू रखकर जेब में, बेच रहे बस धार॥
जिनके कांधे है पड़ी, उनकी अपनी लाश।
वे भी दावा कर रहे, बदलेंगे इतिहास॥
करवट ली है वक्त ने, रही न अब वो बात।
जीत रहे खरगोश अब, कछुए खातॆ मात॥
गठबंधन तो हो गया, पर रिश्ते बेमेल।
चली छोड़कर पटरियां, सम्बंधों की रेल॥
कल तक जो हरते रहे, संविधान की चीर।
वो फिर लिखने जा रहे , हम सबकी तकदीर॥
कीचड़ में लिपटे हुए ,चेहरे सभी समान।
किससे हैं महफूज़ हम, सांसत में है जान॥
हर अंधे धृतराष्टृ को, सिंहासन की चाह।
होता हो फिर क्यों नहीं, चाहे देश तबाह॥
संदेहों की जेल में, आशाएं हैं कैद।
तिस पर दुर्दिन हैं खड़े. पहरे पर मुस्तैद॥
असमंजस में आज है, फिर से अपना देश।
चुन लें ख़ूनी सन्त या, फिर डाकू दरवेश॥

--सत्यप्रसन्न





देखो आता पाँच साल बाद चुनाव
होती नाव उम्मीदवार की आर पार
आया भारत के लोकतंत्र का महापर्व
हमें इस हथियार पर होता महागर्व

सत्ता और विरोधी निर्दलीय करें प्रचार
आपस में कटू वाणियों में करते प्रहार
जूता फेंक का देखो आया है व्यवहार

रैलियों में भीड़ जुटाने आते फिल्मी स्टार
भाषण में भूल जाते उम्मीदवार का नाम
पार्टियों का उड़ाते खूब माल
वोट नोट की खेलते चाल

करो मंजु सही मतदान
बने सर्वश्रेष्ठ सरकार
जिससे हो देश का विकास
दूर हो भ्रष्टाचार बेरोजगार

