फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

ग़ज़ल


मै जब भी हूँ किसी इंसां के करीब जाता ।
अल्लाह तेरा बस तेरा ही वजूद पाता ॥

कितने ही चांद सूरज अंबर में हैं विचरते,
हर कोई ऐसा लगता, चक्कर तेरा लगाता ।

देख जो मैने फूलों को खिलते औ महकते
तुम्हारी बंदगी में, सर है झुका ही जाता ।

देखा जो मैने चिडिय़ॊं को उड़ते औ चहकते,
जर्रा यहां का हर, तेरी याद है दिलाता ।

रख ले मुझे हमेशा अपनी शरण में मौला,
दिल बार बार तुझको आवाज़ है लगाता ।

कवि कुलवंत सिंह

ईद 2008 और हिन्दी कविताएँ







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - ईद/रमजान/भाईचारा

अंक - अठारह

माह - सितम्बर २००८





काव्य-पल्लवन का अठारहवाँ अंक लेकर हम प्रस्तुत हैं। इस बार हमने विषय को 'ईद/रमज़ान/भाईचारा' को समर्पित किया है। पिछले महीने इस प्रस्ताव पर लम्बी चर्चा हुई थी कि इसे विषय विशेष से बदलकर विधा विशेष कर देना चाहिए, इस चर्चा में लम्बा समय बीता और निर्णय लेने तक कई तारीखें बदल गई थीं। समय कम दिया गया, फिर भी हमें १२ कविताएँ प्राप्त हो गईं। और दो कविताएँ (एक जय कुमार की और दूसरी ) भी प्राप्त हुई थीं, लेकिन उसमें लिखे शब्दों को समझ पाना कठिन था। रचनाकारों को इस बाबत सम्पर्क किया गया, लेकिन हमें उत्तर नहीं मिला, इसलिए हम उन्हें शामिल नहीं कर रहे है।

सबसे अच्छी बात है कि सभी कलमकारों ने सौहार्द और शांति का पैगाम दिया है। इनका पैगाम दुनिया को पहुँचे, हमारी तो यही कामना है।

आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| संजीव वर्मा "सलिल" | विवेक रंजन श्रीवास्तव | प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव | सविता दत्ता | महेश कुमार वर्मा | सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न ' | बसंत लाल दास | राजीव सारस्वत | शोभा महेंद्रू | सुनील कुमार 'सोनू' |पंखुड़ी कुमारी |

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





ईद हो हर दिन हमारा,
दिवाली हर रात हो.
दिल को दिल से जीत लें हम,
नहीं दिल की मात हो.....
भूलकर शिकवे शिकायत,
आओ हम मिल लें गले.
स्नेह सलिला में नहायें,
सुबह से संझा ढले.
आंख तेरी ख्वाब मेरे,
खुशी की बारात हो.....
दर्द मुझको हो तो तेरी
आंख से आंसू बहे
मेरे लब पर गजल
तेरे अधर पर दोहा रहे
जय कहें जम्हूरियत की
खुदी वह हालात हो.....
छोड दें फिरकापरस्ती
तोड नफरत की दिवाल.
दूध पानी की तरह हों एक
ऊंचा रहे भाल.
"सलिल" की शहनाई,
सबकी खुशी के नग्मात हो.....

खुशियों के त्यौहार

ईद दिवाली ओणम क्रिसमस
खुशियों के त्यौहार.
लगकर गले बधाई दें लें
झूमें नाचें यार.
हम सब भारत मां के बेटे
सबके सुख दुख एक.
सभी सुखी हों यही मनाते,
तजें न अपनी टेक.
भाईचारा मजहब अपना
मानवता ईमान.
आंसू पोछें हर पीडित के
बन सच्चे इंसान.
नूर खुदाई सबमें देखा
कोई दिखा न गैर.
हाथ जोडकर रब से मांगें
सबकी रखना खैर
.
दहशतगर्दी से लडना है
हर इंसां का फर्ज.
बहा पसीना चुका सकेंगे
भारत मां का कर्ज
गुझिया सिंवई खिकायें खायें
हों साझे त्यौहार.
अंतर से अंतर का अंतर
मिटा लुटायें प्यार.

--संजीव वर्मा "सलिल"



आसमां में गुफ्तगू है चल रही ,
चाँद की आये खबर तो ईद हुई
अम्मी बनातीं थीं सिंवईयाँ दूध में ,
स्वाद वह याद आया लो ईद हुई
नमाज हो मन से अदा,
जकात भी दिल से बँटे,
मजहब महज किताब नहीं
पूरे हुये रमजान के रोजों के दिन ,
सौगात जो खुदा की, वो ईद हुई
आतंक होता अंधा जुनूनी बेइंतिहाँ ,
मकसद है क्या इसका भला
गांधी जयंती ईद है इस दफा ,
जो अंत हो आतंक का तो ईद हुई
नजाकत नफासत और तहजीब की
पहचान है मुसलमानी जमात,
आतंक का नाम अब और मुस्लिम न हो,
फैले रहमत तो ईद हुई
कुरान को समझें,
समझें जिहाद का मतलब,
ईद का पैगाम है मोहब्बत
दिल मिलें,भूल कर शिकवे गिले ,
गले रस्मी भर नहीं ,तो ईद हुई
रौनक बाजारों की , मन का उल्लास ,
नये कपड़े ,और छुट्टी पढ़ाई की
उम्मीद से और ज्यादा मिले ,
ईदी बचपन , और बड़प्पन को ईद हुई

