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आज एक बार फिर अचंभित है वो बच्चा


तेजेन्द्र शर्मा हिन्दी के ख्यातिलब्ध कथाकार हैं। यद्यपि इनकी कविताओं और ग़ज़लों का एक संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है, फिर भी ये लोगों से अपना परिचय एक कहानीकार के रूप में ही देते हैं। इनका पूरा-परिचय पढ़ना हो या फिर एक दमदार कहानी पढ़नी हो तो यहाँ जायें। फिलहाल तो हम आपको इनकी एक नई कविता पढ़वा रहे हैं।


बच्चे की आँखों से दुनिया....

आज एक बार फिर
दुनिया को एक बच्चे की तरह देखा।
फैल गई आँखें, अचरज से
दुनिया जैसी है
वैसी क्यों है?

मेरे भीतर का बच्चा
पूछ बैठा मुझसे ये सवाल
रिश्तों का क्यों हुआ ऐसा हाल?
क्यों बदल गए रिश्तों के अर्थ
अर्थ ही क्यों बन गया रिश्ता?

आज एक बार फिर
अचंभित है वो बच्चा।

क्यों किया आविष्कार भगवान का?
मज़हब, बैर, आतंक!
चेहरे एक से
एक ही त्वचा का रंग
फिर भी दुश्मनी

एक बार फिर
परेशान है बच्चा।

मान्यताएँ बनाई जाती हैं
टूटती हैं मान्यताएँ
मरोड़े जाते हैं अर्थ
हर बात के।
शत्रु कहाँ से आते हैं?

एक बार फिर
सोच में पड़ा है बच्चा।

देखता है बड़ों को
घबरा जाता है
उनके झूठ और छल
पड़ जाते हैं बल
उस छोटे से माथे पर।

छोटी छोटी उँगलियों
देखता है बच्चा।

बड़ों के काम
बच्चों के लिये वर्जित
उनको करने से
हो सकते हैं बदनाम
छोटे बच्चे।

आज एक बार फिर
दुनिया को एक बच्चे की तरह देखा
अचरज से फैल गई आंखें
दुनिया जैसी है
वैसी क्यों हैं।

--तेजेन्द्र शर्मा

गायब हो जाता है


हिन्द-युग्म के अप्रैल 2010 की यूनिकवि प्रतियोगिता के तीसरे स्थान की कविता की कवयित्री नीरा त्यागी ने पहली बार इस प्रतियोगिता में भाग लिया है। नई दिल्ली में जन्मीं नीरा मिरांडा हाऊस, दिल्ली यूनिवर्सिटी से विज्ञान में स्नातक हैं। ब्रिटेन के सरकारी प्रोजेक्ट्स में मैनेजर की नौकरी कर रही हैं। पिछले कुछ समय से ब्रिटेन की हिंदी बिरादरी और हलचल में कविताओं और कहानियों के
जरिये कोशिश। कवयित्री मानती हैं कि लिखना सिर्फ आसमान और वज़ूद की तलाश नहीं है, जमीन और जड़ों से जुड़ने का प्रयास भी है। 'काहे को ब्याहे बिदेस' नाम से ब्लॉग भी लिखती हैं।

पुरस्कृत कविताः गायब हो जाता है

दिन
मुझे ठगता है
हर राहगीर में एक चेहरा दिखा
अँधेरे में जा छिपता है

शाम
मुझे नंगे पाँव
बर्फ पर दौड़ाती है
यादों के पेड़ पर लिखा एक नाम
पत्ते-पत्ते पर पढवाती है

अंगुलियाँ
जबरन बटन दबा
उसे पास बुलाती हैं

धड़कने
दिन भर उसे कोस
रात को खुशबू में
उसकी
चुपचाप सो जाती हैं

वजूद मुझे
अंगूठा दिखा
उसका हाथ पकड़
इतराता है

दिल के भीतर
तिजोरी तोड़
वो मेरा चैन
रेजगारी समझ ले जाता है

मुझे तुमसे महब्बत है
मेज़ पर जमी धुल
पर लिख
वो फिर गायब हो जाता है।


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

स्वयं को जानने के लिए


स्वयं को जानने के लिए
हम देखते हैं
बुजुर्गों की तस्वीरें।
रौब दार मूँछे,
घूँघट की मासूम हँसी
और झुर्रियों की दरारों में
हम ढूँढ़ते हैं
अपनी समानताएँ।
संदूक में
फिनायल गोली के साथ रखे
उनके शादी के जोड़े ,
काली पड़ी जरदोजी की साड़ियाँ,
पीली पगड़ी,
पुराने जेवरों की गठरी।

ये चीजें
हमारी धरोहर बन जाती हैं
इनमें महकती हैं
उनकी गाथाएँ
रीतियाँ,
जो सजाती हैं रंगोली
रोपती हैं आँगन में
तुलसी का बीरा
इनको
वो सौंपते हैं
आने वाली पीढ़ी को।
तीज, त्यौहार,रिश्तों के मौसम
अतीत बुनता है,
उस की एक नाजुक सी डोर
सौंपता है
वर्तमान को
हमारे चारों ओर
फैल जाते हैं संस्कार
और हम धनी हो जाते हैं।

वो बताते हैं
भूख पीढ़े की
घात अपनों की
सही नहीं जाती
उन्होंने सिखाया
सच के पन्ने भूरे हुए
पर अभी भी धडकते हैं
ये गुनगुनी बातें
सर्द परिस्थियों में
लिहाफ बन जाती हैं।

वो कतरा-कतरा
हममें ढलते हैं
शब्द, संस्कार, आकार
और वसीयत बन के
वो मरते नहीं, जब देह त्यागते हैं
अंत होता है उनका,
जब यादों के दरख्तों पर
खिलते है बहुत से फूल
पर उन के नाम का
एक भी नहीं।

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

आँखों में अटका था बस एक ही सपना


पहनी
मोची से सिलवाई चप्पल
कि दे सके
तेरे पैरों को जूते का आराम
फटी कमीज़ तो चकती लगा ली
ताकि शर्ट तुम्हारी सिल सके
पंचर जुड़ी साईकिल पर चलता रहा
टूटी गद्दी पर
बांध कपड़ा काम चलाता रहा
ताकि खरीद सके
वो पुरानी मोटर साईकिल तुम्हारे लिए
तागी थी जिस धागे से रजाई
उनकी उम्र पूरी हुई
रुई भी खिसक के किनारे हुई
ठंडी रजाई में सिकुड़ता रहा
कि गर्मी तुझ तक पहुँचती रहे

जब भी जला चूल्हा
तेरी ही ख्वाहिशें पकीं
उसने खाया तो बस जीने के लिए
जीवन भर की जमा पूँजी
और कमाई नेक नियमति
अर्पित कर
तुझ को समाज में एक जगह दिलाई
पंख लगे और तू उड़ने लगा
ऊँचा उठा तो
ये न देखा
कि तेरे पैर उनके कन्धों पर हैं
उनके चाल की सीवन उधड गई
तेरी रफ़्तार बढती रही
सहारे को हाथ बढाया
तुमने लाठी पकड़ा दी
उनकी धुंधली आँखों से
ओझल हो गया
वो घोली खटिया पर लेटे
धागे से बंधी ऐनक सँभालते
तेरे लौटने की राह देखते रहे
अंतिम यात्रा तक
आँखों में अटका था
बस एक ही सपना
साबुत चप्पल, नई कमीज़ और एक साईकिल।

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

कहो कब आओगे?


कहो
तुम कब आओगे
अब तो
पानी में सूरज बुझ चुका
बूढ़ा बरगद
चौपाल से कट चुका है
पनघट के
प्यासे-चटके होंठों से टपकता लहू
धूल बन
गलियों-गलियों भटकता रहा
हवाओं में लगी
नफरत की गाँठ खोलने
क्या तुम आओगे
घर में
ईंटें कहतीं, दीवारें सुनती है
पगडण्डी पर ख़ामोशी
सन्नाटे को आगोश में भींचे
सहमी चलती है
चिड़ियाँ भी अब
फुसफुसा के बोलती हैं
क्या तुम आओगे
इस डर की चुप्पी को आवाज देने
या तुम आओगे
बहते हुये
चाँद के पानी में
ढल के
ओबामा के शब्दों में
भारत-अमेरिका की बातचीत में
फॉरेन रिटर्न का तमगा लिए
सुख-चाशनी की चन्द बूँदे
फटे आँचल में टपकाते
या आओगे तब
जब चूहे कुतुर लेंगे
तुम्हारी अभिलाषाएँ
इंतजार को पूर्ण विराम लगा
करेंगीं चिर विश्राम
बूढी हड्डियाँ
तब आओगे
उनको अग्नि देने
कहो कब आओगे?

