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धरा का हो गया तन-मन लाल


हमारे सभी पाठकों को रंगो के त्योहार होली के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए हम कामना करते हैं कि मस्ती और खुशी के रंग आप सबके जीवन मे भी घुलते रहें। रंगों के अनुपम पर्व पर प्रस्तुत है कवियत्री रचना श्रीवास्तव की कविता।


पंछी करें टीका 
अम्बर  भाल 
धरा का हो गया तन-मन लाल 
फागुन की 
अँगुलियों  में 
सजा गीतों का छल्ला 
नीले पीले 
रंग चले
मचाते हुए  हो हल्ला 
ईद  मिल होली से पूछे हाल 
धरा का हो गया तन-मन लाल   
रंगों भरी 
चादर हटा 
गुनगुनी धूप झांके 
गुलाबी ठण्ड 
थाम के चुनर 
गलियों गलियों भागे 
टेसू खिले हर बाग हर डाल
धरा का हो गया तन-मन लाल 
गोरी की 
हँसुली टूटी 
नील पड़ा था हाथ
सजना की 
ठिठोली हुई 
पांव फिसला था  हाट 
लज्जावश हुए सुर्ख उसके  गाल  
धरा का हो गया तन-मन लाल
पापड़ चिप्स
 छज्जे फैले 
ताके बैठा कौवा 
घर में 
गुझिया चहक रही 
बाग भटक रहा महुआ 
ठंढाई पीके बदली चाल
धरा का हो गया तन-मन लाल

दोहा गाथा सनातन गोष्ठी ८ दोहा है रस-खान


होली रस का पर्व है, दोहा है रस-खान.
भाव-शिल्प को घोंट कर, कर दोहा-पय-पान.

भाव रंग अद्भुत छटा, ज्यों गोरी का रूप.
पिचकारी ले शिल्प की, निखरे रूप अनूप.

प्रतिस्पर्धी हैं नहीं, भिन्न न इनको मान.
पूरक और अभिन्न हैं, भाव-शिल्प गुण-गान.

रवि-शशि अगर न संग हों, कैसे हों दिन-रैन?
भाव-शिल्प को जानिए, काव्य-पुरुष के नैन.

पुरुष-प्रकृति हों अलग तो, मिट जाता उल्लास.
भाव-शिल्प हों साथ तो, हर पल हो मधु मास.

मन मेंरा झकझोरकर, छेड़े कोई राग.
अल्हड लाया रंग रे!, गाये मनहर फाग

महकी-महकी हवा है, बहकी-बहकी ढोल.
चहके जी बस में नहीं, खोल न दे, यह पोल.

कहे बिन कहे अनकहा, दोहा मनु का पत्र.
कई दुलारे लाल हैं, यत्र-तत्र-सर्वत्र.

सुनिये श्रोता मगन हो, दोहा सम्मुख आज।
चतुरा रायप्रवीन की, रख ली जिसने लाज॥

बिनटी रायप्रवीन की, सुनिये शाह सुजान।
जूठी पातर भखत हैं, बारी बायस स्वान॥

रसगुल्‍ले जैसा लगा, दोहे का यह पाठ ।
सटसट उतरा मगज में, हुए धन्य, हैं ठाठ ॥


दोहा के दोनों पदों के अंत में एक ही अक्षर तथा दीर्घ-लघु मात्रा अनिवार्य है.

उत्तम है इस बार का,
२ १ १ २ १ १ २ १ २ = १३
दोहा गाथा सात |
२ २ २ २ २ १ = ११
आस यही आचार्य से
२ १ २ १ २ २ १ २ = १३
रहें बताते बात |
१ २ १ २ २ २ १ = ११

सीमा मनु पूजा सुलभ, अजित तपन अवनीश.
रवि को रंग-अबीर से, 'सलिल' रंगे जगदीश.


चलते-चलते फिर एक सच्चा किस्सा-

अंग्रेजी में एक कहावत है 'power corrupts, absolute power corrupts absolutely' अर्थात सत्ता भ्रष्ट करती है तो निरंकुश सत्ता पूर्णतः भ्रष्ट करती है, भावार्थ- 'प्रभुता पाहि काहि मद नाहीं' .
घटना तब की है जब मुग़ल सम्राट अकबर का सितारा बुलंदी पर था. भारत का एकछत्र सम्राट बनाने की महत्वाकांक्षा तथा हर बेशकीमती-लाजवाब चीज़ को अपने पास रखने की उसकी हवस हर सुन्दर स्त्री को अपने हरम में लाने का नशा बनकर उसके सिर पर स्वर थी. दरबारी उसे निरंतर उकसाते रहते और वह अपने सैन्य बल से मनमानी करता रहता.
गोंडवाना पर उन दिनों महारानी दुर्गावती अपने अल्प वयस्क पुत्र की अभिभावक बनकर शासन कर रही थीं. उनकी सुन्दरता, वीरता, लोकप्रियता, शासन कुशलता तथा सम्पन्नता की चर्चा चतुर्दिक थी. महारानी का चतुर दीवान अधार सिंह कायस्थ तथा सफ़ेद हाथी 'एरावत' अकबर की आँख में कांटे की तरह गड रहे थे क्योंकि अधार सिंग के कारण राज्य में शासन व्यवस्था व सम्रद्धता थी और यह लोक मान्यता थी की जहाँ सफ़ेद हाथी होता है वहाँ लक्ष्मी वास करती है. अकबर ने रानी के पास सन्देश भेजा-

अपनी सीमाँ राज की, अमल करो फरमान.
भेजो नाग सुवेत सो, अरु अधार दीवान.


मरता क्या न करता... रानी ने अधार सिंह को दिल्ली भेजा. अधार सिंह की बुद्धि की परख करने के लिए अकबर ने एक चाल चली. मुग़ल दरबार में जाने पर अधार सिंह ने देखा कि सिंहासन खाली था. दरबार में कोर्निश (झुककर सलाम) न करना बेअदबी होती जिसे गुस्ताखी मानकर उन्हें सजा दी जाती. खाली सिंहासन को कोर्निश करते तो हँसी के पात्र बनाते कि इतनी भी अक्ल नहीं है कि सलाम बादशाह सलामत को किया जाता है गद्दी को नहीं. अधार सिंह धर्म संकट में फँस गये, उन्होंने अपने कुलदेव चित्रगुप्त जी का स्मरण कर इस संकट से उबारने की प्रार्थना करते हुए चारों और देखा. अकस्मात् उनके मन में बिजली सी कौंधी और उन्होंने दरबारियों के बीच छिपकर बैठे बादशाह अकबर को कोर्निश की. सारे दरबारी और खुद अकबर आश्चर्य में थे कि वेश बदले हुए अकबर की पहचान कैसे हुई? झेंपते हुए बादशाह खडा होकर अपनी गद्दी पर आसीन हुआ और अधार से पूछा ki उसने बादशाह को कैसे पहचाना?

अधार सिंह ने विनम्रता से उत्तर दिया कि जंगल में जिस तरह शेर के न दिखने पर अन्य जानवरों के हाव-भाव से उसका पता लगाया जाता है क्योंकि हर जानवर शेर से सतर्क होकर बचने के लिए उस पर निगाह रखता है. इसी आधार पर उन्होंने बादशाह को पहचान लिया चूकि हर दरबारी उन पर नज़र रखे था कि वे कब क्या करते हैं? अधार सिंह की बुद्धिमानी के कारण अकबर ने नकली उदारता दिखाते हुए कुछ माँगने और अपने दरबार में रहने को कहा. अधार सिंह अपने देश और महारानी दुर्गावती पर प्राण निछावर करते थे. वे अकबर के दरबार में रहते तो जीवन का अर्थ न रहता, मन करते तो बादशाह रुष्ट होकर दंड देता. उन्होंने पुनः चतुराई से बादशाह द्वारा कुछ माँगने के हुक्म की तामील करते हुए अपने देश लौट जाने की अनुमति माँग ली. अकबर रोकता तो वह अपने कॉल से फिरने के कारण निंदा का पात्र बनता. अतः, उसने अधार सिंह को जाने तो दिया किन्तु बाद में अपने सिपहसालार को गोंडवाना पर हमला करने का हुक्म दे दिया. दोहा बादशाह के सैन्य बल का वर्णन करते हुए कहता है-

कै लख रन मां मुग़लवा, कै लख वीर पठान?
कै लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान?

इक लख रन मां मुगलवा, दुई लख वीर पठान.
तिन लख साजे पारधी, रे दिल्ली सुलतान.


असाधारण बहादुरी से लम्बे समय तक लड़ने के बाद भी अपने देवर की गद्दारी का कारण अंततः महारानी दुर्गावती, अधार सिंह तथा अन्य वीर अपने देश और आजादी पर शहीद हो गये. मुग़ल सेना ने राज्य को लूट लिया. भागते हुए लोगों और औरतों तक को नहीं बख्शा. महारानी का नाम लेना भी गुनाह हो गया. जनगण ने अपनी लोकमाता को श्रद्धांजलि देने का एक अनूठा उपाय निकाल लिया. दुर्गावती की समाधि के रूप में सफ़ेद पत्थर एकत्र कर ढेर लगा दिया गया, जो भी वहाँ से गुजरता वह आस-पास से एक सफ़ेद कंकर उठाकर समाधि पर चढा देता. स्वतंत्रता सत्याग्रह के समय भी इस परंपरा का पालन कर आजादी के लिए संग्घर्ष करने का संकल्प किया जाता रहा. दोहा आज भी दुर्गावती, अधार सिंह और आजादी के दीवानों की याद दिल में बसाये है-

ठाँव बरेला आइये, जित रानी की ठौर.
हाथ जोर ठंडे रहें, फरकन लगे बखौर.


