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नहीं चाहिये यह एक दिन की होली अब


आज ज़मीन पर बिखरे टेसू देखे तो एहसास हुआ,
कि बसंत कब का आ चुका है और होली मुँह बाए खड़ी है,
पर शायद कुछ उमंगों की कमी है या हालातों की कुछ है साज़िश,
कि ना बसंत ने मन में पग धरे, ना ही होली देती कोई दस्तक.

और मन में ख्यालों की सुगबुगाहट होने लगी कि,
हर बार की तरह अबीर गुलाल तो खूब फैलाएंगे रंग इस बार भी,
और खिलखिलाहट और कहकहे गूँजा जायेंगे हर कोना,
शैफालियाँ भी होंगी आच्छादित चारों ओर,
और बाजेंगे चंग-मृदंग और ढोल भी,
गुझिया और मिठाईयों की भी होगी होड़,
भंग-ठन्डई भी कर जायेंगी सब को सराबोर,
फिर सब नाचेंगे हो मस्त, और छलक जायेंगे जाम भी।

मगर क्या होगा दिलों का भीतर से भी मेल?
या रंगीन परत के नीचे होगा सिर्फ काला रंग,
क्या होगा सिर्फ एक दिन का इन्द्रधनुष और फिर सब स्याह,
या होगा झूठ सर्वव्यापि जिसमें सच का होगा ‘एक दाग’ लगा.

होली और दिवाली साल में आती है बस एक बार,
मगर होते बम धमाके देश में बारम्बार,
माँएँ अभी भी हैं रोती और लज्जित होती हैं अबलाएँ,
बुजुर्गों और बच्चों की होती हैं रोज हत्याएँ,
और कुछ की नौकरी छूटी, कुछ की घटी हैं तनख्वाएँ।
नेता आते और जाते सिर्फ कर जाते अपनी बात,
और बाकि हम सब भूला दिये जाते वोट के बाद ,
स्लम से आस्कर तक पहूंचें जरूर, लेकिन स्लम हैं वहीं के वहीं,
और अब तो ’जै हो’ का नारा भी लिया है छीन इन नेताओं ने।

बस और नहीं! नहीं चाहिये यह एक दिन की होली अब,
अब होली कुछ ऐसी चाहिये, जो लाये उमंग हर दिन हर पल,
प्यार अपार हो और हो सुख सब दिन,
रंग छलकें और हों सब दिल प्रेम-रंगों से सराबोर,
और सौहार्द और प्रेम से गूंजे हर कोना, हर कण,
द्वेष, घृणा और अपराध रूपी होलिका दहन होगी जब,
सुख-शांति और चैन से दमकेगा जीवन सबों का जब,
तभी कहलायेगी आज की होली सच्ची और सुरम्य होली।

--अरविन्द चौहान

वहशत की दहशत...


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आँधी भूल सब आगे निकल गये.

धरती हुई थी लाल, लपटें उठी थीं विकराल,
अनदेखों ने अनजानों से खेली थी होली लाल,
न तुमको चेहरा मिला, ना ही कोई नाम मिला,
फिर क्यों किया मौत का तान्डव, ये ज़लज़ला...?

कोई भाई ढूंढता मिला, किसी को न दोस्त मिला,
बदहवास से समेटते रहे, वो दहशत का सिलसिला,
माँएँ बिलखती रहीं, बेटियाँ सिसकती रहीं,
कुछ वहशी पलों में, जीवन बेल टूटती रहीं,

रूपहले स्वप्न टूट गये, मोती सारे बिखर गये,
बिन चाहे वो तो अपना, अंतिम सफर कर गये,
लाचार हो खडे सब तमाशा देखते रहे,
और तूफानों में मुस्काते फूल बिखरते रहे.

देश अन्धेरे में डूबता रहा, सियासत अनजान रही,
हिन्द की धरती पर आज अपनों की साजिश रही,
आज यहाँ कल वहाँ बस यही सवाल रह गये,
कब तुम कब हम, बस अब यही हाल रह गये.


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आन्धी भूल सब आगे निकल गये...

--अरविन्द चौहान