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

सर्दी कुछ झलकियाँ


उसका भ्रम

बर्फ पर बे खौफ
बहुत देर तक चलती रही
वो जानती थी
कि क़दमों के निशान
उस को लौटने की दिशा देंगे
बरसते बर्फ के फूलों को
आँचल में समेट
जब वो पलटी
समय की सर्द हवा
सारे निशान मिटा चुकी थी


हरा सिंदूर

निवस्त्र हुए पेड़
मौसम से
हरितमा की
याचना करते रहे
वो बरसा
और उनको वैधव्य के रंग से रंग गया
समय बीता
आया नई सोच का मौसम
सजा गया उसकी मांग
हरे सिन्दूर से

गर्म झोंका

ठंड से जले हाथों में
चिटके गलों को ढाँपे
बर्फ के थपेड़ों से लड़ रही थी
कि हवा का गर्म झोंका
उसे पिता की गोद-सी
गुनगुनाहट दे गया
वो जानती थी
ये हवा आई है
उसी गाँव से
जहाँ गाँठ लगे ऊन से
बुन रही थी
स्वेटर उस की माँ

सर्द धुआँ

मेरे अंदर
जल रहा था
जज्बात का दिया
रिश्तों की ठंडक ने
उसे जमा दिया
सर्द-सा धुआँ उठा
मै स्वयं बर्फ बन गई

-रचना श्रीवास्तव

अब की पकड़ ढीली न हुई


जीवन में पैबंद नहीं था
फिर भी इसको ब्रान्डेड करने के लिए
पराई धरती पर कदम रखा
लड़खड़ाई घबराई
पर विदेशी आकाश में
एक कदम कोना पा ही लिया
संस्कारों की गठरी थामे
मुख्य धारा में शामिल होने की
मासूम कोशिश की
तेज थी हवा की मार
तेज थी समय की धार
तेज थी जीवन की रफ़्तार भी
इस तेजी में
हुई पकड़ ढीली
फिसल गई गठरी
बनी पांव की ठोकर
और तिनका तिनका बिखर गई
मै उन्मुक्त उड़ने लगी
खुद को उनमे से ही एक समझने लगी
कभी कुछ कटाछ
कुछ उपेछा के शब्द
चोले बदल मुझतक आये
मुख्य धारा से सिमट
मै हाशिये पर आ गई
समझने और होने का फर्क
दंश सा चुभता रहा
इन के बीच हो के भी
मै इनकी न थी
इनके जैसी न थी
कुचले बिखरे संस्कारों को
धुंधली आँखों से चुनती रही
इस पोटली में
आत्मसम्मान की गांठ लगाती रही
तेज थी हवा की धार
तेज थी समय की मार
तेज थी जीवन की रफ़्तार भी
पर अब की पकड़ ढीली न हुई

--रचना श्रीवास्तव

ख़त्म होता महीना


कुछ आश्वासनों को जन्म देता है
घर का मालिक टाँगता है
हर ज़रूरत को
पहली तारीख की नोक पर
रख ले धर्य
पहली तारीख पर ला दूँगा दवा
रात भर खाँसती
माँ से बेटे ने कहा
बाबा पेट बहुत दुखता है
चूरन भी अब काम नहीं करता है
बिटिया मिलने वाली है तनखाह
बड़े डाक्टर को दिखा दूँगा
दर्द से तड़पती बेटी से पिता ने कहा
सुनो जी फट गई है मेरी धोती
पड़ौसी की नियत भी है खोटी
धन्नो लगा ले धोती में गांठ
जैसे-तैसे बचा ले अपनी लाज
चिथड़े में लिपटी बीवी से पति ने कहा
पहली तारीख की पहली किरण
उम्मीद में जला चूल्हा,
उम्मीद की बनी चाय
उम्मीद का दमन पकड़े हर शय मुस्काए
उम्मीद के कपड़े पहन,
सजा उम्मीद की चप्पल पैर में
उत्साह भरा निकला वो घर से
लौटा तो प्रश्न भरी आँखें
चिपक गईं उससे
देखत को भेली बाटत को चुरकुना
गरीब की तनखाह का यही हाल है होना
कुछ पैसे बनिए को दिए
कुछ मकान के किराये में गए
दोस्तों का उधार चुकाया
जो बचे वो ये रहे
बेबसी पिघल के गालों पर लुढ़क गई
माँ, धन्नो और बिटिया ने
अपनी ज़रूरतों की गठरी बांध
दुछत्ती पर डाल दी
वे जानती हैं कि इन्हें करना होगा
पुनः पहली तारीख का इंतज़ार

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

....और नींद पलकों का शामियाना गिरा देती है


नींद

अक्सर आँखों में बंद होने से
कर देती है इंकार
छिटक कर पलकों की दहलीज से
किनारे पड़ी कुर्सी पर बैठ
पढ़ती है
दिन भर घटी घटनाओं की किताब
मैं भटकती रहती हूँ बिस्तर पर
गिनती हूँ चादर की सिलवटें
तिनका-तिनका बिखरे अपने वज़ूद को
समेटने के लिए
तमाम करवटें बदलती हूँ
पर बंद आँखों में भी चुभ जाती हैं
फांसें इनकी
इच्छाओं की गोरैया
पंखे से कट के गिरती है
टुकड़े-टुकड़े हुई अभिलाषाएँ
मेरा दामन पकड़ के पूछती हैं
आखिर कब तक
करती रहोगी हमारी हत्याएँ
रक्तरंजित हाथों को
धोने के प्रयास में
लाल रंग के धब्बे
उभर आते हैं दीवारों पर
घबराहट की चन्द बूंदें
छलक जाती हैं माथे पर
नींद मेरे सिरहाने बैठ
फुसफुसा के कहती है
सुकून का एक पल भी नहीं
कि मैं उग सकूँ तेरी आँखों में
रोशनी की धीमी किरण भी नहीं
कि खिल सके एक सूरज तेरी हथेली पर
पर तुझ में धड़क रहा है
एक नन्हा दिल
तेरे चारों ओर फैली नागफनी पर
एक फूल खिलने को है
इस खुशबू का दामन थाम
नींद उतरती है आँखों में
और पलकों का शामियाना गिरा देती है

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

गुजर गए बाबूजी


अमरईया की छाँव से
पूरब के एक गाँव से
सोंधे शीतल बाबूजी

जेठ में लूह की धार से
सावन की पड़ती फुहार से
नरम गरम बाबूजी

दरवाजे पर लटके ताले से
आँगन में लगे जाले से
सुरक्षा की मजबूत कड़ी बाबूजी

गीतों में लोक गीत से
सदियों से चली आ रही रीत से
कभी न बदले बाबूजी

परीक्षा के प्रश्न पत्र से
विद्यालय के नए सत्र से
सदा डराते बाबूजी

उबलते पानी पर रखे ढक्कन से
भाड़ में भुनते मकई के दानों से
बड़-बड़ करते बाबूजी

गर्म तावे पर मक्खन से
मुट्ठी में बर्फ के टुकड़े से
पिघल जाते बाबूजी

जर जर पात से
अपनों की घात से
टूट गए बाबूजी

बेटे की उपेक्षा से
बँटवारे की समस्या से
बिखर गए बाबू जी

वृद्धा आश्रम की गलियों में
टूटी सी टाली में
गुजर गए बाबूजी

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

मैं वापस मुड़ गई


जीवन वैतरणी में चलते हुए
एक दिन
संवेदनाएँ मरने लगीं
भावनाएँ आहत होने लगीं
साथ जो कभी अपना था
बेमानी लगने लगा
ख़ुद अपनी लाश
ढोने से अच्छा है
रास्ता बदल लिया जाए
दो छत्ती से अरमान उतार
बिखरे आत्मसम्मान की पोटली लिए
आशा की पगडण्डी
पर चल निकली
हवा के तीर
राहों में पड़े शब्द
पांव छिलते रहे
पर थामे सूरज का हाथ चलती रही
हजारों उँगलियाँ मेरी ओर थीं
कटाक्ष के बवंडर
आँखों में चुभे
रूह तक नंगा करते रहे
गर्द के गुबार में
खुद को छुपाती में चलती रही
कुलछनी, कुलटा, व्यभिचारिणी
ऐसी संज्ञाओं के पत्थर
मुझ पर बरसते रहे
मेरी घायल अस्मिता
दरद से तड़प उठी
पर स्वयं अपने सहारे
मैं चलती रही
इस पीड़ा में
मधुरता का अहसास लिए
शुभ लक्षण का
मुझमें प्रादुर्भाव हुआ
एक औरत
इन उल्काओं का सामना कर भी ले
पर माँ ..............नहीं
बिखरे जिस्म के टुकडों को समेट
रक्तरंजित पैरों से
स्वाभिमान को कुचलती
स्वयं से स्वयं को हारती
ममता को आगोश में लिए
मैं वापस मुड़ गई।

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

पीड़ा की गठरी


पीड़ा की गठरी
तारों की नोक पर टंगी थी
बेवफा बादल ने
उस को गला के
मुझपे ही बरसा दिया
आत्मा में
चुभे तुम्हारे शब्द मुस्कुरा दिए
मेरे आस-पास
दर्द की अमर बेलें उगने लगीं
मुझको मुझसे ही नोच
अलग करने लगी
फफोलों से रिसता मेरा वजूद
चीखता रहा
रात देहरी पर
रोती रही
माँ की दुआएं
खटखटाती रहीं
सारी रात दर मेरा
पर एक झिर्री भी न मिली
अंदर आने को