अर्थात यदि आप बरेला गाँव में रानी की समाधि पर हाथ जोड़कर श्रद्धाभाव से खड़े हों तो उनकी वीर गाथा सुनकर आपकी भुजाएं फड़कने लगती हैं. अस्तु... वीरांगना को महिला दिवस पर याद न किये जाने की कमी पूरी करते हुए आज दोहा-गाथा उन्हें प्रणाम कर धन्य है.

शेष फिर...

महानगर की होली


होली आई होली आई
मुन्ने की नजरें ललचाई
देख पिचकारी और गुलाल
पाया जा घर में धमाल
ले दो मुझको भी गुलाल
करूँगा रंगों से कमाल
माँ ने ला दी एक पिचकारी
पानी ही से भर दी सारी
साथ में दी दी चेतावनी
देखो वेस्ट न करना पानी
साठ रुपये का लीटर बीस
पानी के दाम से निकले चीस
कई बार तो मारे प्यास
पिलाएँ उसे जो आएँ खास
बाथ का पानी अलग मँगवाएँ
दस ही दिन में सम्ब भरवाएँ
एक माह में टैंकर तीन
बरतें पानी ज्यों कोई दीन
देखो जो तुम रंग डारोगे
खुद को और घर गंदा करोगे
रंगों में पानी डालोगे
फिर दीवाल को रंग डालोगे
नष्ट करोगे नहाकर पानी
बिगड़ेगी अपनी बजट कहानी
पेंट के पैसे भरने पडेंगे
मालिक के ताने भी मिलेंगे
दिखाओ तुम भी इमानदारी
पानी की एक ही पिचकारी
समझ लो तुम इसी को रंग
नहीं खेलना दोस्तों के संग
यह है महा-नगर मेरे लाल
उड़ते नहीं हैं यहां गुलाल
कौन कहां और किसकी होली
पैसे की यहां लगती बोली
तुम भी यह समझ जाओगे
रंग न फिर कोई लाओगे
नहीं किसी का कोई हमजोली
यह है महा-नगर की होली

आप इसे कविता/ अकविता , लेख/आलेख , कहानी कुछ भी कह सकते हैं| लेकिन मेरे लिए यह महा-नगरीय जीवन की कड़वी सच्चाई है |

-सीमा सचदेव



नहीं चाहिये यह एक दिन की होली अब


आज ज़मीन पर बिखरे टेसू देखे तो एहसास हुआ,
कि बसंत कब का आ चुका है और होली मुँह बाए खड़ी है,
पर शायद कुछ उमंगों की कमी है या हालातों की कुछ है साज़िश,
कि ना बसंत ने मन में पग धरे, ना ही होली देती कोई दस्तक.

और मन में ख्यालों की सुगबुगाहट होने लगी कि,
हर बार की तरह अबीर गुलाल तो खूब फैलाएंगे रंग इस बार भी,
और खिलखिलाहट और कहकहे गूँजा जायेंगे हर कोना,
शैफालियाँ भी होंगी आच्छादित चारों ओर,
और बाजेंगे चंग-मृदंग और ढोल भी,
गुझिया और मिठाईयों की भी होगी होड़,
भंग-ठन्डई भी कर जायेंगी सब को सराबोर,
फिर सब नाचेंगे हो मस्त, और छलक जायेंगे जाम भी।

मगर क्या होगा दिलों का भीतर से भी मेल?
या रंगीन परत के नीचे होगा सिर्फ काला रंग,
क्या होगा सिर्फ एक दिन का इन्द्रधनुष और फिर सब स्याह,
या होगा झूठ सर्वव्यापि जिसमें सच का होगा ‘एक दाग’ लगा.

होली और दिवाली साल में आती है बस एक बार,
मगर होते बम धमाके देश में बारम्बार,
माँएँ अभी भी हैं रोती और लज्जित होती हैं अबलाएँ,
बुजुर्गों और बच्चों की होती हैं रोज हत्याएँ,
और कुछ की नौकरी छूटी, कुछ की घटी हैं तनख्वाएँ।
नेता आते और जाते सिर्फ कर जाते अपनी बात,
और बाकि हम सब भूला दिये जाते वोट के बाद ,
स्लम से आस्कर तक पहूंचें जरूर, लेकिन स्लम हैं वहीं के वहीं,
और अब तो ’जै हो’ का नारा भी लिया है छीन इन नेताओं ने।

बस और नहीं! नहीं चाहिये यह एक दिन की होली अब,
अब होली कुछ ऐसी चाहिये, जो लाये उमंग हर दिन हर पल,
प्यार अपार हो और हो सुख सब दिन,
रंग छलकें और हों सब दिल प्रेम-रंगों से सराबोर,
और सौहार्द और प्रेम से गूंजे हर कोना, हर कण,
द्वेष, घृणा और अपराध रूपी होलिका दहन होगी जब,
सुख-शांति और चैन से दमकेगा जीवन सबों का जब,
तभी कहलायेगी आज की होली सच्ची और सुरम्य होली।

--अरविन्द चौहान

ब्रजबासिन संग जो होरि मनाहि


ब्रज की होरी का आनंद, उसमें छुपी ब्रज की संस्‍कृति, जो आज भी युगों से राधा-कृष्‍ण के निश्‍छल प्रेम की अनुपम सौगात है। उसी होली को समर्पित छंदात्मक शैली में गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' की यह मौलिक रचना आप सभी के लिए प्रस्तुत है। सभी लोगों ने इस शैली की कविताएँ अपने पाठ्यक्रम में पढ़ी होंगी, फिर भी यदि किसी शब्द, किसी छंद का भावार्थ न समझ में आये तो टिप्पणी में पूछ लें, आकुल समाधान लेकर हाज़िर रहेंगे।


भोर भई खग नीड़ सूं छूटे
भयो कलरव कहीं टेर सुनायो.
होरि है आज भई सिहरन
अंग-अंग पुलकित मन-मन लहरायो. (1)

मन सौं न हटै, दृगअन में बसै
मनमोहिनी सूरत श्‍याम दुलारे.
कब कौन घड़ी पट थाप पड़ै
नहीं सूझ पड़ै, नहीं काज संवारे. (2)

बरजोरी करेंगी सखिअन सब
कहनो ही पड़ैगो बात बनाहि्.
पहलो रंग श्‍याम पड़ै अंग-अंग
यही श्‍याम सौं, होरि पे सौंह है खाहि.(3)

सब काज धरे, कल नाहीं पड़ै
कछु आहट पे दृग द्वारहि जाहि.
ओट सूं देखि, न श्‍याम हते
नहीं सखिअन टोली, सबै भरमाहि. (4)

देर भई कहीं बात न जाय
नाहिं सखिअन गईं, नाहि सखिअन आहि.
कहीं कोइ सखि आय तो, भेजूं संदेश मैं
श्‍याम कूं, कि कैसेहि, लाय बुलाहि. (5)

पहलो पग आंगन भी न पड्यो
रंग-रंग सौं भर्यो, जाहिं देखो सब ताहिं.
मातु, जनक हरसे मोहि देख के
का न खेलुं, सखिअन संग जाहि. (6)

कोई है पत्‍यो, ये अंग है रच्‍यो
रंग मन में बस्‍यो, बस तन है बच्‍यो.
बस एक बेर नैनन से रंगूं
नैनन से कहूं, हिय जाय खिंच्‍यो.(7)

सैं भोर कहि, आवन रसिया
रंग रसिक शिरोमणि, अजहूं न आये.
अब धूप चुभे, कल नाहिं छुपे
थके नैन बिकल, कहूं आये न आये.(8)

आई टोलि सखिन, बरजोरि करी
मैं नायं करी, सौंह याद कराहि.
जाओ सखि कहो, ब्रजसुंदर सौं
कैसेहि पिंड, छुड़ावन आहि.(9)

चल बृषभानुजा, खेलहि होरि
चढ्यो दिन कब तक, बाट निहारहि.
नाहि पड़ी निर्मोहि श्‍यामहि
ज्‍यों तू टक-टक, नैन निहारहि.(10)

ज्‍यों ‘आकुल’ मैं, श्‍यामहि ‘आकुल’
होंगे सखि कछु और निहारहि.
जाओ तुमहि, भजि कै दैखो
सखि श्‍याम तो नाहिं फंसे, कित माहि.(11)

ललिता सखिअन, सब कूं सौं है जो
एक भी बूंद, कै रंग लगाहि.
सौं लीनी मैं, रंग रसिया सूं
पहल करूं फिर, गाम समाहि.(12)

होरि है, होरि है तान पड़ी
कानन सखिअन सब, चीस के नाहि.
देख गवाख मुंडेरन द्वारहि
शयाम को टोला तो, आवहि नाहि.(13)