--विवेक रंजन श्रीवास्तव



ईद के चाँद की खोज में हर बरस ,
दिखती दुनियाँ बराबर ये बेजार है
बाँटने को मगर सब पे अपनी खुशी,
कम ही दिखता कहीं कोई तैयार है
ईद दौलत नहीं ,कोई दिखावा नहीं ,
ईद जज्बा है दिल का ,खुशी की घड़ी
रस्म कोरी नहीं ,जो कि केवल निभे ,
ईद का दिल से गहरा सरोकार है !! १!!
अपने को औरों को और कुदरत को भी ,
समझने को खुदा के ये फरमान है
है मुबारक घड़ी ,करने एहसास ये -
रिश्ता है हरेक का , हरेक इंसान से
है गुँथीं साथ सबकी यहाँ जिंदगी ,
सबका मिल जुल के रहना है लाजिम यहाँ
सबके ही मेल से दुनियाँ रंगीन है ,
प्यार से खूबसूरत ये संसार है !!२!!
मोहब्बत, आदमीयत ,
मेल मिल्लत ही तो सिखाते हैं सभी मजहब संसार में
हो अमीरी, गरीबी या कि मुफलिसी ,
कोई झुलसे न नफरत के अंगार में
सिर्फ घर-गाँव -शहरों ही तक में नहीं ,
देश दुनियां में खुशियों की खुश्बू बसे
है खुदा से दुआ उसे सदबुद्धि दें,
जो जहां भी कहीं कोई गुनहगार है !!३!!
ईद सबको खुशी से गले से लगा,
सिखाती बाँटना आपसी प्यार है
है मसर्रत की पुरनूर ऐसी घड़ी,
जिसको दिल से मनाने की दरकार है
दी खुदा ने मोहब्बत की नेमत मगर,
आदमी भूल नफरत रहा बाँटता
राह ईमान की चलने का वायदा,
खुद से करने का ईद एक तेवहार है !!४!!
जो भी कुछ है यहां सब खुदा का दिया,
वह है सबका किसी एक का है नहीं
बस जरूरत है ले सब खुशी से जियें,
सभी हिल मिल जहाँ पर भी हों जो कहीं
खुदा सबका है सब पर मेहरबांन है,
जो भी खुदगर्ज है वह ही बेईमान है
भाईचारा बढ़े औ मोहब्बत पले ,
ईद का यही पैगाम , इसरार है !!५!!

--प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव



भारत वर्ष में हम भारतीय
सम्भवतः सभी पर्व मनाते हैं।
धर्म निरपेक्षता पहचान इसकी
धरती आनन्द मग्न सदा रहती
अनेक त्यौहार कभी कभार
माह दो माह के भीतर-भीतर
हर धर्म में मनाए जाते हैं।
कभी ईद,दिवाली इकट्ठे हुए
कभी आनन्द चौदस और
गणेश-चतुर्दशी
पोंगल और लोहड़ी हैं
कभी गुरू पर्व क्रिसमस जुड़ जाते हैं।
श्रृंखला बद्ध तरीके से जब
हम बड़े-बड़े उत्सव मनाते हैं।
फूलों की बौछार आसमाँ करते
हृदय आनन्द विभोर हो जाते हैं।
हमारी राष्टीय एकता और अखंडता
इसी सहारे जीवित है
सब धर्म यहाँ उपस्थित हैं
सब धर्म की राह दिखाते हैं
भारत वर्ष को शत-शत नमन
हन तभी भारतीय कहलाते हैं।

--सविता दत्ता



है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥

--महेश कुमार वर्मा



अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
दहल गए है कलेजे सब के ,
शोर धमाकों का सुन सुन कर
हैरान हूँ मै क्यों नही मारता,
ये बम हिन्दुओं को चुन चुन कर
वहाँ मुस्लमान भी मरते है
ये बम भेदभाव नही करते है
शोर धमाकों का गूँज रहा है
पटाखे फिर मै चलाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
गले लगो गर लग सको
भुलाके मजहब ईमान सभी
न हिंदू कहो न मुस्लिम कहो
बन जाओ जरा इंसान सभी
सब भारत माँ की संतान है
ये देश तो बड़ा महान है
सदभावना की अजान सुनाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे

--सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न'



रमजाने-पैगाम याद रखना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
आयतें उतरी जमीं पे जिस रोज,
अनवरे-इलाही आयी उस रोज;
इनायत खुदा की न कभी भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
खयानत का ख्याल तू दिल से निकाल दे,
खुदी को मिटा खुदाई में तस्लीम कर दे;
क़यामत के कहर में भी ये कलाम न छोड़ना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
अदावत का गुल ना खिल पाये कभी,
हबीबों की हस्ती ना हिल पाये कभी;
जुर्मों की जहाँ से सदा परहेज करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
पीर-फकीर, मौलाना हुए इसी राह पे चलकर,
उतारा आयतों को दिल में जुल्मों-सितम सहकर;
हर मर्ज की दवा है, वल्लाह , ना भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
हम हैं नूर खुदा के, सबसे प्यारे हैं खुदा के,
मोमिनों अहिंसक बनो, कह गए पैगम्बर सबसे;
जख्म ना पाये कोई जीव हमसे, सदा रहम करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥

--बसंत लाल दास



इक नया इतिहास
अब चलो नया इतिहास लिखें हम
स्‍नेह, मिलन के अध्‍यायों का
आपस के संघर्षों की
परम्‍परा मिटाने का
सुख दुःख साथ निभाने का

युद्ध नहीं हो कोई अब से
सत्‍ता और किसानों में
द्वन्द्व नहीं हो कोई अब से
धर्म के नाम पर आपस में
मानवता है धर्म सर्वोपरि
सबको गले लगाने का
पग पग नेह लुटाने का
अब चलो नया...
सम्‍प्रदायगत भावनाओं को
पैरों तले दबाना है
भ्रष्‍ट जनों के पुण्‍य कर्म को,
सिर पर नहीं बिठाना है
सबको यही सिखाना है
कि मिलकर बोझ उठाना है
समाधान हो ऐसे अपनी
राष्‍ट्र समाज की समस्‍याओं का
अब चलो नया....

--राजीव सारस्वत



भारत माँ की बगिया
रंग-बिरंगे फूलों से मुस्काती है
त्योहारों के मौसम मैं
कुछ और भी महक जाती है.

भाद्र मास आते ही
त्योहारों की बाढ़ सी आजाती है
एक ऐसी हवा चलती है
हर फूल को महका जाती है.

