काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन
विषय - महँगाई
विषय-चयन - विवेक रंजन श्रीवास्तव 'विनम्र'
अंक - सोलह
माह - जुलाई 2008
कुतुब होटल, नई दिल्ली के पास प्रदर्शन करते मीडियाकर्मीलगातार बढ़ती मुद्रा स्फीति की दर ने भारत के आम आदमी की नाक में दम कर रखा है। जब हम जुलाई माह के काव्य-पल्लवन के लिए विषय का चयन कर रहे थे तो इस बात को ख्याल में रखते हुए कि महँगाई आज देश की सबसे बड़ी समस्या है, इस माह का
काव्य-पल्लवन इसी पर कराने का निर्णय लिया। कुल २५ कवियों ने भाग लिया। एक फोटोग्राफर
रश्मि सिंह ने हमें कुछ छायाचित्र भी भेजे, जिसमें दो फोटों हम यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि जिन्होंने भाग नहीं लिया, उन्हें महँगाई की चिंता नहीं है, हो सकता है कि वो महँगाई से इतने परेशान हो कि कलम की रोशनाई खरीदने के लिए भी सोचना पड़ा हो।
खैर आप सभी इस विमर्श में भाग लीजिए और सरकार की मुँह ताके बिना इसके निवारण पर विचार कीजिए।
आपको यह प्रयास कैसा लग रहा है?-टिप्पणी द्वारा अवश्य बतावें।
*** प्रतिभागी ***
| प्रदीप मानोरिया | सुरेन्द्र कुमार अभिन्न | शशिकाँत शर्मा | रचना श्रीवास्तव | संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी |देवेन्द्र कुमार मिश्रा | शैलेश जमलोकि | सीमा सचदेव
| रेनू जैन | विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र" |विपिन चौधरी |कमलप्रीत सिंह |
सुरिन्दर रत्ती | अर्पिता नायक | प्रकाश यादव 'निर्भीक' | प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव | सोमेश्वर पांडेय | कमला भंडारी | पंकज रामेन्दू मानव | मनालिनि काणे | राजेश राय | शोभा महेन्द्रू | सविता दत्ता | विनय के जोशी | विश्व दीपक 'तन्हा' |
~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~

बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
किंतु लेखनी सूखी रह्ती निर्धन की कठिनाई पर ,
चिंता है किंतु न चिंतन बढ़ती हुई महंगाई पर |
एक बार तो लिख कर देखो ठग वायदा बाज़ारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
खंड हुए अभिलेख पुराने नहीं लगाम महंगाई पर,
हर्षित नेता श्रेष्ठी हैं सब करते मौज कमाई पर |
एक बार अब हटा के फेंको ऐसी ठग सरकारों को
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
तपे जेठ की घोर दुपहरी , बे-घर रह मैदानों में ,
लथपथ रहे पसीना तन पर , करते काम खदानों में |
एक बार तो छूकर देखो उन दिल की दीवारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
जाडों में तन रहे ठिठुरता अधनंगे रह सड़कों पर ,
छोटी कथरी खींच तान कर डाल रहा जो लड़कों पर |
एक बार तो हाथ रखो अब इन मजबूरी के तारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
निर्धन की कुटिया छप्पर की टपक रही बरसातों में ,
बर्तन सारे बिछा फर्श पर जाग रहा जो रातों में |
एक बार तो लिख कर देखो इनकी करुण पुकारों पर ||
बूंदों पर तो छंद लिखे हैं ग़ज़ल लिखी बौछारों पर |
तारीफों के बंद लिखे हैं गीत लिखे त्योहारों पर ||
--प्रदीप मानोरिया 
मंहगाई ...मंहगाई ....मंहगाई
हल्ला मचा रहे हो
दिमाग का फतूर बढ़ने से रोक लो
महंगाई भी रुक जायेगी
एक पागल यही कहते सुना है मैंने
जीवन स्तर को
ऊपर उठाने की बात तो करते हो
उपग्रह पे बस्तियां बसाने की
तैयारियां भी हैं तुम्हारी,
फ़िर स्वप्न क्यों देखते हो
एक चवन्नी में
दस किलो देशी घी
और एक टक्के में मनो अनाज का
जानते नही क्या.