झांई पड़ी, जो अबीर छटी
घनश्‍याम घिरे, ब्रजबासिन माहि.
राह बने नहिं, घिरि-घिरि सब जन
पोतहि रंग-बिरंगे श्‍यामहि.(14)

टीस पड़ी सखि कौनहु अंग
बच्‍यो बे रंग कैं, रंग समाहि.
जा सखि बोल, बचा मैं राख्‍यो
हिय ‘आकुल’ पर, अब कब ताहिं.(15)

देख बिकल, नैनन अंसुअन, सखि
दौड़ि सबै पट, खोल किवारहि.
भागि ज्‍यूं पवन चले, बरखा ऋतु
टीस सूं भर हिय, कौन दिशा रहि.(16)

बेग सूं टोला, भर्यो सखिअन
सब ब्रजबासिन के बीच में जाहि.
कैसो सिंगार रच्‍यो है निसर्ग कि
ग्‍वाल बाल सब, सखिअन माहि.(17)

सखिअन पोति, ग्‍वाल लिपटाहि सब
ग्‍वाल के होश है, राखि बिगाड़हि.
श्‍यामहि राह करी, करि सैन सूं
बात कहि, कोउ बाट निहारहि.(18)

रंगरेली रंग देखि के कामत
आन पड़े सब, बीचन माहि.
श्‍याम चले ढक पीताम्‍बर
इक ग्‍वाल के माथे पे, डार के नाहि.(19)

कह ‘आकुल’ सब द्वार खुले
दस दिशा खुली, जो दृश्‍य दिख्‍यो.
भरि-भरि अंग-अंग रंग-रंग में रच्‍यो
संग-संग सब ब्रज, हरसाय खिल्‍यो.(20)

छिपे कहां घनश्‍याम घनन
वृषभानुजा ओट छिपे सकुचाहि.
ढूंढ सकौ तो ढूंढ लो आवन
बैठि पलक पल नैन बिछाहि.(21)

ओट सूं देखहि श्‍याम बिकल
हिय हाथ में आय पड्यो अब नाहि.
’श्‍याम’ कहि, निक ध्‍यान बटायो
दौड़ पड़ि, घनश्‍याम सराहि.(22)

ठिठक निअर खड़ि, श्‍याम निहारन
लागि तबहि, नैनन भर आहि.
हाथ उठैं, जैसे हि रंग ले वहिं
श्‍याम ने करि, बरजोरि उठाहिं.(23)

बाहु मैं लै कसि, लाल कपोल
गुलाबी करे, तब भींच के नाहिं.
तन स्‍वेद भर्यो, मन भेद भर्यो
रंग सेज कर्यो, रंगरेज की नाहिं.(24)

‘होरि’ है टोला घुस्‍यो, घर गूंज्‍यो
मृदंग, ढप, झांझ की ताल सुनाहि.
हर ग्‍वाल बन्‍यो, एक श्‍याम सुंदर
हर सखी खड़ी, राधा बन आहि.(25)

गोकुल, बिंदावन, बरसाने वा
नंद के गाम की होरी मनाहि.
आज भी रेणु अबीर बने
जमुना जल की रंगरोरी बनाहि.(26)

कह ‘आकुल’ महारास रच्‍यो
ब्रजबासिन संग जो होरि मनाहि.
आज भी प्रेम के पथिक कहें
ब्रज की हर नारि में राधा समाहि.(27)

होली के कई रंग (छोटी कविताएँ और क्षणिकाएँ)


गुलाल की छींटें
जो बिखराए थे कभी राहों में
मेरा फागुन
आज भी महका जाती हैं
छूती हैं हौले से मुझे
मन चन्दन हो जाता है
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सामने थाल में हो जब
बर्फी, गुझिया रसीले
तो मीठी है होली
पर हो जब उसमें
भूख, बेबसी, गरीबी
तो कहो कैसी है होली?
------------------------------
रंग तुम्हारे
चुपचाप मेरे जीवन में
चले आते हैं
बेनूर चूनर पर
बरस
मुझ में समा जाते हैं
मै सतरंगी हो जाती हूँ

-------------------------------
रंग पर चढ़ के
शब्द तुम्हारे
गलियारे में उधम मचाते हैं
रात डेवड़ी पर
औंधेमुँह सो जाते हैं
फींके सपने मेरे
इन्द्रधनुषी हो जाते हैं
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बचा सबकी नज़र
मुझ पर फेंका
प्रेम रंग
उस का अभ्रक
चुभता है आज भी आँखों में
हर होली आँखें बरस जाती हैं
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पकवानों की मेज पर
कहकहों की भीड़ में
उन मासूम हाथों ने कुछ माँगा
झिड़कियां, दुत्कार, फफ्तियाँ
सभ्य लोगों की सभ्यता
कुछ यूँ मिली उसको
नौकर ने हाथ पकड़
बाहर का रास्ता दिखलाया
वो सहमी टुकुर-टुकुर देखती रही
महक से ही पेट भरती रही
यहाँ रंग और भंग का
खेल चलता रहा
वो भूख के अंधियारों में भटकती रही
-------------------------------------
होली की मस्ती में
खेला खूब रंग
उधड़ी त्वचा बाल गिरा
आँखें हो गईं लाल
टेसू के रंग नहीं
रसायनिक हैं अबीर गुलाल
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महँगाई की मार
गरीबों के रसोई पर पड़ती है
इनके घर
गुझिया कहाँ तलती है
रंग है नहीं
तो कीचड़ से चलते हैं काम
सोचती हूँ
क्या त्यौहार में भी नहीं आते हैं
इनके घर भगवान
-------------------------------------
बुराई जली
प्रह्‌लाद बचा
तो होली का रंग सजा
आज चहुँओर है
होलिका का राज
कोने में जल रहा प्रह्‌लाद
फिर कैसी होली है आज

रचना श्रीवास्तव

जोगीरा सा रा रा रा....


जोगीरा का अन्तिम भाग प्रस्तुत है .....हर छंद के बाद आप भी कहिये जोगीरा सा रा रारा और फ़िर देखिये होली का मज़ा...

जोगीरा सा रा रा रा.....

लाशों के व्यापार की, राजनीति में सिद्ध,
भारत माँ के लाडले, कुत्ते, बिल्ली, गिद्ध...

बात-बात में माँ-बहिन,करने में उस्ताद....
बिना बात के मुद्दों पर,जम कर करें विवाद...

लोकतंत्र की नाव में, नाविक करते छेद...
पूरब से पश्चिम गए, घर के सारे भेद...

हिरनी जैसी चाल है, बेहद लंबे बाल,
मुश्किल से पहचाने जाएँ, भारत माँ के लाल...

जींस ज़मी पर लोटती, नखरे हैं छत्तीस....
पॉप-रॉक में खो गयी, भारत माँ की टीस...

मंत्री जी की जेब का कर न सके जुगाड़,
डिग्री, एम.ए पास हैं, फ़िर भी हैं बेकार.....

कुर्सी पर है जो डटा, वही हुआ भगवान्,
भोली जनता रट रही, मेरा देश महान...

अर्थहीन से हो गए, प्रेम, भक्ति, मुस्कान...
बाजारों में खो गई, अपनी भी पहचान...

अपनी भाषा में रहें, छोटे-बड़े सवाल..
हिन्दयुग्म के सारथी, थामे रहे मशाल...

जोगीरा सा रारारा ...

निखिल आनंद गिरि

किससे खेलूँ होली रे !


वैसे तो होली जा चुकी है..लेकिन रंग अभी भी चढ़े हुए हैं...

पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

रंग हैं चोखे पास
पास नही हमजोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

देवर ने लगाया गुलाल,
मै बन गई भोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

ननद ने मारी पिचकारी,
भीगी मेरी चोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

जेठानी ने पिलाई भाँग,
कभी हंसी कभी रो दी रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

सास नही थी कुछ कम,
की उसने खूब ठिठोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

देवरानी ने की जो चुहल
अंगिया मेरी खोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

बेसुध हो मै भंग में
नन्दोई को पी बोली रे !
पी हैं बसे परदेश,
मै किससे खेलूँ होली रे !

कवि कुलवंत सिंह

तब समझना कि यार होली है


गुरु देव पंकज जी ने अपनी ग़ज़लों की कक्षा में एक होम वर्क दिया था.तभी "होली" काफिये पर ये ग़ज़ल लिखी थी.उस काफिये पर बहुत से सहपाठियों ने बहुत उम्दा रचनाएँ लिखीं. उम्मीद करता हूँ कि मेरा प्रयास भी शायद पसंद आए.

प्यार जिनके लिए ठिठोली है
सोच उनकी हुजूर पोली है

बर्फ रिश्तों से जब पिघल जाए
तब समझना की यार होली है

याद का यूँ नशा चढ़े तेरी
भंग की ज्यूँ चढाई गोली है

गुफ्तगू का मज़ा कहाँ प्यारे
बात गर सोच सोच बोली है

मस्तियां देख कर नहीं आतीं
ये महल है कि कोई खोली है

बोल कर झूट ना बचा कोई
सोच मेरी जनाब भोली है

आप उस पर यकीन मत करना
वो सियासत पसंद टोली है

खूब रब ने दिया तुझे नीरज
दिल मगर क्यों बिछाए झोली है

जोगीरा सा रा रारा......


