सहरा की धूप में जो जल रहा था, वेदना के गरल से जो गल रहा था, काल के निर्मोह हाथों पल रहा था, सुधा का प्याला उसे तुमने पिलाया । मौत के आगोश से तुमने बचाया ॥
जीवन का संघर्ष जिसको छल रहा था, भरी जवानी में भी जो ढ़ल रहा था, स्वयं का जीवन जिसको खल रहा था, अंधकार में उर्मिल बन कर तुम आयीं । जीवन में जलनिधि बन कर तुम छायीं ॥
दुश्मन का कुचक्र हर पल चल रहा था, चुपचाप वह हाथ अपने मल रहा था, गिराया हर बार जब भी संभल रहा था, करुणा को द्रावित कर आनंद बनाया । गहन वेदना को तुमने मधु रस पिलाया ॥
नयनों से अविरल कितना नीर बहाया, शून्य गगन में निर्जन मन बिखरा पाया, दग्ध दुख अभिशापित कर हृदय बसाया, तप्त उर को अंक भर तुमने सहलाया । नयनों में भर छवि उसे अपना बनाया ॥
सुख की निर्मल छाया का भान कराया । गीत प्रीत का मीत बना कर उसे सुनाया ॥
एक दिन मार्निंग वॉक के समय मैने अपने मित्र से कहा-- आजकल बहुत चोरी हो रही है। उसने कहा-- हाँ, चोरी क्या, सीनाजोरी भी हो रही है। मैने कहा-- कुछ सलाह दो। उसने कहा-- एक कुत्ता पाल लो। मुझे मित्र की सलाह अच्छी लगी गली में बहुत से कुत्तों के पिल्ले घूम रहे थे आव देखा न ताव एक को उठाया और झट से कर लिया घर के अन्दर बच्चे देखकर खुश हुए बोले-- सुन्दर है। मैने उसका नाम भी रख लिया-- सुन्दर ! दूसरे दिन मैने अपने मित्र से कहा-- तुमने सलाह दिया मैने मान लिया तुमने सुना मैने एक कुत्ता पाल लिया। दोस्त को आश्चर्य हुआ अच्छा ! विलायती है ! मैने गर्व से कहा-- नहीं, देसी है।
उसने बुरा सा मुंह बनाया देसी ! कुत्ता वह भी देसी !
मैने पूछा-- क्यों, देसी स्वामिभक्त नहीं होते ?
उसने कहा-- नहीं यह बात नहीं।
तो ?
देसी स्वामिभक्त होते हैं मगर विलायती के आगे दुम हिलाने लगते हैं !
दयालू होते हैं खूंखार नहीं होते।
चोर और पड़ोसी से बचने के लिए कुत्ता खूंखार होना चाहिए !
खूंखार शब्द सुनकर मेरी आँखों के सामने उसकी पत्नी का चेहरा नाच गया।
मैने मासूमियत से पूछा-- तुम्हारी बीबी विलायती है !
सुनकर वह नाराज हो गया। काफी देर बाद बोला--
बीबी देसी ही ठीक है मगर कुत्ता विलायती होना चाहिए। दोगली नस्ल का मिल जाय तो और भी अच्छा।
मैने उलाहना दिया-- तो पहले क्यों नहीं बताया ? मैने उसे अपने हिस्से का दूध भी पिलाया !
उसने मेरी पीठ थपथपाई कोई बात नहीं जब पाल लिया है तो पालो मगर सुनो, रैबिश का इंजेक्शन भी लगवा लो। उसी दिन मैं कुत्तों के डाक्टर के पास गया उसने मुझे इंजेक्शन, दवाइयों की लिस्ट थमा दिया। बोला-- मेरा आदमी आपके पास चला जाएगा समय-समय पर सारे इंजेक्शन लगाकर आ जाएगा अभी ये दो बोतल शीरफ और कुछ टेबलेट्स लेते जाइये सुबह-शाम दूध के साथ मिलाकर रोज पिलाइये।
मैने पूछा-- अच्छा ! कित्ता हुआ ? डाक्टर बोला-- ज्यादा नहीं अभी तो सिर्फ एक हजार ही हुआ ! दाम सुनकर मेरा माथा ठनका थोड़ा चीखा थोड़ा झनका
हे राम ! एक कुत्ते की दवाइयों के इत्ते दाम !
डाक्टर बोला-- बोला क्या जबड़े से बंधा शेर खोला--
इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या आगे-आगे देखिए होता है क्या
क्या समझते हैं कुत्ते का पिल्ला आदमी के बच्चे से सस्ता होता है ? जनाब इसको पालने में ज्यादा खर्च होता है। मैं बुरी तरह फंस चुका था चार लोग मुझे इतने उपहास पूर्ण नजरों से घूर रहे थे मानों मुझे इतनी छोटी सी बात का भी ग्यान नहीं ! मैने कांपते हाथों से पैसा बढ़ाया दवाइयों से भरा पॉलीथीन का थैला उठाया और बिना कुछ बोले घर की ओर भारी कदमों से चलने लगा-----। रास्ते भर मेरी वणिक बुद्धि मुझे धिक्कारती रही-- मूर्ख, क्या करता है ? विलायती होता तो और बात थी देसी पर इतना खर्च करता है ! रास्ते भर मेरी अंतरात्मा मुझे समझाती रही-- कि दवा-दारू खान-पान शिक्षण-प्रशिक्षण का रखा जाय भरपूर ध्यान तो देसी भी हो सकते हैं विलायती से अच्छे
फिर चाहे कुत्तों के पिल्ले हों या गली में घूमते अनाथ, लावारिस, आदमी के बच्चे।
स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये, कल की आँधी भूल सब आगे निकल गये.
