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बच्चे-देश का भविष्य । चित्र और रचना (भाग-6)







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - अनुज अवस्थी

अंक - छब्बीस

माह - मई 2009






इस बार के काव्यपल्लवन के लिये अनुज अवस्थी ने जिस चित्र को भेजा उस चित्र को देखते ही कईं शे’र, कईं गीत याद आ जाते हैं। एक नज़र डालें..

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के..ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की..इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की..

और यह गीत तो सभी को याद होगा..

नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ...

रिक्शा चलाते बच्चों का चित्र एक दयनीय स्थिति दिखला रहा है। जिसमें आज की सच्चाई और बदसूरत भविष्य नजर आ रहा है। क्या आज की तारीख में इस तरह के गाने लिखे जाते हैं? क्या बच्चों का बचपन अब समाप्त हो चुका है? जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनके ऊपर अपने अभिभावकों की उम्मीदों का बोझ होता है और जो नहीं जा सकते वो? वे मजबूरी का बोझ ढोते हैं। उपर्युक्त गीत उन बच्चों को समर्पित हैं जिन्हें हम अपने देश का भविष्य कहते हैं। 25 प्रतिशत बच्चों को देख कर हम समझते हैं कि हम भारत-निर्माण कर रहे हैं पर 75 प्रतिशत को पता ही नहीं होता कि बचपन क्या है!!

तभी तो कवि भी बच्चों के इन हालातों पर ऐसी पंक्तियाँ लिख बैठते हैं:

बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम जैसे हो जायेंगे...

या फिर...

घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये...

हमारे पाठकों व कवियों ने भी मासूम बच्चों के ऊपर चंद पंक्तियाँ लिखकर अपनी भावनायें व्यक्त की हैं। लेकिन आप लोगों से एक गुजारिश है। आप केवल लिखे या पढ़े नहीं। इस देश के लिये कुछ ऐसा करें कि इन बच्चों का भविष्य सँवर सके। सरकार को दोष न दें। हमें स्वयं उठना होगा। हम चाहते हैं कि इस तरह के चित्र पर कभी काव्यपल्लवन न हो!!!



आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
मुकेश कुमार तिवारी | मनु ’बेतखल्लुस’ | एम ऐ शर्मा " सेहर" | रचना श्रीवास्तव | मुहम्मद अहसन | शन्नो अग्रवाल | सीमा सिंघल | रवि मिश्रा | संगीता सेठी | सुरिंदर रत्ती | सजल प्यासा | मंजू गुप्ता | सौरभ कुमार । अनुज शुक्ला | परवीन अग्रवाल ।

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






मैंने,
इन्हें नही देखा कभी स्कूल जाते
रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे
पीठ पर लादे हुये बोझ
या दौड़ते तितलियों के पीछे
पेट भर खाने के बाद

मैंने
जब भी देखा इन्हें
तो सीखते मिले जिन्दगी की पाठशाला में
पीठ पर कैसे लादा जा सकता है बोझ
और कितनी दूर तक ढोया जा सकता है
एक ही साँस में बिना रूके

बाप,
के कदमों की छाप पर
रखते हुये पैर
सीखा रास्ता घर से कितनी दूर तक जाता है
और कैसे लौटता है
जब सूरज उबासिया ले रहा होता है
या चूल्हे में मचल रही होती हैं लकड़ियाँ

माँ,
के हाथों की लकीरों को
यह पढ रही होती हैं
गोबर की छाप में कंडों(उपलो) पर
या लिख रही होती हैं अपना नाम
राख के ढेर में उंगली से उकेरते हुये
और ढाल रही होती हैं
आदत,
बर्तन मांजते हुये

बचपन,
शायद इसी को कहते होंगे
ऐसा यह भी समझते हैं
और मैं भी
हो सकता है आप नही?

--मुकेश कुमार तिवारी




कोई बोले नेता कल के,
और कोई बतलाये मवाली
खस्ता बचपन देख के सोचा
क्या हरियाली, क्या खुशहाली
हो सकता है अब दिन बदलें,
है सरकार बदलने वाली
पेट को सूखी रोटी दूभर
आँखों में पकवान खयाली

खेंप नए वोटर की है ये,
जिस्म उघाडे, पेट सवाली

--मनु ’बेतखल्लुस’




ये देश के नंगे ,भूखे बच्चे
कुम्हलाये सहमे बदरंग से बच्चे
खाने का ठिकाना ना पहनने की सुध
नादाँ अनबूझ पहेली से बच्चे......
जरा इनके चेहरे की रौनक तो देखो
हर हाल मुस्कुराता ये जीवन तो देखो
हँसी शरारत ये मौज ये मस्ती
मासूमियत का ये मंज़र तो देखो......
ममता के आँचल को तरसते सिसकते
सहारे को इक हाथ ढूढते झिझकते
गर इक हाथ हम ही हैं बढाते
क्या देश के ये किसी काम न आते ??

--एम.ए. शर्मा




जीवन की जरूरतों से खेलता हूँ में
धुप के साये में
पलता हूँ मैं
बह न जाये आँखों से दर्द मेरा
मुस्कान एक चेहरे पर
ओढ़ लेता हूँ मै
अर्ध नंग्न है भविष्य भारत का
हुक्मरानों से ये बे खौफ
कहता हूँ मै
चिपका के बच्चों को जब ठंडे मे सोते हो तुम
चिल चिलाती धुप में तब
ठेला खीचता हूँ मै
सपने सूख के जब झड़ने लगते हैं
उम्मीद की नमी से
उनको सीच लेता हूँ मै
आज हो जायेंगे दवा के पूरे पैसे शायद
यही सोच हर रोज
घर से निकलता हूँ मै
जेब खाली पेट खाली फिर भी
नेताओं और ललित को
सलूट करता हूँ मै
देख मेरी तस्वीर कविता लिखने वालों
कुछ उम्मीद तो
तुम से भी रखता हूँ मै

--रचना श्रीवास्तव




तस्‍वीर में ही नहीं हम तो सदा साथ रहते हैं,
मुश्किलें कितनी भी आयें सदा हंसते रहते हैं ।

कोई आकर हमें अभी डांट भी जाएगा पर हम,
इन बातों को अब दिल से नहीं लिया करते हैं ।

पल कैसे भी नाजुक हों नन्‍हीं सी मुस्‍कान से,
हम अपने संग सब को बहला लिया करते हैं ।

कोई सपना अधूरा ना रहे साथ विश्‍वास के,
एक कदम लक्ष्‍य की ओर बढ़ा लिया करते हैं ।

वंदन संग अभिनन्‍दन मातृभूमि का खेल खेल में,
साथियों को अपने सदा सिखला दिया करते हैं ।

--सीमा सिंघल




खींसें निपोर लो
मसखरी कर लो
हंस लो
उचक फांद लो दो चार साल
अंततः तो जिंदगी की गाडी में जुतना ही है
किसी दफ्तर में चपरासी
कोई छोटी मोटी दूकान
कोई छोटा मोटा धंधा
कोई छोटी मोटी अपराध की जिंदगी
क्षुद्र जीवन , क्षुद्र संघर्ष
शादी ब्याह बच्चे
और बहुत जल्दी यह चक्र भी पूरा

दर असल मेरे कहने के पीछे एक कारण है
देश की किसी पिछली गली के गड्ढे में
उगे बच्चे चमत्कार नहीं करते है ,
सशक्त हस्ताक्षर नहीं बनते हैं ,
कहीं हजारों में ही कभी कोई विराट बरगद हो पाता है

देश के जनतंत्र को सलाम !
परन्तु परम्परागत व्यवस्था में ,
चपरासी का बेटा अमूमन चपरासी ही होता है,
धूल से धूल ही उगती है ,
और गोबर से गोबर ,

फोटोग्राफर साहेब के लिए भी तो तुम मात्र
फोटोग्राफी का ही तो एक अच्छा विषय हो ,
'मलिन बस्ती के हंसते कौतुक पूर्ण बच्चे '
न इस से अधिक न इस से कम

--मुहम्मद अहसन




ओ बाबू, ओ साहिब, ओ मेम साहिब
कब से यहाँ इन्तजार कर रहे हैं
किसी सवारी का
क्या आपको है कहीं जाना
अरे आप इधर आइये ना
बस कुछ पैसे मिल जाएँ तो
ले चलेंगे हम आपको
जहाँ भी है आपको जाना.