होली मनाने के अपने-अपने अंदाज़ हैं.....उत्तर भारत में जोगीरा गाने का चलन है.....हर छंद के बाद आप भी कहिये जोगीरा सा रा रारा और फ़िर देखिये होली का मज़ा

एक तरफ़ हैं चाँद पर, इंसानों के पाँव,
और इधर अंधेर में, सदियों से हैं गाँव....

ना पानी, ना सड़क की, कोई करता बात,
हर नेता है पूछता, किसकी क्या है जात...

बाप दरोगा हो गए, बेटे हैं रंगदार,
माँ दुखियारी रो रही, हो बेबस, लाचार...

जब चाहा तब रात हो, पलक झपकते भोर,
क्या रखा है गाँव में, चलो शहर की ओर ...

कर धुएँ का नाश्ता, झटपट हों तैयार,
गए पड़ोस के भोज में, लेकर अपनी कार...

आँगन मेरे गाँव का, शहरी फ्लैट से बीस,
तिलक बराबर हो गई, पहली क्लास की फीस...

घर की मुर्गी दाल है, ऐसी अपनी सोच,
सौ करोड़ के देश में, रखें विदेश कोच...

दिल्ली आकर खो गए, शब्द , भावना, गीत,
त्योहारों पर कभी-कभी, याद आए मनमीत...

जोगीरा सा रा रा रा.....(अगले हफ्ते भी खेलेंगे होली....)

निखिल आनंद गिरि


होली की शुभकामनाएँ !


कुछ अंतर नहीं
संसद और सब्ज़ी मंडी में
सिवाए झगड़े और वाकआऊट के
कुछ नही होता वहाँ!
दिल काला है..
काला रंग पसंद है इन्हे
यहाँ बैठे कथित मनुष्य
जलाते हैं जनता के नोट
रोज़ खेलते हैं होली
उनकी कालिख से...
होली की शुभकामनाएँ!

प्रहलाद तो मरा नहीं
हाँ..होलिका मर गयी
आज वो भी जल गयी
और बच गयी
दहेज की भूख!
उसके बाप ने
बेरंग आँसुओं से खेली होली
ग़रीब था बेचारा
नही खरीद पाया रंग
अपनी बेटी की ज़िंदगी में भरने!
होली की शुभकामनाएँ!

क्यों करें फागुन का इंतज़ार?
बेमौसम होली का मज़ा
और ही होता है|
मंदिर के सामने
कटा बकरा फिंकवा दिया
बस..हो गयी होली!
होलिका की जगह
अब जिंदे लोग जलेंगे!
अपनी पिचकारियों में
रंगों की जगह लहू भरते हैं हम
लाल रंग पसंद है हमें
सुर्ख होता है...
चढ़ जाए तो यूँ ही नहीं उतरता
होली की शुभकामनाएँ!

छह दरिंदों ने
खूब नोंचा उसे
फिर फेंक दिया सड़क पर
अधमरी हालत में |
अपने कुछ पलों को रंगीन बनाने
छीन लिए उन्होने
उसकी ज़िंदगी के सारे रंग!
रंग बाकी हैं कुछ..
शायद कोई और भी छीनेगा अभी !
यही तो होली है
रंगों की होली!
होली की शुभकामनाएँ!

भारत महान है
और होली भी..
पड़ोस में लाल झंडे वाले
जला रहें हैं
अधिकारों की होलिका,
खेल रहे हैं होली
तिब्बतियों के लहू से!
लाल रंग
पसंद है इन्हे भी !
हम खुश है
सब सीख रहे हैं होली खेलना
सचमुच महान है हम
और हमारी संस्कृति!
वाह!
होली की शुभकामनाएँ!

आँखें खोल कर देखो
साल भर होली मनाते हैं हम
लगाव है हमें रंगों से
खैर..आज होली है
कम्बख़्त नकली रंगों का त्योहार!
चलो अब रंग जाओ
इन नकली रंगों में
होली खेलो
परंपरा है तो निभाओ
आज यही होली सही!
होली की शुभकामनाएँ!
होली मुबारक!

तो हर दिन यारो होली है


रंग गुलाल लिये कर में निकली मतवाली टोली है
ढोल की थाप पे पाँव उठे औ गूँज उठी फिर ’होली है’

कहीं फाग की तानें छिड़ती हैं कहीं धूम मची है रसिया की
गोरी के मुख से गाली भी लगती आज मीठी बोली है

बादल भी लाल गुलाल हुआ उड़ते अबीर की छटा देख
धरती पे रंगों की नदियाँ अंबर में सजी रंगोली है

रंगों ने कलुष जरा धोया जो रोक रहा था प्रेम-मिलन
मन मिलकर एकाकार हुये, प्राणों में मिसरी घोली है

सबके चेहरे इकरूप हुये, ’अजय’ न भेद रहा कोई
यूँ सारे अंतर मिट जायें तो हर दिन यारो होली है

होली के 33 रंग (काव्य-पल्लवन, वर्ष- 2, अंक- 1)






छायाचित्र- अनुराधा श्रीवास्तव

होली शब्द सुनते ही आंखों के सामने रंग बिखर जाते हैं । होली उत्तर भारत के अलावा अन्य प्रदेशों मे भी मनाई जाती है, हाँ थोड़ा बहुत रूप स्वरूप बदल जाता है।
हरियाणा की धुलन्डी: इस दिन औरतें गीले कपडे को कोड़ा के रूप में प्रयोग करती हैं और रंग डालने वालों को इसका वार झेलना पडता है । भाभियाँ देवरों को इस दिन खूब सताती हैं ।
बंगाल का बसन्तोत्सव: गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने होली के दिन ही शान्तिनिकेतन में बसन्तोत्सव का आयोजन किया था। पूरे बंगाल में इसे ढोल पूर्णिमा अथवा ढोल-जात्रा के तौर पर भी मनाया जाता है । लोग अबीर गुलाल लेकर मस्ती करते है।
महाराष्ट्र की रंग पंचमी और कोंकण का शिमगो: महाराष्ट्र और कोंकण के लगभग सभी हिस्सों में इस त्योहार को रंगों के त्योहार के रूप मे मनाया जाता है। मछुआरों की बस्ती मे इस त्योहार का मतलब नाच,गाना और मस्ती होता है। ये मौसम रिश्ते(शादी) तय करने के लिये मुआफिक होता है, क्योंकि सारे मछुआरे इस त्योहार पर एक दूसरे के घरों को मिलने जाते है और काफी समय मस्ती मे व्यतीत करते हैं।
तमिलनाडु की कामन पोडिगई : तमिलनाडु में होली का दिन कामदेव को समर्पित होता है। इस दिन शंकर जी ने रति के विलाप करने पर कामदेव को पुर्नजीवित किया था.
होली इस बार मार्च महीने की २२ तारीख को है इस लिये हिन्द-युग्म पर काव्य पल्लवन का विषय भी "होली" ही रखा गया और इस अंक को महीने के आखिरी वीरवार कि बजाये पहले ही प्रकाशित किया जा रहा है । इस बार हमें होली के अलग अलग रंग लिये रचनायें प्राप्त हुई हैं.

Holi Ki Badhayiyan


*** प्रतिभागी ***

| महक | शम्भु चौधरी | सविता दत्ता | कृष्ण लाल | पियूष. के. मिश्रा |
| सजीव सारथी | ममता गुप्ता | महेन्द्र भटनागर | प्रदीप कुमार | जीतेश नौगरैया | सीमा सचदेवा |
| रचना श्रीवास्तव | सुरिन्दर रत्ती | अवनीश तिवारी | देवेन्द्र कुमार मिश्रा | गोविन्द शर्मा, आगरा |
| प्रेमचंद सहजवाला | रंजना भाटिया 'रंजू' |सुमन कुमारी 'मेनका' | विनय के॰ जोशी |
| अमित अरुण साहू | अल्पना वर्मा |दिनेश चन्द्र जैन | विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र' |
| विश्व दीपक 'तन्हा' | शोभा महेन्द्रू |नगेन्द्र पाठक | अंजु गर्ग |
| संजय साहा | पूजा |श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' | सतीश वाघमारे |

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छाई खुशियों की बौछार
के आई है होरी
मीठी गुझिया,मीठा मोरा सैय्या

दोनो पे टिकी होये
इस दिन नज़र हमारी

बड़ी स्वादिष्ट सी गुझिया
हाय,खाने को जियरा ललचाय
लागे एक ही बारी में
स्वाहा करूँ सारी
छुपाय के सबसे खाना पड़त है
देखे कोई ई न कह दे
बहुरिया घर की,सब से चटोरी.

देख सलोना भोला सैय्या
गोरियों का दिल मचल जाय
नटखट सखियाँ धोखे से
सजनवा को भंग पीलाय
जानत मस्ती,पर मन घबराए
कोई मोरे सैययांजी की
कर ले ना चोरी.

भूल,ख़ता माफ़,मन की स्लेट कोरी
रंगों से सजी हो सब जन की होरी.

