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Thursday, March 20, 2008

होली के 33 रंग (काव्य-पल्लवन, वर्ष- 2, अंक- 1)






छायाचित्र- अनुराधा श्रीवास्तव

होली शब्द सुनते ही आंखों के सामने रंग बिखर जाते हैं । होली उत्तर भारत के अलावा अन्य प्रदेशों मे भी मनाई जाती है, हाँ थोड़ा बहुत रूप स्वरूप बदल जाता है।
हरियाणा की धुलन्डी: इस दिन औरतें गीले कपडे को कोड़ा के रूप में प्रयोग करती हैं और रंग डालने वालों को इसका वार झेलना पडता है । भाभियाँ देवरों को इस दिन खूब सताती हैं ।
बंगाल का बसन्तोत्सव: गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने होली के दिन ही शान्तिनिकेतन में बसन्तोत्सव का आयोजन किया था। पूरे बंगाल में इसे ढोल पूर्णिमा अथवा ढोल-जात्रा के तौर पर भी मनाया जाता है । लोग अबीर गुलाल लेकर मस्ती करते है।
महाराष्ट्र की रंग पंचमी और कोंकण का शिमगो: महाराष्ट्र और कोंकण के लगभग सभी हिस्सों में इस त्योहार को रंगों के त्योहार के रूप मे मनाया जाता है। मछुआरों की बस्ती मे इस त्योहार का मतलब नाच,गाना और मस्ती होता है। ये मौसम रिश्ते(शादी) तय करने के लिये मुआफिक होता है, क्योंकि सारे मछुआरे इस त्योहार पर एक दूसरे के घरों को मिलने जाते है और काफी समय मस्ती मे व्यतीत करते हैं।
तमिलनाडु की कामन पोडिगई : तमिलनाडु में होली का दिन कामदेव को समर्पित होता है। इस दिन शंकर जी ने रति के विलाप करने पर कामदेव को पुर्नजीवित किया था.
होली इस बार मार्च महीने की २२ तारीख को है इस लिये हिन्द-युग्म पर काव्य पल्लवन का विषय भी "होली" ही रखा गया और इस अंक को महीने के आखिरी वीरवार कि बजाये पहले ही प्रकाशित किया जा रहा है । इस बार हमें होली के अलग अलग रंग लिये रचनायें प्राप्त हुई हैं.

Holi Ki Badhayiyan


*** प्रतिभागी ***

| महक | शम्भु चौधरी | सविता दत्ता | कृष्ण लाल | पियूष. के. मिश्रा |
| सजीव सारथी | ममता गुप्ता | महेन्द्र भटनागर | प्रदीप कुमार | जीतेश नौगरैया | सीमा सचदेवा |
| रचना श्रीवास्तव | सुरिन्दर रत्ती | अवनीश तिवारी | देवेन्द्र कुमार मिश्रा | गोविन्द शर्मा, आगरा |
| प्रेमचंद सहजवाला | रंजना भाटिया 'रंजू' |सुमन कुमारी 'मेनका' | विनय के॰ जोशी |
| अमित अरुण साहू | अल्पना वर्मा |दिनेश चन्द्र जैन | विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र' |
| विश्व दीपक 'तन्हा' | शोभा महेन्द्रू |नगेन्द्र पाठक | अंजु गर्ग |
| संजय साहा | पूजा |श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' | सतीश वाघमारे |

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





छाई खुशियों की बौछार
के आई है होरी
मीठी गुझिया,मीठा मोरा सैय्या

दोनो पे टिकी होये
इस दिन नज़र हमारी

बड़ी स्वादिष्ट सी गुझिया
हाय,खाने को जियरा ललचाय
लागे एक ही बारी में
स्वाहा करूँ सारी
छुपाय के सबसे खाना पड़त है
देखे कोई ई न कह दे
बहुरिया घर की,सब से चटोरी.

देख सलोना भोला सैय्या
गोरियों का दिल मचल जाय
नटखट सखियाँ धोखे से
सजनवा को भंग पीलाय
जानत मस्ती,पर मन घबराए
कोई मोरे सैययांजी की
कर ले ना चोरी.

भूल,ख़ता माफ़,मन की स्लेट कोरी
रंगों से सजी हो सब जन की होरी.

-महक

Holi Ki Badhayiyan


रंग बने एक ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो तन को नहीं - मन को छू सके।
रंग बने एक ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो राज्य-राज्य की बात न कर
करे राष्ट्र की बात।
रंग बने एक ऎसा,
जो लाल, गुलाबी, पीला, नीला,
हरा नहीं हो यार।
इसका रंग कुछ ऎसा हो,
जो जात -पात का भेद भुला कर
करे प्रेम की बात।
पर देखो इस देश को लग गई
किस मनहूस की हाय।
ये मेरा महाराष्ट्र, तो ये मेरा बंगाल,
ये मेरा गुजरात, तो ये मेरा पंजाब,
ये मेरा बिहार, तो ये मेरा असम,
कोई नहीं कहता यारों
भारत! ये मेरा देश बने महान
आओ हम सब मिलकर बनायें
एक नया और रंग
जिसमें दिखे भारत का
साथ-साथ सातों रंग।

-शम्भु चौधरी

Holi Ki Badhayiyan


हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
आ गई होली
उमंग रंग और बचपन की
धुँधली यादें लिए
छत पर खड़े होकर
हर राहगीर पर जब
फेंके जाते थे
रंगीन पानी से भरे गुब्बारे
या छोड़ी जाती थी
पिचकारी के पानी की धार
कभी किसी की गाली
सुनने को मिलती थी
और कभी प्यार बिखेरती मुस्कान
सादगी थी मासूमियत थी
उस होली में
हो हल्ला तो था
पर अदब भी था उस होली में
(फिर अपने साथ लिए
बचपन की यादें )

हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
आ गई होली

त्योहार पर शगुन भी
मिला करते हैं
तब भी मिलते थे
एक रूपया या दो रूपए
और उन्हीं पैसों से
फिर खरीदे जाते थे
गुब्बारे, रंग और गुलाल
मगर अब होली में
हम बिना रंग के ही
रंगीन हो जाते हैं
आँखें लाल रंग से तर
रंगीन हो जाती हैं
नम होकर उनसे
बहने लगता है पानी
(यही तो जरूरी होता है होली में
रंग और पानी )
आज बच्चों को देखती हूँ
खेलते होली

हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
आ गई होली

-सविता दत्ता

Holi Ki Badhayiyan


कभी खेला करते थे होली हम जिद्द करके सब से
जबसे हुआ बदरंग ये जीवन छुए नही रंग तब से
यूँ तो होली खेलने साथी अब भी घर आते हैं
पर जीवन हो बदरंग तो फिर रंग कहां कोई भाते है

तुमने जानू कह कर मेरी जान ये क्या कर डाला
रंगहीन जीवन में मेरे फिर से रंग भर डाला
फिर से जगा दी सोई उमंगे तुमने बन हमजोली
मन मे हुडदंग मचा रही है अरमानो की टोली

तुमने हम पे रंग डाल के कर तो दी है शुरूआत
अब देखना किन किन रंगो की होगी तुम पर बरसात
अंग अंग भीगे ना जब तक तब तक होगी होली
अब ना बचेगी तेरी चुनरिया अब ना बचेगी चोली

डरते डरते चुटकी भर रंग इक दूजे को लगाना
मै ना मानू इस को होली मै ठहरा दीवाना
बस माथे गुलाल का टीका ये भी हुई कोई होली
ना रंगो से रंगी चुनरिया ना ही भीगी चोली

होली मे भी सीमाओ का क्यो रखना अहसास
भूखा ही मरना है तो फिर तोडना क्यों उपवास
खेलनी है तो जम कर खेलो मस्ती भरी ये होली
मातम की तरह ना मनाओ होली मेरे हमजोली

होली को होली सा खेलो या रहने दो हमजोली
जितनी भी होनी थी होली तुम संग होली होली

-कृष्ण लाल

Holi Ki Badhayiyan


तुम्हारे लबों का लाल रंग
बहुत पसंद है मुझे
इस होली
रंग देना
मुझे इसी रंग में...