मेरा बापू घर पर बैठा रहता है बेकार
दिनभर फूंकता है बीडी
माँ कराहती है बीमारी से
भाई-बहन सभी मुझ पर हैं निर्भर
दवा के बिना, कभी अन्न के बिना
भूखे पेटों को मसोस कर हमें
जीना पड़ता है कभी-कभी
मेरे ही कन्धों पर टिका है सारा घर.

जिन्दगी घिसटती रहती है और
हमारी उम्मीदों का सूरज
हर सुबह उगता है पर
हर शाम के संग डूब जाता है
दो बख्त रोटी के लिये
ही तो मुस्कुराते हैं
इन रोटियों से जिंदगी चलने का
कितना अजीब सा नाता है.

बसंत- बहार आती है ऋतुओं में
हमारे जीवन में तो
आंधी, शीत और पतझर
हमेशा ही बने रहते हैं
पसीना टपकता है माथे से
नंगे पैरों, हांफते हुए
मेहनत-मजदूरी करते हैं
सबकी सुनते और सहते हैं.

दहकते हुए सूरज के नीचे
तपती दुपहरी और आंधी में
झम-झम बरसते पानी में
तरबतर भीगते हैं
अध ढंके गात लिये अरमानों
की सौगात लिये
हम पेट की खातिर ही तो
सारा दिन इतना बोझ खींचते हैं.

--शन्नो अग्रवाल




सलाम साहब
हमारा सलाम क़ुबूल करें
सलाम साहब
ये सलामी है नंगी तकदीर की
भूख झलकाती भारत की तस्वीर की
जो सालों में हमारे लिए गढ़ी गई है
पंचवर्षीय योजनाओं के तहत रची गई है
सलाम साहब................
आप आये तो अच्छा लगा
लेकिन आप को क्यों मै बच्चा लगा
मेरी उम्र तो उतनी पुरानी है
जितनी पुरानी इस गणतंत्र की कहानी है
सलाम साहब...............
ज्यादा कहां शिकायत है
शिकायत के कहां हम लायक हैं
कुछ खाने को लाते तो अच्छा लगता
अब बातों से पेट नहीं भरता
सलाम साहब...............
वैसे इस लोकतंत्र में हम सलामी ठोक जीने के रास्ते बनाते हैं
सो जनतंत्र में हम जनता सिर झुकाकर ही इसे बचाते है
हम भी झुका रहे हैं
मजबूरी है फिर भी मुस्कुरा रहे हैं
सलाम साहब.............
इस बार हमारी गलियों में कुछ लोग आये
भरोसे और वादे की नई खुराक़ खिला गये
गोदी में भी उठाया, प्यार से पुचाकारा
नीचे उतारा, फिर उन के नाम का बुलंद हुआ नारा
उनको भी , सलाम साहब..........
कह गये है फिर आयेंगे
जीत जायेंगे, सरकार बनायेंगे, हमारी ग़रीबी मिटायेंगे
है अब बस यही एक आस
कि पांच सालों बाद जब वो आएं
तब तक हम नरकंकालों में बची रहे सांस
तबतक के लिए .................
सलाम साहब............

--रवि मिश्रा




ऐ देशवासिओं इन्हें संभालो

ऐ देशवासिओं
इन्हे संभालो
इन नन्हे नाज़ुक बच्चों को
जो बच्चे भूखे मरते हैं
जो बच्चे घर-घर फिरते हैं
जो बच्चे अंधियारे में है
ऐ देशवासिओं
इन्हें संभालो
यही देश की आन है
यही देश की शान है
यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा

--संगीता सेठी




आज़ादी के बाद भी, इन्कलाब न हो सका,
हमारे बच्चों के वास्ते, एहतसाब न हो सका
मासूम भला क्या जानें, हयात की दुशवारियाँ,
कलम, दवात, किताब का, हिसाब न हो सका
एक मासूमियत ही, झलकती चेहरे पे,
किसी हरे-भरे चमन का, गुलाब न हो सका
ज़िन्दगी तीरगी में, क्या होगा हासिल,
अपने घर को रौशन करे, वो आफताब न हो सका
एक रद्दी चीज़ कोई, जैसे किसी घर की,
सड़क पर पड़ा संग, दुरे नायाब न हो सका
माना के ये वक़्त, बच्चों की मस्ती का,
बिना तालीम के कोई, कामयाब न हो सका
आज भी बरहनगी, देखी तंग गलियों में,
बदन ढकने का पूरा, खवाब न हो सका
मेरे मुल्क की तरक्की में, कई परेशानियां "रत्ती"
तालीम का बड़ा दायरा, दस्तयाब न हो सका
शब्दार्थ:
एहतसाब = प्रजा की रक्षा के लिये व्यवस्था करना, हयात = जीवन
दुशवारियाँ = कठिनाईयाँ, तीरगी = अन्धकार, आफ़ताब = सूर्य, संग = पत्थर
दुरे नायाब = अमूल्य मोती, तालीम = शिक्षा, बरहनगी = नग्नता,
दस्तयाब = प्राप्त

--सुरिंदर रत्ती




गरीब...नाम तो सुना होगा,
बड़ी आसानी से तुम स्वीकार गये,
की बड़े बड़े देशों मे ऐसी
छोटी छोटी बातें होती रहती है,
ये गरीबी,भूखमरी,ये कंगाली
एक आदत बन चुकी है,
तुम्हारे लिये भी,मेरे लिये भी,
हमे इस कदर आदत हो गयी है,
आज गरीबी दिखती है
हमारी नज़र में,हमारे अंदाज़ में,
और तुमको आदत पड़ चुकी है
इसको आदतन नज़र अंदाज़ करने की।
लेकिन क्या करूँ हाय
हमारे भी दिल में कुछ कुछ होता है,
ये बेहया सी अभिलाषाएँ,बेशरम से सपने,
हमारी झोंपड़ियों में,कभी बंजर पड़े खेतों मे
बेरोकटोक आते जाते रहते है,
और जब ये ख्वाब छटपटाते है,
तो हमारे बाबा हमे बताते है,
ये गरीबी अपने लिये आज
एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है,
इस समाज ने हमे ऐसा रावण बना डाला है
जो लाख चाहे,ये रेखा पार नही कर पाता।
इंसान एक बार जीता है,एक बार मरता है,
कहते है बस एक बार प्यार करता है,
इसी तरह एक ही बार आता है बचपन,
बचपन,एक ऐसा जादूगर,
जो जागी आँखों से ख्वाब दिखाता है,
बचपन एक ऐसा सम्मोहन,
जो हमे हमारी सीमाएँ भुलाता है,
एक गरीब और एक अमीर बच्चे के लिये
ज़मीं और आसमाँ की दूरी में फ़र्क नही होता,
ये बचपन ही तो है जो
अभाव रहित और अभाव सहित दोनो जीवन मे
उड़ान और उत्थान के अरमान जगा सकता है,
इसी माया,इसी मोहपाश,इसी सम्मोहन,इसी जादू
मे हम जकड़े हुए है,छूटना भी नही चाहते,
कयोंकि ऐसे ही खुश है हम,
कभी ये सोचके की हम खुश है,
कभी ये सोचके की कभी हम खुश होंगे।
हाय हाय रे हाय ये इंसा,हाय हाय रे हाय,
तुम कौन होते हो फ़ैसला करने वाले,
कि हम जीवन भर खुश नही रह सकते,
मूर्ख अमीरजादे! कमी हममे नही,
तुममे, तुम्हारी व्यवस्था में है,
देश का भविष्य हम भी है
पर नंगे खड़े है,बेआबरू से,
लेकिन ये बचपन हमे याद दिलाएगा,
हम भी चहकना,मुस्काना जानते थे,
कल अगर रोटी ना मिली तो आज को याद करेंगे,
जन भूखे पेट खेतों में भागते खेलते रहते है।
कोई भारत उदय हमे फ़ील गुड नही करवाएगा,
हमारे मन की शांति हमारे मन मे है,
आसमाँ की छत के नीचे बैठा हर इंसान
एक,दो,तीन,चार कितनी भी रोटियाँ खाने वाला,
खुश रहेगा,हंसेगा,इस खिलखिलाते बचपन की तरह,
कुछ कुछ होता है दोस्त...
तुम नही समझोगे !!

