बाद मुद्दत के उससे जो मिलने गया, देख रजनी सखी मुस्कराने लगी
एक छोटी सी बदली को कर सामने, ओट में चाँद मुखड़ा छुपाने लगी
रूप छुपता है कब ऐसे पर्दों से पर, चाँदनी सारे अंबर पे छायी रही
और गगन-ओढ़नी पे चमकते हुये, उन सितारों को भी नींद आई रही
खुद में सिमटी रही मानिनी मान से, मैं रह-रह के उसको मनाता रहा
झूठा गुस्सा भी आखिर हवा हो गया, चाह की चाँदनी झिलमिलाने लगी
रात रानी की खुशबू लिये गोद में, एक झोंका बदन को यूँ ही छू गया
सारे दिन की थकन और जहाँ भर के ग़म मिट गये करके वो जादू गया
मौन अधरों से गाती रही रागिनी, चुपके सुनता रहा बंद पलकें किये
हाथ थामे हुये निद्रा-पथ से मुझे ले के सपनों की दुनिया में जाने लगी