रंग लगाया तो तुमने
लबों से नहीं
लफ़्ज़ों से मगर
चुभते हैं बहुत
और दिखते भी नहीं....
फैल रहे हैं बदन में
ज़हर की तरह...

मैने ऐसा तो नहीं कहा था!!

-पियूष. के. मिश्रा

Holi Ki Badhayiyan


सोने की चिड़िया कैसी थी ?
माटी की गुड़िया ऎसी है -
होली के रंग उसने देखे होंगे,
मजहबी ज़ंग की ये साक्षी है,
अबीर -ओ- गुलाल में वो नहाती होगी,
नफरत के छींटों से दामन लाल है,
पिच्कारियों - गुब्बारों से प्यार बरसता होगा,
गोलियों -बरूदों से सीना छलनी है .
सोने की चिड़िया कैसी थी ?
माटी की गुड़िया ऎसी है .


-सजीव सारथी

Holi Ki Badhayiyan


फिर आया फागुन
फिर मौसम बदला
मन-मंजूषा खोल
देखने को..
फिर मन मचला
खोलते ही....
बिखर गया
स्मृतियों का एक-एक मनका
बीनते-बीनते उन्हें
होश रहा तन का ना मन का
आ-हा----
मन भावन संग वह होली
रंग-देने और रंग-जाने की
वह आँखमिचौली
उस बरस टेसू पेङों पर नहीं
अधरों पर महके थे
रंग हवाओं में नहीं
कपोलों पर दहके थे
पिचकारी से नहीं
नेह -रस...
आँखों से बरसा था
यह तन गीला नहीं हुआ था
उनकी बाँहों में सरसा था

तुम्हें नहीं लायी
तो क्या आयी ये होली
कैसा टेसू...
कैसा गुलाल और कैसी रोली

पर क्या फर्क पङता है ---
तेरे संग तो मेरी होली
कब की हो-ली------
स्मृतियों में ही सही
इस बरस भी तेरे संग ही
होगी ये होली-------

-ममता गुप्ता

Holi Ki Badhayiyan


आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !
नये पूर्ण मानव बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
आओ जगाएँ
भुवन-भाविनी भावनाएँ !
नहीं हो परस्पर विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता,
आओ मिटाएँ
दलन-दानवी-दासताएँ !
कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों न नभ पर प्रभंजन,
आओ बहाएँ
अधम आसुरी आपदाएँ !

-महेन्द्र भटनागर

Holi Ki Badhayiyan


फिर फागुन आया है यारों !
फिर आई है होली .
भूल के सारे भेदभाव को
खेलेंगे हम होली .
गोरा हो या काला कोई
सब को मलें गुलाल ,
रंग भेद मिट जाएं सारे
कर दें लाल्मलाल
सबको गले लगाके
खेलेंगे हम होली .
सदियों पहले रूठ गई जो
भीड़ भाड़ में छूट गई जो
शायद अब के फागुन में
वो भी आए खोली में
अपने रंग में रंगने उसको
खेलेंगे हम होली.
अब तक जिससे कभू ना बोले
प्यार का राज कभू ना खोले
म्हारे घर के आगे से जब ,
गुजरेगी वो हौले-हौले
मारेंगे उसपे पिचकारी
खेलेंगे हम होली .
सारी नफरत मिटेंगी अब के
दुश्मन भी गल मिलेंगे अब के .
छोट बडाई सभी मिटेगी ,
सब तकरार मिटेंगे अब के .
सब को प्रेम के रंग में रंगने
खेलेंगे हम होली

-प्रदीप कुमार

Holi Ki Badhayiyan


होली का क्या अब तो कभी भी हो जाती है
या यू कहे हर दिन सुनी पढी जाती है
दहेज़ के लोभियों ने नववधू जलाई
किशोरी ने छेड़खानी की रिपोर्ट लिखाई
तो दबंगों ने केरोसीन छिड़क आग लगाई

बंद के दौरान प्रदर्शनकारियों ने बस को फूंका
दो की मौके पे मौत छह को भर्ती कराया
अपनी रिपोर्ट नही लिखे जाने से क्षुब्ध रामआसरे
ने ख़ुद को कलेक्टरेट के सामने जलाया


दो गुटों मे संघर्ष खूनी होली
जमीनी विवाद को ले चली गोली
ये सिर्फ़ हेडलाइन नही जो काले रंग से रंगी
मिलेगा मुँह पे पुता तिरंगा हाथ मे नीली झंडी
बजट चुनावी रंग मे राजनीति केसरिया मे डूबी

पर क्यों क्यों नही हम मना सकते वो होली
जिसमे डंडे के साथ जलाते थे झाड़ झंगड़
पान की खाली टोकरिया और खती हुई बल्लिया
पूजा की गुजिया पपडिया और लाल छोटी झंडिया

क्यों नही चला सकते वो पिचकारी
जो रंग के साथ अपनपत बरसाए
क्यों नही लगा सकते वो गुलाल
जो कर दे हर गाल गुलाबी
हर चेहरे पर मुस्कुराहट ले आए

-जीतेश नौगरैया

Holi Ki Badhayiyan


होली आई , खुशियाँ लाई
खेले राधा सँग कन्हाई

फ़ेंकें इक दूजे पे गुलाल
हरे , गुलाबी ,पीले गाल

प्यार का यह त्योहार निराला
खुश है कान्हा सँग ब्रजबाला

चढ़ा प्रेम का ऐसा रंग
मस्ती मे झूमे अंग अंग

आओ हम भी खेले होली
नहीं देंगे कोई मीठी गोली

हम खेले शब्दो के संग
भावो के फ़ेंकेंगे रंग

रंग विरंगे भाव दिखेंगे
आज हम होली पे लिखेंगे

चलो होलिका सब मिल के जलाएँ
एक नया इतिहास बनाएँ

जलाएँ उसमे बुरे विचार
कटु-भावो का करे तिरस्कार

नफरत की दे दे आहुति
आज लगाएँ प्रेम भभूति

प्रेम के रंग मे सब रन्ग डाले
नफरत नही कोई मन मे पाले

सब इक दूजे के हो जाएँ
आओ हम सब होली मनाएँ

-सीमा सचदेवा

Holi Ki Badhayiyan


लो आ गई फिर होली
दिल मे एक टीस जगा गई होली
यादों को झकझोर ,
मुझ को मेरे देश पहुँचा गई होली

अपने पराए सब को रंग लगते थे
बुरा न मनो होली है कह के बच जाते थे
फागुन आते ही हम मनाने लगते थे होली

धरती अम्बर एक रंग हो जाता था
अमीर गरीब का भेद मिट जाता था
जब आती थी अबीर उड़ाती होली

राजा रंक एक रंग रंगते थे
रंगो से हम तन नही मन रंगते थे
जब भी आती थी सब को गले लगाती होली

गुझियों की होली ,पापड़ चिप्स की होली
पानी मे भीगी गलियों की होली
मुझ को याद आती है हुड़दंग की होली

