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दोहा गाथा सनातन: 44 - रोला-उल्लाला रचें मिलकर छप्पय छंद


रोला-उल्लाला रचें मिलकर छप्पय छंद.
ग्यारह-पन्द्रह विषम, सम तेरह दें आनंद..

छप्पय छन्द कुण्डली की तरह छह पंक्तियों / पदों का संयुक्त छंद है. इसकी प्रथम चार पंक्तियाँ रोला की तथा अंतिम दो पंक्तियाँ उल्लाला की होती हैं. रोला में ११-१३ पर यति (विराम) होती है जबकि उल्लाला में १५-१३ पर. इस प्रकार चप्पे की प्रथम चार पंक्तियों में विषम चरणों में ११ कलायें / मात्राएँ होती हैं जबकि शेष दो पंक्तियों के विषम चरणों में १५ कलायें होती हैं. सभी ६ पंक्तियों में सम चरणों में १३ कलायें होती हैं.

उदाहरण:

१. नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है.
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है.
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है. - रोला
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की.
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की.. -उल्लाला

२. पा अनंत अमरत्व , कर गए नाम धरा में.
गए जोड़ अपनत्व काव्य की परंपरा में.
किये प्राण उत्सर्ग, लहू को खाद बनाया.
खिलें न्याय-श्रम-सुमन, देश पर शीश चढ़ाया. -रोला
वे राष्ट्र-हितैषी धन्य हैं, निर्वाहा कर्त्तव्य को.
निज जीवन देकर सँवारा, भारत के भवितव्य को. -उल्लाला

३. व्यर्थ न कर अभिमान, एक दिन मिट जाना है.
राजा हो या रंक, न कोई बच पाना है.
आया खाली हाथ, हाथ खाली जाएगा.
तजा न जिसने लोभ, 'सलिल' वह पछतायेगा. -रोला
करते सब ग्रन्थ निषेध हैं, हिंसा लालच क्रोध का.
भव-सागर से तरेगा जब, पथ पकड़ेगा बोध का. -उल्लाला

दोहा गाथा सनातन : 34 दोही दोहे की बहिन


दोहा गाथा सनातन : ३४

दोही दोहे की बहिन

दोहा के विविध प्रकारों से परिचित होने के साथ-साथ हमने सोरठा, रोला तथा कुंडली से भी परिचय प्राप्त किया.

दोहा कुल के अन्य छंदों की चर्चा प्रारंभ करते हुए आज हम 'दोही' का परिचय प्राप्त करते हैं.

दोही भी है द्विपदी, विषम चरण है भिन्न.
पंद्रह मात्राएँ रखें, किन्तु न लय विच्छिन्न.

सम चरणों के अंत में, लघु रखिये चुपचाप.
ग्यारह मात्राएँ लिए, दोही में रस व्याप.

'दोही'के दोनों पदों के विषम चरणों में पंद्रह तथा सम चरणों में ग्यारह मात्राएँ होती हैं.
प्रत्येक पद में १५+११ = २६ मात्राएँ इस एक दोही में तरह कुल ५२ मात्राएँ होती हैं.

उदाहरण:

१.
दर न रहे जाता मनुज जो, दर-दर बिना बुलाय.
आदर मान मिले न नर को, लख मुँह लोग फुलाय..
-डॉ, ॐप्रकाश बरसैया 'ओंकार', छंद क्षीरधि

२.
विरद सुमिरि सुधिकरत नित ही, हरि तुव चरन निहार.
यह भव जलनिधिते मुहि तुरत, कब प्रभु करिहहु पार..

३.
प्रभु तुम ही हो असरन-सरन, औ' मैं हूँ मानव मात्र.
तुम करुणासागर हो देव, हम करुणा के पात्र.. -सलिल

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दोहा गाथा सनातन: 33 वर्जित है चंडालिनी


दोहा के जिन २३ प्रकारों की चर्चा अब तक की गयी है उन पर गजाधर कवि ने 'छंद मंजरी' में निम्न छंद दिया है_

भ्रमर१ सुभ्रामर२ शरभ३ श्येन४ मंडूक५ बखानहु।

मरकत६ करभ७ सु और नरहि८ हंसहि९ परमानहु।

गनहु गयंद१०सु और पयोधर११ बल१२ अवरेखहु

वानर१३ त्रिकल१४ प्रतच्छ कच्छ्पहु१५ मच्छ१६ विसेखहु

शार्दूल१७ अहिबरहु१८ व्याल१९युत वर विडाल२० अरु

अश्व२१ गनि उद्दाम उदर२२ अरु सर्प२३ शुभ तेइस विधि दोहा करनि।

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वर्जित है चंडालिनी, दोहा रचना मीत.
विषम चरण-आरम्भ में, जगण न रखिये रीत..

आज हम चंडालिनी दोहा की चर्चा करेंगे.

दोहा के मानक नियमों में विषम चरण (पहला, तीसरा) के आदि (प्रारंभ) में 'जगण' ( जभान = १+२+१) का प्रयोग एक चरण में वर्जित है. चंडालिनी दोहा इस नियम को तोड़ता है इसलिए इसका लिखना ही मना किया गया है.

अनेक कवियों ने विषम चरण के आरम्भ में दो शब्दों में 'जगण' वाले दोहे रचे हैं और उन्हें सही कहा गया है.

उदाहरण:

१. महाकवि बिहारी

जु ज्यों उझकि झंपति वदन, झुकति विहँसि सतरात.
तुल्यो गुलाल झुठी-मुठी, झझकावत पिय जात..

२. वृन्द

भले-बुरे सब एक संग, जों लौ बोलत नाहि.
जान पडत हैं काक-पिक, ऋतु वसंत के मांहि.

३. डॉ. अनंतराम मिश्र 'अनंत'

भीतर तो अवसन्न है, बाहर दिखे प्रसन्न.
सुखी नहीं हैं आजकल, लोग मात्र संपन्न..

वर्जित चंडालिनी दोहा निम्न है:

१. ॐप्रकाश बरसैंया 'ओमकार'

बिना विचारे जो स्वबल, बढ़के उछले दूर.
अशक्ति से अरमान सब, होते चकनाचूर.

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दोहा गाथा सनातन: 32 गुरुविहीन जो सर्प वह, कठिन निभाना प्रीत


गुरुविहीन जो सर्प वह, कठिन निभाना प्रीत.
अड़तालिस लघु से बने, दोहा पिंगल-रीत..

सूत्र: सर्प दोहा- ० गुरु + ४८ लघु = ४८ अक्षर

पिंगल ग्रंथों में वर्णित दोहा का तेइसवां प्रकार सर्प दोहा केवल ४८ लघु मात्राओं की सहायता से बिना किसी गुरु मात्रा के लिखा जाता है. इसकी रचना दुष्कर है. बहुत कम दोहाकार इन दोहों की रचनाकार पाते हैं.

उदाहरण :

१.
चमक-दमक नभ पर तड़ित, गरज-बरस घन सहित.
विचलित-विगलित थल-ह्रदय, कर प्रमुदित अनवरत.-सलिल

२.
उथल-पुथल नित-नित नवल, समय अनवरत करत.
कण-कण पर निज परम पद, धमक-धमक कर धरत. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

३.
जय-जय-जय अधहरन हर, विषम अनल धर नयन.
दरन-दरन असरन सरन, विपति हरन सुख अयन..

४.
रहन-सहन कर सरल शुचि, गरम न बनकर सहन.
छुइ-मुइवत मत मुरझ नर, हितकर गुरूच सुग्रहन.. -डॉ. ॐ प्रकाश बरसैंया 'ॐकार'

दोहागाथा के पाठक सर्प दोहा लिखने का अभ्यास करें. आगामी कड़ी में हम परिचय करेंगे एक ऐसे दोहे से जिसे लिखना पारंपरिक पिन्गालाचार्यों ने वर्जित किया है.

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दोहा गाथा सनातन: 31 छयालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम


दोहा गाथा सनातन में अब तक हम दोहोंके २१ प्रकारों से परिचित हो चुके हैं. आज तथा अगली कड़ी में दो ऐसे प्रकारों की चर्चा है जो दोहा के सम चरणान्त में गुरु-लघु की सामान्यतः मान्य शर्त का पालन नहीं करते. इन में गुरु मात्रा क्रमशः १ तथा ० होती है.

आइये, हम परिचित हों उदर दोहा से-

लघु-गुरु छियालिस-एक मिल, दोहा रचते मीत.
गुरु-लघु सम चरणान्त की, खंडित होती रीत..

'उदर' न देखे रात-दिन, चाहे केवल तृप्ति.
नियम-भंग हो भले ही, चाहे नहीं अतृप्ति..

छ्यालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम.
सुषमा सुरभि बिखेरता, अपनी ललित-ललाम..

