फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

तस्वीरों में हिन्द-युग्म वार्षिकोत्सव 2008


हिन्द-युग्म ने २८ दिसम्बर की दोपहर २ बजे से हिन्दी भवन, आईटीओ में अपना वार्षिकोत्सव मनाया। जिसकी विस्तृत रपट आप पढ़ चुके हैं। आइए कैमरे के माध्यम से देखते हैं वहाँ की रूहत और रंगत।

मंच की शोभा प्रदीप शर्मा, प्रो॰ भूदेव शर्मा, राजेन्द्र यादव(मुख्य-अतिथि),
डॉ॰ सुरेश कुमार सिंह और डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम' (संचालक)


सभा को संबोधित करते सेंट्रल बैंक के सहायक महाप्रबंधक श्रीधर मिश्र


अतिथियों को ध्यान से सुनते हिन्द-युग्म के नियंत्रक शैलेश भारतवासी


काव्य-पाठ करतीं युवा कवयित्री रूपम चोपड़ा


हिन्द-युग्म के परिचय की स्लाइड


काव्य-पाठ करते यूनिकवि पावस नीर


फुरसत के पलों में सुनीता चोटिया और नीलम मिश्रा


काव्य-पाठ करते यूनिकवि निखिल आनंद गिरि


काव्य-पाठ करते कविहृदयी फोटोग्राफर मनुज मेहता


अल्का सेहरावत, शिवानी सिंह


काव्य-पाठ करते यूनिकवि गौरव सोलंकी


चोखेरबाली की मॉडरेटर सुजाता तेवतिया के साथ सुनीता चोटिया
इनके पीछे हैं श्री तथा श्रीमती महेन्द्रू


काव्य-पाठ करतीं कवयित्री शोभा महेन्द्रू


कार्यक्रम के बाद मुख्य-अतिथि से उनकी प्रतिक्रिया लेते शैलेश भारतवासी


कार्यक्रम की शुरूआत से पहले की तस्वीर


॰॰॰॰॰और भी तस्वीरे हैं, जिन्हें लेकर हम अगली पोस्ट में उपस्थित होंगे।

हिन्द-युग्म की बैठक सम्पन्न




कल दिनांक २१ सितम्बर २००८ को इंडिया हैबिटेट सेंटर (भारत पर्यावास केन्द्र) में हिन्द-युग्म ने एक बैठक की।
मीटिंग दोपहर २ बजे से संध्या ६ बजे तक चली।



समय-समय पर हिन्द-युग्म अलग-अलग शहरों में इस तरह की बैठक करता रहता है, ताकि हिन्द-युग्म से जुड़े हिन्दी सेवकों में हिन्दी के कुछ करने का भाव जिंदा रहे।



इस बैठक को पिछले माह के यूनिकवि पराग अग्रवाल को पुस्तकें और सम्मान आनंदम संस्था प्रमुख वरिष्ठ साहित्यकार जगदीश रावतानी ने भेंट किया।



हिन्द-युग्म के वरिष्ठम सदस्य और साहित्यकार प्रेमचंद सहजवाला ने हिन्द-युग्म की नवोदित सदस्या नीलम मिश्रा को मसि-कागद की ओर से प्राप्त पुस्तक भेंट की। नीलम मिश्रा ने बाल-उद्यान को और अधिक सक्रिय करने पर बल दिया और बहुत हद तक खुद से जिम्मेदारी उठाने की बात की।



उपलब्ध यूनिकवियों में से वरिष्ठम यूनिकवि गौरव सोलंकी ने सुमित भारद्वाज की पठनीयता को सलाम करते हुए उन्हें उपहार स्वरूप पुस्तकें भेंट की।



जगदीश रावतानी जी के हाथों हिन्द-युग्म की नवोदित कवयित्री रूपम चोपड़ा को सम्मानित किया गया। रूपम चोपड़ा के रूप में एक उत्साहित कार्यकर्ता हमें मिला है।

