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हेएए ........ नदिया बहिले थोड़ा धीरे, थोड़ा धीरे


मुहम्मद अहसन हिन्द-युग्म का जाना-पहचाना चेहरा हैं। इनका नाम ऐसे पाठकों में शुमार है जो हर कविता पर अपनी सच्ची प्रतिक्रिया देने में विश्वास रखते हैं। आज हम इन्हीं एक कविता अपने पाठकों की नज़र कर रहे हैं।

कविता- नदिया बहिले थोड़ा धीरे, थोड़ा धीरे

हेएए ........ नदिया बहिले थोड़ा धीरे, थोड़ा धीरे

हेएए......... चलै बयार, उड़ें गोरिया के केस
घर मा गाय बियावै, भैया चले रे बिदेस

हेएए ........ नदिया बहिले थोड़ा धीरे, थोड़ा धीरे

हेएए....... खेत मा फूलै चना और घर मा तुलसी
सरसों ऊ रंग बिखारे पीला भावा रे देस

हेएए ........ नदिया बहिले थोड़ा धीरे, थोड़ा धीरे

हेएए........रात मा हम गावैं बिरहा सांझ मा भजना
दिन मा काटें हम दंगल दूर भवे सब कलेस

हेएए ........ नदिया बहिले थोड़ा धीरे, थोड़ा धीरे

हेएए.......... पूजें हम पीपल द्वारे और चढावें पानी
आँख मा बस गयी गोरी, चित्त मा हनुमान गनेस

हेएए ......... नदिया बहिले थोड़ा धीरे, थोड़ा धीरे


प्रथम चरण मिला स्थान- अठारहवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- बारहवाँ

कभी कभी


कभी कभी
जिंदगी कैसी तो टूट-फूट जाती है,
न जुड़ सकती है न मरम्मत हो सकती है,
बस बच्चों के किसी खिलोने की तरह -
चाभी कहीं, पहिया कहीं,
और इस टूटी फूटी जिंदगी का
न कोई मरकज़, न कोई धुरी

और कभी-कभी
कैसे तो ज़ख्म रिसते रहते हैं
रूह के हर पोर से;
और कैसा तो कभी बेशुमार दर्द भर जाता है !
इतना दर्द, इतना दर्द
जैसे पूरा वजूद ही दर्द बन जाए
इतना दर्द, इतना दर्द कि
दर्द की पोटली न बन्ध पाए
न ढोई जा पाए;
और कभी कभी
हम कैसे तो अलग - अलग
अपने अपने सय्यारों पर रहने लगते हैं
बिलकुल अजनबी
कोई किसी को नहीं समझता , पढ़ता -
जो परदेसी वो भी नहीं
जो अपने, बिलकुल अपने
वो भी नहीं
...........................
मरकज़- केंद्र
सय्यारे- ग्रह

--मोहम्मद अहसन

थोड़ी बहुत बगावत का जुज़ भी ज़रूरी है


मुहम्मद अहसन हिन्द-युग्म के सक्रियतम पाठक हैं। एक बार यूनिकवि का ख़िताब भी जीत चुके हैं। जुलाई माह की यूनिकवि प्रतियोगिता में इनकी एक कविता ने 6वाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता- सलाह

पुरसुकून जिंदगी के लिए
समझौते ज़रूरी हैं,
मगर यह देख लेना कि,
समझौते कहीं इस क़दर न हो जाएं
कि और कुछ करने के
लायक़ ही न रहो

बड़े और बुजुर्गों की,
मां बाप और रिश्तेदारों की
इज्ज़त और फ़र्माबरदारी

फ़र्ज़ और लाज़मी है,
मगर यह देख लेना कि
एइत्क़ाद के समंदर में
आँख इस क़दर न बंद हो जाय
कि तुम उन के जुर्म में शरीक हो जाओ

हाकिमों और ओहदेदारों
मिज़ाजपुरसी यक़ीनन ज़रूरी है,
आदाब और अदब ज़रूरी हैं,
हुक्मबरदारी लाज़मी है,
मगर यह देख लेना कि
हुक्म और आदाब बजा लाने के जोश में
कहीं इस क़दर न झुक जाना
कि रीढ़ की हड्डी ही टूट जाय

एइत्क़ाद और परस्तिश ज़रूरी हैं,
ईमान और एतबार ज़रूरी हैं
मगर यह देख लेना कि
जिंदा इंसान के लिए
ज़मीर ओ खुद्दारी भी ज़रूरी हैं;
सही और ग़लत का इम्तियाज़ भी ज़रूरी है,
चीजों के इखलाकी
और गैरइखलाकी होने का
फ़र्क भी भी ज़रूरी है ;
और इंसान के जिंदा वजूद के लिए
थोड़ी बहुत बगावत का जुज़ भी ज़रूरी है
.............................................................
एइत्क़ाद - श्रद्धा
इम्तियाज़ - भेद
इखलाकी -नैतिक
गैर इखलाकी - अनैतिक
जुज़ - अंश


प्रथम चरण मिला स्थान- छठवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- छठवाँ


पुरस्कार और सम्मान- सुशील कुमार की ओर से इनके पहले कविता-संग्रह 'कितनी रात उन घावों को सहा है' की एक प्रति।

अगस्त माह की यूनि प्रतियोगिता में रु 3500 से भी अधिक के पुरस्कार जीतने का मौका


अगस्त 2009 माह की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित की जाती है। उल्लेखनीय है कि हिन्द-युग्म पिछले 32 माह से इस प्रतियोगिता का आयोजन यूनिकोड (हिन्दी) के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के लिए करता आ रहा है। हिन्दी आयोजनों में यह एक मात्र पुरस्कार है जो पाठकों को भी प्रोत्साहित करता है।

इस प्रतियोगिता के आयोजन की उद्‍घोषणा प्रत्येक माह की पहली तिथि को की जाती है और परिणाम अगले माह के प्रथम सोमवार को प्रकाशित किये जाते हैं। इस प्रतियोगिता का आयोजन हिन्द-युग्म के सहयोगियों, प्रसंशकों और हिन्दी-कर्मियों की मदद से होता है।

कृपया इसमें भाग लेकर इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने की परम्परा को समृद्ध करें।

अगस्त 2009 का यूनिकवि बनने के लिए-

१) अपनी कोई मौलिक तथा अप्रकाशित कविता 18 अगस्त 2009 की मध्यरात्रि तक hindyugm@gmail.com पर भेजें।

(महत्वपूर्ण- मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अतिरिक्त गूगल, याहू समूहों में प्रकाशित रचनाएँ, ऑरकुट की विभिन्न कम्न्यूटियों में प्रकाशित रचनाएँ, निजी या सामूहिक ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित रचनाओं की श्रेणी में आती हैं।)

२) कोशिश कीजिए कि आपकी रचना यूनिकोड में टंकित हो।
यदि आप यूनिकोड-टाइपिंग में नये हैं तो आप हमारे निःशुल्क यूनिप्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं।

३) परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, इतना होने पर भी आप यूनिकोड-टंकण नहीं समझ पा रहे हैं तो अपनी रचना को रोमन-हिन्दी ( अंग्रेजी या इंग्लिश की लिपि या स्क्रिप्ट 'रोमन' है, और जब हिन्दी के अक्षर रोमन में लिखे जाते हैं तो उन्हें रोमन-हिन्दी की संज्ञा दी जाती है) में लिखकर या अपनी डायरी के रचना-पृष्ठों को स्कैन करके हमें भेज दें। यूनिकवि बनने पर हिन्दी-टंकण सिखाने की जिम्मेदारी हमारे टीम की।

४) एक माह में एक कवि केवल एक ही प्रविष्टि भेजे।

यूनिपाठक बनने के लिए

चूँकि हमारा सारा प्रयास इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा देना है, इसलिए पाठकों से हम यूनिकोड ( हिन्दी टायपिंग) में टंकित टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं। टायपिंग संबंधी सभी मदद यहाँ हैं।

१) 1 अगस्त 2009 से 31 अगस्त 2009 के बीच की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित अधिकाधिक प्रविष्टियों पर हिन्दी में टिप्पणी (कमेंट) करें।

२) टिप्पणियों से पठनीयता परिलक्षित हो।

३) हमेशा कमेंट (टिप्पणी) करते वक़्त समान नाम या यूज़रनेम का प्रयोग करें।

४) हिन्द-युग्म पर टिप्पणी कैसे की जाय, इस पर सम्पूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है।

कवियों और पाठकों को निम्न प्रकार से पुरस्कृत और सम्मानित किया जायेगा-


१) यूनिकवि को शिवना प्रकाशन की ओर से रु 1000 की मूल्य तक की पुस्तकें तथा प्रशस्ति-पत्र।

२) यूनिपाठक को मुहम्मद अहसन के कविता-संग्रह नीम का पेड़ की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।

३) दूसरे से दसवें स्थान के कवियों को तथा दूसरे से चौथे स्थान के पाठकों को मुहम्मद अहसन के कविता-संग्रह नीम का पेड़ की एक-एक प्रति।

कवि-लेखक प्रतिभागियों से भी निवेदन है कि वो समय निकालकर यदा-कदा या सदैव हिन्द-युग्म पर आयें और सक्रिय लेखकों की प्रविष्टियों को पढ़कर उन्हें सलाह दें, रास्ता दिखायें और प्रोत्साहित करें।

प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले सभी 'नियमों और शर्तों' को पढ़ लें।

अनजाने सफ़र, अनजानी मंजिलें जिसके मुक़द्दर हैं


मोहम्मद अहसन हिन्द-युग्म के सक्रियतम पाठकों में से एक हैं। हमारे प्रत्येक आयोजन में भाग भी लेते हैं। पिछले माह की यूनकवि प्रतियोगिता में भी भाग लिया। इनकी कविता ने छठवाँ स्थान भी बनाया।

