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देर तलक क्यूँ रोते हैं शजर


तुम
किसी पानी की लहर से आये
मेरा रोम रोम
अपने नूर से भिगो गए
मैं तन्हा, अब तलक
तेरी आमद को महसूस कर रही हूँ
जबकि तुम कब के जा चुके
दर्द बूँद बूँद कर के टूटता है
तो एहसास होता है
बारिश के जाने के बाद
देर तलक
क्यूँ रोते हैं शजर!!

कवयित्री- दीपाली आब

होली के कई रंग (छोटी कविताएँ और क्षणिकाएँ)


गुलाल की छींटें
जो बिखराए थे कभी राहों में
मेरा फागुन
आज भी महका जाती हैं
छूती हैं हौले से मुझे
मन चन्दन हो जाता है
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सामने थाल में हो जब
बर्फी, गुझिया रसीले
तो मीठी है होली
पर हो जब उसमें
भूख, बेबसी, गरीबी
तो कहो कैसी है होली?
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रंग तुम्हारे
चुपचाप मेरे जीवन में
चले आते हैं
बेनूर चूनर पर
बरस
मुझ में समा जाते हैं
मै सतरंगी हो जाती हूँ

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रंग पर चढ़ के
शब्द तुम्हारे
गलियारे में उधम मचाते हैं
रात डेवड़ी पर
औंधेमुँह सो जाते हैं
फींके सपने मेरे
इन्द्रधनुषी हो जाते हैं
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बचा सबकी नज़र
मुझ पर फेंका
प्रेम रंग
उस का अभ्रक
चुभता है आज भी आँखों में
हर होली आँखें बरस जाती हैं
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पकवानों की मेज पर
कहकहों की भीड़ में
उन मासूम हाथों ने कुछ माँगा
झिड़कियां, दुत्कार, फफ्तियाँ
सभ्य लोगों की सभ्यता
कुछ यूँ मिली उसको
नौकर ने हाथ पकड़
बाहर का रास्ता दिखलाया
वो सहमी टुकुर-टुकुर देखती रही
महक से ही पेट भरती रही
यहाँ रंग और भंग का
खेल चलता रहा
वो भूख के अंधियारों में भटकती रही
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होली की मस्ती में
खेला खूब रंग
उधड़ी त्वचा बाल गिरा
आँखें हो गईं लाल
टेसू के रंग नहीं
रसायनिक हैं अबीर गुलाल
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महँगाई की मार
गरीबों के रसोई पर पड़ती है
इनके घर
गुझिया कहाँ तलती है
रंग है नहीं
तो कीचड़ से चलते हैं काम
सोचती हूँ
क्या त्यौहार में भी नहीं आते हैं
इनके घर भगवान
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बुराई जली
प्रह्‌लाद बचा
तो होली का रंग सजा
आज चहुँओर है
होलिका का राज
कोने में जल रहा प्रह्‌लाद
फिर कैसी होली है आज

रचना श्रीवास्तव

यूनिकवि की दो छोटी कवितायें


आज सोमवार है और यूनिकवि की कविता का भी दिन है। इसलिये हम यहाँ डॉ॰ मनीष मिश्रा की दो कवितायें प्रकाशित कर रहे हैं।



तुम

मैं देखता हूँ तुम्हारे हाथ
चटख नीली नसों से भरे
और
उंगलियों में भरी हुई उड़ान
मैं सोचता हूँ
तुम्हारी अनवरत देह की सफ़ेद धूप
और उसकी गर्म आंचश
मैं जीत्ताता हूँ तुमको
तुम्हारे व्याकरण और
नारीत्व की शर्तो के साथ
मैं हारता हूँ
एक पूरी उम्र
तुम्हारे एवज में!



कठिन समय में

हमें कठिन क्षणों में भी गुनगुनाना चाहिए अपना मौन
बुननी चाहिए उधड़ते हुए रिश्तो की सीवन
लिखनी चाहिए प्रेम कविताये
निहारना चाहिए चाँद के आलोक में लिप्त आकाश
रखना चाहिए एक स्मृति फूल किताब के भीतर
और लौटना चाहिए पुराने दोस्त दिनों में
हमें कठिन समय में भी
अपने आदि मंत्र की तरह
सहेजकर रखनी चाहिए
बची खुची
जीवन क्र प्रति अपनी
कोमल जिजीविषा!

कविताएँ और किताबें


पिछले सप्ताह अक्टूबर माह के यूनिकवि की दूसरी कविता पर अनामी जी की प्रतिक्रिया से हमें पता चला कि विजय कुमार सप्पत्ती की वह कविता ऊनके ब्लॉग पर पहले से ही प्रकाशित है। इसके बाद जब हमने उनके ब्लॉग को खँगाला तो पाया कि प्रथम स्थान की कविता भी उनके ब्लॉग पर प्रकाशित है। उनके ब्लॉग के अतिरिक्त और बहुत सी जगहों पर भी प्रकाशित है। इसलिए शर्तानुसार हम यह विजय कुमार सप्पत्ती को दिया जाने वाले पुरस्कार और सम्मान को हम रद्द करते हैं और द्वितीय स्थान के कवि डॉ॰ मनीष मिश्रा को अक्टूबर माह का यूनिकवि घोषित करते हैं। विजय कुमार सप्पत्ती का आग्रह है कि उनकी कविताएँ हटाई न जायें, तो हम नहीं हटा रहे हैं। हम इन्हें गलती के उदाहरण के तौर पर भी संजोकर रखना चाह रहे हैं। आज चूँकि सोमवार है, और आज वर्तमान यूनिकवि का वार होता है, अतः डॉ॰ मनीष मिश्रा की कविताएँ आपके समक्ष प्रस्तुत हैं।


कवितायें

डायरी के फाड़ दिए गए पन्नों में भी
साँस ले रही होती हैं अधबनी कवितायें
फड़फड़ाते हैं कई शब्द और उपमायें!
विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ
सूख नहीं पाते सारे जलाशय
शब्दों और प्रेम के बावजूद
बन नहीं पाती सारी कवितायें!
डायरी के फटे पन्नों में
प्रतीक्षा करती है कवितायें
संज्ञा की, प्रतीक की, विशेषण की नहीं
दुःख की उस जमीन की
जिस पर वो अक्सर पनपती हैं!