जन्माष्टमी,राखी, पर्व,
साथ-साथ आते हैं
और अपने साथ मैं
रमजान भी ले आते हैं

त्योहारों का साथ-साथ आना
ईश का वरदान है
ये कहती है कुदरत
सब उसी की संतान हैं

मैं रखूं रमजान
तुम नवरात्र रखना
प्रेम का प्रसाद
सब मिलकर चखना

राम को पूजो
या अल्लाह को मानो
पर माता की गोदी के
लाल न उजाडो

त्योहारों पर भी गर
हिंसा फैलाओगे
न राम मिलेगा
न अल्लाह को पाओगे

त्योहरीं ने प्यार की
डोर ये डाली है
बंध जाओ इसमें
ये बड़ी मतवाली है

एक साथ नाचो
और एक साथ गाओ
एकता की बीन बजी
एक हो जाओ

भिन्नता भुलाओ-
भिन्नता भुलाओ

--शोभा महेंद्रू



आनंद-उल्लास से भरा है पलकों का गागर
प्रेम-आश से छलका है धड़कनों का सागर
इस नज़र में उस नज़र में चाहे देखो जिस नज़र से
एक नई खुशी है एक नई है मुस्कराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

आसमान के सुनहरी लाल-लाल किरणें
समायी हुयी है सबके मासूम चेहरे पे.
चांदनी भी कुछ कम नहीं
फलक पे दिख रही निखरी-निखरी से
ये चिड़ियों की चहचहाहट, वो पत्तों की सरसराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

सजदे दुआओं तेरे सहज कबूल हों
रहें जिंदगी में तेरे जलज फूल हों
खुदा की असीम कृपा तेरे साथ रहे
भटकाव न आए कभी लक्ष्य पे तेरे आँख रहे
ये दुआ हमारी तरफ़ से, कही जो अब तक
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक !

-सुनील कुमार 'सोनू'



रमजान का महीना लाया
ईद की सुंदर सौगात|
सौगात को संजो लेते सब
आड़े न आता हैसियत औ हालात ||

बड़ी मुश्किल से मुझे मालूम पड़ी
ईद मनाने की ये वजह |
दिल ने कहा क्यों इन्सान
खुश नहीं हो सकता बेवजह||

गले मिलते हैं
साथ खाते हैं |
इस दिन दुश्मन को भी
गले लगाते हैं ||

पर इक दिन ही क्यों
हर दिन वैर मिट नहीं सकता |
मीठी सेवईयाँ लेने से
क्या और दिन कोई रोकता ||

कुरान का पाठ
खुदा की इबादत |
रखता जज्बों को पाक
दूर रहती बुरी आदत ||

क्या रोज इबादत से
खुदा ख़फा हो जाएगा |
रोज कुरान पढ़ने से
कोई दफा लग जाएगा ||

क्यों आपसी भाईचारा और प्यार
एक मौके की मोहताज है |
क्यों ईद का मिलाप
बस ईद के दिन की बात है ||

ये रंगीन पल, ये रौशनी
ये रौनक, ये चमक |
क्यों नही रह सकते जेहन में तब तलक
आ न जाए दूसरा ईद जब तलक ||

इस बार ईद पे
कुछ ऐसी ईदी दे दो |
जिससे गले मिला आज
उसे ताउम्र अपना कर लो ||

हर गम और रंजिश को मिटा के दे
सबको ईद की मुबारकबाद |
करे उस अल्लाह को याद
जिसकी हैं हम सब ही औलाद ||

--पंखुडी कुमारी



वहशत की दहशत...


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आँधी भूल सब आगे निकल गये.

धरती हुई थी लाल, लपटें उठी थीं विकराल,
अनदेखों ने अनजानों से खेली थी होली लाल,
न तुमको चेहरा मिला, ना ही कोई नाम मिला,
फिर क्यों किया मौत का तान्डव, ये ज़लज़ला...?

कोई भाई ढूंढता मिला, किसी को न दोस्त मिला,
बदहवास से समेटते रहे, वो दहशत का सिलसिला,
माँएँ बिलखती रहीं, बेटियाँ सिसकती रहीं,
कुछ वहशी पलों में, जीवन बेल टूटती रहीं,

रूपहले स्वप्न टूट गये, मोती सारे बिखर गये,
बिन चाहे वो तो अपना, अंतिम सफर कर गये,
लाचार हो खडे सब तमाशा देखते रहे,
और तूफानों में मुस्काते फूल बिखरते रहे.

देश अन्धेरे में डूबता रहा, सियासत अनजान रही,
हिन्द की धरती पर आज अपनों की साजिश रही,
आज यहाँ कल वहाँ बस यही सवाल रह गये,
कब तुम कब हम, बस अब यही हाल रह गये.


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आन्धी भूल सब आगे निकल गये...

--अरविन्द चौहान

अच्छा नहीं लगता


******************************************
हाथ खाली हों तो आँखें भर लाना अच्छा नहीं लगता
उनकी दुनिया लुट गई, उन पर गाना अच्छा नहीं लगता
माना सबके खिरजो-जज्बात* के अपने तरीके हैं मगर
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

माँ होकर क्यों देखती हूँ वही तमाशा जो बरहा लगता है
क्यों यतीम बच्चे देख मेरा खून खौलता नहीं पिघलता है
क्यों जागती हूँ तब ही जब कोई 'बापू' या 'बोस' जगता है
क्यों हरदम "मुझे" किसी रहनुमा* का इंतज़ार रहता है
उन शहीदों को यूँ नज्मों में मारना अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

मशहर-सा* माहौल है हरसू, दिल भी उदास ख़राब है
उठे हुए सवालों ने ऐसी 'सुखन' पाई के सब लाजवाब है**
अब लिखने को नहीं, करने को, उठने को हाथ बेताब हैं
क्यों लिख रही हूँ फिर, क्यों मेरी बगावत में हिजाब* है
कुछ कर नहीं सकती और 'कुछ न करना' अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

शायद कुछ मिनिट लगते हैं एक नज़्म लिखने में
और शायद कुछ मिनिट लगे थे वो जानें जाने में
कुछ मिनिट लगेंगे मॉल्स की 'सेक्युरिटी' परखने में
कुछ मिनिट लगेंगे हमें हरसू एहतियात बरतने में
'दानव बड़ा है' सोच कुछ पल लगेंगे सबको डरने में
'दानव बड़ा है' जान गुंजाइश घटेगी निशाने-तीर चूकने में
जागो तो कुछ पल लगेंगे सबको थोड़ा-थोड़ा जगने में
समझो तो पल भी नहीं लगेंगे मेरी बात समझने में
'चूड़ी-कंगन पहने' यूँ बैठे रहना अब अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

- रूपम चोपडा (RC)