उपस्थित सदस्य- मनुज मेहता, शैलेश भारतवासी, यूनिकवि निखिल आनंद गिरि, नीलम मिश्रा, विपिन चौधरी, यूनिकवि गौरव सोलंकी, यूनिकवि पराग अग्रवाल, अनुराधा शर्मा, सुमित भारद्वाज, तपन शर्मा, प्रेमचंद सहजवाला, सीमा कुमार, आलोक सिंह साहिल, यूनिकवि पावस नीर, भूपेन्द्र राघव, सुनील कुमार परौहा, सजीव सारथी।

बाद में दैनिक हिन्दुस्तान का 'हिन्दी वर्ग पहेली' स्तम्भ सम्हालने वाले हरीश चंद ने भी बैठक में भाग लिया और हमारा मार्गदर्शन किया।

अन्य झलकियाँ


नीलम मिश्रा, पराग अग्रवाल, अनुराधा शर्मा, रूपम चोपडा़ तथा निखिल आनंद गिरि


पावस नीर, सुनील परौहा तथा भूपेन्द्र राघव


सुनील परौहा, सुमित भारद्वाज तथा गौरव सोलंकी


शैलेश भारतवासी और विपिन चौधरी


सीमा कुमार, गौरव सोलंकी तथा नीलम मिश्रा


सजीव सारथी और जगदीश रावतानी





फोटो- मनुज मेहता

अच्छा नहीं लगता


******************************************
हाथ खाली हों तो आँखें भर लाना अच्छा नहीं लगता
उनकी दुनिया लुट गई, उन पर गाना अच्छा नहीं लगता
माना सबके खिरजो-जज्बात* के अपने तरीके हैं मगर
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

माँ होकर क्यों देखती हूँ वही तमाशा जो बरहा लगता है
क्यों यतीम बच्चे देख मेरा खून खौलता नहीं पिघलता है
क्यों जागती हूँ तब ही जब कोई 'बापू' या 'बोस' जगता है
क्यों हरदम "मुझे" किसी रहनुमा* का इंतज़ार रहता है
उन शहीदों को यूँ नज्मों में मारना अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

मशहर-सा* माहौल है हरसू, दिल भी उदास ख़राब है
उठे हुए सवालों ने ऐसी 'सुखन' पाई के सब लाजवाब है**
अब लिखने को नहीं, करने को, उठने को हाथ बेताब हैं
क्यों लिख रही हूँ फिर, क्यों मेरी बगावत में हिजाब* है
कुछ कर नहीं सकती और 'कुछ न करना' अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

शायद कुछ मिनिट लगते हैं एक नज़्म लिखने में
और शायद कुछ मिनिट लगे थे वो जानें जाने में
कुछ मिनिट लगेंगे मॉल्स की 'सेक्युरिटी' परखने में
कुछ मिनिट लगेंगे हमें हरसू एहतियात बरतने में
'दानव बड़ा है' सोच कुछ पल लगेंगे सबको डरने में
'दानव बड़ा है' जान गुंजाइश घटेगी निशाने-तीर चूकने में
जागो तो कुछ पल लगेंगे सबको थोड़ा-थोड़ा जगने में
समझो तो पल भी नहीं लगेंगे मेरी बात समझने में
'चूड़ी-कंगन पहने' यूँ बैठे रहना अब अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

- रूपम चोपडा (RC)

(**सुखन = यहाँ दो मतलब लिए हैं - बातचीत और कविता
खिरजो-जज्बात = खिरज और जज्बात = श्रद्धांजलि और भावनाएं
मशहर = प्रलय, हिजाब = सुशीलता/नम्रता, रहनुमा = मार्गदर्शक, लीडर )

*******************************************************

वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था


आतंकवाद - दो गजलें

कल हुई दहशत ने मारे थे बहुत
जो गए, वो लोग प्यारे थे बहुत

जिस जगह पर कल धुआँ उठने लगा
घर वहाँ मेरे तुम्हारे थे बहुत

दोस्तों के और अजीजों के लिए
लोग वो सच्चे सहारे थे बहुत

धूप मीठा खिलखिलाती थी मगर
छा गए फिर मेघ कारे थे बहुत

यक-ब-यक बस्ती धुएँ से भर गई
लोग कितना डर के मारे थे बहुत

कुछ नहीं मेरा तुम्हारा ये कुसूर
अज़ल से ही अश्क खारे थे बहुत

(अर्थ: दहशत = आतंक, अज़ल = सृष्टि रचना काल , यक-ब-यक = अचानक )

(2)

शहर में मौत पे अफ़सोस करने आया था,
वो कौन शख्स था जो दर्द पढ़ने आया था.

