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शाहिद अख़्तर की कविताएँ


कविता जहाँ बाहर की निरंकुश निस्तब्धता को तोड़ने के लिये जरूरी हथियार है तो अपने अंदर के निविड़ एकांत को टटोलने का साधन भी है। हिंद-युग्म पर हम समय-समय पर सामयिक और महत्वपूर्ण कवियों से पाठकों का तअर्रुफ़ कराते रहते हैं। इसी कड़ी मे एक अहम्‌ नाम मोहम्मद शाहिद अख्तर का भी है।
  21 मार्च 1962 मे गया मे जन्मे अख्तर साहब ने सिंदरी (धनबाद) से इंजीनियरिंग शिक्षा हासिल की थी मगर वामपंथी राजनीति से जुड़ कर सामाजिक कार्यकर्ता बन गये। मुंबई मे झुग्गीवासियों और श्रमिकों के बीच काम करते हुए जीवन की पाठशाला से काफ़ी कुछ सीखने को मिला तो अहसासों को धारदार बनाने मे मदद भी मिली। वर्तमान मे प्रेस ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया मे वरिष्ठ हिंदी पत्रकार के रूप मे कार्यरत शाहिद जी की अनुवाद पर दो पुस्तकें और हिंदी-उर्दू-अंग्रेजी मे तमाम सामाजिक-सामयिक-साहित्यिक लेख आदि भी प्रकाशित हुए हैं। अपने बारे मे उनका कहना है कि "हर शख्स की तरह मेरे भी गम-ए-जानाँ हैं और साथ ही गम-ए-दौराँ भी अपनी शिद्दत के साथ है। अपने इसी गम-ए-दौराँ और गम-ए-जानाँ को अपनी नज्मों और कविताओं में अभिव्यक्त करने की कोशिश करता हूँ। बेशक मैं यह जानता हूँ कि:
बस कि दुश्वा्र है हर बात का आसाँ होना 
आदमी को भी मयस्स‍र नहीं इंसाँ होना  (ग़ालिब)
दूरभाष: 9971055984

पेश-ए-नज़र हैं उनकी कुछ कविताएँ।

तन्हाइयाँ -1
तुम नहीं तो क्या
तुम्हारी याद तो है
उम्मीद के दरीचे को
खटखटाने के लिए
छोटी-छोटी चीजें हैं
 छोटी-छोटी यादें हैं
दिल की वीरान महफिल को
सजाने के लिए
जिंदगी की रहगुजर पर
मैं अकेला कब रहा
जब कोई हमसफर ना रहा तुम रही,
तुम्हारी याद रही
इक काफिला बनाने के लिए
याद का पंछी
मेरे दिल के कफस से
उड़ कर भाग नहीं सकता
ये दिल जो मेरा भी कफस है

तन्हाइयाँ-2
सहरा-ए-जीस्त में जब
 यादों के फूल खिलते हैं
आंखों से उबलते हैं
गौर-ए-नायाब के
दिल की बस्ती के परे
 लहलहाती है जफा की फस्लें
 ढलते सूरज की सुर्खी से सराबोर
आसमां में तैरते हैं
यास के बादल
उफ्क पर दूर मंडलाती हैं
 हसीं दिलफरेब तितलियां
 माजी के आइने से झांकते हैं
परीवश चेहरे
जानम तुम क्या जानो
 कितना खुशरंग है
यह मंजर
 कितना लहूरंग !


ख़ामोशी के खिलाफ
दर्द हो तो
मदावा भी होगा
हमारी खामोशी
जुर्म होगी
अपने खिलाफ
और हम भुगत रहे हैं
इसकी ही सजा
लब खोलो
कुछ बोलो
कोई नारा, कोई सदा
उछालो जुल्मत की इस रात में
आवाजों के बम और बारूद
ढह जाएंगे इन से
जालिमों के किले
(गाजा पर इस्राइली हमले के खिलाफ)

समय चक्र और 16 कवितायें







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - चित्र पर आधारित कवितायें

चित्र - मनुज मेहता

अंक - बाइस

माह - जनवरी २००९





वर्ष २००९ के प्रथम काव्य-पल्लवन को लेकर हम हाजिर हैं। ये महीना है जनवरी का। ये महीना बताता है कि समय चल रहा है। नये वर्ष का आगमन है और पिछला वर्ष पीछे छूट गया है। यही महीना होता है मौसम में बदलाव का। मकर सक्रांति का। रात का समय कम होने और दिन का समय बढ़ने का। समय के चलते रहने के प्रतीक इस माह में हम भी लाये हैं १६ कविताओं का समागम। ये कवितायें आधारित हैं नीचे दिये गये चित्र पर। इस माह के काव्य-पल्लवन की उद्घोषणा में मनुज मेहता के चित्र को काफी पसंद किया गया। देखना यह है कि हमारे पाठक इन कविताओं को कितना पसंद करते हैं।

Manuj Mehta

आवश्यक सूचना: यदि आप भी अपना कोई चित्र अथवा फोटो जनवरी माह के काव्य-पल्लवन के अंक के लिये भेजना चाहें, तो हमें ३० जनवरी २००९ तक kavyapallavan@gmail.com पर भेजें। कृपया ध्यान रहें कि आपकी तस्वीर अथवा स्केच कहीं भी प्रकाशित न हुए हों।

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतायें।

*** प्रतिभागी ***
श्याम सखा ’श्याम’ | विवेक रंजन श्रीवास्तव | रचना श्रीवास्तव | सीमा सचदेव | ज्योति बाला खरे | शारदा अरोड़ा | एम ऐ शर्मा " सेहर" | मंजु गुप्ता | शामिख फ़राज़ | दिलशेर दिल | देवेन्द्र कुमार मिश्रा | सी.आर.राजश्री | रश्मि सिंह | कमलप्रीत सिंह | सुनील कुमार ’सोनू’ | सुरिन्दर रत्ती