यहाँ न वो मौसम है ,
न रंगो मे भीगा धरती अम्बर है
पकवानों की खुशबू भी नही
सूना सूना घर आँगन है
पिचकारियों से न छूटती है रंगो की गोली
फगुआ गाती नही है कोई टोली
फिर भी है आज होली
दिल मे टीस उठती होली
मुझको आपने देश पहुँचाती होली

-रचना श्रीवास्तव

Holi Ki Badhayiyan


अब तो मोहन तुम बिन कुछ नहीं सुहाता
होली ही नहीं कोई उत्सव नहीं भाता

आतंकी ख़ून की होली खेले
जान मासूमों की ले ले

सरकार मूक हो तमाशा देखती है
हत्याओं पर लगाम लगे, न सोचती है

बिगड़ा रईस अबला के साथ होली मनाता है
गंगा मैली होती प्रतिदिन, कोई न उसे बचाता है

अब तो जीवन के सारे रंग फीके लगते हैं
नंगा बचपन, अंधी जवानी, लाचार बुढापा, सिसकते हैं

होली तो एक बहाना है, गुंडा-गर्दी फैलाना है
बस वासना है दिलों में, मकसद भूख को मिटाना है

प्यार के लाल रंग लुप्त होते जा रहे हैं
शत्रुता के काले रंग नज़र आ रहे हैं

मोहन तुम्हारे संग होली खेलना चाहता हूँ

भक्ती और श्रद्धा के रंग में डूबना चाहता हूँ

पिचकारी में कृपा दृष्टि के रंग भर मुझ पर डालना
"रत्ती" भक्ती का ही पक्का रंग ही मुझ पर डालना

-सुरिन्दर रत्ती

Holi Ki Badhayiyan


होली आ रही है, रहना तैयार
लाल, नीला और होगा रंग हरा ,
हंसी-खुशी, मस्ती से होगा दिन भरा,

पिचकारी से निकलेगी गोली,
भीगेगी इसकी पतलून और उसकी चोली ,

सर से उतार सभी कामों का भार,
होली आ रही है, रहना तैयार

रंगों से रंगों का देना जवाब,
साल भर का ले लेना हिसाब ,

खेलना ऐसे कि रंग जाए तन और मन,
फेंकना रंग चाहे दोस्त हो या दुश्मन,

अबीर-गुलाल से करके श्रृंगार ,
होली आ रही है, रहना तैयार

उस दिन का रंग साल भर ना छूटे,
सभी संग रहे , न किसीसे रूठे ,

प्रेम- सम्मान का ऐसा हो रंग,
जिताये सबको जो जीवन की जंग,

जिसका बेताबी से करते सब इंतज़ार ,
होली आ रही है, रहना तैयार

-अवनीश तिवारी

Holi Ki Badhayiyan


बेर लगे गदराने, आम लगे बौराने ।
कलियाँ खिल कर फूल बनी, भँबर लगे मडराने।।
मौसम आसकाना, चलन लगी पुरवाई।
गूँज उठी शहनाई, रितु मिलन की आई।।

दिनकर बन आ जाओ, मन पंकज खिल जाये ।
शशि आभा की आश लगाये, खिलने कुमुदनी मचलाये।।
चातक मन गगन निहारे, बन चंदा, दे जा दिखाई ।
गूँज उठी...

एक बूँद स्वाति का पानी, सीप लगाये आश ।
मोती बन आ जाओ सजना, तुम सजनी के पास।।
देके अलौकिक यह नजराना, हिय में जाओ समाई ।
गूँज उठी...

मयूर नृत्य कर रहस रचाये, पपीहा चला बुझाने प्यास ।
मेघ चले भूमि से मिलने, सरिता चली सागर के पास ।।
इंद्रजाल में हुई बाबरी, रितु पावस की आई ।
गूँज उठी...

कैसे कटते दिन है उनके , कैसे कटती रतियाँ ।
मदमस्ती में खो-खो जाती, मिलन की करती बतियाँ ।।
साथ में खेली सखी सहेली, उनकी हुई सगाई ।
गूँज उठी...

मेरे सपनों के राजकुमार, हम हुये दीवाने ।
पल-पल तेरी राह देखती, आ जाओ अन्जाने ।।
दिल में मचा तूफान, कहाँ छिपे हरजाई ।
गूँज उठी...

नयन बिछाये राह निहारू, मुझे पहनाओ कंगना ।
दीपक बन आ जाओ सजना, करो प्रकाशित अंगना ।।
मचल-मचल जाये मन, रितु बसंत की आई ।
गूँज उठी...

शिल्पकार पत्थर को गढके, मूरत में सजीबता लाये ।
जौहरी हीरा तरासे, तभी चमक है आये ।।
मन मंदिर में आन विराजो , सुनलो अरज हमाई ।
गूँज उठी...

बने मीठे पकवान, गुजियों के संग ।
देख होली हुरदंग, मन उठती उमंग ।।
प्रेमरंग से रंग दे चूनर, सजना होली आई ।
गूँज उठी...

-देवेन्द्र कुमार मिश्रा

Holi Ki Badhayiyan


होली आई रे होली,
रंग के देव ने खोली झोली,
दो पुराने दोस्त कर बैठे थे बैर,
मन में घोल रखा था घृणा और द्वेष का जहर,
टूट रहा था भाई पर भाई का कहर,
देख होली के रंग यह आँधी गई ठहर,
होली आई रे होली,

भर दी खुशियों से झोली,
होली के रंग ने मिला दिये दुश्मन बने दोस्त,
होली का रंग देख संभल गए होश,
आया रे आया आज तो वृद्धों में भी जोश,
धरती भी चीख बोली,
होली आई रे होली,

होली की सुबह ने रंग दिये सब के तन,
घृणा और द्वेष भरा गागर भी बदल गया मन,
देख रंग, दुश्मन बने दोस्त नाच रहे संग-संग,
घृणा और द्वेष, दो दुश्मनों की चाल की भंग,
दोपहर को स्नान से बह गई गंदगी,
सुधर गई फिर से इंसान की जिंदगी,
मिले, गले दो इंसान, हुई क्रूरता की पराजय,
देखो आज पत्थर दिल, प्रेम को सह गय,
देख होली, ग्रीष्म ऋतु हो गई प्रारम्भ,
चारों ओर छायेगी हरियाली, वंसत का है आगमन,
घृणा, द्वेष मार, मन ही मन छा गई खुशहाली,
होली आई रे होली।।

- गोविन्द शर्मा, आगरा

Holi Ki Badhayiyan


तेरे दिल के करीब आ के मना लें होली
आ तुझे प्यार से बुला के मना लें होली

ला के बाज़ार से रगीं गुलाल इतराएँ
हाथ रुख्सारों पे फिसला के मना लें होली

कंपकंपाती औ थरथराती खिखिलाती हो
देह पिचकारी से भिगवा के मना लें होली

खेल लें रंग डालने से पहले छुप्पाछुपी
ख़ुद को फिर ख़ुद ही पकड़वा के मना लें होली

जब कि मदहोश हों सब धूम में धडाके में
सरे बाज़ार बोसे पा के मना लें होली

कृष्ण मैं सांवला और राधा वो गोरी गोरी
हाये फिर बांसुरी बजा के मना लें होली

लेट कर दूब को भी रंग से रंगीं कर दें
एक दूजे को गुदगुदा के मना लें होली

आसमाँ से भी बहुत तेज़-रंग हों सपने
आरजुओं से गुनगुना के मना लें होली

प्यार तो रिश्ता है सदियों से जन्म जन्मों का
याद इक दूजे को दिला के मना लें होली

-प्रेमचंद सहजवाला

Holi Ki Badhayiyan


नहीं बिखरते हैं अब रंग होली के
दिखती नहीं मस्तानों की टोली
फागुन भी बदला इस कलयुग में
दिलों में नहीं प्यार की बोली
होली की अब उठ गई है डोली

आमों से रूठा है बौर
सेमल के फूलों का ...
दिखे न अब यहाँ कोई ठौर
फागुन का रास्ता तकते
खिलती सरसों भी लगती
हमें आधी और अधूरी
महुए की महक भी
अब सबको है भूली
होली की अब उठ गई है डोली

मस्ती के बदले अंदाज़
कहाँ अब वह रंग रास
दहकते टेसू ,फ्लाश
महके न अब हवा में
अबीर गुलाल के
वह मदमाते अंदाज़
देवर संग जमे न
अब भाभी की हँसी ठिठोली
कि होली की उठ गई है डोली

अजब सी फिजा में
लगे अजनबी
अपनी ही बोली
राधा-कृष्ण की भी प्रीत
अब बीती बात हो ली
कि होली की उठ गई है डोली
दिखती नहीं अब मस्तानों की टोली!!

