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दोहा गोष्ठी 15- दोहानंद अमूल्य


समयजयी दोहा रचे, सत्-शिव-सुन्दर मूल्य.
सत्-चित-आनंद दे 'सलिल', दोहानंद अमूल्य.

आपकी पंक्तियाँ आपको ही समर्पित हैं:

अद्‍भुत जी! आपका स्वागत...दोहा को जितना अधिक जानेंगे उतना अधिक जानने की इच्छा होगी. दोहा तथा अन्य छंद ध्वनि-विज्ञान के नियमों पर आधारित हैं. अक्षरों के उच्चारण के स्थान तथा उनके प्रभाव को छंद-दृष्टा ऋषियों ने आत्मसात करने के बाद ही छंद की रचना की. एक विशेषता यह है जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा तथा पढ़ा जाता है. इस कारण अन्तरिक्ष में अन्य ग्रहों पर संभावित सभ्यताओं से संकेत-संप्रेषण के लिए विश्व के वैज्ञानिकों सर्वाधिक उपयुक्त दो भाषाएँ संस्कृत और हिन्दी मानी हैं. अस्तु...

शन्नो जी! आपमें बहुत प्रतिभा है. सहज हास्य आपकी विशेषता है...हास्य लिखना सर्वाधिक कठिन है...आप शब्द-चयन तथा गति-यति के प्रति कुछ अधिक सजग हो सकें तो हम सबको आपसे बहुत मधुर और मनोरंजक रचनाएँ मिलेंगी.

जबसे करने मैं लगी, हिन्दयुग्म पे सैर
हर दिन नयी आस मिले, अपने लगते गैर.

'पे' के स्थान पर 'पर' तथा 'नयी आस' के स्थान पर 'नव आशा' करना चाहेंगी क्या?

घर बैठे करने चली, पूरे चारों धाम
यात्रा तो चलती रहे, पैर करें आराम.

तीसरे चरण को 'मन यात्रा करता रहे' करने से अर्थ या प्रभाव में आये परिवर्तन पर ध्यान दें. शिल्प सध रहा है...अ़ब भावों की विविधता आपकी दृष्टि में आ सकें तो शब्द को औजार की तरह काम में ला सकेंगी.

मन रक्खें अपना दुरुस्त, बनें काम में चुस्त
११ २ २ १ १ २ १ २ १, १२ २ १ २ २ १ = १४, ११
चाय-शाय पीते रहें , कक्षा में न हों सुस्त.
२ १ २ १ २ २ १ २, २ २ २ १ २ २ १ = १३, १२

मन दुरुस्त अपना रखें, बनें काम में चुस्त
चाय-शाय पीते रहें, हों न वर्ग में सुस्त.

आप सहमत होंगी कि कोई भी बदलाव ऐसा नहीं जो आप न कर सकें...आवश्यकता केवल थोडा सजग होने की है. दो व्यक्तियों के पास एक जैसे कपडे हों, उनमें से एक कपडे धोकर, प्रेस कर पहने और दूसरा बिना धोये पहन ले तो किसे अधिक अच्छा कहेंगी?

कक्षा में हूँ सुस्त तो, क्या कर लेंगी आप...?
टोपी पर कर टिप्पणी, छोडेंगी निज छाप....?

जो भी लिखिए युग्म पर, सुनिए 'मनु' की बात.
अंगरेजी तज मनस में, हिंदी रखिये तात.

टोपीवाला सुन रहा, गुपचुप सारी बात.
'क्या कर लोगी?, चुनौती, बढा शीश का ताप.

टोपीवाले बता दे, गिटपिट कर मत भाग.
धमकी क्यों दी है मुझे, क्या तेरा खटराग?

अंगरेजी में बोलते हैं हिंदी के बोल.
हाय! घोर अंधेर है, बोल रहे बिन तोल

बच्चे बहुत शरारती, सब हैं धींगामस्त.
गुरु जी छुट्टी पर गए, ध्वजवाहक है पस्त.

ध्वजवाहक है पस्त, सम्हाले कक्षा कैसे?
टोपी-टोपी खेल रहे, है इच्छा जैसे.

'अजित' कहे विनती सुनिए, सब मन के सच्चे.
गुरूजी दंड न देना, अच्छे हैं सब बच्चे.

कन्धों पर डाला हुआ, सारा बोझ सम्हाल.
पोंछ पसीना- सार भी, लाईं किया कमाल.