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~




समय सीमा
न रहती तो
बहुत देर बतियाते हम
अगर
सामने बैठे रहते तो कब याद आते हम
बात से यूँ ही
नई बात निकलती है
रिश्तों में उष्मा हो
तो कड़वाहट मोम बन पिघलती है
मोम की देह में
धागे की अस्थियाँ रहती हैं
मन में
पीड़ा,
पीड़ा में
खण्डित सपनों की बस्तियाँ रहती हैं
हर धड़्कन
बस यही बात मुझसे बार-बार कहती है
समय के साथ-साथ
देह,
देह के साथ-साथ
साँस
साँस के साथ ही तो
आस की नदियाँ बहती है।
जो बस एक बात कहती है
सपनों में
मन, हीरामन बन जाता है
एक
एक·के बाद दुसरी
फिर आखिरी
यानि तीसरी कसम खाता है
तीसरी कसम
यानि मोह से दूर रहेगा
अपनी
व्यथा नहीं किसी से कहेगा
कहने-सुनने
में फिर समय सीमा
की बात आ जाती है
उजला सा दिन होता है खत्म
स्याह रात आ जाती है
अन्धेरे में
नयनों के दीप जगाते हम
समय सीमा
न रहती तो कितना बतियाते हम

--श्याम सखा ’श्याम’



समय के ब्लैक बोर्डपर
यादगार
पदचिन्ह छोड़ जाने की कोशिश में
रात दिन
अनवरत
भागमभाग कर रहे हैं हम !
चल रही है घड़ी
चल रही है दुनियाँ !
मनाते हैं हम
कोई दिन, कोई दिवस
बताने को
उसकी महत्ता !
दरअसल
दिन, दिवस, महीने
महान नही होते,
महान होते हैँ हमारे
किये गये कार्य,
जो बना देते हैं किसी क्षण को
चिरस्मरणीय!
या पोत देते हैं, कालिख
तारीख पर!

--विवेक रंजन श्रीवास्तव



समय के चाल की
कोई आवाज नही होती
पर सुनाई
बहुत तेज देती है
कुछ पल
इस से चुरा के
जो अपने आंचल पर बिखराती हूँ
दर्द के कांटे
स्वयम में चुभता पाती हूँ
ये देता है एक हाथ से
दो हाथो से लेलेता है
बादल निचोड़
कुछ छीटे
तपते जीवन पर बिखरता तो है
पर सूरज बन
उस नमी को पी जाता है
अपनी मौज में झूमता गुजरता है
कितनी सांसे टूटी ,फूल बिखरे
इन बातों से
दमन इसका कब छलनी होता है
बेवफाई का बोझ ले के
नजाने ये कैसे जीता है
रुक जाता उस रोज जो
कुछ अपने बचा लेती मै
देता जो थोडी मोहलत
गले उनको लगा लेती मै
दिल की गर्द झड़ने में लगी थी मै
तभी समय ने
मुझको छू के कहा
रुक गया जो पल भर भी
कायनात सारी थम जायेगी
दर्द की झडी
जो लगाये बैठी हो
कभी ख़त्म न हो पायेगी
ये पल बीतेगा
तो अगला पल ,
दस्तक देगा दहलीज़ पर तेरी
अपनी तो कहदी तुमने
पर देखो तो मज़बूरी मेरी
गलती कर के हर कोई
इल्जाम मुझ पर धर देता है
कर के खड़ा
कटहरे में मुझको
स्वयम
ब इज्ज़त बरी होजाता है
आज है कांटे तो बुरा हूँ मै
कल जब फूलों पर चलोगी
तो क्या याद करोगी मुझको
खुशी और गम लेके
सभी की झोली में
टपकता हूँ
चलो ,अभी चलता हूँ
उम्मीद की किरण
सुख का सूरज
तेरे आंगन में उगाना है
छाव धूप में उलझते हुए
मुझको बीत जाना है

--रचना श्रीवास्तव



१.समय का पहिया न रुका है
न रुकेगा
बस हर कोई उसके सम्मुख झुकेगा

२.समय की गति बलवान है
पर जो उसे नाप पाए
वही तो महान है

३. समय के पद-चिन्हों पर
चलकर मिलती नहीं
मंजिल कभी

४.जो समय पर समझ आ जाए
ज्ञान कहलाता है
जो समय से पहले समझ जाए
महान कहलाता है

५. समय को पकड पाना भी
अब आसान है
देखो बच्चों मे छुपे बूढों को
जिनके सम्मुख बडे भी नादान हैं

६.समय के साथ कदम हमें
मिलाना न आया
चले जब भी इसके पीछे
तो इसने खूब रुलाया
७. समय के साथ कदम मिलाकर
चलने का जमाना
हुआ अब पुराना
और वक्त से आगे चलने का राज
हमने कभी न जाना

८.समय का चक्र कहीं हम
जो रोक पाते
तो समय की कमी का कभी
बहाना न बनाते

९.समय ने देखो हमे
क्या से क्या बना दिया
कल सपना बुना था
आज स्वयं मिटा दिया

१०. समय बीत जाता है
छोड जाता है याद
गुलाम बना रखा सबको
बस स्वयं ही आजाद

११. समय के कदमों की
आहट नहीं होती
चुपचाप आकर गुजर जाए
तो मन मे कभी राहत नहीं होती