(**सुखन = यहाँ दो मतलब लिए हैं - बातचीत और कविता
खिरजो-जज्बात = खिरज और जज्बात = श्रद्धांजलि और भावनाएं
मशहर = प्रलय, हिजाब = सुशीलता/नम्रता, रहनुमा = मार्गदर्शक, लीडर )

*******************************************************

वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था


आतंकवाद - दो गजलें

कल हुई दहशत ने मारे थे बहुत
जो गए, वो लोग प्यारे थे बहुत

जिस जगह पर कल धुआँ उठने लगा
घर वहाँ मेरे तुम्हारे थे बहुत

दोस्तों के और अजीजों के लिए
लोग वो सच्चे सहारे थे बहुत

धूप मीठा खिलखिलाती थी मगर
छा गए फिर मेघ कारे थे बहुत

यक-ब-यक बस्ती धुएँ से भर गई
लोग कितना डर के मारे थे बहुत

कुछ नहीं मेरा तुम्हारा ये कुसूर
अज़ल से ही अश्क खारे थे बहुत

(अर्थ: दहशत = आतंक, अज़ल = सृष्टि रचना काल , यक-ब-यक = अचानक )

(2)

शहर में मौत पे अफ़सोस करने आया था,
वो कौन शख्स था जो दर्द पढ़ने आया था.

जहाँ पे आज धमाका हुआ था शाम ढले
वहीं पे कल ही तो मैं सैर करने आया था.

यहीं पे पहली मुलाक़ात में मिला था मुझे
यहीं पे आज वो सब से बिछड़ने आया था.

बहुत हसीन था वो लाजवाब सूरत थी
कफ़न के पैरहन में अब सँवरने आया था.

बहुत बयान दिए हुक्मराँ ने मकतल पर
वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था.

तुम इस तर्ह मुझे मुजरिम समझ के मत देखो,
मैं अपने दीन पे ही जीने मरने आया था.

(अर्थ: पैरहन = वस्त्र मकतल = वधस्थल, तफ्तीश = जांच)

प्रेमचंद सहजवाला

दिल पे मगर हिन्दी-हिन्दुस्तान लिखना


फूल लिखना कि पान लिखना
गेहूँ लिखना कि धान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल पे मगर हिन्दी-हिन्दुस्तान लिखना

वेद लिखना कि पुरान लिखना
सबद लिखना कि कुरान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल......
सुबह लिखना कि शाम लिखना
रहीम लिखना राम लिखना
कागद पे
दिल पे.....

मजूर लिखना कि किसान लिखना
बच्चे-बूढ़े या तुम जवान लिखना
कागद पे ...
दिल पे.......
गीत गज़ल का उनवान लिखना
तमिल उड़िया जुबान लिखना
कागद पे..
दिल पे हिन्दी-हिन्दुस्तान लिखना

-- डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'
रोहतक (हरियाणा)




हिन्दी दिवस,
भाषा और साहित्य का-
है दिवस एक पावन;
पर एक शंका उठती रही,
सामने है खड़ा वह-
अंग्रेजी का रावण।
दिख रहा स्पष्ट यह,
लीलता है जा रहा-
हिन्दी की वह गरिमा को;
कमर कस हिन्दी सेवक,
हों अगर तैयार सब-
बचा लें इसकी महिमा को।
हिन्दी के मानस पुत्रों ने,
विकास के रोड़े हटाये-
किया संघर्ष-दुर्धर्ष;
आज है यह हमारी,
साहित्य के प्रति जिम्मेदारी-
न जाए वह संघर्ष-व्यर्थ।
भारतेंदु और प्रेमचंद,
निराला से लेकर पन्त-
करते रहे प्रयास;
हिन्दी साहित्य को दे,
रचनाओं की समृद्धि-
किया इसका विकास।
हिन्दी जोड़ती एक सूत्र में,
उत्तर से ले दक्षिण तक-
कार्य करती रही;
बिना हिन्दी के बने कैसे,
एक देश और एक राष्ट्र-
हमारा अखंड हिंदुस्तान।
संस्कृति की रक्षा,
करना है हिन्दी के द्वारा-
हमपर है यह कर्ज;
संकल्प लें हम,
हिन्दी रक्षा कर-
निभाएंगे अपना फर्ज।
यही उद्घोष है अपना,
हिन्दी के अनवरत विकास की-
लड़ेगा जो लड़ाई,
वही साधक है,
पाने लायक बचा बस-
हिन्दी दिवस की बधाई।

--प्रमोद कुमार,
जामतारा,
झारखण्ड (भारत)

एक्ल्व्य का अंगूठा-गुरु ने नहीं कटवाया?


भारत का पहला शिक्षक

मित्रो,
भारत नाम के
देश में शिक्षक
नहीं गुरू होते थे
अपना यह देश
परम्परओं का देश है
और परम्परा रिवाज नहीं होती
धारा होती है
जैसे समय की धारा
जो निरन्तर अविकल बहती है
यहां सदा-सदा से
ज्ञान बांटते रहे थे ,गुरु
और ज्ञान प्राप्त करते रहे थे शिष्य
शिष्य ! विद्यार्थी नहीं शिष्य
क्या फ़र्क होता है
शिष्य और विद्यार्थी मे?
जी वही
जो होता है शिक्षक और गुरु में
विद्यार्थी माने हुआ
जिसे विद्या की चाह हो,ज्ञान की नहीं
और अब तो विद्या विद्यार्थी दोनो के अर्थ बदल रहे हैं
अब तो विज्ञान माने विशेष ज्ञान का जमाना है
ज्ञान तो गौण हुआ,
विज्ञान ही सब कुछ है अब
उसी तरह विद्यार्थी के अर्थ भी बदल गये हैं अब
विद्या+ अर्थ
अर्थ माने धन
धन+विद्या
का जोड़
क्या भला ज्ञान कहला सकता है ?
जब हो जाता है
धन का प्रवेश
तो ज्ञान हो जाता है अशेष
केवल
भारत भू पर ही थे गुरु
देवगुरू बृहस्पति
दानव गुरू-शुक्राचार्य
वही शुक्राचार्य जिन्होने
वामन बने छ्ली-विष्णु से
राजा बली ,अपने शिष्य को
बचाने के प्रयत्न में गवां दी थी अपनी आँख
ऋषि वशिष्ठ हो या ऋषि विश्वामित्र या ऋषि संदीपन
इन गुरुओं के सम्मुख दंडवत होते थे
हमारे अवतार पुरूष
राम और कृष्ण
गुरुकुलों मे समान होते थे
राजा और रंक
कृष्ण-सुदामा
पर अचानक वक्त ने करवट ली
और अंधे धृष्तराष्टर के मोह नें
मोड़ दी ज्ञान की धारा
गुरू गये
आगये शिक्षक
जी हां-गुरू नहीं शिक्षक
ऋषि नहीं आचार्य
जी ठीक समझे आप
आचार्य द्रोण या द्रोणाचार्य
द्रोण पहले शिक्षक थे भारत भू के
वे शिक्ष्क थे इसीलिये ऋषि नही आचार्य कहलाये
अगर द्रोण होते गुरू तो कहलाते ऋषि
न कि आचार्य
और इतिहास साक्षी है कि
एकलव्य का अंगूठा किसी गुरू ने नहीं
एक शिक्षक ने आचार्य ने कटवाया था
गुरू दिवस मनाये
शिक्षक दिवस नहीं