हम निखट्टूओं का भला, किया नहीं अंदाज़.
होती तो देती हटा, मैं टोपी का ताज.

भार लिया सबसे अधिक, सचमुच किया कमाल.
नमन आपको कर रही, कितना ह्रदय विशाल?

शैतानी से त्रस्त पर, नहीं दे रहीं दंड.
नतमस्तक मैं हो रही, कर सम्मान अखंड.

टोपी वाला हो गया, बहुत अधिक उद्दंड
गुरु जी जब आयें तभी, देंगें उसको दंड.

देंगें उसको दंड, रंग में भंग कर दिया
आया बहुत देर से सबको तंग कर दिया.

डरकर 'शन्नो' कहे, लगे जो भोला-भाला
उत्तर पूरे नहीं बताता टोपीवाला.

शन्नो जी की चुहल से, है कक्षा जीवंत.
याद आई कॉलेज की, कर अंतर का अंत

जन्मकुंडली-चित्र दें, लगता यह अनिवार्य
शिरोधार्य गुरु-आज्ञा, करुँ- कठिन कुछ कार्य.

धीरे-धीरे बढायें, दोहा कक्षा आप.
अन्य ज्ञान भी दीजिये, सके सभी में व्याप.


यह दोहा कक्षा आपकी, आपके लिए, आपके द्वारा संचालित है. आप अपनी रूचि की बात करें, बीच-बीच में सीखे हुए छंद प्रयोग करते रहें और गृह कार्य यथा समय करें. आपके चाहे अनुसार हम आगे बढ़ने की गति मंद कर रहे हैं.

अवनीश जी की कुछ द्विपदियों को दोहा ध्वजवाहिका अजित जी दोहा में ढाल रही हैं.

खुसरो और कबीर के दोहे आपने खोजे, सराहे और समझे...खुसरो और कबीर दोनों सूफी मत से हैं. सूफी मत में भक्त अपनी आत्मा को प्रेमिका तथा परमात्मा को प्रेमी मानकर भक्ति करता है. इस नाते दोनों संत कवियों में श्रृंगार के दोनों पक्षों मिलन-विरह को केंद्र में रखकर की गयी रचनाएँ हैं. यह श्रृंगार द्विअर्थी है...सामान्य जन इसे लौकिक मान सकते हैं, भक्त या विद्वान् अलौकिक...दोनों के साहित्य में एक और समानता है कि वे आम आदमी की भी समझ में आजाते हैं और बड़े-बड़े ज्ञानी भी उन्हें नहीं समझ पाते. दोनों में अंतर भी बहुत हैं. कबीर फक्कड़ मेहनतकश जुलाहे थे. खुसरो के नाम के पूर्व लगा विशेषण 'अमीर' ही उनके सामाजिक स्थान और आर्थिक हैसियत का पता देता है. खुसरो शिक्षित, बहुभाषी और दरबारी थे जबकि कबीर शिक्षा से वंचित होने पर भी भाषा के अद्भुत जानकार थे. डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को भाषा का डिक्टेटर कहा है, आशय यह कि कबीर ने अनेक शब्दों को उनके प्रचलित अर्थ से भिन्न अर्थ में प्रयोग किया. खुसरो कि मुर्कियाँ और पहेलियाँ जन-जन का कंठ हार हैं तो कबीर की सखियाँ और बीजक जनगण के हृदय की धड़कन हैं. सामान्य बिम्बों और शब्दों को गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ में प्रयोग करने में दोनों का सानी नहीं. दोनों की रचनाओं को आमजन, सामान्य गायक तथा शास्त्रीय गायक अनेक रागों में गाते रहे हैं...यही दोहा सिद्ध होने का लक्षण है. जिस दोहे को कई तरीकों से गया जा सके, कोई शब्द अटकता-खटकता न लगे, वह शुद्ध दोहा है.

दोहा ध्वजवाहिका अजित जी के श्रम और लगन,.दोहा कक्षा नायिका शन्नो जी की जीवन्तता और मनु जी के दोहा-प्रेम को नमन.

अब बारी मनु जी की... मनु जी! यह पता लगायें कि क्या दोहा बहर में लिखा जा सकता है? यदि हाँ तो किस बहर में? एक ही बहर में या एक से
अधिक बहरों में? बहर के आधार पर रचे गए दोहे भी लाइए ताकि उनको समझा जा सके...