पुरस्कृत कविता- बाबू जी मैं जा रही हूँ

बाबू जी मैं जा रही हूँ,
अनजाने सफ़र, अनजान मंजिलों की तरफ;
न जाने कौन होगा मेरे साथ,
कौन लोग होंगे!
कौन जाने किस्मतों में सिर्फ अँधेरे हों,
सन्नाटा हो, गहरे काले साए हों, आंधियां हों,
या कि हलचल हो तूफानों की,
पर मेरी फ़िक्र आप ज़रा न करना;
मुझे यक़ीनन आप की फ़िक्र रहेगी ,
अनजाने सफ़र, अनजानी मंजिलें शायद मेरा मुक़द्दर हैं
मगर तुम्हारी फ़िक्र, तुम्हारा ख़याल मेरा फर्ज़ है,
मैं सिर्फ आप की दुआओं की तालिब हूँ
कि अनजान रास्तों पर मेरे क़दम न लड़खडाएं,
अगर अँधेरे ही मेरा मुक़द्दर हैं
तो उन्हें भी हिम्मत से बढ़ के थाम लूँ

बाबू जी तुम मुझ से व'अदा करो,
कि तुम अपना ख़याल रखोगे,
डाक्टर ने जो कहा है एहतियात बरतोगे;
मेरी गैर मौजूदगी में उदासी को मत फटकने देना
बेवजह मेरी फ़िक्र मत करना;
मैं कोशिश करूंगी
कि पहली फुर्सत में,
'उन से' इजाज़त ले के घर आ जाऊं
और हफ्ता दस रोज़ तुम्हारी खिदमत में गुजार दूँ

बाबू जी, देखो मेरी फ़िक्र मत करना
मुझे तो जाना ही था एक दिन अनजान मंजिलों की तरफ,
बस मेरी हिम्मत बढ़ाइये कि मेरे कदम साकित रहें;
अगर रस्म ए दुनिया का तकाजा न होता
ता जिंदगी तुम्हारा घर न छोड़ती,
तुम्हारा घर छोड़ कर देवताओं के घर भी न जाती,
बस तुम्हारे क़दमों में रह के
तुम्हारी खिदमत में जिंदगी गुजार देती, और
और तुम्हारे चेहरे का सुकून ही अपना मुक़द्दर जानती


प्रथम चरण मिला स्थान- तीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- छठवाँ


पुरस्कार- राकेश खंडेलवाल के कविता-संग्रह 'अंधेरी रात का सूरज' की एक प्रति।

गिद्धः मिलेंगे कहाँ और बैठेंगे कहाँ- सोचने की बात है


आज पूरी दुनिया पर्यावरण दिवस मना रही है। यह दिवस प्रत्येक वर्ष 5 जून को 1972 से लगातार पर्यावरण के प्रति सजग रहने के लिए मनाया जाता है। भारत में गिद्ध पक्षी का विशेष तरह का पर्यावरणीय महत्व रहा है। पिछले 5-6 वर्षों से उन्हें कहीं देखा गया हो, यह भी कह पाना मुश्किल हो रहा है। यह पूरी दुनिया के पर्यावरण के लिए बहुत अच्छे लक्षण नहीं हैं। आज हम तीन कविताओं के माध्यम से गिद्धों के विलुप्त होने पर बुद्धिजीवियों की चिंता आपके समक्ष लेकर उपस्थित हैं।

पिछले सप्ताह से आप रामजी यादव की कविताएँ पढ़ रहे हैं। रामजी का गिद्धों से बचपन का याराना था। इनकी बाल-स्मृतियों में गिद्ध उसी तरह से समाये हैं, जैसे कि रोज़ का खाना और सोना। रामजी गिद्धों के गायब होने को हमारी सभ्यता पर एक प्रश्नचिह्न मानते हैं।

गिद्ध

मैंने गिद्धों से हमेशा प्यार किया
और भूल गया कि वे खतरे में हैं

जब भी किसी के
ठहाके की लय का अवरोह सुनता हूँ
बार-बार मुझे गिद्ध याद आते हैं
जैसे खाकर अघाये हों वो
और प्रेमालाप के लिए फुर्सत चाहते हों

मेरी नानी के द्वार पर खड़ा
यह विशाल पीपल वृक्ष
अब खो चुका है अपनी हरीतिमा
जैसे गिद्धों ने अपना अस्तित्व खो दिया है
इतना बीड़र है यह पीपल आज कि
एक-एक टहनी गिन सकता हूँ
लेकिन एक भी निशान बाकी नहीं है गिद्धों का

मेरी स्मृतियों में नानी के प्यार की तरह सुरक्षित है
यह (वह) विशाल हरा-भरा पीपल
जब बसंत आता था तो झर जाते थे बूढ़े पत्ते
और कल्ले फूटते थे नए-नए
निकलती जाती थीं ललछौंह पत्तियाँ

छत पर चादर में मुँह डुबाए हम
ढकेल देना चाहते थे सुबह को थोड़ा और पीछे
चिल्लाती थी नानी- उठो रे सौं
करो दतुअन-कुल्ला, देखो कहाँ आया घाम
तब चादर हम और तान लेते थे
कि लो! हम गहरी नींद में हैं
पर धूप तो धूप है नींद में घुस जाती थी
और आप से आप सरक जाती थी चादर गर्दन के नीचे
और दिखाई पड़ता था पीपल जैसे रेखिया उठान
कोई नौजवान खड़ा हो

नई-नई पत्तियों पर रेंगती और फिसलती थी धूप
और संकोच से सेनुराभ हो उठती थीं पत्तियाँ
आह! वहीं पर देखा मैंने सौन्दर्य
उन्हीं से जाना फिदा होना
वहीं से सीखा कि प्यार में रंग फना हो जाता है दोनों का

ऊपर आराम फरमाते जटायु और संपाती के नात-नतेरुआ
हम मिचमिचाते हुए आँखें पूरे होश में आने से
पहले बरबराते
ससुर ई अबहीं लोग हियां बैठे के मुजरा लेते हैं
कि तभी दो डैने पसरते हवा में
और काँप उठता वायुमंडल
फिर एक और ज़रा ऊँचा उड़ता हुआ फिर एक और..........
हम गिनते थे गिद्धों को और शाम को मिलाते थे गिनती
कोई नया आता तो हम उसे पाहुन समझते

गायब हो गये हैं गिद्ध एक-एक कर
जैसे गायब हो गये हैं
मेरे जीवन के भोले और सुन्दर दिन
जैसे गायब हुई चली जाती है जवानी
लेकिन बुढ़ापे की तरह भी कहीं आते नहीं दिखते गिद्ध
अकबका गया हूँ जैसे किसी हाइवे पर
कोई ज़रूरी चीज़ खो आया हूँ दूर कहीं

गायब हो गए हैं गिद्ध
अब डरता हूँ किसी को गाली देने से
अचक्के में किसी धूर्त और मक्कार को कहीं गिद्ध न कह बैठूँ
डरता हूँ कि कोई चालाक गिद्ध की तरह न लग जाय
यह सरासर अपमान होगा गिद्धों का
गायब हो गए हैं गिद्ध कि अब
उदाहरण भी अकेला और उदास कर जाते हैं मुझे

डाँटती थी मामी- अरे! बस अढ़ाई फुलके
कैसे चलोगे जिंदगी की हराई
एक बाँव में ही थक जाओगे तुम तो
बिल्कुल गीध की तरह लजाधुर हो बौरहा!
सात-आठ रोटी खा के जब तक न होगे अडड्ड
कैसे बुद्धि बनेगी मजबूत और बुझेगी न्याव-अन्याव
गीध भी तो कटा आया पंखा और लड़कर गिरा धरती पर
कि थाली में एक ओर रोटी डाल देती मामी

क्या लिया गिद्धों ने दुनिया से!
एक मछली तक न खाया चुराकर
न झपट्टा मारा तालाब में
केवल मरे जानवर खाए मिले जहाँ कहीं
जैसे त्याज्य हो बाकी सब
जैसे सहस्राब्दियों ने ओढ़ ली हो जिम्मेदारी
पर्यावरण को साफ रखने की
और इसी में आनंद पाने लगे हों
ऐसे में कहाँ पता रहा होगा कि आदमी का लालच
कितना विषैला हो चुका है?
और अपनी ही प्रतिबद्धता की भेंट
चढ़ते चले गये होंगे एक-एक कर

किसी के चेहरे पर शिकन नहीं देखता हूँ
नहीं पाता हूँ कहीं अपराध बोध
कि मारा है गिद्धों को किसने
सभी छिपा रहे हैं अपने ज़ुर्म
और घाव दिखा रहे हैं एक-दूसरे को अपने
कोई शै है ऐसी जिससे मुँह चुरा रहे हैं सभी
वही कि जिसने सभी को अमानवीय बना छोड़ा है

गिद्धों के सवाल पर लगातार चुप्पी है
चारों तरफ छाई है वीरानी
अनवरत चला आ रहा है सन्नाटा
चारों तरफ पसर रहा है एक क्रंद्रन
लोगों को पता नहीं है प्रकृति रो रही है चुपचाप
हमारी भाषा में नहीं है पीड़ा और संवेदना
हम भूल गये हैं असहमति और तर्क
और जिंदगी के खिलाफ संकीर्ण नज़रिया है सब तरफ

लड़ाई यहाँ से भी शुरू होनी चाहिए।
-रामजी यादव


मोहम्मद अहसन भारतीय वन सेवा में अधिकारी के तौर पर कार्यरत हैं। जंगल, गाँव, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदी-पोखर-तालाब से ये उसी तरह से जुड़े रहे हैं जैसे कि आज का बच्चा कम्प्यूटर और वीडियो गेम से। अहसन पर्यावरण के प्रति सजग रहे हैं। इनका एक संग्रह 'मेरी इक्कीस पर्यावरण कविताएँ' प्रकाशित हुआ है, जिसमें पर्यावरण के प्रति इनकी चिंता व्यापक रूप से दिखलाई पड़ती है। अहसन की कविता 'गिद्ध बैठेंगे कहाँ!' में भी सूक्ष्म तौर पर गिद्धों के गायब होने की ही दास्ताँ हैं, कुछ अन्य कारणों के साथ।

गिद्ध बैठेंगे कहाँ!

