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दोहा गाथा सनातन: 31 छयालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम


दोहा गाथा सनातन में अब तक हम दोहोंके २१ प्रकारों से परिचित हो चुके हैं. आज तथा अगली कड़ी में दो ऐसे प्रकारों की चर्चा है जो दोहा के सम चरणान्त में गुरु-लघु की सामान्यतः मान्य शर्त का पालन नहीं करते. इन में गुरु मात्रा क्रमशः १ तथा ० होती है.

आइये, हम परिचित हों उदर दोहा से-

लघु-गुरु छियालिस-एक मिल, दोहा रचते मीत.
गुरु-लघु सम चरणान्त की, खंडित होती रीत..

'उदर' न देखे रात-दिन, चाहे केवल तृप्ति.
नियम-भंग हो भले ही, चाहे नहीं अतृप्ति..

छ्यालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम.
सुषमा सुरभि बिखेरता, अपनी ललित-ललाम..

सूत्र: उदर १ गुरु + ४६ लघु = ४७ अक्षर

उदाहरण:

१.
घट-घट नित अघटित घटित, लख धक्-धक् मन मगन.
चपल चकित चित चुप 'सलिल', निरख लगन की अगन.- सलिल

२.
भरत-भरत रुचिकर लवण, उदर रहत नित तरल.
अधिक चखत उलटत सभी, लवण बनत जब गरल. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

३.
कदम-कदम अनवरत चल, अनथक नत रख नयन.
कर मधु रस वर्षण 'सलिल', मनहर कह मृदु बयन..

पाठकगण उदर दोहा की रचना करने का प्रयास करें.

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