मेरा सच
मेरे पांव में चुभता रहा
दर्द की धारा
जमीं रंगती रही
मैं खुद अपनी लाश
गोदी में लिए सिसकती रही
सुबह धरती ओस से भर गई

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

राम के आने की राह


छोड़ पराई आस
खुद कुछ करने की चाह में
सूरज की खिड़की बंद की
तो तपती धरती को शीतलता मिली
बादल में सेंध लगाई
प्यासे खेतों की प्यास बुझी
नदी की तरंगों को सी दिया
तो डूबे घरों ने साँस लिया
किसान की आशा फली
घर अनाथ होने से बचा
शहरी हवाओं में गांठ लगा दिया
तो बूढ़ा पीपल मुस्कुरा दिया
उन्नति की राह खुली
तो उम्मीदें लौट के घर चलीं
नम हुई बूढ़ी पलकें
ढलती उम्र ने सहारा पाया
मेरे माथे पर
कापतें हाथों ने आशीष सजाया
फैला अपने डैने
मैं जो मौज में उड़ने को था
के कुछ ज़मीनी भगवान की सोचों ने
क़तर दिए पंख मेरे
आत्मा तक नोच
मेरे उत्साह तो खुरेद डाला
बहुत चला था रामराज्य लाने
कह के धूल में पटक दिया
मैं भी जटायु सा पड़ा धरा पर
राम के आने की राह देखने लगा

कवयित्री- रचना श्रीवास्तव

बच्चे-देश का भविष्य । चित्र और रचना (भाग-6)







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - अनुज अवस्थी

अंक - छब्बीस

माह - मई 2009






इस बार के काव्यपल्लवन के लिये अनुज अवस्थी ने जिस चित्र को भेजा उस चित्र को देखते ही कईं शे’र, कईं गीत याद आ जाते हैं। एक नज़र डालें..

नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुठ्ठी में क्या है...मुठ्ठी में है तकदीर हमारी
इन्साफ़ की डगर पे, बच्चों दिखाओ चल के..ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें झाँकी हिन्दुस्तान की..इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की..

और यह गीत तो सभी को याद होगा..

नन्हा मुन्ना राही हूँ, देश का सिपाही हूँ...

रिक्शा चलाते बच्चों का चित्र एक दयनीय स्थिति दिखला रहा है। जिसमें आज की सच्चाई और बदसूरत भविष्य नजर आ रहा है। क्या आज की तारीख में इस तरह के गाने लिखे जाते हैं? क्या बच्चों का बचपन अब समाप्त हो चुका है? जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनके ऊपर अपने अभिभावकों की उम्मीदों का बोझ होता है और जो नहीं जा सकते वो? वे मजबूरी का बोझ ढोते हैं। उपर्युक्त गीत उन बच्चों को समर्पित हैं जिन्हें हम अपने देश का भविष्य कहते हैं। 25 प्रतिशत बच्चों को देख कर हम समझते हैं कि हम भारत-निर्माण कर रहे हैं पर 75 प्रतिशत को पता ही नहीं होता कि बचपन क्या है!!

तभी तो कवि भी बच्चों के इन हालातों पर ऐसी पंक्तियाँ लिख बैठते हैं:

बच्चों के नाजुक हाथों को चाँद-सितारे छूने दो,
चार किताबें पढ़कर भी ये हम जैसे हो जायेंगे...

या फिर...

घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये...

हमारे पाठकों व कवियों ने भी मासूम बच्चों के ऊपर चंद पंक्तियाँ लिखकर अपनी भावनायें व्यक्त की हैं। लेकिन आप लोगों से एक गुजारिश है। आप केवल लिखे या पढ़े नहीं। इस देश के लिये कुछ ऐसा करें कि इन बच्चों का भविष्य सँवर सके। सरकार को दोष न दें। हमें स्वयं उठना होगा। हम चाहते हैं कि इस तरह के चित्र पर कभी काव्यपल्लवन न हो!!!



आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
मुकेश कुमार तिवारी | मनु ’बेतखल्लुस’ | एम ऐ शर्मा " सेहर" | रचना श्रीवास्तव | मुहम्मद अहसन | शन्नो अग्रवाल | सीमा सिंघल | रवि मिश्रा | संगीता सेठी | सुरिंदर रत्ती | सजल प्यासा | मंजू गुप्ता | सौरभ कुमारअनुज शुक्ला | परवीन अग्रवाल

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






मैंने,
इन्हें नही देखा कभी स्कूल जाते
रंगबिरंगी यूनीफार्म में सजे
पीठ पर लादे हुये बोझ
या दौड़ते तितलियों के पीछे
पेट भर खाने के बाद

मैंने
जब भी देखा इन्हें
तो सीखते मिले जिन्दगी की पाठशाला में
पीठ पर कैसे लादा जा सकता है बोझ
और कितनी दूर तक ढोया जा सकता है
एक ही साँस में बिना रूके

बाप,
के कदमों की छाप पर
रखते हुये पैर
सीखा रास्ता घर से कितनी दूर तक जाता है
और कैसे लौटता है
जब सूरज उबासिया ले रहा होता है
या चूल्हे में मचल रही होती हैं लकड़ियाँ

माँ,
के हाथों की लकीरों को
यह पढ रही होती हैं
गोबर की छाप में कंडों(उपलो) पर
या लिख रही होती हैं अपना नाम
राख के ढेर में उंगली से उकेरते हुये
और ढाल रही होती हैं
आदत,
बर्तन मांजते हुये

बचपन,
शायद इसी को कहते होंगे
ऐसा यह भी समझते हैं
और मैं भी
हो सकता है आप नही?

--मुकेश कुमार तिवारी




कोई बोले नेता कल के,
और कोई बतलाये मवाली
खस्ता बचपन देख के सोचा
क्या हरियाली, क्या खुशहाली
हो सकता है अब दिन बदलें,
है सरकार बदलने वाली
पेट को सूखी रोटी दूभर
आँखों में पकवान खयाली

खेंप नए वोटर की है ये,
जिस्म उघाडे, पेट सवाली

--मनु ’बेतखल्लुस’




ये देश के नंगे ,भूखे बच्चे
कुम्हलाये सहमे बदरंग से बच्चे
खाने का ठिकाना ना पहनने की सुध
नादाँ अनबूझ पहेली से बच्चे......
जरा इनके चेहरे की रौनक तो देखो
हर हाल मुस्कुराता ये जीवन तो देखो
हँसी शरारत ये मौज ये मस्ती
मासूमियत का ये मंज़र तो देखो......
ममता के आँचल को तरसते सिसकते
सहारे को इक हाथ ढूढते झिझकते
गर इक हाथ हम ही हैं बढाते
क्या देश के ये किसी काम न आते ??

--एम.ए. शर्मा




जीवन की जरूरतों से खेलता हूँ में
धुप के साये में
पलता हूँ मैं
बह न जाये आँखों से दर्द मेरा
मुस्कान एक चेहरे पर
ओढ़ लेता हूँ मै
अर्ध नंग्न है भविष्य भारत का
हुक्मरानों से ये बे खौफ
कहता हूँ मै
चिपका के बच्चों को जब ठंडे मे सोते हो तुम
चिल चिलाती धुप में तब
ठेला खीचता हूँ मै
सपने सूख के जब झड़ने लगते हैं
उम्मीद की नमी से
उनको सीच लेता हूँ मै
आज हो जायेंगे दवा के पूरे पैसे शायद
यही सोच हर रोज
घर से निकलता हूँ मै
जेब खाली पेट खाली फिर भी
नेताओं और ललित को
सलूट करता हूँ मै
देख मेरी तस्वीर कविता लिखने वालों
कुछ उम्मीद तो
तुम से भी रखता हूँ मै

--रचना श्रीवास्तव




तस्‍वीर में ही नहीं हम तो सदा साथ रहते हैं,
मुश्किलें कितनी भी आयें सदा हंसते रहते हैं ।

कोई आकर हमें अभी डांट भी जाएगा पर हम,
इन बातों को अब दिल से नहीं लिया करते हैं ।

पल कैसे भी नाजुक हों नन्‍हीं सी मुस्‍कान से,
हम अपने संग सब को बहला लिया करते हैं ।

कोई सपना अधूरा ना रहे साथ विश्‍वास के,
एक कदम लक्ष्‍य की ओर बढ़ा लिया करते हैं ।

वंदन संग अभिनन्‍दन मातृभूमि का खेल खेल में,
साथियों को अपने सदा सिखला दिया करते हैं ।

--सीमा सिंघल




खींसें निपोर लो
मसखरी कर लो
हंस लो
उचक फांद लो दो चार साल
अंततः तो जिंदगी की गाडी में जुतना ही है
किसी दफ्तर में चपरासी
कोई छोटी मोटी दूकान
कोई छोटा मोटा धंधा
कोई छोटी मोटी अपराध की जिंदगी
क्षुद्र जीवन , क्षुद्र संघर्ष
शादी ब्याह बच्चे
और बहुत जल्दी यह चक्र भी पूरा

दर असल मेरे कहने के पीछे एक कारण है
देश की किसी पिछली गली के गड्ढे में
उगे बच्चे चमत्कार नहीं करते है ,
सशक्त हस्ताक्षर नहीं बनते हैं ,
कहीं हजारों में ही कभी कोई विराट बरगद हो पाता है

देश के जनतंत्र को सलाम !
परन्तु परम्परागत व्यवस्था में ,
चपरासी का बेटा अमूमन चपरासी ही होता है,
धूल से धूल ही उगती है ,
और गोबर से गोबर ,

फोटोग्राफर साहेब के लिए भी तो तुम मात्र
फोटोग्राफी का ही तो एक अच्छा विषय हो ,
'मलिन बस्ती के हंसते कौतुक पूर्ण बच्चे '
न इस से अधिक न इस से कम

--मुहम्मद अहसन




ओ बाबू, ओ साहिब, ओ मेम साहिब
कब से यहाँ इन्तजार कर रहे हैं
किसी सवारी का
क्या आपको है कहीं जाना
अरे आप इधर आइये ना
बस कुछ पैसे मिल जाएँ तो
ले चलेंगे हम आपको
जहाँ भी है आपको जाना.