जहाँ पे आज धमाका हुआ था शाम ढले
वहीं पे कल ही तो मैं सैर करने आया था.

यहीं पे पहली मुलाक़ात में मिला था मुझे
यहीं पे आज वो सब से बिछड़ने आया था.

बहुत हसीन था वो लाजवाब सूरत थी
कफ़न के पैरहन में अब सँवरने आया था.

बहुत बयान दिए हुक्मराँ ने मकतल पर
वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था.

तुम इस तर्ह मुझे मुजरिम समझ के मत देखो,
मैं अपने दीन पे ही जीने मरने आया था.

(अर्थ: पैरहन = वस्त्र मकतल = वधस्थल, तफ्तीश = जांच)

प्रेमचंद सहजवाला

अंतरजाल पर देवनागरी-प्रयोग का मानकीकरण एक आवश्यक आवश्यकता है (पूर्णिमा वर्मन से एक मुलाकात)




(प्रवीण सक्सेना, मनीष वंदेमातरम्, पूर्णिमा वर्मन और मोहिन्दर कुमार)


पिछले १ सप्ताह से ऑनलाइन साप्ताहिक पत्रिकाओं 'अनुभूति' और 'अभिव्यक्ति' की सम्पादकीय प्रमुख पूर्णिमा वर्मन भारत में थी। १३ फरवरी २००८ को हिन्द-युग्म के सदस्यों से उन्होंने मिलने की इच्छा जताई। सादिगनगर, नई दिल्ली में वो अपने पति के साथ सुबह लगभग १०:३० बजे के आसपास हिन्द-युग्म के मोहिन्दर कुमार, मनीष वंदेमातरम् और शैलेश भारतवासी से मिलीं।

इंटरनेट पर हिन्दी का बढ़ता प्रचलन, विकिपिडिया पर हिन्दी की बढ़ती पृष्ठ संख्या चर्चा के मध्य में रहे।

पूर्णिमा वर्मन जी ने कहा कि इंटरनेट पर देवनागरी लिपि के मानकीकरण पर सभी को ध्यान देने की आवशयकता है। क्योंकि गूगल सर्च (या किसी भी तरह की सर्चइंजनी पद्धति) इन्हीं लिपियों के हिसाब से परिणाम देता है। उन्होंने कहा कि चूँकि हिन्द-युग्म, अनुभूति और अभिव्यक्ति मंच इंटरनेट पर हिन्दी का प्रतिनिधित्व करते हैं, इसलिए पहले हमें ही इस मानकीकरण को लागू करना चाहिए। जहाँ हिन्द-युग्म अनुस्वार (ं) लगाये वहाँ हम अनुस्वार लगायें, जहाँ हिन्द-युग्म अर्द्धानुस्वार (चंद्रविन्दु, ँ) लगाये, वहाँ हमारी दोनों पत्रिकाओं में ऐसा हो। जाय में कब 'य' लगे कब 'ए', 'ए' के ऊपर 'ँ' लगे या न लगे इत्यादि मानकीकरण तय कर लिए जायँ और २-३ महीनों के अंदर अपने-अपने संग्रहालय का मानकीकरणों कर लिया जाय।

हिन्द-युग्म ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार किया। और यह विश्वास दिलाया कि हिन्दी के लिए किये जाने वाले किसी भी सकारात्मक कदम का स्वागत करता है।


(प्रवीण सक्सेना, मनीष वंदेमातरम्, पूर्णिमा वर्मन और शैलेश भारतवासी)

भविष्य में अनुभूति-अभिव्यक्ति और हिन्द-युग्म संयुक्त रूप से हिन्दी के लिए काम करने पर एकमत हुए। बैठक मात्र २ घंटों की रही, लेकिन दोनों ओर से इसका आनंद लिया गया।


(मनीष वंदेमातरम्, पूर्णिमा वर्मन और शैलेश भारतवासी)