धरा से अब अनाज
मेहनत और पसीने से नही उगता
जमीन की भूख भी ज्यादा हो गई है,
जंक फ़ूड का ज़माना है,
उसे भी खाने को यूरिया
और पीने को कीटनाशक चाहिए
यूँ ही बवाल मचा देते हो
महंगाई ..महंगाई....महंगाई
डीजल .पेट्रोल के भाव बदने पर
हड़ताल करते हो.
नवीनतम मॉडल कार का
कौन सा आया शो रूम मे
हर महीने क्यों पड़ताल करते हो
सबसे मंहगी हो इस
शहर में मेरी कार
ये फतूर दिमाग में किसने बढाया
..?
फिर तेल के रेट बड़े तो
कहते हो महंगाई हो रही है
मंहगाई कब नही थी
कल ...............?
बरसों पहले........?
सदियों पहले ......?
मंहगाई
सर्वदा सर्वत्र विद्यमान रहती है,
निर्धन के लिए
मजदूर के लिए
अभावग्रस्त मेहनतकश के लिए..
बाकि सब के लिए तो
वरदान होती है
कर्मचारी का महंगाई भत्ता
कवियों की पुरुस्कार राशिः
कभी तिगुनी
कभी पाँच गुनी
राष्ट्रपति का वेतन .....
चपरासी का वेतन
आयोग चिंतित है
और
बार बार बैठते है
किसानों के लिए भी आयोग
व्यापार के आयोग
नित नित नए नए प्रयोग
सोचता हूँ की
कभी भूख को
गरीबी को
और रोज पिसते आम आदमी को
आयोग क्यों नही मिला.?
दूध बिजली दवाई से लेकर
हर छोटी बड़ी चीज़ को
महंगाई के नाम पर
कैश करा रहे हो
और हल्ला मचा रहे हो
मंहगाई .मंहगाई ...मंहगाई
काश आप को भी एक
पागल की आवाज सुनाई दे
और मंहगाई पर
खामखाँ की बहस बंद हो
--सुरेन्द्र कुमार अभिन्न
हाय ना जाने क्या लिखवाकर
जनता भारत की आई है
सबको जकडा एक रोग ने
महामारी ये महँगाई है
भूल गये सब हलवा-पूरी
रबडी और मलाई हैं,
सूखे चने चबाते है सब
आई जो महँगाई है
बूढे बच्चे और सयाने
सबको हरने आई है
नाच रही सर चडकर सबके
ये कालजायी महँगाई है
निगल चुकी है सबको अब
सरकार की बारी आई है
सुरसा सी बढती है जाती
अजर अमर महँगाई है
--शशिकाँत शर्मा 
विरोधी नेता
माल दबा दाम बढाते हैं
इसी की सीधी चढ़
सत्ता में आते हैं
गद्दी पे बैठ
बहुत मंहगे हो जाते हैं
महंगाई से दीखते है चहुँ ओर
पर आम जनता की पहुँच से
दूर हो जाते हैं
महंगाई सब को
सरे आम लूटती है
पर रपट इसकी
किसी थाने में
नही लिखी जाती है
इसी लिए शायद
ये बेखौफ बढती जाती है
एक गरीब माँ
बच्चों को
फल के नाम बता रही थी
खरीद सकती नही
इसी लिए
दूर से दिखारही थी
महंगाई स्वयं महंगी हुई
पर रिश्ते सस्ते हो गए
गिरा दाम इमान का
जज्बात नीलाम हो गए
सस्ती बिकने लगी हैं बातें
जान इन्सान की सस्ती होगी
कम हुई कीमत किसानों की
बचा आत्महत्या की केवल रास्ता है
इस मंहगाई के दौर में लोगों
ये ही तो है जो सस्ता है
--रचना श्रीवास्तव
महँगाई का शासन हो गया, दिशा-दिशा में गान है।
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।
व्यवसायी का लाभ बढ रहा,
कर्मचारी का बढ़ता भत्ता।
नेताओं की है पौ-बारह,
किसान पाये ना, रोटी-लत्ता?
तेल, बीज और खाद बढ़ गया, खाद्यान्न का ही गान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।
क्रीमीलेयर की सीमा बढ़ती,
सेंसेक्स की रेखा चढ़ती।
दुधमुँहें की माता पूछे,
महँगाई कब होगी कमती?