१२.क्यों कभी कभी समय
जैसे रुक सा जाता है
पीडा के झंझावात मे
बवंडर लाता है

१३.पीडा की काली अंधियारी रातों मे
समय गुजारे न गुजरता है
शायद दुख की परछाई से
आगे निकल्ने मे
यह भी डरता है

१४. समय कभी किसी का
साथ नहीं निभाता है
पर जो इसका साथ निभाए
यह उसी का हो जाता है

१५.आने वाला समय अभी
इतिहास बन जाएगा
वर्तमान को भविष्य का आईना दिखाएगा

--सीमा सचदेव



माँ...
मत मारो...
मुझे कोख में ही....
माँ.... मैं भी....
जीना चाहती हूँ.....
ये कैसा अंधेरा है...?
माँ....
मैं भी....
दुनिया देखना चाहती हूँ.....
मैं अभी....
बेज़ुबां हूँ माँ....
ये वक़्त ऐसा क्यूँ है....
हर कोई.....
मेरी मौत बनके.....
क्यूँ खड़ा है.....?
क्यूँ पापा.....?
आप मौन क्यूँ है.....?
माँ.....! अब....
तुमको ही आगे आना होगा...!
तभी ये तेरी बेटी बचेगी....!
माँ....
ग्यान की रोशनी फैलानी होगी...
तुझे ही....
ये काली चादर हटानी होगी.....
देखो माँ..!
अब सुबह भी होने को है....!
देखो माँ....
पाँच बजने वाले हैं.....
और....
तुम हो की....
अभी तक सोई हो...?
हे माँ...
अब तो जागो...!
और अपनी बेटी को बचा लो...!
अब तो जागो माँ....
अब तो जागो....................!!!!!

--ज्योति बाला खरे



१)
वक्त कुछ यूँ थमा

वक्त कुछ यूँ थमा
लम्बी लम्बी यात्राएं
क़दमों में कुछ यूँ ठहरीं
कदम बोलते खड़े
वक्त ठहर गया
वक्त कुछ यूँ थमा
घड़ी की टिक-टिक
तयशुदा समय ले कर
सांझ आई
मंजर बदल गया
वक्त कुछ यूँ थमा
जीवन कुछ यूँ थमा
वक्त है बोलता खड़ा
निशान बोलेंगे
सफर बदल गया
सुबह के पास कहीं
अँधेरा गहरा है
काली रातों का पहरा है
काल के हाथ कहीं
जीवन बहल गया


2 )
वक्त चलता रहा
सुबह और शाम
दिन-रात वक्त चलता रहा
तू सोया रहा
वक्त सपने भरता रहा
रात से डरा तू
ख़ुद को छलता रहा
सुबह का राज़
रात के सीने मई पलता रहा
क़दमों की लकीरों के परे
वही देख पायेगा
भोर की किरण
जो जमीं से जुदा
और वक्त की डोर थामे चलता रहा
3)
अक्स
काल चक्र चलता रहा, आदमी हिलता रहा
कदम जब जब रुके , वक्त का पहरा रहा
कैद कर लिये क़दमों में, नक्श बोलते खड़े
वक्त तो थमा नही , अक्स बोलते खड़े
--शारदा अरोड़ा



अब ये सागर शान्त है
पहले कई बार इसमें
ज्वार भाटा आये
और गये
रह गये
समय के गीत गुनगुनाते
कुछ अवशेष
तुम्हारी बाहें
नभ का विस्तार लिए
मौन सहेजती
सिमटना मेरा
तुम्हारे मन आँगन में
अधरों पर
गुलमोहोर की रंगत लिए
खिलखिलाना मेरा
अनदेखा कर
समय की गति को
भाव विभोर हो
बादल बन
विचरना मेरा
अकस्मात उस दिन
चले जाना तुम्हारा
बिना दोषारोपणक किए
इस तरह
बारिश के बाद
स्वच्छ आकाश से
विलुप्त होता
सुंदर इन्द्रधनुष
तब से
अब तक
उत्तर तलाशते
वेदना रहित
ठूठ की तरह जड़ होता
मेरा समय
करवट न ले पाया
ठहर गया वही !!!

--एम.ए. शर्मा ’सेहर’



घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो
नववर्ष पर मुंबई में हुई मैराथन की दौड़
मची धावकों में वक़्त चाल की होड़
हिन्द-युग्म की स्पर्धा का है वह चित्र
साधना के उच्च शिखरों को मिली जीत
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

फूल सा है जीवन
कब है मुरझा जाए
बुलबुलों सा है जीवन
करता हम से छल
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

इन नन्हें पैरों को
लक्ष्य पर बढ़ने दो
आए कितनी बाधाएं
उन्हें गर्तिमति दो
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

स्वप्न हो फिर साकार
फैले जग में नवप्रभात
नव-नव चरण बन
बने युग का प्रमाण
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

समय तुम से है चलता
नहीं है कभी रूकता
हमें दो अपना नाम
आए हम जग के काम
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

बढ़े जब जिसके कदम
सफलता ने लिया तभी दम
भरे हम में लगन हरदम
आस विश्वास न हो कम
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

समय की तुम पाबंद हो
समय पर चलना सीखा दो
वक्त पर हर काम हो
वह चाल हमें बता दो
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

तुम्हीं जग की सत्य की डगर
निर्भय बन देती खबर
कसौटी पर तुम हो खरी
दो दिशा हमें मानवता की
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

तुम हमारी हो आठ याम
सदा रहे तुम्हारा ध्यान
करें वक्त पर हर काम
फिर लक्ष्य की नहीं होती हार
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

नव वर्ष 2009 संदेश है लाया
घड़ी-गति की रफ्तार होती
रूक गई अगर गति
मृत्यु सी स्थिरता उधर होगी
घडी़ मेरे कदमों का सहारा बनो

