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दरमियां .................


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अब कोई बात न होगी
हमारे बीच ...

वो अपने गुनाहों से पशेमां
होठों से लफ्ज़ों को भींच
मैं उसकी खताओं से परेशां
उसकी नासमझी पर खीज
अब कोई बात न होगी
हमारे बीच .....

इधर मेरी नाराजगियां
रंजिश से उपजती नफरत
उधर शर्म की खामोशी और
न माफ़ी की कोई गुंजाइश
अब कोई बात न होगी
हमारे बीच ...

वो मेरे रहम के इंतज़ार में
मैं उसी अर्ज़ के इंतज़ार में
शायद अब यूँ ही बीते सदियाँ
इक पहल के इंतज़ार में
ज़िंदगी के धागे अब भागेंगे आगे
कुछ गिरहों को छोड़ पीछ
अब कोई बात न होगी
हमारे बीच ....

फिर एहसास रिश्ते की संजीदगी का
और हर बाक़ी शै के सिफर* होने का
मेरे सामने रक्खा मेरा फोन
और एक पल के फैसले का बीज
और अब
.... कोई बात न होगी
हमारे बीच .....

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RC
सिफर= zero
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काव्य-पल्लवन का नया रूप


काव्यपल्लवन के अब तक उन्नीस अंक प्रकाशित हो चुके हैं। हर बार हम एक नया शब्द ले कर आये और नई तरह की अलग अलग लोगों की ढेरों रचनायें प्रकाशित की। कभी त्योहारों पर लिखा गया, कभी आप लोगों से ही हमने जानना चाहा कि किस विषय पर लिखा जाये। "पहली कविता" की शृंखला को लोगों ने काफी पसंद किया और इस प्रयोग से हमें नये कवि भी मिले। हम मानते हैं प्रयोग होते रहने चाहिये, तभी हम अपने उद्देश्य पर भी आगे बढ़ते रहेंगे। हर कला को हिंदी से और हिंदी को हर कला से जोड़ना है। तो इसी के मद्देनज़र हम आज से शुरू कर रहे हैं काव्य-पल्लवन का नया रूप। हम यहाँ एक चित्र प्रकाशित कर रहे हैं। करना केवल यह है कि आपको इस चित्र पर आधारित कुछ पंक्तियाँ अथवा कविता लिखनी है। हम पहले भी कविताओं पर आधारित चित्रकारों के चित्र प्रकाशित कर चुके हैं यहाँ चित्र के आधार पर कविता लिखनी है।

इस बार हम हिंदयुग्मी फोटोग्राफर मनुज मेहता का चित्र पेश कर रहे हैं।

Photobucket

यदि आप इसी चित्र के विषय पर अपना कोई चित्र या फोटो भेज सकते हैं तो आपका स्वागत है।

अपनी रचनायें kavyapallavan@gmail.com पर भेजें। रचनायें भेजने की अंतिम तिथि २४ नवम्बर है।

आपको हमारा यह प्रयास कैसा लगा ज़रूर बताइयेगा।

लाल बहादुर शास्त्री और गाँधी जी के जन्मदिवस पर विशेष


लाल बहादुर शास्त्री और गाँधी जयंती के उपलक्ष्य पर हमें तीन कवितायें प्राप्त हुईं हैं, जिन्हें हम आज प्रकाशित कर रहे हैं।



उड़ गए पंछी सो गए हम
अब हमको है लुटने का गम

क्या बतलाएं बापू तुमको दाने कहाँ गए।

जब उजले पंछी आए थे
तब हम उनसे टकराए थे
थे ताकतवर नरभक्षी थे
पर हमने मार भगाए थे

जान लड़ाने वाले वो दीवाने कहाँ गए।
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गए।

हैं गैरों से तो जीते हम
पर अपनों से ही हारे हम
कैसे-कैसे सपने देखे
जब नींद खुली आंखें थीं नम

बजुके पूछ रहे खेतों के दाने कहाँ गए।
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गए।

भुना रहे हैं एक रूपैय्या
जाने कैसे तीन अठन्नी
पैर पकड़कर हाथ मांगते
अब भी अपनी एक चवन्नी।

मुट्ठी वाले हाथ सभी ना जाने कहाँ गए।
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गए।

तुलसी के पौधे बोए थे
दोहे कबीर के गाए थे
सत्य अहिंसा के परचम
जग में हमने फहराए थे