शन्नो जी! आप को यह जानकारी जुटानी है कि अंगरेजी की द्विपदियाँ (कप्लेट्स) दोहा से क्या साम्य या भिन्नता रखते हैं? कुछ उदहारण हों तो सोने में सुहागा...

इस बीच विलंब से सम्मिलित छात्र तेजी से पिछले पाठ पूरे करें ताकि साथ-साथ चल सकें. शेष फिर...

गोष्ठी 14 - दोहा के संग-साथ


दोहा के पदों और चरणों में मात्रा गणना का पर्याप्त अभ्यास आपको है। अब करना केवल यह है कि चारो चरणों या दोनों पदों या पूरे दोहे की गुरु और लघु मात्राएँ अलग-अलग गिनें, गुरु को २ से गुणा कर लघु जोड़ेंगे तो योग ४८ ही आएगा. दोहा में कुल ४८ लघु मात्राएँ होती हैं. हर गुरु मात्रा के लिए २ लघु मात्राएँ कम हो जाती हैं. दोहा के २३ प्रकार इन लघु-गुरु के विविध संयोजनों से ही बनते हैं. ग़ज़ल की बहर की तरह दोहे के प्रकार हैं. बहरों के नामों की तरह इन दोहों के नाम हैं. नीचे आपके ही दोहों में मात्रा गणना एवं दोहा का प्रकार प्रस्तुत है-

- अजित जी
लोकतन्‍त्र की गूँज है, लोक मिले ना खोज
२ १ २ १ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार= १८+६=२४ मात्रा
राजतन्‍त्र ही रह गया, वोट बिके हैं रोज
२ १ २ १ २ १ १ १ २,२ १ १ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार=१६+८=२४ मात्रा.
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.

-मनु जी
अब तो कक्षा नायिका, के भी पकडे कान
१ १ २ २ २ २ १ २ २ २ १ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
फुटक रहे हैं छात्र सब , देती क्यूं ना ध्यान
१ १ १ १ २ २ २ १ १ १, २ २ २ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार =१६+८ =२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+८=१७ बार अर्थात ३४ मात्रा,
लघु ६+८=१४ मात्रा, कुल ३४ + १४ = ४८ मात्रा
१७ गुरु तथा १४ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मरकट' है.

-पूजा जी
रचना रोला भूमिका, दोहे के संग साथ.
१ १ २ २ २ २ १ २, २ २ २ १ १ २ १
गुरु ९ बार + लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
बना रहे हैं कुण्डलिनी, लिये हाथ में हाथ.
१ २ १ २ २ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार +लघु ६ बार = १८+६=२४ मात्रा
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.

-अभिषेक जी
मैं अपने को जप रहा, चादर-बाहर पाँव।
२ १ १ २ २ १ १ १ २, २ १ १ २ १ १ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
अभिमानी जन का नहीं, कहीं नाम या गाँव।
१ १ २ २ १ १ २ १ २, १ २ २ १ २ २ १
गुरु ८ बार, लघु ८ बार = १६+८=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ७+८=१५ बार अर्थात ३० मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३० + १८ = ४८ मात्रा
१५ गुरु तथा १८ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'नर' है.

-तपन शर्मा
मात्रा का भय नहीं है, करूँ हमेशा जोड़.
२ २ २ १ १ १ २ २, १ २ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार = १८+६=२४
ज्ञान न शब्दों का मुझे, शिल्प न दूँ मैं तोड़.
२ १ १ २ २ २ १ २, २ १ १ २ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार, १८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ९+९=१८ बार अर्थात ३६ मात्रा,
लघु ६+६=१२ मात्रा, कुल ३६ + १२ = ४८ मात्रा
१८ गुरु तथा १२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'मंडूक' है.

-शन्नो जी
'जहाँ पड़ें गुरु के चरण, चंदन बनती धूल.
१ २ १ २ १ १ २ १ १ १, २ १ १ १ १ २ २ १
गुरु ६ बार, लघु १२ बार = १२+१२=२४
पाकर चरणों में शरण, मिले शांति का कूल..
२ १ १ १ १ २ २ १ १ १,१ २ २ १ २ २ १
गुरु ७ बार, लघु १० बार = १४+१०=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु ६+७=१३ बार अर्थात २६ मात्रा,
लघु १२+१०= २२ मात्रा, कुल २६ + २२ = ४८ मात्रा
१३ गुरु तथा २२ लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'गयंद या मदुकल' है.