--मंजु गुप्ता



यह कौन है जो तीन अक्षरों में छुपा रहता है
यह मौन है और तीन अक्षरों में छुपा रहता है
यह कौन है जो
मुड़ता भी नही, झुकता भी नहीं,
जमता भी नही, थमता भी नहीं,
किसने चला के इसे छोडा है कि
रुकता भी नही, थकता भी नहीं
यह कौन है जिसके
गुज़रे हुए लम्हों को याद कहते हैं
यह कौन है जिसके
आने वाले पलों को ख्वाब कहते हैं.
हाँ समय है जो तीन अक्षरों में छुपा रहता है
सब पे हुकूमत है इसकी और
तीन अक्षरों में बसा रहता है

--शामिख फ़राज़



जाने क्या था, मगर कुछ हुआ था!
काला-काला सा क्या छा गया था!

वक़्त कैसा यहाँ आ गया था!
आज सूरज कहीं सो गया था!

उस घड़ी दिल दहलने लगा था,
एक पल ही तो बच्चा जिया था!

उसको लड़की बनाया खुदा ने,
जुर्म उसका भला इसमे क्या था!

कोख में तूने क्यूँ मार डाला,
उसको पैदा तो होने दिया था!

उसने देखा न था अपनी माँ को,
और पापा को भी खो दिया था!

"लाश" वो बेज़ुबां पूछती है,
'माँ' बता तूने ये क्यों किया था!

"दिल" मेरा, दिल को थामे हुए 'बस'
वक़्त की चाल पे रो रहा था!

--दिलशेर 'दिल'



माँझी हो न निराश,
जीवन सागर में उठते ज्वार ।
प्रभु में आशा रख, विश्वास,
खेता चल पतवार ।।

सुख-दुख का मेल है,
प्रकृति का खेल है।
खेलता चल इसे,
हिम्मत न हार ।।
जीवन सागर----------------

शशि हो न उदास,
गृहण के बाद आये पूनम की रात ।
हर रजनी के अंत में, आता सदा प्रभात
वक्त का कर इंतिजार।।
जीवन सागर --------------

क्रांति के बाद ही,
होता सदा सुधार।
पतझर के बाद आये,
बसंत बहार।।
जीवन सागर---------------

दृढ हो संकल्प,
अटल रख विश्वास।
धैर्य और साहस से,
सिंधु करेगा पार ।।
जीवन सागर----------------

--देवेन्द्र कुमार मिश्रा



देखो इन पैरों को ........
छोटे छोटे ये खूबसूरत पाँव समय के साथ साथ
पल- पल बढ़ते रहते
गिरते सम्बलते आगे चलते
ठोकर खाकर मजबूत बनते
इन पैरों में अजीब से शक्ति है
मंजिल की ओर बढ़ने की गति है
दुनिया में अपनी जगह बनने की लगन है
वक्त के संग संग चलने की स्फ्रूति है
क्षितिज तक पहुँचने की क्षमता है
बुराईयों को जड़ से उकाढ़ने का वैराग्य है
तिमिर से जूझने का अडिग विश्वास है
मुशिकिलों का सामना करने का अटूट साहस है
देखो देखो इन पैरों को ......
अपना हाथ देकर इन्हे सम्भालों
सही रास्ता चुनने में इनकी मदद करों
इन पर नज़र रखों कहीं ये पैर भटक न जाए
वक्त की बेडियों में बंधकर कहीं ये लडखडा न जाए
इनका हौसला बढ़ावो कहीं ये बहक न जाए
देखो देखो इन पैरों को ......
महसूस करों इनकी आहट को
अरे ये तो अपने ही बचपन की
आहट है जिसे भी..........
अपनी तरह लंबा रास्ता तय करना है

--सी.आर.राजश्री



वक्त के आईने से
झांक रहा अपना ही अक्श
दीवार पर सजी तस्वीरे पूछे
कौन है ये शख्श
है सफ़ेद जिसके बाल
और चेहरे पर झुर्रिया
ढीला कुरता और ऊँचा पायजामा
झुकी कमर व हाथो मैं दवाइया
नाते-रिश्तो की लम्बी पंक्ति
तालियों की गडगडाहट ,और तगमे
समटने मैं लगी रही जीवन शक्ति
की अब अपना चेहरा देख कर
अपना आइना ही पूछे सवाल
बुझने को आ गयी अब जीवन मिशाल
समय ने किया कैसा कमाल
चलता रहा वो अपनी चाल
पलटते रहे कैलेंडर के पन्ने
बीतते रहे दिन पर दिन
गुजरते रहे साल पर साल .....
.................साल पर साल......

--रश्मि सिंह



गुज़रते वक़्त के साथ
थकन का अहसास
हम में से किसी को भी
निढाल कर देता है
हाथों की लकीरें पढ़ पाने
पढ़ लेने के बाद
बहुत बार व्यक्ति विशेष का
भविष्य जानना बता पाना सम्भव होता है
लेकिन पावों के तलवों पर
उभर आयी ये रेखाएं
एक लंबे सफर और
सतत संघर्ष का प्रतीक हें
अपने चाही चुनी पगडंडियों पर
पूरी आस्था के साथ
लगातार चलने वाले इन पावों ने
दुनिया की ऊंचाइयों को
सफलतापूर्वक मापा है
जब तक जीवन है ,संघर्ष है
और संघर्ष जीवन का ही दूसरा नाम है
ऐसे मे उच्चतम शिखर पर
पहुँचने की ललक के बावजूद
एक थकन का अनुभव हो आना
कितना सहज और स्वीकार्य है