मेरा बापू घर पर बैठा रहता है बेकार
दिनभर फूंकता है बीडी
माँ कराहती है बीमारी से
भाई-बहन सभी मुझ पर हैं निर्भर
दवा के बिना, कभी अन्न के बिना
भूखे पेटों को मसोस कर हमें
जीना पड़ता है कभी-कभी
मेरे ही कन्धों पर टिका है सारा घर.

जिन्दगी घिसटती रहती है और
हमारी उम्मीदों का सूरज
हर सुबह उगता है पर
हर शाम के संग डूब जाता है
दो बख्त रोटी के लिये
ही तो मुस्कुराते हैं
इन रोटियों से जिंदगी चलने का
कितना अजीब सा नाता है.

बसंत- बहार आती है ऋतुओं में
हमारे जीवन में तो
आंधी, शीत और पतझर
हमेशा ही बने रहते हैं
पसीना टपकता है माथे से
नंगे पैरों, हांफते हुए
मेहनत-मजदूरी करते हैं
सबकी सुनते और सहते हैं.

दहकते हुए सूरज के नीचे
तपती दुपहरी और आंधी में
झम-झम बरसते पानी में
तरबतर भीगते हैं
अध ढंके गात लिये अरमानों
की सौगात लिये
हम पेट की खातिर ही तो
सारा दिन इतना बोझ खींचते हैं.

--शन्नो अग्रवाल




सलाम साहब
हमारा सलाम क़ुबूल करें
सलाम साहब
ये सलामी है नंगी तकदीर की
भूख झलकाती भारत की तस्वीर की
जो सालों में हमारे लिए गढ़ी गई है
पंचवर्षीय योजनाओं के तहत रची गई है
सलाम साहब................
आप आये तो अच्छा लगा
लेकिन आप को क्यों मै बच्चा लगा
मेरी उम्र तो उतनी पुरानी है
जितनी पुरानी इस गणतंत्र की कहानी है
सलाम साहब...............
ज्यादा कहां शिकायत है
शिकायत के कहां हम लायक हैं
कुछ खाने को लाते तो अच्छा लगता
अब बातों से पेट नहीं भरता
सलाम साहब...............
वैसे इस लोकतंत्र में हम सलामी ठोक जीने के रास्ते बनाते हैं
सो जनतंत्र में हम जनता सिर झुकाकर ही इसे बचाते है
हम भी झुका रहे हैं
मजबूरी है फिर भी मुस्कुरा रहे हैं
सलाम साहब.............
इस बार हमारी गलियों में कुछ लोग आये
भरोसे और वादे की नई खुराक़ खिला गये
गोदी में भी उठाया, प्यार से पुचाकारा
नीचे उतारा, फिर उन के नाम का बुलंद हुआ नारा
उनको भी , सलाम साहब..........
कह गये है फिर आयेंगे
जीत जायेंगे, सरकार बनायेंगे, हमारी ग़रीबी मिटायेंगे
है अब बस यही एक आस
कि पांच सालों बाद जब वो आएं
तब तक हम नरकंकालों में बची रहे सांस
तबतक के लिए .................
सलाम साहब............

--रवि मिश्रा




ऐ देशवासिओं इन्हें संभालो

ऐ देशवासिओं
इन्हे संभालो
इन नन्हे नाज़ुक बच्चों को
जो बच्चे भूखे मरते हैं
जो बच्चे घर-घर फिरते हैं
जो बच्चे अंधियारे में है
ऐ देशवासिओं
इन्हें संभालो
यही देश की आन है
यही देश की शान है
यह मत सोचो
चंद अमीर बच्चों की
मुस्कानों से यह देश चमक उठेगा

--संगीता सेठी




आज़ादी के बाद भी, इन्कलाब न हो सका,
हमारे बच्चों के वास्ते, एहतसाब न हो सका
मासूम भला क्या जानें, हयात की दुशवारियाँ,
कलम, दवात, किताब का, हिसाब न हो सका
एक मासूमियत ही, झलकती चेहरे पे,
किसी हरे-भरे चमन का, गुलाब न हो सका
ज़िन्दगी तीरगी में, क्या होगा हासिल,
अपने घर को रौशन करे, वो आफताब न हो सका
एक रद्दी चीज़ कोई, जैसे किसी घर की,
सड़क पर पड़ा संग, दुरे नायाब न हो सका
माना के ये वक़्त, बच्चों की मस्ती का,
बिना तालीम के कोई, कामयाब न हो सका
आज भी बरहनगी, देखी तंग गलियों में,
बदन ढकने का पूरा, खवाब न हो सका
मेरे मुल्क की तरक्की में, कई परेशानियां "रत्ती"
तालीम का बड़ा दायरा, दस्तयाब न हो सका
शब्दार्थ:
एहतसाब = प्रजा की रक्षा के लिये व्यवस्था करना, हयात = जीवन
दुशवारियाँ = कठिनाईयाँ, तीरगी = अन्धकार, आफ़ताब = सूर्य, संग = पत्थर
दुरे नायाब = अमूल्य मोती, तालीम = शिक्षा, बरहनगी = नग्नता,
दस्तयाब = प्राप्त

--सुरिंदर रत्ती




गरीब...नाम तो सुना होगा,
बड़ी आसानी से तुम स्वीकार गये,
की बड़े बड़े देशों मे ऐसी
छोटी छोटी बातें होती रहती है,
ये गरीबी,भूखमरी,ये कंगाली
एक आदत बन चुकी है,
तुम्हारे लिये भी,मेरे लिये भी,
हमे इस कदर आदत हो गयी है,
आज गरीबी दिखती है
हमारी नज़र में,हमारे अंदाज़ में,
और तुमको आदत पड़ चुकी है
इसको आदतन नज़र अंदाज़ करने की।
लेकिन क्या करूँ हाय
हमारे भी दिल में कुछ कुछ होता है,
ये बेहया सी अभिलाषाएँ,बेशरम से सपने,
हमारी झोंपड़ियों में,कभी बंजर पड़े खेतों मे
बेरोकटोक आते जाते रहते है,
और जब ये ख्वाब छटपटाते है,
तो हमारे बाबा हमे बताते है,
ये गरीबी अपने लिये आज
एक लक्ष्मण रेखा बन गयी है,
इस समाज ने हमे ऐसा रावण बना डाला है
जो लाख चाहे,ये रेखा पार नही कर पाता।
इंसान एक बार जीता है,एक बार मरता है,
कहते है बस एक बार प्यार करता है,
इसी तरह एक ही बार आता है बचपन,
बचपन,एक ऐसा जादूगर,
जो जागी आँखों से ख्वाब दिखाता है,
बचपन एक ऐसा सम्मोहन,
जो हमे हमारी सीमाएँ भुलाता है,
एक गरीब और एक अमीर बच्चे के लिये
ज़मीं और आसमाँ की दूरी में फ़र्क नही होता,
ये बचपन ही तो है जो
अभाव रहित और अभाव सहित दोनो जीवन मे
उड़ान और उत्थान के अरमान जगा सकता है,
इसी माया,इसी मोहपाश,इसी सम्मोहन,इसी जादू
मे हम जकड़े हुए है,छूटना भी नही चाहते,
कयोंकि ऐसे ही खुश है हम,
कभी ये सोचके की हम खुश है,
कभी ये सोचके की कभी हम खुश होंगे।
हाय हाय रे हाय ये इंसा,हाय हाय रे हाय,
तुम कौन होते हो फ़ैसला करने वाले,
कि हम जीवन भर खुश नही रह सकते,
मूर्ख अमीरजादे! कमी हममे नही,
तुममे, तुम्हारी व्यवस्था में है,
देश का भविष्य हम भी है
पर नंगे खड़े है,बेआबरू से,
लेकिन ये बचपन हमे याद दिलाएगा,
हम भी चहकना,मुस्काना जानते थे,
कल अगर रोटी ना मिली तो आज को याद करेंगे,
जन भूखे पेट खेतों में भागते खेलते रहते है।
कोई भारत उदय हमे फ़ील गुड नही करवाएगा,
हमारे मन की शांति हमारे मन मे है,
आसमाँ की छत के नीचे बैठा हर इंसान
एक,दो,तीन,चार कितनी भी रोटियाँ खाने वाला,
खुश रहेगा,हंसेगा,इस खिलखिलाते बचपन की तरह,
कुछ कुछ होता है दोस्त...
तुम नही समझोगे !!