15 अगस्त 15 कविताएँ


स्वाधीनता दिवस, स्वतंत्रता दिवस, ६१वीं आज़ादी दिवस पर हिन्द-युग्म की विशेष प्रस्तुति

दुनिया में हर जगह, भारतीय अपनी आज़ादी का जश्न मना रहे हैं। हिन्द-युग्म भी अपने कविता पृष्ठ पर अपने तरीके से स्वाधीनता दिवस का जश्न मना रहा है। १५ अगस्त के दिन १५ कविताएँ लेकर हाज़िर है। भारत विभिन्नता में एकता का देश है। हमने भी इस विशेष अंक में आज़ादी के कविता के १५ भिन्न-भिन्न रंग शामिल किये हैं। इस अंक में पूर्वी भारत से भी एक लिखने वाली हैं, पश्चिम से भी कोई है, उत्तर तो हिन्दी की दुनिया है, दक्षिण की भी कवयित्री शामिल हैं। कवयित्री हरकीरत कलसी 'हकी़र' गुवाहाटी आसाम में रहती हैं, तो वहीं कवयित्री सी आर॰ राजश्री कोयमबटूर से हैं। देवेन्द्र वाराणसी, मयंक नोएडा, विवेक पाण्डेय भोपाल से, विवेक रंजन और विदग्ध जबलपुर, वहीं संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी नागौर राजस्थान, तो सुधी जयपुर से हैं। विद्याधर दुबे कानपुर से, प्रदीप मानोरिया मध्य प्रदेश, निशिकांत नोएडा, वीनस केसरी इलाहाबाद तो प्रदीप पाठक नई दिल्ली से हैं। मतलब अनन्त रंगों में से १५ रंग आज हमने अपने पृष्ठ पर सजाएँ हैं। आज इस अंक के लिए चित्रकार राजेश तिवारी ने एक चित्र भी बनाकर भेजा है। शेष आपकी टिप्पणियों के विविध रंगों का इंतज़ार रहेगा।






स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष











आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| मयंक सक्सेना | सुधीर सक्सेना 'सुधि' | प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध" | हरकीरत कलसी 'हकी़र' | सी आर राजश्री | विवेक पांडेय | वीनस केशरी | संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी | प्रदीप पाठक | विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र" |विद्याधर दुबे |कमलप्रीत सिंह | प्रदीप मानोरिया | देवेन्द्र पाण्डेय | निशिकांत तिवारी

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~









विधि-
1. (blogger) ब्लॉग पर लगाने के लिए डैशबोर्ड से 'Layout' में जायें, 'Add A Page Eliment' पर क्लिक करें। फिर HMTL/Javascript पर क्लिक करें। 'Content' के बक्से में कोड पेस्ट करें और अपनी मर्जी का शीर्षक चुनकर Save कर लें (सहेज लें)।
(wordpress) ब्लॉग में लगाने के लिए डैशबोर्ड से उस ब्लॉग के 'Design' में जायें जिसमें इस पोस्टर को लगाना चाहते हैं। फिर Widget पर क्लिक करें। ढेरों विकल्प आयेंगे। आप 'Text' को जोड़ें। फिर दायीं तरफ Text की एक पट्टी बन जायेगी, उसके Edit पर क्लिक करें और सहेज लें। (याद रखें माउस की जगह CTRL+v से पेस्ट करें)।

2. ऑरकुट के लिए कोड को सीधे स्क्रेपबुक में पेस्ट करें।
3. ईमेल सिग्नेचर के लिए ईमेल सेटिंग में जाकर 'सिग्नेचर' के HTML विकल्प में उपर्युक्त कोड पोस्ट करें।



विज़न २०२०
हरी नीली लाल पीली
बड़ी बड़ी तेज़ रफ्तार मोटरें
और उनके बीच दबा,
सहमा, डरा सा
आम आदमी

हरे भरे लहराते बड़े बड़े
पेडो के नीचे बिखरी पन्निया
बारिश की प्रदुषण धुली बूँदें
आँखों से बरसती

सड़क पर चाय के ठेले पर
वही बुढ़िया और
चाय पहुचता
वही छोटू

स्कूल से निकलता अल्हड, मस्त
किल्कारिया भरता बचपन
और पास ही सड़क पर
भीख मांगते नन्हे,
असमय बड़े हो चुके
छोटे बच्चे

पाँच सितारा अस्पताल का
उद्घाटन करते प्रधान मंत्री
की तस्वीर को घूरती
सरकारी अस्पताल में
बिना इलाज मरे शिशु की लाश

और इन सबको
कर उपेक्षित
विकास के दावो की होर्डिंग निहारता मैं
मन में दृढ़ करता चलता विश्वास
की हाँ २०२० में
हम विकसित हो ही जाएँगे
दिल को बहलाने को ग़ालिब...........