--कमलप्रीत सिंह



सो रह गया उसका अमर पहचान

देखो वक़्त की सिलवटें पे कोई
छोड़ दिया अपना पद-निशान
मिट गया उसकी हस्ती सारी
रहा गया उसका अमर पहचान

अँधेरा उसे रोक न पाया
घडी की सुई भी टोक न पाया
भूकंप तो फटा ही होगा आगे-पीछे
आग की लपटे मगर उसे झोक न पाया
आज कहलाये वो शख्स महान
सो रह गया उसका अमर पहचान

धुन का पक्का सपने में चूर होगा
साहस-धैर्य -उर्जा से वो भरपूर होगा
हँस के स्वीकारता होगा चुनौतियों को
बंदा हठी वो खुदा में भी मशहूर होगा
थामा होगा बाजूओं में आंधी-तूफान
सो रह गया उसका अमर पहचान

कल और कल की सोच में
वो आज बर्बाद न किया होगा
मस्तमौला मनमौजी अल्हड़ सा
तन-मन से आजाद जिया होगा
मर्म जिंदगी के लिया होगा जान
सो रह गया उसका अमर पहचान.
सुख से अलगाव जैसी रिश्ता होगी
दुःख से गुलाब जैसी मित्रता होगी
मथ दिया होगा सौ-सौ समुद्र को
खुद जहर पीकर अमृत बांटा होगा लोगों को
कर्म से प्रसन्न हो गया भगवान
सो रह गया उसका अमर पहचान.

इस पद-निशान से जो
किरणे निकलती होगी
सूर्य जहाँ पहुँच न पाए
ये वहां चमकती होगी
तमस भरी जिंदगी में
लाता होगा नव-विहान
सो रह गया उसका अमर पहचान.

बाहरी आदमी के खोली में
अन्दर का आदमी सोया हुआ है
जो जगा न पाए उसको
अभागा वही आदमी रोया हुआ है
मै के भीतर 'मै' को जाना होगा
तभी सौ फीसदी दिल से लोग करते बखान
सो रह गया उसका अमर पहचान.

--सुनील कुमार ’सोनू’



भारत भूमि संतों की भूमि,
हमारी संस्कृति की एक अलग छाप,
विश्व में शायद कहीं नहीं, ऐसी प्रथा,
प्रभु राम के वनवास जाने के पश्चात,
रामजी की चरण पादुका को ही अपना सर्वस्व मान कर,
राज्य किया भारत जी ने,
कितना आदर और प्यार झलकता है,
एक संदेश दिया विश्व को,
के हम चरण पूजा करके भी,
निष्काम भाव से सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं,
चरण वंदना में हमारा ही लाभ छुपा है,
आशीर्वाद के रूप में,
ये लाभ बिना मूल्य के मिलता हो तो इसको पाने का,
प्रयास हमको अवश्य करना चाहिए
ये आशीर्वाद एक रामबाण दावा और हथियार मिला,
जीवन की गाड़ी को चलाने की ऊर्जा,
चरण धूलि का भी एक अलग ही महत्त्व है,
चरना धूलि मस्तक पर लगा कर
लोग फुले नहीं समाते, अपना सौभाग्य मानते है,
समय बदला, युग बदला पर,
हमारी संस्कृति हमारे शुद्ध विचार नहीं बदले,
संतों के आशीर्वाद से,
गुरु वंदना, हरी चरणों का रूप ध्यान करके,
अगर हमारे कष्टों निवारण होता है
तो हमें इसका प्रयास अवश्य करना चाहिए

--सुरिन्दर रत्ती



**** आधी मुलाकात ?


आधी मुलाकात ?

तुमने लिखा है
दूर हो
माना
रोटी रोजी के
मसअले के कारण
मजबूर हो
खत तो लिखो
सुनो मैने कहीं सुना था
खत आधी-मुलाकात होते हैं
- - -
हां
कुछ खत
आधी मुलाकात
होते हैं
इसीलिये तो
हम और आप
खत की बाट जोहते हैं

खत में
कभी खुद को
कभी उनको टोहतें हैं
कई-कई खत तो
मन को बहुत मोहते हैं
कई खत
दर्दे-दिल दोहते हैं
वे खत तो
सचमुच
बहुत सोहते हैं

खतों की
न जाने
कितनी परिभाषा हैं
मगर
हर खत की
एक ही भाषा है

कुछ खत
जेठ की धूप होते हैं
कुछ खत
सावन की बरसात होते है
कुछ खत
आधी मुलाकात होते है

खतों
की कहानी
सदियों पुरानी है
खतों की बात
मुश्किल समझानी है
खतों की जात
भला किसने जानी है

खत
कभी दर्द
कभी खुशियां
बांटते हैं
खत कभी
माँ बनकर सहलाते हैं
कभी पिता बनकर डांटते हैं

खत का
दिल से
बहुत पुराना नाता है
खत में
लिखा हर शब्द
रूह तक जाता है
मुझे तो
खत का
हर उनवान बहुत भाता है

कुछ खत
दिवस से उजले
कुछ खत
सियाह रैन होते हैं
आपने
देखा होगा
कुछ खत बहुत बेचैन होते हैं

कुछ खत
खाली खाली
निरे दिखावटी होते हैं
कुछ खत
सहेजे ज़जबात होते हैं
कुछ खत
आधी मुलाकात होते हैं

खत
कभी गुलाब,
कभी केवड़े से महकते हैं
कभी-कभी
तो खत
अंगारे बन दहकते हैं
बावरे खत
जाने
कहां-कहां जा बहकते हैं
मनमीत
मिलने पर तो
खत कोयल से चहकते हैं
खत हमेशा
दिल से दिल की बात होते हैं
खत
आधी मुलाकात होते हैं

