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Monday, May 11, 2009

वह गँवार नहीं है


उन
बस्तियों में जहाँ दिन में भी
अंधेरा होता है घरों में /
और चिमनियों में तेल बचाने की जद्दोजहद
बच्चे पढ़ने नहीं जाते

सभी
समझते हैं बस्ती में
बच्चे बहुत कुछ सीख सकते हैं
जिससे सीधे-सीधे रोटी पैदा हो सकती है
स्कूल जाने पर
ना जाने क्या पढ़ेंगे /
ना जाने क्या सीखेंगे

स्कूल,
नहीं जाने के बाद भी
वो बच्चे,
नहीं भूल पाते हैं स्कूल और पढ़ना लिखना
जितना भी जानते हैं
यह स्कूल की दीवारों पर
देखने को मिलता है
जहाँ अक्सर वो लिखा मिल जाता है
जिसे हम बोलचाल में गालियाँ कह लेते हैं
और पढ़ने के बाद नाक भौं सिकोड़ते हैं

वो,
बच्चे बड़े होने तक सीख जाते हैं
चोरी करना / बूट पॉलिश करना /
जेब कतरना / या भीख माँगना
फिर भी स्कूल नहीं भूल पाते हैं
जब भी खाली होते हैं तो
किसी पब्लिक शौचालय को नहीं छोड़ते
चाहे ट्रेन में हो या किसी चौराहे पर
उनके सामने की दीवार बदल आई होती हैं
ब्लैक-बोर्ड में और कलम
या तो कोयला होता है /
या ईंट को पीसकर बनाया हुआ चूरा
जिसमें थूंक कर
वो सब लिखा जा सकता है
या बनाये जा सकते हैं वो चित्र
जिन्हें देखकर यह लगे कि
अभी-अभी किसी प्रोफेसर ने पढ़ायी हो ह्यूमन फिजियोलॉजी
प्रजनन तंत्र की एनाटॉमी के साथ
और बोर्ड को बिना पोंछे ही छोड़ दिया हो
छात्रों के पुर्नअभ्यास के लिये
जिसे देखकर हम मुँहभर के गाली दे लेते हैं
स्साले! गँवार के गँवार
और अपने बेड़रूम में छोड़ नही पाते हैं
लोभ किसी बल्यू फिल्म का

यही,
वो सब दोहराता है
हमारे मुँह पर तमाचा मारते हुये
कि
बता सके कि वह गँवार नही है
और जानता है
पढ़ना-लिखना
भले ही यह हमें ठीक लगे या नहीं

यूनिकवि मुकेश कुमार तिवारी
दिनांक : ०६-मई-२००९

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

बन्धु ,
आपकी रचना का विषय और जो कहा गया है, मुझे बहुत पसंद आया | व्याहारिक और वास्तविकता के करीब है |

फिर भी कुछ कविता जैसी flexibility होती तो और पढ़ने में मजा आता |

सुन्दर रचना के लिए बधाई |

अवनीश तिवारी

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

बन्धु ,
आपकी रचना का विषय और जो कहा गया है, मुझे बहुत पसंद आया | व्यावहारिकता * और वास्तविकता के करीब है |

फिर भी कुछ कविता जैसी flexibility होती तो और पढ़ने में मजा आता |

सुन्दर रचना के लिए बधाई |

अवनीश तिवारी

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

समय,परिस्थिति,परिणाम......बहुत ही परिपक्व विश्लेषण

mohammad ahsan का कहना है कि -

दिन प्रति दिन के जीवन के सामाजिक अंतर्विरोधों और अभिजात्य ढोंग को प्रर्दशित करती अच्छी कविता. काश कि थोडा छोटी होती , काश कि थोडा लयबद्ध भी होती. फिर भी दिलचस्प लगी,
- ahsan

Nirmla Kapila का कहना है कि -

बहुत ही भा्वमय कविता है सही मे यही है बस्तियों का सच बधाई और आभार्

vinay k joshi का कहना है कि -

बता सके कि वह गँवार नही है
और जानता है
पढ़ना-लिखना
भले ही यह हमें ठीक लगे या नहीं
*
पसंद आया ,
बधाई

Anonymous का कहना है कि -

lekh achchaa hai

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

सभी काव्य रसिकों का आभार!!

मैं, सभी गुणीजनों और शुभेच्छुओं का आभारी हूँ जिन्होंने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से मुझे अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत कराया और मुझे अपने लेखन में उन्नयन के सुझाव दिये।

सुधार किसी भी प्रक्रिया का एक अनिवार्य अंग होता है और उसकी गुंजाईश रखी जाना चाहिये ऐसा मैं मानता हूँ।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

Roshi का कहना है कि -

नन्हे महमान
ओ नन्हे मेहमान, तेरे वास्ते हैं हम सब परेशान
तेरी सलामती और सेहत के लिए मन है बेचैन
हर घडी हर पल है नई आशाएं, नए सपने
नए रिश्ते जुड़ने की, सुगबुगाहट, नई कल्पनाये
हर पल बढती है धड़कन दिल की मन होता है, बेचैन
हरदम सोचती हूँ उस प्रसब पीड़ा की वेदना, पर
तत्काल ही आँखों में आ जाती है सूरत उस छोटी जान की
पागल मन डूबने लगता है उसके प्रेम और नई पहचान में ...

Roshi का कहना है कि -

अहसास
जीवन एक नवजीवन का
चक्र है यह अदभुत इश्वेर का
स्रष्टि ने है फिर से दोहराया इतिहास
बेटी की कोख में पल रही है एक आस
याद आते हैं बो लम्हे जब हुआ था जन्म लाडली का
छोटी सी नाजुक सी गुडिया छाया था सर्वत्र उल्लास
कब पली, बड़ी और था उस पर यौवन छाया
माँ का आँचल छोड़ कब चल पड़ी वह काया
पिया का अपने पाने को साथ
आज वही नन्ही कलि एक पुष्प बनी
और खुद चल पड़ी मातृत्व के नाजुक पल की ओर
कल जिससे गुजारी थी माँ उसी अहसास की ओर
याद आता है हरपल वो लम्हा जो गुजरा था मैंने
एक हकीकत के साथ .

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