सूत्र: उदर १ गुरु + ४६ लघु = ४७ अक्षर

उदाहरण:

१.
घट-घट नित अघटित घटित, लख धक्-धक् मन मगन.
चपल चकित चित चुप 'सलिल', निरख लगन की अगन.- सलिल

२.
भरत-भरत रुचिकर लवण, उदर रहत नित तरल.
अधिक चखत उलटत सभी, लवण बनत जब गरल. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

३.
कदम-कदम अनवरत चल, अनथक नत रख नयन.
कर मधु रस वर्षण 'सलिल', मनहर कह मृदु बयन..

पाठकगण उदर दोहा की रचना करने का प्रयास करें.

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दोहा गाथा सनातन : 30 दोहा नामित 'श्वान'


दो गुरु लघु हों चवालिस, दोहा नामित 'श्वान'

सूत्र: २ गुरु + ४४ लघु = कुल ४६ अक्षर

परिभाषा:

दो गुरु लघु हों चवालिस, दोहा नामित 'श्वान'
लिखना नहीं सरल 'सलिल', लिखकर कर पहचान..

दो गुरु दो गुण 'श्वान' के, जाग्रति औ' ईमान.
शेष चवालिस लघु मिला, रच दोहा गुणवान.

२ गुरु तथा ४४ लघु मात्राओं के संयोजन से बने दोहे को 'श्वान' कहा जाता है.

इस दोहे में मात्र दो मात्राएँ होती हैं जिन्हें द्वितीय तथा चतुर्थ चरण के अंत में अर्थात प्रथम व द्वितीय पद के अंत में रखा जाता है, शेष सभी अक्षर लघु होने से यह दोहा पढने में सरल किन्तु रचने में जटिल होता है.

ब्रज तथा भोजपुरी में ऐसे दोहे अल्प हैं किन्तु हिन्दी की खड़ी बोली में लगभग नहीं हैं.

इस अनुष्ठान के सहभागी अंतिम ५-६ प्रकार के दोहे हिन्दी की खड़ी बोली में रचकर इस अभाव को दूर करें.

उदाहरण:

१.
समय-समय रस बिन बहुत, समय-समय रसखान.
मचल-मचल सब कुछ चखत, घर-घर घुसकर श्वान.
- आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

२.
जगदव गत हिय-पतन-कृति, कलित प्रकृति-दृग कोर.
बिटप-बिटप पर लद सुमन, कि सित लसित हर ओर. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

३.
कदम-कदम पर अगम जग, जगमग-जगमग देख.
बहक-फिसल मत, बच 'सलिल', अजब-गजब विधि-लेख..-सलिल

४.
अमल-विमल हर-हर लहर, कलकल सलिल-निनाद.
विधि-हरि-हर प्रमुदित विहँस, हरकर हर अवसाद. -सलिल

५.
अनिल अनल क्षिति जग 'सलिल', सकल सृजन-शुभ मूल.
कण-कण निरख-परख सतत, मत कह कमतर धूल..

६. तन-मन-धन सब कुछ 'सलिल', गुप-चुप रहकर वार.
अजर-अमर निज वतन-रज, हँसकर सर पर धार..

७.
छन-छन छन-छनन छन, थिरक-थिरक घनश्याम.
लिपट-लिपटकर चमक सँग, खिल-खिल पड़ें सुनाम..

श्वान दोहे को सिद्ध करने के बाद हम आगामी श्रृंखलाओं में दो ऐसे दोहों की चर्चा करेंगे जो पदांत में गुरु-लघु नियम का पालन नहीं करते.

विगत कक्षा के पत्राचार में श्री श्याम सखा 'श्याम' ने एक अर्धाली का उल्लेख किया था. दोहा गाथा का आरम्भ करते समय हमने दोहों के इतिहास तथा दोहा द्वारा इतिहास या व्यक्तियों के जीवन में परिवर्तन की चर्चा का क्रम छेड़ा था जो पाठकों के रुच न लेने पर क्रमशः बंद कर दिया. यदि यह क्रम चलता रहता तो शायद यह दोहा भी उसमें आता...अस्तु,

संत कबीरदास जी से तो हर हिन्दीभाषी परिचित है. कबीर की साखियाँ सभी ने पढी हैं. कबीर पशे से जुलाहे थे किन्तु उनकी आध्यात्मिक ऊँचाई के कारण मीरांबाई जैसी राजरानी भी उन्हें अपना गुरु मानती थीं. जन्मना श्रेष्ठता, वर्णभेद तथा व्द्द्वाता पर घमंड करनेवाले पंडित तथा मौलाना उन्हें चुनौतियाँ देते रहते तथा मुँह की खाकर लौट जाते. ऐसे ही एक प्रकांड विद्वान् थे पद्मनाभ शास्त्री जी.
उन्होंने कबीर को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा तथा कबीर को नीचा दिखने के लिए उनकी शिक्षा-दीक्षा पर प्रश्न किया. कबीर ने बिना किसी झिझक के सत्य कहा-

चारिहु जुग महात्म्य ते, कहि के जनायो नाथ.
मसि-कागद छूयो नहीं, कलम गही नहिं हाथ.

अर्थात स्वयं ईश्वर ने उन्हें चारों युगों की महत्ता से अवगत कराया और शिक्षा दी. उन्होंने न तो स्याही-कागज को छुआ ही, न ही हाथ में कभी कलम ली.

पंडित जी ने सोच की कबीर ने खुद ही अनपढ़ होना स्वीकार लिया सो वे जीत गए किन्तु कबीर ने पंडितजी से पूछा कि उन्होंने जो ज्ञान अर्जित किया है वह पढ़कर समझा या समझकर पढ़ा?

पंडित जी चकरा गए, तुंरत उत्तर न दे सके तो दो दिन का समय माँगा लेकिन दो दिन बाद भी उत्तर न सूझा तो कबीर से समझकर पढ़नेवाले तथा पढ़कर समझनेवाले लोगों का नाम पूछा ताकि वे दोनों का अंतर समझ सकें. कबीर ने कहा- प्रहलाद, शुकदेव आदि ने पहले समझा बाद में पढ़ा जबकि युधिष्ठिर ने पहले पढ़ा और बाद में समझा. पंडित जी ने उत्तर की गूढता पर ध्यान दिया तो समझे कि कबीर सांसारिक ज्ञान की नहीं परम सत्य के ज्ञान की बात कर रहे थे. यह समझते ही वे अपना अहम् छोड़कर कबीर के शिष्य हो गए.

हम भाई श्याम सखा 'श्याम' के आभारी हैं कि उन्होंने इस प्रसंग की चर्चा का अवसर प्रदान किया.

शेष फिर...

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दोहा गाथा सनातन: 29 विडाल दोहा


ब्यालिस लघु गुरु तीन ले,रचिए दोहा नित्य.
नाम 'विडाल' मिला इसे, दे आनंद अनित्य.

दोहाकार प्रवीण जो, लिखते वही विडाल.
मात्र तीन गुरु वर्ण ले, कहते बात कमाल..

वर्ण बयालीस लघु लगें, सच जी का जंजाल.
जिस दोहे में हों सजे, उसका नाम विडाल..

सूत्र: विडाल दोहा = ३ गुरु + ४२ लघु = कुल ४५ मात्राएँ

उदाहरण:

१.
नटखट मन अटपट चलन, अरुण नयन मद-मस्त.
जन-जन-मन विचलित करे, कर सद्गति-पथ ध्वस्त. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

२.
लहिय न बढ़ि बरि अरुनि-तिय, जिय हनि बड़वरि हानि.
कहँ सिरमनि तिन हित धरी, जिन सिरमनि कुल कानि. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

३.
निश-दिन शत-शत नमन कर, सुमिर-सुमिर गणराज.
चरण-कमल धरकर ह्रदय, प्रणत- सदय हो आज. -सलिल

४.
डगमग-डगमग सतत चल, डग-डग मग कर पार.
पग-पग पर पद चिन्ह नव, प्रमुदित विकल निहार.. -सलिल

५.
निरख-परख जड़ जगत नित, अमित-अजित बन आत्म.
कण-कण तृण-तृण लख कहे, सकल जगत परमात्म.. -सलिल

६.
सरल-तरल रह सलिल सम, अजित अपरिमित शक्ति.
सतत अवतरित हो अगर, अविचल प्रभु-पद भक्ति.. -सलिल

७.
अनिल अनल जल धरणि नभ, सकल चर-अचर भूल.
'सलिल' वतन-रज सर चढा, बरबस सब अनुकूल..