न्यूनतम वेतन की बातें करते, अधिकतम् का क्या मान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।
भारत से लेकर अमरीका,
एक-दूसरे पर करते टीका।
महँगाई से पीड़ित हैं सब,
मिस्टर सेम हों या हो भीखा।
आज हमारी रोटी गिनते, क्या परमाणु अभिमान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।
सहनशक्ति है, सब सह लेंगे,
विकास कर रहे, विकास करेंगे।
विकास लक्ष्य जब हम पा लेंगे,
जवाब करारा हम भी देंगे।
तेल क्षेत्र पर कब्जा करके, हमको दिखाते शान है?
सब कुछ देखो हो गया महँगा, बस सस्ता इंसान है।।
--संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
कभी नहीं था सोचा मैंने, ऐसा भी हो सकता है ।
बिन ईधन के चलना मुश्किल, सब की हालत खसता है ।।
सब की हालत खसता है, ईधन हुआ मंहगा नशा ।
अमेरिका-ईरान संबंधों से, हुई यह दुर्दशा ।।
कच्चे तेल की बढती कीमत, परेशान हैं आज सभी ।
दादा गिरी, आपना असत्तव, असर दिखाये कभी-कभी ।।
बिगडा पर्यावरण, कहीं है बाढ-कहीं है सूखा ।
कृषि उत्पादन कमी आई है, आज किसान है भूखा ।।
आज किसान है भूखा, लागत ज्यादा उत्पादन कम ।
कर्जा चुका नहीं है पाता, तोड रहा है दम ।।
सुरसा जैसा मुँह फैलाये, मंहगाई ने झिगडा ।
विदेशी आनाज मगाया, देशी बजट है बिगडा ।।
मकान, सोना चाँदी, हुई आज है सपना ।
बेरोजगारी बढती जाती, रंग दिखाती अपना ।।
रंग दिखाती अपना, आज है मुश्किल शिक्षा पाना ।
भ्रष्टाचार का जाल है फैला, योग्य-अयोग्य न जाना ।।
शादी के संजोये सपने, मंहगाई फीके पकवान ।
कर्मचारी, मजदूर, किसान, बचा सके न आज मकान ।।
नेता की परिभाषा बदली, पाखंडी बनाया बेश ।
कभी भूनते तंदूरों में, बाहुबली चलाते देश ।।
बाहुबली चलाते देश, धर्म-जाति आपस लडबाते ।
सत्ता में आ जाते , वेतन सुख-सुविधाएं पाते ।।
सब कुछ मंहगा मौत है सस्ती, लाज के ये क्रेता ।
कुछ नही सिद्धांत इनका, भ्रष्ट आचरण नेता ।।
दर-दर बढती जनसंख्या, भूमि है स्थाई ।
कृषि भूमि में बनी हैं बस्ती, ऐसी नौबत आई ।।
ऐसी नौबत आई, जनसंख्या पर रोक लगाओ ।
नूतन तकनीती से, आवश्यकता पूर्ण कराओ ।।
विज्ञानकों का कर आव्हान, अबिष्कार को कर ।
पर्यावरण का कर संरक्षण, रोको मंहगाई की दर ।।
--देवेन्द्र कुमार मिश्रा
महंगाई की बात चली तो, मेरी भी सुन लो
चार जो आते थे दस के, आते अब बस दो
इन्फ्लेशन का नाम सुना था, जाने क्या है वो
दिल पर पत्थर रख लो तुम, जब भी पैसे दो
एक बार रोता था बस, पहले महंगा जो
अब महंगे सामान को ले के, खून के आंसू रो..
सत्ता संग ले जायेगी, क्या महंगाई को ?
फरक पड़ेगा अब कह के, जो होना सो हो..