- सलिल
दोहा गाथा से हुए, जितने श्रोता गोल.
२ २ २ २ २ १ २, १ १ २ २ २ २ १.
गुरु १० बार, लघु ४ बार=२०+४=२४
वापिस आ दोहा रचें, शब्द-शब्द को तोल..
२ १ १ २ २ २ १ २ २ १ २ १ २ २ १
गुरु ९ बार, लघु ६ बार=१८+६=२४
पूरे दोहे में जोडें तो गुरु १०+९=१९ बार अर्थात ३८ मात्रा,
लघु ४+६= १० मात्रा, कुल ३८ + १० = ४८ मात्रा
१९ गुरु तथा १० लघु मात्राओं के दोहे का नाम 'श्येन' है. .

गोरी सोयी सेज पर, मुख पर डारे केस.
चल खुसरो घर आपने, रैन भई चहुँ देस.. १४ गुरु, २० लघु - हंस
खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग.
तन मेरो मन पीउ को, दोउ भये इक रंग.. १६ गुरु, १६ लघु - करभ
सजन सकारे जायेंगे, नैन मरेंगे रोय.
विधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय.. १६ गुरु, १६ लघु- करभ

टिप्पणी: प्रथम चरण में १३ के स्थान पर १४ मात्राएँ हैं. यहाँ एक मात्रा गिराई गयी है. खुसरो हिन्दी-उर्दू दोनों में लिखते थे. यह असर होना स्वाभाविक है, पर हम ऐसा न करें.

नीलम जी ...
दोहा के परिवार में, जुडें-लिखें यदि आप.
तब खुसरो की विरासत, सके जगत में व्याप. १४-२० हंस
खुसरो दरिया प्रेम का ,उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया ,जो डूब गया सो पार
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी, चौथे चरण में 'जो' नहीं है.
खुसरो दरिया प्रेम का, उलटी वाकी धार
जो उतरा सो डूब गया, डूब गया सो पार १७ - १४ मरकट


मैंने निम्न रूप भी सुना है-
खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी बाकी धार.
जो उतराया डूबता, जो डूबा हो पार.. १९ गुरु, १० लघु -श्येन

२)सेज वो सूनी देखके रोवु मै दिन रैन ,
पिया -पिया मै करत हूँ, पहरों पल भर न चैन |
सेज वो सूनी देखके, रोऊँ मैं दिन-रैन.
पिया-पिया मैं करत हूँ, पल भर पड़े न चैन.. १४ गुरु, २० लघु -हंस.
मात्राएँ आप गिन लातीं तो सबको प्रेरणा मिलती.

shanno said...
आचार्य जी,
दोहा का कुनबा बड़ा, बढ़कर हुआ विशाल
कठिन समस्या हो गयी, बिगड़ा मेरा हाल १५ - १८ नर
बिगड़ा मेरा हाल, कि मीटर बंद हो गया
अकल हो गयी मंद,लिखा तो छंद हो गया
शन्नो है लाचार, न अब ले पाये लोहा
डग-मग करे नैया, हँसते मुझपर दोहा.

'खुसरो बाजी प्रेम की, मैं खेलूँ पी के संग
जीत गयी तो पी मोरे, हारी पी के संग'.
दूसरे चरण से 'मैं' हटा दें. तीसरे चरनमें एक मात्रा गिरेगी. २० - ८ शरभ

'अपनी छव बनायिके, जो मैं पी के पास गयी
छव देखी जब पीयू की, सो अपनी भूल गयी'. -यह दोहा नहीं है.

'एक गुनी ने यह गुन कीना
हरियल पिंजरे में दे दीना
देखो जादूगर का कमाल
डाले हरा निकाले लाल'. - यह पहेली है...बूझिये.
एक सवाल आ रहा है दिमाग में जिसे पूछे बिना वह पच नहीं रहा है.....वह यह कि क्या खुसरो जी के जमाने में मात्रायों को गिनने की प्रथा थी या नहीं. क्योंकि मुझे काफी गड़बड़ दिखती है इधर-उधर कई जगह. इतने महान और ज्ञानी इंसान के बारे में ऐसा सवाल पूछते हुए संकोच बहुत हो रहा है

संकोच न करें...खुसरो के समय में आज की तरह विद्यालय या किताबें सर्व सुलभ नहीं. थे. शिक्षा गुरुओं या उस्तादों से ली जाती थी. खुसरो बहुभाषी विद्वान् थे. संस्कृत, अरबी-फारसी-उर्दू तथा अपभ्रंश जानते थे. आम बोल-चाल की भाषा में, जिसे वे 'हिन्दवी' कहते थे रचनाएँ करते थे. इसलिए उनके कलाम में कई जगहों पर उर्दू की तरह मात्राएँ गिराई जाना जरूरी हो जाता है. दूसरे इतना समय बीत गया है कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग पाठ-भेद प्रचलित हैं.