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दोहा गाथा सनातन: 28 व्याल भाल कवि का रखे, ऊंचा


व्याल भाल कवि का रखे, ऊँचा ''सलिल'' सदैव।
जो रच पाता है इसे, कीर्ति उसे दें दैव॥

चालिस लघु गुरु चार ले, रचिए दोहा डूब।
व्याल नाम से पुकारें, रसानंद हो खूब॥

व्याल दोहा सूत्र: ४ गुरु + ४० लघु = ४४

चार गुरु मात्राओं और ४० लघु मात्राओं के संयोजन से बने दोहे को लघु दोहा कहते हैं.

१.
तिरसठ बनकर चलत यदि, पग-पग मिलत असीस।
दर-दर पर ठोकर सहत, बन-बन कर छत्तीस। । -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

२.
कुंडल-दुति दमकति परति, इमि नँद सुवन कपोल।
नील गगन जनु नखत गन, बहु रँग करत किलोल।। -श्याम रसमयी

३.
चमक-दमक, चुप-मुखर रह, गरज-बरस नभ-नाथ।
थकित-श्रमित, असफल-भ्रमित, धरा न लगती हाथ।। -सलिल

४.
नटवर गिरिधर हरि किशन, मुदित मगन रसराज।
विहँस-विहँस कर-कमल पग, कमल पखारें आज।। -सलिल

५.
दरद हरन कर सकल विधि, नरम नरमदा मात।'
सलिल' विमल भव तर सके, प्रमुदित अविकल गात।। -सलिल

६.
पल-पल निशि-दिन सुमिर मन, नटवर गिरिधर नाम।
तन-मन-धन जड़ जगत यह, 'सलिल' न आते काम॥

७।कलियुग में हर जन भ्रमित, बदल रहे नर- नार।
करम-धरम नहिं मन बसत, बदलत रहत बिचार।।-शन्नो

शन्नो जी के उक्त दोहा क्र. ७ में तीसरे पद में मूलतः 'ना' का प्रयोग किया गया है और यह अहिवर दोहा है किन्तु 'ना' के स्थान पर 'नहिं' का प्रयोग करने पर एक गुरु मात्रा घाट जाती है और यही दोहा 'व्याल' हो जाता है.

व्याल दोहे के चार चरणों में चार गुरु मात्राओं में से दो पदांत में होती है, शेष दो कहीं भी रखी जा सकती हैं. चालीस लघु अक्षरों का प्रयोग कर कुछ सार्थक कहना सहज नहीं है. उक्त उदाहरणों को देखकर पाठक प्रयास करें.
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दोहा गाथा सनातन: 27 ठुमक-ठुमक अहिवर चले


सूत्र:

अहिवर दोहा - ५ गुरु ३८ लघु = ४३ अक्षर

परिभाषा:

दोहा परिवार का यह सदस्य 'ठुमक-ठुमक रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ' की स्मृति जगाता है.

अहिवर दोहे को पढ़ते समय यही प्रतीत होता है कि कोई नटखट नन्हा ठुमकता-मचलता चला जा रहा है.

अहिवर दोहे में ५ गुरु तथा ३८ लघु कुल ४३ अक्षर होते हैं. इस दोहे की रचना करते समय प्रारंभ में यथासंभव बिना मात्रा के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए.

उदाहरण:

१.
लटकि-लटकि लटकत चलत, डटल मुकुट की छांह.
टक भइयौ नटु मिलि गयौ, अटक-भटक बन मांह. -महाकवि बिहारी

२.
पाटल-दल सम अधर पर, तिल मधुकर रस-लीन.
लख तिल-तिल दिल जल रहा, घृत बिन दीपक दीन. -सलिल

३.
बढ़त-बढ़त सम्पति सलिल, मन-सरोज बढ़ि जाय.
घटत-घटत पुनि नहिं घटत, बरु समूल कुम्हिलाय.

४.
कवि मन सावन सघन घन, कवि मानस जलधार.
उमड़-घुमड़ बरसात सतत, चल-चल सबके द्वार. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

५.
नटखट झटपट लपटकर, मधुर-मधुर कह बैन.
डगमग-डगमग पग रखे, माँ परवश बेचैन.. -सलिल

६.
जनप्रतिनिधि बनकर 'सलिल', पद-मद चखकर चूर.
जनगण-मन आहत अगर, सपने चकनाचूर..

७.
हम-तुम, यह-वह, सकल जग, विधि-हरि-हर का खेल.
उसकी मन-मरजी 'सलिल', शुभ कह, हँसकर झेल..

अहिवर दोहे रचना जटिल है. अतः, अपेक्षकृत कम दोहाकार इन्हें रच पाते हैं.

इस लेखमाला के नियमित पाठक इस चुनौती को स्वीकार कर अपने तथा दोहे अन्यों के दोहे भेजें.

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दोहा गाथा सनातन : 26 शार्दूल दोहा लिखें, आएगा आनंद


वीर पराक्रमी सिंह-सम, शार्दूल की आन.
छतिस गुरु छै लघु करें, मात्राएँ गुणगान..

शार्दूल दोहा लिखें, आएगा आनंद.
छतिस गुरु छै लघु मिला, सिद्ध कीजिये छंद..

शार्दूल दोहा में छत्तीस लघु तथा छै गुरु मिलकर कुल ४२ मात्राएँ होती हैं, इस प्रकार के दोहे खड़ी हिंदी में कम ही रचे गए हैं. भोजपुरी, अवधि या बृज में इस प्रकार के दोहे अन्य प्रकारों से कम किन्तु खड़ी हिंदी से अधिक हैं कुछ शार्दूल दोहों का आनंद लीजिये-

शार्दूल ६ गुरु ३६ लघु = ४२ मात्राएँ

१.
जइण रमिय बहुतेण सहु, परिसेसिय बहु गब्बु.
अजकल सिहु णवि जिमि विह्तु, जब्बणु रूठ वि सब्बु. -पवन कवि, १०वीं सदी

२.
अमिय हलाहल रस भरे, स्वेत-स्याम रतनार.
जियत-मरत झुकि-झुकि परत, जिहि चितवत इक बार. -रसलीन

३.
कहत सबै कवि कमल से, मो मत नैन पषानु.
नतरुक कत इन बिय लगत, उपजत बिरह-कृसानु. -बिहारी

४.
जगर-मगर दीपक जलत, स्वर्णिम लगत प्रकाश.
जीवन धन पग-पग चलत, मिळत मिलन की बास. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

५.
मन से मिलकर मगन मन, गुपचुप करता बात.
अधर-मधुप हर्षित-तृषित, अधर खिले जलजात.-
सलिल

६.
कण-कण तृण-तृण जोड़कर, 'सलिल' न करना मोह.
निज तन-मन-धन निमिष में, तजकर करते द्रोह.. -सलिल

७.
तन मन वचन नयन 'सलिल', फिर-फिर आकर याद.
पग-पग पर पग रोकते, मत रुकना फरियाद.. -सलिल

शार्दूल दोहा रचकर आप अपनी दोहांकारी को कसौटी पर कसने का अवसर मत गंवाइये.

देखें, किसने कितना सीखा?

दोहा गाथा सनातन: 25 रचें मच्छ दोहा मधुर


मच्छ दोहा: ७ गुरु + ३४ लघु = ४१ मात्राएँ

जिस दोहे के चारों चरणों या दोनों पदों में ७ गुरु तथा ३४ लघु कुल ४१ मात्राएँ होती हैं, उसे मच्छ दोहा कहा जाता है.

उदाहरण:

१. जहि मन पवन न संचरई, रवि-ससि नाहि पवेस.
तहि बढ़ चित्त बिसाम करु, सरहे कहिय उवेस.-सरहपा, संवत ६८०

२.हिय निर्गुन नयननि सगुन, रसना नाम सुनाम.
भनहुँ परट, संपुट लखत, तुलसी ललित ललाम. -तुलसीदास

३. परम धरम निर्मल करम, भरम न मन में पाल.
अमर-अजर सब कुछ नहीं, जगत काल के गाल. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

४. ह्रदय-कमल पर छा गए, कमलनयन जदुनाथ,
जीवन कमल अमल किये, कमल-कमल का साथ. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

५. हँसत बोल, बोलति हँसी, हँसि बोलत नन्दलाल.
लखि-लखि दृग, सुनि-सुनि स्रवन, गुनि-गुनि जोय निहाल. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'
नंदलाल में 'न' के पर चन्द्रबिंदी, लघुमात्रा है.

६. चटक-मटक कि तड़क-भड़क, अटक-भटक कि निहार.
मैं तुझ पर बलिहार हूँ, किसी कि सभी प्रकार. -डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

७. कम्पित कदम कदम्ब तक, पहुँचे-संकुचे मौन.
छमछम चुप, धड़कन मुखर, परबस सुनता कौन. -सलिल (संकुचे में 'च' पर चन्द्रबिंदी, लघु मात्रा)

दोहा में गुरु मात्रा के घटने के साथ-साथ उनका रचना-कर्म कठिन होता जाता है. यदि बिना मात्रा के अक्षर मात्र से बनानेवाले शब्दों का प्रयोग अधिक से अधिक करें तो इन दोहों को रचना सहज होगा.
सभी सहभागी, जो किसी कारण से कम सक्रिय हैं इन प्रकारों ओके सिद्ध करने से न चूकें. जो दोहाकार इन प्रकारों को रच पता है उसे पूर्व के दोहे रचना सुगम हो जाता है.