-रंजना भाटिया 'रंजू'

Holi Ki Badhayiyan


बचपन के आँगन में,
खेली थी, जो 'होली' हमने
आज उस होली को मन तरसे|
चारो तरफ़ उमंग
रंगों का उफान हर दिशा में बरसे
लाल-पीले हर रंग के रंग
मुख हमारे हरे-नीले
हाथों मे मुट्ठी भर-भर गुलाल
गालों पर सभी रंगों का कमाल
घर-घर जा कर मचाते धमाल
आज उस धमाल को मन तरसे
आज उस होली को मन तरसे
पकवान जो, होली में विशेष बनते
पुआ-पुरी और कचौरी
दही-भल्ले संग खूब ललचाती जिलेबी
पिचकारियाँ भर-भर देते एक-दुसरे पर मार
करते सब मिल रंगों की बौछार
उस बौछार मे, गुलाब जामुन पर चढ़ते रंग हजार
फागुन की फुहार में हम मस्त-मौला हो कर झुमते
आज उस फुहार को मन तरसे
आज उस होली को मन तरसे|

- सुमन कुमारी 'मेनका'

Holi Ki Badhayiyan


अबीर गुलाल फाग राग अब
बीती बातें काव्य जगत की,
गाली कीचड़ एसिड मिर्चे
मौका मिला और रगड़ दी,
कौवे की है जात जिस्म में
पर कोयल की बोली है |
बुरा न मानो होली है |
.
कुमकुम महावर मेहंदी लाली
लाज शरम भंगार हो गया,
सर पर टाट बदन पर टाटू
नंगापन श्रृंगार हो गया,
सूरपनखा सराही जाती
उर्मिला रही अबोली है |
बुरा न मानो होली है |
.
गर्दभ उष्ट्र मित्र मंडली
अहो रूपम ! अहो ध्वनी !
कवि मुख्य कविता गौण
अहो नामम ! अहो मनी !
अंगूर पड़े उपेक्षित कोने
पुरस्कृत खजूर निमौली है |
बुरा न मानो होली है |
.
सोना लेने घर से निकले
पाई चाँदी केश में ,
तार-तार यादों चादर
रफुगिर है परदेश में,
सूखी होली तब खेली थी
नजरें आज भिगोली है |
बुरा न मानो होली है |
.
मन भाते से विमुख होकर
जो कुछ बांटा वह है अपना,
तेरा क्या है मेरा क्या है
जो कुछ पाया वह है सपना ,
दाता बैठा एक गगन में
हाथ सभी के झोली है |
बुरा न मानो होली है |

-विनय के॰ जोशी

Holi Ki Badhayiyan


आज मन की ज्वाला दहकी
तू सासों में चंदन सी महकी
तप्त लपटों में आज मन के
सारे द्वेष-राग मिटा ले
आ प्रेयसी होली मना लें

आज तू अपने हृदय से
मेरे हृदय के रंग मिला ले
शब्दों को प्रेम रस में डूबोकर
आज तू जी भर के गा ले
आ प्रेयसी होली मना लें

मेरे लिए हर रंग बेरंग हो
जीवन सफर में जो तू न संग हो
अपने माथे पर आज प्रिये
मेरे प्यार का अबीर लगा ले
आ प्रेयसी होली मना लें

तू उत्कृष्ट, अभिमान मेरा
तू अद्‌भुत, सम्मान मेरा
दुनिया के जितने भी है रंग
मैंने तुझमें हैं देख डाले
आ प्रेयसी होली मना लें

-अमित अरुण साहू

Holi Ki Badhayiyan


बरस बाद देखो, फिर होली आई,
सतरंगी घटा, घिर घिर के छाई।

छलक-छलक जाएं बदरा से रंग,
मस्ताने डोल रहे करते हुडदंग।

वो देखो मस्त हुए, पी कर के भंग,
सखियाँ भी छोडे़ नहीं, करती हैं तंग।

रंग उड़े चहुँदिशा, सूखे और गीले,
हरे, जामनी, लाल, गुलाबी, नीले और पीले।

टोलियाँ नाचें गाएं, मिल के सब संग,
खूब ज़ोर आज बजाएं, ढोलक मृदंग।

धरती ने ओढ़ लीनी, पीली चुनरिया,
पवन बसंती जाए, कौन सी डगरिया।

मीठी व प्यार भरी, गुझिया तो खाओ,
याद रहे बरसों तक, ऐसी होली मनाओ।

-अल्पना वर्मा

Holi Ki Badhayiyan


हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली
प्रेम अबीर उड़ाती आई मन में प्रीत जगाती आई
द्वेष भाव को दूर भगाने का सन्देश सुनाती आई
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

नयनो में मस्ती सी छाई सबको गले लगाती आई
मन का मैल हटाती आई शत्रु मित्र बनाती आई
मन का हिरनकश्यप मारन को नरसिंह का अवतार है होली
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

पुराने वस्त्र हटाती आई नए बसना पहराती आई
बूढ़ों में मादकता लायी बच्चों के भी मन को भाई
मन की कलुष्ता मिट जाये वह रंगीन विचार है होली
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

कुछ झिझकी शरमाती आई प्रेम रंग मादकता छाई
सब पर अजब जवानी लायी राम नाम को गाती आई
मन से मन सब का मिल जाये तन से तन मिलवाती होली
हौले-हौले आ गयी होली,मस्ती का रंग भरी ठिठोली

हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सब मिल खेलो होली भाई
पंथ निरपेक्षता की शहनाई हर मजहब को है भाई
'दिनेश' राष्ट पर बलि-बलि जाये बहत का संस्कार है होली
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

-दिनेश चन्द्र जैन

Holi Ki Badhayiyan


लगाते हो जो मुझे हरा रंग
मुझे लगता है
बेहतर होता
कि, तुमने लगाये होते
कुछ हरे पौधे
और जलाये न होते
बड़े पेड़ होली में।
देखकर तुम्हारे हाथों में रंग लाल
मुझे खून का आभास होता है
और खून की होली तो
कातिल ही खेलते हैं मेरे यार
केसरी रंग भी डाल गया है
कोई मुझ पर
इसे देख सोचता हूँ मैं
कि किस धागे से सिलूँ
अपना तिरंगा
कि कोई उसकी
हरी और केसरी पट्टियाँ उधाड़कर
अलग अलग झँडियाँ बना न सके
उछालकर कीचड़,
कर सकते हो गंदे कपड़े मेरे
पर तब भी मेरी कलम
इंद्रधनुषी रंगों से रचेगी
विश्व आकाश पर सतरंगी सपने
नीले पीले ये सुर्ख से सुर्ख रंग, ये अबीर
सब छूट जाते हैं, झट से
सो रंगना ही है मुझे, तो
उस रंग से रंगो
जो छुटाये से बढ़े
कहाँ छिपा रखी है
नेह की पिचकारी और प्यार का रंग?
डालना ही है तो डालो
कुछ छींटे ही सही
पर प्यार के प्यार से
इस बार होली में।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'