--सजल प्यासा




भारत माता के हम हैं लाल
मस्त बेफिक्र अल्हड़ सा है जीवन
फूल सा खिलखिलाया बचपन
नफरत भेदभाव न करते हम
एकता का सौरभ लुटाए हम
भारत माता के हम हैं लाल
हमीं में छिपे गांधी इंदिरा लाल
सम्प्रदायों की तोड़ें दीवार
धर्मनिरपेक्षता की हम हैं शान
संसार के हम हैं सूरज चॉंद
भारत माता के हम हैं लाल
गाँवों में बसा है हिंदुस्तान
मैत्री की रिक्शा पर हम सवार
पैट्रोल बचत का रच इतिहास
प्रदूषण मुक्ति का दे पैगाम
भारत माता के हम हैं लाल
इनके जज़्बे को मंजु करे प्रणाम
जयहिंद का गा रहें जयगान
भविष्य की प्रगति विकास के प्राण
इनसे बनता प्यारा हिंदुस्तान

--मंजू गुप्ता




अधनंगी तलवारे
जीवन रथ पे
खड़े शहर के
अधनंगी तलवारे देखो.
भारत माँ को
बेशर्म हाथों से आये बचाने
नए सहारे देखो.
सोच नयी है, रंग नया है
छा जाने का ढंग नया है
सागर में अभी जैसे
फूट पड़े फ़व्वारे देखो.
सरकारे तुम आ जाते हो
दान हमारे ले जाते हो
अ़ब न सोचो ये सब होगा
हमने आँखे खोल रखी है
हाथों में बारूद भरी है
तुम नजराने अब नए हमारे देखो..

--सौरभ कुमार




बचपन
आधे भारत का सच है,
पाश कालोनियो के पीछे से होकर -
एक गली जाती है, जहाँ
गंदगियो के बिच, जिन्दगी की -
जद्दोजहद जारी रहती है जीवन पर्यन्त........
बार - बार कोशिश करते है कि-
कब हम , झुग्गियो से सेक्टरो और
अपार्टमेन्टो मे पहुन्च जाये सदा- सदा के लिये
इन गलियो को लाँघकर .
पर ,
हर कोशिश बेकार जाती है
दिल्ली वालो तक - आवाज नही पहुँच पाती है
१० के राष्ट्रकुल खेलो और रक्छा सौदो कि -
तैयारियो के शोर के बीच
आवाज
दबकर रह जती है.
मन्त्रालयो राहत की बाट जोहते,
कब निकल जाता है
बचपन
कूड़ा बीनते , रिक्शा खींचते........................

--अनुज शुक्ला




बदल रहा हे हिंदुस्तान, क्या तुमने कही देखा हे!
बदल रही हे तस्वीर गाँव की, क्या तुमने कही देंखी हे!
खो गया हे बचपन मेरा, क्या तुमने कही देखा हे!
कहाँ सो गयी तकदीर हमारी, क्या तुमने कही देंखी हे!
आती हे लहरें समुद्र में, क्यूँ पहुचती नहीं मुझ तक!
कहाँ खो जाती हे वो, या रास्ते में ही सो जाती हैं वो!
सरकार बनती हेई योजनाय बहुत, पर क्या तुमने उनको देखा हे!
क्या में कभी पढ़ पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
क्या में कभी तन डाख पायूँगा, क्या तुमको इतना भरोसा हे!
लगता हे सारा बचपन यूँही नंगा गुजरेगा!
वक़्त तो गुजरेगा बहुत, पर गरीबी की जगह सिर्फ एक और गरीब ही गुजरेगा!
क्यूँ नहीं बुलाते तुम उसको, जो तन पर हमारे कपडा दे!
इस बुखे पेटको बहरने को, जो हमको थोडा खाना दे!
नहाने और धोने को एक गुसलखाना दे!
पर पक्की इत्टो का, छोटा मगर एक आशियाना दे!
यही सोचकर दोस्तों में यह रिक्शा लेकर जाता हूँ!
अपनी रूठी किस्मत को जगाकर लाता हूँ!
अपनी और तुम्हारी आँखों की उम्मीद बुलाकर लाता हूँ!
पर बतलाना सही-सही क्या तुमने हमारी अछि तकदीर को अपनी इन आँखों से देखा हे!

--परवीन अग्रवाल



नेता, चुनाव, राजनीति, लोकतंत्र, वोट और 13 कवि







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - लोकसभा चुनाव-लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव

अंक - पच्चीस

माह - अप्रैल २००९






३० अप्रैल २००९। आज हम सबसे बड़े लोकतंत्र के महोत्सव के तीसरे पड़ाव तक पहुँच गये हैं। ११ राज्यों के करोड़ों लोग लम्बी कतारों में खड़े होकर हमारे देश के भविष्य को चुन रहे हैं। और यहाँ हमारे कवि भी इसी चिन्तन में हैं कि किस तरह से हमारे देश को हर तरह से सम्पन्न बनाया जाये, एक क्रांति लाई जाये और हर कोई गर्व से कह सके "मेरा भारत महान"। जिस तरह हम नेताओं को उनका फ़र्ज याद दिलाते रहते हैं हम भी समझें कि वोट डालना हमारा अधिकार भी है और फ़र्ज़ भी। हमारे कवि "जूतों" के बारे में भी कह रहे हैं, राजनीति में घुस रहे बाहुबलियों की बातें भी कर रहे हैं। पिछले दिनों ही ’आवाज़’ के संचालक सजीव सारथी ने भी चुनावों के मद्देनजर अपनी बात रखी। आइये आज पढ़ते हैं हमारे कवियों को। मनाते हैं "लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव"।

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।



*** प्रतिभागी ***
सत्यप्रसन्न | मंजू गुप्ता | मुकेश कुमार तिवारी | प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध | शन्नो अग्रवाल | मुहम्मद अहसन | विवेकरंजन श्रीवास्तव | रचना श्रीवास्तव | संगीता स्वरूप | मनु ’बेतखल्लुस’ | डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी | आलोक गौड़-डा नीरज जैन-सुरिंदर रत्ती

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~






जमी झील में कंकड़ी, फेंक रहे हैं लोग।
क्यों हिलोर उठती नहीं, लगा रहे अभियोग॥
रोटी ठंडी आग पे, सेंक रहे अख़बार।
चाकू रखकर जेब में, बेच रहे बस धार॥
जिनके कांधे है पड़ी, उनकी अपनी लाश।
वे भी दावा कर रहे, बदलेंगे इतिहास॥
करवट ली है वक्त ने, रही न अब वो बात।
जीत रहे खरगोश अब, कछुए खातॆ मात॥
गठबंधन तो हो गया, पर रिश्ते बेमेल।
चली छोड़कर पटरियां, सम्बंधों की रेल॥
कल तक जो हरते रहे, संविधान की चीर।
वो फिर लिखने जा रहे , हम सबकी तकदीर॥
कीचड़ में लिपटे हुए ,चेहरे सभी समान।
किससे हैं महफूज़ हम, सांसत में है जान॥
हर अंधे धृतराष्टृ को, सिंहासन की चाह।
होता हो फिर क्यों नहीं, चाहे देश तबाह॥
संदेहों की जेल में, आशाएं हैं कैद।
तिस पर दुर्दिन हैं खड़े. पहरे पर मुस्तैद॥
असमंजस में आज है, फिर से अपना देश।
चुन लें ख़ूनी सन्त या, फिर डाकू दरवेश॥

--सत्यप्रसन्न





देखो आता पाँच साल बाद चुनाव
होती नाव उम्मीदवार की आर पार
आया भारत के लोकतंत्र का महापर्व
हमें इस हथियार पर होता महागर्व

सत्ता और विरोधी निर्दलीय करें प्रचार
आपस में कटू वाणियों में करते प्रहार
जूता फेंक का देखो आया है व्यवहार

रैलियों में भीड़ जुटाने आते फिल्मी स्टार
भाषण में भूल जाते उम्मीदवार का नाम
पार्टियों का उड़ाते खूब माल
वोट नोट की खेलते चाल

करो मंजु सही मतदान
बने सर्वश्रेष्ठ सरकार
जिससे हो देश का विकास
दूर हो भ्रष्टाचार बेरोजगार