धरती हुई थी लाल, लपटें उठी थीं विकराल, अनदेखों ने अनजानों से खेली थी होली लाल, न तुमको चेहरा मिला, ना ही कोई नाम मिला, फिर क्यों किया मौत का तान्डव, ये ज़लज़ला...?
कोई भाई ढूंढता मिला, किसी को न दोस्त मिला, बदहवास से समेटते रहे, वो दहशत का सिलसिला, माँएँ बिलखती रहीं, बेटियाँ सिसकती रहीं, कुछ वहशी पलों में, जीवन बेल टूटती रहीं,
रूपहले स्वप्न टूट गये, मोती सारे बिखर गये, बिन चाहे वो तो अपना, अंतिम सफर कर गये, लाचार हो खडे सब तमाशा देखते रहे, और तूफानों में मुस्काते फूल बिखरते रहे.
देश अन्धेरे में डूबता रहा, सियासत अनजान रही, हिन्द की धरती पर आज अपनों की साजिश रही, आज यहाँ कल वहाँ बस यही सवाल रह गये, कब तुम कब हम, बस अब यही हाल रह गये.
स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये, कल की आन्धी भूल सब आगे निकल गये...
****************************************** हाथ खाली हों तो आँखें भर लाना अच्छा नहीं लगता उनकी दुनिया लुट गई, उन पर गाना अच्छा नहीं लगता माना सबके खिरजो-जज्बात* के अपने तरीके हैं मगर मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता
माँ होकर क्यों देखती हूँ वही तमाशा जो बरहा लगता है क्यों यतीम बच्चे देख मेरा खून खौलता नहीं पिघलता है क्यों जागती हूँ तब ही जब कोई 'बापू' या 'बोस' जगता है क्यों हरदम "मुझे" किसी रहनुमा* का इंतज़ार रहता है उन शहीदों को यूँ नज्मों में मारना अच्छा नहीं लगता मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता
मशहर-सा* माहौल है हरसू, दिल भी उदास ख़राब है उठे हुए सवालों ने ऐसी 'सुखन' पाई के सब लाजवाब है** अब लिखने को नहीं, करने को, उठने को हाथ बेताब हैं क्यों लिख रही हूँ फिर, क्यों मेरी बगावत में हिजाब* है कुछ कर नहीं सकती और 'कुछ न करना' अच्छा नहीं लगता मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता
शायद कुछ मिनिट लगते हैं एक नज़्म लिखने में और शायद कुछ मिनिट लगे थे वो जानें जाने में कुछ मिनिट लगेंगे मॉल्स की 'सेक्युरिटी' परखने में कुछ मिनिट लगेंगे हमें हरसू एहतियात बरतने में 'दानव बड़ा है' सोच कुछ पल लगेंगे सबको डरने में 'दानव बड़ा है' जान गुंजाइश घटेगी निशाने-तीर चूकने में जागो तो कुछ पल लगेंगे सबको थोड़ा-थोड़ा जगने में समझो तो पल भी नहीं लगेंगे मेरी बात समझने में 'चूड़ी-कंगन पहने' यूँ बैठे रहना अब अच्छा नहीं लगता मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता
- रूपम चोपडा (RC)
(**सुखन = यहाँ दो मतलब लिए हैं - बातचीत और कविता खिरजो-जज्बात = खिरज और जज्बात = श्रद्धांजलि और भावनाएं मशहर = प्रलय, हिजाब = सुशीलता/नम्रता, रहनुमा = मार्गदर्शक, लीडर ) *******************************************************
रमेश श्रेष्ठ की नेपाली कविता 'कविता-उत्सव' हिन्द-युग्म के अनुवादक (नेपाली से हिन्दी) कुमुद अधिकारी की व्यस्तता के कारण हम पिछले कई माहों से कोई नेपाली कविता नहीं प्रस्तुत कर सके। इंतज़ार काफी लम्बा हो गया था, लेकिन आज कुमुद अधिकारी एक नेपाली कविता 'कविता उत्सव' लेकर प्रस्तुत हैं जिसके रचनाकार है रमेश श्रेष्ठ।
रमेश श्रेष्ठः एक परिचय
पोखरा में रहने वाले 1967 में जनमें कवि एवं कलाकार श्री रमेश श्रेष्ठ दस साहित्यिक संस्थाओं से संबद्ध हैं और राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण कोष, पोखरा में कार्यरत हैं। प्रकाशित कृतियाँ-
1. नपोतिएका रङहरू(गीत)
2. चराहरूको पहाड(कविता संग्रह)
3. आमा नदीहरू(कविता संग्रह)
4. बुद्ध बिम्ब अक्षर बिम्ब(कविता संग्रह)
5. In the name of Buddha(Poems)
6. घाँस उखेलीरहेकी केटी(काव्य)
7. रोदी रोएको देशमा(काव्य)
8. कविता र साँझ(भी.सी.डी.)