--सजल प्यासा




भारत माता के हम हैं लाल
मस्त बेफिक्र अल्हड़ सा है जीवन
फूल सा खिलखिलाया बचपन
नफरत भेदभाव न करते हम
एकता का सौरभ लुटाए हम
भारत माता के हम हैं लाल
हमीं में छिपे गांधी इंदिरा लाल
सम्प्रदायों की तोड़ें दीवार
धर्मनिरपेक्षता की हम हैं शान
संसार के हम हैं सूरज चॉंद
भारत माता के हम हैं लाल
गाँवों में बसा है हिंदुस्तान
मैत्री की रिक्शा पर हम सवार
पैट्रोल बचत का रच इतिहास
प्रदूषण मुक्ति का दे पैगाम
भारत माता के हम हैं लाल
इनके जज़्बे को मंजु करे प्रणाम
जयहिंद का गा रहें जयगान
भविष्य की प्रगति विकास के प्राण
इनसे बनता प्यारा हिंदुस्तान

--मंजू गुप्ता




अधनंगी तलवारे
जीवन रथ पे
खड़े शहर के
अधनंगी तलवारे देखो.
भारत माँ को
बेशर्म हाथों से आये बचाने
नए सहारे देखो.
सोच नयी है, रंग नया है
छा जाने का ढंग नया है
सागर में अभी जैसे
फूट पड़े फ़व्वारे देखो.
सरकारे तुम आ जाते हो
दान हमारे ले जाते हो
अ़ब न सोचो ये सब होगा
हमने आँखे खोल रखी है
हाथों में बारूद भरी है
तुम नजराने अब नए हमारे देखो..

--सौरभ कुमार




बचपन
आधे भारत का सच है,
पाश कालोनियो के पीछे से होकर -
एक गली जाती है, जहाँ
गंदगियो के बिच, जिन्दगी की -
जद्दोजहद जारी रहती है जीवन पर्यन्त........
बार - बार कोशिश करते है कि-
कब हम , झुग्गियो से सेक्टरो और
अपार्टमेन्टो मे पहुन्च जाये सदा- सदा के लिये
इन गलियो को लाँघकर .
पर ,
हर कोशिश बेकार जाती है
दिल्ली वालो तक - आवाज नही पहुँच पाती है
१० के राष्ट्रकुल खेलो और रक्छा सौदो कि -
तैयारियो के शोर के बीच
आवाज
दबकर रह जती है.
मन्त्रालयो राहत की बाट जोहते,
कब निकल जाता है
बचपन
कूड़ा बीनते , रिक्शा खींचते........................

--अनुज शुक्ला




बदल रहा हे हिंदुस्तान, क्या तुमने कही देखा हे!
बदल रही हे तस्वीर गाँव की, क्या तुमने कही देंखी हे!
खो गया हे बचपन मेरा, क्या तुमने कही देखा हे!
कहाँ सो गयी तकदीर हमारी, क्या तुमने कही देंखी हे!
आती हे लहरें समुद्र में, क्यूँ पहुचती नहीं मुझ तक!
कहाँ खो जाती हे वो, या रास्ते में ही सो जाती हैं वो!
सरकार बनती हेई योजनाय बहुत, पर क्या तुमने उनको देखा हे!
क्या में कभी पढ़ पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
क्या में कभी तन डाख पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
लगता हे सारा बचपन यूँही नंगा गुजरेगा!
वक़्त तो गुजरेगा बहुत, पर गरीबी की जगह सिर्फ एक और गरीब ही गुजरेगा!
क्यूँ नहीं बुलाते तुम उसको, जो तन पर हमारे कपडा दे!
इस बुखे पेटको बहरने को, जो हमको थोडा खाना दे!
नहाने और धोने को एक गुसलखाना दे!
पर पक्की इत्टो का, छोटा मगर एक आशियाना दे!
यही सोचकर दोस्तों में यह रिक्शा लेकर जाता हूँ!
अपनी रूठी किस्मत को जगाकर लाता हूँ!
अपनी और तुम्हारी आँखों की उम्मीद बुलाकर लाता हूँ!
पर बतलाना सही-सही क्या तुमने हमारी अछि तकदीर को अपनी इन आँखों से देखा हे!

--परवीन अग्रवाल



काव्यपल्लवन ने पूरे किये २ वर्ष







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - विवेक रंजन श्रीवास्तव

अंक - चौबीस

माह - मार्च २००९






हिन्दयुग्म को काव्यपल्लवन आयोजित करते हुए २ वर्ष पूरे हो गये हैं। मार्च २००७ से इसकी शुरुआत हुई। काव्यपल्लवन के आरम्भ से हमने किसी विषय को आधार बना कर कविता लिखने का सिलसिला शुरु किया था और आज हम चित्र पर आधारित काव्यपल्लवन आयोजित करते हैं। इन दो वर्षों में हर बार पाठकों और कवियों ने बढ़-चढ़कर हमारे इस प्रयास को सराहा है। ’पहली कविता’ के अंकों में सौ से अधिक कवियों ने भाग लिया जिसके चलते हमें यह अंक छह भागों तक बढ़ाना पड़ा।

मार्च माह के काव्यपल्लवन की उद्घोषणा के चित्र पर पाठकों ने तभी से ही अपने विचार देने शुरु कर दिये। इस माह का चित्र भेजा है विवेक रंजन श्रीवास्तव ने। चित्र पर जब विचार रखे गये तो लड़कियों, बेटियों व दहेज पर चर्चा हुई। कुछ सप्ताह पहले हमने भी ’महिला दिवस’ बनाया और इस बार का काव्यपल्लवन की अधिकतर रचनायें में भी इसी विषय के इर्द-गिर्द ही घूम रहीं हैं। इस बार कविताओं की संख्या कम जरूर हैं पर आशा करते हैं कि आपको पसंद आयेंगी। हिन्दयुग्म के नियमित पाठक व कवि तो इनमें शामिल हैं ही पर कुछ नये कवि भी हमसे जुड़ रहे हैं। आइये जानते हैं उनके विचार।
यदि आप भी अपनी किसी फोटो अथवा चित्र पर काव्य-पल्लवन आयोजित करवाना चाहते हैं तो स्वयं द्वारा ली गई फोटो या स्वयं द्वारा बनी पेंटिंग हमें २८ मार्च २००९ तक भेज सकते हैं।



आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
आचार्य संजीव 'सलिल' | विश्व दीपक ’तन्हा' | मनु ’बेतखल्लुस’ | मुकेश कुमार तिवारी | एम ऐ शर्मा " सेहर" | शन्नो अग्रवाल | मुकेश सोनी | विवेकरंजन श्रीवास्तव | रोहित चौबे "रौशन" | संगीता स्वरूप | कमलप्रीत सिंह | रज़िया मिर्ज़ा | मंजू गुप्ता |

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मौन देखकर
यह मत समझो,
मुंह में नहीं जुबान...
शांति-शिष्ट,
चिर नवीनता,
जीवत की पहचान.
शांत सतह के
नीचे हलचल
मचल रहे अरमान.
श्याम-श्वेत लख,
यह मत समझो
रंगों से अनजान...
ऊपर-नीचे
हैं हम लेकिन
उंच-नीच से दूर.
दूर गगन पर
नजर गडाए
आशा से भरपूर.
मुस्कानों से
कर न सकोगे
पीडा का अनुमान...
ले-दे बढ़ते,
ऊपर चढ़ते,
पा लेते हैं जीत.
मिला ताल से
ताल सुनाते
सदा सफलता-गीत.
प्यार मित्र है,
नफरत दुश्मन
झुके समय बलवान...

--आचार्य संजीव 'सलिल'





उम्र हाय!
यह उम्र निगोड़ी,
उड़नखटोले पर जो बैठी,
बढती जाए थोड़ी-थोड़ी,
इस वसंत से उस वसंत तक,
मन के साथ करे बरजोरी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी।

सखियन के बाँहों में बाँहें,
डाल-डाल फिरती थी जो मैं,
कहाँ भला थिरती थी तो मैं,
एक थाल से दूजे थाल तक,
एक डाल से दूजी डाल तक,
उछल-उछल के, फुदक-फुदक के,
हवा संग गिरती थी तो मैं;
अब तो राम!
गया वह दौर,
मन उत है, पर इत है ठौर,
अब तो राम!
बस एक मलाल,
ना कहीं, पात, ना कहीं डाल,
चहुँ ओर इक लाख सवाल,
रिश्तों के रस्ते के अलावा,
उम्र ने कोई डगर नहीं छोड़ी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी।

आध-आध दर्जन भर मन की
सोच-वोच थी एक हीं जैसी,
ललक-लोच थी एक हीं जैसी,
मन जो भाए, कर जाती थीं,
मन का करके, तर जाती थीं,
मन की भांति हम सारी भी
नि:संकोच थीं एक हीं जैसी,
अब तो राम!
भय निर्भय है,
कौन हूँ मैं, यही संशय है,
अब तो राम!
हया है भारी,
जोश है मूर्छित , मैं बेचारी,
रह गई मैं, नारी की नारी,
अबला कर के अल्प-भाग्य से,
उम्र ने मेरी गाँठ है जोड़ी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी!!

अब तो इस विध हीं जीना है,
सोचती हूँ गरल पीना है,
लेकिन यह क्या....कैसा स्वर है,
मस्तिष्क कहता ....तुमको ज्वर है?
फिर क्यों , ऎसा सोच रही हो..
खुद को हीं खरोंच रही हो?
सुन रे नारी, सच बतलाऊँ,
तुमको सत्य की राह दिखाऊँ.....
"उम्र का क्या है,
एक संख्या है,
तब बढती, जब मन विह्वल हो,
भय का क्या है,
बस व्याख्या है,
मन देता, जब वह निर्बल हो|
नारी देख! तुझमें भी बल है,
तू पूरे घर की संबल है,
तो फिर भाग्य-भरोसे क्यूँ है,
अपने वय को कोसे क्यूँ है,
लोक-लाज का ध्यान हटा दे,
यौवन का अरमान हटा दे,
यौवन तो अब भी तुझमें है,
बस तुझको हीं संशय है...
संशय त्याग, खोल ले अंखियाँ,
देख तुझे, ढूँढे हैं सखियाँ !!!"

आह! आज के आज फिर से
आध-आध दर्जन भर मन में
एक हीं जैसी हूक उठी है,
वसंत है, कोयल कूक उठी है,
और वो देखो
शर्म की मारी
छिपी जा रही चोरी-चोरी,
उम्र हाय!
मेरी उम्र निगोड़ी!!

--विश्व दीपक ’तन्हा'





आज मिल के खिलखिला लें, ये लम्हा मन में बसा लें
मेरे, तेरे, इसके, उसके, संग मिल कर देख डालें,
अजनबी पर आशना से, वो सभी अनजाने ख्वाब

करके खाने का बहाना, छांव में महफ़िल सजाना,
कैमरे में क़ैद कर लो, गुनगुनाता ये ज़माना
हों भले इस्कूल में, पर लंच में हम हैं नवाब

कल खबर क्या कहर टूटे, देश,घर, या शहर छूटे
क्या है किस्मत का ठिकाना,किसकी संवरे,किसकी फूटे
हम अभी से कल को जीकर क्यूं करें ये पल खराब

दो घडी चल मिल के बैठें, कल हो जाने क्या अजाब
छूटते बचपन को थामे, सख्त-जां,मुश्किल शबाब

--मनु ’बेतखल्लुस’






आज,
सारी दोपहर
बस मन भागता रहा
बिस्तर को जैसे लग आये हो पंख
बस घूमता रहा
उसी पेड़ के इर्द-गिर्द
जहाँ,
हम सपनों को सहेजते थे
कोटर में किसी चिडिया के बच्चे सा
उम्र के उस पड़ाव पर
जब शायद,
यह कभी ख्याल नही आया कि
किसी दिन बड़ा होना है हमें
और,
सिमट आना है किसी दायरे में
बंधे हुये अपने खूंटों में

इस,
धुंधलाती हुई तस्वीर में
हमारे सामने है
अपनी आँखों से बड़े सपनें /
अपने कद से ऊँची ख्वाहिशें /
और पेड़ की शाखों से बुलंद हौसलें
जो,
वक्त के साथ सिमट आये हैं
सिर्फ, अपने आप तक
और सीमित हो गये हों
अपने सिर पर ओढे हुये
अपने हिस्से के परिवार में
जो कभी हमारे ख्वाबों मे था ही नही /
ना ही
ऐसी किसी तस्वीर में
जो आज भी
खींच ले जाती है
उसी पेड़ के इर्द-गिर्द
जिसकी घनी छांव में
हम पकाते थे अपने सपनों को
--मुकेश कुमार तिवारी





ऊंचा उठने की तमन्ना लिए
हर कदम हर बाधा को चुनौती दिए
हम बेटियाँ लाखों में एक......
सीना पिरोना बनाना सजाना
सभी जिम्मेदारियाँ घर की भी निभाना
हम बेटियाँ लाखों में एक......
अपनाते सभी रिश्ते हर संभव सजाते
बेटी ,बहिन पत्नी व माँ बन निभाते
हम बेटियाँ लाखों में एक......

किसी भी क्षेत्र में न रहेंगे हम पीछे
शूल की चुभन हो चाहे पग नीचे
हम बेटियाँ लाखों में एक......
बुलंद हैं अब हौसले ना होंगे ये पस्त
कामयाबी का सूरज ना होगा अब अस्त
हम बेटियाँ लाखों में एक......

--एम.ए. शर्मा






निखरती धूप में दिन की
पेड़ की छांव को पाकर
न जाने कितने सपनों को
यहाँ बुनती हैं यह आकर.