--मंजू गुप्ता





प्रजातंत्र के पर्व पर, होत शाही स्नान ।
सभी प्रजाति कूद पड़ी, खूब रचावै स्वांग ॥

लाऊडस्पीकर पर हो रहा, यश-कीर्ती गान ।
छुटभैये गाल बजाकर, पा रहे सम्मान ॥

लालू पीले हो गये, हुये मुलायम सख्त ।
दोऊ लारि टपिका रहे, देखि ताज-ओ-तख्त ॥

पासवान पांसे चले, अमर चलावै दांव ।
शरद हूँकारी भर रहै, होवत कांव-कांव ॥

माया ठहरी मायावी, खूब अलापै राग ।
छींके पर अटकी नज़रें, कब जागेगें भाग्य ॥

सांप सूंघ गया वाम को, हुआ तीसरा फैल ।
चौथे की तैयारियाँ, खूब चला यह खेल ॥

अड़वाणी रथ लै भटिकै, छेड़े अपनी तान ।
भैरों रूठे रह गये, वरूण चलावै बाण ॥

हाथ हैं तरसे साथ को, कितै ना दीखे ठौर ।
सत्ता सुख की चाह में, भटकै चारो ओर ॥

राहुल धूल फांक रहै, हुईं सोनिया त्रस्त ।
राजनीति भगवान बचाये, रहैं मुकेश मस्त ॥

ढोल बजै ताली बजी, गलियन होय पुकार ।
नेता देहरी लाँघ रहैं, होवे जय-जयकार ॥

खुद ही माला पहनकर, जोड़े दोनो हाथ ।
वोट माँगते फिर रहैं, जिनके सिर पर ताज ॥

साड़ी बँटी दारू बँटी, और कम्बल का ढेर ।
चला रहै सब दांव-पेंच, ये कुर्सी के शेर ॥

नोट-वोट का घाल-मेल, चलेहिं सालों साल ।
नेता गब्बर हो गये, जनता भई कंगाल ॥

वादों की बौछार है, नारों की बरसात ।
यह मौसम की बात है, बाद किसे है याद ॥

फिर बारी पर ठगी गई, जनता देखे राह ।
लूटने फिर अईहैं, पाँच बरस के बाद ॥

जाति पाँत भाषा धर्म, ने बाँट दयौ इंसान ।
वोटरलिस्ट में सिमट गई, अब उसकी पहचान ॥

भाग्य बंद पेटी हुआ, उपर चढती साँस ।
रोज मनौती कर रहे, डगमग है विश्वास ॥

लात चली घूंसे चले, हो जूतम-पैजा़र ।
हिस्ट्रीशीटर देश के, बन गईले सरकार ॥

--मुकेश कुमार तिवारी




राजनीति से उड़ गया, देश प्रेम का रंग
छिड़ी हुई है दलों में सिर्फ स्वार्थ की जंग

खेल कर रहे सभी दल चुप जनता के साथ
करते बस बातें बड़ी दे भाषण दिन रात

पिछले अनुभव से गया खो मन का विश्वास
बातों मे सच्चाई कम है ज्यादा बकवास

लोगों में क्यों रुचि रहे या श्रद्धा के भाव
वादे तो मीठे मधुर मन में मगर दुराव

स्वार्थ नीति ही प्रमुख है राजनीति में आज
उदासीन है लोग सब बेबस सकल समाज

देखा है जब जब हुये जहां भी कहीं चुनाव
सभी दलों में आपसी बढ़ जाते टकराव

जन सेवा औ " समझ का कहीं न सही प्रचार
सुनने आते प्रलोभन औ" बीमार विचार

धोखे ही खाने मिले हर चुनाव के बाद
मत दाता का मत हुआ बार बार बेकार

दुनियां बस उनकी बसी जिनकी हो गई जीत
काम किये सबने सदा वादों के विपरीत

है चुनाव चक्कर अजब इसमें फंसकर लोग
पाल लिये करते सभी लेन देन का रोग

लोकतंत्र की भावना का दिखता विद्रूप
पावन होते तंत्र भी घिस पिट हुआ कुरूप

इसी लिये मिलती खबर जूता मारी खून
जिसकी लाठी साथ हो उसका ही कानून

--प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध




ना चाहकर भी कुछ यहाँ
हम भी कहना चाहते हैं
हो रहा है कितना हल्ला
बस यह बताना चाहते हैं.

यह जोश, यह चीखना सब
बस केवल चुनावी बुखार है

जनता की भावनायों पर
यह एक सीधा प्रहार है.

हर किसी ने बना लिया है
यहाँ पर अपना-अपना hero
रात-दिन चीखते हैं मिलकर
इनमें कुछ अकल के zero.

कभी-कभी कुछ उम्मीदवार भी
उनके साथ प्रकट हो जाते हैं
पक्ष में करने को अपने वह
जनता के निकट हो जाते हैं.

भीड़ में घुसकर कभी वह
बच्चों की नाक पूँछ देते हैं
कभी रोते बच्चों को माँ की
गोद से लेकर चूम लेते हैं.

इस जानी-मानी सी कला में
यह सब लोग कितने दक्ष हैं

दिखाकर यह सारे कारनामें
जीत लेते जनता का पक्ष हैं.

कोई कहता इनमें बार-बार
'रामलला हम फिर आयेंगे
वादा करके जाते हैं आकर
मंदिर फिर यहीं बनायेंगें'.

या गरीब के घर रोटी खाने
कोई आंधी जैसा है आता
जगह बनाकर उसके दिल में
भगवान के जैसा बस जाता.

ना भूलो यह झूठे वादों से
दिल तोड़ने में माहिर हैं
समय आने पर भूल जायेंगे
सबको यह बात जाहिर है.

पता नहीं कहाँ-कहाँ से यह
इतने चमचे बटोर लाते हैं
फिर खुली जीपों में खड़े होकर
सब गला फाड़कर चिल्लाते हैं.

झूठे वादों से फुसलाकर यह
जनता को खूब फ़ूल बनाते हैं
उनके दिल जीत लेने के बाद
अपने वादों को भूल जाते हैं.