--शैलेश जम्लोकि
दिनो दिन बढती जाती है
किसी नॉन स्टॉप ट्रेन की भान्ति
छूती जा रही है ऊँचाई
किसी उडान भरते विमान की भान्ति
खोलती है अपना मुँह
सुरसा की भान्ति
नही है अब किसी हनुमान की हिम्मत
कि कलयुगी सुरसा के मुँह मे
घुसकर सुरक्षित वापिस आ सके
रह जाता है साधारण जन लटक कर
त्रिशन्कु की भान्ति
एक ऐसा चक्र्व्यूह जिसमे
कोई अभिमन्यु घुसता है
पर वापसी के सारे मार्ग बन्द
कर जाता है अपने आप ही
बुन लेता है जाल
अपने चारो ओर
मकडी की भान्ति और
जीवन पर्यन्त खोजता है
बाहर का रास्ता
लाख प्रयत्न भी नही निकाल पाते
उसे इस मकडजाल से बाहर
घेर लेती है एक अदृश्य परछाई
न जाने कब ,कैसे
और पता भी नही चलता
फँस जाता है
आगे कुँआ पीछे खाई
के दोराहे पर
ज्यो पेट भरने की चाहत मे
निगल जाता है साँप छिपकली को
सिर पर कर्ज़ का बोझ लिए
ताउम्र सहता है आम जन
मँहगाई के कौडे
और लिख जाता है वसीयत
मेँ मँहगाई..........
अपने वारिसो के नाम भी
-- सीमा सचदेव
भारत की सरकार निराली,
कहीं नहीं ऐसी पाओगे...
कहती 'कम होगी महंगाई'
हर बरस बढती पाओगे....
दो के छः और छः के बारह,
दाम सदा ही ऊपर जाता,
सब्ज़ी, चावल हो या आटा
दूर से हमको मुंह है चिढ़ाता।
अब खाली बैठे न हमसे,
चीनी यूँ फांकी जाती है...
एक चाय की कीमत भी तो,
पाँच रूपये आंकी जाती है।
गरीब बेचारा क्या खायेगा...
ख़ुद को भी जो बेच आएगा...
एक जून की रोटी भी तो,
बच्चो को नहीं दे पायेगा।
फल मिष्ठान्न तो बन गए सपना,
भोजन मिल जाए क्या कम है...
खीर पूरी का गया ज़माना,
सूखी रोटी, आँखें नम हैं.......
--रेनू जैन
आम आदमी चिंता में है , कारण इसका है मँहगाई
खास सभी चिंतन में हैं सब , कारण इसका है मँहगाई
अखबारों में सुर्ख हुआ है, "प्राइस इंडैक्स" का बढ़ा केंचुआ
खबरों में "बाजार" बना है , कारण इसका है मँहगाई
सरकारें संकट में हैं सब , जोड़ तोड़ और उठा पटक है
कुर्सी सबकी डोल रही है , कारण इसका है मँहगाई
भारतीय भोजन की चर्चा , आबादी का बढ़ता खर्चा
अमरीकी सीनेट करते हैं , कारण इसका है मँहगाई
राशन पहुँचाने गरीब को , शासन सारा जुटा हुआ है
सुरसा मुख सा बढ़ा बजट है , कारण इसका है मँहगाई
चादर कितनी भी फैलाओ , फिर फिर पाँव उघड़ जाते हैं
सभी विवश हैँ पैर सिकोड़े , कारण इसका है मँहगाई
मँहगी थाली , मँहगी शिक्षा , मँहगी यात्रा और चिकित्सा
यही चाहते हैं हम सब अब , किसी तरह कम हो मंहगाई !
--विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र "
आज के इस वक्त में हमें
हमें कपडा, रोटी और मकान से ज्यादा
और भी कुछ चाहिये
पर मँहगाई के उतार चढाव के इस दौर में
कुछ ज्यादा मिलने की उम्मीद हमें नहीं है
हैरान परेशान होने के दिन अब लद गये है
हमने मान लिया है रुपया हमारा बाप है
और हमनें उसकी गुलामी स्वीकार कर ली है
हम धीरे धीरे चलते हैं
पर हमारे सपने हमसे भी तेज चलने का साहस रखते हैं
हमारे कुछ सपने सिक्कों के सहारे खडे हैं
जब सिक्के गिरे तो सपने भी गिरे
जो सपने फक्कड थे वे चलते चले गये
हम समझ गये उसकी जमीनी हक्कीत