--मंजू गुप्ता





प्रजातंत्र के पर्व पर, होत शाही स्नान ।
सभी प्रजाति कूद पड़ी, खूब रचावै स्वांग ॥

लाऊडस्पीकर पर हो रहा, यश-कीर्ती गान ।
छुटभैये गाल बजाकर, पा रहे सम्मान ॥

लालू पीले हो गये, हुये मुलायम सख्त ।
दोऊ लारि टपिका रहे, देखि ताज-ओ-तख्त ॥

पासवान पांसे चले, अमर चलावै दांव ।
शरद हूँकारी भर रहै, होवत कांव-कांव ॥

माया ठहरी मायावी, खूब अलापै राग ।
छींके पर अटकी नज़रें, कब जागेगें भाग्य ॥

सांप सूंघ गया वाम को, हुआ तीसरा फैल ।
चौथे की तैयारियाँ, खूब चला यह खेल ॥

अड़वाणी रथ लै भटिकै, छेड़े अपनी तान ।
भैरों रूठे रह गये, वरूण चलावै बाण ॥

हाथ हैं तरसे साथ को, कितै ना दीखे ठौर ।
सत्ता सुख की चाह में, भटकै चारो ओर ॥

राहुल धूल फांक रहै, हुईं सोनिया त्रस्त ।
राजनीति भगवान बचाये, रहैं मुकेश मस्त ॥

ढोल बजै ताली बजी, गलियन होय पुकार ।
नेता देहरी लाँघ रहैं, होवे जय-जयकार ॥

खुद ही माला पहनकर, जोड़े दोनो हाथ ।
वोट माँगते फिर रहैं, जिनके सिर पर ताज ॥

साड़ी बँटी दारू बँटी, और कम्बल का ढेर ।
चला रहै सब दांव-पेंच, ये कुर्सी के शेर ॥

नोट-वोट का घाल-मेल, चलेहिं सालों साल ।
नेता गब्बर हो गये, जनता भई कंगाल ॥

वादों की बौछार है, नारों की बरसात ।
यह मौसम की बात है, बाद किसे है याद ॥

फिर बारी पर ठगी गई, जनता देखे राह ।
लूटने फिर अईहैं, पाँच बरस के बाद ॥

जाति पाँत भाषा धर्म, ने बाँट दयौ इंसान ।
वोटरलिस्ट में सिमट गई, अब उसकी पहचान ॥

भाग्य बंद पेटी हुआ, उपर चढती साँस ।
रोज मनौती कर रहे, डगमग है विश्वास ॥

लात चली घूंसे चले, हो जूतम-पैजा़र ।
हिस्ट्रीशीटर देश के, बन गईले सरकार ॥

--मुकेश कुमार तिवारी




राजनीति से उड़ गया, देश प्रेम का रंग
छिड़ी हुई है दलों में सिर्फ स्वार्थ की जंग

खेल कर रहे सभी दल चुप जनता के साथ
करते बस बातें बड़ी दे भाषण दिन रात

पिछले अनुभव से गया खो मन का विश्वास
बातों मे सच्चाई कम है ज्यादा बकवास

लोगों में क्यों रुचि रहे या श्रद्धा के भाव
वादे तो मीठे मधुर मन में मगर दुराव

स्वार्थ नीति ही प्रमुख है राजनीति में आज
उदासीन है लोग सब बेबस सकल समाज

देखा है जब जब हुये जहां भी कहीं चुनाव
सभी दलों में आपसी बढ़ जाते टकराव

जन सेवा औ " समझ का कहीं न सही प्रचार
सुनने आते प्रलोभन औ" बीमार विचार

धोखे ही खाने मिले हर चुनाव के बाद
मत दाता का मत हुआ बार बार बेकार

दुनियां बस उनकी बसी जिनकी हो गई जीत
काम किये सबने सदा वादों के विपरीत

है चुनाव चक्कर अजब इसमें फंसकर लोग
पाल लिये करते सभी लेन देन का रोग

लोकतंत्र की भावना का दिखता विद्रूप
पावन होते तंत्र भी घिस पिट हुआ कुरूप

इसी लिये मिलती खबर जूता मारी खून
जिसकी लाठी साथ हो उसका ही कानून

--प्रो.सी.बी. श्रीवास्तव विदग्ध




ना चाहकर भी कुछ यहाँ
हम भी कहना चाहते हैं
हो रहा है कितना हल्ला
बस यह बताना चाहते हैं.

यह जोश, यह चीखना सब
बस केवल चुनावी बुखार है

जनता की भावनायों पर
यह एक सीधा प्रहार है.

हर किसी ने बना लिया है
यहाँ पर अपना-अपना hero
रात-दिन चीखते हैं मिलकर
इनमें कुछ अकल के zero.

कभी-कभी कुछ उम्मीदवार भी
उनके साथ प्रकट हो जाते हैं
पक्ष में करने को अपने वह
जनता के निकट हो जाते हैं.

भीड़ में घुसकर कभी वह
बच्चों की नाक पूँछ देते हैं
कभी रोते बच्चों को माँ की
गोद से लेकर चूम लेते हैं.

इस जानी-मानी सी कला में
यह सब लोग कितने दक्ष हैं

दिखाकर यह सारे कारनामें
जीत लेते जनता का पक्ष हैं.

कोई कहता इनमें बार-बार
'रामलला हम फिर आयेंगे
वादा करके जाते हैं आकर
मंदिर फिर यहीं बनायेंगें'.

या गरीब के घर रोटी खाने
कोई आंधी जैसा है आता
जगह बनाकर उसके दिल में
भगवान के जैसा बस जाता.

ना भूलो यह झूठे वादों से
दिल तोड़ने में माहिर हैं
समय आने पर भूल जायेंगे
सबको यह बात जाहिर है.

पता नहीं कहाँ-कहाँ से यह
इतने चमचे बटोर लाते हैं
फिर खुली जीपों में खड़े होकर
सब गला फाड़कर चिल्लाते हैं.

झूठे वादों से फुसलाकर यह
जनता को खूब फ़ूल बनाते हैं
उनके दिल जीत लेने के बाद
अपने वादों को भूल जाते हैं.

जेल में जाते हैं तब भी तो
इनका नाम ऊंचा ही होता है
वहीँ से ही बैठे-बैठे चमचों से
उन सबका सारा काम होता है.


वोट जिस किसी का भी हो
इतना भी सस्ता ना होगा
फिर भी आजमाने के लिए
कोई और रास्ता भी ना होगा.

--शन्नो अग्रवाल




सूरज सुबह उगता है
सुबह सुहानी लगती है
भारत बुलंद है

चिड़ियाँ चहचहाती हैं
फूल मुस्कराते हैं
भारत बुलंद है

आस्था हो न हो
मंदिर हैं , मस्जिद है
भारत बुलंद है

बिजली हो न हो
बिल तो आता ही है
भारत बुलंद है

सड़कें हो न हों
मंजिलें तो हैं
भारत बुलंद है

शिक्षक आये न आयें
शालायें हैं , छात्र भी
भारत बुलंद है

रोजगार मिले न मिले
स्वरोजगार योजना जो है
भारत बुलंद है

अपराध बढ़ते है तो बढ़ें
पुलिस है , अदालतें भी
भारत बुलंद है

उद् घाटन की नौबत आये न आये
शिलान्यास तो हो रहे हैं न
भारत बुलंद है

आबादी आबाद हो न हो
६०० करोड़ वाले नेता आबाद हैं
भारत बुलंद है

मंहगाई घटे न घटे
मुद्रा स्फिति की दर तो घट रही है
भारत बुलंद है

आमदनी हो न हो
कर्ज लो ,खर्च करो
भारत बुलंद है

उम्मीदवार पसंद हो न हो
वोटर हो तो वोट करो
भारत बुलंद है

--विवेक रंजन श्रीवास्तव




नेता बुद्धिमान हत्यारे होते हैं
वो शारीर नहीं मारते
बड़ी चालाकी से
लेलेते है हमारा वो समय
हमारे वो शब्द ,हमारी वो आवाज़
जिसमे हम रहते हैं .

हमारे छोटे छोटे सुखों की
छाँव ढूंढ लेते हैं
ढूंढ लेते हैं
हमारे दुखो और जरूरतों की गुमटियाँ
बिठा देते हैं पहरे
उसके मुहाने पर

सब्ज बाग कुछ यूँ दिखाते हैं
स्वर्ग यहीं होगा
हम मान जाते हैं
वादों को
कपट जाल तले बिछाते हैं
किस्मत के मारे
हम जब इसमें फस जाते हैं
तब पर हमारे क़तर देते हैं

कहते हैं झूठ
पर कुछ इस तरह
के वो हमारी ही
अवाज लगने लगता है
सत्ता में आते ही
उनका सच होता है बेनकाब
और ठगी जनता
तलाशती है नया सहारा

हमारे शब्द
यदि उनके खिलाफ हों
उसका फंदा वो हम पर ही कसते है
और उसी से कर देते हैं
हमारी हत्या

--रचना श्रीवास्तव




लोकतंत्र का उत्सव
मना रहे इस बार
जनता नेताओं से
खाये बैठी है खार .
जनता के हाथ में
आ गया एक हथियार
जूते से हैं लैस सब
चलाने को तैयार .
नेताजी अब सोच रहे
कैसे होगा बेडा पार
भरी सभा में डर रहे
क्या रखें अपने विचार ?
जनता से कर धोखा
और करके अत्याचार
आज खड़े हैं आ कर वो
जूते का पहने हार .
त्रस्त हुई अब जनता
नेताओं पर कर विश्वास
पर नेताजी घूम रहे
लेकर जीत की आस .
कोई नहीं है ऐसा नेता
जो सुने जनता की पुकार
जनता तो ठगी ही जायेगी
आये कोई भी सरकार ..