तनावर दरख्त झुक गए हैं
पेड़ बूढे गिर रहे हैं;
गिद्ध बैठेंगे कहाँ
और घोंसला अब बनेगा कहाँ

जवां पेड़ों की जमा’अत पस्त है
हौसला हैं पर शाखें नहीं हैं
सिर्फ तने ही तने हैं ,
भाव सारे अनमने हैं
मैं सोचता हूँ
गिद्ध अब बैठेंगे कहाँ !

आसमां बंद है
वायु बोझल है
परवाज़ गिद्धों की होगी कहाँ,
परवाज़ के अंत में
गिद्ध उतरें गे कहाँ, और
बैठेंगे कहाँ !

गाँव में अब डंगर मरते नहीं
या मरते ही दफ़्न हो जाते हैं
किस तरह होती है उन की अंतिम क्रिया
इन सवालों के जवाब अब मिलते नहीं
मैं सोचता हूँ
गिद्ध अब खाएंगे क्या, और
बैठेंगे कहाँ !
-मोहम्मद अहसन


इनकी अगली कविता में पर्यावरण के हर बदलाव की तरह इशारा है और समाधान का निर्देश भी है।

क्यों......???

क्यों बादल टूटा
क्यों नद्दी उबली
क्यों गाँव बहे
क्यों धारे पलटे
क्यों भूमि कटी
क्यों खेत बहे

क्यों पर्वत खिसका
क्यों चट्टान धँसी
क्यों गाँव दबा
क्यों सड़क कटी
क्यों लोग फँसे

क्यों धरती काँपी
क्यों गाँव ढहे
क्यों लोग मरे
क्यों श्मशान पटे

क्यों रेत उड़ी
क्यों तूफ़ान उठे
क्यों बंज़र चीखा
क्यों बीहड़ रोया

क्यों मौसम उलझा
क्यों धरती सूखी
क्यों खेत जले
क्यों फ़सल फुँकी
क्यों भूख उगी

क्यों आग लगी
क्यों जंगल सुलगा
क्यों पशु भागे
क्यों धुँवा उठा
क्यों अम्बर तड़पा

क्यों पेड़ कटे
क्यों जंगल सिसका
क्यों सोते सूखे
क्यों खेती बैठी
क्यों बाग़ कटे
क्यों पुरवे उजड़े
क्यों शहर उगा

क्यों झीलें सूखीं
क्यों पंक्षी भागे
क्यों मेढक दुबके
क्यों कछुवे सहमे

क्यों विष बरसा
क्यों मछली तड़पीं
क्यों ज़हर घुला
क्यों गिद्ध मरे

कुछ तुम सोचो !
कुछ मैं सोचूँ !
-मोहम्मद अहसन

इन्हें मिलेंगी रु 5500 तक की पुस्तकें


मई महीने का यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता का आयोजन कई मायनों में नया रहा। एक तो यह कि इस महीने रु 5500 तक की पुस्तकें देने की उद्‍घोषणा की गई। वहीं इसमें 56 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इससे पहले फरवरी 2008 की प्रतियोगिता में 58 कवियों ने भाग लिया था। सुखद बात यह भी रही कि इस अंक में बहुत से कवियों ने पहली बार भाग लिया।

इस नाते हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ी कि हम अच्छी कविताओं का चयन कर पायें। यूनिकविता के स्तर की 10 कविताएँ चुन पायें। हिन्द-युग्म कहता आया है कि शीर्ष 10 कविताओं का स्थान निर्धारण इसके लिए बहुत मुश्किल होता है। इस बार इसी तरह की मुश्किल तब आई जब प्रथम तथा दूसरे स्थान की कविताओं का प्राप्तांक लगभग बराबर हो गया। इस बार कुल 8 जजों से निर्णय कराया गया। पहले चरण में 4 जज और अंतिम चरण में भी चार जज रखे गये। पहले चरण से 32 कविताओं को चुनकर अंतिम चरण के निर्णायकों को भेजा गया। अंतिम चरण के निर्णायकों द्वारा दिये गये अंकों के साथ पिछले चरण के औसत अंकों को भी जोड़ा जाता है और यह महा-औसत निकालकर कविताओं का स्थान निर्धारण किया जाता है। ग़ौरतलब है कि किसी भी जज को न तो दूसरे जज के बारे में कुछ ज्ञात होता है और नहीं रचनाओं के रचनाकार के बारे में ही।

इस प्रकार जब अंक तालिका बनाई गई तो शीर्ष 2 कविताओं में बहुत छोटा अंतर था। फिर हमने दोनों चरणों के स्थानों की तुलना करके कवि दिबेन की कविता 'कृष्ण और द्रिपदी' को यूनिकविता चुना। साथ ही साथ यह भी तय किया कि बेशक हम दूसरे स्थान के रचनाकार को पहले स्थान वाला पुरस्कार नहीं दे पायेंगे, लेकिन जून के महीने में ही एक अन्य कविता प्रकाशित करने का अवसर ज़रूर देंगे।

जून माह के विजेता कवि यानी यूनिकवि दिबेन की एक कविता 'मछली रानी' पिछले महीने भी प्रकाशित हो चुकी है।

दिबेन सिंह का परिचय बस इतना है कि 13 अक्टूबर 1955 को मुज़फ़्फ़नगर (उ॰प्र॰) में इनका जन्म हुआ। दिबेन की कहानियों की तीन पुस्तकें, दो उपन्यास तथा कविताओं की एक पुस्तक (काँच के ताजमहल) प्रकाशित हो चुके हैं। एम॰ए॰, एल॰एल॰बी॰ तथा वनस्पति विज्ञान में बी॰एसी॰ की आदि की पढ़ाई कर चुके दिबेन इन दिनों बहादुरगढ़ (हरियाणा) में रहते हैं।

पुरस्कृत कविता- कृष्ण और द्रौपदी

तंग अंधेरी बंद कोठरियों में
सिसकती- घुटती रही सुबकियां और
कंठ में दबी चीख,
नहीं रहे कृष्ण भी अब निर्बल के मीत
द्रौपदी का करना अपमान
बन गई दुश्शासन की रोज-रोज की बात
.......और द्रौपदी?

द्रौपदी इस सबकी हो गई अभ्यस्त
क्योंकि उसके पति
बनवास में ही नहीं अब केबिनेट में भी हैं
मैंने भी अपने भीतर बैठे विदुर की हत्या कर दी है
इसके बदले में उन्होंने मुझे दिया है
रोटी का आश्वासन
और मेरी अवैध संतानों को पेंशन
वी आई पी लोगों की
अवैध संतानें वैध करार दे दी गई हैं
तुम कुंती से कह देना
कि कर्ण को नदी में न बहाए।



प्रथम चरण मिला स्थान- तीसरा


द्वितीय चरण मिला स्थान- प्रथम


पुरस्कार और सम्मान- शिवना प्रकाशन, सिहोर (म॰ प्र॰) की ओर से रु 1000 के मूल्य की पुस्तकें तथा प्रशस्ति-पत्र। जून माह के अन्य दो सोमवारों की कविता प्रकाशित करनवाने का मौका।

इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें हम राकेश खंडेलवाल की पुस्तक 'अंधेरी रात का सूरज' की एक-एक प्रति भेंट करेंगे, उनके नाम हैं-

सत्यप्रसन्न
अखिलेश कुमार श्रीवास्तव
आलोक उपाध्याय 'नज़र इलाहाबादी'
उमेश पंत
मुहम्मद अहसन
रवि मिश्रा
जितेन्द्र दवे
श्यामली त्रिपाठी
निर्मला कपिला


इस बार एक और बात बहुत ध्यान देने वाली है कि जजों को कुछ कविताएँ इतनी पसंद आईं कि उन्होंने उन्हें लगभग बराबर अंक दिये। यही कारण है कि शीर्ष 10 के बाद हमारे पास 10 और ऐसी कविताएँ हैं जिनका औसत प्राप्तांक दशमलव के दूसरे या तीसरे स्थान में कम या अधिक है। इसलिए हम निम्नांकित कवियों की कविताएँ भी प्रकाशित करेंगे।

स्वप्निल कुमार 'आतिश'
ऋतु सरोहा
रवि कांत 'अनमोल'
किरण सिन्धु
अम्बरीष श्रीवास्तव
दीपाली "आब"
प्रदीप वर्मा
संगीता सेठी
मनु "बे-तक्ख्ल्लुस"

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 30 जून 2009 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

इस बार पाठकों में मोहम्मद अहसन ने हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा, हाँ यह ज़रूर है कि ये देवनागरी में लिखने में हिचकिचाते रहे या यूँ कह लें कि परेशानी महसूस करते रहे। खैर हम इसे अपनी ही असफलता मानेंगे कि अपने यूनिपाठक को देवनागरी टंकण में अभी तक दक्ष न कर सके।

यूनिपाठक- मोहम्मद अहसन

पढ़ने, लिखने, साहित्य, कला, प्रकृति भ्रमण आदि में रुचि रखने वाले मुहम्मद अहसन वर्तमान में भारतीय वन सेवा के लखनऊ क्षेत्र के मुख्य वन संरक्षक हैं। इनका चिंतन प्रकृति, पर्यावरण, प्रेम, जीवन के मूलभूत सत्य, सामाजिक तनाव इत्यादि की अनुभूतियों के साथ मिलकर जहाँ काव्य के रूप में सामने उभर कर आता है वहीं दूसरी ओर वह अनेकों प्रकार के शौक व हॉबियों के बालिक हैं। मूलरूप से बाराबंकी के रहने वाले हैं और अपनी जड़ों पर गर्व अनुभव करते हैं।
पुरस्कार और सम्मान- राकेश खंडेलवाल के कविता-संग्रह 'अधेरी रात का सूरज' की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।

इनके अतिरिक्त संगीता पुरी ने भी हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा। हम इन्हें भी यह पुस्तक भेंट करेंगे।