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दोहा गाथा सनातन: 23 - त्रिकल दोहा


परिभाषा:

मात्राएँ यदि तीस लघु, नौ गुरु मिलें सुजान।
उस दोहे को 'त्रिकल' कहें, 'सलिल' काव्य-विद्वान।।

नौ गुरु के सँग तीस लघु, मात्राएँ लें देख।
'सलिल' 'त्रिकल' दोहा रचें, शुद्ध बने अभिलेख।।


दोहे के इस प्रकार में 9 गुरु + 30 लघु = कुल 39 अक्षर होते हैं, जिनकी कुल मात्राएँ 9 x 2 = 18 + 30 = 48 होती हैं।

उदाहरण:

1. सुख-दुःख दो पद, रात-दिन, चरण चतुर्युग चार।
तेरह-ग्यारह विषम-सम, दोहा विधि अनुसार।। -सलिल

2. तन-मन यदि परवश हुआ, गँवा मान-सम्मान।
जीवन-मरण समान तब, सुमिर आत्म-अभिमान।। -सलिल

3. विषम चरण के अंत में, रखिये 'सनर' अवश्य।
'जतन' अंत सम चरण का, सार्थक कर कवि-कथ्य।। - सलिल

4. घट-घट भरी उदासियाँ, पनघट-पनघट प्यास।
गुमसुम-गुमसुम खेत हैं, पगडंडियाँ उदास।। -डॉ. रामसनेही लाल शर्मा 'यायावर'

5. गज त्यौं सुमिरौं हरि तुम्हें, हम सुमिरें केहि काज?
हम गजगामिन हेतु हरि, तुमहुँ बनत जब ग्राह।। -अम्बिकाप्रसाद 'दिव्य'

6. कटि तनु भरे सुजंघ जुग, सब तन भरे उमंग।
खिलत जवानी पाइ मनु, खिलत रहत से अंग।। -रामचरित उपाध्याय

7. अगल-बगल, मुद-थल जुगल, अति कल इहिं बल पाय।
ताकत तिरिछेयी अहैं, सूधे को न बनाय।। - डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'

8. नचत स्याम थिरकत पगनि, दलि दुःख-दल करि कुंठ।
दीन्यौ इक इक हिलनि मैं, एक-एक बैकुंठ।। - डॉ. राजेश दयालु 'राजेश'


उक्त दोहों में गुरु-लघु मात्राओं के संयोजन में चरणों या पदों का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। किसी भी चरण या पद में मात्राएँ आवश्यकता के अनुसार हो सकती हैं किन्तु पूरे दोहे में 9 गुरु व 30 लघु मात्राएँ होना अनिवार्य है।

विविध काल के दोहकारों के उक्त उदाहरणों में मात्राओं के संयोजन की विविधता देखें किन्तु शब्दावली या भाषा सम-सामयिक ही रखें ताकि पाठक पढ़कर समझ और रस ले सकें।

आगामी लेख मालाओं में दोहों में गुरु मात्रा की संख्या क्रमशः कम होंगी और ऐसे दोहों की रचना के लिए छंद और भाषा पर अधिक अधिकार आवश्यक है। दोहा संग्रहों में भी ऐसे दोहे कम ही मिलते हैं। प्रयास यही है कि पर्याप्त संख्या में उदाहरण दिए जा सकें ताकि विविधता पर दृष्टि जा सके. पाठक भी ऐसे दोहे भेजें तो उन्हें भेजनेवाले के नाम सहित सम्मिलित किया जाएगा।

आगामी अंश में 8 गुरु + 32 लघु मात्राओं के कच्छप दोहे पर चर्चा होगी। पाठक स्वयं के अथवा अन्यों के लिखे त्रिकल और कच्छप दोहे दोहाकार के नाम सहित भेजें।

दोहा गाथा सनातन- 22- दोहा रचना मान है


वानर अथवा पान है, दोहा का नव भेद।
पढें समझ रचिए इसे, मन में रहे न खेद।।
दस गुरु अट्ठाईस लघु, वानर सा व्यवहार।
रंग मान के पान सा, जग होता बलिहार।।

मत पूछो यह किस तरह, बीती उसकी रात।
बदल-बदलकर करवटें, उसने किया प्रभात।। -प्रो. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

दोहा युग की चेतना, जनगण-मन का मीत।
मिलन-विरह, सुख-दुःख, सृजन, परिवर्तन की रीत।। -सलिल

अगनित मुनि औ' देव हैं, अगनित दानव-यक्ष।
अगनित सागर रत्न हैं, अगनित पक्ष-विपक्ष।। -रामस्वरूप बृजपुरिया

मौसम, खुशियाँ, तितलियाँ, बतरस, मिलन, मिठास।
कल तक सब त्यौहार थे, आज हुए इतिहास।। - राधेश्याम शुक्ल

बदल गए सब रूप अब, बदल गए सब रंग।
सरबन अब अपनी कथा, ले जा अपने संग।। -सोम ठाकुर

नहर फाँदकर शिखर पर, लिखकर अपना नाम।
चुप नौ-दो-ग्यारह हुई, आँख मूँदकर शाम।। - श्रीकृष्ण शर्मा

दोहा गाथा सनातन- 21 - दोहा में कस-बल बहुत


दोहा में कस-बल बहुत, लेकिन लघु आकार.
रचता नव इतिहास यह, साक्षी है संसार.

ग्यारह गुरु छब्बीस लघु, चल या बल दो नाम.
बिम्ब भाव रस-त्रिवेणी, दस दिश व्यापा नाम..

रजकण की महिमा अनत, अतुल धरम-विस्तार.
धरती के परमाणु की, महिमा अपरम्पार.. -शंकर सक्सेना

महुआ महका, पवन में सुरभित मंजुल राग.
सदा सुहागन वन्य श्री, वर ऋतुराज सुहाग.. - संजीव 'सलिल'

जनगण-मन को मुग्धकर, करे ह्रदय पर राज्य.
नव रस का यश कलश है, दोहों का साम्राज्य.. - संजीव 'सलिल'

परिवर्तन तो है नियम, उस पर क्या आवेश.
जब भी बदला है समय, बदल गया परिवेश.. -चंद्रसेन 'विराट'

दीरघ अनियारे सुगढ़, सुन्दर विमल सुलाज.
मकर छबी, बाढह मनो, मैन सुरूप जहाज.. - सूरदास मदन मोहन

चम-चम विद्युद्दाम हैं, तड़क रहे ललकार.
या अनंत-फ़ण कर उठे, उठ ऊपर फुंकार.. -डॉ.अनंतराम मिश्र 'अनंत'

दोहा गाथा सनातन: 20- दोहा पावन पयोधर


दोहा पावन पयोधर, दे मन को आनंद.
बारह-चौबिस गुरु-लघु, छत्तीस मात्रिक छंद..

जिस दोहे में बारह गुरु तथा चौबिस लघु कुल ३६ मात्राएँ हों उसे पयोधर कहते हैं।

उमस, घुटन, सीलन भरी, लोग खड़े निर्वात।
खूब गरजते मेघ तुम तब होती बरसात।। - डॉ. भारतेंदु मिश्र
भाषा अम्बर भाव् शशि, पिंगल है ऋतुचक्र।
तारक उपमा, जलद रस, तडित्छटा गण वक्र।।
रीति-नीति, युग-बोध नव, पुरा-पुरातन सत्य।
शिव-सुन्दर कर कह रहा, दोहा छंद अनित्य।।

द्वैताद्वैत, सगुण-निगुण, ज्ञान-प्रेम दिन-रात।
विविध मतों का तिमिर हर, दोहा करे प्रभात।।
सबा-सलिल शीतल-विमल, मिले नर्मदा-तीर।
सफल सदा हो साधना, नर हो ऋषि-गुरु-पीर।।

अगली कड़ी में मिलिए 'बल' दोहा से-

दोहा गाथा सनातन: 19 दोहा छंद-दिनेश


गीति काव्य रस-गगन में, दोहा छंद-दिनेश.
अन्य छंद शशि-तारिका, वे सुर द्विपदि सुरेश..- गयंद
धर्म नीति आचार का, दोहा अमिट प्रमाण.
मिलन-विरह, बदलाव फिर, ध्वंस-पुनर्निमाण....- गयंद
द्वैताद्वैत, सगुण-निगुण, ज्ञान-प्रेम, दिन-रात.
विविध मतों का मन मिला, दोहा करे प्रभात...-गयंद
दोहा मात्रिक छंद है, तेईस विविध प्रकार.
तेरह-ग्यारह दोपदी, चरण समाहित चार....- गयंद
विषम चरण के आदि में, जगण विवर्जित मीत,
दो शब्दों में 'जगण' की, अनुमति दोहा-रीत...- गयंद
एक घटे गुरु-दो बढ़ें लघु- हो नया प्रकार.
कुल अड़तालीस मात्रा, दोहा विधि अनुसार....- गयंद
तेरह गुरु-बाईस लघु, वर्ण रहें पैंतीस.
रच गयंद कवि सुखी हों, मन में रहे न टीस..-गयंद

गयंद दोहे में तेरह गुरु तथा २२ लघु, इस तरह कुल ३५ वर्ण होते हैं. गयंद के उक्त उदाहरण देखें और अभ्यास करें. गयंद को मदुकल भी कहते हैं.

