समयजयी दोहा रचे, सत्-शिव-सुन्दर मूल्य.
सत्-चित-आनंद दे 'सलिल', दोहानंद अमूल्य.
आपकी पंक्तियाँ आपको ही समर्पित हैं:
अद्भुत जी! आपका स्वागत...दोहा को जितना अधिक जानेंगे उतना अधिक जानने की इच्छा होगी. दोहा तथा अन्य छंद ध्वनि-विज्ञान के नियमों पर आधारित हैं. अक्षरों के उच्चारण के स्थान तथा उनके प्रभाव को छंद-दृष्टा ऋषियों ने आत्मसात करने के बाद ही छंद की रचना की. एक विशेषता यह है जैसा बोला जाता है वैसा ही लिखा तथा पढ़ा जाता है. इस कारण अन्तरिक्ष में अन्य ग्रहों पर संभावित सभ्यताओं से संकेत-संप्रेषण के लिए विश्व के वैज्ञानिकों सर्वाधिक उपयुक्त दो भाषाएँ संस्कृत और हिन्दी मानी हैं. अस्तु...
शन्नो जी! आपमें बहुत प्रतिभा है. सहज हास्य आपकी विशेषता है...हास्य लिखना सर्वाधिक कठिन है...आप शब्द-चयन तथा गति-यति के प्रति कुछ अधिक सजग हो सकें तो हम सबको आपसे बहुत मधुर और मनोरंजक रचनाएँ मिलेंगी.
जबसे करने मैं लगी, हिन्दयुग्म पे सैर
हर दिन नयी आस मिले, अपने लगते गैर.
'पे' के स्थान पर 'पर' तथा 'नयी आस' के स्थान पर 'नव आशा' करना चाहेंगी क्या?
घर बैठे करने चली, पूरे चारों धाम
यात्रा तो चलती रहे, पैर करें आराम.
तीसरे चरण को 'मन यात्रा करता रहे' करने से अर्थ या प्रभाव में आये परिवर्तन पर ध्यान दें. शिल्प सध रहा है...अ़ब भावों की विविधता आपकी दृष्टि में आ सकें तो शब्द को औजार की तरह काम में ला सकेंगी.
मन रक्खें अपना दुरुस्त, बनें काम में चुस्त
११ २ २ १ १ २ १ २ १, १२ २ १ २ २ १ = १४, ११
चाय-शाय पीते रहें , कक्षा में न हों सुस्त.
२ १ २ १ २ २ १ २, २ २ २ १ २ २ १ = १३, १२
मन दुरुस्त अपना रखें, बनें काम में चुस्त
चाय-शाय पीते रहें, हों न वर्ग में सुस्त.
आप सहमत होंगी कि कोई भी बदलाव ऐसा नहीं जो आप न कर सकें...आवश्यकता केवल थोडा सजग होने की है. दो व्यक्तियों के पास एक जैसे कपडे हों, उनमें से एक कपडे धोकर, प्रेस कर पहने और दूसरा बिना धोये पहन ले तो किसे अधिक अच्छा कहेंगी?
कक्षा में हूँ सुस्त तो, क्या कर लेंगी आप...?
टोपी पर कर टिप्पणी, छोडेंगी निज छाप....?
जो भी लिखिए युग्म पर, सुनिए 'मनु' की बात.
अंगरेजी तज मनस में, हिंदी रखिये तात.
टोपीवाला सुन रहा, गुपचुप सारी बात.
'क्या कर लोगी?, चुनौती, बढा शीश का ताप.
टोपीवाले बता दे, गिटपिट कर मत भाग.
धमकी क्यों दी है मुझे, क्या तेरा खटराग?
अंगरेजी में बोलते हैं हिंदी के बोल.
हाय! घोर अंधेर है, बोल रहे बिन तोल
बच्चे बहुत शरारती, सब हैं धींगामस्त.
गुरु जी छुट्टी पर गए, ध्वजवाहक है पस्त.
ध्वजवाहक है पस्त, सम्हाले कक्षा कैसे?
टोपी-टोपी खेल रहे, है इच्छा जैसे.
'अजित' कहे विनती सुनिए, सब मन के सच्चे.
गुरूजी दंड न देना, अच्छे हैं सब बच्चे.
कन्धों पर डाला हुआ, सारा बोझ सम्हाल.
पोंछ पसीना- सार भी, लाईं किया कमाल.
हम निखट्टूओं का भला, किया नहीं अंदाज़.
होती तो देती हटा, मैं टोपी का ताज.
भार लिया सबसे अधिक, सचमुच किया कमाल.
