फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

ईद 2008 और हिन्दी कविताएँ







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - ईद/रमजान/भाईचारा

अंक - अठारह

माह - सितम्बर २००८





काव्य-पल्लवन का अठारहवाँ अंक लेकर हम प्रस्तुत हैं। इस बार हमने विषय को 'ईद/रमज़ान/भाईचारा' को समर्पित किया है। पिछले महीने इस प्रस्ताव पर लम्बी चर्चा हुई थी कि इसे विषय विशेष से बदलकर विधा विशेष कर देना चाहिए, इस चर्चा में लम्बा समय बीता और निर्णय लेने तक कई तारीखें बदल गई थीं। समय कम दिया गया, फिर भी हमें १२ कविताएँ प्राप्त हो गईं। और दो कविताएँ (एक जय कुमार की और दूसरी ) भी प्राप्त हुई थीं, लेकिन उसमें लिखे शब्दों को समझ पाना कठिन था। रचनाकारों को इस बाबत सम्पर्क किया गया, लेकिन हमें उत्तर नहीं मिला, इसलिए हम उन्हें शामिल नहीं कर रहे है।

सबसे अच्छी बात है कि सभी कलमकारों ने सौहार्द और शांति का पैगाम दिया है। इनका पैगाम दुनिया को पहुँचे, हमारी तो यही कामना है।

आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| संजीव वर्मा "सलिल" | विवेक रंजन श्रीवास्तव | प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव | सविता दत्ता | महेश कुमार वर्मा | सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न ' | बसंत लाल दास | राजीव सारस्वत | शोभा महेंद्रू | सुनील कुमार 'सोनू' |पंखुड़ी कुमारी |

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





ईद हो हर दिन हमारा,
दिवाली हर रात हो.
दिल को दिल से जीत लें हम,
नहीं दिल की मात हो.....
भूलकर शिकवे शिकायत,
आओ हम मिल लें गले.
स्नेह सलिला में नहायें,
सुबह से संझा ढले.
आंख तेरी ख्वाब मेरे,
खुशी की बारात हो.....
दर्द मुझको हो तो तेरी
आंख से आंसू बहे
मेरे लब पर गजल
तेरे अधर पर दोहा रहे
जय कहें जम्हूरियत की
खुदी वह हालात हो.....
छोड दें फिरकापरस्ती
तोड नफरत की दिवाल.
दूध पानी की तरह हों एक
ऊंचा रहे भाल.
"सलिल" की शहनाई,
सबकी खुशी के नग्मात हो.....

खुशियों के त्यौहार

ईद दिवाली ओणम क्रिसमस
खुशियों के त्यौहार.
लगकर गले बधाई दें लें
झूमें नाचें यार.
हम सब भारत मां के बेटे
सबके सुख दुख एक.
सभी सुखी हों यही मनाते,
तजें न अपनी टेक.
भाईचारा मजहब अपना
मानवता ईमान.
आंसू पोछें हर पीडित के
बन सच्चे इंसान.
नूर खुदाई सबमें देखा
कोई दिखा न गैर.
हाथ जोडकर रब से मांगें
सबकी रखना खैर
.
दहशतगर्दी से लडना है
हर इंसां का फर्ज.
बहा पसीना चुका सकेंगे
भारत मां का कर्ज
गुझिया सिंवई खिकायें खायें
हों साझे त्यौहार.
अंतर से अंतर का अंतर
मिटा लुटायें प्यार.

--संजीव वर्मा "सलिल"



आसमां में गुफ्तगू है चल रही ,
चाँद की आये खबर तो ईद हुई
अम्मी बनातीं थीं सिंवईयाँ दूध में ,
स्वाद वह याद आया लो ईद हुई
नमाज हो मन से अदा,
जकात भी दिल से बँटे,
मजहब महज किताब नहीं
पूरे हुये रमजान के रोजों के दिन ,
सौगात जो खुदा की, वो ईद हुई
आतंक होता अंधा जुनूनी बेइंतिहाँ ,
मकसद है क्या इसका भला
गांधी जयंती ईद है इस दफा ,
जो अंत हो आतंक का तो ईद हुई
नजाकत नफासत और तहजीब की
पहचान है मुसलमानी जमात,
आतंक का नाम अब और मुस्लिम न हो,
फैले रहमत तो ईद हुई
कुरान को समझें,
समझें जिहाद का मतलब,
ईद का पैगाम है मोहब्बत
दिल मिलें,भूल कर शिकवे गिले ,
गले रस्मी भर नहीं ,तो ईद हुई
रौनक बाजारों की , मन का उल्लास ,
नये कपड़े ,और छुट्टी पढ़ाई की
उम्मीद से और ज्यादा मिले ,
ईदी बचपन , और बड़प्पन को ईद हुई

--विवेक रंजन श्रीवास्तव



ईद के चाँद की खोज में हर बरस ,
दिखती दुनियाँ बराबर ये बेजार है
बाँटने को मगर सब पे अपनी खुशी,
कम ही दिखता कहीं कोई तैयार है
ईद दौलत नहीं ,कोई दिखावा नहीं ,
ईद जज्बा है दिल का ,खुशी की घड़ी
रस्म कोरी नहीं ,जो कि केवल निभे ,
ईद का दिल से गहरा सरोकार है !! १!!
अपने को औरों को और कुदरत को भी ,
समझने को खुदा के ये फरमान है
है मुबारक घड़ी ,करने एहसास ये -
रिश्ता है हरेक का , हरेक इंसान से
है गुँथीं साथ सबकी यहाँ जिंदगी ,
सबका मिल जुल के रहना है लाजिम यहाँ
सबके ही मेल से दुनियाँ रंगीन है ,
प्यार से खूबसूरत ये संसार है !!२!!
मोहब्बत, आदमीयत ,
मेल मिल्लत ही तो सिखाते हैं सभी मजहब संसार में
हो अमीरी, गरीबी या कि मुफलिसी ,
कोई झुलसे न नफरत के अंगार में
सिर्फ घर-गाँव -शहरों ही तक में नहीं ,
देश दुनियां में खुशियों की खुश्बू बसे
है खुदा से दुआ उसे सदबुद्धि दें,
जो जहां भी कहीं कोई गुनहगार है !!३!!
ईद सबको खुशी से गले से लगा,
सिखाती बाँटना आपसी प्यार है
है मसर्रत की पुरनूर ऐसी घड़ी,
जिसको दिल से मनाने की दरकार है
दी खुदा ने मोहब्बत की नेमत मगर,
आदमी भूल नफरत रहा बाँटता
राह ईमान की चलने का वायदा,
खुद से करने का ईद एक तेवहार है !!४!!
जो भी कुछ है यहां सब खुदा का दिया,
वह है सबका किसी एक का है नहीं
बस जरूरत है ले सब खुशी से जियें,
सभी हिल मिल जहाँ पर भी हों जो कहीं
खुदा सबका है सब पर मेहरबांन है,
जो भी खुदगर्ज है वह ही बेईमान है
भाईचारा बढ़े औ मोहब्बत पले ,
ईद का यही पैगाम , इसरार है !!५!!

--प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव



भारत वर्ष में हम भारतीय
सम्भवतः सभी पर्व मनाते हैं।
धर्म निरपेक्षता पहचान इसकी
धरती आनन्द मग्न सदा रहती
अनेक त्यौहार कभी कभार
माह दो माह के भीतर-भीतर
हर धर्म में मनाए जाते हैं।
कभी ईद,दिवाली इकट्ठे हुए
कभी आनन्द चौदस और
गणेश-चतुर्दशी
पोंगल और लोहड़ी हैं
कभी गुरू पर्व क्रिसमस जुड़ जाते हैं।
श्रृंखला बद्ध तरीके से जब
हम बड़े-बड़े उत्सव मनाते हैं।
फूलों की बौछार आसमाँ करते
हृदय आनन्द विभोर हो जाते हैं।
हमारी राष्टीय एकता और अखंडता
इसी सहारे जीवित है
सब धर्म यहाँ उपस्थित हैं
सब धर्म की राह दिखाते हैं
भारत वर्ष को शत-शत नमन
हन तभी भारतीय कहलाते हैं।

--सविता दत्ता



है रमजान प्रेम-मुहब्बत का महीना।
है रमजान मज़हब याद दिलाने का महीना॥
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना।
है रमजान ज़श्न मनाने का महीना॥
पाक रखेंगे इसे अल्लाह के नाम।
नहीं करेंगे हम इसे बदनाम॥
है प्रेम का महीना रमजान।
है प्रेम का महीना रमजान॥
आया है ईद प्रेम-भाईचारा का सौगात लेकर।
मनाएंगे इसे वैर व कटुता का भाव भुलाकर॥
मिलजुल मनाएंगे ईद।
नहीं करेंगे मांस खाने की जिद॥
तोड़ेंगे हिंसा का रश्म।
मनाएंगे मिलकर ज़श्न॥
हम सब लें आज ये कसम।
हम सब लें आज ये कसम॥

--महेश कुमार वर्मा



अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
दहल गए है कलेजे सब के ,
शोर धमाकों का सुन सुन कर
हैरान हूँ मै क्यों नही मारता,
ये बम हिन्दुओं को चुन चुन कर
वहाँ मुस्लमान भी मरते है
ये बम भेदभाव नही करते है
शोर धमाकों का गूँज रहा है
पटाखे फिर मै चलाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे
गले लगो गर लग सको
भुलाके मजहब ईमान सभी
न हिंदू कहो न मुस्लिम कहो
बन जाओ जरा इंसान सभी
सब भारत माँ की संतान है
ये देश तो बड़ा महान है
सदभावना की अजान सुनाऊँ कैसे
अबके ईद मनाऊँ कैसे
जश्ने ईद मनाऊँ कैसे

--सुरेन्द्र कुमार 'अभिन्न'



रमजाने-पैगाम याद रखना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
आयतें उतरी जमीं पे जिस रोज,
अनवरे-इलाही आयी उस रोज;
इनायत खुदा की न कभी भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
खयानत का ख्याल तू दिल से निकाल दे,
खुदी को मिटा खुदाई में तस्लीम कर दे;
क़यामत के कहर में भी ये कलाम न छोड़ना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
अदावत का गुल ना खिल पाये कभी,
हबीबों की हस्ती ना हिल पाये कभी;
जुर्मों की जहाँ से सदा परहेज करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
पीर-फकीर, मौलाना हुए इसी राह पे चलकर,
उतारा आयतों को दिल में जुल्मों-सितम सहकर;
हर मर्ज की दवा है, वल्लाह , ना भूलना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥
हम हैं नूर खुदा के, सबसे प्यारे हैं खुदा के,
मोमिनों अहिंसक बनो, कह गए पैगम्बर सबसे;
जख्म ना पाये कोई जीव हमसे, सदा रहम करना।
हर वक्त हो नमाज याद रखना॥

--बसंत लाल दास



इक नया इतिहास
अब चलो नया इतिहास लिखें हम
स्‍नेह, मिलन के अध्‍यायों का
आपस के संघर्षों की
परम्‍परा मिटाने का
सुख दुःख साथ निभाने का

युद्ध नहीं हो कोई अब से
सत्‍ता और किसानों में
द्वन्द्व नहीं हो कोई अब से
धर्म के नाम पर आपस में
मानवता है धर्म सर्वोपरि
सबको गले लगाने का
पग पग नेह लुटाने का
अब चलो नया...
सम्‍प्रदायगत भावनाओं को
पैरों तले दबाना है
भ्रष्‍ट जनों के पुण्‍य कर्म को,
सिर पर नहीं बिठाना है
सबको यही सिखाना है
कि मिलकर बोझ उठाना है
समाधान हो ऐसे अपनी
राष्‍ट्र समाज की समस्‍याओं का
अब चलो नया....