दोहा के विविध प्रयोगों के अर्न्तगत यह भी जान लें की दोहा शुभ कामना देने का माध्यम भी है. २ जून को दोहा-कक्षा के होनहार छात्र मनु बेतखल्लुस और उनकी जीवनसंगिनी उमा जी के परिणय की वर्ष-ग्रंथि है. दोहा हमारा दूत बन कर उन्हें शुभ-कामना दे रहा है-

प्रथा सनातन-पुरातन, चिर नवीन शुभ रीत.
पुरुष-प्रकृति का मिलन ही, सत्य-चिरन्तन प्रीत.
द्वैत मिटा, अद्वैत वर, दो तन-मन हों एक.
उमा और मनु शिवा-शिव, रचें सृष्टि निज नेक..
दोहा-गाथा को मिला मनु जी का सहयोग.
दोहा की खोजी बहर, यही शारदा-भोग..
चन्द्र-चन्द्रिका सम सदा, पूरक बन रह साथ.
उमा और मनु सौ बरस, जियें उठाये माथ.
हिन्दयुग्म-दोहा रहे, दोनों को आशीष.
सलिल-साधना स्नेह लाख, हों कृपालु जगदीश..

अगले सत्र में पयोधर और बल दोहा से परिचय प्राप्त करेंगे हम सब.

दोहा गाथा सनातन: कक्षा 17 दोहा है रस-कोष


गागर में सागर लिए, दोहा है रस-कोष।
सत्य सनातन का करे, 'सलिल' सतत जय घोष।।
भ्रमर सुभ्रामर शरभ से, मिला चुके हम हाथ।
श्येन और मंडूक से, करी मित्रता साथ।।
मरकत की छवि मन बसी, करें करभ का दर्श।
नर से मिलकर हंस सँग, करिए निज उत्कर्ष।।

करभ: १६ - १६ - ३२ - ४८
होती सम गुरु-लघु कला, सोलह-सोलह सँग।
जमता है तब करभ का, विद्वज्जन में रंग।।
जो मैं ऐसा जानती, प्रीत किये दुःख होय।
नगर ढिंढोरा पीटती, प्रीत न करियो कोय।। -मीरा बाई
'दरिया' सोता सकल जग, जागत नाहीं कोय।
जागे में फिर जागना, जागा कहिये सोय।। - दरिया
बाँस साँस के योग से, बंशी बजे द्विकूल।
घातों सँग रह बाँस जब, बजे सिरों पै झूल।। - ओम प्रकाश बरसैयां
द्रोह मोह आक्रोश या, योग भोग संयोग।
दोहा वह उपचार जो हरता भव के रोग।। -सलिल
जिसमें बची जिजीविषा, उसकी करो सँभाल।
शेष सभी को खा रहा, मुँह फैलाये काल।।- प्रो. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

नर: १५ - १८ - ३३ - ४८
नर में पंद्रह गुरु रहें, अट्ठारह लघु शेष।
कथ्य बिम्ब रस की छटा, देखें 'सलिल' अशेष।।
राधावल्लभ लाल कों, जाहि न भावत नेह।
परियौ मुठी हजार दस, ताकी आँखिन खेह।। -मतिराम
कदम कुञ्ज व्हैं हौं कबै, श्री वृन्दावन मांहि।
'ललितकिसोरी'लाडलै, बिहरेंगे तिहि मांहि।। -ललितकिशोरी
गर्मी भर जीवै बढै, झरे वारि तो सूख।
विष रस धारे आकतू, शिव को प्रिय हिय रूख।। ओमप्रकाश बरसैयां
हुए सहाय अहेतु ही, कहाँ-कहाँ कब कौन?
सबके प्रति आभार है,शीश झुकाता मौन।। -चंद्रसेन 'विराट'
दोहा छंद-नरेश के, यश गाते कवि-भाट।
गागर में सागर भरें, लघु में लीन विराट।। -सलिल

हंस: १४ - २० - ३४ - ४८
चौदह गुरु से बीस लघु, करते हैं जब मेल।
दोहा सरवर में करे, हंस अनवरत खेल।।
'पलटू' भेद न कीजिये, यह जग बुरी बलाय।
लिए कतरनी कांख में, करै मित्रता धाय।। -पलटू
काला हंसा निरमला, बसे समंदर तीर।
पंख पसारे बिखहरे, निरमल करे सरीर।। शैख़ शरफुद्दीन अहमद
अर्थ बिम्ब रस उक्ति से, छोडे अमित प्रभाव।
मर्म भेद कर रसिक के, दोहा भरता घाव।। -सलिल
हम-तुम दोनों मुसाफिर, आती-जाती रेल।
अपने-अपने गाँव तक,सबका-सबसे खेल।। निदा फाजली

शेष दोहों से भेंट के पहले, अब तक पढ़े दोहों के साथ दो-दो हाथ करते रहें।



दोहा गाथा सनातन: 15- रम जा दोहे में तनिक


रम जा दोहे में तनिक, मत कर चित्त उचाट.
ध्यान अधूरा यदि रहा, भटक जायेगा बाट..
दोहा की गति-लय पकड़, कर किंचित अभ्यास.
या मात्रा गिनकर 'सलिल', कर लेखन-अभ्यास..
भ्रमर सुभ्रामर से मिले, शरभ-श्येन को जान.
आज मिलें मंडूक से, मरकत को पहचान..
अट्ठारह-बारह रहें, गुरु-लघु हो मंडूक.
सत्रह-चौदह से बने, मरकत करें न चूक..


१८/१२ - मंडूक

जाको राखे साइयाँ, मार सके ना कोय.
बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय..
राम निकाई रावरी, है सभी कौ नीक.
जो यह साँची है सदा, तौ नीकौ तुलसीक..
संत तुलसीदास

का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच.
काम जु आवै कामरी, का लै करै कमाँच..
संत तुलसीदास

पिय को जिय जासो रमै, सोई ज्येष्ठा होइ.
आनि कनिष्ठा जानिए, कहै सयाने लोइ..
तोष कवि

बानी तो पानी भरै, चारू बेद मजूर.
करनी तो गारा करै, साहब का घर दूर..
-कबीर

दोहा में होता सदा, युग का सच ही व्यक्त.
देखे दोहाकार हर, सच्चे स्वप्न सशक्त..
- सलिल

कोई नहीं विकल्प हो, फिर भी एक विकल्प.
पूरी श्रृद्धा से करुँ, मैं प्रार्थना अनल्प..
- चंद्रसेन 'विराट'

१७/१४ - मरकत

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय.
मीठी बानी बोल के, जग बस में कर लेय..
रूप नहीं रेखा नहीं, नाहीं है कुल-गोत.
बिन देही का साहिबा, झिलमिल देखूं जोत..
- संत सिंगाजी

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय.
माली सींचै सौ घडा, ऋतु आये फल होय..
-स्वामी प्राणनाथ

कानों में अब शूल सी, चुभती मंद बयार.
खेतों में दिखने लगा, श्वेत कपासी प्यार..
अशोक गीते

मोह एक आसक्ति है, और प्रेम है मुक्ति.
जहाँ मुक्ति होती नहीं, वहां सिर्फ पुनरुक्ति..
-सुरेश उपाध्याय

द्वार खुले ही रह गए, तूने दिया न ध्यान.
क्यों तेरे घर में नहीं, घुस आएगा श्वान?.
- डॉ. अनंत राम मिश्र 'अनंत'

चहरों की होती नहीं, अपने से पहचान.
दर्पण भी अंधा हुआ, है खुद से नादान..
डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी

दोहा दरबार के २३ रत्नों में से ६ से आपका परिचय हो चुका है. इनके जितना निकट आयेंगे उतना ही अधिक आनंद आएगा.