जो पाठक लगातार पढ़ रहे हैं और यूनिपाठक का पुरस्कार जीत चुके हैं वे वार्षिक हिन्द-युग्म पाठक सम्मान के प्रतिभागी बनते जा रहे हैं। इसलिए पढ़ने में कोई कसर न छोड़ें।

हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें।

मनोज भावुक
डा. अनिल चड्डा
समीर गुप्ता
डॉ.योगेन्द्र मणि
ज्योत्स्ना पाण्डेय
आलोक गौड़
अभिषेक ताम्रकार “अभि”
ममता गुप्ता
मधुछन्दा चक्रवर्ती
शेली खत्री
ओम प्रभाकर भारती
हिमांशु कुमार पाण्डेय
अनु बंसल
मंजू गुप्ता
केशव कुमार कर्ण
गौरव शर्मा 'लम्स'
पूजा अनिल
सौरभ कुमार
पृथ्वीपाल रावत
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
सोनिया उपाध्याय
शारदा अरोरा
अजय कुमार उपाध्याय
सुधीर परवाना "बेजान"
तरुण सोनी तन्वीर
स्तुति नारायण
अजित गुप्‍ता
डॉ॰ संजय अग्रवाल
शन्नो
सीमा सिंघल
राजेश बिस्सा
स्वरन सरीन
दिनेश "दर्द"
संजय सेन सागर
कुलदीप यादव
धीरेन्द्र सिंह
जितेन्द्र कुमार दीक्षित
फ़कीर मो॰ घोसी

बच्चे-देश का भविष्य । चित्र और रचना (भाग-6)







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - अनुज अवस्थी

अंक - छब्बीस

माह - मई 2009






इस बार के काव्यपल्लवन के लिये अनुज अवस्थी ने जिस चित्र को भेजा उस चित्र को देखते ही कईं शे’र, कईं गीत याद आ जाते हैं। एक नज़र डालें..

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के..ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की..इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की..

और यह गीत तो सभी को याद होगा..

नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ...

रिक्शा चलाते बच्चों का चित्र एक दयनीय स्थिति दिखला रहा है। जिसमें आज की सच्चाई और बदसूरत भविष्य नजर आ रहा है। क्या आज की तारीख में इस तरह के गाने लिखे जाते हैं? क्या बच्चों का बचपन अब समाप्त हो चुका है? जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनके ऊपर अपने अभिभावकों की उम्मीदों का बोझ होता है और जो नहीं जा सकते वो? वे मजबूरी का बोझ ढोते हैं। उपर्युक्त गीत उन बच्चों को समर्पित हैं जिन्हें हम अपने देश का भविष्य कहते हैं। 25 प्रतिशत बच्चों को देख कर हम समझते हैं कि हम भारत-निर्माण कर रहे हैं पर 75 प्रतिशत को पता ही नहीं होता कि बचपन क्या है!!

तभी तो कवि भी बच्चों के इन हालातों पर ऐसी पंक्तियाँ लिख बैठते हैं:

बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम जैसे हो जायेंगे...

या फिर...

घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये...

हमारे पाठकों व कवियों ने भी मासूम बच्चों के ऊपर चंद पंक्तियाँ लिखकर अपनी भावनायें व्यक्त की हैं। लेकिन आप लोगों से एक गुजारिश है। आप केवल लिखे या पढ़े नहीं। इस देश के लिये कुछ ऐसा करें कि इन बच्चों का भविष्य सँवर सके। सरकार को दोष न दें। हमें स्वयं उठना होगा। हम चाहते हैं कि इस तरह के चित्र पर कभी काव्यपल्लवन न हो!!!



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*** प्रतिभागी ***
मुकेश कुमार तिवारी | मनु ’बेतखल्लुस’ | एम ऐ शर्मा " सेहर" | रचना श्रीवास्तव | मुहम्मद अहसन | शन्नो अग्रवाल | सीमा सिंघल | रवि मिश्रा | संगीता सेठी | सुरिंदर रत्ती | सजल प्यासा | मंजू गुप्ता | सौरभ कुमारअनुज शुक्ला | परवीन अग्रवाल

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मैंने,
इन्हें नही देखा कभी स्कूल जाते
रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे
पीठ पर लादे हुये बोझ
या दौड़ते तितलियों के पीछे
पेट भर खाने के बाद

मैंने
जब भी देखा इन्हें
तो सीखते मिले जिन्दगी की पाठशाला में
पीठ पर कैसे लादा जा सकता है बोझ
और कितनी दूर तक ढोया जा सकता है
एक ही साँस में बिना रूके

बाप,
के कदमों की छाप पर
रखते हुये पैर
सीखा रास्ता घर से कितनी दूर तक जाता है
और कैसे लौटता है
जब सूरज उबासिया ले रहा होता है
या चूल्हे में मचल रही होती हैं लकड़ियाँ

माँ,
के हाथों की लकीरों को
यह पढ रही होती हैं
गोबर की छाप में कंडों(उपलो) पर
या लिख रही होती हैं अपना नाम
राख के ढेर में उंगली से उकेरते हुये
और ढाल रही होती हैं
आदत,
बर्तन मांजते हुये

बचपन,
शायद इसी को कहते होंगे
ऐसा यह भी समझते हैं
और मैं भी
हो सकता है आप नही?

--मुकेश कुमार तिवारी




कोई बोले नेता कल के,
और कोई बतलाये मवाली
खस्ता बचपन देख के सोचा
क्या हरियाली, क्या खुशहाली
हो सकता है अब दिन बदलें,
है सरकार बदलने वाली
पेट को सूखी रोटी दूभर
आँखों में पकवान खयाली

खेंप नए वोटर की है ये,
जिस्म उघाडे, पेट सवाली

--मनु ’बेतखल्लुस’




ये देश के नंगे ,भूखे बच्चे
कुम्हलाये सहमे बदरंग से बच्चे
खाने का ठिकाना ना पहनने की सुध
नादाँ अनबूझ पहेली से बच्चे......
जरा इनके चेहरे की रौनक तो देखो
हर हाल मुस्कुराता ये जीवन तो देखो
हँसी शरारत ये मौज ये मस्ती
मासूमियत का ये मंज़र तो देखो......
ममता के आँचल को तरसते सिसकते
सहारे को इक हाथ ढूढते झिझकते
गर इक हाथ हम ही हैं बढाते
क्या देश के ये किसी काम न आते ??

--एम.ए. शर्मा




जीवन की जरूरतों से खेलता हूँ में
धुप के साये में
पलता हूँ मैं
बह न जाये आँखों से दर्द मेरा
मुस्कान एक चेहरे पर
ओढ़ लेता हूँ मै
अर्ध नंग्न है भविष्य भारत का
हुक्मरानों से ये बे खौफ
कहता हूँ मै
चिपका के बच्चों को जब ठंडे मे सोते हो तुम
चिल चिलाती धुप में तब
ठेला खीचता हूँ मै
सपने सूख के जब झड़ने लगते हैं
उम्मीद की नमी से
उनको सीच लेता हूँ मै
आज हो जायेंगे दवा के पूरे पैसे शायद
यही सोच हर रोज
घर से निकलता हूँ मै
जेब खाली पेट खाली फिर भी
नेताओं और ललित को
सलूट करता हूँ मै
देख मेरी तस्वीर कविता लिखने वालों
कुछ उम्मीद तो
तुम से भी रखता हूँ मै

--रचना श्रीवास्तव




तस्‍वीर में ही नहीं हम तो सदा साथ रहते हैं,
मुश्किलें कितनी भी आयें सदा हंसते रहते हैं ।

कोई आकर हमें अभी डांट भी जाएगा पर हम,
इन बातों को अब दिल से नहीं लिया करते हैं ।

पल कैसे भी नाजुक हों नन्‍हीं सी मुस्‍कान से,
हम अपने संग सब को बहला लिया करते हैं ।

कोई सपना अधूरा ना रहे साथ विश्‍वास के,
एक कदम लक्ष्‍य की ओर बढ़ा लिया करते हैं ।

वंदन संग अभिनन्‍दन मातृभूमि का खेल खेल में,
साथियों को अपने सदा सिखला दिया करते हैं ।

--सीमा सिंघल




खींसें निपोर लो
मसखरी कर लो
हंस लो
उचक फांद लो दो चार साल
अंततः तो जिंदगी की गाडी में जुतना ही है
किसी दफ्तर में चपरासी
कोई छोटी मोटी दूकान
कोई छोटा मोटा धंधा
कोई छोटी मोटी अपराध की जिंदगी
क्षुद्र जीवन , क्षुद्र संघर्ष
शादी ब्याह बच्चे
और बहुत जल्दी यह चक्र भी पूरा

दर असल मेरे कहने के पीछे एक कारण है
देश की किसी पिछली गली के गड्ढे में
उगे बच्चे चमत्कार नहीं करते है ,
सशक्त हस्ताक्षर नहीं बनते हैं ,
कहीं हजारों में ही कभी कोई विराट बरगद हो पाता है

देश के जनतंत्र को सलाम !
परन्तु परम्परागत व्यवस्था में ,
चपरासी का बेटा अमूमन चपरासी ही होता है,
धूल से धूल ही उगती है ,
और गोबर से गोबर ,

फोटोग्राफर साहेब के लिए भी तो तुम मात्र
फोटोग्राफी का ही तो एक अच्छा विषय हो ,
'मलिन बस्ती के हंसते कौतुक पूर्ण बच्चे '
न इस से अधिक न इस से कम

--मुहम्मद अहसन




ओ बाबू, ओ साहिब, ओ मेम साहिब
कब से यहाँ इन्तजार कर रहे हैं
किसी सवारी का
क्या आपको है कहीं जाना
अरे आप इधर आइये ना
बस कुछ पैसे मिल जाएँ तो
ले चलेंगे हम आपको
जहाँ भी है आपको जाना.