--राजीव सारस्वत



भारत माँ की बगिया
रंग-बिरंगे फूलों से मुस्काती है
त्योहारों के मौसम मैं
कुछ और भी महक जाती है.

भाद्र मास आते ही
त्योहारों की बाढ़ सी आजाती है
एक ऐसी हवा चलती है
हर फूल को महका जाती है.

जन्माष्टमी,राखी, पर्व,
साथ-साथ आते हैं
और अपने साथ मैं
रमजान भी ले आते हैं

त्योहारों का साथ-साथ आना
ईश का वरदान है
ये कहती है कुदरत
सब उसी की संतान हैं

मैं रखूं रमजान
तुम नवरात्र रखना
प्रेम का प्रसाद
सब मिलकर चखना

राम को पूजो
या अल्लाह को मानो
पर माता की गोदी के
लाल न उजाडो

त्योहारों पर भी गर
हिंसा फैलाओगे
न राम मिलेगा
न अल्लाह को पाओगे

त्योहरीं ने प्यार की
डोर ये डाली है
बंध जाओ इसमें
ये बड़ी मतवाली है

एक साथ नाचो
और एक साथ गाओ
एकता की बीन बजी
एक हो जाओ

भिन्नता भुलाओ-
भिन्नता भुलाओ

--शोभा महेंद्रू



आनंद-उल्लास से भरा है पलकों का गागर
प्रेम-आश से छलका है धड़कनों का सागर
इस नज़र में उस नज़र में चाहे देखो जिस नज़र से
एक नई खुशी है एक नई है मुस्कराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

आसमान के सुनहरी लाल-लाल किरणें
समायी हुयी है सबके मासूम चेहरे पे.
चांदनी भी कुछ कम नहीं
फलक पे दिख रही निखरी-निखरी से
ये चिड़ियों की चहचहाहट, वो पत्तों की सरसराहट
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक!

सजदे दुआओं तेरे सहज कबूल हों
रहें जिंदगी में तेरे जलज फूल हों
खुदा की असीम कृपा तेरे साथ रहे
भटकाव न आए कभी लक्ष्य पे तेरे आँख रहे
ये दुआ हमारी तरफ़ से, कही जो अब तक
ईद -मुबारक ईद -मुबारक सबको ईद -मुबारक !

-सुनील कुमार 'सोनू'



रमजान का महीना लाया
ईद की सुंदर सौगात|
सौगात को संजो लेते सब
आड़े न आता हैसियत औ हालात ||

बड़ी मुश्किल से मुझे मालूम पड़ी
ईद मनाने की ये वजह |
दिल ने कहा क्यों इन्सान
खुश नहीं हो सकता बेवजह||

गले मिलते हैं
साथ खाते हैं |
इस दिन दुश्मन को भी
गले लगाते हैं ||

पर इक दिन ही क्यों
हर दिन वैर मिट नहीं सकता |
मीठी सेवईयाँ लेने से
क्या और दिन कोई रोकता ||

कुरान का पाठ
खुदा की इबादत |
रखता जज्बों को पाक
दूर रहती बुरी आदत ||

क्या रोज इबादत से
खुदा ख़फा हो जाएगा |
रोज कुरान पढ़ने से
कोई दफा लग जाएगा ||

क्यों आपसी भाईचारा और प्यार
एक मौके की मोहताज है |
क्यों ईद का मिलाप
बस ईद के दिन की बात है ||

ये रंगीन पल, ये रौशनी
ये रौनक, ये चमक |
क्यों नही रह सकते जेहन में तब तलक
आ न जाए दूसरा ईद जब तलक ||

इस बार ईद पे
कुछ ऐसी ईदी दे दो |
जिससे गले मिला आज
उसे ताउम्र अपना कर लो ||

हर गम और रंजिश को मिटा के दे
सबको ईद की मुबारकबाद |
करे उस अल्लाह को याद
जिसकी हैं हम सब ही औलाद ||

--पंखुडी कुमारी



ईद पर कविताएँ आमंत्रित


काव्य-पल्लवन विषय-विशेष हो या विधा-विशेष हो?- इस पर हुई तीन दिवसीय चर्चा के बाद हमने काव्य-पल्लवन को इस बार भी किसी एक विषय पर ही कराने का निर्णय लिया है।

यह महीना रमजान का है। अगले महीने की २ तारीख को ईद है, उसी दिन महात्मा गाँधी की जयन्ती भी है। गाँधी जी पर हम पहले भी कविताएँ प्रकाशित करते रहे हैं, लेकिन पिछले २ वर्षों में ईद पर बहुत कम कविताएँ हिन्द-युग्म पर प्रकाशित हुईं।

इसलिए इस माह का काव्य-पल्लवन 'ईद' पर केन्द्रित होगा। इसके अंतर्गत भाईचारा, रमजान आदि विषयों की कविताएँ भी संकलित होंगी। अपनी मौलिक रचनाएँ २४ सितम्बर २००८ तक kavyapallavan@gmail.com पर भेजें। ईद-विशेषांक काव्य-पल्लवन २५ सितम्बर को हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होगा।

काव्य-पल्लवन के लिए जो पाठक नये हैं, वो यहाँ देखें।

रिश्ते और 24 कविताएँ







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - रिश्ते

विषय-चयन - HC

अंक - सत्रह

माह - अगस्त २००८






इस दुनिया की छोटी से छोटी ईकाई भी अपना पृथक अस्तित्व रखती है, लेकिन वहीं उसका ब्रह्माण्ड की शेष-सत्ता से विशिष्ट सम्बंध भी है। मनुष्य का जीवन भी इन्हीं विशिष्ट और विविध रिश्तों से पटा हुआ है। एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से सम्बन्ध विशिष्ट है। हिन्द-युग्म का हिन्दी से, तकनीक से, इंटरनेट से, कवियों से, पाठकों से, प्रतिभागियों से, लेखकों से, चित्रकारों से, गायकों से, संगीतकारों से, गीतों से, ग़ज़लों से, कहानियों से और पता नहीं किस-किस से गहरा नाता है।

सम्बन्धों की इसी ख़ासियत को ध्यान में रखते हुए हमने इस बार का काव्य-पल्लवन 'रिश्ते' विषय पर आयोजित किया है। २४ विविध रंगों से काव्य-पल्लवन की नई महफिल सजी है। हमें उम्मीद है कि पाठक इन कविताओं से अपना नाता जोड़ेंगे। यदि रस मिला, भाव मिला, कथ्य-तथ्य मिला तो हमारा आयोजन सफल भी हो जायेगा।







आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| अनुराग शर्मा | शैलेश जम्लोकि | सुरेन्दर कुमार 'अभिन्न' | सीमा स्‍मृति | चन्द्रकान्त सिंह | कमलप्रीत सिंह | सविता दत्ता | मेनका कुमारी | महेश कुमार वर्मा | विवेक रंजन श्रीवास्तव | सारिका सक्सेना "रिकु" | प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध" | आचार्य संजीव 'सलिल' | सधिकांत शर्मा | बसंत लाल "चमन" | विपिन चौधरी | प्रदीप मानोरिया | अनुराग पाठक | सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी | सतीश वाघमरे | सुरिन्दर रत्ती | अरविन्द चौहान | सुधीर सक्सेना 'सुधि' | रश्मि सिंह |

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





उनके सवालों जवाबात से अब आगे चला आया हूँ
कमजोरी-ऐ-जज़्बात से अब आगे चला आया हूँ
मुद्दई,मुंसिफ,कचहरी, छूट गए पीछे सब
तहरीर औ तकरार से अब आगे चला आया हूँ
उस दुनिया से तो हूँ दूर अभी भी यारों
इस दुनिया से ज़रूर आगे चला आया हूँ
बीच मंझधार खड़ा हूँ है भंवर आहों का
पुल हरेक रिश्ते का मैं आज जला आया हूँ।

--अनुराग शर्मा




दूर होके भी पास थी ऐसे
बुत मै कोई जाँ थी जैसे
हमराज बनी, अनजाने से
कहलाता क्या, ये रिश्ता है?

मन मै एक विश्वास सी बनके
याद तुम्हारी आंख से छलके
दिल पूछे अनजान सा बनके
तुमसे ये कैसा रिश्ता है?

तुम नाम वहां जब लेते हो.
दिल जैसे ये सुन लेता हो
इस रिश्ते को कोई नाँ नहीं
ये दिल से दिल का रिश्ता है

बेनाम सा रिश्ता यूँ पनपा है
फूल से भंवरा ज्यूँ लिपटा है
पलके आंखे, दिया और बाती
ऐसा ये अपना रिश्ता है.!!!!

--शैलेश जम्लोकि




आसमान से ऊँचे हरदम,
और सागर से गहरे रिश्ते.

दिल के अंधेरे मिटा देते हैं,
होते हैं बड़े सुनहरे रिश्ते.

खून के रिश्तों से बड़कर,
होते है दिल के गहरे रिश्ते .

मेंहदी रिश्ते,पायल रिश्ते
और होते हैं गजरे रिश्ते

रिश्तों के निगेहबान है रिश्ते
रिश्तों पे होते पहरे रिश्ते

कभी अंधे,गूंगे,बेसहारा और
हो जाते कभी क्यूँ बहरे रिश्ते ?

--सुरेन्दर कुमार 'अभिन्न'



इंसान थे हम,
देवता बना पूजते रहे 'वो
बेखबर इस बात से
कि पत्‍थरों की भी उम्र होती है
टूट के बिख्‍ार जाने पर
पूजने वाले पहचानते भी नहीं.