गृह कार्य:

१. उक्त ६ प्रकार के दोहों को बार-बार पढें यह देखें कि इनकी लय में क्या अंतर है? लय को पकड़ सकें तो बिना मात्रा गिने भी इन्हें लिख सकेंगे.

२. खुसरो को दोहों की विशेषता बताइये. ये दोहे आपको क्यों पसंद हैं अथवा क्यों पसंद नहीं हैं? गोष्टी में इस बिंदु पर चर्चा करना उपयोगी होगा.

३. आप में से हर एक कबीर का कम से कम एक-एक दोहा लाये और कबीर तथा खुसरो के दोहों की भाषा तथा कथ्य पर ध्यान देकर अपनी बात टिप्पणी में दे.

४. ऊपर विविध समयों के दोहकारों के दोहे दिए गए हैं. समकालिक दोहकारों को आप भाषा और कथ्य से जान लेंगे. उनकी कहन और कथन पर ध्यान दें. इससे आज के दोहों का शिल्प और भाव समझने में मदद मिलेगी.

दोहों का पत्राचार और टिप्पणी में प्रयोग कीजिये. सोरठा, रोला और कुण्डली का अभ्यास करते रहिये.
अब एक सलाह दीजिये कि इस दोहा गाथा को इसी तरह चलने दिया जाए, संक्षिप्त कर समाप्त किया जाए या आगे और गहराई में उतरा जाये? यह आपकी, आपके लिए, आपके द्वारा है. आपमें से बहुमत जैसा चाहेगा वैसा ही रूपाकार रखा जायेगा. यह उबाऊ हो रहा हो तो भी निस्संकोच संकेत करें.

अब कक्षा समाप्त करने के पूर्व दोहा छुपल में सुनिए एक और सच्चा किस्सा:

रज्जब तू गज्जब किया...निर्गुण पंथ से सादृश्यता रखते दादूपंथ के संस्थापक संत दादू दयाल (संवत १६०१, अहमदाबाद- संवत १६६०, नारना, जयपुर) साबरमती नदी में शिशु के रूप में बहते हुए लादी राम नामक ब्राम्हण को मिले थे. दादू के दोहों में हिंदी, गुजराती, राजस्थानी तथा पंजाबी का प्रयोग हुआ है. इनकी विषय वास्तु अलौकिक प्रेम तत्व की सरस व्यंजनासतगुरु महिमा, ईश्वर की व्यापकता, भौतिक जग की क्षण भंगुरता तथा आत्म बोध है. दादू के कुछ दोहो का आनंद लीजिये-

घीव दूध में रमि रहा, व्यापक सब ही ठौर.
'दादू' बकता बहुत है, माथि काढे ते और..
साध मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि की प्यास.
'दादू' संगत साधू की, अविगत पावै आस..
'दादू' देख दयाल को, सकल रहा भरपूर.
रोम-रोम में रमि रह्या, तू जनि जाने दूर..
केते पारिख पच मुए, कीमती कही न जाइ.
'दादू' सब हैरान हैं, गूंगे का गुड खाइ.
जब मन लागे राम सौं, अनत काय को जाइ.
'दादू' पाणी-लूण ज्यों, ऐसे रही समाइ..


दादू के प्रमुख ५२ शिष्यों में से एक आमेर शहर के निवासी रज़्ज़ब भी थे. दादू बहर यात्रा पर गए तो घरवालों ने अपनी मुहब्बत का वास्ता देकर रज़्ज़ब को विवाह के लिए मजबूर कर दिया. बेमन से रज़्ज़ब को जमा पहनकर, सर पर सेहरा बांधकर मौर सजाये घोडे पर बैठना पड़ा. उन्होंने बहुत कोशिश की कि बच सकें पर उनकी एक न चली. तब उन्होंने अपने गुरु दादू को याद किया. गुरु शिष्य की पुकार कैसे अनसुनी करते? रज़्ज़ब बारात के साथ गाजे-बजे के साथ जा रहे थे कि अचानक गुरु दादू दिखाई पड़े. रज़्ज़ब ने गोदे पर बैठे-बैठे ही गुरु को प्रणाम किया. दादू ने आशीष देते हुए उच्चस्वर में एक दोहा कहा जिसे सुनते ही रज़्ज़ब सेहरा फेंककर घोडे से कूदकर आँखों में आँसू भरे हुए गुरु के श्री चरणों में लोटने लगा. गुरु ने उसे उठाकर ह्रदय से लगाया और दीक्षा दी, कोई रोक नहीं पाया. रज़्ज़ब को सांसारिक मोह-जाल से बचाकर भक्ति-मार्ग पर ले जानेवाला दोहा सुनिए-

रज़्ज़ब तू गज्ज़ब किया, सर पर बांधा मौर.
आया था हरि-भजन को, जाता है किस ओर..


कालांतर में रज़्ज़ब खुद भी सिद्ध संत हुए. उनका भी एक दोहा पढिए-

रज़्ज़ब जाकी चाल सों, दिल न दुखाया जाय.
जहाँ खलक खिदमत करे, उत है खुसी खुदाय..
निराकार-निर्गुण भजै, दोहा खोजे राम.
गुप्त चित्र ओंकार का, चित में रख निष्काम..



गोष्ठी 14 - दोहा के संग-साथ


दोहा के पदों और चरणों में मात्रा गणना का पर्याप्त अभ्यास आपको है। अब करना केवल यह है कि चारो चरणों या दोनों पदों या पूरे दोहे की गुरु और लघु मात्राएँ अलग-अलग गिनें, गुरु को २ से गुणा कर लघु जोड़ेंगे तो योग ४८ ही आएगा. दोहा में कुल ४८ लघु मात्राएँ होती हैं. हर गुरु मात्रा के लिए २ लघु मात्राएँ कम हो जाती हैं. दोहा के २३ प्रकार इन लघु-गुरु के विविध संयोजनों से ही बनते हैं. ग़ज़ल की बहर की तरह दोहे के प्रकार हैं. बहरों के नामों की तरह इन दोहों के नाम हैं. नीचे आपके ही दोहों में मात्रा गणना एवं दोहा का प्रकार प्रस्तुत है-

- अजित जी
लोकतन्‍त्र की गूँज है, लोक मिले ना खोज
२ १ २ १ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार= १८+६=२४ मात्रा
राजतन्‍त्र ही रह गया, वोट बिके हैं रोज
२ १ २ १ २ १ १ १ २,२ १ १ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार=१६+८=२४ मात्रा.
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.

-मनु जी
अब तो कक्षा नायिका, के भी पकडे कान
१ १ २ २ २ २ १ २ २ २ १ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
फुटक रहे हैं छात्र सब , देती क्यूं ना ध्यान
१ १ १ १ २ २ २ १ १ १, २ २ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार =१६+८ =२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.

-पूजा जी
रचना रोला भूमिका, दोहे के संग साथ.
१ १ २ २ २ २ १ २, २ २ २ १ १ २ १
गुरु ९ बार + लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
बना रहे हैं कुण्डलिनी, लिये हाथ में हाथ.
१ २ १ २ २ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार +लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.

-अभिषेक जी
मैं अपने को जप रहा, चादर-बाहर पाँव।
२ १ १ २ २ १ १ १ २, २ १ १ २ १ १ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
अभिमानी जन का नहीं, कहीं नाम या गाँव।
१ १ २ २ १ १ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार = १६+८=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ७+८=१५ बार अर्थात ३० मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३० + १८ = ४८ मात्रा
१५ गुरु तथा १८ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'नर' है.

-तपन शर्मा
मात्रा का भय नहीं है, करूँ हमेशा जोड़.
२ २ २ १ १ १ २ २, १ २ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४
ज्ञान न शब्दों का मुझे, शिल्प न दूँ मैं तोड़.
२ १ १ २ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार, १८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.

-शन्नो जी
'जहाँ पड़ें गुरु के चरण, चंदन बनती धूल.
१ २ १ २ १ १ २ १ १ १, २ १ १ १ १ २ २ १
गुरु ६ बार, लघु १२ बार = १२+१२=२४
पाकर चरणों में शरण, मिले शांति का कूल..
२ १ १ १ १ २ २ १ १ १,१ २ २ १ २ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ६+७=१३ बार अर्थात २६ मात्रा,
लघु १२+१०= २२ मात्रा, कुल २६ + २२ = ४८ मात्रा
१३ गुरु तथा २२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'गयंद या मदुकल' है.

- सलिल
दोहा गाथा से हुए, जितने श्रोता गोल.
२ २ २ २ २ १ २, १ १ २ २ २ २ १.
गुरु १० बार, लघु ४ बार=२०+४=२४
वापिस आ दोहा रचें, शब्द-शब्द को तोल..
२ १ १ २ २ २ १ २ २ १ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार=१८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु १०+९=१९ बार अर्थात ३८ मात्रा,
लघु ४+६= १० मात्रा, कुल ३८ + १० = ४८ मात्रा
१९ गुरु तथा १० लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'श्येन' है. .

गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस.. १४ गुरु, २० लघु - हंस
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग.. १६ गुरु, १६ लघु - करभ
सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय.. १६ गुरु, १६ लघु- करभ

टिप्पणी: प्रथम चरण में १३ के स्थान पर १४ मात्राएँ हैं. यहाँ एक मात्रा गिराई गयी है. खुसरो हिन्दी-उर्दू दोनों में लिखते थे. यह असर होना स्वाभाविक है, पर हम ऐसा न करें.

नीलम जी ...
दोहा के परिवार में, जुडें-लिखें यदि आप.
तब खुसरो की विरासत, सके जगत में व्याप. १४-२० हंस
खुसरो दरिया प्रेम का ,उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया ,जो डूब गया सो पार
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी, चौथे चरण में 'जो' नहीं है.
खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया, डूब गया सो पार १७ - १४ मरकट


मैंने निम्न रूप भी सुना है-
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी बाकी धार.
जो उतराया डूबता, जो डूबा हो पार.. १९ गुरु, १० लघु -श्येन

२)सेज वो सूनी देखके रोवु मै दिन रैन ,
पिया -पिया मै करत हूँ, पहरों पल भर न चैन |
सेज वो सूनी देखके, रोऊँ मैं दिन-रैन.
पिया-पिया मैं करत हूँ, पल भर पड़े न चैन.. १४ गुरु, २० लघु -हंस.
मात्राएँ आप गिन लातीं तो सबको प्रेरणा मिलती.

shanno said...
आचार्य जी,
दोहा का कुनबा बड़ा, बढ़कर हुआ विशाल
कठिन समस्या हो गयी, बिगड़ा मेरा हाल १५ - १८ नर
बिगड़ा मेरा हाल, कि मीटर बंद हो गया
अकल हो गयी मंद,लिखा तो छंद हो गया
शन्नो है लाचार, न अब ले पाये लोहा
डग-मग करे नैया, हँसते मुझपर दोहा.

'खुसरो बाजी प्रेम की, मैं खेलूँ पी के संग
जीत गयी तो पी मोरे, हारी पी के संग'.
दूसरे चरण से 'मैं' हटा दें. तीसरे चरनमें एक मात्रा गिरेगी. २० - ८ शरभ

'अपनी छव बनायिके, जो मैं पी के पास गयी
छव देखी जब पीयू की, सो अपनी भूल गयी'. -यह दोहा नहीं है.

'एक गुनी ने यह गुन कीना
हरियल पिंजरे में दे दीना
देखो जादूगर का कमाल
डाले हरा निकाले लाल'. - यह पहेली है...बूझिये.
एक सवाल आ रहा है दिमाग में जिसे पूछे बिना वह पच नहीं रहा है.....वह यह कि क्या खुसरो जी के जमाने में मात्रायों को गिनने की प्रथा थी या नहीं. क्योंकि मुझे काफी गड़बड़ दिखती है इधर-उधर कई जगह. इतने महान और ज्ञानी इंसान के बारे में ऐसा सवाल पूछते हुए संकोच बहुत हो रहा है

संकोच न करें...खुसरो के समय में आज की तरह विद्यालय या किताबें सर्व सुलभ नहीं. थे. शिक्षा गुरुओं या उस्तादों से ली जाती थी. खुसरो बहुभाषी विद्वान् थे. संस्कृत, अरबी-फारसी-उर्दू तथा अपभ्रंश जानते थे. आम बोल-चाल की भाषा में, जिसे वे 'हिन्दवी' कहते थे रचनाएँ करते थे. इसलिए उनके कलाम में कई जगहों पर उर्दू की तरह मात्राएँ गिराई जाना जरूरी हो जाता है. दूसरे इतना समय बीत गया है कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग पाठ-भेद प्रचलित हैं.

Dr. Smt. ajit gupta said...
आचार्य जी
दो दोहे खोजे हैं -
खुसरो रेन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो मन पिऊ को, दोउ भये एक रंग
खुसरो ऐसी प्रीत कर, जैसी हिन्‍दू जोय
पूत कराए कारने, जल,जल कोयला होय
दोहे के तीन प्रकार प्रस्‍तुत हैं -
हाथ पसारे मैं खड़ी, घर की चौखट पार
छाँव मिली ना ओट थी, बस थी केवल हार।
१६ + १६ = करभ
रात चाँदनी खूब थी, तारे जगमग होय
पंछी बैठा एकला, भोर बता कब होय।
१७+१४= मर्कट
साँपों ने मुझको डसा, घुस बाँहों के माय
प्रेम सिमटकर रह गया, शक ही बढ़जा जाय।
१४+२०= हंस
तीन दोहे और प्रस्‍तुत हैं, २३ बनाने में अभी समय लगेगा। मुझे अंतिम दो प्रकार- उदर और सर्प समझ नहीं आए, क्‍योंकि बिना लघु के दोहा कैसे सम्‍भव है?

उदर में १ गुरु तथा ४६ लघु हैं जबकि सर्प में गुरु नहीं है, ४८ लघु हैं.

प्रेम और विश्‍वास से, जोड़ा था परिवार
नौकरियां ने चोट की, तोड़ा है घरबार
१८+१२ = मंडूक
चीयां मेरी बावरी, उल्‍टी उल्‍टी जाय
दिन में तो सोती रहे, पड़े रात जग जाय।
१९ + १० = श्‍येन
सारा आटा साँध के, रोटी बनती नाय
थोड़ा साटा राख के, लोई बिलती जाय
२० + ८ = शरभ

वाह! वाह!! आपने कमाल कर दिया. आज की दोहा ध्वजवाहिका आप ही हैं.

Kavi Kulwant said...
रावण रावण जो दिखे, राम करे संहार ।
रावण घूमे राम बन, कलयुग बंटाधार ॥
कलयुग में मैं ढो़ रहा, लेकर अपनी लाश ।
सत्य रखूँ यां खुद रहूँ, खुद का किया विनाश ॥
भगवन सुख से सो रहा, असुर धरा सब भेज ।
देवों की रक्षा हुई, फंसा मनुज निस्तेज ॥
मैं मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट ।
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट ॥
सच की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार ।
पहुंचाने शमशान भी, मिला न कोई यार ॥

स्वागत कवि कुलवंत जी!, हम दर्शन कर धन्य.
दोहों का उपहार है, सचमुच मीत अनन्य.

pooja said...
आचार्य जी,
अच्छा किया जो आपने खुसरो के दोहे लेकर आने को कहा, इस बहाने अमीर खुसरो की लिखी तमाम रचनाओं को पढने का सौभाग्य मिला, अब तक सब नहीं पढ़ पाई, इन्हें पढने का काम चल रहा है और अपनी दोहा यात्रा भी चल ही रही है :) , अमीर खुसरो के कुछ दोहे , चुन कर ले आई ---
अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।

अँगना तो परबत भयो, दहरी भई बिदेस.
जा बाबुल घर आपने, चली पिया के देस..

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी.

खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहि होत सहाय।।

दोहों के प्रकार समझने में अब तक कठिनाई हो रही है, पर हार नहीं मानी है, कोशिश जारी है, जैसे ही समझ में आ जायेंगे, उदाहरण के साथ फिर हाजिर हो जाउंगी.

पूजा जी! आपका परिश्रम और लग्न सराहनीय है। आपका प्रयास अन्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा. पुराने दोहाकारों के दोहों की मात्रा गणना (तकतीअ) करते हुए प्रक्षिप्त शब्दों को खोज कर अलग कर दें। शीघ्रता न करें। दोहा पढ़ती-लिखती रहें...अपने-आप उनकी लय का अंतर समझने लगेंगी. अस्तु...



दोहा गाथा सनातन : गोष्ठी 13- दोहा सागर है अगम


दोहा सागर है अगम, कहीं न मिलती थाह.
उतनी गहराई मिले, जितना लो अवगाह.
रश्मि प्रभा जी-श्याम जी, स्वागत कर स्वीकार.
उपकृत हमको कीजिये, कुछ दोहे उच्चार..



डॉ. श्याम गुप्ता जी!

आपने बिलकुल सही कहा है, गोष्ठी १२ के प्रथम दोहे के तृतीय चरण में १३ के स्थान पर १४ मात्राएँ हैं. दोहा है-

दोहा दे शुभकामना, रहिये सदा प्रसन्न.
कीर्ति सफलता लाई है, बैसाखी आसन्न..