चहकतीं रहतीं चिडियों सी
मिलकर अपनी हमजोली में
बड़ी हुईं साथ, पढ़ रहीं साथ
मुस्कुरातीं अपनी टोली में.

उमर के इन पलों में
उम्मीदें मन में हैं पलतीं
सुनहरे पांख पर बैठी
जिंदगी उड़ती सी रहती.

गुजरते दिनों के संग यहीं
बदलते रहते हैं सपने
समय की लहरों में बहकर
दूर हो जायेंगे कितने.

अभी तो चहक रहीं संग में
बाद में फिर तपन होगी
कहीं होगी ख़ुशी तो फिर
कहीं गम और घुटन होगी.

किसी के घर की बगिया की
महकती सी हैं यह कलियाँ
कभी फिर छोड़ देंगी सब
अचानक बाबुल की गलियां.

किसी के आँगन में सजने
विदा होंगीं जब डोली में
छोड़कर बाबुल के घर को
दुआएँ लेकर झोली में.

दूर होकर एक दुसरे से
टूट जायेगा यह बंधन
तरस जायेंगीं मिलने को
पराया होगा अपनापन.

--शन्नो अग्रवाल





अलबेला बचपन अब मुझको बुलाये
बड़े दिनों के बाद फिर मुझको बुलाये
अल्हड़ दोस्तों का साथ , बस दिनभर होती थी बातें
और फिर दादी की कहानियो से आँखें मुंदती मेरी रातें ;
हर गर्मियों की दोपहर कच्ची अमिया की महक ले आये
बीते दिन फिर ना आये मुझको यूँ रुलाये
अलबेला बचपन अब मुझको बुलाये
बड़े दिनों के बाद फिर मुझको बुलाये
परीक्षा की दिन बीतते पाठ रटते - रटते
नीरस स्कूली किताबो से कभी समय ना कटते
होता हमेशा इंतजार कब पढाई ख़तम हो जाये
अब मांगू पर , बीते दिन लौट के ना आये
अलबेला बचपन अब मुझको बुलाये
बड़े दिनों के बाद फिर मुझको बुलाये
करके याद तेरी छुअन ,, मेरा दिल खिल जाये
किताबों के बीच दबा गुलाब आज भी मुस्कुराये
ज़िन्दगी के किसी मोड़ पे तू फिर से टकराए
रास्ते अलग फिर भी बेकरार दिल आज गुनगुनाये
अलबेला बचपन अब मुझको बुलाये
बड़े दिनों के बाद फिर मुझको बुलाये

--मुकेश सोनी





मन में ऊँची ले उड़ाने, बढ़ रही हैं ये किशोरी लड़कियां
स्कूल में जो वृक्ष पर,संग खड़ी हैं ये किशोरी लड़कियां
कोई भी परिणाम देखो, अव्वल हैं हर फेहरिस्त में
हर हुनर में लड़कों पे भारी पड़ रही हैं ये किशोरी लड़कियां
अब्बा अम्मी और टीचर, हौसले ही बढ़ा सकते हैं बस
अपना फ्यूचर खुद बखुद ही गढ़ रही हैं ये किशोरी लड़कियां
तालीम का गहना पहनकर, बुरके को तारम्तार कर
औरतों के हक की खातिर लड़ रही हैं ये किशोरी लड़कियां
"कल्पना" हो या "सुनीता" गगन में , "सोनिया" या "सुष्मिता"
रच रही वे पाठ खुद जो, पढ़ रही हैं ये किशोरी लड़कियां
इनको चाहिये प्यार थोड़ा परवरिश में, और केवल एक मौका
करेंगी नाम, बेटों से बढ़कर होंगी साबित ये किशोरी लड़कियां

--विवेक रंजन श्रीवास्तव






बहुत याद आते हैं वो दिन...
बचपन के वो सुनहरे दिन
जो हमने पाठशाला में बिताये थे..,

शायद जीवन के सर्वाधिक याद किये जाने वाले दिन...
समय जो हमने शाला के आँगन में बिताये,
समय जो शाला प्रांगन में दशको से मौजूद अमराई तले बिताये.
अब तो वो शाला और वो उसके छात्र-छात्राए...
बहुत याद आते हैं वो दिन...

--रोहित चौबे "रौशन"






लोग कहते हैं कि
समाज बदल रहा है
शिक्षा का
प्रसार हो रहा है
लड़कियां लड़कों के साथ
कंधे से कन्धा मिला कर
आगे बढ़ रही हैं
और बेटियाँ बेटों की
जगह ले रही हैं .
पर सोच है कि-
वहीँ की वहीँ खड़ी है
भारतीय परिवेश में
किसी भी लड़की का
कोई स्वतंत्र आस्तित्व
नज़र नहीं आता है
कहने को लोग
पढ़े - लिखे हैं
पर पुरातनपंथी ही बने रहना
उनको भाता है .

आज भी कन्या को
जायदाद समझा जाता है
विवाह पर उन्हें
दान किया जाता है .
कहने को बेटियाँ
आज अर्थ भी कमाती हैं
पर क्या सही अर्थों में
अपने मन की कर पाती हैं?
आज भी
जात - बिरादरी की जंजीरें
उनके पांवों की
बेडिया बनी हुई हैं
माँ-बाप की ख़ुशी के आगे
उनकी इच्छा
दांव पर लगी हुई है
कहाँ कुछ बदला है?
बदला है तो बस इतना ही कि-
लड़कियों को
सोचने की ताकत तो दी है
पर सोचने की आज़ादी नहीं
धन कमाने की चाहत तो दी है
पर उपभोग की इजाज़त नहीं
आज कहने को लड़कियां
आजाद भी हैं
पर बंधनों से
आज़ादी नहीं .

गर सच में
आज़ादी पानी है
तो पहले अपनी सोच को
बुलंद करना होगा
खुद की सोच के बंधनों से
खुद को आजाद करना होगा
तभी मिलेगा वो मुकम्मल आसमां
जिसको पाने की चाहत की है
तभी खिलेगी मुस्कराहट चेहरे पर
जिसको पाने की तमन्ना की है.

--संगीता स्वरूप





अपनी आँखों में झिलमिल
सपने लिए आज
पूरा करने की राहमें खडी हैं
भविष्य इनका भी उज्जवल बने
जिसे संवारने की चाह में यह आगे बढी हैं
विद्या के मंदिर में आयीं
सभी शीश नवाने
पहले खुद समझने आयीं हैं
ताकि चल सकें साथ ज़माने
इसी लोक की ललनाएं हैं
अपने कल को संवारें
कैशोर्य अपना -हंस खेल गुजारें
खुशकिस्मत हैं सभी
आते यौवन की देहरी पर
आँख कोई क्रूर न रही
इनके जन्म ओ दामन पर
सपनों को साकार करें परिवारों में अपने
आज यही है चाह सभी की
जितने भी है अपने
भावनाओं ने इनकी सदा
वास्तविकताओं को संवारा है
इन अर्थों में न्यारा
सचमुच देश हमारा है

--कमलप्रीत सिंह





देखो कैसे खिलखिलाया बचपन
अच्छा लगता है जीवन का शैशव
हरे भरे पेड़ हैं प्रकृति का सृजन
नारी देती है जग को नवसृजन
संसार का सृजनहार हमारा एक
सृष्टि में धरा गगन सूरज चॉंद एक
जग में क्यों होता है लिंग भेदभाव
जग में जन्म देती है सबको मॉं
पेड़ काट कर पर्यावरण हुआ खराब
लिंग असंतुलन से है नारी का अभाव
इसलिए जग मनाता पर्यावरण दिवस
आठ मार्च को जग मनाता विश्व स्त्री दिन
करे मानव संसार में ऐसा काम
भेदभाव असमता का करें विनाश
समरसता हरियाली का करें प्रकाश
संतुलन के गीत गाएं धरा आकाश