नैतिकता के वो ऊँचे पैमाने कहाँ गए।
क्या बतलाएँ बापू तुमको दाने कहाँ गए।

--देवेन्द्र पाण्डेय


धोती वाले बाबा की
यह ऐसी एक लडा़ई थी
न गोले बरसाये उसने
न बन्दूक चलायी थी
सत्य अहि़सा के बल पर ही
दुश्मन को धूल चटाई थी
मन की ताकत से ही उसने
रोका हर तूफान को

हम श्रद्धा से याद करेगें
गाँधी के बलिदान को

ली सच की लाठी उसने
तन पर भक्ति का चोला
सबक अहि़सा का सिखलाया
वाणी में अमृत उसने घोला
बापू के इस रंग में रंग कर
देश का बच्चा- बच्चा बोला
कर देगें भारत माँ पर अर्पण
हम अपनी जान को

हम श्रद्घा से याद करेगें
गाँधी के बलिदान को

चरखे के ताने बाने से उसने
भारत का इतिहास रचा
हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई
सबमें इक विश्वास रचा
सहम गया विदेशी फिरंगी
लड़ने का अभ्यास रचा
मान गया अंग्रेजी शासक
बापू की पहचान को

हम श्रद्धा से याद करेगें
गाँधी के बलिदान को

जिस बापू ने सारे जग में
हिन्दुस्तान का नाम किया
उस पर ही इक घात लगाकर
अनहोनी ने काम किया
बापू ने बस राम कहा और
चिर निद्र में विश्राम किया
यह संसार नमन करता है
आजादी की शान को

हम श्रद्धा से याद करेगें
गाँधी के बलिदान को.

--हरकीरत कलसी हकी़र


एक थे लाल और एक थे बापू ,
कहाँ हैं अब ऐसे लाल और बापू ,
दोनों ने जीवन ,सर्वस्व किया ,नौछावर ,
अपनी इस जननी की खातिर ,
आओ मिलकर दिया जलाएं ,
जन्मदिन उनका मनाएँ ,
सुख ,समृधि का जो देखा उन्होंने सपना ,
उसको पूरा करने का क्योँ न ले प्रण अपना |
प्यारे बापू प्यारे शास्त्री जी ,
धन्यभाग हमारे ,
जो हम इस धरती पर आए ,
जहां ऐसे कर्णधार हमने हैं पाये |
अपने कर्मठ अमर सपूतों को ,
उनके पसीने की एक एक बूंदों को
क्योँ न याद करे हम दोनों को ,
भावबिह्वलहोकर दोनों को
इस धरा के अमर सपूतों को ,
एक ने बोला जय जवान -जय किसान ,
दूसरे बोले रघुपति राघव राजा राम
दोनों की थी एक ही बोली ,
देश हमारा खेले होली(रंगों की),
क्योँ न बोलें हम ये आज ,
भारत ,बन जाए हम सबकी शान

--नीलम मिश्रा

ईद 2008 और हिन्दी कविताएँ







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - ईद/रमजान/भाईचारा

अंक - अठारह

माह - सितम्बर २००८





काव्य-पल्लवन का अठारहवाँ अंक लेकर हम प्रस्तुत हैं। इस बार हमने विषय को 'ईद/रमज़ान/भाईचारा' को समर्पित किया है। पिछले महीने इस प्रस्ताव पर लम्बी चर्चा हुई थी कि इसे विषय विशेष से बदलकर विधा विशेष कर देना चाहिए, इस चर्चा में लम्बा समय बीता और निर्णय लेने तक कई तारीखें बदल गई थीं। समय कम दिया गया, फिर भी हमें १२ कविताएँ प्राप्त हो गईं। और दो कविताएँ (एक जय कुमार की और दूसरी ) भी प्राप्त हुई थीं, लेकिन उसमें लिखे शब्दों को समझ पाना कठिन था। रचनाकारों को इस बाबत सम्पर्क किया गया, लेकिन हमें उत्तर नहीं मिला, इसलिए हम उन्हें शामिल नहीं कर रहे है।

सबसे अच्छी बात है कि सभी कलमकारों ने सौहार्द और शांति का पैगाम दिया है। इनका पैगाम दुनिया को पहुँचे, हमारी तो यही कामना है।

आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| संजीव वर्मा "सलिल" | विवेक रंजन श्रीवास्तव | प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव | सविता दत्ता | महेश कुमार वर्मा | सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न ' | बसंत लाल दास | राजीव सारस्वत | शोभा महेंद्रू | सुनील कुमार 'सोनू' |पंखुड़ी कुमारी |

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ईद हो हर दिन हमारा,
दिवाली हर रात हो.
दिल को दिल से जीत लें हम,
नहीं दिल की मात हो.....
भूलकर शिकवे शिकायत,
आओ हम मिल लें गले.
स्नेह सलिला में नहायें,
सुबह से संझा ढले.
आंख तेरी ख्वाब मेरे,
खुशी की बारात हो.....
दर्द मुझको हो तो तेरी
आंख से आंसू बहे
मेरे लब पर गजल
तेरे अधर पर दोहा रहे
जय कहें जम्हूरियत की
खुदी वह हालात हो.....
छोड दें फिरकापरस्ती
तोड नफरत की दिवाल.
दूध पानी की तरह हों एक
ऊंचा रहे भाल.
"सलिल" की शहनाई,
सबकी खुशी के नग्मात हो.....

खुशियों के त्यौहार

ईद दिवाली ओणम क्रिसमस
खुशियों के त्यौहार.
लगकर गले बधाई दें लें
झूमें नाचें यार.
हम सब भारत मां के बेटे
सबके सुख दुख एक.
सभी सुखी हों यही मनाते,
तजें न अपनी टेक.
भाईचारा मजहब अपना
मानवता ईमान.
आंसू पोछें हर पीडित के
बन सच्चे इंसान.
नूर खुदाई सबमें देखा
कोई दिखा न गैर.
हाथ जोडकर रब से मांगें
सबकी रखना खैर
.
दहशतगर्दी से लडना है
हर इंसां का फर्ज.
बहा पसीना चुका सकेंगे
भारत मां का कर्ज
गुझिया सिंवई खिकायें खायें
हों साझे त्यौहार.
अंतर से अंतर का अंतर
मिटा लुटायें प्यार.

--संजीव वर्मा "सलिल"



आसमां में गुफ्तगू है चल रही ,
चाँद की आये खबर तो ईद हुई
अम्मी बनातीं थीं सिंवईयाँ दूध में ,
स्वाद वह याद आया लो ईद हुई
नमाज हो मन से अदा,
जकात भी दिल से बँटे,
मजहब महज किताब नहीं
पूरे हुये रमजान के रोजों के दिन ,
सौगात जो खुदा की, वो ईद हुई
आतंक होता अंधा जुनूनी बेइंतिहाँ ,
मकसद है क्या इसका भला
गांधी जयंती ईद है इस दफा ,
जो अंत हो आतंक का तो ईद हुई
नजाकत नफासत और तहजीब की
पहचान है मुसलमानी जमात,
आतंक का नाम अब और मुस्लिम न हो,
फैले रहमत तो ईद हुई
कुरान को समझें,
समझें जिहाद का मतलब,
ईद का पैगाम है मोहब्बत
दिल मिलें,भूल कर शिकवे गिले ,
गले रस्मी भर नहीं ,तो ईद हुई
रौनक बाजारों की , मन का उल्लास ,
नये कपड़े ,और छुट्टी पढ़ाई की
उम्मीद से और ज्यादा मिले ,
ईदी बचपन , और बड़प्पन को ईद हुई