Holi Ki Badhayiyan


आसमां से धनुक लेके कसे तरकश फगुना,
महुआ के कलश फोड़ पिये सब रस फगुना।

फिरा दे लत-लक्षण भी ओल, नीम, करैला के,
मधु टपके चहुंओर, रहसे बरबस फगुना ्।

कोकिल-राग छेड़े कुहूक, मन के बगान में,
लाग सारे हीं जगाके छीने आलस फगुना।

दहके जो होके गुलाबी बिना रंग-गुलाल के,
गालों से गोरी के न हो, टस से मस फगुना।

मनमुटाव ना बचे कुछ मेरे गाँव-जमात में,
आना तुम अगले बरस जस के तस फगुना।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

Holi Ki Badhayiyan


होली के रंग
और तुम्हारी याद
दोनो साथ-साथ
आ गए….
खिले हुए फूल
और…
बरसते हुए रंग
कसक सी….
जगा गए
आती है जब भी
टेसू की गन्ध
दिल की कली
मुरझा सी जाती है
रंगों में डूब जाने की
चाहत….
बलवती हो जाती है
चेतना बावली होकर
पुकार लगाती है
और शून्य में टकराकर
पगली सी लौट आती है
फाग में झूमती
मस्तों की टोली में
बेबाक….
तुम्हें खोजने लगती हूँ
और आँखें….
अकारण ही बरस जाती हैं
होली की गुजिया
और गुलाल के रंग
बहुत फीके से लगते हैं
कानों में तुम्हारी हँसी
आज भी गूँजती है
आँखें…..
तुम्हे देख नहीं पाती
पर आस है कि
मरती ही नहीं
कानों में….
तुम्हारे आश्वासन
गूँजने लगते हैं
और…..
रंगों को हाथ में लिए
दौड़ पड़ती हूँ
दिमाग पर…
दिल की विजय
यकीन दिलाती है
तुम जरूर आओगे
और मुझे…..
फिर से
अपने रंग दे जाओगे

- शोभा महेन्द्रू

Holi Ki Badhayiyan


मुंबई वालो मौज मनालो
आई है होली हाथ मिला लो

कौन है राजा कौन भिखारी
कौन मराठा कौन बिहारी
कौन यहाँ पर यूपी से आया
पहचान पाया सपने सजाया
फूल सभी हैं भेद न डालो
आई है होली हाथ मिला लो

मराठी बाला बनती हो खाला
साथ निभाती हो उगले जो ज्वाला
बाहर आओ रंग जमाओ
राज कहाँ है राज बताओ
देता है गारी यूपी बिहारी
दवा दिला दो भारी बीमारी
भैया तुम्हारा उसको संभालो
आई है होली हाथ मिला लो

फागुन आया रंग जमाया
सामना करने सामना आया
बाबा जी बाला खोलो भी ताला
बंद करो अब बाँटो न आला
लहराती दाढ़ी जैसे हो साड़ी
रंग करा लो निरे अनाड़ी
खोलो जी खोलो खेलो जी होली
रोली लगा दो मारो न गोली
दोगे जो गारी वो प्यारी प्यारी
हँस कर सुनेंगे सारी की सारी
दर पर खड़े हैं अपना बना लो
आई है होली हाथ मिला लो

उद्धव जी आना रंग न लाना
नशा है भारी बदला ज़माना
तुम तो हमारे हम भी तुम्हारे
हारे नहीं हैं न आज़माना
बम बनो मत अपना बना लो
आई है होली हाथ मिला लो

सल्लू जी समझो इनमें न उलझो
फिल्में करो और उनमें ही उछलो
रंग है चोखा दे देगा धोखा
हाथ मलोगे राज अनोखा
बाबू बिहारी क्यों हो दुखारी
तुम तो बड़े हो हम सब भिखारी
मारा है तुमने जो पिचकारी
रंग बिना ही वो क्षयकारी
आग में ऐसे घी न डालो
आई है होली हाथ मिला लो

- नगेन्द्र पाठक

Holi Ki Badhayiyan


इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

किया था जो सखियों से वादा
तुमको उनसे मिलवाऊँगी
कैसे वादा अपना निभा पाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

बना रही हूँ
जो अपने हाथों से
प्रेम रंग
फिर वो किसको लगाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

कैसे तुम्हारे बिना
पकवानों की मिठास चख पाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

मालूम है मुझे तुम
जेठ की छुट्टियों में आओगे
तुम ही बताओ
तब भला मैं कहाँ से
फूलों की बहार लाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

ना मैं तुम्हें
पीली सरसों का हाल बताऊँगी
न पाती भेज कर
गाँव की मिटटी सूँघाऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

ना सोमवार को मन्दिर
तुम्हारे लिए जाऊँगी
न देख कर चाँद को मुस्कराऊँगी
इस होली पे यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाऊँगी

बादल भइया से कह कर
सावन में तुमको तड़पाऊँगी
ना रिमझिम बरसातों में
मधुर गीत सुनाऊँगी
देख लेना इस होली पे
यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाउंगी

-अंजु गर्ग

Holi Ki Badhayiyan


रंगों में जीवन के सारे भाव जो नज़र आयें, रंग खेल कर तो देखो
क्यों है उनके साथ बैर-भाव फूल चमन का लाकर तो देखो
दिल खिल उठेगा दिल मिलने से अपने जज़्बात टटोल कर तो देखो
आज है सनम होली का दिन रंगों की टोली में मिल कर तो देखो
कितना आनंद आता है रंगों में एक दूसरे को रंग लगाकर तो देखो
लाल, नीला, पीला, हरा, गुलाबी रंगों से सारा रंग जाये
धरा के संग संग अंबर भी सजाये
गले मिलकर इस पर्व को मनाये
रंगों से धरती सजे बीड़ा खिलाकर सबको गले से लगाओ
उनको भी रंगें खुद भी रंग जायें चलो मिलकर रंगों का त्यौहार मनायें
मस्ती हो होली हो दिल से दिल की होली हो

-संजय साहा

Holi Ki Badhayiyan


हाथों में ढफ लिये खड़ा है
आज फिर गाँव का ग्वाला
मुरली लेकर प्रकट हुआ है
आज फिर मुरली वाला
रंगों के मेले में, गुलाल के झमेले में
रंग गई दुग्धबाला
अबीर के उड़ते रंगों में
छिप गया भोर का उजाला
भंग का देखो शंभू ने
फिर भर दिया है प्याला
बच्चों के बीच फँसा है
आज ये हलवाई लाला
नाचते गाते आ रहा है
पंचम गाने वाला
सुरेन्द्र बरसा रहा है सब पे
पानी खुशबू वाला
उड़ कर फिर से प्रहलाद के
कंधों पर टिका दुशाला
मच गई है धूम, फिर आया
त्यौहार रंगों वाला

-पूजा

Holi Ki Badhayiyan


उलझी लटें
पुरबा के झोंके से
बार बार बिखरें
धूप-छांव देखि आँख
खेत-खेत ठहरे
प्यासी काली आंखों में
सूनी प्रतीक्षा
मन तेरा अलसाये
फागुन के रंग खिले
पे टेसू संग अंग
पीपल के पात डोलें
खाय जो उमंग भंग
सेमर के फूल बीन
सपने संजोये गोरी
नयी नयी कोंपलों से
परिधान पाये
उड़त अबीर बन धूर
है गली गली
गोपी राधा बंसी सुन
घर से चली चली
चित्त है चलायमान
कसक उठाये
होली हुडदंग देख
खोजती है द्रष्टि अब
किसे विकल बार बार
'कान्त' परदेशी संग
प्रीत क्यों लगाये

-श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'

Holi Ki Badhayiyan


चलो रंगरेलिया मनाएं, कहां छिपी होली है
बुरा नहीं मानेगी वह, भई आखिर होली है !