मैने
देखा है
परखा है,जाँचा है
क्या
आपने कभी
बिना दिल का खत बाँचा है
क्या नहीं
मेरा यह कथन
सचमुच साँचा है
खत पढ़्कर
क्या नहीं
आपके दिल का मोर नाचा है
फोन व सेलुलर
के आगे
खत हुआ
एक ढहता हुआ ढाँचा है

पर
कुछ लोग
सचमुच मुझसे दीवाने हैं
इस युग में भी
ढ़ूंढते
खत
लिखने के बहाने हैं
कहें!
क्या खत
गुजरे हुए जमाने हैं
लोग
जो चाहे कह लें
मेरा दिल
तो यह बात नहीं माने है
रोज
एक खत
लिखने की ठाने है

हर
खत की
अपनी खुशबू
अपना अंदाज़ होता है
हर
खत में छुपा
दिल का राज़ होता है
हर खत
लिखने वाला
शाह्जहां
और
पढ़्ने वाला
मुमताज होता है

कुछ खत
दीन-धर्म जात होते है
कुछ खत
तो
फ़कीरों की जमात होते हैं
खत
आधी मुलाकात होते हैं

कुछ
खतों में
ख्वाब ठहरे होते हैं
कुछ
खत तो
सागर से भी गहरे होते हैं

कुछ
खत ज़मीं
कुछ
खत आसमां होते हैं
कुछ
खत तो
उम्रभर की दास्तां होते है

कुछ
खत गूंगे
कुछ
खत वाचाल होते हैं
कुछ
खत
अपने भीतर
समेटे भूचाल होते हैं

मुझ
सरीखे लोग
खतों को तरसते हैं
खत
न मिलने पर
नैनो की राह बरसते हैं

कुछ
खत
दो दिन के
मेहमान होते हैं
कुछ
खत
बच्चों की
मुस्कान होते हैं
कुछ
खत
बुढापे की बात
होते हैं
कुछ खत
जवानी की रात होते हैं

खत क्या
सिर्फ़ आधी मुलाकात होते हैं ?

ईद 2008 और हिन्दी कविताएँ







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - ईद/रमजान/भाईचारा

अंक - अठारह

माह - सितम्बर २००८





काव्य-पल्लवन का अठारहवाँ अंक लेकर हम प्रस्तुत हैं। इस बार हमने विषय को 'ईद/रमज़ान/भाईचारा' को समर्पित किया है। पिछले महीने इस प्रस्ताव पर लम्बी चर्चा हुई थी कि इसे विषय विशेष से बदलकर विधा विशेष कर देना चाहिए, इस चर्चा में लम्बा समय बीता और निर्णय लेने तक कई तारीखें बदल गई थीं। समय कम दिया गया, फिर भी हमें १२ कविताएँ प्राप्त हो गईं। और दो कविताएँ (एक जय कुमार की और दूसरी ) भी प्राप्त हुई थीं, लेकिन उसमें लिखे शब्दों को समझ पाना कठिन था। रचनाकारों को इस बाबत सम्पर्क किया गया, लेकिन हमें उत्तर नहीं मिला, इसलिए हम उन्हें शामिल नहीं कर रहे है।

सबसे अच्छी बात है कि सभी कलमकारों ने सौहार्द और शांति का पैगाम दिया है। इनका पैगाम दुनिया को पहुँचे, हमारी तो यही कामना है।

आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| संजीव वर्मा "सलिल" | विवेक रंजन श्रीवास्तव | प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव | सविता दत्ता | महेश कुमार वर्मा | सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न ' | बसंत लाल दास | राजीव सारस्वत | शोभा महेंद्रू | सुनील कुमार 'सोनू' |पंखुड़ी कुमारी |

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ईद हो हर दिन हमारा,
दिवाली हर रात हो.
दिल को दिल से जीत लें हम,
नहीं दिल की मात हो.....
भूलकर शिकवे शिकायत,
आओ हम मिल लें गले.
स्नेह सलिला में नहायें,
सुबह से संझा ढले.
आंख तेरी ख्वाब मेरे,
खुशी की बारात हो.....
दर्द मुझको हो तो तेरी
आंख से आंसू बहे
मेरे लब पर गजल
तेरे अधर पर दोहा रहे
जय कहें जम्हूरियत की
खुदी वह हालात हो.....
छोड दें फिरकापरस्ती
तोड नफरत की दिवाल.
दूध पानी की तरह हों एक
ऊंचा रहे भाल.
"सलिल" की शहनाई,
सबकी खुशी के नग्मात हो.....

खुशियों के त्यौहार

ईद दिवाली ओणम क्रिसमस
खुशियों के त्यौहार.
लगकर गले बधाई दें लें
झूमें नाचें यार.
हम सब भारत मां के बेटे
सबके सुख दुख एक.
सभी सुखी हों यही मनाते,
तजें न अपनी टेक.
भाईचारा मजहब अपना
मानवता ईमान.
आंसू पोछें हर पीडित के
बन सच्चे इंसान.
नूर खुदाई सबमें देखा
कोई दिखा न गैर.
हाथ जोडकर रब से मांगें
सबकी रखना खैर
.
दहशतगर्दी से लडना है
हर इंसां का फर्ज.
बहा पसीना चुका सकेंगे
भारत मां का कर्ज
गुझिया सिंवई खिकायें खायें
हों साझे त्यौहार.
अंतर से अंतर का अंतर
मिटा लुटायें प्यार.