9. अक्षरको खेत(काव्य)
10. एक खण्डकाव्य और कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य।
पुरस्कार सम्मानः राष्ट्रीय प्रतिभा पुरस्कार, युवावर्ष मोती पुरस्कार के साथ अन्य बारह पुरस्कार एवं सम्मान।
जवाँ उजाले के सामने कविता वैसी कुछ बड़ी चीज नहीं है आज तुम्हारे नाम पर तारे गिर गए तारों के गर्म आँसू न आकाश देख पाया न धरती देख पायी आज बहककर ही तारे तुम्हारे नाम पर गिरे
यादों में किसी दिन सागर में बड़ी सुनामी आई बहुत सी बस्तियाँ, गुंबद, निर्माण और लोगों को बहा ले गई लोगों के बनाए प्रेम-स्मारक प्रेम घोलकर पी जा रही कॉफी व कॉफी-शॉप दिल में तान बजाते वॉयलिन और एक बार की जिंदगी में गुजारे हुए प्रेम के पल ऐसे बह गए जैसे सपने बहते हैं वह प्रेम, वॉयलिन का दिल और धुन कोई नहीं देख पाया, नहीं सुन पाया देखा और सुना तो सिर्फ़ कवि ने और छाती से लगाकर लिखा धरती की सुनामी, सागर और प्रेम के साथ किताबों के अक्षर के साथ जागकर चेतना में घूमती रही कविता वैसी कुछ बड़ी चीज नहीं है।
याद करने लायक कोई दिन सड़कों पर पैरों और आवाजों की कैटरीना आई मूछें, कुर्सियाँ, गाड़ियाँ और शासन की जड़ें बहा ले गई मानव निर्मित असमानताएँ नींद और तंद्रा की कुरूपता में चौंक गईं बिन आँखोंवाली गोली भीड़ में आई और भीड़ के आँसू बहा ले गई कई लाशें गिरीं उन्हीं लाशों के गंध से मस्तिष्क के किसी किनारे पर स्वतंत्रता का आभास हुआ एकबार की जिंदगी में उनके नाम फिर चाँद हो गए मीठे भाषण हुए, बदली मूछें, बदली कुर्सियाँ, बदला शासन शहीदों का संरक्षण हुआ, शहीद नाम के उनके चाँद में सड़क पर फैले खून के साथ गिरते सिंदूर के आँसू और बच्चों की भूख के दाग कोई नहीं देख पाया देखा तो सिर्फ कवि ने और खुद से बदलकर लिखा फिर कवि उनका एक नंबर का दुश्मन हो गया कविता वैसी बड़ी चीज नहीं है
जीवन के जुलूस में तारे गिर गए तुम्हारे नाम उन तारों के गर्म आँसू न आकाश ने देखा न धरती ने उन तारों में जीवन के दुःख और प्रेम की गहराइयाँ चमक रही थीं पर देखा नहीं किसी ने देखा तो सिर्फ कवि ने और लिखी कविता जवाँ उजाले के सामने कविता वैसी कुछ खास चीज नहीं है। नेपाली से अनुवादःकुमुद अधिकारी
स्वाधीनता दिवस, स्वतंत्रता दिवस, ६१वीं आज़ादी दिवस पर हिन्द-युग्म की विशेष प्रस्तुति
दुनिया में हर जगह, भारतीय अपनी आज़ादी का जश्न मना रहे हैं। हिन्द-युग्म भी अपने कविता पृष्ठ पर अपने तरीके से स्वाधीनता दिवस का जश्न मना रहा है। १५ अगस्त के दिन १५ कविताएँ लेकर हाज़िर है। भारत विभिन्नता में एकता का देश है। हमने भी इस विशेष अंक में आज़ादी के कविता के १५ भिन्न-भिन्न रंग शामिल किये हैं। इस अंक में पूर्वी भारत से भी एक लिखने वाली हैं, पश्चिम से भी कोई है, उत्तर तो हिन्दी की दुनिया है, दक्षिण की भी कवयित्री शामिल हैं। कवयित्री हरकीरत कलसी 'हकी़र' गुवाहाटी आसाम में रहती हैं, तो वहीं कवयित्री सी आर॰ राजश्री कोयमबटूर से हैं। देवेन्द्र वाराणसी, मयंक नोएडा, विवेक पाण्डेय भोपाल से, विवेक रंजन और विदग्ध जबलपुर, वहीं संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी नागौर राजस्थान, तो सुधी जयपुर से हैं। विद्याधर दुबे कानपुर से, प्रदीप मानोरिया मध्य प्रदेश, निशिकांत नोएडा, वीनस केसरी इलाहाबाद तो प्रदीप पाठक नई दिल्ली से हैं। मतलब अनन्त रंगों में से १५ रंग आज हमने अपने पृष्ठ पर सजाएँ हैं। आज इस अंक के लिए चित्रकार राजेश तिवारी ने एक चित्र भी बनाकर भेजा है। शेष आपकी टिप्पणियों के विविध रंगों का इंतज़ार रहेगा।