--सीमा स्‍मृति




रिश्ते कुछ खास होते हैं
शायद उनकी डोर उस प्रभु के पास होती है
जो वहां है जहां थोड़ी सी हवा है,थोड़ा सा आसमान है
अक्सर राह चलते कुछ रिश्ते हमें पकड़ कर ले जाते हैं वहां
जहां हम कभी नहीं गये होते
हम चीखते हैं कि नहीं जाना चाहते इस जहां को छोड़ कर
मगर एक हवशी ला पटकता है नए दरख्तों के तले
चिल्लप-पों के बीच अपनी ही आवाज लौट कर
दे जाती है दस्तक
आखिर क्यों हमें आज हर रिश्ते से डर लगता है?
रिश्ते तो रुई के फाहे है
फिर क्यों हम उन्हें नासूर समझ कर ठुकरा देते हैं?
शायद यह समय ही ऐसा है कि-
'हमें अपनी ही परछाईं से डर लगता है'
बदहवास से हम घूमते हैं नंगे पांव
शीशे की दीवारों में अपना माथा लटकाए
हम टहलते हैं सिर्फ अपने पुरवे की ओर
अजीब सी खलल मथ डालती है
और उसकी तपिश में हम सोचते हैं-
काश! कोई अपना भी होता !

--चन्द्रकान्त सिंह




सरोकार छूट जायें
नज़रें बदलती हैं
रास्ते बदल जायें तो
सूरतें बदलती हैं
मुलाक़ात फिर हो जाए
शायद किसी मोड़ पर
नीयतें आज तो
बदलने को मचलती हैं
हट गयीं जो बंदिशें
खुल गए हैं रास्ते
ज़रूरारें तो आज सभी
किसी और रुख फिसलतीं हैं

दिन हवाएं हो गए
और बंधनों के रास्ते
जज्बात की आंधी कहीं
मोम सी पिघलती है
देख कर पहचान पाएं
ये ताब नहीं रही उन में
पहचान कर भी देख जाएं
मजबूरियां बदलतीं हैं
सरोकार छूट जायें
नज़रें बदलतीं हैं
रास्ते बदल जायें
सूरतें बदलतीं हैं

--कमलप्रीत सिंह




आकाश से पटल तक
जीव चलता मात्र रिश्तों पर
कुछ लंबे समय तक टिकते हैं
कुछ बीच में दम तोड़ देते हैं
कुछ रिश्ते पैसों से बनते हैं
कुछ प्रेम प्रतीक भी होते हैं
कुछ क्षण भर के,कुछ युग-युग के
रिश्तों पर जीवन टिकता है
रिश्तों से जीवन बनता है
रिश्तों में दरार, विश्वास की कमी
रिश्तों में मिठास, प्रेम अनुभूति
एक जीवन, अनेक रिश्ते
जीवन से जुड़े सारे रिश्ते
निर्जीव सजीव सभी रिश्ते
रिश्तों का प्रतीक, स्वयं रिश्ते

--सविता दत्ता




किसी से दर्द का रिश्ता होता है,
किसी से प्यार का रिश्ता होता है,
फर्क क्या है, दोनों में
क्या है, अन्तर
'रिश्ता' तो होता है|
किसी को याद करते है, जखम जैसे
किसी को याद करते है, दवा जैसे
फर्क है, कुछ तो बोलो
बतलाओ क्या है, अन्तर
याद तो करते है दोनों को ही|
कोई दिल में रहता है, दुश्मन की तरह
कोई दिल में रहता है, दोस्त की तरह
कुछ भी फरक नही इसमे|
ना ही है कोई अन्तर|
दिल में तो रहते है दोनों ही|
याद करते है, सोचते है सबको
एक साँस से.... दूसरी साँस तक
और फिर अन्तिम साँस तक|
तानाबाना बुनते रहते है, रिश्तों के
सभी एक दुसरे के पूरक
इसके बिना वो नही, उसके बिना ये नहीं
सब एक ही माला के मोती
कोई सुंदर, कोई बदसूरत
कोई कठोर, कोई नरम
कोई कड़वा, कोई मधुर
फर्क क्या है? इसमे कुछ
क्या है? कुछ अन्तर
'रिश्ता' तो सबसे है
यादें तो सबसे जुड़ी है,
कुछ भयानक, कुछ सुंदर
इसके बिना वो नहीं, उसके बिना ये नहीं|

--मेनका कुमारी




पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
था कभी भाई-भाई का रिश्ता
कभी न बिछुड़ने वाला रिश्ता
जो हमेशा साथ-साथ खेलता
हमेशा साथ-साथ पढ़ता
हमेशा साथ-साथ खाता
हमेशा साथ-साथ रहता
पर आज जब वे बड़ा व समझदार हुए
तो दोनों एक-दूसरे के दुश्मन हुए
हथियार लेकर दोनों आमने-सामने हुए
भाई-भाई का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
किया था शादी पति-पत्नी के रिश्ता के साथ
जीवन भर साथ निभाने को
पर रह गयी दहेज़ में कमी
तो न दिया उसे साथ रहने को
और जिन्दा ही पत्नी को जला डाला
क्योंकि था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
था वह दहेज़ के पीछे मतवाला
जीवन भर साथ निभाने का रिश्ता दुश्मनी में बदल गया
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
था पिता-पुत्र का रिश्ता
पिता ने उसे अपने बुढ़ापे का सहारा समझा
पर उसने तो दुश्मन से भी भयंकर निकला
निकाल दिया पिता को घर से
भूखे-प्यासे छोड़ दिया
नहीं मारा पिता तो उसने
जहर देकर मार दिया
बुढ़ापे का सहारा आज उसी का कातिल बना
था इन्सान पर आज वह हैवान बना
पता नहीं चलता ये रिश्ता चीज होती है क्या
अरे कोई तो बताए ये रिश्ता चीज होती क्या
ये रिश्ता चीज होती है क्या

--महेश कुमार वर्मा




मुलायम दूब पर,
शबनमी अहसास हैं रिश्ते
निभें तो सात जन्मों का,
अटल विश्वास हैं रिश्ते
जिस बरतन में रख्खा हो,
वैसी शक्ल ले पानी
कुछ ऐसा ही,
प्यार का अहसास हैं रिश्ते
कभी सिंदूर चुटकी भर,
कहीं बस काँच की चूड़ी
किसी रिश्ते में धागे सूत के,
इक इकरार हैं रिश्ते
कभी बेवजह रूठें,
कभी खुद ही मना भी लें
नया ही रंग हैं हर बार ,
प्यार का मनुहार हैं रिश्ते
अदालत में
बहुत तोड़ो,
कानूनी दाँव पेंचों से लेकिन
पुरानी
याद के झकोरों में, बसा संसार हैं रिश्ते
किसी को चोट पहुँचे तो ,
किसी को दर्द होता है
लगीं हैं जान की बाजी,
बचाने को महज रिश्ते
हमीं को हम ज्यादा तुम,
समझती हो मेरी हमदम
तुम्हीं बंधन तुम्हीं मुक्ती,
अजब विस्तार हैं रिश्ते
रिश्ते दिल का दर्पण हैं ,
बिना शर्तों समर्पण हैं
खरीदे से नहीं मिलते,
बड़े अनमोल हैं रिश्ते
जो
टूटे तो बिखर जाते हैं,
फूलों के परागों से
पँखुरी पँखुरी सहेजे गये,
सतत व्यवहार हैं रिश्ते

--विवेक रंजन श्रीवास्तव




नहीं जानती की तुम मेरे क्या हो
शायद हो मीत या शायद सखा हो

मिल जाती हैं सारी खुशियाँ जिसमें
अनमोल सा शायद तुम वो लम्हा हो

कह लेती हूँ तुमसे व्यथा दिल की अपनी
मां के मन सा कोमल तुम वो जज़्बा हो

नहीं है चाह तुमसे और कुछ भी पाने की
अनजाना अनसुना सा जैसे कोई रिश्ता हो

बंध गए हैं एक डोर मैं मन तेरे मेरे
नेह से भरा ये बंधन जैसे प्रेम पगा हो

अदभुत सा एक रिश्ता है बीच में हमारे
जो न पहले कहीं देखा हो न ही सुना हो

--सारिका सक्सेना "रिकु




कई रंग में रंगे दिखते हैं ,
निश्छल प्राण के रिश्ते
कई हैं खून के रिश्ते,
कई सम्मान के रिश्ते !!
जो सबको बाँधे रखते हैं,
मधुर संबँध बंधन में
वे होते प्रेम के रिश्ते,
सरल इंसान के रिश्ते !!
भरा है एक रस मीठा,
प्रकृति ने मधुर वाणी में
जिन्हें सुन मन हुलस उठता,
हैं मेहमान के रिश्ते !!
जो हुलसाते हैं मन को ,
हर्ष की शुभ भावनाओ से
वे होते यकायक
उद्भूत,
नये अरमान के रिश्ते !!
कभी होती भी देखी हैं,
अचानक यूँ मुलाकातें
बना जाती जो जीवन में,
मधुर वरदान के रिश्ते !!
मगर इस नये जमाने में,
चला है एक चलन बेढ़ब
जहाँ आतंक ने फैलाये,
बिन पहचान के रिश्ते !!
सभी भयभीत हैं जिनसे,
न मिलती कोई खबर जिनकी
जो हैं आतंकवादी दुश्मनों से,
जान के रिश्ते !!

--प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध"




दिल को दिल से जोड़ते रिश्ते मिलते हाथ
अपनी मंजिल पा सकें कदम अगर हों साथ
'सलिल' समूची ज़िन्दगी रिश्तों की जागीर
रिश्तों से ही आदमी बने गरीब-अमीर
रिश्ते-नाते घोलते प्रति पल मधुर मिठास
दाना रिश्ते पालते नादां करें खलास
रिश्ते ही इंसान की लिखते हैं तकदीर
रिश्ते बिन नाकाम ही होती हर तदबीर
बिगड़ी बात बने नहीं बिन रिश्ते लो मान
रिश्ते हैं तो लुटा दो एक दूजे पर जान
रिश्ते हैं रसनिधि अमर रिश्ते हैं रसखान
रिश्ते ही रसलीन हो हो जाते भगवान
रिश्ते ही करते अता आन- बान औ' शान
रिश्ते हित शैतान भी बन जाता इंसान
रिश्ते होली दिवाली रिश्ते क्रिसमस ईद
रिश्ते-नाते निभाना सचमुच 'सलिल' मुफीद
रिश्ते मधुर न रख सके लडे हिंद औ' पाक
रिश्तों में बिखराव गर तो रिश्ते नापाक
धर्म दीन मजहब नहीं आदम की पहचान
जो रिश्तों को निभाता सलिल वही गुणवान
नेह नर्मदा में नहा नित्य नवल जज-धार
रिश्ते सच्चे पलकर सलिल लुटा दे प्यार

--आचार्य संजीव 'सलिल'




तुम पर कैसा मान चढ़ा
इतरा कर इत-उत डोल रहे
जग में सेठ बने फ़िरते
बोल बड़े तुम बोल रहे

अरे बावरे, भूल गये तुम
नौ मास कहाँ पर थे,
अपनी तो तुम्हें सुध भी न थी
तुम किस से सहारे जी रहे थे.