--संजीव वर्मा "सलिल"



आसमां में गुफ्तगू है चल रही ,
चाँद की आये खबर तो ईद हुई
अम्मी बनातीं थीं सिंवईयाँ दूध में ,
स्वाद वह याद आया लो ईद हुई
नमाज हो मन से अदा,
जकात भी दिल से बँटे,
मजहब महज किताब नहीं
पूरे हुये रमजान के रोजों के दिन ,
सौगात जो खुदा की, वो ईद हुई
आतंक होता अंधा जुनूनी बेइंतिहाँ ,
मकसद है क्या इसका भला
गांधी जयंती ईद है इस दफा ,
जो अंत हो आतंक का तो ईद हुई
नजाकत नफासत और तहजीब की
पहचान है मुसलमानी जमात,
आतंक का नाम अब और मुस्लिम न हो,
फैले रहमत तो ईद हुई
कुरान को समझें,
समझें जिहाद का मतलब,
ईद का पैगाम है मोहब्बत
दिल मिलें,भूल कर शिकवे गिले ,
गले रस्मी भर नहीं ,तो ईद हुई
रौनक बाजारों की , मन का उल्लास ,
नये कपड़े ,और छुट्टी पढ़ाई की
उम्मीद से और ज्यादा मिले ,
ईदी बचपन , और बड़प्पन को ईद हुई

--विवेक रंजन श्रीवास्तव



ईद के चाँद की खोज में हर बरस ,
दिखती दुनियाँ बराबर ये बेजार है
बाँटने को मगर सब पे अपनी खुशी,
कम ही दिखता कहीं कोई तैयार है
ईद दौलत नहीं ,कोई दिखावा नहीं ,
ईद जज्बा है दिल का ,खुशी की घड़ी
रस्म कोरी नहीं ,जो कि केवल निभे ,
ईद का दिल से गहरा सरोकार है !! १!!
अपने को औरों को और कुदरत को भी ,
समझने को खुदा के ये फरमान है
है मुबारक घड़ी ,करने एहसास ये -
रिश्ता है हरेक का , हरेक इंसान से
है गुँथीं साथ सबकी यहाँ जिंदगी ,
सबका मिल जुल के रहना है लाजिम यहाँ
सबके ही मेल से दुनियाँ रंगीन है ,
प्यार से खूबसूरत ये संसार है !!२!!
मोहब्बत, आदमीयत ,
मेल मिल्लत ही तो सिखाते हैं सभी मजहब संसार में
हो अमीरी, गरीबी या कि मुफलिसी ,
कोई झुलसे न नफरत के अंगार में
सिर्फ घर-गाँव -शहरों ही तक में नहीं ,
देश दुनियां में खुशियों की खुश्बू बसे
है खुदा से दुआ उसे सदबुद्धि दें,
जो जहां भी कहीं कोई गुनहगार है !!३!!
ईद सबको खुशी से गले से लगा,
सिखाती बाँटना आपसी प्यार है
है मसर्रत की पुरनूर ऐसी घड़ी,
जिसको दिल से मनाने की दरकार है
दी खुदा ने मोहब्बत की नेमत मगर,
आदमी भूल नफरत रहा बाँटता
राह ईमान की चलने का वायदा,
खुद से करने का ईद एक तेवहार है !!४!!
जो भी कुछ है यहां सब खुदा का दिया,
वह है सबका किसी एक का है नहीं
बस जरूरत है ले सब खुशी से जियें,
सभी हिल मिल जहाँ पर भी हों जो कहीं
खुदा सबका है सब पर मेहरबांन है,
जो भी खुदगर्ज है वह ही बेईमान है
भाईचारा बढ़े औ मोहब्बत पले ,
ईद का यही पैगाम , इसरार है !!५!!

--प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव



भारत वर्ष में हम भारतीय
सम्भवतः सभी पर्व मनाते हैं।
धर्म निरपेक्षता पहचान इसकी
धरती आनन्द मग्न सदा रहती
अनेक त्यौहार कभी कभार
माह दो माह के भीतर-भीतर
हर धर्म में मनाए जाते हैं।
कभी ईद,दिवाली इकट्ठे हुए
कभी आनन्द चौदस और
गणेश-चतुर्दशी
पोंगल और लोहड़ी हैं
कभी गुरू पर्व क्रिसमस जुड़ जाते हैं।
श्रृंखला बद्ध तरीके से जब
हम बड़े-बड़े उत्सव मनाते हैं।
फूलों की बौछार आसमाँ करते
हृदय आनन्द विभोर हो जाते हैं।
हमारी राष्टीय एकता और अखंडता
इसी सहारे जीवित है
सब धर्म यहाँ उपस्थित हैं
सब धर्म की राह दिखाते हैं
भारत वर्ष को शत-शत नमन
हन तभी भारतीय कहलाते हैं।

--सविता दत्ता



है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥

--महेश कुमार वर्मा



अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
दहल गए है कलेजे सब के ,
शोर धमाकों का सुन सुन कर
हैरान हूँ मै क्यों नही मारता,
ये बम हिन्दुओं को चुन चुन कर
वहाँ मुस्लमान भी मरते है
ये बम भेदभाव नही करते है
शोर धमाकों का गूँज रहा है
पटाखे फिर मै चलाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
गले लगो गर लग सको
भुलाके मजहब ईमान सभी
न हिंदू कहो न मुस्लिम कहो
बन जाओ जरा इंसान सभी
सब भारत माँ की संतान है
ये देश तो बड़ा महान है
सदभावना की अजान सुनाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे

--सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न'