-महक

Holi Ki Badhayiyan


रंग बने एक ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो तन को नहीं - मन को छू सके।
रंग बने एक ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो राज्य-राज्य की बात न कर
करे राष्ट्र की बात।
रंग बने एक ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो जात -पात का भेद भुला कर
करे प्रेम की बात।
पर देखो इस देश को लग गई
किस मनहूस की हाय।
ये मेरा महाराष्ट्र, तो ये मेरा बंगाल,
ये मेरा गुजरात, तो ये मेरा पंजाब,
ये मेरा बिहार, तो ये मेरा असम,
कोई नहीं कहता यारों
भारत! ये मेरा देश बने महान
आओ हम सब मिलकर बनायें
एक नया और रंग
जिसमें दिखे भारत का
साथ-साथ सातों रंग।

-शम्भु चौधरी

Holi Ki Badhayiyan


हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
आ गई होली
उमंग रंग और बचपन की
धुँधली यादें लिए
छत पर खड़े होकर
हर राहगीर पर जब
फेंके जाते थे
रंगीन पानी से भरे गुब्बारे
या छोड़ी जाती थी
पिचकारी के पानी की धार
कभी किसी की गाली
सुनने को मिलती थी
और कभी प्यार बिखेरती मुस्कान
सादगी थी मासूमियत थी
उस होली में
हो हल्ला तो था
पर अदब भी था उस होली में
(फिर अपने साथ लिए
बचपन की यादें )

हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
आ गई होली

त्योहार पर शगुन भी
मिला करते हैं
तब भी मिलते थे
एक रूपया या दो रूपए
और उन्हीं पैसों से
फिर खरीदे जाते थे
गुब्बारे, रंग और गुलाल
मगर अब होली में
हम बिना रंग के ही
रंगीन हो जाते हैं
आँखें लाल रंग से तर
रंगीन हो जाती हैं
नम होकर उनसे
बहने लगता है पानी
(यही तो जरूरी होता है होली में
रंग और पानी )
आज बच्चों को देखती हूँ
खेलते होली

हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
आ गई होली

-सविता दत्ता

Holi Ki Badhayiyan


कभी खेला करते थे होली हम जिद्द करके सब से
जबसे हुआ बदरंग ये जीवन छुए नही रंग तब से
यूँ तो होली खेलने साथी अब भी घर आते हैं
पर जीवन हो बदरंग तो फिर रंग कहां कोई भाते है

तुमने जानू कह कर मेरी जान ये क्या कर डाला
रंगहीन जीवन में मेरे फिर से रंग भर डाला
फिर से जगा दी सोई उमंगे तुमने बन हमजोली
मन मे हुडदंग मचा रही है अरमानो की टोली

तुमने हम पे रंग डाल के कर तो दी है शुरूआत
अब देखना किन किन रंगो की होगी तुम पर बरसात
अंग अंग भीगे ना जब तक तब तक होगी होली
अब ना बचेगी तेरी चुनरिया अब ना बचेगी चोली

डरते डरते चुटकी भर रंग इक दूजे को लगाना
मै ना मानू इस को होली मै ठहरा दीवाना
बस माथे गुलाल का टीका ये भी हुई कोई होली
ना रंगो से रंगी चुनरिया ना ही भीगी चोली

होली मे भी सीमाओ का क्यो रखना अहसास
भूखा ही मरना है तो फिर तोडना क्यों उपवास
खेलनी है तो जम कर खेलो मस्ती भरी ये होली
मातम की तरह ना मनाओ होली मेरे हमजोली

होली को होली सा खेलो या रहने दो हमजोली
जितनी भी होनी थी होली तुम संग होली होली

-कृष्ण लाल

Holi Ki Badhayiyan


तुम्हारे लबों का लाल रंग
बहुत पसंद है मुझे
इस होली
रंग देना
मुझे इसी रंग में...

रंग लगाया तो तुमने
लबों से नहीं
लफ़्ज़ों से मगर
चुभते हैं बहुत
और दिखते भी नहीं....
फैल रहे हैं बदन में
ज़हर की तरह...

मैने ऐसा तो नहीं कहा था!!

-पियूष. के. मिश्रा

Holi Ki Badhayiyan


सोने की चिड़िया कैसी थी ?
माटी की गुड़िया ऎसी है -
होली के रंग उसने देखे होंगे,
मजहबी ज़ंग की ये साक्षी है,
अबीर -ओ- गुलाल में वो नहाती होगी,
नफरत के छींटों से दामन लाल है,
पिच्कारियों - गुब्बारों से प्यार बरसता होगा,
गोलियों -बरूदों से सीना छलनी है .
सोने की चिड़िया कैसी थी ?
माटी की गुड़िया ऎसी है .


-सजीव सारथी

Holi Ki Badhayiyan


फिर आया फागुन
फिर मौसम बदला
मन-मंजूषा खोल
देखने को..
फिर मन मचला
खोलते ही....
बिखर गया
स्मृतियों का एक-एक मनका
बीनते-बीनते उन्हें
होश रहा तन का ना मन का
आ-हा----
मन भावन संग वह होली
रंग-देने और रंग-जाने की
वह आँखमिचौली
उस बरस टेसू पेङों पर नहीं
अधरों पर महके थे
रंग हवाओं में नहीं
कपोलों पर दहके थे
पिचकारी से नहीं
नेह -रस...
आँखों से बरसा था
यह तन गीला नहीं हुआ था
उनकी बाँहों में सरसा था

तुम्हें नहीं लायी
तो क्या आयी ये होली
कैसा टेसू...
कैसा गुलाल और कैसी रोली

पर क्या फर्क पङता है ---
तेरे संग तो मेरी होली
कब की हो-ली------
स्मृतियों में ही सही
इस बरस भी तेरे संग ही
होगी ये होली-------

-ममता गुप्ता

Holi Ki Badhayiyan


आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !
नये पूर्ण मानव बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
आओ जगाएँ
भुवन-भाविनी भावनाएँ !
नहीं हो परस्पर विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता,
आओ मिटाएँ
दलन-दानवी-दासताएँ !
कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों न नभ पर प्रभंजन,
आओ बहाएँ
अधम आसुरी आपदाएँ !

-महेन्द्र भटनागर

Holi Ki Badhayiyan


फिर फागुन आया है यारों !
फिर आई है होली .
भूल के सारे भेदभाव को
खेलेंगे हम होली .
गोरा हो या काला कोई
सब को मलें गुलाल ,
रंग भेद मिट जाएं सारे
कर दें लाल्मलाल
सबको गले लगाके
खेलेंगे हम होली .
सदियों पहले रूठ गई जो
भीड़ भाड़ में छूट गई जो
शायद अब के फागुन में
वो भी आए खोली में
अपने रंग में रंगने उसको
खेलेंगे हम होली.
अब तक जिससे कभू ना बोले
प्यार का राज कभू ना खोले
म्हारे घर के आगे से जब ,
गुजरेगी वो हौले-हौले
मारेंगे उसपे पिचकारी
खेलेंगे हम होली .
सारी नफरत मिटेंगी अब के
दुश्मन भी गल मिलेंगे अब के .
छोट बडाई सभी मिटेगी ,
सब तकरार मिटेंगे अब के .
सब को प्रेम के रंग में रंगने
खेलेंगे हम होली

-प्रदीप कुमार

Holi Ki Badhayiyan


होली का क्या अब तो कभी भी हो जाती है
या यू कहे हर दिन सुनी पढी जाती है
दहेज़ के लोभियों ने नववधू जलाई
किशोरी ने छेड़खानी की रिपोर्ट लिखाई
तो दबंगों ने केरोसीन छिड़क आग लगाई

बंद के दौरान प्रदर्शनकारियों ने बस को फूंका
दो की मौके पे मौत छह को भर्ती कराया
अपनी रिपोर्ट नही लिखे जाने से क्षुब्ध रामआसरे
ने ख़ुद को कलेक्टरेट के सामने जलाया


दो गुटों मे संघर्ष खूनी होली
जमीनी विवाद को ले चली गोली
ये सिर्फ़ हेडलाइन नही जो काले रंग से रंगी
मिलेगा मुँह पे पुता तिरंगा हाथ मे नीली झंडी
बजट चुनावी रंग मे राजनीति केसरिया मे डूबी

पर क्यों क्यों नही हम मना सकते वो होली
जिसमे डंडे के साथ जलाते थे झाड़ झंगड़
पान की खाली टोकरिया और खती हुई बल्लिया
पूजा की गुजिया पपडिया और लाल छोटी झंडिया

क्यों नही चला सकते वो पिचकारी
जो रंग के साथ अपनपत बरसाए
क्यों नही लगा सकते वो गुलाल
जो कर दे हर गाल गुलाबी
हर चेहरे पर मुस्कुराहट ले आए