--संगीता स्वरूप




रैली ,परचम और नारों से कर डाला बदरंग
शहर वोटर को फिर ठगने निकले, नेता बनकर नटवरलाल
कैसे छांटें इन चेहरों में अपनी मर्जी का लीडर
जीत के बाद सभी कर देते हैं पब्लिक का दम बेहाल

--मनु ’बेतखल्लुस’




ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

नेता पहुंचें गली गली बात बनावें बड़ी बड़ी
रात का सपना दिन माँ दिखलावें, लगाएं वोट की गुहार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बाँट बाँट के जाति बिरादरी सब अपना उल्लू सीधा कीन्हिन
खड़ी किहिन दौलत कोठी अपनी लै के वोटवा हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

जस त्यौहार खतम चलिहैं नेता जी दिल्ली, बनिहैं मंतरी
कोठी बंगला गाडी छोड़ के फिर कहाँ झोपड़ी माँ हमार !
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

बीत गयी उमरिया अपनी देखत सब चुनाव का हाल
न गाँव माँ कछु बदला न बदली किस्मतिया हमार
ओ बबुवा सुन ले रे आवा लोक तंत्र का त्यौहार

--मुहम्मद अहसन




लोक सभा चुनाव
लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव
चुनाव आयोग सशक्त,
आचार-संहिता तोड़ते
राजनीति के भक्त,
चुनाव-घोषणा पत्र
जनता रूपी प्रेमिका को
बेबफा-प्रेमी नेता का प्रेम-पत्र
तारे तोड़कर लाने के वादे,
लूटकर प्रेमिका को,
प्रेमी वादे भुला दे,
बेच दे उसको, वैश्यालय पहुँचा दे।
चुनाव-उत्सव
होली का त्योहार,
रंग-बिरंगे रंगों का उपहार,
सभी उड़े रंग
जनता रह गयी दंग
बचा केवल रंग काला
चुनाव-गंगा बन गई नाला
सभी दल फँसे दल-दल में,
नेताओं के चेहरों पर
पुती है कालिख
आओ वोटर!
वोट बेच, कीमत वसूल
थोड़ी कालिख,
अपने चेहरे पर भी मल
अब नहीं रहा तू नाबालिग
वोट डाल चुनाव से हों फारिग।
संसदीय चुनाव
दीपावली का त्योहार
दीपों का उपहार,
दीपक का तेल हुआ गुमनाम,
स्विस बैंक के खातों में,
वोटर आते बातों में,
बाती को भी हड़पने की लगी,
नेताओं में होड़
तू टिकिट के लिए लगा दे दौड़,
जनता को छोड़।
दीपावली है,
चुनाव का जुआ खेल,
बाती को लगा दे दाँव पर,
जरा सा लगा के तेल
भारतीय, नारी, संस्कृति व विचार,
बचे हैं दाव पर लगाने को यार,
पश्चिमी-पारदर्शी-आकर्षक-नग्नता के आवरण में लपेट,
लगा दाव पर, भर ले अपना पेट।
संसदीय चुनाव,
रक्षाबंधन का त्योहार,
बाँधकर रक्षासूत्र,
जनता सौंपती लोकतंत्र की रक्षा का भार,
नेताओं के लिए रक्षासूत्र,
चुनाव तक की दरकार,
तोड़ देंगे चुटकी में,
बस बन जाए सरकार।
रक्षासूत्र ही बनेगा कामसूत्र,
रक्षासूत्र बाँधने वाली को ही
अंकशायिनी बनने को कर देंगे मजबूर,
वस्त्रों को कर तार-तार,
इसी के कर-कमलों से पहनेंगे,
जीत के हार।
विजयादशमी होगी,
चुनाव-परिणामों की घोषणा,
वोटर की मजबूरी है,
किसी ना किसी को,
वोट देना जरूरी है
यदि बहुमत नहीं मिलेगा,
सभी हो जायेंगे सवार
तभी सत्ता का रथ चलेगा
सभी एक-दूसरे के गले लगेंगे,
हम मिलकर सहयोग करेंगे,
यूपीए,राजग,तीसरा,चौथा या पाँचवा मोर्चा,
और सभी दल स्वतंत्र,
दल ही नहीं निर्दलीय उम्मीदवार भी
लोक को छोड़ पीछे,
अपनायेंगे सत्ता-तंत्र।
सभी का धर्म एक है,
सत्ता सभी की टेक है।
तंत्र पहनायेगा,
इन्हें जीत के हार,
जनता भले ही हो बेजार,
ये धर्म की रखेंगे लाज,
धार्मिक पर्यटन बढ़ायेंगे,
धार्मिक-स्थलों पर शराब पार्टी मनायेंगे,
होगें नग्न-नृत्य,
सभी वोटर बन जायेंगे भृत्य,
इनकी तिजोरी देखना,
वही होंगे इनके कृत्य,
जनता का हो राम नाम सत्य।

--डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी




हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

तब कि बातें और थी तब लोगों को ज्ञान था
कथनी और करनी का अंतर गाँधी जी को ध्यान था
बच्चे से गुड़ खाना छोड़ो उस दिन तक ना बोले थे
जिसदिन तक गुड़ खाने का खुद बापू को अरमान था

अब लालटेन वाले नेता बैठें एसी दरबार में
साइकिल वाले नेता भी चलते हैं मोटर कार में
अब काटें भी मिलते हैं कुछ फूलों के हार में
अब पंजे तक से पिसता है बस वोटर हर सरकार में

चिकनी चुपड़ी बात करे जो कभी करे न काम

जगह से अपनी हिले नहीं जो मिले न जबतक दाम
पांच साल में एक बार जो करता हो सलाम
याद नहीं रखता उनको जो आते उसके काम
पहचान ही जिसकी ये हो जो नहीं आदमी आम
अपनों तक का सगा नहीं जो नेता उसका नाम

भरे पेट जो रोज़ लगाते नैतिकता के नारे
और सबको ये बतलाते हैं कि क्या अच्छा है प्यारे
वो शायद ना चल पाएँ खुद अपनी ही बोली राह पर
गर मिल ना पाए उनको उनका खाना उनकी चाह पर
भूखे रहना क्या होता है जबतक नहीं नेता जानेगें
क्या भूख से लड़ने वालों की बातों को वो मानेगें

हमारे नेताओं को क्या हो गया हमारी राजनीति को क्या हो गया
हम भी कहीं न कहीं कसूरवार हैं हमको भी न जाने क्या हो गया

--आलोक गौड़




रथ बताते फिर रहे चालाक मोटर की जगह
राजनेता फिट हुये हैं आज जोकर की जगह
दृशय मिश्रण आ गया है अब नई तकनीक में
ले रहे हैं 'गांधी' मुरली मनोहर की जगह
शुष्क रेगिस्तान की संभावना दिखने लगी
इस चमन की बुलबुलों को अब सरोवर की जगह
पोल क्या खोलेंगे पोलिंगबूथ शिक्षा के बिना
कुछ भगत सिंह चाहिये हैं आज वोटर की जगह

--डा नीरज जैन



भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

मुँह उठाये फिर चले आये,
छुटभैये, चमचों से पर्चे बटवाये,
रंग-बिरंगे झण्डे फहराये,
इक्के-दुक्के काम गिनवाये,
मांग रहे हमसे मतदान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

पुराने वादे न दोहराओ,
घिसे-पिटे भाषण न सुनाओ,
धर्म का ज़हर न फैलाओ,
पाँच साल का हिसाब बताओ,
कितने किये अच्छे काम,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

भाजप, कांग्रेस, समाजवादी,
ओढे रहो भईया सफेद खादी,
हर काम की तुमको आज़ादी,
होती है होने दो बर्बादी,
इसका है किसी को अनुमान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

सुस्त क़ानून व्यवस्था हमारी,
तिस पर महंगायी, बेरोजगारी,
सुरक्षा, शिक्षा की कमी भारी,
रिश्वत भी लाइलाज बिमारी,
पिस रही जनता हैं सब परेशान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान .....

फेल हो तुम चौथा दर्जा,
फिर भर दिया तुमने पर्चा,
कौन भरेगा चुनाव का खर्चा,
देश पर बढेगा भारी कर्जा,
ख़ूब रौशन किया भारत का नाम,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

कौन सुखी है बोलो आज,
एक सपना है रामराज,
राम भरोसे सब कामकाज,
खीझ है मन में, हैं सब नाराज़,
"रत्ती" बचाये सबको भगवान,
भारत के लोकतंत्र का, क्या करूँ बखान,
भोली जनता क्या करे, पल्ले पडे़ बेईमान,
तुम हो महान नेताजी, तुम हो महान .....

