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दोहा सलिला : दोहों की दीपावली: --संजीव 'सलिल'


दोहा सलिला :
दोहों की दीपावली: 
--संजीव 'सलिल'

दोहों की दीपावली, रमा भाव-रस खान.
श्री गणेश के बिम्ब को, अलंकार अनुमान..

दीप सदृश जलते रहें, करें तिमिर का पान.
सुख समृद्धि यश पा बनें, आप चन्द्र-दिनमान..

अँधियारे का पान कर करे उजाला दान.
माटी का दीपक 'सलिल', सर्वाधिक गुणवान..

मन का दीपक लो जला, तन की बाती डाल.
इच्छाओं का घृत जले, मन नाचे दे ताल..

दीप अलग सबके मगर, उजियारा है एक.
राह अलग हर पन्थ की, ईश्वर सबका एक..

बुझ जाती बाती 'सलिल', मिट जाता है दीप.
यही सूर्य का वंशधर, प्रभु के रहे समीप..

दीप अलग सबके मगर, उजियारा है एक.
राह अलग हर पन्थ की, लेकिन एक विवेक..

दीपक बाती ज्योति को, सदा संग रख नाथ!
रहें हाथ जिस पथिक के, होगा वही सनाथ..

मृण्मय दीपक ने दिया, सारा जग उजियार.
तभी रहा जब परस्पर, आपस में सहकार..

राजमहल को रौशनी, दे कुटिया का दीप.
जैसे मोती भेंट दे, खुद मिट नन्हीं सीप..

दीप ब्रम्ह है, दीप हरी, दीप काल सच मान.
सत-शिव-सुन्दर है यही, सत-चित-आनंद गान..

मिले दीप से दीप तो, बने रात भी प्रात.
मिला हाथ से हाथ लो, दो शह भूलो मात..

ढली सांझ तो निशा को, दीप हुआ उपहार.
अँधियारे के द्वार पर, जगमग बन्दनवार..

रहा रमा में मन रमा, किसको याद गणेश.
बलिहारी है समय की, दिया जलाये दिनेश..

लीप-पोतकर कर लिया, जगमग सब घर-द्वार.
तनिक न सोचा मिट सके, मन की कभी दरार..

सरहद पर रौशन किये, शत चराग दे जान.
लक्ष्मी नहीं शहीद का, कर दीपक गुणगान..

दीवाली का दीप हर, जगमग करे प्रकाश.
दे संतोष समृद्धि सुख, अब मन का आकाश..

कुटिया में पाया जनम, राजमहल में मौत.
आशा-श्वासा बहन हैं, या आपस में सौत?.

पर उन्नति लख जल मरी, आप ईर्ष्या-डाह.
पर उन्नति हित जल मरी, बाती पाई वाह..

तूफानों से लड़-जला, अमर हो गया दीप.
तूफानों में पल जिया, मोती पाले सीप..

तन माटी का दीप है, बाती चलती श्वास.
आत्मा उर्मिल वर्तिका, घृत अंतर की आस..

जीते की जय बोलना, दुनिया का दस्तूर.
जलते दीपक को नमन, बुझते से जग दूर..

मातु-पिता दोनों गए, भू को तज सुरधाम.
स्मृति-दीपक बालकर, करता 'सलिल' प्रणाम..

जननि-जनक की याद है, जीवन का पाथेय.
दीप-ज्योति में बस हुए, जीवन-ज्योति विधेय..

नन्हें दीपक की लगन, तूफां को दे मात.
तिमिर रात का मिटाकर, 'सलिल' उगा दे प्रात..

दीप-ज्योति तन-मन 'सलिल', आत्मा दिव्य प्रकाश.
तेल कामना को जला, तू छू ले आकाश..


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दोहा गाथा सनातन: 39 छंद विमल ध्वनि है मधुर


दोहों की दीपावली

दोहों की दीपावली, रमा भाव-रस खान.
श्री गणेश के बिम्ब को, 'सलिल' सार अनुमान..

दीप सदृश जलते रहें, करें तिमिर का पान.
सुख समृद्धि यश पा बनें, आप चन्द्र-दिनमान..

अँधियारे का पान कर करे उजाला दान.
माटी का दीपक 'सलिल', सर्वाधिक गुणवान..

मन का दीपक लो जला तन की बाती डाल.
इच्छाओं का घृत जले, मन नाचे दे ताल..

दीप अलग सबके मगर, उजियारा है एक.
राह अलग हर पन्थ की, ईश्वर सबका एक..

बुझ जाती बाती 'सलिल', मिट जाता है दीप.
किन्तु सूर्य का वंशधर, प्रभु के रहे समीप..

दीप अलग सबके मगर, उजियारा है एक.
राह अलग हर पन्थ की, लेकिन एक विवेक..