वे सपने चलते गये और दुनियादारी से
बाहर होते गये
कुछ लोग बाजार में खरीदने निकले
और मन मार कर खरीद भी लाये
वो भी खरीदने निकले
पर दाम सुन कर मायुस हो लौट गये
हमनें इस जग में बहुतों से
जीतने का दावा किया
पर बहुत कोशिशों के बाद भी
हम मँहगाई से जीत नहीं पाये।
--विपिन चौधरी
जब जब भी सुना
जब जब भी है जाना
फिर इक आफत है आयी
बढती ही जाती हैं कीमतें
छूती ही चली जातीं हैं नयी ऊंचाई
रहम ,दुहाई है दुहाई
सुरसा सा मुंह खोले महंगाई
आटा घी शक्कर और
कपडों की सिलाई
हमेशा से हुए मंहगे
साथ बढ़ती महंगाई
लेकिन यह भी सच है
खाना पीना ओढ़ना
कुछ भी तो नहीं छूटा
बल्कि कुछ बढ़ा ही होगा
आयी नहीं रुलाई -
आमदनी तो है
पन्द्रेह सौ की कौन कहे महँगी
जब जेब में पचीस सौ ने गुत्थी सुलझाई -महंगाई ,उफ़ महंगाई
यूँ तो बढ़ते दामों ने है
दुनिया सताई
पर महंगाई के चलते
कुछ न रुका,
कुछ न रुके भाई
--कमलप्रीत सिंह
बडे सयाने कह गये, इसे मीठा ज़हर बताये हैं
महंगाई ने हम सबके, चेहरे खुश्क बनाये हैं
तवंगर अपना रोवे, मुफलिस भूखा सोवे,
आज दुनियांवालों ने, ग़म के गीत गाये हैं
जीना हुआ दुश्वार सभी का, सबकी एक कहानी है,
महंगाई के भूत ने देखो, हर शै पे पेहरे लगाये हैं
जमाखोरी, घूसखोर का, हुआ था पहले संगम,
उनके नालायक बेटे ने, चूल्हे सबके बुझाये हैं
उम्र तो अपनी रफ़्तार से, बढती ही चली जाये,
महंगाई जो बढ गयी तो, कम न होने पाये है
महंगाई तो दुश्मन का, बडा ज़ालिम बेटा है,
हर शख्स के सर पे उसनें, डन्डे बहोत बरसाये हैं
बेबस ज़िन्दगी कोस रही, उस उपरवाले को,
दो निवाले सुख के नहीं, आज तलक खाये हैं
ख़ुदा कहे कोई मुझको, न देना इल्ज़ाम,
गुनाह तुम्हारे सवाब तुम्हारे, वही सामने आये हैं
यारब करिश्मा कर, "रत्ती" पत्थर हज़म करे,
रोटी से निजात मिले, मैंने हाथ बहोत फैलाये हैं
शब्दार्थतवंगर = अमीर, मुफलिस = गरीब, दुश्वार = कठिन,
सवाब = पुण्य, निजात = छुटकारा
--सुरिन्दर रत्ती
अंग्रेज़ी अखबारों में ख़बर पढ़ते हैं,
"इन्फ्लेशन रेट बढ़ गई है",
और मुंह बिचका कर कहते हैं,
"उफ्फ यह महंगाई,
ये बेचारे गरीब लोग"
आँखें मूँद कर वही अखबार हम
मोड़-मरोड़ कर कोने में रख जाते हैं.
दास्ताँ-ऐ-महंगाई वाले कागज़ अब
रद्दियों के दाम कबाडी में जाते हैं
रद्दीवाला भी दाम देते वक्त कह उठता है,
"उफ्फ यह महंगाई"
दो निवाले खाने वाले अब
छोटा निवाला उठाते हैं
बारिस से पहले छप्पर की मरम्मत करने वाले
अब बहाना बना टाल जाते हैं
बच्ची के लिए गुडिया का वादा करने वाले
रोज़ भूल जाते हैं
अब पहली तनख्वाह से फ्रीज, टीवी नहीं आते हैं
बीवी को मनाने वाला, फूल-गहने भूल
केवल बातों काम चलाते हैं
"उफ्फ यह महंगाई, हाय यह महंगाई "
कहने वाले थक जाते हैं
किंतु, महंगाई की मार से बच नहीं पाते हैं.
मैंने सुना है-
महंगाई जीना मुश्किल करती है
मैंने सुन रखा है-
हाहाकार मची है
राशन की दूकान के सामने ,
सभी अपनी जेबें थामें खड़े हैं
थैले में अपना सर्वस्व
समेटने को अडे हैं
लेकिन, मैं सुनूं कैसे......