जेल में जाते हैं तब भी तो
इनका नाम ऊंचा ही होता है
वहीँ से ही बैठे-बैठे चमचों से
उन सबका सारा काम होता है.


वोट जिस किसी का भी हो
इतना भी सस्ता ना होगा
फिर भी आजमाने के लिए
कोई और रास्ता भी ना होगा.

--शन्नो अग्रवाल




सूरज सुबह उगता है
सुबह सुहानी लगती है
भारत बुलंद है

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल मुस्कराते हैं
भारत बुलंद है

आस्था हो न हो
मंदिर हैं , मस्जिद है
भारत बुलंद है

बिजली हो न हो
बिल तो आता ही है
भारत बुलंद है

सड़कें हो न हों
मंजिलें तो हैं
भारत बुलंद है

शिक्षक आये न आयें
शालायें हैं , छात्र भी
भारत बुलंद है

रोजगार मिले न मिले
स्वरोजगार योजना जो है
भारत बुलंद है

अपराध बढ़ते है तो बढ़ें
पुलिस है , अदालतें भी
भारत बुलंद है

उद् घाटन की नौबत आये न आये
शिलान्यास तो हो रहे हैं न
भारत बुलंद है

आबादी आबाद हो न हो
६०० करोड़ वाले नेता आबाद हैं
भारत बुलंद है

मंहगाई घटे न घटे
मुद्रा स्फिति की दर तो घट रही है
भारत बुलंद है

आमदनी हो न हो
कर्ज लो ,खर्च करो
भारत बुलंद है

उम्मीदवार पसंद हो न हो
वोटर हो तो वोट करो
भारत बुलंद है

--विवेक रंजन श्रीवास्तव




नेता बुद्धिमान हत्यारे होते हैं
वो शारीर नहीं मारते
बड़ी चालाकी से
लेलेते है हमारा वो समय
हमारे वो शब्द ,हमारी वो आवाज़
जिसमे हम रहते हैं .

हमारे छोटे छोटे सुखों की
छाँव ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं
हमारे दुखो और जरूरतों की गुमटियाँ
बिठा देते हैं पहरे
उसके मुहाने पर

सब्ज बाग कुछ यूँ दिखाते हैं
स्वर्ग यहीं होगा
हम मान जाते हैं
वादों को
कपट जाल तले बिछाते हैं
किस्मत के मारे
हम जब इसमें फस जाते हैं
तब पर हमारे क़तर देते हैं

कहते हैं झूठ
पर कुछ इस तरह
के वो हमारी ही
अवाज लगने लगता है
सत्ता में आते ही
उनका सच होता है बेनकाब
और ठगी जनता
तलाशती है नया सहारा

हमारे शब्द
यदि उनके खिलाफ हों
उसका फंदा वो हम पर ही कसते है
और उसी से कर देते हैं
हमारी हत्या

--रचना श्रीवास्तव




लोकतंत्र का उत्सव
मना रहे इस बार
जनता नेताओं से
खाये बैठी है खार .
जनता के हाथ में
आ गया एक हथियार
जूते से हैं लैस सब
चलाने को तैयार .
नेताजी अब सोच रहे
कैसे होगा बेडा पार
भरी सभा में डर रहे
क्या रखें अपने विचार ?
जनता से कर धोखा
और करके अत्याचार
आज खड़े हैं आ कर वो
जूते का पहने हार .
त्रस्त हुई अब जनता
नेताओं पर कर विश्वास
पर नेताजी घूम रहे
लेकर जीत की आस .
कोई नहीं है ऐसा नेता
जो सुने जनता की पुकार
जनता तो ठगी ही जायेगी
आये कोई भी सरकार ..