दीपक बाती ज्योति को, सदा संग रख नाथ!
रहें हाथ जिस पथिक के, होगा वही सनाथ..

मृण्मय दीपक ने दिया, सारा जग उजियार.
तभी रहा जब परस्पर, आपस में सहकार..

राजमहल को रौशनी, दे कुटिया का दीप.
जैसे मोती भेंट दे, खुद मिट नन्हीं सीप..

दीप ब्रम्ह है, दीप हरी, दीप काल सच मान.
सत-शिव-सुन्दर है यही, सत-चित-आनंद गान..

मिले दीप से दीप तो, बने रात भी प्रात.
मिला हाथ से हाथ लो, दो शह भूलो मात..

ढली सांझ तो निशा को, दीप हुआ उपहार.
अँधियारे के द्वार पर, जगमग बन्दनवार..

रहा रमा में मन रमा, किसको याद गणेश.
बलिहारी है समय की, दिया जलाये दिनेश..

लीप-पोतकर कर लिया, जगमग सब घर-द्वार.
तनिक न सोचा मिट सके, मन की कभी दरार..

सरहद पर रौशन किये, शत चराग दे जान.
लक्ष्मी नहीं शहीद का, कर दीपक गुणगान..

दीवाली का दीप हर, जगमग करे प्रकाश.
दे संतोष समृद्धि सुख, अब मन का आकाश..

कुटिया में पाया जनम, राजमहल में मौत.
आशा-श्वासा बहन हैं, या आपस में सौत?.

पर उन्नति लख जल मरी, आप ईर्ष्या-डाह.
पर उन्नति हित जल मरी, बाती पाई वाह..

तूफानों से लड़-जला, अमर हो गया दीप.
तूफानों में पल जिया, मोती पाले सीप..

तन माटी का दीप है, बाती चलती श्वास.
आत्मा उर्मिल वर्तिका, घृत अंतर की आस..

जीते की जय बोलना, दुनिया का दस्तूर.
जलते दीपक को नमन, बुझते से जग दूर..

मातु-पिता दोनों गए, भू को तज सुरधाम.
स्मृति-दीपक बालकर, करता 'सलिल' प्रणाम..

जननि-जनक की याद है, जीवन का पाथेय.
दीप-ज्योति में बस हुए, जीवन-ज्योति विधेय..

नन्हें दीपक की लगन, तूफां को दे मात.
तिमिर रात का मिटाकर, 'सलिल' उगा दे प्रात..

दीप-ज्योति तन-मन 'सलिल', आत्मा दिव्य प्रकाश.
तेल कामना को जला, तू छू ले आकाश..

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आइये! मिलें दोहा परिवार के अगले सदस्य विमल ध्वनि से.

कुंडली, छप्पय, अमृत ध्वनि आदि की तरह विमलध्वनि में भी छः पंक्तियाँ (पद) होते हैं. प्रथम दो पद दोहा ही होता है. ३२-३२ मात्राओं के शेष चार पदों में सोलह-सोलह मात्राओं पर यति होती है.

छंद क्षीरधिकार ॐप्रकाश बरसैयां 'ॐकार' पदांत में तीन लघु होना अनिवार्य मानते हैं जबकि मेकलसुता संपादक कृष्ण स्वरूप शर्मा 'मैथिलेन्द्र' ऐसा कोई बंधन जरूरी नहीं मानते.

बत्तिस मात्री चार पद, सोलह पर यति संग.
हों पदांत में तीन लघु, दोहा-बाद अभंग..
छंद विमल ध्वनि है मधुर, कहीं न हो रस-भंग.
रच-पढ़कर आनंद ले, 'सलिल' काव्य की गंग..

उदाहरण:

१.
चमकत सारस-पंख सित, दमकत भानु प्रचंड.
झज्झज्झज्झहरात झर, झरना झुक भूखंड..
खंडज्ज्ल ढल, धध्धध्धावत, छछ्छछ्छहरत घघ्घघ्घहरत.
बब्बब्बरसत, सस्सस्सरसत, जज्जज्जनहित लल्लल्लहरत..
खख्खख्खनडत, पप्पप्पत्थर, कक्कक्कणकण, सस्सस्सरकत.
मम्मम्माझी, गग्गग्गावत, शस्शस्शफ़री, चच्चच्चमकत..
माझी = केवट, शफरी = मछली. -ॐप्रकाश बरसैयां 'ॐकार'

२.
हौले आवत हुलसकर, भँवरे हुए मतंग.
चुन-चुन कलियों के निकट, लगे जमाने रंग..
रंग जमावत, गुन-गुन गावत, अंग छुवावत करत ठिठोली.
देह दिखावट नैन चलावत, नेह लगावत, धरत बंहोली..
उड़-उड़ जावत, मुड़-मुड़ आवत, इत-उत-धावत, छाँड़त टोली.
तन पुलकावत, मन हुलसावत, रास रचावत, आवत होली.. -शिवशरण दुबे