तुम अंगुली पकड़ के चलते थे,
तुम गोदी-गोई झूमे थे
जो भी मुँह से माँग लिया
पल भर में हाज़िर कार देते थे.

तेरे खाने पर ही खाती वो,
तेरे सोने पर ही सोती वो,
जो तेरा तनिक जी घबराता
देवों के आगे रोती वो.

माँ के ऋण को क्या भर पायेगा
इस जग में कोई बेटा
सात जनम भी कम सेवा को
ऋण भरी, हलका बेटा.

आशीष मात का जिस सर है
वो आगे बढ़ता जायेगा
हे मात तुम्हें यूँ स्मरण कर
’शशि’ आजीवन रोता जायेगा
’शशि’ आजीवन रोता जायेगा

--सधिकांत शर्मा




रिश्ते कहते है किसको
अब तक समझ न पाया
रिश्तो के रेलमपेल में
बस स्वार्थ ही स्वार्थ नजर आया ।
जग ने पाया क्या
बना के रिश्तों की लड़ियाँ
मिल न सका कभी आपस में
संबंधो की बेमेल कड़ियाँ ।
तू मेरा है मै तेरा हूँ
बस इतना कहना ही क्या रिश्ता है ?
संग न चल पाता दो पग भी
हाय ! ये कैसा रिश्ता-नाता है ।
क्या करूँ कवायद इन रिश्तों की
रूप इनके है बड़े निराले
देते तोहफे कामयाबी के कहीं
तो बरसाते कहीं हार के पाले ।
रिश्तो की गहराई का अब तक
थाह ना ले पाया है कोई
अपनापन का मुखौटा पहने
शोषण करता है हर कोई ।
साधू हो या दुर्जन कोई
मतलब के रिश्ते निभाते है
दिल की चंद खुशी के खातिर
रिश्तो का बलिदान चढाते है ।
रिश्तो के चक्रव्यूह में फँसकर ही
आज "चमन "का ये हाल है
अपना-अपना कहके सबने लुटा
अपनी हस्ती ही यारों बदहाल है ।।

--बसंत लाल "चमन"




हर रिश्ते के पास हमने अलग कहानी देखी
अपने दुख-सुख देखे, अपनी हंसी-खुशी देखी
प्रेम के हिस्से में आया महान दुख
और छोटी खुशियाँ देखी
खून के रिश्ते में कम होता खून देखा
एक रिश्ता जो हमने बडे मनोयोग से बनाया
उनमें नमक कुछ ज्यादा था
जब वो रिश्ता टूटा
तो दिल में ही नहीं, आँखों तक में
नमक उतर आया
माना हमारे हाथ बंधे हुए हैं
पर आँखें तो पूरी तरह से खुली हुई हैं
हम खुली आँखों से
एक के बाद एक सपनें के टुटनें को देखते हुए
अपनी बेबसी को कोसते रहे
जिन रिश्तों में खाली जगह थी
उन खाली जगहों में झाडियाँ बेशुमार उग आयी थी
उन खरपतवारों की मात्रा हर बारिश में बढती ही गयी
और हमारी उनकी नजदीक आने की सम्भावना
लगभग खत्म होती चली गई
हर रिश्ता अपना दाना पानी
ले कर आता है और तमाम उमर
उसी पर गुजर बसर करता है
हर रिश्ते की अलग परिभाषा
तैयार की हमने और उसी पर चलते रहे
तमाम रूकावटों के बावजूद।

--विपिन चौधरी




दिल में छिपी जो बात ,वो ज़ाहिर न कीजिये |
राज बे-परदा न हो , रुसबा न कीजिये ||
रिश्ता हो अपना कोई भी, हमराज ही रहो
रिश्तों की बात है यही , न बदनाम कीजिये ||
चाहे रहो रकीब पर, रिश्ता तो है सही ,
इस दुश्मनी को भी "रिश्ता" नाम दीजिये ||
पाकीज़गी खुसूसियत रिश्तों में ये रहे ,
ता-उम्र ज़िंदगी में, निभाया ही कीजिये ||
रूह से बनते हैं ये , सांस में मौजूद हैं ,
कहना ज़रूरी हो तो , रिश्ता उसे कह दीजिये ||
हैं मुख्तलिफ से नाम मगर काम दो ही हैं ,
रिश्तों में या नफरत करो , या प्यार कीजिये ||
मिट जाए ये नफरत सदा सारे जहान से ,
हो प्यार बस चारों तरफ़ बस प्यार कीजिये ||

*रकीब = दुश्मन , पाकीज़गी =पवित्रता, खुसूसियत = विशेषता , मुख्तलिफ = विभिन्न

--प्रदीप मानोरिया




तिनके तिनके से मिल कर हुए एक हैं !
चन्द कागज़ के टुकडों पे हम बंट गए !!

सारी धरती को परिवार कहते रहे ,
फिर भी नक्शों ने बांधे हमारे कदम !
रोक हम तो परिंदों को पाए नहीं ..
तेरे मेरे जहाजों पर हम डट गए !!
चन्द कागज़ के टुकडों पर हम बंट गए !

कुछ ना सूझा, बे-मतलब का मजहब लिखा
जब था काँटा सुमन, सांप चन्दन का संग !
बेर केले के संग का हवाला दिया
बे बचे रह गए और हम फट गए !!
चन्द कागज़ के टुकडों पे हम बंट गए !!
चन्द कागज़ के टुकडों पे हम बंट गए !!

--अनुराग पाठक




बिखर रहे हैं देखो रिश्ते, परिवार पुरानी चीज हुई।
नर नारी का सौदा करता, नारी नर से दूर हुई।।
बचपन बच्चों का छिनता है।
भ्रूण हत्या कैसी ममता है?
बच्चा घर पर रहे अकेला,
नर-नारी की ये समता है?
बाप तो नौकरी करता ही था, मां भी अब मजदूर हुई।
नर नारी का सौदा करता, नारी नर से दूर हुई।।
कुटुंब पुरानी बात हुई है।
रिश्ते देखो, छुई-मुई हैं।
वृद्धाश्रम में बुजुर्ग है पहुंचे,
पति-पत्नी में तलाक हुई है।
नर-नारी अब नहीं है पूरक, भावुकता काफूर हुई।
नर नारी का सौदा करता, नारी नर से दूर हुई।।
नर नारी, वश रहे जरूरत।
कहीं रहो, दुनिया¡ खुबसूरत।
शादी की तुम बात करो मत,
फिगर सजाओ, बन जाओ मूरत।
मुझको पति नहीं जरूरी, नारी तन कर खड़ी हुई।
नर नारी का सौदा करता, नारी नर से दूर हुई।।
वैयक्तिक स्वतंत्रता ने है तोड़ा।
बिखर रहा है, प्राकृतिक जोड़ा।
शादी अब बंधन लगती है,
बिन शादी ही, बिस्तर तोड़ा।
समलैंगिक सम्बन्ध बढ़ रहे, एड्स आज सामान्य हुई।
नर नारी का सौदा करता, नारी नर से दूर हुई।।
बहन-भाई का रिश्ता टूटा।
गुरू-शिष्या का भांडा फूटा।
वासना आज है प्रेम कहाती,
जमीन किसी की,गाढ़ो खूंटा।
रिश्ते आज मखोल बन रहे, मानवता बेजार हुई।
नर नारी का सौदा करता, नारी नर से दूर हुई।।

--सन्तोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी




दोतरफा सरहद पर क्या धूम मची है गश्तों की
कहानियाँ यहाँ हमने खूब रची है रिश्तों की

खोजती रही हो तुम आशियाने दुनिया भर के
इसी शहरके पिछवाडे, वहीं गली है रिश्तों की

जाहिर ये है के अब तो, हम दोस्त नहीं रह पाएंगे
बात यहाँ है अपनों की, बात चली है रिश्तों की

रोक नहीं अब पाऊंगा मैं ये बहाव इन अश्कों का
सदियों से इन नदियों में ही नांव चली है रिश्तों की

ले-देके मिलकियत बस इतनी जुटा पाया हूं मैं
चंद ख्वाब सजे हैं आँखोंमें और नमी है रिश्तों की

अमीर बडा कहलाता, भरे पडे खजाने पुश्तों से
मेहेरबाँ जिंदगी भी है, सिर्फ कमी है रिश्तों की

क्या बटवारों की किश्तोंसे, बच निकलेंगी ये इमारतें
हाय! फिसलते रेत पे हमने नीव रखी है रिश्तों की

जरा जमीं पे आकर देखो, क्या रखा है जन्नत में
इन्सानों की बस्ती में बारात सजी है रिश्तोंकी !