-जीतेश नौगरैया

Holi Ki Badhayiyan


होली आई , खुशियाँ लाई
खेले राधा सँग कन्हाई

फ़ेंकें इक दूजे पे गुलाल
हरे , गुलाबी ,पीले गाल

प्यार का यह त्योहार निराला
खुश है कान्हा सँग ब्रजबाला

चढ़ा प्रेम का ऐसा रंग
मस्ती मे झूमे अंग अंग

आओ हम भी खेले होली
नहीं देंगे कोई मीठी गोली

हम खेले शब्दो के संग
भावो के फ़ेंकेंगे रंग

रंग विरंगे भाव दिखेंगे
आज हम होली पे लिखेंगे

चलो होलिका सब मिल के जलाएँ
एक नया इतिहास बनाएँ

जलाएँ उसमे बुरे विचार
कटु-भावो का करे तिरस्कार

नफरत की दे दे आहुति
आज लगाएँ प्रेम भभूति

प्रेम के रंग मे सब रन्ग डाले
नफरत नही कोई मन मे पाले

सब इक दूजे के हो जाएँ
आओ हम सब होली मनाएँ

-सीमा सचदेवा

Holi Ki Badhayiyan


लो आ गई फिर होली
दिल मे एक टीस जगा गई होली
यादों को झकझोर ,
मुझ को मेरे देश पहुँचा गई होली

अपने पराए सब को रंग लगते थे
बुरा न मनो होली है कह के बच जाते थे
फागुन आते ही हम मनाने लगते थे होली

धरती अम्बर एक रंग हो जाता था
अमीर गरीब का भेद मिट जाता था
जब आती थी अबीर उड़ाती होली

राजा रंक एक रंग रंगते थे
रंगो से हम तन नही मन रंगते थे
जब भी आती थी सब को गले लगाती होली

गुझियों की होली ,पापड़ चिप्स की होली
पानी मे भीगी गलियों की होली
मुझ को याद आती है हुड़दंग की होली

यहाँ न वो मौसम है ,
न रंगो मे भीगा धरती अम्बर है
पकवानों की खुशबू भी नही
सूना सूना घर आँगन है
पिचकारियों से न छूटती है रंगो की गोली
फगुआ गाती नही है कोई टोली
फिर भी है आज होली
दिल मे टीस उठती होली
मुझको आपने देश पहुँचाती होली

-रचना श्रीवास्तव

Holi Ki Badhayiyan


अब तो मोहन तुम बिन कुछ नहीं सुहाता
होली ही नहीं कोई उत्सव नहीं भाता

आतंकी ख़ून की होली खेले
जान मासूमों की ले ले

सरकार मूक हो तमाशा देखती है
हत्याओं पर लगाम लगे, न सोचती है

बिगड़ा रईस अबला के साथ होली मनाता है
गंगा मैली होती प्रतिदिन, कोई न उसे बचाता है

अब तो जीवन के सारे रंग फीके लगते हैं
नंगा बचपन, अंधी जवानी, लाचार बुढापा, सिसकते हैं

होली तो एक बहाना है, गुंडा-गर्दी फैलाना है
बस वासना है दिलों में, मकसद भूख को मिटाना है

प्यार के लाल रंग लुप्त होते जा रहे हैं
शत्रुता के काले रंग नज़र आ रहे हैं

मोहन तुम्हारे संग होली खेलना चाहता हूँ

भक्ती और श्रद्धा के रंग में डूबना चाहता हूँ

पिचकारी में कृपा दृष्टि के रंग भर मुझ पर डालना
"रत्ती" भक्ती का ही पक्का रंग ही मुझ पर डालना

-सुरिन्दर रत्ती

Holi Ki Badhayiyan


होली आ रही है, रहना तैयार
लाल, नीला और होगा रंग हरा ,
हंसी-खुशी, मस्ती से होगा दिन भरा,

पिचकारी से निकलेगी गोली,
भीगेगी इसकी पतलून और उसकी चोली ,

सर से उतार सभी कामों का भार,
होली आ रही है, रहना तैयार

रंगों से रंगों का देना जवाब,
साल भर का ले लेना हिसाब ,

खेलना ऐसे कि रंग जाए तन और मन,
फेंकना रंग चाहे दोस्त हो या दुश्मन,

अबीर-गुलाल से करके श्रृंगार ,
होली आ रही है, रहना तैयार

उस दिन का रंग साल भर ना छूटे,
सभी संग रहे , न किसीसे रूठे ,

प्रेम- सम्मान का ऐसा हो रंग,
जिताये सबको जो जीवन की जंग,

जिसका बेताबी से करते सब इंतज़ार ,
होली आ रही है, रहना तैयार

-अवनीश तिवारी

Holi Ki Badhayiyan


बेर लगे गदराने, आम लगे बौराने ।
कलियाँ खिल कर फूल बनी, भँबर लगे मडराने।।
मौसम आसकाना, चलन लगी पुरवाई।
गूँज उठी शहनाई, रितु मिलन की आई।।

दिनकर बन आ जाओ, मन पंकज खिल जाये ।
शशि आभा की आश लगाये, खिलने कुमुदनी मचलाये।।
चातक मन गगन निहारे, बन चंदा, दे जा दिखाई ।
गूँज उठी...

एक बूँद स्वाति का पानी, सीप लगाये आश ।
मोती बन आ जाओ सजना, तुम सजनी के पास।।
देके अलौकिक यह नजराना, हिय में जाओ समाई ।
गूँज उठी...

मयूर नृत्य कर रहस रचाये, पपीहा चला बुझाने प्यास ।
मेघ चले भूमि से मिलने, सरिता चली सागर के पास ।।
इंद्रजाल में हुई बाबरी, रितु पावस की आई ।
गूँज उठी...

कैसे कटते दिन है उनके , कैसे कटती रतियाँ ।
मदमस्ती में खो-खो जाती, मिलन की करती बतियाँ ।।
साथ में खेली सखी सहेली, उनकी हुई सगाई ।
गूँज उठी...

मेरे सपनों के राजकुमार, हम हुये दीवाने ।
पल-पल तेरी राह देखती, आ जाओ अन्जाने ।।
दिल में मचा तूफान, कहाँ छिपे हरजाई ।
गूँज उठी...

नयन बिछाये राह निहारू, मुझे पहनाओ कंगना ।
दीपक बन आ जाओ सजना, करो प्रकाशित अंगना ।।
मचल-मचल जाये मन, रितु बसंत की आई ।
गूँज उठी...

शिल्पकार पत्थर को गढके, मूरत में सजीबता लाये ।
जौहरी हीरा तरासे, तभी चमक है आये ।।
मन मंदिर में आन विराजो , सुनलो अरज हमाई ।
गूँज उठी...

बने मीठे पकवान, गुजियों के संग ।
देख होली हुरदंग, मन उठती उमंग ।।
प्रेमरंग से रंग दे चूनर, सजना होली आई ।
गूँज उठी...

-देवेन्द्र कुमार मिश्रा

Holi Ki Badhayiyan


होली आई रे होली,
रंग के देव ने खोली झोली,
दो पुराने दोस्त कर बैठे थे बैर,
मन में घोल रखा था घृणा और द्वेष का जहर,
टूट रहा था भाई पर भाई का कहर,
देख होली के रंग यह आँधी गई ठहर,
होली आई रे होली,

भर दी खुशियों से झोली,
होली के रंग ने मिला दिये दुश्मन बने दोस्त,
होली का रंग देख संभल गए होश,
आया रे आया आज तो वृद्धों में भी जोश,
धरती भी चीख बोली,
होली आई रे होली,

होली की सुबह ने रंग दिये सब के तन,
घृणा और द्वेष भरा गागर भी बदल गया मन,
देख रंग, दुश्मन बने दोस्त नाच रहे संग-संग,
घृणा और द्वेष, दो दुश्मनों की चाल की भंग,
दोपहर को स्नान से बह गई गंदगी,
सुधर गई फिर से इंसान की जिंदगी,
मिले, गले दो इंसान, हुई क्रूरता की पराजय,
देखो आज पत्थर दिल, प्रेम को सह गय,
देख होली, ग्रीष्म ऋतु हो गई प्रारम्भ,
चारों ओर छायेगी हरियाली, वंसत का है आगमन,
घृणा, द्वेष मार, मन ही मन छा गई खुशहाली,
होली आई रे होली।।

- गोविन्द शर्मा, आगरा

Holi Ki Badhayiyan


तेरे दिल के करीब आ के मना लें होली
आ तुझे प्यार से बुला के मना लें होली

ला के बाज़ार से रगीं गुलाल इतराएँ
हाथ रुख्सारों पे फिसला के मना लें होली

कंपकंपाती औ थरथराती खिखिलाती हो
देह पिचकारी से भिगवा के मना लें होली

खेल लें रंग डालने से पहले छुप्पाछुपी
ख़ुद को फिर ख़ुद ही पकड़वा के मना लें होली

जब कि मदहोश हों सब धूम में धडाके में
सरे बाज़ार बोसे पा के मना लें होली

कृष्ण मैं सांवला और राधा वो गोरी गोरी
हाये फिर बांसुरी बजा के मना लें होली

लेट कर दूब को भी रंग से रंगीं कर दें
एक दूजे को गुदगुदा के मना लें होली

आसमाँ से भी बहुत तेज़-रंग हों सपने
आरजुओं से गुनगुना के मना लें होली

प्यार तो रिश्ता है सदियों से जन्म जन्मों का
याद इक दूजे को दिला के मना लें होली

-प्रेमचंद सहजवाला

Holi Ki Badhayiyan


नहीं बिखरते हैं अब रंग होली के
दिखती नहीं मस्तानों की टोली
फागुन भी बदला इस कलयुग में
दिलों में नहीं प्यार की बोली
होली की अब उठ गई है डोली

आमों से रूठा है बौर
सेमल के फूलों का ...
दिखे न अब यहाँ कोई ठौर
फागुन का रास्ता तकते
खिलती सरसों भी लगती
हमें आधी और अधूरी
महुए की महक भी
अब सबको है भूली
होली की अब उठ गई है डोली

मस्ती के बदले अंदाज़
कहाँ अब वह रंग रास
दहकते टेसू ,फ्लाश
महके न अब हवा में
अबीर गुलाल के
वह मदमाते अंदाज़
देवर संग जमे न
अब भाभी की हँसी ठिठोली
कि होली की उठ गई है डोली

अजब सी फिजा में
लगे अजनबी
अपनी ही बोली
राधा-कृष्ण की भी प्रीत
अब बीती बात हो ली
कि होली की उठ गई है डोली
दिखती नहीं अब मस्तानों की टोली!!