किताबें

हमारे सूखे दरकते जीवनकाश को
गीला भीगा करती हैं किताबें
वे संजोती हैं इतिहास की सूख गई बेल
सुंदर उपमायें और
अंतहीन सपनों के प्रायदीप!
वे चुनती बटोरती हैं
आदि मंत्रो के स्वर विन्यास
और हरीतिमा में भीगी रागिनी!
एक ऐसे समय में
जब सूख चुकी है हस्तलिपियाँ
और संवेदनायें
रंगों गंधों की सूक्ष्म विवेचनायें!
ऐसे हाँफते, काँपते समय में
किताबे हमें
फिर-फिर लौटाती हैं
जोड़ती-गाँठती हैं
बिसरा दिए गए अक्षरों से
लिपि से
भाषा से
एक अदभुत जीवन से!

हिन्द-दिवस का नारा


सभी को हिन्दी-दिवस की पूर्व संध्या पर शुभकामनाएँ। खूब प्रयोग करें अपनी-अपनी मातृभाषा का, न प्रयोग होने वाली भाषाएँ मर जाती हैं। संकल्प लें की अपनी भाषा को जीवित रखेंगे। इस अवसर पर आलोक शंकर की यह कविता भी प्रासंगिक है। पिछले साल हिन्द-युग्म इसी विषय पर सितम्बर का काव्य-पल्लवन भी आयोजित किया था, पढ़िए हिन्दी-दिवस पर १६ कविताएँ। कल हिन्द-युग्म हिन्दी का भविष्य सुरक्षित करने के लिए एक ऑनलाइन परिचर्चा आयोजित कर रहा है। कल सुबह १० से शाम ४ बजे तक का समय हिन्दी के लिए सुरक्षित करें और भाग लें। अधिक जानकारी हेतु देखें




आप भी इस तरह के पोस्टर अपने ब्लॉग पर लगायें


1.
हिन्दी मेरा इमान है
हिन्दी मेरी पहचान है
हिन्दी हूँ मैं वतन भी मेरा
प्यारा हिन्दुस्तान है
2.
हिन्दी की बिन्दी को
मस्तक पे सजा के रखना है
सर आँखो पे बिठाएँगे
यह भारत माँ का गहना है
3.
बढ़े चलो हिन्दी की डगर
हो अकेले फिर भी मगर
मार्ग की काँटे भी देखना
फूल बन जाएँगे पथ पर
4.
हिन्दी को आगे बढ़ाना है
उन्नति की राह ले जाना है
केवल इक दिन ही नहीं हमने
नित हिन्दी दिवस मनाना है
5.
हिन्दी से हिन्दुस्तान है
तभी तो यह देश महान है
निज भाषा की उन्नति के लिए
अपना सब कुछ कुर्बान है
6.
निज भाषा का नहीं गर्व जिसे
क्या प्रेम देश से होगा उसे
वही वीर देश का प्यारा है
हिन्दी ही जिसका नारा है
7.
राष्ट्र की पहचान है जो
भाषाओं में महान है जो
जो सरल सहज समझी जाए
उस हिन्दी को सम्मान दो
8.
अग्रेजी का प्रसार भले
हम अपनी भाषा भूल चले
तिरस्कार माँ भाषा का
जिसकी ही गोदि में हैं पले
9.
भाषा नहीं होती बुरी कोई
क्यों हमने मर्यादा खोई
क्यों जागृति के नाम पर
हमने स्व-भाषा ही डुबोई
10.
अच्छा बहु भाषा का ज्ञान
इससे ही बनते है महान
सीखो जी भर भाषा अनेक
पर राष्ट्र भाषा न भूलो एक
11.
इक दिन ऐसा भी आएगा
हिन्दी परचम लहराएगा
इस राष्ट्र भाषा का हर ज्ञाता
भारतवासी कहलाएगा
12.
निज भाषा का ज्ञान ही
उन्नति का आधार है
बिन निज भाषा ज्ञान के
नहीं होता सद-व्यवहार है
13.
आओ हम हिन्दी अपनाएँ
गैरों को परिचय करवाएँ
हिन्दी वैज्ञानिक भाषा है
यह बात सभी को समझाएँ
14.
नहीं छोड़ो अपना मूल कभी
होगी अपनी भी उन्नति तभी
सच्च में ज्ञानी कहलाओगे
अपनाओगे निज भाषा जभी
15.
हिन्दी ही हिन्द का नारा है
प्रवाहित हिन्दी धारा है
लाखों बाधाएँ हो फिर भी
नहीं रुकना काम हमारा है
16.
हम हिन्दी ही अपनाएँगे
इसको ऊँचा ले जाएँगे
हिन्दी भारत की भाषा है
हम दुनिया को दिखाएँगे

--सीमा सचदेव