--सुरिंदर रत्ती



अभिलाषाओं का हवन कुण्ड


मैं एक किताब सी
खुलती हूँ तुम्हारे सामने
तुम पढ़ते हो एसे
जैसे पढ़ी जाती है
रद्दी, कबाडी को बेचने
से पहले

तुम्हारी निगाह की चाह में
चन्द किरणों से सजती हूँ
परन्तु तुम देखते हो इस तरह
ज्यूँ बेवक़्त आये मेहमान को
टालने के किये
उचटी निगाह से घड़ी
देखता है कोई

चाहत की शबनम में
न भीगा मन ये कभी
जो कभी नेह जोड़ा
तो इस तरह
दो वक़्त की रोटी के
बदले
ले लेता है आबरू मालिक जैसे

चाहत के शब्द
भावना के वस्त्र पहन
तुम्हारे आगे-पीछे
डोलते हैं
पर तुम सुनते हो एसे
जैसे गाड़ी के भीड़ वाले डिब्बे में
पसीना पोछता
सुनता है भिखारी का गीत
कोई

अभिलाषा थी
कि तुम अक्षर-अक्षर पढ़ो
मुझे
जैसे पढ़ा होगा
पहली नौकरी का नियम नामा
सुनो मुझे अजान और भजन
की तरह
देखो ऐसे जैसे सूखे खेत
निहारते हैं बादल
मैने दर्शाई जो इतनी इच्छा
शब्दों के लावे मुझ पर
बरसते रहे
रूह झुलस गई
मासूम सी अभिलाषा
कोने में दुबक गई
स्वयं मैं
अपनी सोचों का हवन कुण्ड बन गई
भूल गई थी मैं
कि औरतों को ख्वाहिश का भी
अधिकार नहीं

कवयित्री-रचना श्रीवास्तव



होली के कई रंग (छोटी कविताएँ और क्षणिकाएँ)


गुलाल की छींटें
जो बिखराए थे कभी राहों में
मेरा फागुन
आज भी महका जाती हैं
छूती हैं हौले से मुझे
मन चन्दन हो जाता है
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सामने थाल में हो जब
बर्फी, गुझिया रसीले
तो मीठी है होली
पर हो जब उसमें
भूख, बेबसी, गरीबी
तो कहो कैसी है होली?
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रंग तुम्हारे
चुपचाप मेरे जीवन में
चले आते हैं
बेनूर चूनर पर
बरस
मुझ में समा जाते हैं
मै सतरंगी हो जाती हूँ

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रंग पर चढ़ के
शब्द तुम्हारे
गलियारे में उधम मचाते हैं
रात डेवड़ी पर
औंधेमुँह सो जाते हैं
फींके सपने मेरे
इन्द्रधनुषी हो जाते हैं
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बचा सबकी नज़र
मुझ पर फेंका
प्रेम रंग
उस का अभ्रक
चुभता है आज भी आँखों में
हर होली आँखें बरस जाती हैं
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पकवानों की मेज पर
कहकहों की भीड़ में
उन मासूम हाथों ने कुछ माँगा
झिड़कियां, दुत्कार, फफ्तियाँ
सभ्य लोगों की सभ्यता
कुछ यूँ मिली उसको
नौकर ने हाथ पकड़
बाहर का रास्ता दिखलाया
वो सहमी टुकुर-टुकुर देखती रही
महक से ही पेट भरती रही
यहाँ रंग और भंग का
खेल चलता रहा
वो भूख के अंधियारों में भटकती रही
-------------------------------------
होली की मस्ती में
खेला खूब रंग
उधड़ी त्वचा बाल गिरा
आँखें हो गईं लाल
टेसू के रंग नहीं
रसायनिक हैं अबीर गुलाल
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महँगाई की मार
गरीबों के रसोई पर पड़ती है
इनके घर
गुझिया कहाँ तलती है
रंग है नहीं
तो कीचड़ से चलते हैं काम
सोचती हूँ
क्या त्यौहार में भी नहीं आते हैं
इनके घर भगवान
-------------------------------------
बुराई जली
प्रह्‌लाद बचा
तो होली का रंग सजा
आज चहुँओर है
होलिका का राज
कोने में जल रहा प्रह्‌लाद
फिर कैसी होली है आज

रचना श्रीवास्तव

हमको माफ़ करो


पिछले महीने की यूनिकवयित्री और सितम्बर २००८ माह की यूनिपाठिका रचना श्रीवास्तव का हिन्द-युग्म से रिश्ता बहुत पुराना है। आगे से ये हिन्द-युग्म पर स्थाई तौर पर कविताएँ प्रकाशित करेंगी।

खबरें बासी हों
इस से पहले
पढ़ लिया जाए
ये सोच के खोला अख़बार
पर शब्द नहीं थे वहाँ
पूरा पन्ना था खाली
समझ का बादल
छिन्न-भिन्न होता रहा
कम है शायद बिनाई मेरी
मुझे ही कोसता रहा
पन्ना संख्या तीन पर
कुछ शब्द सर जोड़े
परपंच कर रहे थे
मेरी हलचल से झुंझला के बोले
पेशानी पर नाहक ही बल डालते हो
मुख्य पृष्ट पर रोज क्या पढ़ते हो
बलात्कार, हिंसा, दहेज़ की मार
भ्रष्ट अधिकारी, कफ़न की नीलामी
नेताओं की बयान बाजी
अब तो पढ़ते-पढ़ते
आदत हो गई होगी
तो कल्पना के घोड़े दौड़ाओ
जो नहीं लिखा वो पढ़ते जाओ
जवान जो शहीद होता है
उस ख़बर को आख़िर में
एक छोटा सा स्थान मिलता है
अभिनेताओं की चटपटी खबरें
अभिनेत्रियों की नंगी तस्वीरों
और नेताओं की बीमारियों तक को
गढ़ा-गढ़ा कर के छापा जाता है
एक गरीब की आवाज को
महीन-महीन लिख के दबा दिया जाता है
शब्दों को तोड़-मरोड़ के
अपने ढंग से ख़बर बना ली
और एसे ही टी आर पी बढ़ा ली
हमने जो सच्चाई को
आवाज बनाना चाहा
मिटा दिए गए हम
बिके हुए शब्दों को
हमारी जगह बैठाया गया
झूठी ख़बर बही
लोग उसी में भीगते गए
इन बातों से होके क्षुब्ध
हम सभी अक्षर
हड़ताल पर हैं
जो तुम पढ़ना चाहते तो
वो लिखते हैं
जो वो लिखते हैं तुम पढ़ते हो
सच्चाई न वो लिख सकते हैं
न तुम पढ़ सकते हो
तो तुम्हारे पाप का भागी
हम क्यों बनें
कोरा कागज है जो चाहे पढ़ो
हमको माफ़ करो

--रचना श्रीवास्तव

शादी- चार समीकरण


१. तुमसे
एक कप चाय मांगी
खाना खाया
बच्चों को दुलारा
तुमको डांटा
और शरीर जोड़ कर सो गया
तुम्हारा मन वहीं तकिये के ऊपर सुलगता रहा
और मेरा मन?
ये है शादी

२. तुमने सामान की एक फेहरिस्त मुझको थमाई
बच्चों की ढेर सी शिकायतें बताई
चाय, खाने की सामजिक रीत निभाई
और सो गई
मेरा मन सोचता रहा, और जागता रहा
और तुम्हारा?
ये है शादी

३. तुमने मुझे प्यार से टिफिन थमाया
और दिन भर सोचती रही मेरी गतिविधियाँ
कामना में रही तुम मेरी सफलता की
इंतज़ार किया सूरज के बुझने का
ताकि मैं उदित हो सकूँ
तुम्हारी शाम में-
यह है शादी

४. मैंने सुबह तुमसे विदा ली
और छोड़ गया अपना अस्तित्व,
अपनी चंचलता और निजी सानिध्य
तुम्हारे आँचल में
दिन भर एक नए मुखौटे के साथ
तुम्हें याद रख कर भी भूला रहा
गोधुली में जब लौटा
तुम्हारी चाय में घुल गया अपराजित मन, थकन और क्लान्ति
और मैं फिर महकने लगा
ये है शादी

यूनिकवयित्री- रचना श्रीवास्तव

अन्तर्मन


जीवन में दूसरों के
झाँकने का सुख
असीम है
ख़ुद को बाहर रख
घर में
औरों का घुसना
कितना सरल है
बेटी भाग गई
बेटे ने घर छोड़ा
बाप को प्रीत पराई लगी
ये प्रपंच
अक्षुण आन्नद देता है
स्वान्तः सुखाय
चितार्थ करती
पर निंदा
के अनमोल पलों को
मैंने भी भोगा है
पराई गलियों में,
भटकते-भटकते
स्वयं में भटकी जो एक रोज़
अंत विहीन वीरानगी,
घटा घोप स्याह अन्धकार के अलावा
कुछ भी दृष्टिगत् न हुआ
कुछ आगे बढ़ी तो
एक छोटे से प्रकाश से
आशा बंधी
पर वो भी आ रहा था
बगल के घर से
मेरा कहीं कुछ नहीं था
दर्द के झुंड
पाप के पौधे
गर्द,धुंध
कितना दूषित था
वातावरण मेरे भीतर
गा रहा था एक फ़कीर
"जो दिल देखा आपना
मुझसे बुरा न कोय "
मन गागर छलकी
पश्चाताप के मोती बिखरे
और अन्तर्मन उज्जवलित हो गया

यूनिकवयित्री- रचना श्रीवास्तव