--मंजू गुप्ता





अभी तो हमें पढ़ना है, ख़ेलना है।
हँसना है, हँसाना है।
छूना है ऊंचाइयों को, उडना है आसमान पर,
देख़ना है सारे विश्व की ख़ुबसुरती को,
जिस दुनिया में जन्म लिया है उस दुनिया को
अभी तक ठीक से देख़ा ही कहाँ है अभी हमने?
कुछ दिन और रुक जाओ ना पापा प्लीज़,
,फ़िर चाहे हमें भेज देना हमें किसी की दुल्हन बनाकर।
हाँ! हमें पता है कि हमें ही ज़िम्मेदारी निभानी है,
सँभालनी है ऎक घर” की, एक परिवार की,
जो आज तक सँभालती आई है हमारी माँ,भाभी,बहन,दादी,
और अब हम भी निभएंगे यही ज़िम्मेदारी।
क्यों कि हम भी एक नारी हैं। पर अबला नहिं!
हमें गर्व है कि हम लड़की हैं। नारी हैं।
कभी डाली बनकर, कभी माली बनकर,

हमें ही ख़िलाना है, इस ज़ीवन की बगिया को।

पर अभी कुछ दिन और पापा............

--रज़िया मिर्ज़ा




शहर की भीड़ भरी सड़क और २१ कविताएँ







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - शामिख फ़राज़

अंक - तेइस

माह - फरवरी २००९






चित्र पर आधारित काव्य-पल्लवन की शृंखला में इस बार अंक शामिख फ़राज़ के चित्र पर आधारित है जिस पर २१ कवियों ने अपनी राय रखी। अगर चित्र पर नजर डालें तो उस में भीड़ दिखाई गई है। जिसे देखते ही एक गज़ल सुनी थी कभी जिसका एक शे’र याद आ जाता है:

ज़िन्दगी की राहों में रंज-ओ-गम के मेले हैं,
भीड़ है कयामत की फिर भी हम अकेले हैं।

अधिकतर कवियों ने इसी विषय को आधार बनाकर कविता लिखी है। पिछले दिनों ही हिन्द-युग्म पर श्याम सखा ’श्याम’ की कलम से भी इस विषय पर कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ निकली थी। हर व्यक्ति के मन में एक कवि छुपा होता है। हर व्यक्ति का किसी परिस्थिति को देखने का अपना एक नजरिया होता है।
इस बार हमारे साथ सबसे छोटी कवयित्री पाखी मिश्रा भी जुड़ी हैं जो बाल-उद्यान को नियमित पढ़ती हैं। इस बार इन्होंने काव्य-पल्लवन में भी भाग लिया है। कविता में बालपन है और हम उसे ज्यों की त्यों प्रकाशित कर रहे हैं। कुछ नये नाम भी आपको देखने को मिलेंगे और कुछ अलग विचार भी.. भीड़ से हटके।

Photobucket

आवश्यक सूचना: यदि आप भी अपना कोई चित्र अथवा फोटॊ जनवरी माह के काव्यपल्लवन के अंक के लिये भेजना चाहें, तो हमें २८ परवरी २००९ तक kavyapallavan@gmail.com पर भेजें। कृपया ध्यान रहे कि आपकी तस्वीर अथवा स्केच कहीं भी प्रकाशित न हुए हों।
आइये पढ़ते हैं हमारे २१ कवियों को।

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
मनु ’बेतखल्लुस’ | एम ऐ शर्मा " सेहर" | विवेकरंजन श्रीवास्तव | पाखी मिश्रा | प्रदीप वर्मा | मुकेश सोनी | संगीता स्वरूप | मुहम्मद अहसन | पंखुड़ी कुमारी | पुनीत सहलोत | शन्नो अग्रवाल | दिनेश "दर्द" | सुरिन्दर रत्ती | कमलप्रीत सिंह | गोविंद शर्मा | शामिख फ़राज़ | शिखा वार्श्नेय | शारदा अरोड़ा | आशा जोगळेकर | रोहित चौबे "रौशन" | जय कुमार

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





बस आदमी से उखडा हुआ आदमी मिले
हमसे कभी तो हँसता हुआ आदमी मिले

इस आदमी की भीड़ में तू भी तलाश कर,
शायद इसी में भटका हुआ आदमी मिले

सब तेजगाम जा रहे हैं जाने किस तरफ़,
कोई कहीं तो ठहरा हुआ आदमी मिले

रौनक भरा ये रात-दिन जगता हुआ शहर
इसमें कहाँ , सुलगता हुआ आदमी मिले

इक जल्दबाज कार लो रिक्शे पे जा चढी
इस पर तो कोई ठिठका हुआ आदमी मिले

बाहर से चहकी दिखती हैं ये मोटरें मगर
इनमें, इन्हीं पे ऐंठा हुआ आदमी मिले.

--मनु ’बेतखल्लुस’





महानगरों की
बिखरी हुयी भीड़ का
एक हिस्सा बन
ढूँढती............

नीलापन लिए
खुला आकाश
अपनापन जताती

वो गलियाँ मुहल्ले
चेहरे पर चिपकी
एक अदद मुस्कराहट
कोलाहल से दूर
एक शान्त कोना
अपने आप को
सहलाती समझाती
इन सब में ढूढती
अपना वजूद

--एम.ए. शर्मा





हाँ गुमशुदा हूँ मैँ,
महानगर में ........,
मेरी पहचान हैं
बस कुछ नम्बर,
घर, गली का ,
पोस्ट आफिस का पिन कोड नम्बर,
है मेरा पता
फोन का या नम्बर मोबाइल का ,
ढ़ूंढ़ लेता है मुझे भीड़ में भी
और मैं चाहकर भी स्वयं को
अपने में ही ढ़ूंढ़ने के लिये तक
निकाल नहीं पाता
पल दो पल
बस समय की सुइयों के साथ
भोर से रात तक घूमता रहता हूँ ,
जिंदगी की तलाश में.
अकेला नहीं हूँ मैं महानगर में,
मैं भीड़ का एक हिस्सा हूँ यहाँ
भीड़ की पहचान बन जाता है कभी
कोई झंडा.
भीड़ पर होता है लाठी चार्ज..
भीड़ में फूटता है बम ..
अगले दिन की खबरों में
आदमियों की संख्या के रूप में दर्ज हो
जाती है मेरी मौत.
हाँ गुमशुदा हूँ मैँ ..
महानगर में
--विवेक रंजन श्रीवास्तव






इस भीड़ में खोये लोगों ,
आज की इस दुनिया के लोगों
निकालो थोड़ा वक्त अपने
देश के सम्मान के लिए ,
यूको बैंक में काम करते -
रहते हो तुम पूरे दिन ,
सामने देश का झंडा
लहराता पर ,
तुमने उसे देखकर
अनदेखा कर दिया
वह भी थोड़ा गुमसुम है
और सोचता ,
मुझे सम्मान देने वाले
अब कहां गए ?

