गुरुविहीन जो सर्प वह, कठिन निभाना प्रीत.
अड़तालिस लघु से बने, दोहा पिंगल-रीत..
सूत्र: सर्प दोहा- ० गुरु + ४८ लघु = ४८ अक्षर
पिंगल ग्रंथों में वर्णित दोहा का तेइसवां प्रकार सर्प दोहा केवल ४८ लघु मात्राओं की सहायता से बिना किसी गुरु मात्रा के लिखा जाता है. इसकी रचना दुष्कर है. बहुत कम दोहाकार इन दोहों की रचनाकार पाते हैं.
उदाहरण :
१.
चमक-दमक नभ पर तड़ित, गरज-बरस घन सहित.
विचलित-विगलित थल-ह्रदय, कर प्रमुदित अनवरत.-सलिल
२.
उथल-पुथल नित-नित नवल, समय अनवरत करत.
कण-कण पर निज परम पद, धमक-धमक कर धरत. -आचार्य रामदेव लाल 'विभोर'
३.
जय-जय-जय अधहरन हर, विषम अनल धर नयन.
दरन-दरन असरन सरन, विपति हरन सुख अयन..
४.
रहन-सहन कर सरल शुचि, गरम न बनकर सहन.
छुइ-मुइवत मत मुरझ नर, हितकर गुरूच सुग्रहन.. -डॉ. ॐ प्रकाश बरसैंया 'ॐकार'
दोहागाथा के पाठक सर्प दोहा लिखने का अभ्यास करें. आगामी कड़ी में हम परिचय करेंगे एक ऐसे दोहे से जिसे लिखना पारंपरिक पिन्गालाचार्यों ने वर्जित किया है.
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