आँखों में तकलीफ के कारण जैसे-तैसे इस सामग्री को टंकित किया...चूक हुई, पूरी कक्षा और युग्म परिवार के प्रति खेद व्यक्त करता हूँ, भविष्य में अधिक सजग रहने का प्रयास होगा. तीसरे चरण को इस तरह १३ मात्राओं में रखा जा सकता है-

'लाई है यश-सफलता', शेष दोहा पूर्व की तरह.

शन्नो जी! आपको साधुवाद...निरंतर प्रयास करने और द्रुत गति से छंद पर अधिकार पाने के प्रयास के लिए. आये! आपकी पंक्तियों का मंथन करें.

दुखी बहुत ही मन हुआ, समझ ना कुछ आया
जब मिला आपका साथ, तब जरा लिख पाया

आदत गिनती की पड़ी, मनु का कहना मान
बूँद-बूँद पी ज्ञान की, अब आई मुसकान.


उक्त पंक्तियों में १३-१३ मात्रा हैं. यह दोहा का विधान है किन्तु प्रथम दो पंक्तियों में दीर्घ पदांत है जो दोहे में वर्जित है. इन्हें देख लीजिये. अंतिम दो पंक्तियाँ दोहा हैं और त्रुटिरहित हैं.

पाया मैंने बस तनिक, मुझे बहुत ना ज्ञान
मैं छोटी सी कंकरी, आप ज्ञान की खान
आप ज्ञान की खान, चमकते हीरे जिसमे
तुलना कोई करे, हो सके साहस किसमें
रहे सभी के साथ, 'शन्नो' को भी बताया
साथ आपका मिला, हमने बहुत ही पाया.


प्रथम ४ पंक्तियाँ बिलकुल सही हैं. अंतिम दो पंक्तियों विशेषकर अंतिम चरण को शायद आप परिवर्तित करना चाहें 'हमने बहुत ही पाया' पद के भाव को आप सी प्रतिभावान कवयित्री बेहतर तरीके से व्यक्त कर सकती है. कृपया एक प्रयास और...

कुंडली:
खड़ी हुई रसोई में, मैं करती थी कुछ काम
उसी समय याद आया, एक गाने का नाम
एक गाने का नाम, जिसमे आँसू भरे तराने
मूड में कुछ आकर, लगी मैं उसको गाने
मनु की बातें पढीं, 'शन्नो' बहुत हँस पड़ी
आज्ञा पा 'सलिल'की, मैं कुंडली लिखूं खड़ी.

रोला:
किया किचन में काम, लगी मैं गाने गाना
मनु ने जान तुंरत, शुरू कर दिया खिझाना
हंसी में फंसकर, फिर गयी किचन को भूल
ही, ही, ही मैं हंसी, मैं भी कैसी हूँ फूल.

इन दोनों रचनाओं में आपने प्रत्युत्पन्नमतित्व का परिचय दिया है, बधाई। यह गुण जिस कवि में हो वह हमेशा सराहा जाता है. आप रचना लिखने के बाद शीघ्रता न कर एक बार दोहरा लें तो वे बिलकुल सही हो जायेंगी.


रही रसोई में खडी, मैं करती कुछ काम
आया याद उसी समय, एक गीत का नाम
एक गीत का नाम, थे अश्रु भरे तराने
मस्ती में आ गयी, लगी मैं उसको गाने
मनु की बातें पढीं, हँस पड़ी 'शन्नो' बरबस.
बात 'सलिल' की मान, कुंडली लिखी मिले जस..


रोला:
किया किचन में काम, लगी मैं गाने गाना
मनु ने जान तुंरत, शुरू कर दिया खिझाना
फँसी हँसी में 'शन्नो', गयी किचन को भूल
ही, ही, ही मैं हँसी, लगी फूल या फूल.

तपन शर्मा said...
मात्रा का नहीं है भय, करूँ हमेशा जोड़
शब्दों का न ज्ञान मुझे, मैं शिल्प न दूँ तोड़..

रामचरित लो खोल, सोरठा देखने के लिये
जी भर कर लो बोल, हैं अनेकों उदाहरण

तपन जी! शुभकामनाएँ...दोहा लेखन का सफ़र बिना किसी हिचक के प्रारंभ कर दें, उक्त में किये जा रहे संशोधनों को समझें और तद्‍नुसार लिखें.


मात्रा का भय नहीं है ,करुँ हमेशा जोड़.
ज्ञान न शब्दों का मुझे, शिल्प न दूं मैं तोड़..

देख सोरठा छंद, रामचरित मानस उठा.
पा जी भर आनंद, हैं अनेकों उदाहरण


पूजा जी!

दोहा सत के निकट, ज्यों-, छिपा ह्रदय में सत्य
मिथ्या जग संसार यह , अजब कराये नृत्य .

ता-ता-थैया जगत की, समझ न आती रीत.
लालच की लौ ना बुझे, रुसवा हो मन मीत..


गुरु नानक देव के दोहों को अनूदित करने के प्रयास के लिए आप साधुवाद की पात्र हैं. मैंने इन्हें इस तरह किया है-

पहले मरण कुबूल कर, जीवन दी छंड आस.
हो सबनां दी रेनकां, आओ हमरे पास..

मृत्यु प्रथम स्वीकार कर, जीवन की तज आस.
सबकी जाग्रति हो सके,आओ मेरे पास..

सोचै सोच न होवई, जे सोची लखवार.
चुप्पै चुप्प न होवई, जे लाई लिवतार..

नहीं सोचने से मिले. सोचो लाखों बार.
हो कदापि वह चुप नहीं, कोशिश करो हजार..

इक दू जीभौ लख होहि, लख होवहि लख वीस.
लखु लखु गेडा आखिअहि, एकु नामु जगदीस..

जीभ एक-दो लाख या, बीसों लाखों बार.
बाद अनंतों चक्र के,हो जगदीश उचार..

जुड़े सुरिंदर जी नमन, रत्ती-रत्ती ज्ञान.
तब मिलता जब कर सकें, नित्य निरंतर ध्यान.


दोहा लेखन के कला दोहाकार की सामर्थ्य को निरंतर कसौटी पर कसती है. 'दोहा मंजरी' के रचनाकार श्री गजाधर कवि ने दोहा के २३ प्रकारों का वर्णन एक छंद में कर अपने नैपुण्य का परिचय दिया है-

भ्रमर सुभ्रामर शरभ श्येन मंडूक बखानहु.
मरकत करभ सु और नरहि हंसहि परिमानहु..
गनहु गयंद सु और पयोधर बल अवरेखहु.
वानर त्रिकल प्रतच्छ, कच्छपहु मच्छ विसेखहु.
शार्दूल अहिबरहु व्यालयुत वर विडाल अरु.अश्व्गनि
उद्दाम उदर अरु सर्प शुभ तेइस विधि दोहा करनि.


दोहा की चौपाल में आज हम आपको मिलवा रहे हैं एक अंग्रेज से. चकराइये मत, वे आपको दोहा तो सुनायेंगे पर अंगरेजी में नहीं हिन्दी में ही सुनायेंगे. इन महाशय क नाम है श्री फ्रेडरिक पिंकोट जो संवत १९४३ में भारत में थे. वे भारत में बाल शिक्षा के क्षेत्र में पुस्तक लिखनेवाले तथा उस समय के श्रेष्ठ साहित्यकारों से पत्राचार में दोहा-सोरठा का प्रयोग करनेवाले प्रथम अंग्रेज थे. श्री पिंकोट ने इंग्लैंड लौटकर नगरी तथा कैथी लिपि में 'बाल-दीपक' (४भाग) तथा 'विक्टोरिया चरित' पुस्तकें लिखीं. ये पुस्तकें खड्गविलास प्रेस बांकीपुर से मुद्रित हुईं थीं. श्री पिंकोट ने बाबू कार्तिक प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र कों गद्य-पद्य में कई पत्र लिखे. दोहा-सोरठा के अद्भुत शैल्पिक सौंदर्य पर मुग्ध श्री पिंकोट रचित निम्न सोरठा तथा दोहा स्मरण कर हम उन्हें नमन करेंगे...इन छंदों कों कठिन पानेवाले सोचें कि हिन्दी न जाननेवाले इस अंग्रेज ने पहले हिंदी और फिर छंद-पिंगल कैसे सीखा होगा? क्या हमारी कठिनाई इससे भी अधिक है या हमारे प्रयास कम हैं? श्री पिंकोट ने पत्र का उत्तर न मिलने पर स्नेह-सिक्त शिकायत सोरठा रचकर की -

बैस वंस अवतंस, श्री बाबू हरिचंद जू.
छीर-नीर कलहंस, टुक उत्तर लिख दे मोहि.

श्रीयुत सकल कविंद, कुलनुत बाबू हरिचंद.
भारत हृदय सतार नभ, उदय रहो जनु चंद.

---शेष फिर