--पाखी मिश्रा






नाजुक सा एक ख्वाब
देखा था कभी
आ कर तेरे शहर
खो गया है कहीं

आँखें रीते बर्तनों सी
लुढ़कती रहती हैं
कभी इधर कभी उधर
इस तलाश मे कि
शायद मिल जाऐ कहीं
वह ख्वाब जो कभी
अपना हुआ करता था
वह जो शहर की भीड़ मे
खो गया है कहीं

--प्रदीप वर्मा





अन्धेरी, वीरान सड़कों पर
अकेला ही चला था मै
लेकर उम्मीद की एक
नन्ही किरण ;
अँधेरा छंटता गया और
लोग जुड़ते गए
.. अब सड़को पर हो मेला जैसे और देखो
साहस का परचम ऊँचा लहराता है

--मुकेश सोनी






जंगलात के ठेकेदार हैं कि
जंगल काट रहे हैं
और शहर है कि
इंसानों का जंगल बन गया है.
अनजानी राहों पर
अजनबी चेहरे
हर शख्स के लिए
अकेलेपन का ,
सबब बन गया है.
भीड़ में भी रह कर
क्यूँ तनहा है आदमी
हर शहर है कि भीड़ का
जलजला बन गया है .
गाँव कि धरोहरें
जैसे बिखर सी गयीं हैं
पलायन ही ज़िन्दगी का
सफ़र बन गया है .
दो रोटी कि चाह में
घर से बेघर हो
आम आदमी भीड़ का
चेहरा बन गया है.

--संगीता स्वरूप






यही है मेरा शहर
मनो धुंवा निगलता ,
भीड़ में गुम होता ,
सीने पर हर रोज़ सौ ज़ख्म खाता ,
रिसते ज़ख्मों वाला
यही है मेरा शहर ;
इस शहर में
एहसास के सोते सुखाए जाते हैं
इंसानों के क़द बौने किए जाते हैं
ज़हन पत्थर बनाए जाते हैं
आत्माओं को बोली पर चढाया जाता है
हाँ , यही है मेरा शहर
इस शहर में प्रताड़ना की मीनारें हैं ,
सत्ता के दमघोटू गलियारे हैं
कंक्रीट के जंगल हैं
यह शहर गर्मियों में जलता है
बरसात में गलता है
सर्दियों में केचुल बदलता है ;
इस शहर का हर दूसरा व्यक्ति मैं हूँ .
मुसल्सल दौड़ता , भागता , रेंगता ,
जीने की जंग जीतता- हारता ………….;
यही है मेरा शहर

--मुहम्मद अहसन





ये जगत माया का जाल है
ये जीवन का जंजाल है
कोई समझे ख़ुद को धनवान
तो कोई फटेहाल है

भीड़ का हिस्सा हर इंसान
न कोई अपनी पहचान
कैसा खेल माया का देखो
ख़ुद से है हर कोई अनजान
ऊँची इमारतों और लम्बी सड़कों में
गुम होते जा रहे हैं लोग
अपनी - अपनी किस्मत का
भोग रहे हैं सब भोग
आपाधापी मारामारी
व्यस्तता बन गई है बीमारी
भौतिक सुखों की दौड़ लग रही
रो रही है आत्मा बेचारी
इतना कष्ट भोग चूके
फ़िर भी ढूंढ रहे हैं और
कष्टों से भरी ये दुनिया
कोई नही करे ये गौर

प्रकृति के नाम पे
सिर पे एक आसमान बचा है
उसका व्यापार नही हुआ अब तक
शायद उसमे बहुत खर्चा है
लूट - खसोट कर प्रकृति को
जीर्ण कर मानवता को
क्षतिज के पीछे दौड़ रहे हैं
भूल कर वास्तविकता को
शोर - शराबे में में दब गई
या जबरन दबा दी गई है
कोमलता ,
निश्छलता ,
उदारता ,
पवित्रता ,
विनम्रता
और भी बहुत कुछ ....
शायद इन्सान और इंसानियत भी

--पंखुड़ी कुमारी




जीती जागती ज़िन्दगी को दफनाता ये शहर,
हर मुफलिस को अमीरी के ख्वाब दिखाता ये शहर.

हकीक़त से कोसों दूर है गलियाँ इसकी,
हर किसी को उम्मीदों के पुल बंधाता ये शहर.

न उगते सूरज की परवाह इसे, न ढलती शाम की,
अंधेरे उजालों, उजालों अंधेरों में भागता ये शहर.

चीखुं, चिल्लाऊं, कहानी किसे अपनी सुनाऊं,
भीड़ में गुमनाम बनाता ये शहर.

ऊँची - ऊँची इमारतों के बीच,
दिल के रास्तों को तंग बनाता ये शहर.

ना पडौस यहाँ पे , ना कोई चबूतरा,
गाँव की याद में हर वक्त रुलाता ये शहर.

ना कोई गली अपनी, ना कोई मौहल्ला,
केवल सड़कों से मुलाकात करवाता ये शहर.

ना चाची की डांट यहाँ पे, ना बच्चों की शैतानी,
हर पल प्यार के लिए तरसाता ये शहर.

बेहतर ज़िन्दगी की तलाश में आता है हर शख्स,
जीती जागती ज़िन्दगी को दफनाता ये शहर.

--पुनीत सहलोत





ग्रीष्म-शीत, धूल-गंध या आंधी और बारिश आये
रंग-बिरंगा अमर तिरंगा गगन के नीचे लहराये
चारों तरफ़ सैलाब भीड़ का बढ़ता जाता उसके नीचे
चेहरे उभर रहे हैं कितने कोई आगे भागे कोई पीछे.

उलझन सी है बेकलता है सबके तेज कदम हैं
कभी न होती सडको पर भीड़ कभी भी कम है
बारिश में, आंधी में या हो सूरज आग उगलता
भीड़ की दरिया में हर कोई पुतले जैसा चलता.

बाजारों में लोग हर तरफ़ जैसे हो कोई मेला सा
चहल-पहल में भी कोई-कोई बैठा यहाँ अकेला सा
कोई पेड़ के नीचे वैठा है थका हुआ संघर्षों से
यहाँ फुटपाथों पे बूढे-बच्चे भीख मांगते बरसों से.

कोई चलता है पैदल कोई बैठा है रिक्शे में
कारों में चले अमीरी इस जीवन के किस्से में
साँसों की गर्मी है यहाँ और पसीना रहा टपक
चोर-उचक्के भी यहाँ छिपे होंगे कहीं रहे भटक.

एक दरिया की तरह ही यह लोग बहे चलते हैं
पल-पल करके दिन-रात सदा यूँ ही ढलते हैं
बैंक, दुकानों में देखो लोगों का ही है जमघट
भरी हुई हर जगह और लेन-देन का है झंझट.

टोली में सब अपनी हँसते-गाते और खाते-पीते
कितने बच्चे स्कूल भी जाते होंगे करते बातें
कोई मस्त सा, कोई व्यस्त सा, कोई मचाता शोर
नये नजारे आये दिन यहाँ दिखते हैं चारों ऑर.

--शन्नो अग्रवाल





दूर तक दौड़ते रास्तों पर ये लोग,
जा रहे हैं कहाँ कुछ खबर ही नहीं
बात इतनी सी है के कुछ खो गया,
क्या खो गया, कुछ खबर ही नहीं
ये इमारतों के वन ठूंठ से ताकते,
साखरुपी खिड़कियों कि ओट से झांकते
सब मकीं छोड़कर चल दिए हैं मकाँ,
पर गए वो किधर कुछ खबर ही नहीं.
दूर तक दौड़ते रास्तों पर ये लोग.........