--मयंक सक्सेना



लोकतंत्र के सपने

एक हाथ में लोकतंत्र के सपने
दूसरे में बारूदी छर्रे!
बोलिए-हिप-हिप हुर्रे!
एक तरफ़ भूखे एहसास;
दूसरी तरफ कसाई!
जी हाँ, आपने भी
सही जगह बस्ती बसाई!
पेट में उगते हैं मौसम,
चूल्हे में सुबह-शाम!
बाकी जिंदगी तो होती है,
सड़कों पर तमाम |
आस्तीनों में पलते हैं दोस्त,
म्यानों में मिलते हैं संबंध!
मखमल के हैं संबोधन,
लेकिन टाट के हैं पैबंद!
पर, मेरे वैचारिक सहचरो!
वोट देते ही रटने लगो-
संविधानी मंत्र! वरना
फिर किस तरह बचेगा लोकतंत्र!
और अगर लोकतंत्र नहीं रहा तो
तुम्हारा पेट और चूल्हा कहाँ जाएगा?

--सुधीर सक्सेना 'सुधि'



हिमगिरि शोभित
सागर सेवित
सुखदा गुणमय
गरिमा वाली
सस्य श्यामला
शांति दायिनी
परम विशाला
वैभवशाली ॥
प्राकृत पावन
पुण्य पुरातन
सतत नीती नय
नेह प्रकाशिनि
सत्य बन्धुता
समता करुणा
स्वतंत्रता शुचिता
अभिलाषिणि ॥
ग्यानमयी
युग बोध दायिनी
बहु भाषा भाषिणि
सन्मानी
हम सबकी
माँ भारत माता
सुसंस्कार दायिनि
कल्यानी ॥

--प्रो. सी.बी. श्रीवास्तव "विदग्ध"



यह कैसी आजा़दी है?

अभी-अभी बम के धमाको़ से
चीख़ उठा है शहर
बच्चे, बूढे,जवान
खून से लथपथ
अनगिनत लाशों का ढेर
इस हृदय विदारक वारदात की
कहानी कह रहा है

ओह!
यह कैसी आजा़दी है
जो घोल रही है
मेरे और तुम्हारे बीच
खौ़फ, आग और विष का धुआँ?
हमारे होठों पे थिरकती हंसी को
समेटकर
दुबक गई है
किसी देशद्रोही की जेब में

और हम
चुपचाप देख रहे हैं
अपने सपनों को
अपने महलों को
अपनी आकांक्षाओं को
बारूद में जलकर
राख़ में बदलते हुए.

--हरकीरत कलसी 'हकी़र'



मेरा भारत महान

मेरा यह मानना है
मेरा भारत सब दशों से महान है।
नहीं है ऐसा कोई अन्य देश,
युगों बीतने पर भी वैसा ही है परिवेश,
विभिन्नता में एकता के लिए, प्रसिद्ध है हर प्रदेश,
प्रेम, अहिंसा, भाईचारे का जो है देता संदेश।
मेरा यह मानना है
मेरा भारत सब देशों से महान है।
ऋषि-मुनियों की जो है तपोभूमि,
कई नदियों से भरी है ये पुण्य भूमि,
प्रकृति का है मस्त नजारा यहाँ,
छोड़ इसे जाए हम और अब कहाँ
मेरा यह मानना है
मेरा भारत सब देशों से महान है,
जाति, धर्म का है जहाँ अनूठा संगम,
देशभक्ति की लहर में, भूल जाते सब गम,
देश के लिए मर मिटने को सब है तैयार,
अरे दुनिया वालों, हम है बहुत होशियार,
न छेड़ो हमें, कासर नहीं है हम खबरदार,
अपनी माँ को बचाने, लेगें हम भी हथियार।
मेरा यह मानना है
मेरा भारत सब देशों से महान है

--सी आर राजश्री



१५ अगस्त १९४७ में भारत का पानी चमक उठा
व्यापक विप्लव मुख मुद्रा पर अनल यज्ञ सा दमक उठा
जननी बोली पुत्रों जागों समय गया सब सोने में
रवि दावानल सुलग गया भारत के कोने -कोने में
कायर जीवन जीवन क्या है लगा भाल पर ले रोली
सैनिक आगे बढ़कर कर दे इस जीवन की तू होली
बंगाल जगा पंजाब उठा ,उठ सैनिक दल ललकार उठे
भारत के विशुधर काले भर मस्ती में फुफकार उठे
देश वही है ,गौरवशाली जिसमें नाहर बसते हैं
फांसी पर चढ़ने से पहले एक बार जो हस्ते हों
आज हो गया देश आजाद
देकर खुशहाली हो चले गए
इस खुशहाली को रखना है कायम
चाहे फिर से एक बार होना पड़े न्योछावेर
आओ आज करें एक प्रतिज्ञान
देश के मान ओउर अभिमान की हम करेंगे सुरक्षा
१५ आगस्त सैन्तालिश को जो तिरंगा लहराया है
वही तिरंगा लाल किले पर फहरा है फहराएंगे
जय हिंद

--विवेक पांडेय



विश्व एकता के सम्मुख ना सोचो अपने प्राण की।
बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।

तम को धर से दूर करो अब पट खोलो किवाड़ की।
सीमाओं को खत्म करो अब बात करो ना बाड़ की।।
ना हो विषमता ना हो बन्धन ना हो सीमायें जिसमें।
मिल जुल कर प्रयास करो उस नव युग के निर्माण की।।

बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।

अब तो त्याग करो श्रंखला विजयों के अभियान की।
ध्वनियां तुम तक भी पहुचेगी मानवता के गान की।।
साथ हमारे अगर तुम्हे भी शान्ति दूत बन पाना है,
बन्द करो अब पूजा तुम भी भाले और कृपाण की।।
बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।
अहंकार को छोड़ो कुछ ना कीमत है अभिमान की।
हिल मिल कर अब तुम भी सोचो मानव के सम्मान की।।
लालच में तुम फंसे रहोगे ना इसमें कुछ रक्खा है,
कोशिश करके देखो राहें पाओगे निर्वाण की।।
बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।

नहीं सुनाओ अब तुम गाथा मानव के संहार की।
दिल में ज्योति जलाओ तुम भी प्यार भरे संसार की।।
जब तुमको है ये लगता सब जीवन एक समान है,
फिर क्यों अलग उपाय हो करते अपने जीवन त्राण की।।
बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।