अनगिनत रंगों में तेरे मैं ढला हूं जिंदगी, पर
बचा कालिख से बुराई की, आज तो होली है

चाहतों में मैं तुम्हारी कुछ भी बनने से रहा
कुछ तो बनके ही रहूंगा देख लेना, होली है

नया नाम हर रोज़ वह देता आया है मुझे
आज मीठी गाली उसकी, शायद होली है ...

नाराज़ ही मुझसे रहा, कहा पर कभी नहीं
क्यों जुबां खुली है आज, याद आया होली है !

-सतीश वाघमारे

Holi Ki Badhayiyan



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30 कविताप्रेमियों का कहना है :

seema gupta का कहना है कि -

"सभी मित्रों को , हिंद युग्म को होली की हार्दिक शुभकामनाएं , और सभी प्रतीभागीयों को एक से एक कवीता लिखने पर बधाई"
Regards

mehek का कहना है कि -

पहले तो सब को होली मुबारक हो,खुशियों से भरी हो,
हिंद युग्म टीम को खास बधाई,होली इतनी प्यारी प्यारी रचनाओ से रंगीन बनाने के लिए.
सारे कवियों को भी बहुत ही मुबारक बात,हर कविता का अपना खास रंग है,बहुत ही सुंदर |

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सभी मित्रों को होली की ढेरों शुभकामनाएं |

-- अवनीश तिवारी

सतीश वाघमारे का कहना है कि -

होलीके शुभ अवसर पर इस रंगारंग प्रस्तुति के लिए हिन्दयुग्म को और समस्त प्रतिभागियोंको बधाई हो !

Alpana Verma का कहना है कि -

सभी कवितायें बहुत ही सुंदर हैं.होली आस पास है महसूस हो रहा है.

**खासकर पृष्ठभूमि में रंगों का प्रयोग और फूलों की उपस्थिति आंखों को भा रही है.बहुत सुंदर लग रहा है.
हर बार हिन्दयुग्म के पेज और सामग्री की एक नए रंग में जो प्रस्तुति होती है उसके लिए जिस किसी की भी कल्पना और परिश्रम का यह कमाल है उसको भी बहुत बधाई.
* इस तरह की विविधता नीरसता नहीं आने देती.

सभी मित्रों को और हिन्दयुग्म की टीम को भी होली की शुभकामनाएं.

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

मन में उठने लगी उमंग
गली में होन लगा हुडदंग
चरों ओर बसंती रंग
आओ सब मिल खेलें संग
कि होली आली रे....
होली आली रे आली रे होली आली रे....

सभी के नीले पीले गाल
चलें सब मस्तानी सी चाल
हवा में उडने लगा गुलाल
न पूँछो आज हुआ क्या हाल
कि होली आली रे....
होली आली रे आली रे होली आली रे....

घर-घर गुझियाँ भरी मिठास
कहीं पर टेसू कहीं पलाश
कि कान्हा-राधा का रस रास
हर्ष उल्लास हास परिहास
कि होली आली रे....
होली आली रे आली रे होली आली रे....

कहीं पर मिलीं पकोड़ी भंग
बजें कहीं ढ़ोल और मृदंग
जबरन रंगे सहेली अंग
सभी के अजब निराले ढ़ंग
कि होली आली रे....
होली आली रे आली रे होली आली रे....

- मजा आ गया होली कविताओं के रूप मे इतने सारे रंग देखकर .. मैं तो डूब गया.. अरे तिनका दे दो कोई............

दिल से होली की मुबारकबाद...

रंजू का कहना है कि -

होली के रंगो सी रंग बिरंगी कविताएं दिल को बहुत भायी,सबको होली की बहुत बहुत बधाई :) हर कविता अपना नया ही अंदाज़ लिए है अच्छा लगा यूं होली मनाना :)शुभ कामनाओं के साथ

रंजू

seema sachdeva का कहना है कि -

होली के पावन अवसर पर रंग-बिरंगी कवितायें ,वो भी हर कविता मी नया रंग ,पढ़के मज़ा आ गया और आज ही होली मना ली , हिंद युगम टीम , सभी पाठको और लेखकों को होली की हार्दिक शुभ कामनाएं .......सीमा सचदेव

SURINDER RATTI का कहना है कि -

होली की आप सब को शुभ कामनायें - होली के इतने रंग .... और सब अलग अलग वाह ... मज़ा आ गया ..सुरिन्दर रत्ती

तपन शर्मा का कहना है कि -

कल होली पर ग़ज़लें और अब गीत। वाह।
एक और अलग अलग कवितायें ऊपर से होली के अवसर पर इस पोस्ट पर फैले हुए विभिन्न रंग। सच बताऊँ तो मुझे ये रंगबिरंग पेज भा गया। देख कर लगा कि देखते रहो। हिन्दयुग्म को इतना मोहक पेज बनाने पर धन्यवाद।
सभी को होली की ढेरों शुभकामनायें।

शोभा का कहना है कि -

होली पर लिखी सभी कविताएँ पसन्द आईं । सभी को होली की शुभकामनाएँ ।

देवेन्द्र कुमार मिश्रा का कहना है कि -

होली के पावन अवसर पर रंग-बिरंगी कवितायें ,वो भी हर कविता मी नया रंग ,पढ़के मज़ा आ गया और आज ही होली मना ली , हिंद युगम टीम , सभी पाठको और लेखकों को होली की हार्दिक शुभ
बहुत सुंदर प्रभावी रचना .....
बधाई !
स-स्नेह
देवेन्द्र कुमार मिश्रा

भूल,ख़ता माफ़,मन की स्लेट कोरी
रंगों से सजी हो सब जन की होरी.
-महक
आओ हम सब मिलकर बनायें
एक नया और रंग
जिसमें दिखे भारत का
साथ-साथ सातों रंग।
-शम्भु चौधरी
आज बच्चों को देखती हूँ
खेलते होली
हर वर्ष की तरह
इस वर्ष भी
आ गई होली
-सविता दत्ता
खेलनी है तो जम कर खेलो मस्ती भरी ये होली
मातम की तरह ना मनाओ होली मेरे हमजोली
-कृष्ण लाल
रंग लगाया तो तुमने
लबों से नहीं
लफ़्ज़ों से मगर
चुभते हैं बहुत
और दिखते भी नहीं....
फैल रहे हैं बदन में
ज़हर की तरह...
मैने ऐसा तो नहीं कहा था!!
-पियूष. के. मिश्रा
अबीर -ओ- गुलाल में वो नहाती होगी,
नफरत के छींटों से दामन लाल है,
पिच्कारियों - गुब्बारों से प्यार बरसता होगा,
गोलियों -बरूदों से सीना छलनी है .