नमन आपको कर रही, कितना ह्रदय विशाल?
शैतानी से त्रस्त पर, नहीं दे रहीं दंड.
नतमस्तक मैं हो रही, कर सम्मान अखंड.
टोपी वाला हो गया, बहुत अधिक उद्दंड
गुरु जी जब आयें तभी, देंगें उसको दंड.
देंगें उसको दंड, रंग में भंग कर दिया
आया बहुत देर से सबको तंग कर दिया.
डरकर 'शन्नो' कहे, लगे जो भोला-भाला
उत्तर पूरे नहीं बताता टोपीवाला.
शन्नो जी की चुहल से, है कक्षा जीवंत.
याद आई कॉलेज की, कर अंतर का अंत
जन्मकुंडली-चित्र दें, लगता यह अनिवार्य
शिरोधार्य गुरु-आज्ञा, करुँ- कठिन कुछ कार्य.
धीरे-धीरे बढायें, दोहा कक्षा आप.
अन्य ज्ञान भी दीजिये, सके सभी में व्याप.
यह दोहा कक्षा आपकी, आपके लिए, आपके द्वारा संचालित है. आप अपनी रूचि की बात करें, बीच-बीच में सीखे हुए छंद प्रयोग करते रहें और गृह कार्य यथा समय करें. आपके चाहे अनुसार हम आगे बढ़ने की गति मंद कर रहे हैं.
अवनीश जी की कुछ द्विपदियों को दोहा ध्वजवाहिका अजित जी दोहा में ढाल रही हैं.
खुसरो और कबीर के दोहे आपने खोजे, सराहे और समझे...खुसरो और कबीर दोनों सूफी मत से हैं. सूफी मत में भक्त अपनी आत्मा को प्रेमिका तथा परमात्मा को प्रेमी मानकर भक्ति करता है. इस नाते दोनों संत कवियों में श्रृंगार के दोनों पक्षों मिलन-विरह को केंद्र में रखकर की गयी रचनाएँ हैं. यह श्रृंगार द्विअर्थी है...सामान्य जन इसे लौकिक मान सकते हैं, भक्त या विद्वान् अलौकिक...दोनों के साहित्य में एक और समानता है कि वे आम आदमी की भी समझ में आजाते हैं और बड़े-बड़े ज्ञानी भी उन्हें नहीं समझ पाते. दोनों में अंतर भी बहुत हैं. कबीर फक्कड़ मेहनतकश जुलाहे थे. खुसरो के नाम के पूर्व लगा विशेषण 'अमीर' ही उनके सामाजिक स्थान और आर्थिक हैसियत का पता देता है. खुसरो शिक्षित, बहुभाषी और दरबारी थे जबकि कबीर शिक्षा से वंचित होने पर भी भाषा के अद्भुत जानकार थे. डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कबीर को भाषा का डिक्टेटर कहा है, आशय यह कि कबीर ने अनेक शब्दों को उनके प्रचलित अर्थ से भिन्न अर्थ में प्रयोग किया. खुसरो कि मुर्कियाँ और पहेलियाँ जन-जन का कंठ हार हैं तो कबीर की सखियाँ और बीजक जनगण के हृदय की धड़कन हैं. सामान्य बिम्बों और शब्दों को गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ में प्रयोग करने में दोनों का सानी नहीं. दोनों की रचनाओं को आमजन, सामान्य गायक तथा शास्त्रीय गायक अनेक रागों में गाते रहे हैं...यही दोहा सिद्ध होने का लक्षण है. जिस दोहे को कई तरीकों से गया जा सके, कोई शब्द अटकता-खटकता न लगे, वह शुद्ध दोहा है.
दोहा ध्वजवाहिका अजित जी के श्रम और लगन,.दोहा कक्षा नायिका शन्नो जी की जीवन्तता और मनु जी के दोहा-प्रेम को नमन.
अब बारी मनु जी की... मनु जी! यह पता लगायें कि क्या दोहा बहर में लिखा जा सकता है? यदि हाँ तो किस बहर में? एक ही बहर में या एक से
अधिक बहरों में? बहर के आधार पर रचे गए दोहे भी लाइए ताकि उनको समझा जा सके...
शन्नो जी! आप को यह जानकारी जुटानी है कि अंगरेजी की द्विपदियाँ (कप्लेट्स) दोहा से क्या साम्य या भिन्नता रखते हैं? कुछ उदहारण हों तो सोने में सुहागा...
इस बीच विलंब से सम्मिलित छात्र तेजी से पिछले पाठ पूरे करें ताकि साथ-साथ चल सकें. शेष फिर...