--सतीश वाघमरे




वो बोले तुमसे मेरे सारे रिश्ते नाते हैं,
मुझे वो शोला भी शबनम नज़र आते हैं,
दो तरफा ज़ुबां का चलन जान गये हम,
मैं दूरी रखना चाहता हूँ वो क़रीब आते हैं,
दौलत-ओ-हुस्न खींच लाता है सबको,
वरना कौन किसी को अपना बनाते हैं,
पलकों पे बिठाने का इरादा था मेरा,
वो हर बार ही हमें दगा दे जाते हैं,
रिश्ते क़ायम रखनें की नसीहत देते हैं,
रिश्ते जोड़नेवाले, तोड़ने की जहमत उठाते हैं
ख़ून के रिश्ते पे यक़ीं था भरोसा था "रत्ती"
दौलत की ख़ातिर बाप-बेटे उलझ जाते हैं

--सुरिन्दर रत्ती




क्यों नहीं सुनाई पडती हैं मेरी अजन्मी धडकनें तुमको माँ,
क्यों नही महसूस होती मेरी अजन्मी अठखेलियाँ तुमको माँ.
क्या सोच पाती हो कि मुझे तुम से भी हैं कुछ आशाएँ माँ,
तुम्हारी गोद में प्यार पाने की उत्सुकता है मुझमें भी माँ.
और पिता की बाहों मे झूलने की चाह मुझको है अभी माँ,
तुम्हारे आंगन में पाजेब की झंकार मुझे है गुंजानी अभी माँ.
और भैय्या की राखी अभी से मेरे नन्हे दिल में रखी है माँ,
उसकी सूनी कलाई अभी से मुझको दिखाई पडती है माँ.
क्यों सोचती हो मेरी मौत अभी से मेरी प्यारी सी माँ,
थोडा तो झाँक लेने दो मुझे अपने सुनहरे आंगन में माँ.
क्यों तोड डालना चाह्ती हो तुम इस पावन रिश्ते को मेरी माँ,
क्यों मेरी अबोध निशब्द चीख तुम तक पहूँचती नही है मेरी माँ

--अरविन्द चौहान




रिश्ते खून के
होते जा रहे हैं धूमिल!
छोटे-छोटे शुद्र स्वार्थ की
पत्तलें-दोने चाटने की ललक
जीवन में जब से हो गई है शामिल!
हुजूर यह एक अरब से भी अधिक
आबादी का देश है, जहाँ
सभी की अपनी-अपनी परेशानियाँ हैं;
निहायत घटियापन का परिवेश है.
कभी-कभी तो लगता है,
संबंध अब स्याही नहीं रहे,
पेंसिल की लिखावट हो गए हैं.
जिन्हें जब चाहे रबड़ से मिटा सकते हैं.
नाते-रिश्ते अपने जीवन से
हटा सकते हैं, और सिमट सकते हैं
अपने खोल में. इसके लिए घोल लेते हैं,
खूबसूरती से कडुवापन
अपने दो मीठे बनावटी बोल में.
पर जानता हूँ मैं और
जानते हैं आप भी कि
यह एक ख़तरनाक साजिश है,
जो खून के रिश्तों के बीच
रची जा रही है और
साजिश रचने वाले गैर नहीं,
आपना ही खून है.
तो फिर यह कैसा जुनून है?
इसे आप क्या कहेंगे?
निरक्षर हैं इसलिए?
ज्यादा पढे-लिखे हैं इसलिए?
जी नहीं, यह खून की निरर्थक गरमी है.
इसलिए रिश्तों के नाम पर इतनी बेशर्मी है.
जब तक पिता, बेटे में खोजेगा दोष,
धारावाहिक सीरियल देख-देख,
सास-बहू निकालेंगी आपसी खोट.
छूटेंगे एक-दूजे पर व्यंग्य के तीर.
तब तक जारी रहेगी
रिश्तों के धूमिल होने की पीर.
यह हमारे भीतर के
अहँकार का मसला है.
इसीलिए जारी यह सिलसिला है.

---सुधीर सक्सेना 'सुधि'




यूँ तो मानव का जब से
हुआ अस्तित्व
और शुरू हुआ विकास
तभी से
शुरू हुआ, उसके चाहतो का संसार
हर चीज उसने बनाई
ताकि
थोड़ा मिल सके आराम
हर वस्तु से, हर जिन्दगी से
क्षणिक ही सही
पर उसने चाहा
थोड़ा सा प्यार

जब होश संभाली
और बुद्धि विकसित हुई
तब पता चला
इससे पहले रह चुकी हूं
बंद दीवारों के बीच
किसी तरुणी के गर्भ-गृह में
उस वक़्त, जब मस्तिष्क न था
न थी कोई स्मृति
दुनिया से न लगाव था न विरक्ति
उसने मुझे पाला
उसी ने दिया मुझे आकार
समर्पित है उसको ये साभार
जिसने दिया सबसे पहले
थोड़ा सा प्यार

सोचती हूं कभी-कभी
सबसे पहले, शुरू हुआ होगा
उर में सांसो का आना-जाना
जिससे हुआ पहला मिलन
वो रहा होगा पवन
खुला जब होगा
पलकों का शामियाना
वो अवस्था होगी अवचेतन
सामने होगी सृष्टि
और अचंभित रही होगी दृष्टि
जिसने जिन्दगी का आगे किया प्रसार
उसकी भी निवेदित हैं
थोड़ा सा प्यार

जाने किन-किन हाथों के
स्पर्श में प्यार मिला
कैसे-कैसे शैशव ढला
किस-किस ने दुआए की
कैसे मिली जीने की शक्ति
किसकी लगी मुझे भक्ति
ये तो मालूम नहीं
पर, जिस-जिस स्पर्श ने
मेरे जीने के बढ़ाये आसार
उन्हें कर रही याद है
थोड़ा सा प्यार

याद तो नहीं
पर शायद
सुनी-सुनायी बातों का असर हें
गोद ही होता था बिस्तर
और लोरियों में बीतती रातें
कभी सोते तो कभी जागते
अद्भुत होता है वो रिश्ता
शिशु और ममता का
लोरी और निद्रा का
कि अभी भी
कभी यूँ लगता हें
जैसे जेहन में गूंज रही है झंकार
वो छिपा हुआ
थोड़ा सा प्यार

--रश्मि सिंह



रिश्तों के तानेबाने में होगा अगस्त 2008 का काव्य-पल्लवन


अगस्त २००८ माह के काव्य-पल्लवन के लिए हम 'रिश्ते' विषय पर कविताएँ, पेंटिंग, फोटोग्राफ्स इत्यादि आमंत्रित करते हैं। इस विषय पर उपर्युक्त सामग्री २५ अगस्त २००८ तक kavyapallavan@gmail.com पर भेजें। कविता, पेंटिंग या फोटोग्राफ्स का मौलिक तथा अप्रकाशित होना आवश्यक है।

यह ध्यान रखें कि ब्लॉग, वेबसाइट, ग्रुप, कम्यूनिटी, पत्र-पत्रिका इस्यादि में प्रकाशित रचनाएँ भी प्रकाशित कहलायेंगी और उन्हें स्वीकार नहीं किया जायेगा।

इस बार के काव्य-पल्लवन के लिए हमें ढेरों विषय प्राप्त हुए जिसमें से 'आज़ादी' विषय को कइयों ने चुना भी, लेकिन चूँकि यह अंक २८ अगस्त २००८ को प्रकाशित होना है अतः हमसे इस मामले में देरी हो गई। यद्यपि 'आज़ादी' को हम बहुत बड़े संदर्भ में देख सकते हैं। इसे कभी और करा लेना भी ठीक रहेगा। अतः दूसरा विषय लेना, ज्यादा प्रासंगिक लगा।

यह विषय किसी 'HC' नाम के पाठक का है, जिन्होंने परिचय हमें नहीं दिया है। इनके अतिरिक्त हमें डॉ॰ शीला सिंह, संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी, निखिल आनंद गिरि, स्मार्ट इंडियन, सीमा सचदेव, शशिकांत, अरविन्द, मृदुल कीर्ति, ब्रह्मनाथ तिवारी 'अंजान' , सुरेन्दर अभिन्न, प्रदीप मनौरिया, शैफाली शर्मा, नीरा राजपाल, प्रेम सहजवाला ने हमें अपने-अपने विषय भेजे। सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद।

काव्य-पल्लवन के विषय में अधिक जानकारी और पुराने अंक पढ़ने के लिए निम्न लिंक देखें-

पुराने विशेषांक

काव्य-पल्लवन क्या है?
अंक-१
अंक-२
अंक-३
अंक-४
अंक-५
अंक-६
अंक-७
अंक-८
अंक-९
अंक-१०
अंक-११
अंक-१२
अंक-१३
अंक-१४
अंक-१५ (पहली कविता विशेषांक)
अंक-१६ (महँगाई)

अगस्त महीने के काव्य-पल्लवन का विषय क्या होना चाहिए


हिन्द-युग्म अगस्त माह के काव्य पल्लवन के लिए विषय आमंत्रित करता है। आपकी नज़र ऐसा कौन सा विषय है जिसपर कवियों का ध्यान नहीं गया और आप उनका ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं? विषयों को सोचने के विविध काव्यात्मक आयामों से रूबरू होना चाहते हैं? यदि आप चाहते हैं कि आपके दिये गये विषय पर काव्यात्मक विमर्श हो तो अपने विषय kavyapallavan@gmail.com पर रविवार १० अगस्त २००८ तक भेज दीजिए। चुने गये विषय की सूचना सोमवार ११ अगस्त को दे दी जायेगी। ध्यान रहे विषय १-४ शब्दों का हो।

अब हम काव्य-पल्लवन के साथ नया ऑफर जोड़ रहे हैं। जुलाई माह के काव्य-पल्लवन पर एक पाठक की टिप्पणी से प्रेरित होकर हम यह ऑफर पाठकों के समक्ष रख रहे हैं।

यदि कोई व्यक्ति अपने किसी परिजन, राष्ट्र, समाज या मित्र इत्यादि को काव्य-पल्लवन का कोई या कई विशेष अंक समर्पित करना चाहे तो अपने चुने गये संपादक द्वारा संपादित कर तथा प्रकाशित करके कर सकता है। विशेषांक पुस्तक या पुस्तिका रूप में प्रकाशित होगा। हम अपने पाठकों और वरिष्ठ साहित्यकारों तक आपका यह प्रयास पहुँचायेंगे। इसके लिए सहयोग के तौर पर आपको लागत-मूल्य/खर्च वहन करना होगा। अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें- hindyugm@gmail.com पर।

काव्य-पल्लवन के विषय में अधिक जानकारी और पुराने अंक पढ़ने के लिए निम्न लिंक देखें-

पुराने विशेषांक

काव्य-पल्लवन क्या है?
अंक-१
अंक-२
अंक-३
अंक-४
अंक-५
अंक-६
अंक-७
अंक-८
अंक-९
अंक-१०
अंक-११
अंक-१२
अंक-१३
अंक-१४
अंक-१५ (पहली कविता विशेषांक)
अंक-१६ (महँगाई)

एक महँगाई 25 चिंताएँ: काव्य-पल्लवन-16







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - महँगाई

विषय-चयन - विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'

अंक - सोलह

माह - जुलाई 2008






कुतुब होटल, नई दिल्ली के पास प्रदर्शन करते मीडियाकर्मी


लगातार बढ़ती मुद्रा स्फीति की दर ने भारत के आम आदमी की नाक में दम कर रखा है। जब हम जुलाई माह के काव्य-पल्लवन के लिए विषय का चयन कर रहे थे तो इस बात को ख्याल में रखते हुए कि महँगाई आज देश की सबसे बड़ी समस्या है, इस माह का काव्य-पल्लवन इसी पर कराने का निर्णय लिया। कुल २५ कवियों ने भाग लिया। एक फोटोग्राफर रश्मि सिंह ने हमें कुछ छायाचित्र भी भेजे, जिसमें दो फोटों हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि जिन्होंने भाग नहीं लिया, उन्हें महँगाई की चिंता नहीं है, हो सकता है कि वो महँगाई से इतने परेशान हो कि कलम की रोशनाई खरीदने के लिए भी सोचना पड़ा हो।