-रंजना भाटिया 'रंजू'

Holi Ki Badhayiyan


बचपन के आँगन में,
खेली थी, जो 'होली' हमने
आज उस होली को मन तरसे|
चारो तरफ़ उमंग
रंगों का उफान हर दिशा में बरसे
लाल-पीले हर रंग के रंग
मुख हमारे हरे-नीले
हाथों मे मुट्ठी भर-भर गुलाल
गालों पर सभी रंगों का कमाल
घर-घर जा कर मचाते धमाल
आज उस धमाल को मन तरसे
आज उस होली को मन तरसे
पकवान जो, होली में विशेष बनते
पुआ-पुरी और कचौरी
दही-भल्ले संग खूब ललचाती जिलेबी
पिचकारियाँ भर-भर देते एक-दुसरे पर मार
करते सब मिल रंगों की बौछार
उस बौछार मे, गुलाब जामुन पर चढ़ते रंग हजार
फागुन की फुहार में हम मस्त-मौला हो कर झुमते
आज उस फुहार को मन तरसे
आज उस होली को मन तरसे|

- सुमन कुमारी 'मेनका'

Holi Ki Badhayiyan


अबीर गुलाल फाग राग अब
बीती बातें काव्य जगत की,
गाली कीचड़ एसिड मिर्चे
मौका मिला और रगड़ दी,
कौवे की है जात जिस्म में
पर कोयल की बोली है |
बुरा न मानो होली है |
.
कुमकुम महावर मेहंदी लाली
लाज शरम भंगार हो गया,
सर पर टाट बदन पर टाटू
नंगापन श्रृंगार हो गया,
सूरपनखा सराही जाती
उर्मिला रही अबोली है |
बुरा न मानो होली है |
.
गर्दभ उष्ट्र मित्र मंडली
अहो रूपम ! अहो ध्वनी !
कवि मुख्य कविता गौण
अहो नामम ! अहो मनी !
अंगूर पड़े उपेक्षित कोने
पुरस्कृत खजूर निमौली है |
बुरा न मानो होली है |
.
सोना लेने घर से निकले
पाई चाँदी केश में ,
तार-तार यादों चादर
रफुगिर है परदेश में,
सूखी होली तब खेली थी
नजरें आज भिगोली है |
बुरा न मानो होली है |
.
मन भाते से विमुख होकर
जो कुछ बांटा वह है अपना,
तेरा क्या है मेरा क्या है
जो कुछ पाया वह है सपना ,
दाता बैठा एक गगन में
हाथ सभी के झोली है |
बुरा न मानो होली है |

-विनय के॰ जोशी

Holi Ki Badhayiyan


आज मन की ज्वाला दहकी
तू सासों में चंदन सी महकी
तप्त लपटों में आज मन के
सारे द्वेष-राग मिटा ले
आ प्रेयसी होली मना लें

आज तू अपने हृदय से
मेरे हृदय के रंग मिला ले
शब्दों को प्रेम रस में डूबोकर
आज तू जी भर के गा ले
आ प्रेयसी होली मना लें

मेरे लिए हर रंग बेरंग हो
जीवन सफर में जो तू न संग हो
अपने माथे पर आज प्रिये
मेरे प्यार का अबीर लगा ले
आ प्रेयसी होली मना लें

तू उत्कृष्ट, अभिमान मेरा
तू अद्‌भुत, सम्मान मेरा
दुनिया के जितने भी है रंग
मैंने तुझमें हैं देख डाले
आ प्रेयसी होली मना लें

-अमित अरुण साहू

Holi Ki Badhayiyan


बरस बाद देखो, फिर होली आई,
सतरंगी घटा, घिर घिर के छाई।

छलक-छलक जाएं बदरा से रंग,
मस्ताने डोल रहे करते हुडदंग।

वो देखो मस्त हुए, पी कर के भंग,
सखियाँ भी छोडे़ नहीं, करती हैं तंग।

रंग उड़े चहुँदिशा, सूखे और गीले,
हरे, जामनी, लाल, गुलाबी, नीले और पीले।

टोलियाँ नाचें गाएं, मिल के सब संग,
खूब ज़ोर आज बजाएं, ढोलक मृदंग।

धरती ने ओढ़ लीनी, पीली चुनरिया,
पवन बसंती जाए, कौन सी डगरिया।

मीठी व प्यार भरी, गुझिया तो खाओ,
याद रहे बरसों तक, ऐसी होली मनाओ।

-अल्पना वर्मा

Holi Ki Badhayiyan


हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली
प्रेम अबीर उड़ाती आई मन में प्रीत जगाती आई
द्वेष भाव को दूर भगाने का सन्देश सुनाती आई
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

नयनो में मस्ती सी छाई सबको गले लगाती आई
मन का मैल हटाती आई शत्रु मित्र बनाती आई
मन का हिरनकश्यप मारन को नरसिंह का अवतार है होली
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

पुराने वस्त्र हटाती आई नए बसना पहराती आई
बूढ़ों में मादकता लायी बच्चों के भी मन को भाई
मन की कलुष्ता मिट जाये वह रंगीन विचार है होली
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

कुछ झिझकी शरमाती आई प्रेम रंग मादकता छाई
सब पर अजब जवानी लायी राम नाम को गाती आई
मन से मन सब का मिल जाये तन से तन मिलवाती होली
हौले-हौले आ गयी होली,मस्ती का रंग भरी ठिठोली

हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सब मिल खेलो होली भाई
पंथ निरपेक्षता की शहनाई हर मजहब को है भाई
'दिनेश' राष्ट पर बलि-बलि जाये बहत का संस्कार है होली
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

-दिनेश चन्द्र जैन

Holi Ki Badhayiyan


लगाते हो जो मुझे हरा रंग
मुझे लगता है
बेहतर होता
कि, तुमने लगाये होते
कुछ हरे पौधे
और जलाये न होते
बड़े पेड़ होली में।
देखकर तुम्हारे हाथों में रंग लाल
मुझे खून का आभास होता है
और खून की होली तो
कातिल ही खेलते हैं मेरे यार
केसरी रंग भी डाल गया है
कोई मुझ पर
इसे देख सोचता हूँ मैं
कि किस धागे से सिलूँ
अपना तिरंगा
कि कोई उसकी
हरी और केसरी पट्टियाँ उधाड़कर
अलग अलग झँडियाँ बना न सके
उछालकर कीचड़,
कर सकते हो गंदे कपड़े मेरे
पर तब भी मेरी कलम
इंद्रधनुषी रंगों से रचेगी
विश्व आकाश पर सतरंगी सपने
नीले पीले ये सुर्ख से सुर्ख रंग, ये अबीर
सब छूट जाते हैं, झट से
सो रंगना ही है मुझे, तो
उस रंग से रंगो
जो छुटाये से बढ़े
कहाँ छिपा रखी है
नेह की पिचकारी और प्यार का रंग?
डालना ही है तो डालो
कुछ छींटे ही सही
पर प्यार के प्यार से
इस बार होली में।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'

Holi Ki Badhayiyan


आसमां से धनुक लेके कसे तरकश फगुना,
महुआ के कलश फोड़ पिये सब रस फगुना।

फिरा दे लत-लक्षण भी ओल, नीम, करैला के,
मधु टपके चहुंओर, रहसे बरबस फगुना ्।

कोकिल-राग छेड़े कुहूक, मन के बगान में,
लाग सारे हीं जगाके छीने आलस फगुना।

दहके जो होके गुलाबी बिना रंग-गुलाल के,
गालों से गोरी के न हो, टस से मस फगुना।

मनमुटाव ना बचे कुछ मेरे गाँव-जमात में,
आना तुम अगले बरस जस के तस फगुना।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

Holi Ki Badhayiyan


होली के रंग
और तुम्हारी याद
दोनो साथ-साथ
आ गए….
खिले हुए फूल
और…
बरसते हुए रंग
कसक सी….
जगा गए
आती है जब भी
टेसू की गन्ध
दिल की कली
मुरझा सी जाती है
रंगों में डूब जाने की
चाहत….
बलवती हो जाती है
चेतना बावली होकर
पुकार लगाती है
और शून्य में टकराकर
पगली सी लौट आती है
फाग में झूमती
मस्तों की टोली में
बेबाक….
तुम्हें खोजने लगती हूँ
और आँखें….
अकारण ही बरस जाती हैं
होली की गुजिया
और गुलाल के रंग
बहुत फीके से लगते हैं
कानों में तुम्हारी हँसी
आज भी गूँजती है
आँखें…..
तुम्हे देख नहीं पाती
पर आस है कि
मरती ही नहीं
कानों में….
तुम्हारे आश्वासन
गूँजने लगते हैं
और…..
रंगों को हाथ में लिए
दौड़ पड़ती हूँ
दिमाग पर…
दिल की विजय
यकीन दिलाती है
तुम जरूर आओगे
और मुझे…..
फिर से
अपने रंग दे जाओगे