स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष
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2. ऑरकुट के लिए कोड को सीधे स्क्रेपबुक में पेस्ट करें। 3. ईमेल सिग्नेचर के लिए ईमेल सेटिंग में जाकर 'सिग्नेचर' के HTML विकल्प में उपर्युक्त कोड पोस्ट करें। विज़न २०२० हरी नीली लाल पीली बड़ी बड़ी तेज़ रफ्तार मोटरें और उनके बीच दबा, सहमा, डरा सा आम आदमी
हरे भरे लहराते बड़े बड़े पेडो के नीचे बिखरी पन्निया बारिश की प्रदुषण धुली बूँदें आँखों से बरसती
सड़क पर चाय के ठेले पर वही बुढ़िया और चाय पहुचता वही छोटू
स्कूल से निकलता अल्हड, मस्त किल्कारिया भरता बचपन और पास ही सड़क पर भीख मांगते नन्हे, असमय बड़े हो चुके छोटे बच्चे
पाँच सितारा अस्पताल का उद्घाटन करते प्रधान मंत्री की तस्वीर को घूरती सरकारी अस्पताल में बिना इलाज मरे शिशु की लाश
और इन सबको कर उपेक्षित विकास के दावो की होर्डिंग निहारता मैं मन में दृढ़ करता चलता विश्वास की हाँ २०२० में हम विकसित हो ही जाएँगे दिल को बहलाने को ग़ालिब...........
एक हाथ में लोकतंत्र के सपने दूसरे में बारूदी छर्रे! बोलिए-हिप-हिप हुर्रे! एक तरफ़ भूखे एहसास; दूसरी तरफ कसाई! जी हाँ, आपने भी सही जगह बस्ती बसाई! पेट में उगते हैं मौसम, चूल्हे में सुबह-शाम! बाकी जिंदगी तो होती है, सड़कों पर तमाम | आस्तीनों में पलते हैं दोस्त, म्यानों में मिलते हैं संबंध! मखमल के हैं संबोधन, लेकिन टाट के हैं पैबंद! पर, मेरे वैचारिक सहचरो! वोट देते ही रटने लगो- संविधानी मंत्र! वरना फिर किस तरह बचेगा लोकतंत्र! और अगर लोकतंत्र नहीं रहा तो तुम्हारा पेट और चूल्हा कहाँ जाएगा?
अभी-अभी बम के धमाको़ से चीख़ उठा है शहर बच्चे, बूढे,जवान खून से लथपथ अनगिनत लाशों का ढेर इस हृदय विदारक वारदात की कहानी कह रहा है
ओह! यह कैसी आजा़दी है जो घोल रही है मेरे और तुम्हारे बीच खौ़फ, आग और विष का धुआँ? हमारे होठों पे थिरकती हंसी को समेटकर दुबक गई है किसी देशद्रोही की जेब में
और हम चुपचाप देख रहे हैं अपने सपनों को अपने महलों को अपनी आकांक्षाओं को बारूद में जलकर राख़ में बदलते हुए.
मेरा यह मानना है मेरा भारत सब दशों से महान है। नहीं है ऐसा कोई अन्य देश, युगों बीतने पर भी वैसा ही है परिवेश, विभिन्नता में एकता के लिए, प्रसिद्ध है हर प्रदेश, प्रेम, अहिंसा, भाईचारे का जो है देता संदेश। मेरा यह मानना है मेरा भारत सब देशों से महान है। ऋषि-मुनियों की जो है तपोभूमि, कई नदियों से भरी है ये पुण्य भूमि, प्रकृति का है मस्त नजारा यहाँ, छोड़ इसे जाए हम और अब कहाँ मेरा यह मानना है मेरा भारत सब देशों से महान है, जाति, धर्म का है जहाँ अनूठा संगम, देशभक्ति की लहर में, भूल जाते सब गम, देश के लिए मर मिटने को सब है तैयार, अरे दुनिया वालों, हम है बहुत होशियार, न छेड़ो हमें, कासर नहीं है हम खबरदार, अपनी माँ को बचाने, लेगें हम भी हथियार। मेरा यह मानना है मेरा भारत सब देशों से महान है
१५ अगस्त १९४७ में भारत का पानी चमक उठा व्यापक विप्लव मुख मुद्रा पर अनल यज्ञ सा दमक उठा जननी बोली पुत्रों जागों समय गया सब सोने में रवि दावानल सुलग गया भारत के कोने -कोने में कायर जीवन जीवन क्या है लगा भाल पर ले रोली सैनिक आगे बढ़कर कर दे इस जीवन की तू होली बंगाल जगा पंजाब उठा ,उठ सैनिक दल ललकार उठे भारत के विशुधर काले भर मस्ती में फुफकार उठे देश वही है ,गौरवशाली जिसमें नाहर बसते हैं फांसी पर चढ़ने से पहले एक बार जो हस्ते हों आज हो गया देश आजाद देकर खुशहाली हो चले गए इस खुशहाली को रखना है कायम चाहे फिर से एक बार होना पड़े न्योछावेर आओ आज करें एक प्रतिज्ञान देश के मान ओउर अभिमान की हम करेंगे सुरक्षा १५ आगस्त सैन्तालिश को जो तिरंगा लहराया है वही तिरंगा लाल किले पर फहरा है फहराएंगे जय हिंद