रमजाने-पैगाम याद रखना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
आयतें उतरी जमीं पे जिस रोज,
अनवरे-इलाही आयी उस रोज;
इनायत खुदा की न कभी भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
खयानत का ख्याल तू दिल से निकाल दे,
खुदी को मिटा खुदाई में तस्लीम कर दे;
क़यामत के कहर में भी ये कलाम न छोड़ना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
अदावत का गुल ना खिल पाये कभी,
हबीबों की हस्ती ना हिल पाये कभी;
जुर्मों की जहाँ से सदा परहेज करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
पीर-फकीर, मौलाना हुए इसी राह पे चलकर,
उतारा आयतों को दिल में जुल्मों-सितम सहकर;
हर मर्ज की दवा है, वल्लाह , ना भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
हम हैं नूर खुदा के, सबसे प्यारे हैं खुदा के,
मोमिनों अहिंसक बनो, कह गए पैगम्बर सबसे;
जख्म ना पाये कोई जीव हमसे, सदा रहम करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥

--बसंत लाल दास



इक नया इतिहास
अब चलो नया इतिहास लिखें हम
स्‍नेह, मिलन के अध्‍यायों का
आपस के संघर्षों की
परम्‍परा मिटाने का
सुख दुःख साथ निभाने का

युद्ध नहीं हो कोई अब से
सत्‍ता और किसानों में
द्वन्द्व नहीं हो कोई अब से
धर्म के नाम पर आपस में
मानवता है धर्म सर्वोपरि
सबको गले लगाने का
पग पग नेह लुटाने का
अब चलो नया...
सम्‍प्रदायगत भावनाओं को
पैरों तले दबाना है
भ्रष्‍ट जनों के पुण्‍य कर्म को,
सिर पर नहीं बिठाना है
सबको यही सिखाना है
कि मिलकर बोझ उठाना है
समाधान हो ऐसे अपनी
राष्‍ट्र समाज की समस्‍याओं का
अब चलो नया....

--राजीव सारस्वत



भारत माँ की बगिया
रंग-बिरंगे फूलों से मुस्काती है
त्योहारों के मौसम मैं
कुछ और भी महक जाती है.

भाद्र मास आते ही
त्योहारों की बाढ़ सी आजाती है
एक ऐसी हवा चलती है
हर फूल को महका जाती है.

जन्माष्टमी,राखी, पर्व,
साथ-साथ आते हैं
और अपने साथ मैं
रमजान भी ले आते हैं

त्योहारों का साथ-साथ आना
ईश का वरदान है
ये कहती है कुदरत
सब उसी की संतान हैं

मैं रखूं रमजान
तुम नवरात्र रखना
प्रेम का प्रसाद
सब मिलकर चखना

राम को पूजो
या अल्लाह को मानो
पर माता की गोदी के
लाल न उजाडो

त्योहारों पर भी गर
हिंसा फैलाओगे
न राम मिलेगा
न अल्लाह को पाओगे

त्योहरीं ने प्यार की
डोर ये डाली है
बंध जाओ इसमें
ये बड़ी मतवाली है

एक साथ नाचो
और एक साथ गाओ
एकता की बीन बजी
एक हो जाओ

भिन्नता भुलाओ-
भिन्नता भुलाओ

--शोभा महेंद्रू



आनंद-उल्लास से भरा है पलकों का गागर
प्रेम-आश से छलका है धड़कनों का सागर
इस नज़र में उस नज़र में चाहे देखो जिस नज़र से
एक नई खुशी है एक नई है मुस्कराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

आसमान के सुनहरी लाल-लाल किरणें
समायी हुयी है सबके मासूम चेहरे पे.
चांदनी भी कुछ कम नहीं
फलक पे दिख रही निखरी-निखरी से
ये चिड़ियों की चहचहाहट, वो पत्तों की सरसराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

सजदे दुआओं तेरे सहज कबूल हों
रहें जिंदगी में तेरे जलज फूल हों
खुदा की असीम कृपा तेरे साथ रहे
भटकाव न आए कभी लक्ष्य पे तेरे आँख रहे
ये दुआ हमारी तरफ़ से, कही जो अब तक
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक !

-सुनील कुमार 'सोनू'



रमजान का महीना लाया
ईद की सुंदर सौगात|
सौगात को संजो लेते सब
आड़े न आता हैसियत औ हालात ||

बड़ी मुश्किल से मुझे मालूम पड़ी
ईद मनाने की ये वजह |
दिल ने कहा क्यों इन्सान
खुश नहीं हो सकता बेवजह||

गले मिलते हैं
साथ खाते हैं |
इस दिन दुश्मन को भी
गले लगाते हैं ||

पर इक दिन ही क्यों
हर दिन वैर मिट नहीं सकता |
मीठी सेवईयाँ लेने से
क्या और दिन कोई रोकता ||

कुरान का पाठ
खुदा की इबादत |
रखता जज्बों को पाक
दूर रहती बुरी आदत ||

क्या रोज इबादत से
खुदा ख़फा हो जाएगा |
रोज कुरान पढ़ने से
कोई दफा लग जाएगा ||

क्यों आपसी भाईचारा और प्यार
एक मौके की मोहताज है |
क्यों ईद का मिलाप
बस ईद के दिन की बात है ||

ये रंगीन पल, ये रौशनी
ये रौनक, ये चमक |
क्यों नही रह सकते जेहन में तब तलक
आ न जाए दूसरा ईद जब तलक ||

इस बार ईद पे
कुछ ऐसी ईदी दे दो |
जिससे गले मिला आज
उसे ताउम्र अपना कर लो ||

हर गम और रंजिश को मिटा के दे
सबको ईद की मुबारकबाद |
करे उस अल्लाह को याद
जिसकी हैं हम सब ही औलाद ||

--पंखुडी कुमारी