--विवेक रंजन श्रीवास्तव



ईद के चाँद की खोज में हर बरस ,
दिखती दुनियाँ बराबर ये बेजार है
बाँटने को मगर सब पे अपनी खुशी,
कम ही दिखता कहीं कोई तैयार है
ईद दौलत नहीं ,कोई दिखावा नहीं ,
ईद जज्बा है दिल का ,खुशी की घड़ी
रस्म कोरी नहीं ,जो कि केवल निभे ,
ईद का दिल से गहरा सरोकार है !! १!!
अपने को औरों को और कुदरत को भी ,
समझने को खुदा के ये फरमान है
है मुबारक घड़ी ,करने एहसास ये -
रिश्ता है हरेक का , हरेक इंसान से
है गुँथीं साथ सबकी यहाँ जिंदगी ,
सबका मिल जुल के रहना है लाजिम यहाँ
सबके ही मेल से दुनियाँ रंगीन है ,
प्यार से खूबसूरत ये संसार है !!२!!
मोहब्बत, आदमीयत ,
मेल मिल्लत ही तो सिखाते हैं सभी मजहब संसार में
हो अमीरी, गरीबी या कि मुफलिसी ,
कोई झुलसे न नफरत के अंगार में
सिर्फ घर-गाँव -शहरों ही तक में नहीं ,
देश दुनियां में खुशियों की खुश्बू बसे
है खुदा से दुआ उसे सदबुद्धि दें,
जो जहां भी कहीं कोई गुनहगार है !!३!!
ईद सबको खुशी से गले से लगा,
सिखाती बाँटना आपसी प्यार है
है मसर्रत की पुरनूर ऐसी घड़ी,
जिसको दिल से मनाने की दरकार है
दी खुदा ने मोहब्बत की नेमत मगर,
आदमी भूल नफरत रहा बाँटता
राह ईमान की चलने का वायदा,
खुद से करने का ईद एक तेवहार है !!४!!
जो भी कुछ है यहां सब खुदा का दिया,
वह है सबका किसी एक का है नहीं
बस जरूरत है ले सब खुशी से जियें,
सभी हिल मिल जहाँ पर भी हों जो कहीं
खुदा सबका है सब पर मेहरबांन है,
जो भी खुदगर्ज है वह ही बेईमान है
भाईचारा बढ़े औ मोहब्बत पले ,
ईद का यही पैगाम , इसरार है !!५!!

--प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव



भारत वर्ष में हम भारतीय
सम्भवतः सभी पर्व मनाते हैं।
धर्म निरपेक्षता पहचान इसकी
धरती आनन्द मग्न सदा रहती
अनेक त्यौहार कभी कभार
माह दो माह के भीतर-भीतर
हर धर्म में मनाए जाते हैं।
कभी ईद,दिवाली इकट्ठे हुए
कभी आनन्द चौदस और
गणेश-चतुर्दशी
पोंगल और लोहड़ी हैं
कभी गुरू पर्व क्रिसमस जुड़ जाते हैं।
श्रृंखला बद्ध तरीके से जब
हम बड़े-बड़े उत्सव मनाते हैं।
फूलों की बौछार आसमाँ करते
हृदय आनन्द विभोर हो जाते हैं।
हमारी राष्टीय एकता और अखंडता
इसी सहारे जीवित है
सब धर्म यहाँ उपस्थित हैं
सब धर्म की राह दिखाते हैं
भारत वर्ष को शत-शत नमन
हन तभी भारतीय कहलाते हैं।

--सविता दत्ता



है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥

--महेश कुमार वर्मा



अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
दहल गए है कलेजे सब के ,
शोर धमाकों का सुन सुन कर
हैरान हूँ मै क्यों नही मारता,
ये बम हिन्दुओं को चुन चुन कर
वहाँ मुस्लमान भी मरते है
ये बम भेदभाव नही करते है
शोर धमाकों का गूँज रहा है
पटाखे फिर मै चलाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
गले लगो गर लग सको
भुलाके मजहब ईमान सभी
न हिंदू कहो न मुस्लिम कहो
बन जाओ जरा इंसान सभी
सब भारत माँ की संतान है
ये देश तो बड़ा महान है
सदभावना की अजान सुनाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे

--सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न'



रमजाने-पैगाम याद रखना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
आयतें उतरी जमीं पे जिस रोज,
अनवरे-इलाही आयी उस रोज;
इनायत खुदा की न कभी भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
खयानत का ख्याल तू दिल से निकाल दे,
खुदी को मिटा खुदाई में तस्लीम कर दे;
क़यामत के कहर में भी ये कलाम न छोड़ना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
अदावत का गुल ना खिल पाये कभी,
हबीबों की हस्ती ना हिल पाये कभी;
जुर्मों की जहाँ से सदा परहेज करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
पीर-फकीर, मौलाना हुए इसी राह पे चलकर,
उतारा आयतों को दिल में जुल्मों-सितम सहकर;
हर मर्ज की दवा है, वल्लाह , ना भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
हम हैं नूर खुदा के, सबसे प्यारे हैं खुदा के,
मोमिनों अहिंसक बनो, कह गए पैगम्बर सबसे;
जख्म ना पाये कोई जीव हमसे, सदा रहम करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥

--बसंत लाल दास



इक नया इतिहास
अब चलो नया इतिहास लिखें हम
स्‍नेह, मिलन के अध्‍यायों का
आपस के संघर्षों की
परम्‍परा मिटाने का
सुख दुःख साथ निभाने का

युद्ध नहीं हो कोई अब से
सत्‍ता और किसानों में
द्वन्द्व नहीं हो कोई अब से
धर्म के नाम पर आपस में
मानवता है धर्म सर्वोपरि
सबको गले लगाने का
पग पग नेह लुटाने का
अब चलो नया...
सम्‍प्रदायगत भावनाओं को
पैरों तले दबाना है
भ्रष्‍ट जनों के पुण्‍य कर्म को,
सिर पर नहीं बिठाना है
सबको यही सिखाना है
कि मिलकर बोझ उठाना है
समाधान हो ऐसे अपनी
राष्‍ट्र समाज की समस्‍याओं का
अब चलो नया....

--राजीव सारस्वत



भारत माँ की बगिया
रंग-बिरंगे फूलों से मुस्काती है
त्योहारों के मौसम मैं
कुछ और भी महक जाती है.

भाद्र मास आते ही
त्योहारों की बाढ़ सी आजाती है
एक ऐसी हवा चलती है
हर फूल को महका जाती है.

जन्माष्टमी,राखी, पर्व,
साथ-साथ आते हैं
और अपने साथ मैं
रमजान भी ले आते हैं

त्योहारों का साथ-साथ आना
ईश का वरदान है
ये कहती है कुदरत
सब उसी की संतान हैं

मैं रखूं रमजान
तुम नवरात्र रखना
प्रेम का प्रसाद
सब मिलकर चखना

राम को पूजो
या अल्लाह को मानो
पर माता की गोदी के
लाल न उजाडो

त्योहारों पर भी गर
हिंसा फैलाओगे
न राम मिलेगा
न अल्लाह को पाओगे

त्योहरीं ने प्यार की
डोर ये डाली है
बंध जाओ इसमें
ये बड़ी मतवाली है

एक साथ नाचो
और एक साथ गाओ
एकता की बीन बजी
एक हो जाओ

भिन्नता भुलाओ-
भिन्नता भुलाओ

--शोभा महेंद्रू



आनंद-उल्लास से भरा है पलकों का गागर
प्रेम-आश से छलका है धड़कनों का सागर
इस नज़र में उस नज़र में चाहे देखो जिस नज़र से
एक नई खुशी है एक नई है मुस्कराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

आसमान के सुनहरी लाल-लाल किरणें
समायी हुयी है सबके मासूम चेहरे पे.
चांदनी भी कुछ कम नहीं
फलक पे दिख रही निखरी-निखरी से
ये चिड़ियों की चहचहाहट, वो पत्तों की सरसराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

सजदे दुआओं तेरे सहज कबूल हों
रहें जिंदगी में तेरे जलज फूल हों
खुदा की असीम कृपा तेरे साथ रहे
भटकाव न आए कभी लक्ष्य पे तेरे आँख रहे
ये दुआ हमारी तरफ़ से, कही जो अब तक
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक !

-सुनील कुमार 'सोनू'



रमजान का महीना लाया
ईद की सुंदर सौगात|
सौगात को संजो लेते सब
आड़े न आता हैसियत औ हालात ||

बड़ी मुश्किल से मुझे मालूम पड़ी
ईद मनाने की ये वजह |
दिल ने कहा क्यों इन्सान
खुश नहीं हो सकता बेवजह||

गले मिलते हैं
साथ खाते हैं |
इस दिन दुश्मन को भी
गले लगाते हैं ||

पर इक दिन ही क्यों
हर दिन वैर मिट नहीं सकता |
मीठी सेवईयाँ लेने से
क्या और दिन कोई रोकता ||

कुरान का पाठ
खुदा की इबादत |
रखता जज्बों को पाक
दूर रहती बुरी आदत ||

क्या रोज इबादत से
खुदा ख़फा हो जाएगा |
रोज कुरान पढ़ने से
कोई दफा लग जाएगा ||

क्यों आपसी भाईचारा और प्यार
एक मौके की मोहताज है |
क्यों ईद का मिलाप
बस ईद के दिन की बात है ||

ये रंगीन पल, ये रौशनी
ये रौनक, ये चमक |
क्यों नही रह सकते जेहन में तब तलक
आ न जाए दूसरा ईद जब तलक ||

इस बार ईद पे
कुछ ऐसी ईदी दे दो |
जिससे गले मिला आज
उसे ताउम्र अपना कर लो ||

हर गम और रंजिश को मिटा के दे
सबको ईद की मुबारकबाद |
करे उस अल्लाह को याद
जिसकी हैं हम सब ही औलाद ||

--पंखुडी कुमारी



वहशत की दहशत...