विश्व एकता के सम्मुख ना सोचो अपने प्राण की। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।
तम को धर से दूर करो अब पट खोलो किवाड़ की। सीमाओं को खत्म करो अब बात करो ना बाड़ की।। ना हो विषमता ना हो बन्धन ना हो सीमायें जिसमें। मिल जुल कर प्रयास करो उस नव युग के निर्माण की।।
बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।
अब तो त्याग करो श्रंखला विजयों के अभियान की। ध्वनियां तुम तक भी पहुचेगी मानवता के गान की।। साथ हमारे अगर तुम्हे भी शान्ति दूत बन पाना है, बन्द करो अब पूजा तुम भी भाले और कृपाण की।। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।। अहंकार को छोड़ो कुछ ना कीमत है अभिमान की। हिल मिल कर अब तुम भी सोचो मानव के सम्मान की।। लालच में तुम फंसे रहोगे ना इसमें कुछ रक्खा है, कोशिश करके देखो राहें पाओगे निर्वाण की।। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।
नहीं सुनाओ अब तुम गाथा मानव के संहार की। दिल में ज्योति जलाओ तुम भी प्यार भरे संसार की।। जब तुमको है ये लगता सब जीवन एक समान है, फिर क्यों अलग उपाय हो करते अपने जीवन त्राण की।। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।
करेंगे एक और संघर्ष आओ करें संकल्प इस स्वाधीनता दिवस पर, करेंगे एक और संघर्ष पाने को स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से जिसने जगह बनाई है स्कूल से लेकर संसद तक में अधिकारी शिकायतकर्ता का ही करते हैं उत्पीड़न दौलत जुटाते हैं करके पड़पीड़न केवल काम नहीं चलेगा झण्डा फहराने से कब तक काम कराते रहोगे नजराने से जिस स्वतंत्रता की खातिर दिए थे प्राण जांबाजों ने आज उसी देश को लूट लिया झूठ को कला समझने वाले कलाबाजों ने आओ हम हाथ मिलायें, अनुशासन की जंजीरों को भी चटकायें भ्रष्ट अधिकारी हो या नेता, या फिर उनका हो प्रणेता, कानून तो उनकी मुठ्ठी में है, सच्चा कानून तो जन-हित है, जिसकी खातिर तोड़कर सारी जंजीरे आओ उनको मजा चखाये स्वाधीनता को बचाना है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलायें उन्होंने स्वतंत्रता की वेदी पर किये थे प्राण निछावर अपने स्वार्थों को छोड़ कोई भी मूल्य चुकाने को होना होगा तैयार तभी हम स्वतंत्रता के होंगे सच्चे हकदार अन्यथा यह नाटक है बेकार आओ करें संकल्प इस स्वाधीनता दिवस पर, करेंगे एक और संघर्ष पाने को स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से।
दरिया में बहा दो रंजिश सब अब अमन की कुछ बात हो जाये मेरे देश में खुशहाली हो बस इत्मिनान से मुलाकात हो जाये एक अनोखी ख्वाहिश सी सजी जमीन है फ़ुर्सत से अब माटी के पहलू से कुछ नई फ़सल-सौगात हो जाये जब सारे अरमान देख लिये क्यों अपने प्यारे खफ़ा हुए आज मिली आज़ादी में फ़िर ईद-मिलन दस्तूर हो जाये मैं सब्र में आज डूबा हूँ कुछ दूर चलके रोया हूँ वजूद को अपने ढूँढू हर दम मैं फ़िर कहीं जाके खोया हूँ
रेत के घरोंदो को छोड़ो अब टूटे सपनों को खोजो मेरे साथ चलो,नई आवाज़ लिये आज फिर एक ख्वाब एक उम्मीद हो जाये..