खैर आप सभी इस विमर्श में भाग लीजिए और सरकार की मुँह ताके बिना इसके निवारण पर विचार कीजिए।
आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।

*** प्रतिभागी ***
| प्रदीप मानोरिया | सुरेन्द्र कुमार अभिन्न | शशिकाँत शर्मा | रचना श्रीवास्तव | संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी |देवेन्द्र कुमार मिश्रा | शैलेश जमलोकि | सीमा सचदेव
| रेनू जैन | विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र" |विपिन चौधरी |कमलप्रीत सिंह |
सुरिन्दर रत्ती | अर्पिता नायक | प्रकाश यादव 'निर्भीक' | प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव | सोमेश्वर पांडेय | कमला भंडारी | पंकज रामेन्दू मानव | मनालिनि काणे | राजेश राय | शोभा महेन्द्रू | सविता दत्ता | विनय के जोशी | विश्व दीपक 'तन्हा' |

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~







बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
किंतु लेखनी सूखी रह्ती निर्धन की कठिनाई पर ,
चिंता है किंतु न चिंतन बढ़ती हुई महंगाई पर |
एक बार तो लिख कर देखो ठग वायदा बाज़ारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
खंड हुए अभिलेख पुराने नहीं लगाम महंगाई पर,
हर्षित नेता श्रेष्ठी हैं सब करते मौज कमाई पर |
एक बार अब हटा के फेंको ऐसी ठग सरकारों को
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
तपे जेठ की घोर दुपहरी , बे-घर रह मैदानों में ,
लथपथ रहे पसीना तन पर , करते काम खदानों में |
एक बार तो छूकर देखो उन दिल की दीवारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
जाडों में तन रहे ठिठुरता अधनंगे रह सड़कों पर ,
छोटी कथरी खींच तान कर डाल रहा जो लड़कों पर |
एक बार तो हाथ रखो अब इन मजबूरी के तारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
निर्धन की कुटिया छप्पर की टपक रही बरसातों में ,
बर्तन सारे बिछा फर्श पर जाग रहा जो रातों में |
एक बार तो लिख कर देखो इनकी करुण पुकारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||

--प्रदीप मानोरिया





मंहगाई ...मंहगाई ....मंहगाई
हल्ला मचा रहे हो
दिमाग का फतूर बढ़ने से रोक लो
महंगाई भी रुक जायेगी
एक पागल यही कहते सुना है मैंने
जीवन स्तर को
ऊपर उठाने की बात तो करते हो
उपग्रह पे बस्तियां बसाने की
तैयारियां भी हैं तुम्हारी,
फ़िर स्वप्न क्यों देखते हो
एक चवन्नी में
दस किलो देशी घी
और एक टक्के में मनो अनाज का
जानते नही क्या.
धरा से अब अनाज
मेहनत और पसीने से नही उगता
जमीन की भूख भी ज्यादा हो गई है,
जंक फ़ूड का ज़माना है,
उसे भी खाने को यूरिया
और पीने को कीटनाशक चाहिए
यूँ ही बवाल मचा देते हो
महंगाई ..महंगाई....महंगाई
डीजल .पेट्रोल के भाव बदने पर
हड़ताल करते हो.
नवीनतम मॉडल कार का
कौन सा आया शो रूम मे
हर महीने क्यों पड़ताल करते हो
सबसे मंहगी हो इस
शहर में मेरी कार
ये फतूर दिमाग में किसने बढाया
..?
फिर तेल के रेट बड़े तो
कहते हो महंगाई हो रही है
मंहगाई कब नही थी
कल ...............?
बरसों पहले........?
सदियों पहले ......?
मंहगाई
सर्वदा सर्वत्र विद्यमान रहती है,
निर्धन के लिए
मजदूर के लिए
अभावग्रस्त मेहनतकश के लिए..
बाकि सब के लिए तो
वरदान होती है
कर्मचारी का महंगाई भत्ता
कवियों की पुरुस्कार राशिः
कभी तिगुनी
कभी पाँच गुनी
राष्ट्रपति का वेतन .....
चपरासी का वेतन
आयोग चिंतित है
और
बार बार बैठते है
किसानों के लिए भी आयोग
व्यापार के आयोग
नित नित नए नए प्रयोग
सोचता हूँ की
कभी भूख को
गरीबी को
और रोज पिसते आम आदमी को
आयोग क्यों नही मिला.?
दूध बिजली दवाई से लेकर
हर छोटी बड़ी चीज़ को
महंगाई के नाम पर
कैश करा रहे हो
और हल्ला मचा रहे हो
मंहगाई .मंहगाई ...मंहगाई
काश आप को भी एक
पागल की आवाज सुनाई दे
और मंहगाई पर
खामखाँ की बहस बंद हो

--सुरेन्द्र कुमार अभिन्न



हाय ना जाने क्या लिखवाकर
जनता भारत की आई है
सबको जकडा एक रोग ने
महामारी ये महँगाई है
भूल गये सब हलवा-पूरी
रबडी और मलाई हैं,
सूखे चने चबाते है सब
आई जो महँगाई है
बूढे बच्चे और सयाने
सबको हरने आई है
नाच रही सर चडकर सबके
ये कालजायी महँगाई है
निगल चुकी है सबको अब
सरकार की बारी आई है
सुरसा सी बढती है जाती
अजर अमर महँगाई है

--शशिकाँत शर्मा



विरोधी नेता
माल दबा दाम बढाते हैं
इसी की सीधी चढ़
सत्ता में आते हैं
गद्दी पे बैठ
बहुत मंहगे हो जाते हैं
महंगाई से दीखते है चहुँ ओर
पर आम जनता की पहुँच से
दूर हो जाते हैं

महंगाई सब को
सरे आम लूटती है
पर रपट इसकी
किसी थाने में
नही लिखी जाती है
इसी लिए शायद
ये बेखौफ बढती जाती है

एक गरीब माँ
बच्चों को
फल के नाम बता रही थी
खरीद सकती नही
इसी लिए
दूर से दिखारही थी

महंगाई स्वयं महंगी हुई
पर रिश्ते सस्ते हो गए
गिरा दाम इमान का
जज्बात नीलाम हो गए
सस्ती बिकने लगी हैं बातें
जान इन्सान की सस्ती होगी
कम हुई कीमत किसानों की
बचा आत्महत्या की केवल रास्ता है
इस मंहगाई के दौर में लोगों
ये ही तो है जो सस्ता है

--रचना श्रीवास्तव



महँगाई का शासन हो गया, दिशा-दिशा में गान है।
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।

व्यवसायी का लाभ बढ रहा,
कर्मचारी का बढ़ता भत्ता।
नेताओं की है पौ-बारह,
किसान पाये ना, रोटी-लत्ता?

तेल, बीज और खाद बढ़ गया, खाद्यान्न का ही गान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।

क्रीमीलेयर की सीमा बढ़ती,
सेंसेक्स की रेखा चढ़ती।
दुधमुँहें की माता पूछे,
महँगाई कब होगी कमती?

न्यूनतम वेतन की बातें करते, अधिकतम् का क्या मान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।


भारत से लेकर अमरीका,
एक-दूसरे पर करते टीका।
महँगाई से पीड़ित हैं सब,
मिस्टर सेम हों या हो भीखा।

आज हमारी रोटी गिनते, क्या परमाणु अभिमान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।

सहनशक्ति है, सब सह लेंगे,
विकास कर रहे, विकास करेंगे।
विकास लक्ष्य जब हम पा लेंगे,
जवाब करारा हम भी देंगे।

तेल क्षेत्र पर कब्जा करके, हमको दिखाते शान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।

--संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी



कभी नहीं था सोचा मैंने, ऐसा भी हो सकता है ।
बिन ईधन के चलना मुश्किल, सब की हालत खसता है ।।
सब की हालत खसता है, ईधन हुआ मंहगा नशा ।
अमेरिका-ईरान संबंधों से, हुई यह दुर्दशा ।।
कच्चे तेल की बढती कीमत, परेशान हैं आज सभी ।
दादा गिरी, आपना असत्तव, असर दिखाये कभी-कभी ।।
बिगडा पर्यावरण, कहीं है बाढ-कहीं है सूखा ।
कृषि उत्पादन कमी आई है, आज किसान है भूखा ।।
आज किसान है भूखा, लागत ज्यादा उत्पादन कम ।
कर्जा चुका नहीं है पाता, तोड रहा है दम ।।
सुरसा जैसा मुँह फैलाये, मंहगाई ने झिगडा ।
विदेशी आनाज मगाया, देशी बजट है बिगडा ।।
मकान, सोना चाँदी, हुई आज है सपना ।
बेरोजगारी बढती जाती, रंग दिखाती अपना ।।
रंग दिखाती अपना, आज है मुश्किल शिक्षा पाना ।
भ्रष्टाचार का जाल है फैला, योग्य-अयोग्य न जाना ।।
शादी के संजोये सपने, मंहगाई फीके पकवान ।
कर्मचारी, मजदूर, किसान, बचा सके न आज मकान ।।
नेता की परिभाषा बदली, पाखंडी बनाया बेश ।
कभी भूनते तंदूरों में, बाहुबली चलाते देश ।।
बाहुबली चलाते देश, धर्म-जाति आपस लडबाते ।
सत्ता में आ जाते , वेतन सुख-सुविधाएं पाते ।।
सब कुछ मंहगा मौत है सस्ती, लाज के ये क्रेता ।
कुछ नही सिद्धांत इनका, भ्रष्ट आचरण नेता ।।
दर-दर बढती जनसंख्या, भूमि है स्थाई ।
कृषि भूमि में बनी हैं बस्ती, ऐसी नौबत आई ।।
ऐसी नौबत आई, जनसंख्या पर रोक लगाओ ।
नूतन तकनीती से, आवश्यकता पूर्ण कराओ ।।
विज्ञानकों का कर आव्हान, अबिष्कार को कर ।
पर्यावरण का कर संरक्षण, रोको मंहगाई की दर ।।

--देवेन्द्र कुमार मिश्रा



महंगाई की बात चली तो, मेरी भी सुन लो
चार जो आते थे दस के, आते अब बस दो

इन्फ्लेशन का नाम सुना था, जाने क्या है वो
दिल पर पत्थर रख लो तुम, जब भी पैसे दो

एक बार रोता था बस, पहले महंगा जो
अब महंगे सामान को ले के, खून के आंसू रो..

सत्ता संग ले जायेगी, क्या महंगाई को ?
फरक पड़ेगा अब कह के, जो होना सो हो..

