दोहा गाथा सनातन : ३४
दोही दोहे की बहिन
दोहा के विविध प्रकारों से परिचित होने के साथ-साथ हमने सोरठा, रोला तथा कुंडली से भी परिचय प्राप्त किया.
दोहा कुल के अन्य छंदों की चर्चा प्रारंभ करते हुए आज हम 'दोही' का परिचय प्राप्त करते हैं.
दोही भी है द्विपदी, विषम चरण है भिन्न.
पंद्रह मात्राएँ रखें, किन्तु न लय विच्छिन्न.
सम चरणों के अंत में, लघु रखिये चुपचाप.
ग्यारह मात्राएँ लिए, दोही में रस व्याप.
'दोही'के दोनों पदों के विषम चरणों में पंद्रह तथा सम चरणों में ग्यारह मात्राएँ होती हैं.
प्रत्येक पद में १५+११ = २६ मात्राएँ इस एक दोही में तरह कुल ५२ मात्राएँ होती हैं.
उदाहरण:
१.
दर न रहे जाता मनुज जो, दर-दर बिना बुलाय.
आदर मान मिले न नर को, लख मुँह लोग फुलाय..
-डॉ, ॐप्रकाश बरसैया 'ओंकार', छंद क्षीरधि
२.
विरद सुमिरि सुधिकरत नित ही, हरि तुव चरन निहार.
यह भव जलनिधिते मुहि तुरत, कब प्रभु करिहहु पार..
३.
प्रभु तुम ही हो असरन-सरन, औ' मैं हूँ मानव मात्र.
तुम करुणासागर हो देव, हम करुणा के पात्र.. -सलिल
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