-सजीव सारथी
फिर आया फागुन, फिर मौसम बदला,
मन-मंजूषा खोल, देखने को, फिर मन मचला,
खोलते ही,बिखर गया स्मृतियों का एक-एक मनका,
बीनते-बीनते उन्हें होश रहा तन का ना मन का,
-ममता गुप्ता
आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !
नये पूर्ण मानव बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
आओ जगाएँ
-महेन्द्र भटनागर
अब तक जिससे कभू ना बोले
प्यार का राज कभू ना खोले
म्हारे घर के आगे से जब ,
गुजरेगी वो हौले-हौले
मारेंगे उसपे पिचकारी
खेलेंगे हम होली .
-प्रदीप कुमार
क्यों नही चला सकते वो पिचकारी
जो रंग के साथ अपनपत बरसाए
क्यों नही लगा सकते वो गुलाल
जो कर दे हर गाल गुलाबी
हर चेहरे पर मुस्कुराहट ले आए
-जीतेश नौगरैया
हम खेले शब्दो के संग
भावो के फ़ेंकेंगे रंग
रंग विरंगे भाव दिखेंगे


-सीमा सचदेवा
फगुआ गाती नही है कोई टोली
फिर भी है आज होली
दिल मे टीस उठती होली
मुझको आपने देश पहुँचाती होली
-रचना श्रीवास्तव
मोहन तुम्हारे संग होली खेलना चाहता हूँ
भक्ती और श्रद्धा के रंग में डूबना चाहता हूँ
-सुरिन्दर रत्ती
खेलना ऐसे कि रंग जाए तन और मन,
फेंकना रंग चाहे दोस्त हो या दुश्मन,
-अवनीश तिवारी
भर दी खुशियों से झोली,
होली के रंग ने मिला दिये दुश्मन बने दोस्त,
होली का रंग देख संभल गए होश,
आया रे आया आज तो वृद्धों में भी जोश,
धरती भी चीख बोली,
होली आई रे होली,
- गोविन्द शर्मा, आगरा
आसमाँ से भी बहुत तेज़-रंग हों सपने
आरजुओं से गुनगुना के मना लें होली
प्यार तो रिश्ता है सदियों से जन्म जन्मों का
याद इक दूजे को दिला के मना लें होली
-प्रेमचंद सहजवाला
राधा-कृष्ण की भी प्रीत
अब बीती बात हो ली
कि होली की उठ गई है डोली
दिखती नहीं अब मस्तानों की टोली!!
-रंजना भाटिया 'रंजू'



पकवान जो, होली में विशेष बनते
पुआ-पुरी और कचौरी
दही-भल्ले संग खूब ललचाती जिलेबी
पिचकारियाँ भर-भर देते एक-दुसरे पर मार
करते सब मिल रंगों की बौछार
उस बौछार मे, गुलाब जामुन पर चढ़ते रंग हजार
फागुन की फुहार में हम मस्त-मौला हो कर झुमते
आज उस फुहार को मन तरसे
आज उस होली को मन तरसे|
- सुमन कुमारी 'मेनका'
मन भाते से विमुख होकर
जो कुछ बांटा वह है अपना,
तेरा क्या है मेरा क्या है
जो कुछ पाया वह है सपना ,
दाता बैठा एक गगन में
हाथ सभी के झोली है |
बुरा न मानो होली है |
-विनय के॰ जोशी
तू उत्कृष्ट, अभिमान मेरा
तू अद्‌भुत, सम्मान मेरा
दुनिया के जितने भी है रंग
मैंने तुझमें हैं देख डाले
आ प्रेयसी होली मना लें
-अमित अरुण साहू
मीठी व प्यार भरी, गुझिया तो खाओ,
याद रहे बरसों तक, ऐसी होली मनाओ
-अल्पना वर्मा
हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सब मिल खेलो होली भाई
पंथ निरपेक्षता की शहनाई हर मजहब को है भाई
'दिनेश' राष्ट पर बलि-बलि जाये बहत का संस्कार है होली
हौले-हौले आ गयी होली, मस्ती का रंग भरी ठिठोली

-दिनेश चन्द्र जैन
डालना ही है तो डालो
कुछ छींटे ही सही
पर प्यार के प्यार से
इस बार होली में।
-विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'
दहके जो होके गुलाबी बिना रंग-गुलाल के,
गालों से गोरी के न हो, टस से मस फगुना।
मनमुटाव ना बचे कुछ मेरे गाँव-जमात में,
आना तुम अगले बरस जस के तस फगुना।
-विश्व दीपक 'तन्हा'
रंगों को हाथ में लिए
दौड़ पड़ती हूँ
दिमाग पर…
दिल की विजय
यकीन दिलाती है
तुम जरूर आओगे
और मुझे…..
फिर से
अपने रंग दे जाओगे
- शोभा महेन्द्रू
मुंबई वालो मौज मनालो
आई है होली हाथ मिला लो
कौन है राजा कौन भिखारी
कौन मराठा कौन बिहारी
कौन यहाँ पर यूपी से आया
पहचान पाया सपने सजाया
फूल सभी हैं भेद न डालो
आई है होली हाथ मिला लो



- नगेन्द्र पाठक
बादल भइया से कह कर
सावन में तुमको तड़पाऊँगी
ना रिमझिम बरसातों में
मधुर गीत सुनाऊँगी
देख लेना इस होली पे
यदि तुम न आए
तो मैं तुमसे रूठ जाउंगी
-अंजु गर्ग
धरा के संग संग अंबर भी सजाये
गले मिलकर इस पर्व को मनाये
रंगों से धरती सजे बीड़ा खिलाकर सबको गले से लगाओ
उनको भी रंगें खुद भी रंग जायें चलो मिलकर रंगों का त्यौहार मनायें
मस्ती हो होली हो दिल से दिल की होली हो
-संजय साहा
उड़ कर फिर से प्रहलाद के
कंधों पर टिका दुशाला
मच गई है धूम, फिर आया
त्यौहार रंगों वाला
-पूजा
होली हुडदंग देख
खोजती है द्रष्टि अब
किसे विकल बार बार
'कान्त' परदेशी संग
प्रीत क्यों लगाये
-श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
नया नाम हर रोज़ वह देता आया है मुझे
आज मीठी गाली उसकी, शायद होली है ...
नाराज़ ही मुझसे रहा, कहा पर कभी नहीं
क्यों जुबां खुली है आज, याद आया होली है !

-सतीश वाघमारे
बहुत सुंदर प्रभावी रचना .....

बधाई !


स-स्नेह
देवेन्द्र कुमार मिश्रा

Gaurav का कहना है कि -

होली के शुभ अवसर पर इस रंगारंग प्रस्तुति के लिए सारे कवियों और हिन्दयुग्म की टीम को शुभकामनाएँ ।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

काव्य पल्लवन का यह अंक प्रशंसनीय है।

सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें।

*** राजीव रंजन प्रसाद

Gita pandit का कहना है कि -

सभी को होली की हार्दिक शुभकामनायें।

अंक अच्छा है....सभी को बधाई |

स-स्नेह
गीता पंडित

gopalkrishna का कहना है कि -

तार-तार यादों चादर
रफुगिर है परदेश में,
सूखी होली तब खेली थी
नजरें आज भिगोली है |
बुरा न मानो होली है |
विनय जी बहुत बढ़िया | बुरा ना माने पर यादों की चादर होना चाहिए था |

anju का कहना है कि -

होली है भई होली है
आप सभी को मेरी और से होली की शुभकामनाएं .
सम्न्झ नही आ रहा क्या लिखूं एक से बढ कर एक कविता लिखी है
एक एक कविता के शब्द इतने अच्छे लगे है जेसे होली पर सब रंग
सबने बहुत ही अच्छा लिखा है अलग अलग तरीको से , बहुत मज़ा आया .सबकी कवितायेँ मैंने दो दो बार पढी .
इसी तरह आप सब की होली खुशहाली से बीते और खुशी के रंग आप सभी के जीवन में रहे .
सभी को
बहुत बहुत बधाई