--शैलेश जम्लोकि



दिनो दिन बढती जाती है
किसी नॉन स्टॉप ट्रेन की भान्ति
छूती जा रही है ऊँचाई
किसी उडान भरते विमान की भान्ति
खोलती है अपना मुँह
सुरसा की भान्ति
नही है अब किसी हनुमान की हिम्मत
कि कलयुगी सुरसा के मुँह मे
घुसकर सुरक्षित वापिस आ सके
रह जाता है साधारण जन लटक कर
त्रिशन्कु की भान्ति
एक ऐसा चक्र्व्यूह जिसमे
कोई अभिमन्यु घुसता है
पर वापसी के सारे मार्ग बन्द
कर जाता है अपने आप ही
बुन लेता है जाल
अपने चारो ओर
मकडी की भान्ति और
जीवन पर्यन्त खोजता है
बाहर का रास्ता
लाख प्रयत्न भी नही निकाल पाते
उसे इस मकडजाल से बाहर
घेर लेती है एक अदृश्य परछाई
न जाने कब ,कैसे
और पता भी नही चलता
फँस जाता है
आगे कुँआ पीछे खाई
के दोराहे पर
ज्यो पेट भरने की चाहत मे
निगल जाता है साँप छिपकली को
सिर पर कर्ज़ का बोझ लिए
ताउम्र सहता है आम जन
मँहगाई के कौडे
और लिख जाता है वसीयत
मेँ मँहगाई..........
अपने वारिसो के नाम भी

-- सीमा सचदेव



भारत की सरकार निराली,
कहीं नहीं ऐसी पाओगे...
कहती 'कम होगी महंगाई'
हर बरस बढती पाओगे....
दो के छः और छः के बारह,
दाम सदा ही ऊपर जाता,
सब्ज़ी, चावल हो या आटा
दूर से हमको मुंह है चिढ़ाता।
अब खाली बैठे न हमसे,
चीनी यूँ फांकी जाती है...
एक चाय की कीमत भी तो,
पाँच रूपये आंकी जाती है।
गरीब बेचारा क्या खायेगा...
ख़ुद को भी जो बेच आएगा...
एक जून की रोटी भी तो,
बच्चो को नहीं दे पायेगा।
फल मिष्ठान्न तो बन गए सपना,
भोजन मिल जाए क्या कम है...
खीर पूरी का गया ज़माना,
सूखी रोटी, आँखें नम हैं.......

--रेनू जैन



आम आदमी चिंता में है , कारण इसका है मँहगाई
खास सभी चिंतन में हैं सब , कारण इसका है मँहगाई

अखबारों में सुर्ख हुआ है, "प्राइस इंडैक्स" का बढ़ा केंचुआ
खबरों में "बाजार" बना है , कारण इसका है मँहगाई

सरकारें संकट में हैं सब , जोड़ तोड़ और उठा पटक है
कुर्सी सबकी डोल रही है , कारण इसका है मँहगाई

भारतीय भोजन की चर्चा , आबादी का बढ़ता खर्चा
अमरीकी सीनेट करते हैं , कारण इसका है मँहगाई

राशन पहुँचाने गरीब को , शासन सारा जुटा हुआ है
सुरसा मुख सा बढ़ा बजट है , कारण इसका है मँहगाई

चादर कितनी भी फैलाओ , फिर फिर पाँव उघड़ जाते हैं
सभी विवश हैँ पैर सिकोड़े , कारण इसका है मँहगाई

मँहगी थाली , मँहगी शिक्षा , मँहगी यात्रा और चिकित्सा
यही चाहते हैं हम सब अब , किसी तरह कम हो मंहगाई !

--विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र "



आज के इस वक्त में हमें
हमें कपडा, रोटी और मकान से ज्यादा
और भी कुछ चाहिये
पर मँहगाई के उतार चढाव के इस दौर में
कुछ ज्यादा मिलने की उम्मीद हमें नहीं है
हैरान परेशान होने के दिन अब लद गये है
हमने मान लिया है रुपया हमारा बाप है
और हमनें उसकी गुलामी स्वीकार कर ली है
हम धीरे धीरे चलते हैं
पर हमारे सपने हमसे भी तेज चलने का साहस रखते हैं
हमारे कुछ सपने सिक्कों के सहारे खडे हैं
जब सिक्के गिरे तो सपने भी गिरे
जो सपने फक्कड थे वे चलते चले गये
हम समझ गये उसकी जमीनी हक्कीत
वे सपने चलते गये और दुनियादारी से
बाहर होते गये
कुछ लोग बाजार में खरीदने निकले
और मन मार कर खरीद भी लाये
वो भी खरीदने निकले
पर दाम सुन कर मायुस हो लौट गये
हमनें इस जग में बहुतों से
जीतने का दावा किया
पर बहुत कोशिशों के बाद भी
हम मँहगाई से जीत नहीं पाये।

--विपिन चौधरी



जब जब भी सुना
जब जब भी है जाना
फिर इक आफत है आयी
बढती ही जाती हैं कीमतें
छूती ही चली जातीं हैं नयी ऊंचाई
रहम ,दुहाई है दुहाई
सुरसा सा मुंह खोले महंगाई
आटा घी शक्कर और
कपडों की सिलाई
हमेशा से हुए मंहगे
साथ बढ़ती महंगाई
लेकिन यह भी सच है
खाना पीना ओढ़ना
कुछ भी तो नहीं छूटा
बल्कि कुछ बढ़ा ही होगा
आयी नहीं रुलाई -
आमदनी तो है
पन्द्रेह सौ की कौन कहे महँगी
जब जेब में पचीस सौ ने गुत्थी सुलझाई -महंगाई ,उफ़ महंगाई
यूँ तो बढ़ते दामों ने है
दुनिया सताई
पर महंगाई के चलते
कुछ न रुका,
कुछ न रुके भाई

--कमलप्रीत सिंह



बडे सयाने कह गये, इसे मीठा ज़हर बताये हैं
महंगाई ने हम सबके, चेहरे खुश्क बनाये हैं
तवंगर अपना रोवे, मुफलिस भूखा सोवे,
आज दुनियांवालों ने, ग़म के गीत गाये हैं
जीना हुआ दुश्वार सभी का, सबकी एक कहानी है,
महंगाई के भूत ने देखो, हर शै पे पेहरे लगाये हैं
जमाखोरी, घूसखोर का, हुआ था पहले संगम,
उनके नालायक बेटे ने, चूल्हे सबके बुझाये हैं
उम्र तो अपनी रफ़्तार से, बढती ही चली जाये,
महंगाई जो बढ गयी तो, कम न होने पाये है
महंगाई तो दुश्मन का, बडा ज़ालिम बेटा है,
हर शख्स के सर पे उसनें, डन्डे बहोत बरसाये हैं
बेबस ज़िन्दगी कोस रही, उस उपरवाले को,
दो निवाले सुख के नहीं, आज तलक खाये हैं
ख़ुदा कहे कोई मुझको, न देना इल्ज़ाम,
गुनाह तुम्हारे सवाब तुम्हारे, वही सामने आये हैं
यारब करिश्मा कर, "रत्ती" पत्थर हज़म करे,
रोटी से निजात मिले, मैंने हाथ बहोत फैलाये हैं

शब्दार्थ
तवंगर = अमीर, मुफलिस = गरीब, दुश्वार = कठिन,
सवाब = पुण्य, निजात = छुटकारा

--सुरिन्दर रत्ती



अंग्रेज़ी अखबारों में ख़बर पढ़ते हैं,
"इन्फ्लेशन रेट बढ़ गई है",
और मुंह बिचका कर कहते हैं,
"उफ्फ यह महंगाई,
ये बेचारे गरीब लोग"
आँखें मूँद कर वही अखबार हम
मोड़-मरोड़ कर कोने में रख जाते हैं.
दास्ताँ-ऐ-महंगाई वाले कागज़ अब
रद्दियों के दाम कबाडी में जाते हैं
रद्दीवाला भी दाम देते वक्त कह उठता है,
"उफ्फ यह महंगाई"
दो निवाले खाने वाले अब
छोटा निवाला उठाते हैं
बारिस से पहले छप्पर की मरम्मत करने वाले
अब बहाना बना टाल जाते हैं
बच्ची के लिए गुडिया का वादा करने वाले
रोज़ भूल जाते हैं
अब पहली तनख्वाह से फ्रीज, टीवी नहीं आते हैं
बीवी को मनाने वाला, फूल-गहने भूल
केवल बातों काम चलाते हैं
"उफ्फ यह महंगाई, हाय यह महंगाई "
कहने वाले थक जाते हैं
किंतु, महंगाई की मार से बच नहीं पाते हैं.
मैंने सुना है-
महंगाई जीना मुश्किल करती है
मैंने सुन रखा है-
हाहाकार मची है
राशन की दूकान के सामने ,
सभी अपनी जेबें थामें खड़े हैं
थैले में अपना सर्वस्व
समेटने को अडे हैं
लेकिन, मैं सुनूं कैसे......
मैं तो खड़ी हूँ मॉल के हॉल में
चारों तरफ़ चकाचौंध है
पैसा जहाँ फाउंटेन में बहता है
और पानी पचास रूपया प्रति ग्लास मिलता है
जहाँ युवा पीढी बसती है, हंसती है, खेलती है
आह्लादित सी अजब गज़ब फैशन ट्राई करती है
और माँ बाप अचंभित से पीछे चलते हैं
इन बदलते रूपों में उनका अंश कौन सा?
मैं भी तो कोई अमीर नहीं ,
एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ
फिर, क्यों नहीं माँ-बाबूजी ने कहा,
"उफ्फ यह महंगाई"
हर मांग तो पूरी होती है मेरी,
क्यों बिगाड़ न पायी कुछ महंगाई मेरी?
फिर ख़याल आया,
बाबूजी रोज़ ऑफिस जल्दी जाते हैं
और रात को देर से लौटते हैं
मम्मी घर का हिसाब मुझ से छिपाती हैं
भाई की फेवरेट्स अब उन्हें पसंद नहीं रहे
रोटियों पर घी की परत नहीं चढाई जाती अब
क्योंकि, मेरी ही खुशी के लिए, कोई नहीं कहता,
"उफ्फ यह महंगाई".