--वीनस केशरी



करेंगे एक और संघर्ष
आओ करें संकल्प
इस स्वाधीनता दिवस पर,
करेंगे एक और संघर्ष
पाने को स्वतंत्रता
भ्रष्टाचार से
जिसने
जगह बनाई है
स्कूल से लेकर
संसद तक में
अधिकारी शिकायतकर्ता
का ही करते हैं उत्पीड़न
दौलत जुटाते हैं
करके पड़पीड़न
केवल काम नहीं चलेगा
झण्डा फहराने से
कब तक काम कराते
रहोगे नजराने से
जिस स्वतंत्रता की खातिर
दिए थे प्राण जांबाजों ने
आज उसी देश को लूट लिया
झूठ को कला समझने वाले कलाबाजों ने
आओ हम हाथ मिलायें,
अनुशासन की जंजीरों को भी चटकायें
भ्रष्ट अधिकारी हो या नेता,
या फिर उनका हो प्रणेता,
कानून तो उनकी मुठ्ठी में है,
सच्चा कानून तो जन-हित है,
जिसकी खातिर तोड़कर
सारी जंजीरे
आओ उनको मजा चखाये
स्वाधीनता को बचाना है तो
भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलायें
उन्होंने स्वतंत्रता की वेदी पर
किये थे प्राण निछावर
अपने स्वार्थों को छोड़
कोई भी मूल्य चुकाने को
होना होगा तैयार
तभी हम स्वतंत्रता के होंगे
सच्चे हकदार
अन्यथा यह नाटक है बेकार
आओ करें संकल्प
इस स्वाधीनता दिवस पर,
करेंगे एक और संघर्ष
पाने को स्वतंत्रता
भ्रष्टाचार से।

--संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



दरिया में बहा दो रंजिश सब
अब अमन की कुछ बात हो जाये
मेरे देश में खुशहाली हो
बस इत्मिनान से मुलाकात हो जाये
एक अनोखी ख्वाहिश सी
सजी जमीन है फ़ुर्सत से
अब माटी के पहलू से
कुछ नई फ़सल-सौगात हो जाये
जब सारे अरमान देख लिये
क्यों अपने प्यारे खफ़ा हुए
आज मिली आज़ादी में
फ़िर ईद-मिलन दस्तूर हो जाये
मैं सब्र में आज डूबा हूँ
कुछ दूर चलके रोया हूँ
वजूद को अपने ढूँढू हर दम
मैं फ़िर कहीं जाके खोया हूँ

रेत के घरोंदो को छोड़ो
अब टूटे सपनों को खोजो
मेरे साथ चलो,नई आवाज़ लिये
आज फिर एक ख्वाब एक उम्मीद हो जाये..

--प्रदीप पाठक



हमारा वतन - भारत

हमको प्यारा है भारत, हमारा वतन
सारी दुनियां का सबसे सुहाना चमन।
हम है पंछी, ये गुलषन यहॉ बैठ मन
चैन पाता, सजाता नये नित सपन ।।
इसकी माटी में खुषबू है, एक आब है
जैसा कष्मीर दो-आब, पंजाब है।
सारी धरती उगलती है सोना रतन
सब भरे खेत-खलिहान, मैदान वन।।
आदमी में मोहब्बल है, इन्साफ है
खुली बातें है, जजबा है, दिल साफ है।
मन हिमालय से ऊंचा, जो छूता गगन
चाहते दिल से सब अंजुमन में अमन।।
पंछियों की भले हों कई टोलियॉं
रूप रंग मिलते-जुलते है औं बोलियॉं
फितरतों में फरक फिर भी है एक मन
सबको प्यारा है खुद से भी ज्यादा चमन।।
क्यारियॉं भी यहॉं है कई रंग की
जिनमें किसमें है फूलों के हर रंग की
एकता ममता समता की ले पर चलन
सबमें बहता मलय का सुगंधित पवन।।
इसकी तहजीब का कोई सानी नहीं
जो पुरानी है फिर भी पुरानी नहीं
मुबारिक यहॉं का ईद-होली मिलन
इसकी शोभा यही है ये गंगोजमन।।

--विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र "



युग बदल गया और फ़िर चरखे का चक्र चला ,फ़िर काला शासन ढकने चला श्वेत खादी
खूंखार शासको की खूनी तलवारों से ,बापू ने हंसकर मांगी अपनी आजादी
जो चरण चल पड़े आजादी की राहों पर,वो रुके न क्षणभर ,धुप,धुआं,अंगारों से
उठ गया तिरंगा एक बार जिसके कर में,वो झुका न तिल भर गोली की बौछारों से

इसीलिए ध्वजा पर पुष्प चढाने से पहले ,
तुम शीश चढ़ने वालों का सम्मान करो II
आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए ,
आजादी के परवानो का सम्मान करो

कितने बिस्मिल ,आजाद सरीखे सेनानी ,इस पुण्य पर्व से पहले ही बलिदान हुए
जब अवध और झाँसी पे थे गोले बरसे ,तो मन्दिर ,मस्जिद साथ- साथ वीरान हुए
जलियांबाग में जिनका नरसंहार हुआ ,वो इसी तिरंगे को फहराने आए थे
जिनके प्रदीप बुझ गए गए अधूरी पूजा में,वो इसी निशा में ज्योत जलाने आए थे

तलवार उठाने से पहले तुम इसीलिए
मिट जाने वालों का गौरव गान करो ||
आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए ,
आजादी के परवानो का सम्मान करो||

दलितों को मिला स्वराज्य इसी स्वर्णिम क्षण में,सदियों से खोया भारत ने गौरव पाया
कट गयी इसी दिन माँ की लौह श्रृंखलाएं,पीड़ित जनता ने फ़िर से सिंहांसन पाया
१५ अगस्त है नेता जी का मधुर स्वप्न ,बापू के अमर दीप की गायक वीणा है
अंधियारे भारत का ये है सौभाग्य सूर्य , माँ के माथे का सुंदर श्याम नगीना है
इसलिए आज मन्दिर जाने से पहले ,तुम राष्ट्र ध्वज के नीचे जन गन गान करो
आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए ,आजादी के परवानो का सम्मान करो......