Dr. Smt. ajit gupta said...
आचार्य जी
दो दोहे खोजे हैं -
खुसरो रेन सुहाग की, जागी पी के संग
तन मेरो मन पिऊ को, दोउ भये एक रंग
खुसरो ऐसी प्रीत कर, जैसी हिन्‍दू जोय
पूत कराए कारने, जल,जल कोयला होय
दोहे के तीन प्रकार प्रस्‍तुत हैं -
हाथ पसारे मैं खड़ी, घर की चौखट पार
छाँव मिली ना ओट थी, बस थी केवल हार।
१६ + १६ = करभ
रात चाँदनी खूब थी, तारे जगमग होय
पंछी बैठा एकला, भोर बता कब होय।
१७+१४= मर्कट
साँपों ने मुझको डसा, घुस बाँहों के माय
प्रेम सिमटकर रह गया, शक ही बढ़जा जाय।
१४+२०= हंस
तीन दोहे और प्रस्‍तुत हैं, २३ बनाने में अभी समय लगेगा। मुझे अंतिम दो प्रकार- उदर और सर्प समझ नहीं आए, क्‍योंकि बिना लघु के दोहा कैसे सम्‍भव है?

उदर में १ गुरु तथा ४६ लघु हैं जबकि सर्प में गुरु नहीं है, ४८ लघु हैं.

प्रेम और विश्‍वास से, जोड़ा था परिवार
नौकरियां ने चोट की, तोड़ा है घरबार
१८+१२ = मंडूक
चीयां मेरी बावरी, उल्‍टी उल्‍टी जाय
दिन में तो सोती रहे, पड़े रात जग जाय।
१९ + १० = श्‍येन
सारा आटा साँध के, रोटी बनती नाय
थोड़ा साटा राख के, लोई बिलती जाय
२० + ८ = शरभ

वाह! वाह!! आपने कमाल कर दिया. आज की दोहा ध्वजवाहिका आप ही हैं.

Kavi Kulwant said...
रावण रावण जो दिखे, राम करे संहार ।
रावण घूमे राम बन, कलयुग बंटाधार ॥
कलयुग में मैं ढो़ रहा, लेकर अपनी लाश ।
सत्य रखूँ यां खुद रहूँ, खुद का किया विनाश ॥
भगवन सुख से सो रहा, असुर धरा सब भेज ।
देवों की रक्षा हुई, फंसा मनुज निस्तेज ॥
मैं मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट ।
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट ॥
सच की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार ।
पहुंचाने शमशान भी, मिला न कोई यार ॥

स्वागत कवि कुलवंत जी!, हम दर्शन कर धन्य.
दोहों का उपहार है, सचमुच मीत अनन्य.

pooja said...
आचार्य जी,
अच्छा किया जो आपने खुसरो के दोहे लेकर आने को कहा, इस बहाने अमीर खुसरो की लिखी तमाम रचनाओं को पढने का सौभाग्य मिला, अब तक सब नहीं पढ़ पाई, इन्हें पढने का काम चल रहा है और अपनी दोहा यात्रा भी चल ही रही है :) , अमीर खुसरो के कुछ दोहे , चुन कर ले आई ---
अंगना तो परबत भयो, देहरी भई विदेस।
जा बाबुल घर आपने, मैं चली पिया के देस।।

अँगना तो परबत भयो, दहरी भई बिदेस.
जा बाबुल घर आपने, चली पिया के देस..

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय।
वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।
तीसरे चरण में एक मात्रा गिरेगी.

खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय।
कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहि होत सहाय।।

दोहों के प्रकार समझने में अब तक कठिनाई हो रही है, पर हार नहीं मानी है, कोशिश जारी है, जैसे ही समझ में आ जायेंगे, उदाहरण के साथ फिर हाजिर हो जाउंगी.