- शोभा महेन्द्रू

Holi Ki Badhayiyan


मुंबई वालो मौज मनालो
आई है होली हाथ मिला लो

कौन है राजा कौन भिखारी
कौन मराठा कौन बिहारी
कौन यहाँ पर यूपी से आया
पहचान पाया सपने सजाया
फूल सभी हैं भेद न डालो
आई है होली हाथ मिला लो

मराठी बाला बनती हो खाला
साथ निभाती हो उगले जो ज्वाला
बाहर आओ रंग जमाओ
राज कहाँ है राज बताओ
देता है गारी यूपी बिहारी
दवा दिला दो भारी बीमारी
भैया तुम्हारा उसको संभालो
आई है होली हाथ मिला लो

फागुन आया रंग जमाया
सामना करने सामना आया
बाबा जी बाला खोलो भी ताला
बंद करो अब बाँटो न आला
लहराती दाढ़ी जैसे हो साड़ी
रंग करा लो निरे अनाड़ी
खोलो जी खोलो खेलो जी होली
रोली लगा दो मारो न गोली
दोगे जो गारी वो प्यारी प्यारी
हँस कर सुनेंगे सारी की सारी
दर पर खड़े हैं अपना बना लो
आई है होली हाथ मिला लो

उद्धव जी आना रंग न लाना
नशा है भारी बदला ज़माना
तुम तो हमारे हम भी तुम्हारे
हारे नहीं हैं न आज़माना
बम बनो मत अपना बना लो
आई है होली हाथ मिला लो

सल्लू जी समझो इनमें न उलझो
फिल्में करो और उनमें ही उछलो
रंग है चोखा दे देगा धोखा
हाथ मलोगे राज अनोखा
बाबू बिहारी क्यों हो दुखारी
तुम तो बड़े हो हम सब भिखारी
मारा है तुमने जो पिचकारी
रंग बिना ही वो क्षयकारी
आग में ऐसे घी न डालो
आई है होली हाथ मिला लो

- नगेन्द्र पाठक

Holi Ki Badhayiyan


इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

किया था जो सखियों से वादा
तुमको उनसे मिलवाऊँगी
कैसे वादा अपना निभा पाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

बना रही हूँ
जो अपने हाथों से
प्रेम रंग
फिर वो किसको लगाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

कैसे तुम्हारे बिना
पकवानों की मिठास चख पाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

मालूम है मुझे तुम
जेठ की छुट्टियों में आओगे
तुम ही बताओ
तब भला मैं कहाँ से
फूलों की बहार लाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

ना मैं तुम्हें
पीली सरसों का हाल बताऊँगी
न पाती भेज कर
गाँव की मिटटी सूँघाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

ना सोमवार को मन्दिर
तुम्हारे लिए जाऊँगी
न देख कर चाँद को मुस्कराऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

बादल भइया से कह कर
सावन में तुमको तड़पाऊँगी
ना रिमझिम बरसातों में
मधुर गीत सुनाऊँगी
देख लेना इस होली पे
यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाउंगी

-अंजु गर्ग

Holi Ki Badhayiyan


रंगों में जीवन के सारे भाव जो नज़र आयें, रंग खेल कर तो देखो
क्यों है उनके साथ बैर-भाव फूल चमन का लाकर तो देखो
दिल खिल उठेगा दिल मिलने से अपने जज़्बात टटोल कर तो देखो
आज है सनम होली का दिन रंगों की टोली में मिल कर तो देखो
कितना आनंद आता है रंगों में एक दूसरे को रंग लगाकर तो देखो
लाल, नीला, पीला, हरा, गुलाबी रंगों से सारा रंग जाये
धरा के संग संग अंबर भी सजाये
गले मिलकर इस पर्व को मनाये
रंगों से धरती सजे बीड़ा खिलाकर सबको गले से लगाओ
उनको भी रंगें खुद भी रंग जायें चलो मिलकर रंगों का त्यौहार मनायें
मस्ती हो होली हो दिल से दिल की होली हो

-संजय साहा

Holi Ki Badhayiyan


हाथों में ढफ लिये खड़ा है
आज फिर गाँव का ग्वाला
मुरली लेकर प्रकट हुआ है
आज फिर मुरली वाला
रंगों के मेले में, गुलाल के झमेले में
रंग गई दुग्धबाला
अबीर के उड़ते रंगों में
छिप गया भोर का उजाला
भंग का देखो शंभू ने
फिर भर दिया है प्याला
बच्चों के बीच फँसा है
आज ये हलवाई लाला
नाचते गाते आ रहा है
पंचम गाने वाला
सुरेन्द्र बरसा रहा है सब पे
पानी खुशबू वाला
उड़ कर फिर से प्रहलाद के
कंधों पर टिका दुशाला
मच गई है धूम, फिर आया
त्यौहार रंगों वाला

-पूजा

Holi Ki Badhayiyan


उलझी लटें
पुरबा के झोंके से
बार बार बिखरें
धूप-छांव देखि आँख
खेत-खेत ठहरे
प्यासी काली आंखों में
सूनी प्रतीक्षा
मन तेरा अलसाये
फागुन के रंग खिले
पे टेसू संग अंग
पीपल के पात डोलें
खाय जो उमंग भंग
सेमर के फूल बीन
सपने संजोये गोरी
नयी नयी कोंपलों से
परिधान पाये
उड़त अबीर बन धूर
है गली गली
गोपी राधा बंसी सुन
घर से चली चली
चित्त है चलायमान
कसक उठाये
होली हुडदंग देख
खोजती है द्रष्टि अब
किसे विकल बार बार
'कान्त' परदेशी संग
प्रीत क्यों लगाये

-श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

Holi Ki Badhayiyan


चलो रंगरेलिया मनाएं, कहां छिपी होली है
बुरा नहीं मानेगी वह, भई आखिर होली है !

अनगिनत रंगों में तेरे मैं ढला हूं जिंदगी, पर
बचा कालिख से बुराई की, आज तो होली है

चाहतों में मैं तुम्हारी कुछ भी बनने से रहा
कुछ तो बनके ही रहूंगा देख लेना, होली है

नया नाम हर रोज़ वह देता आया है मुझे
आज मीठी गाली उसकी, शायद होली है ...

नाराज़ ही मुझसे रहा, कहा पर कभी नहीं
क्यों जुबां खुली है आज, याद आया होली है !

-सतीश वाघमारे

Holi Ki Badhayiyan



इस फागुन ज़रूर से ज़रूर आना


मेरे गाँव की काली माँई
बड़ी परतापी हैं
सबकी मनौती पुराती हैं
पाँच नारियल माना था मैंने
बोर्ड में सेकेण्ड डिवीजन पास हुआ
गाँव की हर नई बहुरिया
उनको चुनरी चढाती है


गाँव के पच्छिम जो पीपल है
उस पर दइत्रा बाबा रहते हैं
एकबार सोनवा के बाबू पर सवार हुए थे
एक बोतल दारू ओर दो चिलम गांजा से जान बची
जब बाबा मरे थे
बाबूजी इसी पीपल पर
कलसे में पानी टांगा करते थे
अब वो कलसा नहीं है
'''''''''''''बाबा पियासे होंगे


मेरे गाँव का जो रस्ता है
जिसकी छाती पर, आज भी
बचपन से अब तक के
मेरे पैरों की नाप है,
मेरा घर जानता है
तुम आँख बन्द करके भी आओ
तुम्हें मेरे घर तक पहुँचा ही देगा
ये तो पहले भी बता चुका हूँ
मैं और मेरे गाँव का चाँद
हमजोली हैं
माँ ने दोनों को चांदी की कटोरी में
साथ-साथ दूध-भात खिलाया है


जब सरसों के फूल खिलें
जब आमों में बौर लगे
मटर-तीसी फुलाने लगें
झुरमुट में छिपी कोयल बुलाने लगे
मेरे गाँव मत आना
इतनी सुन्दरता तुम्हें बाउर कर देगी


आना जब बारिश हो
आह मेरे गांव की बारिश
पूरे मन से बरसती है
बचपन में खूब भीगा हूँ इसमें
और मारा है बाबूजी ने
बाबूजी की मार याद नहीं
पर बारिश की फुहार आज भी याद है


मेरे गाँव का रस्ता
मेरे गाँव का पीपल
मेरे गाँव की बारिश
मेरे गाँव की कोयल
सबसे तुम्हारी बातें करता हूँ
इस फागुन ज़रूर से ज़रूर आना
मिलवाऊँगा सबसे।


कवि- मनीष वंदेमातरम्


शब्दार्थ-

माँई- माँ
परतापी- प्रतापी, शक्तिवाली
दइत्रा बाबा- एक तरह की काल्पनिक शक्ति
कलसा- कलश
बाउर कर देना- बौरा देना, मतवाला बना देना