--विद्याधर दुबे



स्वतंत्रता दिवस

सन '५६ में जन्मी
आज की युवा पीढी
पराधीनताओं की कुंठाओं
तथा सभी वास्तविकताओं से
अनभिज्ञ ही है
हमारी विचार धाराएं
एवं स्मृतियाँ
स्वतंत्रता को केवल
ध्वजारोहण के सन्दर्भ में ले सकीं हैं
अथवा
इससे अधिक
देशभक्ति भावनाओं से
ओत-प्रोत कुछ क्षण
जो समय के साथ साथ
या उस से कहीं पहले
अपना अस्तित्व
खो देते हैं -और
जिसके साथ ही समाप्त
हो जाता है -
सद्भावनाओं से प्रेरित
एक ज्वार
ज्वार जिसे कभी
चन्द्र रूपी देश प्रेम की
सौम्यता ने जन्मा था
सागर की
फेनिल लहरों में खोकर
अपने जन्म दाता के
अस्तित्व को नकार रहा है
सोचता हूँ -
हमारा प्रेम ,
हमारी भावनाएं ,
इतनी क्षणिक क्यों हैं ?
देश प्रेम -हमारी और आपकी वह उपलब्धि है
जिस की सुरक्षा
हमारी सजग चेतना का
प्रतीक है
हमें सजग रहना होगा
तभी हम विरासत के इस ऋण से मुक्त रह सकेंगे
इस महान
स्वतंत्र युग का श्रेय
हमारे गौरवपूर्ण इतिहास एवं
इसमें जीवंत प्रत्येक कर्मठ मानव को है
जो इस भावना के प्रति
सदैव क्रियाशील रहा.

-कमलप्रीत सिंह



आज़ादी की एक और वर्षगांठ

गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
सभी मनाते पर्व देश का आज़ादी की वर्षगांठ है |
वक्त है बीता धीरे धीरे साल एक और साठ है ||
बहे पवन परचम फहराता याद जिलाता जीत रे |
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
जनता सोचे किंतु आज भी क्या वाकई आजाद हैं |
भूले मानस को दिलवाते नेता इसकी याद हैं ||
मंहगाई की मारी जनता भूल गई ये जीत रे |
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं |
किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है ||
भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे |
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे |
जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||

--प्रदीप मानोरिया



हिन्दुस्तान

वह एक पल
सचिन,
धोनी,
अभिनव बिन्द्रा की तरह
चमकने लगता है

दूसरे ही पल
कश्मीर की तरह
दहकने लगता है।
वह एक पल
लक्ष्मी नारायण मित्तल की तरह
खनकता है

दूसरे ही पल
भारतीय स्टेट बैंक,
शाखा डुमरिया गंज के कैशियर की तरह
खटकता है।
वह एक पल
पोखरन की तरह
दहाड़ने लगता है

दूसरे ही पल
उर्जा समझौते की तरह
उलझने लगता है।
वह एक पल
बाबा रामदेव की तरह
गर्वीला लगता है

दूसरे ही पल
अहमदाबाद दंगों की तरह
शर्मि़न्दा दिखता है
वह एक पल----------।
उसके पास
करोणों की भीड़ है
जिसमें
लाखों विद्वान हैं
हजारों रत्न हैं

मगर
आजादी के
इकसठ वर्षों के बाद
आज भी
वह
चौराहे पर ‌खड़ा है !

--देवेन्द्र पाण्डेय



सच्चा देश भक्त

खादी धोती खादी कुर्ता खादी रुमाल,
खादी झोला खादी टोपी रौबदार चाल,
बीच बाज़ार घूम रहे थे चाचाजी क्रांतीकारी,
पहुँचे मिठाई की दुकान पर जब भुख लगी भारी,
डाँट कर बोले- ये तुम मिठाई बना रहे हो ?
कुछ खुद खा रहे हो कुछ मक्खियों को खिला रहे हो ।
.
हलवाई - जब रहे आप लोगों की दुआएँ तो क्यों ना हम मिठाई खाए,
और ये मक्खियाँ तो स्वतंत्र देश के प्राणी आजाद हैं,
ईनके मिठाईयों पर बैठने से इनका और भी बढ जाता स्वाद है,
तो आप हीं बताइए इसमें मेरा या फिर मक्खियों का क्या अपराध है,
इससे पता चलता है कि मिठाईयाँ अच्छी बनी है,
आप आए मेरे दुकान पर किस्मत के धनी है ।
.
ये देखिए ये जलेबी ये बर्फ़ी ये लड्डू और ये रसमलाई है,
तो कहिए जनाब क्या देख कर आपकी लार टपक आई है ,
बोले इसमें सबसे सस्ती कौन है,
जनाब जलेबी पहले तो इसे गोल गोल घुमाओ ,
और खौलते तेल में पकाओ,
फिर चासनी में डुबा-डुबा के निकालो औए मज़ा लेते जाओ ,
तभी टपक पड़ी चाचाजी की लार,
और सारी जलेबियाँ हो गई बेकार ।
हलवाई बोला- अब तो आपको हीं सारी जलेबियाँ खानी पड़ेंगी,
अगर ना खा पाए तो दो्गुनी किमत चुकानी पड़ेगी,
क्योंकि अगर ना खा पाए तो यह राष्ट्रिय़ मिठाई का अपमान होगा,
आपका दुगना भुगतान देश के प्रति छोटा सा बलिदान होगा।
जैसे हीं उन्होने एक जलेबी चबाई,
दाँतों तले से करकराहट की आवाज़ आई,
बोले इसमें तो आ रहा मिट्टी का स्वाद है ।
.
हलवाई-वाह क्या बात है,
आप जैसे लोगो को हीं आ सकती जलेबी में देश की मिट्टी की महक है,
तभी तो आपकी आँखो में आ गई नयी चमक है,
सोचने लगे बेस्वाद जलेबी आखिर ठूसे तो कितना ठूसे,
देश भक्ती का चोला भी पहने रहे व धन से नाता भी ना टूटे,
मर के खाए और खा खा के मरे,
बहुत बुरे फ़ँसे आखीर करें तो क्या करें ।
.
अंत में एक जलेबी बच गई,
सोंचे जलेबी गई अगर अंदर तो प्राण जाएंगे बाहर,
देश भक्ती के चक्कर में बेमतलब जाएंगे मर,
ईज्जत जाए या धन से नाता टूटे,
अब न खाउँगा जलेबी जग रुठे या किस्मत फूटे ,
भारी मन से दिया दोगुना दाम,
और तुरन्त भागे बिना किए विश्राम,
मुस्कुरा कर बोला हलवाई,
देश के सच्चे देश भक्त को ,
सत सत प्रणाम सत सत प्रणाम ।

--निशिकांत तिवारी