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दोहा गाथा सनातन- 22- दोहा रचना मान है


वानर अथवा पान है, दोहा का नव भेद।
पढें समझ रचिए इसे, मन में रहे न खेद।।
दस गुरु अट्ठाईस लघु, वानर सा व्यवहार।
रंग मान के पान सा, जग होता बलिहार।।

मत पूछो यह किस तरह, बीती उसकी रात।
बदल-बदलकर करवटें, उसने किया प्रभात।। -प्रो. देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र'

दोहा युग की चेतना, जनगण-मन का मीत।
मिलन-विरह, सुख-दुःख, सृजन, परिवर्तन की रीत।। -सलिल

अगनित मुनि औ' देव हैं, अगनित दानव-यक्ष।
अगनित सागर रत्न हैं, अगनित पक्ष-विपक्ष।। -रामस्वरूप बृजपुरिया

मौसम, खुशियाँ, तितलियाँ, बतरस, मिलन, मिठास।
कल तक सब त्यौहार थे, आज हुए इतिहास।। - राधेश्याम शुक्ल

बदल गए सब रूप अब, बदल गए सब रंग।
सरबन अब अपनी कथा, ले जा अपने संग।। -सोम ठाकुर

नहर फाँदकर शिखर पर, लिखकर अपना नाम।
चुप नौ-दो-ग्यारह हुई, आँख मूँदकर शाम।। - श्रीकृष्ण शर्मा