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आँधी भूल सब आगे निकल गये.

धरती हुई थी लाल, लपटें उठी थीं विकराल,
अनदेखों ने अनजानों से खेली थी होली लाल,
न तुमको चेहरा मिला, ना ही कोई नाम मिला,
फिर क्यों किया मौत का तान्डव, ये ज़लज़ला...?

कोई भाई ढूंढता मिला, किसी को न दोस्त मिला,
बदहवास से समेटते रहे, वो दहशत का सिलसिला,
माँएँ बिलखती रहीं, बेटियाँ सिसकती रहीं,
कुछ वहशी पलों में, जीवन बेल टूटती रहीं,

रूपहले स्वप्न टूट गये, मोती सारे बिखर गये,
बिन चाहे वो तो अपना, अंतिम सफर कर गये,
लाचार हो खडे सब तमाशा देखते रहे,
और तूफानों में मुस्काते फूल बिखरते रहे.

देश अन्धेरे में डूबता रहा, सियासत अनजान रही,
हिन्द की धरती पर आज अपनों की साजिश रही,
आज यहाँ कल वहाँ बस यही सवाल रह गये,
कब तुम कब हम, बस अब यही हाल रह गये.


स्याह बादल छंट गये, आसमाँ भी धुल गये,
कल की आन्धी भूल सब आगे निकल गये...

--अरविन्द चौहान

अच्छा नहीं लगता


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हाथ खाली हों तो आँखें भर लाना अच्छा नहीं लगता
उनकी दुनिया लुट गई, उन पर गाना अच्छा नहीं लगता
माना सबके खिरजो-जज्बात* के अपने तरीके हैं मगर
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

माँ होकर क्यों देखती हूँ वही तमाशा जो बरहा लगता है
क्यों यतीम बच्चे देख मेरा खून खौलता नहीं पिघलता है
क्यों जागती हूँ तब ही जब कोई 'बापू' या 'बोस' जगता है
क्यों हरदम "मुझे" किसी रहनुमा* का इंतज़ार रहता है
उन शहीदों को यूँ नज्मों में मारना अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

मशहर-सा* माहौल है हरसू, दिल भी उदास ख़राब है
उठे हुए सवालों ने ऐसी 'सुखन' पाई के सब लाजवाब है**
अब लिखने को नहीं, करने को, उठने को हाथ बेताब हैं
क्यों लिख रही हूँ फिर, क्यों मेरी बगावत में हिजाब* है
कुछ कर नहीं सकती और 'कुछ न करना' अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

शायद कुछ मिनिट लगते हैं एक नज़्म लिखने में
और शायद कुछ मिनिट लगे थे वो जानें जाने में
कुछ मिनिट लगेंगे मॉल्स की 'सेक्युरिटी' परखने में
कुछ मिनिट लगेंगे हमें हरसू एहतियात बरतने में
'दानव बड़ा है' सोच कुछ पल लगेंगे सबको डरने में
'दानव बड़ा है' जान गुंजाइश घटेगी निशाने-तीर चूकने में
जागो तो कुछ पल लगेंगे सबको थोड़ा-थोड़ा जगने में
समझो तो पल भी नहीं लगेंगे मेरी बात समझने में
'चूड़ी-कंगन पहने' यूँ बैठे रहना अब अच्छा नहीं लगता
मुझे 'धमाकों' पर कविता लिखना अच्छा नहीं लगता

- रूपम चोपडा (RC)

(**सुखन = यहाँ दो मतलब लिए हैं - बातचीत और कविता
खिरजो-जज्बात = खिरज और जज्बात = श्रद्धांजलि और भावनाएं
मशहर = प्रलय, हिजाब = सुशीलता/नम्रता, रहनुमा = मार्गदर्शक, लीडर )

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वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था


