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दोहा गाथा सनातन: 44 - रोला-उल्लाला रचें मिलकर छप्पय छंद


रोला-उल्लाला रचें मिलकर छप्पय छंद.
ग्यारह-पन्द्रह विषम, सम तेरह दें आनंद..

छप्पय छन्द कुण्डली की तरह छह पंक्तियों / पदों का संयुक्त छंद है. इसकी प्रथम चार पंक्तियाँ रोला की तथा अंतिम दो पंक्तियाँ उल्लाला की होती हैं. रोला में ११-१३ पर यति (विराम) होती है जबकि उल्लाला में १५-१३ पर. इस प्रकार चप्पे की प्रथम चार पंक्तियों में विषम चरणों में ११ कलायें / मात्राएँ होती हैं जबकि शेष दो पंक्तियों के विषम चरणों में १५ कलायें होती हैं. सभी ६ पंक्तियों में सम चरणों में १३ कलायें होती हैं.

उदाहरण:

१. नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है.
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है.
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है. - रोला
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की.
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की.. -उल्लाला

२. पा अनंत अमरत्व , कर गए नाम धरा में.
गए जोड़ अपनत्व काव्य की परंपरा में.
किये प्राण उत्सर्ग, लहू को खाद बनाया.
खिलें न्याय-श्रम-सुमन, देश पर शीश चढ़ाया. -रोला
वे राष्ट्र-हितैषी धन्य हैं, निर्वाहा कर्त्तव्य को.
निज जीवन देकर सँवारा, भारत के भवितव्य को. -उल्लाला

३. व्यर्थ न कर अभिमान, एक दिन मिट जाना है.
राजा हो या रंक, न कोई बच पाना है.
आया खाली हाथ, हाथ खाली जाएगा.
तजा न जिसने लोभ, 'सलिल' वह पछतायेगा. -रोला
करते सब ग्रन्थ निषेध हैं, हिंसा लालच क्रोध का.
भव-सागर से तरेगा जब, पथ पकड़ेगा बोध का. -उल्लाला

दोहा गाथा सनातन: 27 ठुमक-ठुमक अहिवर चले


सूत्र:

अहिवर दोहा - ५ गुरु ३८ लघु = ४३ अक्षर

परिभाषा:

दोहा परिवार का यह सदस्य 'ठुमक-ठुमक रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ' की स्मृति जगाता है.

अहिवर दोहे को पढ़ते समय यही प्रतीत होता है कि कोई नटखट नन्हा ठुमकता-मचलता चला जा रहा है.

अहिवर दोहे में ५ गुरु तथा ३८ लघु कुल ४३ अक्षर होते हैं. इस दोहे की रचना करते समय प्रारंभ में यथासंभव बिना मात्रा के शब्दों का प्रयोग करना चाहिए.

उदाहरण:

१.
लटकि-लटकि लटकत चलत, डटल मुकुट की छांह.
टक भइयौ नटु मिलि गयौ, अटक-भटक बन मांह. -महाकवि बिहारी

२.
पाटल-दल सम अधर पर, तिल मधुकर रस-लीन.
लख तिल-तिल दिल जल रहा, घृत बिन दीपक दीन. -सलिल

३.
बढ़त-बढ़त सम्पति सलिल, मन-सरोज बढ़ि जाय.
घटत-घटत पुनि नहिं घटत, बरु समूल कुम्हिलाय.

४.
कवि मन सावन सघन घन, कवि मानस जलधार.
उमड़-घुमड़ बरसात सतत, चल-चल सबके द्वार. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'

५.
नटखट झटपट लपटकर, मधुर-मधुर कह बैन.
डगमग-डगमग पग रखे, माँ परवश बेचैन.. -सलिल

६.
जनप्रतिनिधि बनकर 'सलिल', पद-मद चखकर चूर.
जनगण-मन आहत अगर, सपने चकनाचूर..

७.
हम-तुम, यह-वह, सकल जग, विधि-हरि-हर का खेल.
उसकी मन-मरजी 'सलिल', शुभ कह, हँसकर झेल..

अहिवर दोहे रचना जटिल है. अतः, अपेक्षकृत कम दोहाकार इन्हें रच पाते हैं.

इस लेखमाला के नियमित पाठक इस चुनौती को स्वीकार कर अपने तथा दोहे अन्यों के दोहे भेजें.

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