--संगीता स्वरूप




रैली ,परचम और नारों से कर डाला बदरंग
शहर वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल
कैसे छांटें इन चेहरों में अपनी मर्जी का लीडर
जीत के बाद सभी कर देते हैं पब्लिक का दम बेहाल

--मनु ’बेतखल्लुस’




ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

नेता पहुंचें गली गली बात बनावें बड़ी बड़ी
रात का सपना दिन माँ दिखलावें, लगाएं वोट की गुहार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बाँट बाँट के जाति बिरादरी सब अपना उल्लू सीधा कीन्हिन
खड़ी किहिन दौलत कोठी अपनी लै के वोटवा हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

जस त्यौहार खतम चलिहैं नेता जी दिल्ली, बनिहैं मंतरी
कोठी बंगला गाडी छोड़ के फिर कहाँ झोपड़ी माँ हमार !
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बीत गयी उमरिया अपनी देखत सब चुनाव का हाल
न गाँव माँ कछु बदला न बदली किस्मतिया हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

--मुहम्मद अहसन




लोक सभा चुनाव
लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव
चुनाव आयोग सशक्त,
आचार-संहिता तोड़ते
राजनीति के भक्त,
चुनाव-घोषणा पत्र
जनता रूपी प्रेमिका को
बेबफा-प्रेमी नेता का प्रेम-पत्र
तारे तोड़कर लाने के वादे,
लूटकर प्रेमिका को,
प्रेमी वादे भुला दे,
बेच दे उसको, वैश्यालय पहुँचा दे।
चुनाव-उत्सव
होली का त्योहार,
रंग-बिरंगे रंगों का उपहार,
सभी उड़े रंग
जनता रह गयी दंग
बचा केवल रंग काला
चुनाव-गंगा बन गई नाला
सभी दल फँसे दल-दल में,
नेताओं के चेहरों पर
पुती है कालिख
आओ वोटर!
वोट बेच, कीमत वसूल
थोड़ी कालिख,
अपने चेहरे पर भी मल
अब नहीं रहा तू नाबालिग
वोट डाल चुनाव से हों फारिग।
संसदीय चुनाव
दीपावली का त्योहार
दीपों का उपहार,
दीपक का तेल हुआ गुमनाम,
स्विस बैंक के खातों में,
वोटर आते बातों में,
बाती को भी हड़पने की लगी,
नेताओं में होड़
तू टिकिट के लिए लगा दे दौड़,
जनता को छोड़।
दीपावली है,
चुनाव का जुआ खेल,
बाती को लगा दे दाँव पर,
जरा सा लगा के तेल
भारतीय, नारी, संस्कृति व विचार,
बचे हैं दाव पर लगाने को यार,
पश्चिमी-पारदर्शी-आकर्षक-नग्नता के आवरण में लपेट,
लगा दाव पर, भर ले अपना पेट।
संसदीय चुनाव,
रक्षाबंधन का त्योहार,
बाँधकर रक्षासूत्र,
जनता सौंपती लोकतंत्र की रक्षा का भार,
नेताओं के लिए रक्षासूत्र,
चुनाव तक की दरकार,
तोड़ देंगे चुटकी में,
बस बन जाए सरकार।
रक्षासूत्र ही बनेगा कामसूत्र,
रक्षासूत्र बाँधने वाली को ही
अंकशायिनी बनने को कर देंगे मजबूर,
वस्त्रों को कर तार-तार,
इसी के कर-कमलों से पहनेंगे,
जीत के हार।
विजयादशमी होगी,
चुनाव-परिणामों की घोषणा,
वोटर की मजबूरी है,
किसी ना किसी को,
वोट देना जरूरी है
यदि बहुमत नहीं मिलेगा,
सभी हो जायेंगे सवार
तभी सत्ता का रथ चलेगा
सभी एक-दूसरे के गले लगेंगे,
हम मिलकर सहयोग करेंगे,
यूपीए,राजग,तीसरा,चौथा या पाँचवा मोर्चा,
और सभी दल स्वतंत्र,
दल ही नहीं निर्दलीय उम्मीदवार भी
लोक को छोड़ पीछे,
अपनायेंगे सत्ता-तंत्र।
सभी का धर्म एक है,
सत्ता सभी की टेक है।
तंत्र पहनायेगा,
इन्हें जीत के हार,
जनता भले ही हो बेजार,
ये धर्म की रखेंगे लाज,
धार्मिक पर्यटन बढ़ायेंगे,
धार्मिक-स्थलों पर शराब पार्टी मनायेंगे,
होगें नग्न-नृत्य,
सभी वोटर बन जायेंगे भृत्य,
इनकी तिजोरी देखना,
वही होंगे इनके कृत्य,
जनता का हो राम नाम सत्य।

--डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी




हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

तब कि बातें और थी तब लोगों को ज्ञान था
कथनी और करनी का अंतर गाँधी जी को ध्यान था
बच्चे से गुड़ खाना छोड़ो उस दिन तक ना बोले थे
जिसदिन तक गुड़ खाने का खुद बापू को अरमान था

अब लालटेन वाले नेता बैठें एसी दरबार में
साइकिल वाले नेता भी चलते हैं मोटर कार में
अब काटें भी मिलते हैं कुछ फूलों के हार में
अब पंजे तक से पिसता है बस वोटर हर सरकार में

चिकनी चुपड़ी बात करे जो कभी करे न काम

जगह से अपनी हिले नहीं जो मिले न जबतक दाम
पांच साल में एक बार जो करता हो सलाम
याद नहीं रखता उनको जो आते उसके काम
पहचान ही जिसकी ये हो जो नहीं आदमी आम
अपनों तक का सगा नहीं जो नेता उसका नाम

भरे पेट जो रोज़ लगाते नैतिकता के नारे
और सबको ये बतलाते हैं कि क्या अच्छा है प्यारे
वो शायद ना चल पाएँ खुद अपनी ही बोली राह पर
गर मिल ना पाए उनको उनका खाना उनकी चाह पर
भूखे रहना क्या होता है जबतक नहीं नेता जानेगें
क्या भूख से लड़ने वालों की बातों को वो मानेगें

हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

--आलोक गौड़




रथ बताते फिर रहे चालाक मोटर की जगह
राजनेता फिट हुये हैं आज जोकर की जगह
दृशय मिश्रण आ गया है अब नई तकनीक में
ले रहे हैं 'गांधी' मुरली मनोहर की जगह
शुष्क रेगिस्तान की संभावना दिखने लगी
इस चमन की बुलबुलों को अब सरोवर की जगह
पोल क्या खोलेंगे पोलिंगबूथ शिक्षा के बिना
कुछ भगत सिंह चाहिये हैं आज वोटर की जगह

--डा नीरज जैन



भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

मुँह उठाये फिर चले आये,
छुटभैये, चमचों से पर्चे बटवाये,
रंग-बिरंगे झण्डे फहराये,
इक्के-दुक्के काम गिनवाये,
मांग रहे हमसे मतदान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

पुराने वादे न दोहराओ,
घिसे-पिटे भाषण न सुनाओ,
धर्म का ज़हर न फैलाओ,
पाँच साल का हिसाब बताओ,
कितने किये अच्छे काम,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

भाजप, कांग्रेस, समाजवादी,
ओढे रहो भईया सफेद खादी,
हर काम की तुमको आज़ादी,
होती है होने दो बर्बादी,
इसका है किसी को अनुमान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

सुस्त क़ानून व्यवस्था हमारी,
तिस पर महंगायी, बेरोजगारी,
सुरक्षा, शिक्षा की कमी भारी,
रिश्वत भी लाइलाज बिमारी,
पिस रही जनता हैं सब परेशान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

फेल हो तुम चौथा दर्जा,
फिर भर दिया तुमने पर्चा,
कौन भरेगा चुनाव का खर्चा,
देश पर बढेगा भारी कर्जा,
ख़ूब रौशन किया भारत का नाम,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

कौन सुखी है बोलो आज,
एक सपना है रामराज,
राम भरोसे सब कामकाज,
खीझ है मन में, हैं सब नाराज़,
"रत्ती" बचाये सबको भगवान,
भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

--सुरिंदर रत्ती