--दिनेश "दर्द"






इन नज़रों ने शहर की तस्वीर उतारी है,
जहाँ तलक नज़र दौड़ाई ज़िन्दगी भारी है
बोली जानवरों की सी बोलनेंवाले सारे,
मोहब्बत के हो नहीं सकते वहशत के पुजारी हैं
जीस्त की दुशवारियों से लराज़ता आदमी,
कुछ बदख़ू मिजाज़ियों का ज़ुल्म जारी है
अब इस हिर्स के जाल का असर देखिये,
रिश्तों को निभाना मजबूरी और लाचारी है
जज़्बा-ऐ-नाकाम के चर्चे रोज़ सुनते रहे,
पर किसी ने न कबूला, ग़लती हमारी है
रोज़ नये मुआमले पेश आने लगे बहोत,
एक से बचता हूँ तो दूजे ने ठोकर मारी है
जिस मुल्क़ में सैय्याद क़फ़स लिये फिरते हों,
होगी क़ैद देंगे सज़ा अब तुम्हारी बारी है
तुम भी इस भीड़ में खो जाओ तो ग़म नहीं,
हरेक दिल बेहलानेवाले खिलौने का व्यापारी है
पीने की आदत न थी हमको ग़मों ने पिलायी,
साक़ी ने जाम भर दिये अब अजब ख़ुमारी है
इस आलम में एक अल्लाहवाला ढून्ढ लाओ,
जिसे अपनी रूह नहीं सबकी रूह प्यारी है
गुलशन में गुलों के साथ कांटे भी दोस्तों,
मगर महकते फूलों ने न हिम्मत हारी है
"रत्ती" माना के तहज़ीब विरासत में नहीं मिलती,
वाइज़ की सोहबत उसकी जुस्तजू तुम्हारी है

--सुरिंदर रत्ती






इस गुलाबी ठण्ड में
गुलाबी नगरी की बीतीं यादें ,
बीते दिन
आज बरबस उभर आए हैं
इस शहर की गुलाबी आभा
अपनी तमाम ऐतिहासिक
परम्पराओं और परिवेश की
पृष्ठ भूमि को साथ लिए है

नगर की गुलाबी छटा
जहाँ इस के लोक धैर्य
सहिष्णुता और सौहार्द का प्रतीक है
वहीं इस का नगर नियोजन और
व्यस्त बाज़ारों की गरिमा
दशकों से चिरपरिचित रही
इसी सौजन्य और सांस्कृतिक संपन्नता ने
पिछले वर्ष
एक बहुत ह्रदय विदारक स्वप्न देखा था
जिस की हकीकत ने इसे विरासत से बहुत दूर फेंक दिया था
अभी तक चली आ रही
सर्व धर्म सह अस्तित्व का
एक जीवंत आदर्श
आज फिर
इस दुष्कर महाप्रश्न का उत्तर ढूँढ ने को तत्पर है

--कमलप्रीत सिंह





भीड़ मुझे डराती है,
लिया जन्म जब मैंने,
खुशी में लड़के की सोच,
आ खड़े हुए भीड़ में,
पर, देख मुझे, मायूस ही,
लौट पड़े बस लक्ष्मी ही कह,
सोचा जब मैंने, कदम बाहर रखने की,
माँ ने रोक दिया,
भीड़ ही के डर से,
डरते-डरते जब सोचा, मैंने,
तामील हासिल करने की,
तो रोका मुझे भीड़ ने,
घर के काम-काज के बहाने से,
प्रिंदे की तरह उड़ना पसन्द था मुझे,
उड़ने की सोची तो,
भीड़ ने नोच लिए मेरे पर,
सबके सामने उस बाजार में,
भीड़ देखती रही तमाशा,
और बस तालियाँ ही बजा रही थी,
देख चीर-हरण एक और द्रोपदी का,
बस यूँ ही,
भीड़ मुझे डराती रही,
हाँ, भीड़ ने दी मुझे तलवार,
कह झाँसी की रानी,
पर, भीड़ ही ने मुझे हराया,
बस, यूँ ही तलवार बनके, खँजर,
चीर गई मेरे तन को,
पर, भीड़ ने ना फिर कहा वीरांगना मुझे,
समाधि बनाकर मेरी,
``कुलच्छिनी´´ का नाम दे दिया,
इसी भीड़ ने मुझे।।

--गोविंद शर्मा






मेरे ख्याल से शाम ढली है और पॉँच बजे हैं
घर को लौटने वाले देखो हाँ लौट पड़े हैं
फिर मेरे बदन में से जाने कौन बोला था
शायद खुदा के शहर में इन दिनों मेले लगे हैं
तब मेरी रूह बुदबुदाती है कि कुछ सिक्कों की
खातिर इनकी ज़िन्दगी में झमेले लगे हैं
और हाँ आँख बोली क्या ख़ास है इसमे
बस कुछ लोग थमे हैं, कुछ लोग खड़े हैं
तब दिल पलटवार करता है उसपे कुछ यूँ
इनकी ज़िन्दगी की रफ्तार देख कहाँ रुके थमे हैं
दौड़ती ज़िन्दगी वक्त मिले तो तू ही बता देना कि तस्वीर
क्या क्या कहती है यह सवाल फ़राज़ की समझ से परे हैं

--शामिख फ़राज़





इन भीड़ भरी सड़कों पर चलता
हर शख्स अकेला लगता है
इस रेले मैं ना गुम हो कहीं
अपनी पहचान बनाता दिखता है
सदियों से लूटा गया जिसे
अपनो ने धोखा दिया उसे फिर भी
दुनिया के नक्शे मैं तिरंगा
सर उठा लहरता दिखता है.

--शिखा वार्श्नेय






दौड़ है
भागम भाग है
महानगर की
पहुँचता कोई कहीं नहीं
एक झण्डे तले
शक्ति नहीं
भक्ति नहीं
विरक्ति नहीं
बस आसक्ति है
पाने की
दौड़ है
महानगर की
--शारदा अरोड़ा






भीड़ भरा ये शहर कितना अकेला है
हर रोज लेकिन शहर में लगता इक मेला है,
हर कोई आता है यहाँ सीढी बनाने को इसे
कौन सजाये या सँवारे, सब फुरसत का खेला है ।
आत्मा शहर की दब गई कूडे के ढेरों में
सिसकियाँ सुन लेना इसकी नियमों के फेरों में ।
बचालो इसे, सम्हालो इसे, यह शहर तुम्हारा है
किसी गैर का नही, लहरा रहा तिरंगा प्यारा है ।

--आशा जोगळेकर




मानव , मकानों और
वाहनों की इस भीड़ - भाड़ में ,
अपनों को
पहचानने की व्यर्थ कोशिश
करता मैं तनहा पताका ;
शायद सभी पराये हो चले हैं ,
जीवन की इस आपाधापी में

--रोहित चौबे "रौशन"






भीड़- भाड़ से भरा था इक सहर
उस शहर में ढूंढ रहा था किसी को नजर

ऐसा लग रहा था कितना अलग सा है ये नगर
झाँक रहा था ऊपर चिल चिलाती दोपहर
भाग रहे थे लोग अपने धुन में इधर से उधर
भीड़- भाड़ से भरा था इक शहर
उस शहर में ढूंढ रहा था किसी को नजर

चलते -चलते डग मागा रहे थे हमारे कदम
रुके नही हम चलते रहे हमरे कदम
चाहत के आस हुए ना कम
किसी की तलाश में भटक रहे थे मगर

भीड़- भाड़ से भरा था इक शहर
उस शहर में ढूंढ रहा था किसी को नजर

आसमान को चूमती ऊँची -ऊँची इमारत चारों ओर
सड़क को छूता एक ओर से दूसरी ओर
सहमे हुए थे हम मगर
टूटा नही था अभी आस का डोर
भीड़- भाड़ से भरा था इक शहर
उस शहर में ढूंढ रहा था किसी को नजर

--जय कुमार