मैं तो खड़ी हूँ मॉल के हॉल में
चारों तरफ़ चकाचौंध है
पैसा जहाँ फाउंटेन में बहता है
और पानी पचास रूपया प्रति ग्लास मिलता है
जहाँ युवा पीढी बसती है, हंसती है, खेलती है
आह्लादित सी अजब गज़ब फैशन ट्राई करती है
और माँ बाप अचंभित से पीछे चलते हैं
इन बदलते रूपों में उनका अंश कौन सा?
मैं भी तो कोई अमीर नहीं ,
एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँ
फिर, क्यों नहीं माँ-बाबूजी ने कहा,
"उफ्फ यह महंगाई"
हर मांग तो पूरी होती है मेरी,
क्यों बिगाड़ न पायी कुछ महंगाई मेरी?
फिर ख़याल आया,
बाबूजी रोज़ ऑफिस जल्दी जाते हैं
और रात को देर से लौटते हैं
मम्मी घर का हिसाब मुझ से छिपाती हैं
भाई की फेवरेट्स अब उन्हें पसंद नहीं रहे
रोटियों पर घी की परत नहीं चढाई जाती अब
क्योंकि, मेरी ही खुशी के लिए, कोई नहीं कहता,
"उफ्फ यह महंगाई".
--अर्पिता नायक
जबसे शुरु हुई कालाबाजारी,
आयी तबसे कमरतोड़ महँगाई;
जन जन की यह होश उडाई,
देश में मच गयी त्राहि त्राहि।
मूल्य बढाने की होड़ मचाई,
वस्तुओं को आपस में लडाई;
सरसों तेल ही पहले दौडा,
आसमान में आसन जमाया।
जब आलु देखा यह तमाशा,
आगे बढने की हुई अभिलाषा;
बढा ऊपर वह इतना कि भाई,
थी नहीं किसी को इतनी आशा।
प्याज पर अब पड़ा दबाब,
जब सह न पाया इतना दाब;
उड़ा पहन महँगाई का नकाब,
देखते ही रह गए सब जनाब।
मिर्च जो ले रही थी अंगड़ाई,
सबकी नजर उस पर दौड़ आयी;
भीड़ देख वह इतनी घबडाई;
डरकर सबसे पिंड छुडाई।
हरी सब्जियाँ की हरयाली,
थी नहीं किसी से कम निराली;
वह भी उपर जाने का सबको,
लहराती हरी झण्डी दिखायी।
इधर पडा था नमक बेचारा,
जो बना था सबका सहारा;
उसने भी जब हिम्मत हारा,
रातों रात दिया एक नारा।
छोडो अब निज देश की चिन्ता,
देखो कैसे जीते हैं सब नेता;
तोडो अब सबसे अपना नाता,
क्यों बने हम दुनियाँ का दाता।
--प्रकाश यादव 'निर्भीक' 
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई
औ॔" जरूरतों ने जेबों संग , है अनचाही रास रचाई
मुश्किल में हर एक साँस है , हर चेहरा चिंतित उदास है
वे ही क्या निर्धन निर्बल जो , वो भी धन जिनका कि दास है
फैले दावानल से जैसे , झुलस रही सारी अमराई !
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!
पनघट खुद प्यासा प्यासा है , क्षुदित श्रमिक ,स्वामी किसान हैं
मिटी मान मर्यादा सबकी , हर घर गुमसुम परेशान है
कितनों के आँगन अनब्याहे , बज न पा रही है शहनाई
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!
मेंहदी रच जो चली जिंदगी , टूट चुकी है उसकी आशा
पिसा जा रहा आम आदमी , हर चेहरे में छाई निराशा
चलते चलते शाम हो चली , मिली न पर मंजिल हरजाई
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!
मिट्टी तक तो मँहगी हुई है , हुआ आदमी केवल सस्ता
चूस रही मंहगाई जिसको , खुलेआम दिन में चौरस्ता
भटक रही शंकित घबराई , दिशाहीन बिखरी तरुणाई
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!
नई समस्यायें मुँह बाई , आबादी ,वितरण , उत्पादन
यदि न सामयिक हल होगा तो ,रोजगार ,शासन , अनुशासन
राष्ट्र प्रेम , चारीत्रिक ढ़ृड़ता की होगी कैसे भरपाई ?
घटती जाती सुख सुविधायें , बढ़ती जाती है मँहगाई !!
