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दोहा गाथा सनातन: 15- रम जा दोहे में तनिक


रम जा दोहे में तनिक, मत कर चित्त उचाट.
ध्यान अधूरा यदि रहा, भटक जायेगा बाट..
दोहा की गति-लय पकड़, कर किंचित अभ्यास.
या मात्रा गिनकर 'सलिल', कर लेखन-अभ्यास..
भ्रमर सुभ्रामर से मिले, शरभ-श्येन को जान.
आज मिलें मंडूक से, मरकत को पहचान..
अट्ठारह-बारह रहें, गुरु-लघु हो मंडूक.
सत्रह-चौदह से बने, मरकत करें न चूक..


१८/१२ - मंडूक

जाको राखे साइयाँ, मार सके ना कोय.
बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय..
राम निकाई रावरी, है सभी कौ नीक.
जो यह साँची है सदा, तौ नीकौ तुलसीक..
संत तुलसीदास

का भाषा का संस्कृत, प्रेम चाहिए साँच.
काम जु आवै कामरी, का लै करै कमाँच..
संत तुलसीदास

पिय को जिय जासो रमै, सोई ज्येष्ठा होइ.
आनि कनिष्ठा जानिए, कहै सयाने लोइ..
तोष कवि

बानी तो पानी भरै, चारू बेद मजूर.
करनी तो गारा करै, साहब का घर दूर..
-कबीर

दोहा में होता सदा, युग का सच ही व्यक्त.
देखे दोहाकार हर, सच्चे स्वप्न सशक्त..
- सलिल

कोई नहीं विकल्प हो, फिर भी एक विकल्प.
पूरी श्रृद्धा से करुँ, मैं प्रार्थना अनल्प..
- चंद्रसेन 'विराट'

१७/१४ - मरकत

कागा का को धन हरे, कोयल का को देय.
मीठी बानी बोल के, जग बस में कर लेय..
रूप नहीं रेखा नहीं, नाहीं है कुल-गोत.
बिन देही का साहिबा, झिलमिल देखूं जोत..
- संत सिंगाजी

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय.
माली सींचै सौ घडा, ऋतु आये फल होय..
-स्वामी प्राणनाथ

कानों में अब शूल सी, चुभती मंद बयार.
खेतों में दिखने लगा, श्वेत कपासी प्यार..
अशोक गीते

मोह एक आसक्ति है, और प्रेम है मुक्ति.
जहाँ मुक्ति होती नहीं, वहां सिर्फ पुनरुक्ति..
-सुरेश उपाध्याय

द्वार खुले ही रह गए, तूने दिया न ध्यान.
क्यों तेरे घर में नहीं, घुस आएगा श्वान?.
- डॉ. अनंत राम मिश्र 'अनंत'

चहरों की होती नहीं, अपने से पहचान.
दर्पण भी अंधा हुआ, है खुद से नादान..
डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी

दोहा दरबार के २३ रत्नों में से ६ से आपका परिचय हो चुका है. इनके जितना निकट आयेंगे उतना ही अधिक आनंद आएगा.

गृह कार्य:

१. उक्त ६ प्रकार के दोहों को बार-बार पढें यह देखें कि इनकी लय में क्या अंतर है? लय को पकड़ सकें तो बिना मात्रा गिने भी इन्हें लिख सकेंगे.

२. खुसरो को दोहों की विशेषता बताइये. ये दोहे आपको क्यों पसंद हैं अथवा क्यों पसंद नहीं हैं? गोष्टी में इस बिंदु पर चर्चा करना उपयोगी होगा.

३. आप में से हर एक कबीर का कम से कम एक-एक दोहा लाये और कबीर तथा खुसरो के दोहों की भाषा तथा कथ्य पर ध्यान देकर अपनी बात टिप्पणी में दे.

४. ऊपर विविध समयों के दोहकारों के दोहे दिए गए हैं. समकालिक दोहकारों को आप भाषा और कथ्य से जान लेंगे. उनकी कहन और कथन पर ध्यान दें. इससे आज के दोहों का शिल्प और भाव समझने में मदद मिलेगी.