३.
मात-पिता दोनों गए, हैं जबसे सुरलोक.
अन्धकार सा छा गया, दिखे नहीं आलोक..
कुछ न सुहाता, कुछ नहिं भाता, मन पछताता,पंथ भुलाता.
ध्यान लगाता, ज्ञान भुलाता, नित अकुलाता, रो-खो जाता..
कुछ झुँझलाता, कुछ भरमाता, चैन गँवाता, नैन भिगाता.
उठ-गिर जाता, थक-चुक जाता, मोह लगाता, निठुर रुलाता..

पाठक उक्त २ के अनुसार विमलध्वनि छंद की रचना का प्रयास करें.

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दोहा गाथा सनातन: 38 अमृतध्वनि मन मोहती


दोहा गाथा सनातन: ३८

अमृतध्वनि मन मोहती



दोहा परिवार के छंदों में सोरठा, रोला, कुंडली, दोही, बरवै, उल्लाला तथा सरसी से साक्षात् के पश्चात् आज मिलते हैं 'अमृतध्वनि' से.

अमृतध्वनि भी कुंडली की तरह षटपदी (६ पंक्तियों का) छंद है. इसकी प्रथम दो पंक्तियाँ दोहा तथा शेष ४ पंक्तियों में ८-८ मात्राओं के ३ समूह होते हैं जिनमें यमक और अनुप्रास के प्रयोग से एक विशिष्ट ध्वनि उत्पन्न होती प्रतीत होती हैं. अमृत ध्वनि का प्रथम और अंतिम शब्द एक सा होता है किन्तु आधुनिक कवि इसका पालन कम ही करते हैं.

उदाहरण:

१.
झुक-झूमकर वृक्ष सब, रहे लताएँ चूम.
ऊँची हो-होकर सभी, रही लताएँ लूम.
लूम लताएँ, शोर मचाएँ, पेड़ हिलाएँ.
आगे आएँ, पीछे जाएँ, ना शर्माएँ.
आनेवाले-जानेवाले घूम-घूमकर-
दृश्य निहारें, खुद को वारें, झूम-झूमकर.
-गिरिमोहन गिरि

२.

पावस है वरदान सम, देती नीर अपार.
हर्षित होते हैं कृषक, फसलों की भरमार.
झर-झर पानी, करत किसानी, कीचड़-सानी.
वारिद गर्जनि, चपला चमकनि, टप-टप पानी.
दान निरावैं, कजरी गावैं, बीती 'मावस.
हर्षित मन-मन पुलकित तन-तन, आयी पावस.
- मनोहर शर्मा 'माया'

३.
जूता-चप्पल चलत हैं, संसद में भी आज.
गाली घूँसा लात सब, नेतन छोडी लाज.
नेतन छोडी लाज आज तो किसकी मानें.
रार मचाते, नित इठलाते, का सब थाने.
'हरकिंकर' कब डरहैं ये सब, हैं यमदूता.
जनता मरवै, देश बिखरवै, तजें न जूता.
-रामसेवक पाठक 'हरिकिंकर'

४.
पिता बिदा होकर बसे, क्या तारों के बीच.
हर दिन मैं खोजूँ उन्हें, अंसुअन धरती सींच.
अंसुअन धरती सींच उगाऊँ फसल स्नेह की.
मातृभूमि हित कुर्बानी दी विहँस देह की.
पूजी तीरथ कहकर वीर शहीद की चिता.
धरती को मैया कह नभ को कहा है पिता..
- सलिल

५.
जलकर भी तम हर रहे, चुप रह मृतिका-दीप.
मोती पाले गर्भ में, बिना कुछ कहे सीप.
सीप-दीप से हम मनुज तनिक न लेते सीख.
इसीलिए तो स्वार्थ में लीन पड़ रहे दीख.
दीप पर्व पर हों संकल्पित रह हिल-मिलकर.
दें उजियारा आत्म-दीप बन निश-दिन जलकर.
- सलिल

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दोहा गाथा सनातन : ३५


दोहा गाथा सनातन : ३५

उल्लाला रचना सहज

उल्लाला रचना सहज, चरण समाहित चार.
तेरह मात्रा सभी में, दो पद लिए निखार..

तेरह मात्री दो पदी, मात्रा बंधन मुक्त.
उल्लाला लिखना 'सलिल' , भाव सरित उन्मुक्त..

उल्लाला छंद में दो पदों में चार चरण होते हैं.

हर चरण में तेरह मात्राएँ होती हैं.

पदों के अंत में लघु-गुरु मात्रा-बंधन न होने से इनकी रचना सरल होती है.