मेरा बापू घर पर बैठा रहता है बेकार
दिनभर फूंकता है बीडी
माँ कराहती है बीमारी से
भाई-बहन सभी मुझ पर हैं निर्भर
दवा के बिना, कभी अन्न के बिना
भूखे पेटों को मसोस कर हमें
जीना पड़ता है कभी-कभी
मेरे ही कन्धों पर टिका है सारा घर.

जिन्दगी घिसटती रहती है और
हमारी उम्मीदों का सूरज
हर सुबह उगता है पर
हर शाम के संग डूब जाता है
दो बख्त रोटी के लिये
ही तो मुस्कुराते हैं
इन रोटियों से जिंदगी चलने का
कितना अजीब सा नाता है.

बसंत- बहार आती है ऋतुओं में
हमारे जीवन में तो
आंधी, शीत और पतझर
हमेशा ही बने रहते हैं
पसीना टपकता है माथे से
नंगे पैरों, हांफते हुए
मेहनत-मजदूरी करते हैं
सबकी सुनते और सहते हैं.

दहकते हुए सूरज के नीचे
तपती दुपहरी और आंधी में
झम-झम बरसते पानी में
तरबतर भीगते हैं
अध ढंके गात लिये अरमानों
की सौगात लिये
हम पेट की खातिर ही तो
सारा दिन इतना बोझ खींचते हैं.

--शन्नो अग्रवाल




सलाम साहब
हमारा सलाम क़ुबूल करें
सलाम साहब
ये सलामी है नंगी तकदीर की
भूख झलकाती भारत की तस्वीर की
जो सालों में हमारे लिए गढ़ी गई है
पंचवर्षीय योजनाओं के तहत रची गई है
सलाम साहब................
आप आये तो अच्छा लगा
लेकिन आप को क्यों मै बच्चा लगा
मेरी उम्र तो उतनी पुरानी है
जितनी पुरानी इस गणतंत्र की कहानी है
सलाम साहब...............
ज्यादा कहां शिकायत है
शिकायत के कहां हम लायक हैं
कुछ खाने को लाते तो अच्छा लगता
अब बातों से पेट नहीं भरता
सलाम साहब...............
वैसे इस लोकतंत्र में हम सलामी ठोक जीने के रास्ते बनाते हैं
सो जनतंत्र में हम जनता सिर झुकाकर ही इसे बचाते है
हम भी झुका रहे हैं
मजबूरी है फिर भी मुस्कुरा रहे हैं
सलाम साहब.............
इस बार हमारी गलियों में कुछ लोग आये
भरोसे और वादे की नई खुराक़ खिला गये
गोदी में भी उठाया, प्यार से पुचाकारा
नीचे उतारा, फिर उन के नाम का बुलंद हुआ नारा
उनको भी , सलाम साहब..........
कह गये है फिर आयेंगे
जीत जायेंगे, सरकार बनायेंगे, हमारी ग़रीबी मिटायेंगे
है अब बस यही एक आस
कि पांच सालों बाद जब वो आएं
तब तक हम नरकंकालों में बची रहे सांस
तबतक के लिए .................
सलाम साहब............

--रवि मिश्रा




ऐ देशवासिओं इन्हें संभालो

ऐ देशवासिओं
इन्हे संभालो
इन नन्हे नाज़ुक बच्चों को
जो बच्चे भूखे मरते हैं
जो बच्चे घर-घर फिरते हैं
जो बच्चे अंधियारे में है
ऐ देशवासिओं
इन्हें संभालो
यही देश की आन है
यही देश की शान है
यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा

--संगीता सेठी




आज़ादी के बाद भी, इन्कलाब न हो सका,
हमारे बच्चों के वास्ते, एहतसाब न हो सका
मासूम भला क्या जानें, हयात की दुशवारियाँ,
कलम, दवात, किताब का, हिसाब न हो सका
एक मासूमियत ही, झलकती चेहरे पे,
किसी हरे-भरे चमन का, गुलाब न हो सका
ज़िन्दगी तीरगी में, क्या होगा हासिल,
अपने घर को रौशन करे, वो आफताब न हो सका
एक रद्दी चीज़ कोई, जैसे किसी घर की,
सड़क पर पड़ा संग, दुरे नायाब न हो सका
माना के ये वक़्त, बच्चों की मस्ती का,
बिना तालीम के कोई, कामयाब न हो सका
आज भी बरहनगी, देखी तंग गलियों में,
बदन ढकने का पूरा, खवाब न हो सका
मेरे मुल्क की तरक्की में, कई परेशानियां "रत्ती"
तालीम का बड़ा दायरा, दस्तयाब न हो सका
शब्दार्थ:
एहतसाब = प्रजा की रक्षा के लिये व्यवस्था करना, हयात = जीवन
दुशवारियाँ = कठिनाईयाँ, तीरगी = अन्धकार, आफ़ताब = सूर्य, संग = पत्थर
दुरे नायाब = अमूल्य मोती, तालीम = शिक्षा, बरहनगी = नग्नता,
दस्तयाब = प्राप्त

--सुरिंदर रत्ती




गरीब...नाम तो सुना होगा,
बड़ी आसानी से तुम स्वीकार गये,
की बड़े बड़े देशों मे ऐसी
छोटी छोटी बातें होती रहती है,
ये गरीबी,भूखमरी,ये कंगाली
एक आदत बन चुकी है,
तुम्हारे लिये भी,मेरे लिये भी,
हमे इस कदर आदत हो गयी है,
आज गरीबी दिखती है
हमारी नज़र में,हमारे अंदाज़ में,
और तुमको आदत पड़ चुकी है
इसको आदतन नज़र अंदाज़ करने की।
लेकिन क्या करूँ हाय
हमारे भी दिल में कुछ कुछ होता है,
ये बेहया सी अभिलाषाएँ,बेशरम से सपने,
हमारी झोंपड़ियों में,कभी बंजर पड़े खेतों मे
बेरोकटोक आते जाते रहते है,
और जब ये ख्वाब छटपटाते है,
तो हमारे बाबा हमे बताते है,
ये गरीबी अपने लिये आज
एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है,
इस समाज ने हमे ऐसा रावण बना डाला है
जो लाख चाहे,ये रेखा पार नही कर पाता।
इंसान एक बार जीता है,एक बार मरता है,
कहते है बस एक बार प्यार करता है,
इसी तरह एक ही बार आता है बचपन,
बचपन,एक ऐसा जादूगर,
जो जागी आँखों से ख्वाब दिखाता है,
बचपन एक ऐसा सम्मोहन,
जो हमे हमारी सीमाएँ भुलाता है,
एक गरीब और एक अमीर बच्चे के लिये
ज़मीं और आसमाँ की दूरी में फ़र्क नही होता,
ये बचपन ही तो है जो
अभाव रहित और अभाव सहित दोनो जीवन मे
उड़ान और उत्थान के अरमान जगा सकता है,
इसी माया,इसी मोहपाश,इसी सम्मोहन,इसी जादू
मे हम जकड़े हुए है,छूटना भी नही चाहते,
कयोंकि ऐसे ही खुश है हम,
कभी ये सोचके की हम खुश है,
कभी ये सोचके की कभी हम खुश होंगे।
हाय हाय रे हाय ये इंसा,हाय हाय रे हाय,
तुम कौन होते हो फ़ैसला करने वाले,
कि हम जीवन भर खुश नही रह सकते,
मूर्ख अमीरजादे! कमी हममे नही,
तुममे, तुम्हारी व्यवस्था में है,
देश का भविष्य हम भी है
पर नंगे खड़े है,बेआबरू से,
लेकिन ये बचपन हमे याद दिलाएगा,
हम भी चहकना,मुस्काना जानते थे,
कल अगर रोटी ना मिली तो आज को याद करेंगे,
जन भूखे पेट खेतों में भागते खेलते रहते है।
कोई भारत उदय हमे फ़ील गुड नही करवाएगा,
हमारे मन की शांति हमारे मन मे है,
आसमाँ की छत के नीचे बैठा हर इंसान
एक,दो,तीन,चार कितनी भी रोटियाँ खाने वाला,
खुश रहेगा,हंसेगा,इस खिलखिलाते बचपन की तरह,
कुछ कुछ होता है दोस्त...
तुम नही समझोगे !!

--सजल प्यासा




भारत माता के हम हैं लाल
मस्त बेफिक्र अल्हड़ सा है जीवन
फूल सा खिलखिलाया बचपन
नफरत भेदभाव न करते हम
एकता का सौरभ लुटाए हम
भारत माता के हम हैं लाल
हमीं में छिपे गांधी इंदिरा लाल
सम्प्रदायों की तोड़ें दीवार
धर्मनिरपेक्षता की हम हैं शान
संसार के हम हैं सूरज चॉंद
भारत माता के हम हैं लाल
गाँवों में बसा है हिंदुस्तान
मैत्री की रिक्शा पर हम सवार
पैट्रोल बचत का रच इतिहास
प्रदूषण मुक्ति का दे पैगाम
भारत माता के हम हैं लाल
इनके जज़्बे को मंजु करे प्रणाम
जयहिंद का गा रहें जयगान
भविष्य की प्रगति विकास के प्राण
इनसे बनता प्यारा हिंदुस्तान

--मंजू गुप्ता




अधनंगी तलवारे
जीवन रथ पे
खड़े शहर के
अधनंगी तलवारे देखो.
भारत माँ को
बेशर्म हाथों से आये बचाने
नए सहारे देखो.
सोच नयी है, रंग नया है
छा जाने का ढंग नया है
सागर में अभी जैसे
फूट पड़े फ़व्वारे देखो.
सरकारे तुम आ जाते हो
दान हमारे ले जाते हो
अ़ब न सोचो ये सब होगा
हमने आँखे खोल रखी है
हाथों में बारूद भरी है
तुम नजराने अब नए हमारे देखो..