हमको प्यारा है भारत, हमारा वतन सारी दुनियां का सबसे सुहाना चमन। हम है पंछी, ये गुलषन यहॉ बैठ मन चैन पाता, सजाता नये नित सपन ।। इसकी माटी में खुषबू है, एक आब है जैसा कष्मीर दो-आब, पंजाब है। सारी धरती उगलती है सोना रतन सब भरे खेत-खलिहान, मैदान वन।। आदमी में मोहब्बल है, इन्साफ है खुली बातें है, जजबा है, दिल साफ है। मन हिमालय से ऊंचा, जो छूता गगन चाहते दिल से सब अंजुमन में अमन।। पंछियों की भले हों कई टोलियॉं रूप रंग मिलते-जुलते है औं बोलियॉं फितरतों में फरक फिर भी है एक मन सबको प्यारा है खुद से भी ज्यादा चमन।। क्यारियॉं भी यहॉं है कई रंग की जिनमें किसमें है फूलों के हर रंग की एकता ममता समता की ले पर चलन सबमें बहता मलय का सुगंधित पवन।। इसकी तहजीब का कोई सानी नहीं जो पुरानी है फिर भी पुरानी नहीं मुबारिक यहॉं का ईद-होली मिलन इसकी शोभा यही है ये गंगोजमन।।
युग बदल गया और फ़िर चरखे का चक्र चला ,फ़िर काला शासन ढकने चला श्वेत खादी खूंखार शासको की खूनी तलवारों से ,बापू ने हंसकर मांगी अपनी आजादी जो चरण चल पड़े आजादी की राहों पर,वो रुके न क्षणभर ,धुप,धुआं,अंगारों से उठ गया तिरंगा एक बार जिसके कर में,वो झुका न तिल भर गोली की बौछारों से
इसीलिए ध्वजा पर पुष्प चढाने से पहले , तुम शीश चढ़ने वालों का सम्मान करो II आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए , आजादी के परवानो का सम्मान करो
कितने बिस्मिल ,आजाद सरीखे सेनानी ,इस पुण्य पर्व से पहले ही बलिदान हुए जब अवध और झाँसी पे थे गोले बरसे ,तो मन्दिर ,मस्जिद साथ- साथ वीरान हुए जलियांबाग में जिनका नरसंहार हुआ ,वो इसी तिरंगे को फहराने आए थे जिनके प्रदीप बुझ गए गए अधूरी पूजा में,वो इसी निशा में ज्योत जलाने आए थे
तलवार उठाने से पहले तुम इसीलिए मिट जाने वालों का गौरव गान करो || आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए , आजादी के परवानो का सम्मान करो||
दलितों को मिला स्वराज्य इसी स्वर्णिम क्षण में,सदियों से खोया भारत ने गौरव पाया कट गयी इसी दिन माँ की लौह श्रृंखलाएं,पीड़ित जनता ने फ़िर से सिंहांसन पाया १५ अगस्त है नेता जी का मधुर स्वप्न ,बापू के अमर दीप की गायक वीणा है अंधियारे भारत का ये है सौभाग्य सूर्य , माँ के माथे का सुंदर श्याम नगीना है इसलिए आज मन्दिर जाने से पहले ,तुम राष्ट्र ध्वज के नीचे जन गन गान करो आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए ,आजादी के परवानो का सम्मान करो......
सन '५६ में जन्मी आज की युवा पीढी पराधीनताओं की कुंठाओं तथा सभी वास्तविकताओं से अनभिज्ञ ही है हमारी विचार धाराएं एवं स्मृतियाँ स्वतंत्रता को केवल ध्वजारोहण के सन्दर्भ में ले सकीं हैं अथवा इससे अधिक देशभक्ति भावनाओं से ओत-प्रोत कुछ क्षण जो समय के साथ साथ या उस से कहीं पहले अपना अस्तित्व खो देते हैं -और जिसके साथ ही समाप्त हो जाता है - सद्भावनाओं से प्रेरित एक ज्वार ज्वार जिसे कभी चन्द्र रूपी देश प्रेम की सौम्यता ने जन्मा था सागर की फेनिल लहरों में खोकर अपने जन्म दाता के अस्तित्व को नकार रहा है सोचता हूँ - हमारा प्रेम , हमारी भावनाएं , इतनी क्षणिक क्यों हैं ? देश प्रेम -हमारी और आपकी वह उपलब्धि है जिस की सुरक्षा हमारी सजग चेतना का प्रतीक है हमें सजग रहना होगा तभी हम विरासत के इस ऋण से मुक्त रह सकेंगे इस महान स्वतंत्र युग का श्रेय हमारे गौरवपूर्ण इतिहास एवं इसमें जीवंत प्रत्येक कर्मठ मानव को है जो इस भावना के प्रति सदैव क्रियाशील रहा.