--अर्पिता नायक



जबसे शुरु हुई कालाबाजारी,
आयी तबसे कमरतोड़ महँगाई;
जन जन की यह होश उडाई,
देश में मच गयी त्राहि त्राहि।
मूल्य बढाने की होड़ मचाई,
वस्तुओं को आपस में लडाई;
सरसों तेल ही पहले दौडा,
आसमान में आसन जमाया।
जब आलु देखा यह तमाशा,
आगे बढने की हुई अभिलाषा;
बढा ऊपर वह इतना कि भाई,
थी नहीं किसी को इतनी आशा।
प्याज पर अब पड़ा दबाब,
जब सह न पाया इतना दाब;
उड़ा पहन महँगाई का नकाब,
देखते ही रह गए सब जनाब।
मिर्च जो ले रही थी अंगड़ाई,
सबकी नजर उस पर दौड़ आयी;
भीड़ देख वह इतनी घबडाई;
डरकर सबसे पिंड छुडाई।
हरी सब्जियाँ की हरयाली,
थी नहीं किसी से कम निराली;
वह भी उपर जाने का सबको,
लहराती हरी झण्डी दिखायी।
इधर पडा था नमक बेचारा,
जो बना था सबका सहारा;
उसने भी जब हिम्मत हारा,
रातों रात दिया एक नारा।
छोडो अब निज देश की चिन्ता,
देखो कैसे जीते हैं सब नेता;
तोडो अब सबसे अपना नाता,
क्यों बने हम दुनियाँ का दाता।

--प्रकाश यादव 'निर्भीक'



घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई
औ॔" जरूरतों ने जेबों संग , है अनचाही रास रचाई

मुश्किल में हर एक साँस है , हर चेहरा चिंतित उदास है
वे ही क्या निर्धन निर्बल जो , वो भी धन जिनका कि दास है
फैले दावानल से जैसे , झुलस रही सारी अमराई !
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!

पनघट खुद प्यासा प्यासा है , क्षुदित श्रमिक ,स्वामी किसान हैं
मिटी मान मर्यादा सबकी , हर घर गुमसुम परेशान है
कितनों के आँगन अनब्याहे , बज न पा रही है शहनाई
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!

मेंहदी रच जो चली जिंदगी , टूट चुकी है उसकी आशा
पिसा जा रहा आम आदमी , हर चेहरे में छाई निराशा
चलते चलते शाम हो चली , मिली न पर मंजिल हरजाई
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!

मिट्टी तक तो मँहगी हुई है , हुआ आदमी केवल सस्ता
चूस रही मंहगाई जिसको , खुलेआम दिन में चौरस्ता
भटक रही शंकित घबराई , दिशाहीन बिखरी तरुणाई
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!

नई समस्यायें मुँह बाई , आबादी ,वितरण , उत्पादन
यदि न सामयिक हल होगा तो ,रोजगार ,शासन , अनुशासन
राष्ट्र प्रेम , चारीत्रिक ढ़ृड़ता की होगी कैसे भरपाई ?
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!

--प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव



आम आदमी बेमौत मर गया
हर वस्तु का मोल बढ़ गया
घर पर छ बाहर तेरह सौ
ऐसा भइया ये भावः चलवाते
कहें मसीहा गरीबों का खुदको
उपहार मंहगाई के बांटते जाते
अन्नदाता जहाँ मरते जाते
गर्व से जय किसान क्यों गाते
दलाल - सटोरिया, बडी कम्पानी
इनके सगे दोस्त और जानी
संसद में ये टिकने कि होड़ में
चट्टे-बट्टे सब बिकते करोड़ में
संसद में ये सब पैसा दिखलाते
ख़ुद तो खाते औरों को खिलाते
संसद बाहर आदमी मर रहा
अंदर नेता सब कंट्रोल कर रहा
किसी का बेटा, पति, बाप या भाई
हाय आज बली फ़िर ले गई मंहगाई .................|

--सोमेश्वर पांडेय



महंगाई ने सबको रुलाया है
पर ये तो खुशियों की सौगात लाया है
नहीं मिलेगी अब रोटी
तो फ़िक्र की क्या बात है
वैसे भी खाना कौन चाहता है रोटी ?
सबको तो फ़िक्र है अपने फिगर की
पहले तो खाना पड़ता था मजबूरी थी
पर महंगाई ने ,
समस्या ही हल कर दी
आपकी फ़िक्र ही जड़ से ख़त्म कर दी
नहीं मिलेगा अब कपड़ा ,
तो फ़िक्र की बात है क्या
वैसे भी पहनना कौन चाहता है
तभी तो दिखते हैं सब आज
नंगे - पुदंगे या अध् कपड़ो में
अध्कपड़े पहनना भी मजबूरी है
की कहीं दुनियाँ ऊँगली न उठाए
पर महंगाई ने तो ऊँगली ही तोड़ दी
तो अब चिंता काहे की
नहीं मिलेगा अब मकान ,
तो फ़िक्र की क्या बात है
कौन पालना चाहता है झंझटों को
कौन लेना चाहता है जिम्मेदारियों को
सब तो हैं परिवार से आजादी
महंगाई ने तो आपकी किस्मत चमका दी
सारी जिम्मेदारियों, झंझटों , परिवार से
मुक्ति दिला दी
तो अब भी क्यों उदास हो तुम
महंगाई से मुहं न मोडो
महंगाई के राज में दम मारो दम
मिटालो सारे गम ।

--कमला भंडारी



मिर्च से तीखापन
चीनी से मीठापन
करेले का कड़वापन
दूध-घी का सौंधापन
कहीं नदारद है
कंबख्त कहां जांए
इस मंहगाई पर लानत है
दाल अब गलती नही
भाजी कहीं मिलती नही
क्या खांए , क्या खरीदे
रेज़गारी चलती नहीं
पसीना भी अब फीका हुआ
नमक कहीं नदारद है
कम्बख़्त कहां जाएं
इस महंगाई पर लानत है
चावल ने पकना छोड़ा
गेंहू ने सबसे मुंह मोड़ा
हल्दी पीली नहीं लगती
मसालों से खुशबू नहीं मिलती
पानी से गीलापन नदारद है
कंबख्त कहां जाएं
इस मंहगाई पर लानत है
खुशियां हुई क्रेडिट
परेशानियां हैं डेबिट
ब्याह हुआ मुश्किल
घर होता नहीं हासिल
हसरतों की फेररिस्त नदारद है
कंबख्त
कहां जाए
इस
मंहगाई पर लानत है

--पंकज रामेन्दू मानव



सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!

सदियों से इसे पाला-पोसा
दादा परदादाऒं ने भी कोसा
फिर भी पीछे न मुडे़ यह महँगाई
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!

’बडे़ भैया’ की आर्थिक मंदी
राजकर्ताऒं ने फैलाई अंधाधुंधी
फिर कैसे लगाये लालच पर पाबंदी
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!

हजारों में एक छलाँग मारती रोजगारी
लाखों में फैलती मोह-माया, लाचारी
फिर कैसे थमेगी शुद्ध हवा,
दान-पानी की मारामारी, जब
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!

रोका, टोका, कोसा, ढोसा,
झुंझकारा, मारा, पीटा
फिर भी न जाये यह महँगाई
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो ना करे
यह उभरती जा रही महँगाई!

--मनालिनी काणे



महँगाई हाय ये महँगाई
मार गयी हमें ये महँगाई
कितने अच्छे थे गाव में
हल चलाते थे धूप और छाव में
कैसी ये शामत आई जो हमें शहर
ले आई
ला दिया घरवालो से जुदाई
महँगाई हाय ये महँगाई
मार गई हमें ये महँगाई
कितने भरे फार्म
फार्म भरते -भरते आंखे हो गई नम
घर के सामने नौकरी लगने के उम्मीद हो गई कम
क्या करें शहर आ गए हम
यहाँ भी था बेरोजगारी
महँगाई हाय ये महँगाई
मार गई हमें ये मेहेंगाई
कितनी अच्छी जिंदगी जीते थे
आराम से दो वक्त की रोटी खाते थे

अचानक कीमतों की बाढ़ आई
मुसीबतों का तूफान लायी
छोड़ दी पढाई शहर की
और पैर बढाई
महँगाई हाय ये महँगाई
मार गई हमें ये महँगाई
--राजेश राय



रोज बढ़ जाती हैं ज़ालिम कीमतें
क्या खरीदूँ और किसका नाम दूँ


हर कदम मँहगाई का दानव खड़ा
कैसे अपने दिल को मैं आराम दूँ।

आरजुएँ दफ्न होकर रह गईं
भूख को अब किस कुँए में डाल दूँ


रिश्ते-नाते भी हुए बेज़ान से
ज़ेब में कौड़ी नहीं जो बाँट दूँ

हैं सजे बाज़ार छाई रौनकें
एक चादर इनपे लाओ डाल दूँ।

आँख में चुभती हैं लाखों ख्वाइशें
दर्द इनका आँसुओं में ढ़ाल दूँ।

जल रहा है देश इसकी आग में
अब शुभी किसको यहाँ इल्ज़ाम दूँ।

--शोभा महेन्द्रू



मैं दिन भर जूझती मरूँगी
बचत करूँगी
पर.....
एक ही वार से
मेरी कमर तोड़ देगी मँहगाई

कोई भी सरकार
आई या गई
मेरे घर पर उससे
कोई फर्क नहीं पड़ा
क्योंकि....
किसी ने भी
मेरे बारे में नहीं सोचा

अमीर या गरीब होती
तो ठीक था
मध्यम वर्ग की तो हालत
लगातार बदतर होती जारही है
कोई निष्कर्ष -
कभी ना मिल पाएगा
ढर्रा शुरू से ही बिगड़ा है
अब क्या सुधरेगा

कौन पहली बार है
मुझे तो मार खाने की
आदत सी पड़ गई है
जिन्होने मँहगाई के झण्डे को
और ऊँचा किया
आओ मिलकर
करें धन्यवाद उनका

--सविता दत्ता



कोटिल्य भूले
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला
.

--विनय के जोशी



सच कड़वा होता है-
करैले-सा
कुछ कहते हैं-
नीम चढे करैले-सा।
नीम!
करैला!
फायदेमंद होते हैं
सेहत के लिए,
स्वाद!
आप शराब पीते हैं, ना!
स्वाद होता है?

करैला, नीम
अमूमन सस्ते होते है,-
हमारी, आपकी जेब के वास्ते..
दाम चढ जाता है
आफ सीजन में,
खपत कम हो जाती है तब।

लेकिन
सच!
करैला नहीं होता,
ना हीं नीम,
ना हीं आता है कभी
आफ सीजन,
फिर भी
होता है कड़वा
और महँगा कई गुणा.......

इसलिए
महँगाई यथार्थ नहीं-
यथार्थ है
सबब और मंशा।

रही बात सच की
तो
दिमागी गोदामों में
सालों से पड़ा
सड़ा
अधमरा सच
और कैसा होगा........!!!!

--विश्व दीपक 'तन्हा'