--सौरभ कुमार




बचपन
आधे भारत का सच है,
पाश कालोनियो के पीछे से होकर -
एक गली जाती है, जहाँ
गंदगियो के बिच, जिन्दगी की -
जद्दोजहद जारी रहती है जीवन पर्यन्त........
बार - बार कोशिश करते है कि-
कब हम , झुग्गियो से सेक्टरो और
अपार्टमेन्टो मे पहुन्च जाये सदा- सदा के लिये
इन गलियो को लाँघकर .
पर ,
हर कोशिश बेकार जाती है
दिल्ली वालो तक - आवाज नही पहुँच पाती है
१० के राष्ट्रकुल खेलो और रक्छा सौदो कि -
तैयारियो के शोर के बीच
आवाज
दबकर रह जती है.
मन्त्रालयो राहत की बाट जोहते,
कब निकल जाता है
बचपन
कूड़ा बीनते , रिक्शा खींचते........................

--अनुज शुक्ला




बदल रहा हे हिंदुस्तान, क्या तुमने कही देखा हे!
बदल रही हे तस्वीर गाँव की, क्या तुमने कही देंखी हे!
खो गया हे बचपन मेरा, क्या तुमने कही देखा हे!
कहाँ सो गयी तकदीर हमारी, क्या तुमने कही देंखी हे!
आती हे लहरें समुद्र में, क्यूँ पहुचती नहीं मुझ तक!
कहाँ खो जाती हे वो, या रास्ते में ही सो जाती हैं वो!
सरकार बनती हेई योजनाय बहुत, पर क्या तुमने उनको देखा हे!
क्या में कभी पढ़ पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
क्या में कभी तन डाख पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
लगता हे सारा बचपन यूँही नंगा गुजरेगा!
वक़्त तो गुजरेगा बहुत, पर गरीबी की जगह सिर्फ एक और गरीब ही गुजरेगा!
क्यूँ नहीं बुलाते तुम उसको, जो तन पर हमारे कपडा दे!
इस बुखे पेटको बहरने को, जो हमको थोडा खाना दे!
नहाने और धोने को एक गुसलखाना दे!
पर पक्की इत्टो का, छोटा मगर एक आशियाना दे!
यही सोचकर दोस्तों में यह रिक्शा लेकर जाता हूँ!
अपनी रूठी किस्मत को जगाकर लाता हूँ!
अपनी और तुम्हारी आँखों की उम्मीद बुलाकर लाता हूँ!
पर बतलाना सही-सही क्या तुमने हमारी अछि तकदीर को अपनी इन आँखों से देखा हे!

--परवीन अग्रवाल



नेता, चुनाव, राजनीति, लोकतंत्र, वोट और 13 कवि







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - लोकसभा चुनाव-लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव

अंक - पच्चीस

माह - अप्रैल २००९






३० अप्रैल २००९। आज हम सबसे बड़े लोकतंत्र के महोत्सव के तीसरे पड़ाव तक पहुँच गये हैं। ११ राज्यों के करोड़ों लोग लम्बी कतारों में खड़े होकर हमारे देश के भविष्य को चुन रहे हैं। और यहाँ हमारे कवि भी इसी चिन्तन में हैं कि किस तरह से हमारे देश को हर तरह से सम्पन्न बनाया जाये, एक क्रांति लाई जाये और हर कोई गर्व से कह सके "मेरा भारत महान"। जिस तरह हम नेताओं को उनका फ़र्ज याद दिलाते रहते हैं हम भी समझें कि वोट डालना हमारा अधिकार भी है और फ़र्ज़ भी। हमारे कवि "जूतों" के बारे में भी कह रहे हैं, राजनीति में घुस रहे बाहुबलियों की बातें भी कर रहे हैं। पिछले दिनों ही ’आवाज़’ के संचालक सजीव सारथी ने भी चुनावों के मद्देनजर अपनी बात रखी। आइये आज पढ़ते हैं हमारे कवियों को। मनाते हैं "लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव"।

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*** प्रतिभागी ***
सत्यप्रसन्न | मंजू गुप्ता | मुकेश कुमार तिवारी | प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध | शन्नो अग्रवाल | मुहम्मद अहसन | विवेकरंजन श्रीवास्तव | रचना श्रीवास्तव | संगीता स्वरूप | मनु ’बेतखल्लुस’ | डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी | आलोक गौड़-डा नीरज जैन-सुरिंदर रत्ती

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जमी झील में कंकड़ी, फेंक रहे हैं लोग।
क्यों हिलोर उठती नहीं, लगा रहे अभियोग॥
रोटी ठंडी आग पे, सेंक रहे अख़बार।
चाकू रखकर जेब में, बेच रहे बस धार॥
जिनके कांधे है पड़ी, उनकी अपनी लाश।
वे भी दावा कर रहे, बदलेंगे इतिहास॥
करवट ली है वक्त ने, रही न अब वो बात।
जीत रहे खरगोश अब, कछुए खातॆ मात॥
गठबंधन तो हो गया, पर रिश्ते बेमेल।
चली छोड़कर पटरियां, सम्बंधों की रेल॥
कल तक जो हरते रहे, संविधान की चीर।
वो फिर लिखने जा रहे , हम सबकी तकदीर॥
कीचड़ में लिपटे हुए ,चेहरे सभी समान।
किससे हैं महफूज़ हम, सांसत में है जान॥
हर अंधे धृतराष्टृ को, सिंहासन की चाह।
होता हो फिर क्यों नहीं, चाहे देश तबाह॥
संदेहों की जेल में, आशाएं हैं कैद।
तिस पर दुर्दिन हैं खड़े. पहरे पर मुस्तैद॥
असमंजस में आज है, फिर से अपना देश।
चुन लें ख़ूनी सन्त या, फिर डाकू दरवेश॥

--सत्यप्रसन्न





देखो आता पाँच साल बाद चुनाव
होती नाव उम्मीदवार की आर पार
आया भारत के लोकतंत्र का महापर्व
हमें इस हथियार पर होता महागर्व

सत्ता और विरोधी निर्दलीय करें प्रचार
आपस में कटू वाणियों में करते प्रहार
जूता फेंक का देखो आया है व्यवहार

रैलियों में भीड़ जुटाने आते फिल्मी स्टार
भाषण में भूल जाते उम्मीदवार का नाम
पार्टियों का उड़ाते खूब माल
वोट नोट की खेलते चाल

करो मंजु सही मतदान
बने सर्वश्रेष्ठ सरकार
जिससे हो देश का विकास
दूर हो भ्रष्टाचार बेरोजगार

--मंजू गुप्ता





प्रजातंत्र के पर्व पर, होत शाही स्नान ।
सभी प्रजाति कूद पड़ी, खूब रचावै स्वांग ॥

लाऊडस्पीकर पर हो रहा, यश-कीर्ती गान ।
छुटभैये गाल बजाकर, पा रहे सम्मान ॥

लालू पीले हो गये, हुये मुलायम सख्त ।
दोऊ लारि टपिका रहे, देखि ताज-ओ-तख्त ॥

पासवान पांसे चले, अमर चलावै दांव ।
शरद हूँकारी भर रहै, होवत कांव-कांव ॥

माया ठहरी मायावी, खूब अलापै राग ।
छींके पर अटकी नज़रें, कब जागेगें भाग्य ॥

सांप सूंघ गया वाम को, हुआ तीसरा फैल ।
चौथे की तैयारियाँ, खूब चला यह खेल ॥

अड़वाणी रथ लै भटिकै, छेड़े अपनी तान ।
भैरों रूठे रह गये, वरूण चलावै बाण ॥

हाथ हैं तरसे साथ को, कितै ना दीखे ठौर ।
सत्ता सुख की चाह में, भटकै चारो ओर ॥

राहुल धूल फांक रहै, हुईं सोनिया त्रस्त ।
राजनीति भगवान बचाये, रहैं मुकेश मस्त ॥

ढोल बजै ताली बजी, गलियन होय पुकार ।
नेता देहरी लाँघ रहैं, होवे जय-जयकार ॥

खुद ही माला पहनकर, जोड़े दोनो हाथ ।
वोट माँगते फिर रहैं, जिनके सिर पर ताज ॥

साड़ी बँटी दारू बँटी, और कम्बल का ढेर ।
चला रहै सब दांव-पेंच, ये कुर्सी के शेर ॥

नोट-वोट का घाल-मेल, चलेहिं सालों साल ।
नेता गब्बर हो गये, जनता भई कंगाल ॥

वादों की बौछार है, नारों की बरसात ।
यह मौसम की बात है, बाद किसे है याद ॥

फिर बारी पर ठगी गई, जनता देखे राह ।
लूटने फिर अईहैं, पाँच बरस के बाद ॥

जाति पाँत भाषा धर्म, ने बाँट दयौ इंसान ।
वोटरलिस्ट में सिमट गई, अब उसकी पहचान ॥

भाग्य बंद पेटी हुआ, उपर चढती साँस ।
रोज मनौती कर रहे, डगमग है विश्वास ॥

लात चली घूंसे चले, हो जूतम-पैजा़र ।
हिस्ट्रीशीटर देश के, बन गईले सरकार ॥

--मुकेश कुमार तिवारी




राजनीति से उड़ गया, देश प्रेम का रंग
छिड़ी हुई है दलों में सिर्फ स्वार्थ की जंग

खेल कर रहे सभी दल चुप जनता के साथ
करते बस बातें बड़ी दे भाषण दिन रात

पिछले अनुभव से गया खो मन का विश्वास
बातों मे सच्चाई कम है ज्यादा बकवास

लोगों में क्यों रुचि रहे या श्रद्धा के भाव
वादे तो मीठे मधुर मन में मगर दुराव

स्वार्थ नीति ही प्रमुख है राजनीति में आज
उदासीन है लोग सब बेबस सकल समाज

देखा है जब जब हुये जहां भी कहीं चुनाव
सभी दलों में आपसी बढ़ जाते टकराव

जन सेवा औ " समझ का कहीं न सही प्रचार
सुनने आते प्रलोभन औ" बीमार विचार

धोखे ही खाने मिले हर चुनाव के बाद
मत दाता का मत हुआ बार बार बेकार

दुनियां बस उनकी बसी जिनकी हो गई जीत
काम किये सबने सदा वादों के विपरीत

है चुनाव चक्कर अजब इसमें फंसकर लोग
पाल लिये करते सभी लेन देन का रोग

लोकतंत्र की भावना का दिखता विद्रूप
पावन होते तंत्र भी घिस पिट हुआ कुरूप

इसी लिये मिलती खबर जूता मारी खून
जिसकी लाठी साथ हो उसका ही कानून

--प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध




ना चाहकर भी कुछ यहाँ
हम भी कहना चाहते हैं
हो रहा है कितना हल्ला
बस यह बताना चाहते हैं.