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे || सभी मनाते पर्व देश का आज़ादी की वर्षगांठ है | वक्त है बीता धीरे धीरे साल एक और साठ है || बहे पवन परचम फहराता याद जिलाता जीत रे | गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे || जनता सोचे किंतु आज भी क्या वाकई आजाद हैं | भूले मानस को दिलवाते नेता इसकी याद हैं || मंहगाई की मारी जनता भूल गई ये जीत रे | गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे || हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं | किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है || भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे | गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
खादी धोती खादी कुर्ता खादी रुमाल, खादी झोला खादी टोपी रौबदार चाल, बीच बाज़ार घूम रहे थे चाचाजी क्रांतीकारी, पहुँचे मिठाई की दुकान पर जब भुख लगी भारी, डाँट कर बोले- ये तुम मिठाई बना रहे हो ? कुछ खुद खा रहे हो कुछ मक्खियों को खिला रहे हो । . हलवाई - जब रहे आप लोगों की दुआएँ तो क्यों ना हम मिठाई खाए, और ये मक्खियाँ तो स्वतंत्र देश के प्राणी आजाद हैं, ईनके मिठाईयों पर बैठने से इनका और भी बढ जाता स्वाद है, तो आप हीं बताइए इसमें मेरा या फिर मक्खियों का क्या अपराध है, इससे पता चलता है कि मिठाईयाँ अच्छी बनी है, आप आए मेरे दुकान पर किस्मत के धनी है । . ये देखिए ये जलेबी ये बर्फ़ी ये लड्डू और ये रसमलाई है, तो कहिए जनाब क्या देख कर आपकी लार टपक आई है , बोले इसमें सबसे सस्ती कौन है, जनाब जलेबी पहले तो इसे गोल गोल घुमाओ , और खौलते तेल में पकाओ, फिर चासनी में डुबा-डुबा के निकालो औए मज़ा लेते जाओ , तभी टपक पड़ी चाचाजी की लार, और सारी जलेबियाँ हो गई बेकार । हलवाई बोला- अब तो आपको हीं सारी जलेबियाँ खानी पड़ेंगी, अगर ना खा पाए तो दो्गुनी किमत चुकानी पड़ेगी, क्योंकि अगर ना खा पाए तो यह राष्ट्रिय़ मिठाई का अपमान होगा, आपका दुगना भुगतान देश के प्रति छोटा सा बलिदान होगा। जैसे हीं उन्होने एक जलेबी चबाई, दाँतों तले से करकराहट की आवाज़ आई, बोले इसमें तो आ रहा मिट्टी का स्वाद है । . हलवाई-वाह क्या बात है, आप जैसे लोगो को हीं आ सकती जलेबी में देश की मिट्टी की महक है, तभी तो आपकी आँखो में आ गई नयी चमक है, सोचने लगे बेस्वाद जलेबी आखिर ठूसे तो कितना ठूसे, देश भक्ती का चोला भी पहने रहे व धन से नाता भी ना टूटे, मर के खाए और खा खा के मरे, बहुत बुरे फ़ँसे आखीर करें तो क्या करें । . अंत में एक जलेबी बच गई, सोंचे जलेबी गई अगर अंदर तो प्राण जाएंगे बाहर, देश भक्ती के चक्कर में बेमतलब जाएंगे मर, ईज्जत जाए या धन से नाता टूटे, अब न खाउँगा जलेबी जग रुठे या किस्मत फूटे , भारी मन से दिया दोगुना दाम, और तुरन्त भागे बिना किए विश्राम, मुस्कुरा कर बोला हलवाई, देश के सच्चे देश भक्त को , सत सत प्रणाम सत सत प्रणाम ।
बाद मुद्दत के उससे जो मिलने गया, देख रजनी सखी मुस्कराने लगी एक छोटी सी बदली को कर सामने, ओट में चाँद मुखड़ा छुपाने लगी
रूप छुपता है कब ऐसे पर्दों से पर, चाँदनी सारे अंबर पे छायी रही और गगन-ओढ़नी पे चमकते हुये, उन सितारों को भी नींद आई रही खुद में सिमटी रही मानिनी मान से, मैं रह-रह के उसको मनाता रहा झूठा गुस्सा भी आखिर हवा हो गया, चाह की चाँदनी झिलमिलाने लगी
रात रानी की खुशबू लिये गोद में, एक झोंका बदन को यूँ ही छू गया सारे दिन की थकन और जहाँ भर के ग़म मिट गये करके वो जादू गया मौन अधरों से गाती रही रागिनी, चुपके सुनता रहा बंद पलकें किये हाथ थामे हुये निद्रा-पथ से मुझे ले के सपनों की दुनिया में जाने लगी
महीने का पहला दिन अर्थात् यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता की उद्घोषणा का दिन। इस प्रतियोगिता की यह १६वीं कड़ी है। हम लगातार प्रतिभागी कवियों और प्रतिभागी पाठकों की संख्या में वृद्धि करते जा रहे हैं। इस आशा के साथ कि इस बार भी बड़ी भारी संख्या में कवि और पाठक इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेंगे, आयोजन की सूचना लगा रहे हैं।नये पाठकों को बता दें कि 'हिन्द-युग्म यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' का आयोजन प्रत्येक माह होता है। कविता प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए कवियों को अपनी मौलिक तथा अप्रकाशित रचनाएँ महीने की १५ वीं तारीख तक भेजनी होती है, तथा पाठकों को पहले दिन से महीने के आखिरी दिन तक यहाँ प्रकाशित सभी प्रविष्टियों पर टिप्पणियाँ करनी होती है।