सराय में कल हुई ब्लॉगर-संगत ज़रूरी-सी लगती है (पूरी रिपोर्ट, साथ में अखबारिया कवरेज़)


हिन्दी चिट्ठाकारों की जमात कुछ मामलों में बहुत ऊर्जावान दिखाई पड़ती है। पिछले १ वर्षों से दुनिया भर के कई कोनों में हिन्दी ब्लॉगरों ने बैठकें की है, जिनमें से अधिकतर बैठकों के पीछे मेलजोल को और आगे ले जाना ही रहा है। यद्यपि ऐसी बैठकों का भी खासा प्रभाव ब्लॉगिंग के प्रति रूझान बढ़ने पर देखा जा सकता है।

अख़बारों व पत्रिकाओं में हिन्दी ब्लॉग के लिए भी एक कोना तय हो जाने से तमाम पत्रकारों, लेखकों, विचारकों, फिल्ममेकरों में कीबोर्डीय हलचल बढ़ सी गई है। और बहुत खुशी की बात है कि आपसी मेल-मिलाप से आगे निकलकर ब्लॉगर्स इसके भविष्य को लेकर भी चिंतित हो गये हैं। बड़े पैमाने पर देखें तो इस तरह की बैठक अब तक तीन ही हुई हैं।

१४ जुलाई २००७ को मैथिली जी के आवास पर इस तरह की चर्चा हुई। दूसरी चर्चा अंग्रेज़ी और हिन्दी ब्लॉगरों के एक साथ १२ जनवरी २००८ को जमा होने पर हुई, जहाँ हिन्दी ब्लॉगरों का नेतृत्व किया मशहूर कवि अशोक चक्रधर ने।

तीसरी बड़ी और सफल ब्लॉगर मीट, कल यानी १३ फरवरी २००८ को २९, राजपुर रोड, सिविल लाइन्स, दिल्ली में हुई, जिसपर थोड़ी सी सामग्री आज के दैनिक भास्कर में है। कुछ आरोप-प्रत्यारोपों को नज़र अंदाज़ करें तो यह ब्लॉगर वैयक्तयिक चर्चाओं से ऊपर उठकर ब्लॉगिंग के बारे में हुई।



दैनिक-भास्कर ने जिन मुद्दों को छोड़ दिया है, वो मैं अपनी मार्फत जोड़ना चाहूँगा।

१॰ सुनील दीपक ने ब्लॉगिग से जुड़ने के पीछे अभिव्यक्ति के एक मंच खोजने की वकालत की।
२॰ मसिजीवी ने पाठक संख्या बढ़ाने को लेकर मुझसे और ब्लॉगवाणी के तकनीक प्रमुख सिरील से सुझाव माँगे।
३॰ अविनाश ने कहा कि मोहल्ला एक कम्न्यूनिटी ब्लॉग है इसलिए मुझे जब अपनी नोस्टालजिया में जाना होता है तो मैं दिल्ली दरभंगा छोटी लाइन पर लिखता हूँ।
४॰ अमर उजाला के ऐसोसिएट एडीटरअरूण आदित्य ने ब्लॉग की शक्ति इस तरह से बसारी कि अब वो अपने अखबार में ब्लॉग से कंटेंट उठाकर प्रकाशित करने लगे हैं, हालाँकि उसी समय गाहे-बगाहे के विनीत कुमार ने उनका विरोध किया कि आपने वहाँ भी नामी लेखकों (अरूण कमल, उदय प्रकाश आदि) की प्रतिक्रियाएँ प्रकाशित की है।,
५॰ बहुत से लोग मौन रहें जिनसे विशेषरूप से बोलने का आग्रह किया गया।
६॰ इरफान और आकाशवाणी के मुनीश ने ब्लॉगिंग को सकारात्मक टूल की तरह इस्तेमाल किए जाने इर बल दिया।
७॰ नोटपैड ने उद्देश्यपरक ब्लॉगों की अहमियत पर ज़ोर दिया

८॰ सराय के राकेश सिंह ने इस तरह के आयोजनों की निरंतरता पर ज़ोर दिया

इस तरह की मासिक मीट आवश्यक सी लगती है।