आतंकवाद - दो गजलें

कल हुई दहशत ने मारे थे बहुत
जो गए, वो लोग प्यारे थे बहुत

जिस जगह पर कल धुआँ उठने लगा
घर वहाँ मेरे तुम्हारे थे बहुत

दोस्तों के और अजीजों के लिए
लोग वो सच्चे सहारे थे बहुत

धूप मीठा खिलखिलाती थी मगर
छा गए फिर मेघ कारे थे बहुत

यक-ब-यक बस्ती धुएँ से भर गई
लोग कितना डर के मारे थे बहुत

कुछ नहीं मेरा तुम्हारा ये कुसूर
अज़ल से ही अश्क खारे थे बहुत

(अर्थ: दहशत = आतंक, अज़ल = सृष्टि रचना काल , यक-ब-यक = अचानक )

(2)

शहर में मौत पे अफ़सोस करने आया था,
वो कौन शख्स था जो दर्द पढ़ने आया था.

जहाँ पे आज धमाका हुआ था शाम ढले
वहीं पे कल ही तो मैं सैर करने आया था.

यहीं पे पहली मुलाक़ात में मिला था मुझे
यहीं पे आज वो सब से बिछड़ने आया था.

बहुत हसीन था वो लाजवाब सूरत थी
कफ़न के पैरहन में अब सँवरने आया था.

बहुत बयान दिए हुक्मराँ ने मकतल पर
वो इक विमान से तफ्तीश करने आया था.

तुम इस तर्ह मुझे मुजरिम समझ के मत देखो,
मैं अपने दीन पे ही जीने मरने आया था.

(अर्थ: पैरहन = वस्त्र मकतल = वधस्थल, तफ्तीश = जांच)

प्रेमचंद सहजवाला

दिल पे मगर हिन्दी-हिन्दुस्तान लिखना


फूल लिखना कि पान लिखना
गेहूँ लिखना कि धान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल पे मगर हिन्दी-हिन्दुस्तान लिखना

वेद लिखना कि पुरान लिखना
सबद लिखना कि कुरान लिखना
कागद पे चाहे जो भी लिखना
दिल......
सुबह लिखना कि शाम लिखना
रहीम लिखना राम लिखना
कागद पे
दिल पे.....

मजूर लिखना कि किसान लिखना
बच्चे-बूढ़े या तुम जवान लिखना
कागद पे ...
दिल पे.......
गीत गज़ल का उनवान लिखना
तमिल उड़िया जुबान लिखना
कागद पे..
दिल पे हिन्दी-हिन्दुस्तान लिखना

-- डॉ॰ श्याम सखा 'श्याम'
रोहतक (हरियाणा)




हिन्दी दिवस,
भाषा और साहित्य का-
है दिवस एक पावन;
पर एक शंका उठती रही,
सामने है खड़ा वह-
अंग्रेजी का रावण।
दिख रहा स्पष्ट यह,
लीलता है जा रहा-
हिन्दी की वह गरिमा को;
कमर कस हिन्दी सेवक,
हों अगर तैयार सब-
बचा लें इसकी महिमा को।
हिन्दी के मानस पुत्रों ने,
विकास के रोड़े हटाये-
किया संघर्ष-दुर्धर्ष;
आज है यह हमारी,
साहित्य के प्रति जिम्मेदारी-
न जाए वह संघर्ष-व्यर्थ।
भारतेंदु और प्रेमचंद,
निराला से लेकर पन्त-
करते रहे प्रयास;
हिन्दी साहित्य को दे,
रचनाओं की समृद्धि-
किया इसका विकास।
हिन्दी जोड़ती एक सूत्र में,
उत्तर से ले दक्षिण तक-
कार्य करती रही;
बिना हिन्दी के बने कैसे,
एक देश और एक राष्ट्र-
हमारा अखंड हिंदुस्तान।
संस्कृति की रक्षा,
करना है हिन्दी के द्वारा-
हमपर है यह कर्ज;
संकल्प लें हम,
हिन्दी रक्षा कर-
निभाएंगे अपना फर्ज।
यही उद्घोष है अपना,
हिन्दी के अनवरत विकास की-
लड़ेगा जो लड़ाई,
वही साधक है,
पाने लायक बचा बस-
हिन्दी दिवस की बधाई।

--प्रमोद कुमार,
जामतारा,
झारखण्ड (भारत)