Anonymous का कहना है कि -

होली के शुभ अवसर पर हिंद युग्म परिवार को बहुत - बहुत बधाई . सब रंगो में रंगी हुई कविताएँ मन को भी रंगीन बना रही हैं .सभी को ढेरों शुभकामनाएं . पूजा अनिल

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

हिन्द-युग्म की तकनीकी व ग्राफिक्स टीम को बधाई जिसने इस अंक को इतना खूबसूरत व रंगमय बनाया।

अनुराधा जी को इतना बढ़िया चित्र भेजने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

१॰ महक जी, इतनी सारी पंक्तियों से भी आप बहुत-कुछ नहीं कह पाईं।

२॰ शम्भू जी, कविता में संफुटित विचार तो बहुत अच्छे हैं, ऊँचे हैं, लेकिन काव्य-रस नहीं मिल रहा।

३॰ सविता जी, माफ़ कीजिएगा आप अपनी कविता को अभीष्ट नहीं दे पाई हैं।

४॰ कृष्ण लाल जी, ठीक-ठीक लिखा है आपने। लेकिन शुरू की ४ पंक्तियाँ इसमें न होती तो हल्के मूड की बढ़िया कविता बन जाती।

५॰ पीयूष जी, आपकी कविता पर गुलज़ार का प्रभाव दिखता है, फिर भी बढ़िया कोशिश।

६॰ सजीव जी, अच्छा लिखा है आपने।

७॰ ममता जी, आप प्रेम के सुयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुंदर चित्रण करती हैं-

पर क्या फर्क पङता है ---
तेरे संग तो मेरी होली
कब की हो-ली------

८॰ महेन्द्र जी, सुंदर विचार हैं आपके।

९॰ प्रदीप जी, बढ़िया लिखा है आपने। सरल रचना।

१०॰ जीतेश जी, उपर्युक्त १० में से सबसे सशक्त रचना मुझे आपकी लगी। बहुत बधाई।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

११॰ सीमा जी, आपकी कविता में लय बहुत बढ़िया होता है। लेकिन इस कविता में कोई नयापन नहीं है।

१२॰ रचना जी, परदेश से आपको ये होली आपको याद आती हैं, हम जो देश में हैं, वो भी ये वाली होली केवल किताबों में पढ़ते हैं। आपकी कविता वास्तविकता के करीब नहीं है।

१३॰ सुरिन्दर जी, अच्छा लिखा है आपने।

१४॰ अवनीश जी, अभी आपको लेखन में बहुत मेहनत की ज़रूरत है। आप बेहतर लिखते जा रहे हैं। मुझे इस बात की खुशी है।

१५॰ देवेन्द्र जी, बहुत ही सुंदर और मोहक गीत लिखा है आपने।

१६॰ गोविन्द भाई, कुछ ख़ास मज़ा नहीं आया।

१७॰ प्रेमचंद जी, आपके शे'र प्रभावी हैं। जितने शे'र हैं , उतने तरह का रंग समेटे हैं, बहुत खूब।

१८॰ रंजना जी, 'कि होली की उठ गई है डोली'। ठीक कहा। अच्छा प्रयास।

१९॰ मेनका जी, बचपन की तो हर घटना के लिए तरसा जा सकता है।

२०॰ विनय जी, अब तक की २० कविताओं में आपकी कविता सबसे सुंदर और प्रसंशनीय है। बहुत सुंदर लिखते हैं आप।

२१॰ साहू जी, जमी नहीं बात।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

२२॰ अल्पना जी, अच्छा लिखा है आपने।

२३॰ दिनेश जी, ज्यादातर कवियों ने आपकी ही वाली बात घुमा-फिराकर लिखी है। इसे कच्चा लेखन कहेंगे।

२४॰ विनम्र जी, आपके विचार अनुकरणीय हैं।

२५॰ तन्हा जी, आपने तो होली का लोक रूप परोस दिया। मुझे अपना गाँव याद आ गया। बहुत बढ़िया।

२६॰ शोभा जी, ठीक-ठाक कविता।

२७॰ नागेन्द्र जी, होली और रंगों के माध्यम से आपने राज ठाकरे-बिहारी मुद्दे पर अच्छा व्यंग्य किया है।

२८॰ अंजु जी, आपकी रचना अच्छी और सच्ची है। आप आगे से निम्न तरक की पंक्तियों से बचा करें, ये इन्हें अति वैयक्तिक बना रही हैं-

मालूम है मुझे तुम
जेठ की छुट्टियों में आओगे

२९॰ संजय जी, बहुत कमज़ोर रचना है आपकी। काव्यात्मकता बिलकुल नदारद है।

३०॰ पूजा जी, कुछ ख़ास मज़ा नहीं आया। इसी तरह की कविता ऊपर के कई कवियों ने लिखी है।

३१॰ श्रीकांत जी, आपकी कविता में गाँव की खुश्बू है। थोड़ा क्राफ़्ट पर और मेहनत की ज़रूरत थी।

३२॰ सतीश जी, बढ़िया लिखा है आपने।

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

सभी मित्रों को और हिन्दयुग्म की टीम को होली की शुभकामनाएं.
होली की इस पावन बेला पर इतनी सारी और एक से बड्कर एक कविताओं के रंगों मे रंगकर अपने आपको धन्य महसूस कर रहा हू और इसका मलाल है कि काव्य पल्लवन के इस गुल्दस्ते में मैं कोई पुश्प क्यों नहीं सजा पाया सभी प्रतिभागियों को बधाई

हिन्दी साहित्य सभा का कहना है कि -

होली का यह अंक मन को छ्व गया। सभीको होली की शुभकामनाएं। -शम्भु चौधरी

Anonymous का कहना है कि -

jo rang de subko bas isi holi ki chahat hai humhe.............
HAPPY HOLI ALL OF YOU....

राकेश खंडेलवाल का कहना है कि -

हिन्द युग्म को इस संयोजन के लिये हार्दिक बधाई.
काव्य कानन में नये कुसुमों को पल्लवित होते देख कर अतीव हर्ष हुआ. जहाँ कुछ रचनायें एकदम मंजी हुई हैं वहीं नवोदित लेखकों के अपने अपने प्रयास सराहनीय हैं

सभी लेखकों और आयोजकों को एक बार फिर बधाई

devendra का कहना है कि -

आदरणीय संपादक महोदय-
अच्छी कविताओं को अच्छी तरह प्रकाशित करने के लिए बधाई।-------श्री देवेन्द्र कुमार मिश्र एवं शोभा महेन्दू की कविताएं बहुत अच्छी लगीं।-------------देवेन्द्र पाण्डेय -सारनाथ-वाराणसी।

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

I couldn't read the poems. As I didn't get time to... But I don't want to miss the opportunity.. to wish all the Hind Yugm.. members.. A very colorful and prosperous HOLI..

Thanks & Regards,
Shailesh

मेनका का कहना है कि -

सभी को होली की शुभकामनायें और बधाईयाँ|
हिंद-युग्म टीम की रंगारंग प्रस्तुति अच्छी लगी|

mamta का कहना है कि -

हिन्द-युग्म परिवार के सभी सदस्यों को होली की बहुत-बहुत बधाइयाँ..... होली के विविध रंग लिए इन कविताओं में सभी रंग एक से बढकर एक हैं। इससे अधिक कुछ कहने की सामर्थ्य मेरी वाणी में नहीं है । इन कविताओं का
रस गूँगे का गुङ है.....स्वाद बतलाना सम्भव नहीं ...........

Anonymous का कहना है कि -

gOOD colection fo poems but the content is subsided by background design

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