दोहों का पत्राचार और टिप्पणी में प्रयोग कीजिये. सोरठा, रोला और कुण्डली का अभ्यास करते रहिये.
अब एक सलाह दीजिये कि इस दोहा गाथा को इसी तरह चलने दिया जाए, संक्षिप्त कर समाप्त किया जाए या आगे और गहराई में उतरा जाये? यह आपकी, आपके लिए, आपके द्वारा है. आपमें से बहुमत जैसा चाहेगा वैसा ही रूपाकार रखा जायेगा. यह उबाऊ हो रहा हो तो भी निस्संकोच संकेत करें.

अब कक्षा समाप्त करने के पूर्व दोहा छुपल में सुनिए एक और सच्चा किस्सा:

रज्जब तू गज्जब किया...निर्गुण पंथ से सादृश्यता रखते दादूपंथ के संस्थापक संत दादू दयाल (संवत १६०१, अहमदाबाद- संवत १६६०, नारना, जयपुर) साबरमती नदी में शिशु के रूप में बहते हुए लादी राम नामक ब्राम्हण को मिले थे. दादू के दोहों में हिंदी, गुजराती, राजस्थानी तथा पंजाबी का प्रयोग हुआ है. इनकी विषय वास्तु अलौकिक प्रेम तत्व की सरस व्यंजनासतगुरु महिमा, ईश्वर की व्यापकता, भौतिक जग की क्षण भंगुरता तथा आत्म बोध है. दादू के कुछ दोहो का आनंद लीजिये-

घीव दूध में रमि रहा, व्यापक सब ही ठौर.
'दादू' बकता बहुत है, माथि काढे ते और..
साध मिलै तब ऊपजै, हिरदै हरि की प्यास.
'दादू' संगत साधू की, अविगत पावै आस..
'दादू' देख दयाल को, सकल रहा भरपूर.
रोम-रोम में रमि रह्या, तू जनि जाने दूर..
केते पारिख पच मुए, कीमती कही न जाइ.
'दादू' सब हैरान हैं, गूंगे का गुड खाइ.
जब मन लागे राम सौं, अनत काय को जाइ.
'दादू' पाणी-लूण ज्यों, ऐसे रही समाइ..


दादू के प्रमुख ५२ शिष्यों में से एक आमेर शहर के निवासी रज़्ज़ब भी थे. दादू बहर यात्रा पर गए तो घरवालों ने अपनी मुहब्बत का वास्ता देकर रज़्ज़ब को विवाह के लिए मजबूर कर दिया. बेमन से रज़्ज़ब को जमा पहनकर, सर पर सेहरा बांधकर मौर सजाये घोडे पर बैठना पड़ा. उन्होंने बहुत कोशिश की कि बच सकें पर उनकी एक न चली. तब उन्होंने अपने गुरु दादू को याद किया. गुरु शिष्य की पुकार कैसे अनसुनी करते? रज़्ज़ब बारात के साथ गाजे-बजे के साथ जा रहे थे कि अचानक गुरु दादू दिखाई पड़े. रज़्ज़ब ने गोदे पर बैठे-बैठे ही गुरु को प्रणाम किया. दादू ने आशीष देते हुए उच्चस्वर में एक दोहा कहा जिसे सुनते ही रज़्ज़ब सेहरा फेंककर घोडे से कूदकर आँखों में आँसू भरे हुए गुरु के श्री चरणों में लोटने लगा. गुरु ने उसे उठाकर ह्रदय से लगाया और दीक्षा दी, कोई रोक नहीं पाया. रज़्ज़ब को सांसारिक मोह-जाल से बचाकर भक्ति-मार्ग पर ले जानेवाला दोहा सुनिए-

रज़्ज़ब तू गज्ज़ब किया, सर पर बांधा मौर.
आया था हरि-भजन को, जाता है किस ओर..


कालांतर में रज़्ज़ब खुद भी सिद्ध संत हुए. उनका भी एक दोहा पढिए-

रज़्ज़ब जाकी चाल सों, दिल न दुखाया जाय.
जहाँ खलक खिदमत करे, उत है खुसी खुदाय..
निराकार-निर्गुण भजै, दोहा खोजे राम.
गुप्त चित्र ओंकार का, चित में रख निष्काम..



दोहा गोष्ठी ३ : दोहा सबका मीत है


दोहा सबका मीत है, सब दोहे के मीत.
नए साल में नेह की, 'सलिल' नयी हो नीत.