पूजा जी! आपका परिश्रम और लग्न सराहनीय है। आपका प्रयास अन्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा. पुराने दोहाकारों के दोहों की मात्रा गणना (तकतीअ) करते हुए प्रक्षिप्त शब्दों को खोज कर अलग कर दें। शीघ्रता न करें। दोहा पढ़ती-लिखती रहें...अपने-आप उनकी लय का अंतर समझने लगेंगी. अस्तु...



दोहा गोष्ठी ९ -दोहा की सीमा नहीं


दोहा की सीमा नहीं, कहता है सच देव।
जो दोहा का मीत हो, टरै न उसकी टेव।

रीति-नीति, युगबोध नव, पूरा-पुरातन सत्य.
सत-शिव-सुन्दर कह रहा, दोहा छंद अनित्य।

दोहा के पद अंत में, होता अक्षर एक।
दीर्घ और लघु को रखें, कविजन सहित विवेक।

खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चलाय।
आया कुत्ता खा गया, बैठी ढोल बजाय।

ला, पानी पिला।
अमीर खुसरो ने उक्त दोहा पढ़कर पानी माँगा. आजकल हास्य कवि दुमदार दोहे सुनते हैं. पहला दुमदार दोहा रचने का श्रेय खुसरो को है. नीलम जी! आपने दोहा ठीक बूझा पर जिस रूप में लिखा उसमें चौथे चरण में ११ के स्थान पर १२ मात्राएँ हैं. सम पदों के अंत में समानाक्षर जरूरी है. उक्त रूप इन दोषों से मुक्त है. मनु जी ने भी सही कहा है.

शत-शत वंदन आपका, दोहा बूझा ठीक.
नीलम-मनु चलती रहे, आगे भी यह लीक.
शन्नो जी! स्वागत करे, हँस दोहा-परिवार.
पूर्व पाठ पढ़, कीजिये, दोहा पर अधिकार.


दोहा में दो पद (पंक्ति), चार चरण, १३-११ पर यति (विराम) विषम पदों ( १, ३ ) के आरम्भ में एक शब्द में जगण ( लघु गुरु लघु = १ २ १ ) वर्जित तथा सम पदों के अंत में लघु गुरु (१ २) के साथ समान अक्षर होना जरूरी है. इन आधारों पर खरा ण होने के कारण निम्न पंक्तियाँ दोहा नहीं हैं, उन्हें द्विपदी (दोपदी) कह सकते है. कुछ परिवर्तन से उन्हें दोहा में ढाला जा सकता है.

'अंगना में बहू ढोल बजावे = १७ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
और सासू चरखा रही चलाइ = १८ मात्राएँ, ११ होना जरूरी
चुप्पे से कुत्ता गओ रसोई में = २० मात्राएँ, १३ होना जरूरी
और खीर गओ सब खाइ.' = १४ मात्राएँ, ११ होना जरूरी

एक प्रयोग देखिये -

चरखा- ढोल चला-बजा, सास-बहू थीं लीन.
घुस रसोई में खीर खा, श्वान गया सुख छीन.


मैंने एक और दोहा लिख लिया है. उत्सुकता है इसके बारे में भी जानने की कि कैसा लिखा है. कृपया बताइये.

'खीर देखि लार गिरावे = १४ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
बैठो कुत्ता एक चटोर = १५ मात्राएँ, ११ होना जरूरी
घर्र-घर्र चरखा चले = १३ मात्राएँ, सही
ढोलक लुढ़की एक ओर.' = १४ मात्राएँ, ११ होना जरूरी

लार गिरा चट खीरकर, भागा श्वान चटोर.
घर्र-घर्र चरखा चले, ढोल पडी इक ओर.
शन्नो जी के मन जगी, दोहा सृजन उमंग.
झट-पट कुछ दोहा रचें, हुलसित भाव-तरंग.


'चरखा और ढोल धरे आँगन में = १९ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
और खीर भरो कटोरा पास = १७ मात्राएँ, ११ होना जरूरी
एक कुत्ता घर में कूँ-कूँ करे = १८ मात्राएँ, १३ होना जरूरी
मन में लगी खीर की आस.' = १५ मात्राएँ, १३ होना जरूरी

देख ढोल चरखा सहित, खीर-कटोरा पास.
आँगन में कूँ-कूँ करे, कुत्ता लेकर आस.