उदाहरण:

१.
राष्ट्र-हितैषी धन्य हैं, निर्वाहा औचत्य को.
नमन करुँ उनको सदा, उनके शुचि साहित्य को..

२.
पूज्य पिता को खो दिया, मैं अनाथ हूँ नाथ अब.
सूनी लगती सृष्टि यह, जगमग कहते जिसे सब..-सलिल

३.
कौन किसी का है सगा, पल में देते छोड़ क्यों?
हम माटी के खिलौने, हरि रच देते तोड़ क्यों??

आप उल्लाला रचें और मैं कल २२ सितम्बर को प्रातः ३.४० पर अपने पूज्य पिताश्री के निधन से उपजे शोक को पचाने का प्रयास करता हूँ.

विलंब हेतु क्षमाप्रार्थी हूँ.

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दोहा गाथा सनातन: 31 छयालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम


दोहा गाथा सनातन में अब तक हम दोहोंके २१ प्रकारों से परिचित हो चुके हैं. आज तथा अगली कड़ी में दो ऐसे प्रकारों की चर्चा है जो दोहा के सम चरणान्त में गुरु-लघु की सामान्यतः मान्य शर्त का पालन नहीं करते. इन में गुरु मात्रा क्रमशः १ तथा ० होती है.

आइये, हम परिचित हों उदर दोहा से-

लघु-गुरु छियालिस-एक मिल, दोहा रचते मीत.
गुरु-लघु सम चरणान्त की, खंडित होती रीत..

'उदर' न देखे रात-दिन, चाहे केवल तृप्ति.
नियम-भंग हो भले ही, चाहे नहीं अतृप्ति..

छ्यालिस लघु गुरु एक ले, दोहा उदर सुनाम.
सुषमा सुरभि बिखेरता, अपनी ललित-ललाम..

सूत्र: उदर १ गुरु + ४६ लघु = ४७ अक्षर

उदाहरण:

१.
घट-घट नित अघटित घटित, लख धक्-धक् मन मगन.
चपल चकित चित चुप 'सलिल', निरख लगन की अगन.- सलिल

२.
भरत-भरत रुचिकर लवण, उदर रहत नित तरल.
अधिक चखत उलटत सभी, लवण बनत जब गरल. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

३.
कदम-कदम अनवरत चल, अनथक नत रख नयन.
कर मधु रस वर्षण 'सलिल', मनहर कह मृदु बयन..

पाठकगण उदर दोहा की रचना करने का प्रयास करें.

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दोहा गाथा सनातन: 27 ठुमक-ठुमक अहिवर चले


सूत्र:

अहिवर दोहा - ५ गुरु ३८ लघु = ४३ अक्षर

परिभाषा:

दोहा परिवार का यह सदस्य 'ठुमक-ठुमक रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ' की स्मृति जगाता है.

अहिवर दोहे को पढ़ते समय यही प्रतीत होता है कि कोई नटखट नन्हा ठुमकता-मचलता चला जा रहा है.

अहिवर दोहे में ५ गुरु तथा ३८ लघु कुल ४३ अक्षर होते हैं. इस दोहे की रचना करते समय प्रारंभ में यथासंभव बिना मात्रा के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए.

उदाहरण:

१.
लटकि-लटकि लटकत चलत, डटल मुकुट की छांह.
टक भइयौ नटु मिलि गयौ, अटक-भटक बन मांह. -महाकवि बिहारी

२.
पाटल-दल सम अधर पर, तिल मधुकर रस-लीन.
लख तिल-तिल दिल जल रहा, घृत बिन दीपक दीन. -सलिल

३.
बढ़त-बढ़त सम्पति सलिल, मन-सरोज बढ़ि जाय.
घटत-घटत पुनि नहिं घटत, बरु समूल कुम्हिलाय.

४.
कवि मन सावन सघन घन, कवि मानस जलधार.
उमड़-घुमड़ बरसात सतत, चल-चल सबके द्वार. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

५.
नटखट झटपट लपटकर, मधुर-मधुर कह बैन.
डगमग-डगमग पग रखे, माँ परवश बेचैन.. -सलिल

६.
जनप्रतिनिधि बनकर 'सलिल', पद-मद चखकर चूर.
जनगण-मन आहत अगर, सपने चकनाचूर..

७.
हम-तुम, यह-वह, सकल जग, विधि-हरि-हर का खेल.
उसकी मन-मरजी 'सलिल', शुभ कह, हँसकर झेल..

अहिवर दोहे रचना जटिल है. अतः, अपेक्षकृत कम दोहाकार इन्हें रच पाते हैं.

इस लेखमाला के नियमित पाठक इस चुनौती को स्वीकार कर अपने तथा दोहे अन्यों के दोहे भेजें.

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