सुधि का संबल पा बनें, मानव से इन्सान.
शान्ति सौख्य संतोष दो, मुझको हे भगवान.

गुप्त चित्र निज रख सकूँ, निर्मल-उज्ज्वल नाथ.
औरों की करने मदद, बढ़े रहें मम हाथ.

कबीर
नए साल में आपको, मिले सफलता-हर्ष.
नेह नर्मदा नित नहा, पायें नव उत्कर्ष.

नए वर्ष की रश्मि दे, खुशियाँ कीर्ति समृद्धि.
पा जीवन में पूर्णता, करें राष्ट्र की वृद्धि.

जन-वाणी हिन्दी बने, जग-वाणी हम धन्य.
इसके जैसी है नहीं, भाषा कोई अन्य.

'सलिल' शीश ऊंचा रखें, नहीं झुकाएँ माथ.
ज्यों की त्यों चादर रहे, वर दो हे जगनाथ.


दोहा गोष्ठी में दोहा रसिकों का स्वागत.

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब.
पल में परलय होयेगी, बहुरि करेगो कब्ब.

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर.
पंछी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर.

दोहे रचे कबीर ने, शब्द-शब्द है सत्य.
जन-गण के मन में बसे, बनकर सूक्ति अनित्य.

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय.
टूटे तो फ़िर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय.


दोहा संसार के राजपथ से जनपथ तक जिस दोहाकार के चरण चिह्न अमर तथा अमिट हैं वह हैं कबीर ( संवत १४५५ - संवत १५७५ )। कबीर के दोहे इतने सरल की अनपढ़ इन्सान भी सरलता से बूझ ले, साथ ही इतने कठिन की दिग्गज से दिग्गज विद्वान् भी न समझ पाये। हिंदू कर्मकांड और मुस्लिम फिरकापरस्ती का निडरता से विरोध करने वाले कबीर निर्गुण भावधारा के गृहस्थ संत थे। कबीर वाणी का संग्रह बीजक है जिसमें रमैनी, सबद और साखी हैं।

रहीम
मुगल सम्राट अकबर के पराक्रमी अभिभावक बैरम खान खानखाना के पुत्र अब्दुर्रहीम खानखाना उर्फ़ रहीम ( संवत १६१० - संवत १६८२) अरबी, फारसी, तुर्की, संस्कृत और हिन्दी के विद्वान, वीर योद्धा, दानवीर तथा राम-कृष्ण-शिव आदि के भक्त कवि थे। रहीम का नीति तथा शृंगार विषयक दोहे हिन्दी के सारस्वत कोष के रत्न हैं। बरवै नायिका भेद, नगर शोभा, मदनाष्टक, श्रृंगार सोरठा, खेट कौतुकं ( ज्योतिष-ग्रन्थ) तथा रहीम काव्य के रचियता रहीम की भाषा बृज एवं अवधी से प्रभावित है। रहीम का एक प्रसिद्ध दोहा देखिये-

नैन सलोने अधर मधु, कहि रहीम घटि कौन?
मीठा भावे लोन पर, अरु मीठे पर लोन।


कबीर-रहीम आदि को भुलाने की सलाह हिन्द-युग्म के वार्षिकोत्सव में मुख्य अतिथि की आसंदी से श्री राजेन्द्र यादव द्वारा दी जा चुकी है किंतु...

पूजा जी! छंद क्या है? पाठ २ में देखें. दोहा क्या है? यह बिना कुछ कहे शुरू से अब तक कहा जा रहा है। अगले किसी पाठ में परिभाषा यथास्थान दी जायेगी। श्लोक संस्कृत काव्य में छंद का रूप है जो कथ्य के अनुसार कम या अधिक लम्बी, कम या ज्यादा पंक्तियों का होता है। इन तीनों में अन्तर यह है कि छंदशास्त्र में वर्णित नियमों के अनुरूप पूर्व निर्धारित संख्या, क्रम, गति, यति का पालन करते हुए की गयी काव्य रचना छंद है।
श्लोक तथा दोहा क्रमशः संस्कृत तथा हिन्दी भाषा के छंद हैं। ग्वालियर निवास स्वामी ॐ कौशल के अनुसार-

दोहे की हर बात में, बात बात में बात.
ज्यों केले के पात में, पात-पात में पात.