Dr. Smt. ajit gupta said...
ज्ञान बड़ा संसार में
21 12 221 2 = 13
शक्तिहीन धनवान
2121 1121 = 11
पुस्‍तक है प्रकाश पुंज
211 2 121 21 = 13
जीवन बने महान।
211 12 121= 11

अजित जी! बधाई, आपने मात्रा-संतुलन पूरी तरह साध लिया है किन्तु तीसरी पंक्ति में लय में कुछ दोष है. इसे पहली पंक्ति की तरह कीजिये....ज्ञान पुंज पुस्तक गहें,

अवनीश एस तिवारी
झटपट खा दौडा कुत्ता
११११ २ २२ १२ =13
चरखे पर का खीर
११२ 11 २ २१ = ११
ढोल बजाओ अब सभी,
२१ १२२ ११ १२ = १३
फूट गयी तकदीर
२१ १२ ११२१ = ११
अवनीश जी! एक अच्छी कोशिश के लिए शाबास. कुत्ता = कुत + ता = २ + २ = ४, पहली पंक्ति में मात्राएँ १४ हैं, १३ चाहिए. 'दौड़ा कुत्ता खा गया' या इसी तरह की पंक्ति रखें.


पूजा जी! ने कर दिया, सचमुच आज कमाल.
होली के रंग में लिखा, दोहा मचा धमाल.

होली के रंग में रंगी, दोहा गोष्ठी विशेष ,
२२ २ ११ २ १२ २२ २२ १२१
वीर गाथा कहें सलिल, सुनें सभी अनिमेष
२१ २२ १२ १११ 12 १२ ११२१ .

तीसरे चरण को 'कहें वीर-गाथा 'सलिल' करने से लय ठीक बन जाती है.
तपन जी! आप और अन्य सभी की भावनाओं का सम्मान करते हुए मैं आपके साथ हूँ जब तक आप चाहें... 'एक कहे दूजे ने मानी, कहे कबीरा दोनों ज्ञानी.'

टिप्प्णी नहीं कर पाते, पढ़ते तो हम रहते है,
आप जाने की कहते हैं, हम परिवार कहते हैं


इस तरह कहें तो दोहा हो जायेगा-

भले न करते टिप्पणी, पढ़ने को तैयार.
आप न जाने को कहें, बना रहे परिवार.


दोहा गाथा से जुड़े सभी साथियों के प्रति आभार कि वे सब दोहा को अंगीकार कर रहे हैं. कठिनाई और असफलता से न डरें, याद रखें - 'गिरते हैं शह सवार ही, मैदाने जंग में. वह तिफ्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले.'

गोष्ठी के अंत में दोहा चौपाल में सुनिए एक सच्चा किस्सा-चित-पट दोनों सत्य हैं...
आपके प्रिय और अमर दोहाकार कबीर गृहस्थ संत थे. वे कहते थे 'यह दुनिया माया की गठरी', इस माया के मोह जाल से मुक्त रहकर ही वे कह सके- ' यह चादर सुर नर मुनि ओढी, ओढ़ के मैली कीनी चदरिया. दास कबीर जतन से ओढी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया.' कबीर जुलाहा थे, जो कपड़ा बुनते उसे बेचकर परिवार पलता पर कबीर वह धन साधुओं पर खर्च कर कहते ' आना खाली हाथ है, जाना खाली हाथ'. उनकी पत्नी लोई बहुत नाराज होती पर कबीर तो कबीर...लोई ने पुत्र कमाल को कपड़ा बेचने के लिए भेजना शुरू कर दिया. कमाल कपड़ा बेचकर साधुओं पर खर्च किये बिना पूरा धन घर ले आया, कबीर को पता चला तो खूब नाराज हुए. दोहा ही कबीर की नाराजगी का माध्यम बना-

'बूडा वंश कबीर का, उपजा पूत कमाल.
हरि का सुमिरन छोड़ के, घर लै आया माल.


कबीर ने कमाल को भले ही नालायक माना पर लोई प्रसन्न हुई. पुत्र को समझाते हुए कबीर ने कहा-

चलती चक्की देखकर, दिया कबीरा रोय.
दो पाटन के बीच में,. साबित बचा न कोय.


कमाल था तो कबीर का ही पुत्र, उसका अपना जीवन-दर्शन था. दो पीढियों में सोच का जो अंतर आज है वह तब भी था.कमाल ने कबीर को ऐसा उत्तर दिया कि कबीर भी निरुत्तर रह गए. यह उत्तर भी दोहे में हैं. सोचिये याद न आये तो खोजिये और बताइये वह दोहा. दोहा सही बतानेवाले को मिलेगा उपहार में एक दोहा....