यह जोश, यह चीखना सब
बस केवल चुनावी बुखार है

जनता की भावनायों पर
यह एक सीधा प्रहार है.

हर किसी ने बना लिया है
यहाँ पर अपना-अपना hero
रात-दिन चीखते हैं मिलकर
इनमें कुछ अकल के zero.

कभी-कभी कुछ उम्मीदवार भी
उनके साथ प्रकट हो जाते हैं
पक्ष में करने को अपने वह
जनता के निकट हो जाते हैं.

भीड़ में घुसकर कभी वह
बच्चों की नाक पूँछ देते हैं
कभी रोते बच्चों को माँ की
गोद से लेकर चूम लेते हैं.

इस जानी-मानी सी कला में
यह सब लोग कितने दक्ष हैं

दिखाकर यह सारे कारनामें
जीत लेते जनता का पक्ष हैं.

कोई कहता इनमें बार-बार
'रामलला हम फिर आयेंगे
वादा करके जाते हैं आकर
मंदिर फिर यहीं बनायेंगें'.

या गरीब के घर रोटी खाने
कोई आंधी जैसा है आता
जगह बनाकर उसके दिल में
भगवान के जैसा बस जाता.

ना भूलो यह झूठे वादों से
दिल तोड़ने में माहिर हैं
समय आने पर भूल जायेंगे
सबको यह बात जाहिर है.

पता नहीं कहाँ-कहाँ से यह
इतने चमचे बटोर लाते हैं
फिर खुली जीपों में खड़े होकर
सब गला फाड़कर चिल्लाते हैं.

झूठे वादों से फुसलाकर यह
जनता को खूब फ़ूल बनाते हैं
उनके दिल जीत लेने के बाद
अपने वादों को भूल जाते हैं.

जेल में जाते हैं तब भी तो
इनका नाम ऊंचा ही होता है
वहीँ से ही बैठे-बैठे चमचों से
उन सबका सारा काम होता है.


वोट जिस किसी का भी हो
इतना भी सस्ता ना होगा
फिर भी आजमाने के लिए
कोई और रास्ता भी ना होगा.

--शन्नो अग्रवाल




सूरज सुबह उगता है
सुबह सुहानी लगती है
भारत बुलंद है

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल मुस्कराते हैं
भारत बुलंद है

आस्था हो न हो
मंदिर हैं , मस्जिद है
भारत बुलंद है

बिजली हो न हो
बिल तो आता ही है
भारत बुलंद है

सड़कें हो न हों
मंजिलें तो हैं
भारत बुलंद है

शिक्षक आये न आयें
शालायें हैं , छात्र भी
भारत बुलंद है

रोजगार मिले न मिले
स्वरोजगार योजना जो है
भारत बुलंद है

अपराध बढ़ते है तो बढ़ें
पुलिस है , अदालतें भी
भारत बुलंद है

उद् घाटन की नौबत आये न आये
शिलान्यास तो हो रहे हैं न
भारत बुलंद है

आबादी आबाद हो न हो
६०० करोड़ वाले नेता आबाद हैं
भारत बुलंद है

मंहगाई घटे न घटे
मुद्रा स्फिति की दर तो घट रही है
भारत बुलंद है

आमदनी हो न हो
कर्ज लो ,खर्च करो
भारत बुलंद है

उम्मीदवार पसंद हो न हो
वोटर हो तो वोट करो
भारत बुलंद है

--विवेक रंजन श्रीवास्तव




नेता बुद्धिमान हत्यारे होते हैं
वो शारीर नहीं मारते
बड़ी चालाकी से
लेलेते है हमारा वो समय
हमारे वो शब्द ,हमारी वो आवाज़
जिसमे हम रहते हैं .

हमारे छोटे छोटे सुखों की
छाँव ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं
हमारे दुखो और जरूरतों की गुमटियाँ
बिठा देते हैं पहरे
उसके मुहाने पर

सब्ज बाग कुछ यूँ दिखाते हैं
स्वर्ग यहीं होगा
हम मान जाते हैं
वादों को
कपट जाल तले बिछाते हैं
किस्मत के मारे
हम जब इसमें फस जाते हैं
तब पर हमारे क़तर देते हैं

कहते हैं झूठ
पर कुछ इस तरह
के वो हमारी ही
अवाज लगने लगता है
सत्ता में आते ही
उनका सच होता है बेनकाब
और ठगी जनता
तलाशती है नया सहारा

हमारे शब्द
यदि उनके खिलाफ हों
उसका फंदा वो हम पर ही कसते है
और उसी से कर देते हैं
हमारी हत्या

--रचना श्रीवास्तव




लोकतंत्र का उत्सव
मना रहे इस बार
जनता नेताओं से
खाये बैठी है खार .
जनता के हाथ में
आ गया एक हथियार
जूते से हैं लैस सब
चलाने को तैयार .
नेताजी अब सोच रहे
कैसे होगा बेडा पार
भरी सभा में डर रहे
क्या रखें अपने विचार ?
जनता से कर धोखा
और करके अत्याचार
आज खड़े हैं आ कर वो
जूते का पहने हार .
त्रस्त हुई अब जनता
नेताओं पर कर विश्वास
पर नेताजी घूम रहे
लेकर जीत की आस .
कोई नहीं है ऐसा नेता
जो सुने जनता की पुकार
जनता तो ठगी ही जायेगी
आये कोई भी सरकार ..

--संगीता स्वरूप




रैली ,परचम और नारों से कर डाला बदरंग
शहर वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल
कैसे छांटें इन चेहरों में अपनी मर्जी का लीडर
जीत के बाद सभी कर देते हैं पब्लिक का दम बेहाल

--मनु ’बेतखल्लुस’




ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

नेता पहुंचें गली गली बात बनावें बड़ी बड़ी
रात का सपना दिन माँ दिखलावें, लगाएं वोट की गुहार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बाँट बाँट के जाति बिरादरी सब अपना उल्लू सीधा कीन्हिन
खड़ी किहिन दौलत कोठी अपनी लै के वोटवा हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

जस त्यौहार खतम चलिहैं नेता जी दिल्ली, बनिहैं मंतरी
कोठी बंगला गाडी छोड़ के फिर कहाँ झोपड़ी माँ हमार !
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बीत गयी उमरिया अपनी देखत सब चुनाव का हाल
न गाँव माँ कछु बदला न बदली किस्मतिया हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

--मुहम्मद अहसन




लोक सभा चुनाव
लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव
चुनाव आयोग सशक्त,
आचार-संहिता तोड़ते
राजनीति के भक्त,
चुनाव-घोषणा पत्र
जनता रूपी प्रेमिका को
बेबफा-प्रेमी नेता का प्रेम-पत्र
तारे तोड़कर लाने के वादे,
लूटकर प्रेमिका को,
प्रेमी वादे भुला दे,
बेच दे उसको, वैश्यालय पहुँचा दे।
चुनाव-उत्सव
होली का त्योहार,
रंग-बिरंगे रंगों का उपहार,
सभी उड़े रंग
जनता रह गयी दंग
बचा केवल रंग काला
चुनाव-गंगा बन गई नाला
सभी दल फँसे दल-दल में,
नेताओं के चेहरों पर
पुती है कालिख
आओ वोटर!
वोट बेच, कीमत वसूल
थोड़ी कालिख,
अपने चेहरे पर भी मल
अब नहीं रहा तू नाबालिग
वोट डाल चुनाव से हों फारिग।
संसदीय चुनाव
दीपावली का त्योहार
दीपों का उपहार,
दीपक का तेल हुआ गुमनाम,
स्विस बैंक के खातों में,
वोटर आते बातों में,
बाती को भी हड़पने की लगी,
नेताओं में होड़
तू टिकिट के लिए लगा दे दौड़,
जनता को छोड़।
दीपावली है,
चुनाव का जुआ खेल,
बाती को लगा दे दाँव पर,
जरा सा लगा के तेल
भारतीय, नारी, संस्कृति व विचार,
बचे हैं दाव पर लगाने को यार,
पश्चिमी-पारदर्शी-आकर्षक-नग्नता के आवरण में लपेट,
लगा दाव पर, भर ले अपना पेट।
संसदीय चुनाव,
रक्षाबंधन का त्योहार,
बाँधकर रक्षासूत्र,
जनता सौंपती लोकतंत्र की रक्षा का भार,
नेताओं के लिए रक्षासूत्र,
चुनाव तक की दरकार,
तोड़ देंगे चुटकी में,
बस बन जाए सरकार।
रक्षासूत्र ही बनेगा कामसूत्र,
रक्षासूत्र बाँधने वाली को ही
अंकशायिनी बनने को कर देंगे मजबूर,
वस्त्रों को कर तार-तार,
इसी के कर-कमलों से पहनेंगे,
जीत के हार।
विजयादशमी होगी,
चुनाव-परिणामों की घोषणा,
वोटर की मजबूरी है,
किसी ना किसी को,
वोट देना जरूरी है
यदि बहुमत नहीं मिलेगा,
सभी हो जायेंगे सवार
तभी सत्ता का रथ चलेगा
सभी एक-दूसरे के गले लगेंगे,
हम मिलकर सहयोग करेंगे,
यूपीए,राजग,तीसरा,चौथा या पाँचवा मोर्चा,
और सभी दल स्वतंत्र,
दल ही नहीं निर्दलीय उम्मीदवार भी
लोक को छोड़ पीछे,
अपनायेंगे सत्ता-तंत्र।
सभी का धर्म एक है,
सत्ता सभी की टेक है।
तंत्र पहनायेगा,
इन्हें जीत के हार,
जनता भले ही हो बेजार,
ये धर्म की रखेंगे लाज,
धार्मिक पर्यटन बढ़ायेंगे,
धार्मिक-स्थलों पर शराब पार्टी मनायेंगे,
होगें नग्न-नृत्य,
सभी वोटर बन जायेंगे भृत्य,
इनकी तिजोरी देखना,
वही होंगे इनके कृत्य,
जनता का हो राम नाम सत्य।

--डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी




हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

तब कि बातें और थी तब लोगों को ज्ञान था
कथनी और करनी का अंतर गाँधी जी को ध्यान था
बच्चे से गुड़ खाना छोड़ो उस दिन तक ना बोले थे
जिसदिन तक गुड़ खाने का खुद बापू को अरमान था

अब लालटेन वाले नेता बैठें एसी दरबार में
साइकिल वाले नेता भी चलते हैं मोटर कार में
अब काटें भी मिलते हैं कुछ फूलों के हार में
अब पंजे तक से पिसता है बस वोटर हर सरकार में

चिकनी चुपड़ी बात करे जो कभी करे न काम

जगह से अपनी हिले नहीं जो मिले न जबतक दाम
पांच साल में एक बार जो करता हो सलाम
याद नहीं रखता उनको जो आते उसके काम
पहचान ही जिसकी ये हो जो नहीं आदमी आम
अपनों तक का सगा नहीं जो नेता उसका नाम

भरे पेट जो रोज़ लगाते नैतिकता के नारे
और सबको ये बतलाते हैं कि क्या अच्छा है प्यारे
वो शायद ना चल पाएँ खुद अपनी ही बोली राह पर
गर मिल ना पाए उनको उनका खाना उनकी चाह पर
भूखे रहना क्या होता है जबतक नहीं नेता जानेगें
क्या भूख से लड़ने वालों की बातों को वो मानेगें

हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

--आलोक गौड़




रथ बताते फिर रहे चालाक मोटर की जगह
राजनेता फिट हुये हैं आज जोकर की जगह
दृशय मिश्रण आ गया है अब नई तकनीक में
ले रहे हैं 'गांधी' मुरली मनोहर की जगह
शुष्क रेगिस्तान की संभावना दिखने लगी
इस चमन की बुलबुलों को अब सरोवर की जगह
पोल क्या खोलेंगे पोलिंगबूथ शिक्षा के बिना
कुछ भगत सिंह चाहिये हैं आज वोटर की जगह

--डा नीरज जैन



भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

मुँह उठाये फिर चले आये,
छुटभैये, चमचों से पर्चे बटवाये,
रंग-बिरंगे झण्डे फहराये,
इक्के-दुक्के काम गिनवाये,
मांग रहे हमसे मतदान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

पुराने वादे न दोहराओ,
घिसे-पिटे भाषण न सुनाओ,
धर्म का ज़हर न फैलाओ,
पाँच साल का हिसाब बताओ,
कितने किये अच्छे काम,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

भाजप, कांग्रेस, समाजवादी,
ओढे रहो भईया सफेद खादी,
हर काम की तुमको आज़ादी,
होती है होने दो बर्बादी,
इसका है किसी को अनुमान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

सुस्त क़ानून व्यवस्था हमारी,
तिस पर महंगायी, बेरोजगारी,
सुरक्षा, शिक्षा की कमी भारी,
रिश्वत भी लाइलाज बिमारी,
पिस रही जनता हैं सब परेशान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

फेल हो तुम चौथा दर्जा,
फिर भर दिया तुमने पर्चा,
कौन भरेगा चुनाव का खर्चा,
देश पर बढेगा भारी कर्जा,
ख़ूब रौशन किया भारत का नाम,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

कौन सुखी है बोलो आज,
एक सपना है रामराज,
राम भरोसे सब कामकाज,
खीझ है मन में, हैं सब नाराज़,
"रत्ती" बचाये सबको भगवान,
भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

--सुरिंदर रत्ती



लल्लू कभी बड़ा नहीं हुआ


यूनिकवि प्रतियोगिता से कविताओं को प्रकाशित करने का क्रम ज़ारी है। चौथी कविता हिन्द-युग्म पर काफी महीनों से सक्रिय कवि मुहम्मद अहसन की है।

पुरस्कृत कविता- लल्लू

लल्लू छोटे क़द का सांवला सा आदमी था
अधेड़
न दुबला न मोटा
बस विनम्रता और समर्पण की प्रतिमूर्ति
चेहरा नि: स्पृह, निर्भाव और निर्द्वंद
बस कभी-कभी बड़ी अजीब सी विकेन्द्रित मुस्कान बिखेरता हुआ;
लल्लू का भगवान और अफ़सर पर बराबर का विश्वास था
लल्लू का मानना था
कि अफ़सर की कलम में बड़ी ताक़त होती है
लल्लू साहब का चपरासी था
पर था बड़ा भला आदमी
रात दिन साहब के साथ रहता था
साहब कोई भी हों
वह लल्लू के लिए देवता होते;
लल्लू उन की रात दिन सेवा करता
दौरों में साहब का पूरा ध्यान रखता
कहीं कोई चूक नहीं हो सकती थी;
सब से बाद में और सब से कम खाता
कहीं भी सो जाता
कुछ भी ओढ़ लेता
न उसे मच्छर तंग करते न मक्खियाँ
लल्लू शक्ल से भी लल्लू था
लगता था वह लल्लू के ही रूप में पैदा हुआ था;
लल्लू कभी बड़ा नहीं हुआ
वह बचपन, जवानी और अधेड़पन में लल्लू ही था;
लल्लू ने जिंदगी में कभी गुस्सा नहीं किया
और न कभी किसी से कुछ माँगा,
विरोध और क्रान्ति उसे छू भी नहीं गए थे
लल्लू छोटा आदमी था
लेकिन सपने बड़े-बड़े देखता था,
कभी सपने देखता कि
शहर के एक कोने में छोटा सा पक्का मकान बनवाएगा
गाँव से परिवार को ला कर शहर में रखेगा
छोटे लल्लू को पढ़ा लिखा कर इंटर पास करवाएगा
और फिर साहेब से कह-सुन कर
कहीं क्लर्की में लगवाए देगा
इस बीच जी.पी. एफ़. के लम्बे हिसाब-किताब उस के दिमाग में चलते रहते;
इस तरह बड़े-बड़े सपने देखते-देखते
लल्लू अक्सर ऊंघ जाता;
सरकारी गाड़ी चलती रहती
लल्लू ऊंघता रहता
सब से पीछे की सीट पर सामान के ऊपर बैठा-बैठा,
घुटने सिकोड़े


प्रथम चरण मिला स्थान- उन्नीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- चौथा


पुरस्कार- हिजड़ों पर केंद्रित रुथ लोर मलॉय द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक 'Hijaras:: Who We Are' के अनुवाद 'हिजड़े:: कौन हैं हम?' (लेखिका अनीता रवि द्वारा अनूदित) की एक प्रति।


उस वर्ष


फरवरी माह की प्रतियोगिता से हम शीर्ष १० गीतों का प्रकाशन कर चुके हैं। हमने उद्‍घोषणा की थी कि इन १० कविताओं के अतिरिक्त हम मोहम्मद अहसन की कविता भी प्रकाशित करेंगे, जो ११वें स्थान पर रही और निर्णायकों ने खूब सराहा।

पुरस्कृत कविता- उस वर्ष.......

उस वर्ष न ऊंची पहाड़ियों पर बर्फ़ पड़ी
न निचली घाटियों में फूल खिले
न चीड़ वन में आँधियाँ आयीं
न देव वन में चांदनी छिटकी
न बुरांस के जंगलों में चटक रंग छिटका
न मैदानों में सरसों फूली
न पलाश वन में अग्नि फूटी
न मरुस्थल में मधु बरसा
न समुद्र की लहरें चट्टानों से टकराईं
न गंगा की लहरों से संगीत उपजा
उस वर्ष तुम्हारा प्रेम मुझ से रूठा हुआ था


प्रथम चरण मिला स्थान- बारहवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- ग्यारहवाँ


मोहम्मद अहसन का अतीत


इस बार दूसरे स्थान पर जिस कवि की कविता आई है, वे हिन्द-युग्म को बहुत लम्बे समय से पढ़ते रहे हैं। पढ़ने, लिखने, साहित्य, कला, प्रकृति भ्रमण आदि में रुचि रखने वाले मुहम्मद अहसन वर्तमान में भारतीय वन सेवा के लखनऊ क्षेत्र के मुख्य वन संरक्षक हैं।

पुरस्कृत कविता- अतीत

पुल तोड़ दिया
नाव जला दी
संपर्क ध्वस्त कर दिए,
फिर भी तो तुम्हारी यादें,
प्रति दिन ही अंधड़ की भांति आती रहीं
और मन को किसी न किसी मरुस्थल में उडा ले जाती रहीं,
कभी दर्द के
कभी पीड़ा के
कभी जलन के;
और मैं वेदना के बवंडर में तिनके की भांति भटकता,
प्रेम का दंड पाता ही रहा



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ६॰५, ६॰९
औसत अंक- ५॰८
स्थान- पाँचवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ६, ५॰८ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰२६६
स्थान- छठवाँ


अंतिम चरण के जजमेंट में मिला अंक-
स्थान- दूसरा
टिप्पणी- छोटे पहर की गहरे भावबोध को आकार देती हुई एक कविता। मानवता और प्रेम की राह में चाहे जितने रोड़े डाले जायें, लेकिन इसकी अजस्त्र धारा मन के किसी कोने बहती ही रहगी। कविता का केन्द्रीय भाव कविता को गहराई प्रदान करता है।


पुरस्कार और सम्मान- ग़ज़लगो द्विजेन्द्र द्विज का ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' की एक स्वहस्ताक्षरित प्रति।