श्लोक से आशय किसी पद्यांश से होता है जो सामान्यतः किसी स्तोत्र (देव-स्तुति) का भाग होता है। श्लोक की पंक्ति संख्या तथा पंक्ति की लम्बाई परिवर्तनशील होती है।

तन्हाजी! 'ग्री' के उच्चारण में लगनेवाला समय 'कृ' के उच्चारण में लगनेवाले समय से दूना है इसलिए ग्रीष्मः = ग्रीष् 3 + म: २ +५ तथा कृष्ण: = कृष् २ + ण: २ = ४। हृदयं = ४, हृदयः = ४, हृदय = ३। पाठ ३ में य पर बिंदी न होना टंकण-त्रुटि है।

दोहा घणां पुराणां छंद:


११ वीं सदी के महाकवि कल्लोल की अमर कृति 'ढोला-मारूर दोहा' में 'दोहा घणां पुराणां छंद' कहकर दोहा को सराहा गया है। राजा नल के पुत्र ढोला तथा पूंगलराज की पुत्री मारू की प्रेमकहानी को दोहा ने ही अमर कर दिया।

सोरठियो दूहो भलो, भलि मरिवणि री बात.
जोबन छाई घण भली, तारा छाई रात.


आतंकवादियों द्वारा कुछ लोगों को बंदी बना लिया जाय तो उनके संबंधी हाहाकार मचाने लगते हैं, प्रेस इतना दुष्प्रचार करने लगती है कि सरकार आतंकवादियों को कंधार पहुँचाने पर विवश हो जाती है। एक मंत्री की लड़की को बंधक बना लिए जाने पर भी आतंकवादी छोड़े जाते हैं। मुम्बई बम विस्फोट के बाद भी रुदन करते चेहरे हजारों बार दिखानेवाली मीडिया ने पूरे देश को भयभीत कर दिया।

संस्कृत, प्राकृत तथा अपभ्रंश तीनों में दोहा कहनेवाले, 'शब्दानुशासन' के रचयिता हेमचन्द्र रचित दोहा बताता है कि ऐसी परिस्थिति में कितना धैर्य रखना चाहिए।

भल्ला हुआ जू मारिआ, बहिणि म्हारा कंतु.
लज्जज्जंतु वयंसि यहु, जह भग्गा घर एन्तु.


अर्थात - भला हुआ मारा गया, मेरा बहिन सुहाग.
मर जाती मैं लाज से, जो आता घर भाग.

अम्हे थोवा रिउ बहुअ, कायर एंव भणन्ति.
मुद्धि निहालहि गयण फलु, कह जण जाण्ह करंति.

भाय न कायर भगोड़ा, सुख कम दुःख अधिकाय.
देख युद्ध फल क्या कहूँ, कुछ भी कहा न जाय.


गोष्ठी के अंत में : तेरा तुझको तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा-

जग सारा अपना लिया, बिसरा मुझको आज.
दुखी किया आचार्य जी, मनु सचमुच नाराज.

दोहों में संजीव जी, छूटा मनु का नाम.
विवश हुए आचार्य जी, उत्तर दें तज काम.

दोहे की महिमा पढी, हुआ ह्रदय को हर्ष.
हमें अगर विस्मृत किया, क्यों होगा उत्कर्ष.

दिल गदगद है खुशी से, आँखों में मुस्कान.
दोहा शोभा युग्म पर, सलिल सदृश गतिमान.

दोहा गाथा से बढ़ा, हिन्दयुग्म का मान.
हर दोहे में निहित है, गहरा-गहरा ज्ञान.

पिछड़ गयी तो क्या हुआ, सीमा आयीं आज.
सबसे आगे जायेंगी, शीघ्र ग्रहण कर राज.

सलिल-धार सम बह रहा, दोहा गहरी धार.
हमें भुला कर तोड़ दी, क्यों सीमा सरकार.

बिन सीमा होगी सलिल, धारा बेपरवाह.
सीमा में रह बहेगी, तभी मिलेगी थाह.

देर हुई दरबार में, क्षमा करें महाराज.
दोहा महफिल में हमें, करें सम्मिलित आप.