यूनिकवि बनने के लिए-
१) अपनी कोई मौलिक तथा अप्रकाशित कविता १५ अप्रैल २००८ की मध्यरात्रि तक hindyugm@gmail.com पर भेजें।
(महत्वपूर्ण-मुद्रित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के अतिरिक्त गूगल, याहू समूहों में प्रकाशित रचनाएँ, ऑरकुट की विभिन्न कम्न्यूटियों में प्रकाशित रचनाएँ, निजी या सामूहिक ब्लॉगों पर प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित रचनाओं की श्रेणी में आती हैं।)
२) कोशिश कीजिए कि आपकी रचना यूनिकोड में टंकित हो। यदि आप यूनिकोड-टाइपिंग में नये हैं तो आप हमारे निःशुल्क यूनिप्रशिक्षण का लाभ ले सकते हैं।
३) परेशान होने की आवश्यकता नहीं है, इतना होने पर भी आप यूनिकोड-टंकण नहीं समझ पा रहे हैं तो अपनी रचना को रोमन-हिन्दी ( अंग्रेजी या इंग्लिश की लिपि या स्क्रिप्ट 'रोमन' है, और जब हिन्दी के अक्षर रोमन में लिखे जाते हैं तो उन्हें रोमन-हिन्दी की संज्ञा दी जाती है) में लिखकर या अपनी डायरी के रचना-पृष्ठों को स्कैन करके हमें भेज दें। यूनिकवि बनने पर हिन्दी-टंकण सिखाने की जिम्मेदारी हमारे टीम की।
४) एक माह में एक कवि केवल एक ही प्रविष्टि भेजे।
यूनिपाठक बनने के लिए
चूँकि हमारा सारा प्रयास इंटरनेट पर हिन्दी लिखने-पढ़ने को बढ़ावा देना है, इसलिए पाठकों से हम यूनिकोड ( हिन्दी टायपिंग) में टंकित टिप्पणियों की अपेक्षा रखते हैं। टायपिंग संबंधी सभी मदद यहाँ हैं।
१) १ अप्रैल २००८ से ३० अप्रैल २००८ के बीच की हिन्द-युग्म पर प्रकाशित अधिकाधिक प्रविष्टियों पर हिन्दी में टिप्पणी (कमेंट) करें।
२) टिप्पणियों से पठनीयता परिलक्षित हो।
३) हमेशा कमेंट (टिप्पणी) करते वक़्त समान नाम या यूज़रनेम का प्रयोग करें।
४) हिन्द-युग्म पर टिप्पणी कैसे की जाय, इस पर सम्पूर्ण ट्यूटोरियल यहाँ उपलब्ध है।
कवियों और पाठकों को निम्न प्रकार से पुरस्कृत और सम्मानित किया जायेगा-
१) यूनिकवि को रु ६०० का नकद ईनाम, रु १०० की पुस्तकें और एक प्रशस्ति-पत्र।
२) यूनिपाठक को रु ३०० का नकद ईनाम, रु २०० की पुस्तकें और एक प्रशस्ति-पत्र।
३) क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान के पाठकों को प्रो॰ सी॰बी॰ श्रीवास्तव 'विदग्ध' और विवेक रंजन श्रीवास्तव की ओर से पुस्तकें।
४) दूसरे से दसवें स्थान के कवियों को कवयित्री डॉ॰ रमा द्विवेदी का काव्य-संग्रह 'दे दो आकाश' की एक-एक प्रति।
प्रतिभागियों से भी निवेदन है कि वो समय निकालकर यदा-कदा या सदैव हिन्द-युग्म पर आयें और सक्रिय कवियों की रचनाओं को पढ़कर उन्हें सलाह दें, रास्ता दिखायें और प्रोत्साहित करें।
शीत सरकते माह माह में करने दिल्ली की सैर चले, बँधी टोंट बर्फीली हवा से करके हिम्मत खैर चले, गधे के सर के सींग के जैसे आसमान बिन सूरज के, हालांकि इस वक्त घड़ी में बीस मिनट थे दो बजके, धुन्ध और कोहरे की चादर हाथ से हाथ नहीं दिखता था, दो पेड़ों का झुन्ड दूर से इंडिया-गेट सा लगता था, तभी अचानक नज़र पड़ी मनो दुर्वासा ऋषि आये, पतली पतली निरवस्त्र भुजा शंकर के अम्बर लटकाये, ढ़कने के नाम पर बाजू पर बस टेंटू लगे भुजंगों के, घुटनों के उपर तंग वस्त्र पायचे भी भिन्न भिन्न रंगों के, एक हाथ कमंडल पर्स लिये दूजे सिगरेट का दम भरती, मस्तक पर भी बिन्दी नागिन आई एक दम फूँ-फूँ करती, बोली एक्सक्यूज मी मिस्टर व्हेअर इज दिस नागलोई, गलती से मैं आ गयी यहाँ क्या मिलेगी यहाँ से बस कोई, मैं बोला नागलोई में ही तो आप खड़ी हो मैडम जी मेरी बातों को सुन झटकी ! बोली एकदम, नहीं समझी! बोली इंडिया-गेट है यह तो राष्ट्रपति का भवन यहाँ, हाईकोर्ट दिख रहा पास में नागलोई यहाँ आयी कहाँ, मैं बोला, मैडम जी देखो झूठ बात मैं नहीं करता, नाग लपेटे तुम फिरती हो और,लोई लपेटे मैं फिरता..