--प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव
आम आदमी बेमौत मर गया
हर वस्तु का मोल बढ़ गया
घर पर छ बाहर तेरह सौ
ऐसा भइया ये भावः चलवाते
कहें मसीहा गरीबों का खुदको
उपहार मंहगाई के बांटते जाते
अन्नदाता जहाँ मरते जाते
गर्व से जय किसान क्यों गाते
दलाल - सटोरिया, बडी कम्पानी
इनके सगे दोस्त और जानी
संसद में ये टिकने कि होड़ में
चट्टे-बट्टे सब बिकते करोड़ में
संसद में ये सब पैसा दिखलाते
ख़ुद तो खाते औरों को खिलाते
संसद बाहर आदमी मर रहा
अंदर नेता सब कंट्रोल कर रहा
किसी का बेटा, पति, बाप या भाई
हाय आज बली फ़िर ले गई मंहगाई .................|
--सोमेश्वर पांडेय
महंगाई ने सबको रुलाया है
पर ये तो खुशियों की सौगात लाया है
नहीं मिलेगी अब रोटी
तो फ़िक्र की क्या बात है
वैसे भी खाना कौन चाहता है रोटी ?
सबको तो फ़िक्र है अपने फिगर की
पहले तो खाना पड़ता था मजबूरी थी
पर महंगाई ने ,
समस्या ही हल कर दी
आपकी फ़िक्र ही जड़ से ख़त्म कर दी
नहीं मिलेगा अब कपड़ा ,
तो फ़िक्र की बात है क्या
वैसे भी पहनना कौन चाहता है
तभी तो दिखते हैं सब आज
नंगे - पुदंगे या अध् कपड़ो में
अध्कपड़े पहनना भी मजबूरी है
की कहीं दुनियाँ ऊँगली न उठाए
पर महंगाई ने तो ऊँगली ही तोड़ दी
तो अब चिंता काहे की
नहीं मिलेगा अब मकान ,
तो फ़िक्र की क्या बात है
कौन पालना चाहता है झंझटों को
कौन लेना चाहता है जिम्मेदारियों को
सब तो हैं परिवार से आजादी
महंगाई ने तो आपकी किस्मत चमका दी
सारी जिम्मेदारियों, झंझटों , परिवार से
मुक्ति दिला दी
तो अब भी क्यों उदास हो तुम
महंगाई से मुहं न मोडो
महंगाई के राज में दम मारो दम
मिटालो सारे गम ।
--कमला भंडारी
मिर्च से तीखापन
चीनी से मीठापन
करेले का कड़वापन
दूध-घी का सौंधापन
कहीं नदारद है
कंबख्त कहां जांए
इस मंहगाई पर लानत है
दाल अब गलती नही
भाजी कहीं मिलती नही
क्या खांए , क्या खरीदे
रेज़गारी चलती नहीं
पसीना भी अब फीका हुआ
नमक कहीं नदारद है
कम्बख़्त कहां जाएं
इस महंगाई पर लानत है
चावल ने पकना छोड़ा
गेंहू ने सबसे मुंह मोड़ा
हल्दी पीली नहीं लगती
मसालों से खुशबू नहीं मिलती
पानी से गीलापन नदारद है
कंबख्त कहां जाएं
इस मंहगाई पर लानत है
खुशियां हुई क्रेडिट
परेशानियां हैं डेबिट
ब्याह हुआ मुश्किल
घर होता नहीं हासिल
हसरतों की फेररिस्त नदारद है
कंबख्त
कहां जाए
इस
मंहगाई पर लानत है
--पंकज रामेन्दू मानव
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!
सदियों से इसे पाला-पोसा
दादा परदादाऒं ने भी कोसा
फिर भी पीछे न मुडे़ यह महँगाई
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!
’बडे़ भैया’ की आर्थिक मंदी
राजकर्ताऒं ने फैलाई अंधाधुंधी
फिर कैसे लगाये लालच पर पाबंदी
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!
हजारों में एक छलाँग मारती रोजगारी
लाखों में फैलती मोह-माया, लाचारी
फिर कैसे थमेगी शुद्ध हवा,
दान-पानी की मारामारी, जब
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो न क्रे
यह उभरती जा रही महँगाई!
रोका, टोका, कोसा, ढोसा,
झुंझकारा, मारा, पीटा
फिर भी न जाये यह महँगाई
सूमो पहलवान से बलवान बनती
बढ़ती जा रही है यह महँगाई
डर है हमें जमींदोस्त तो ना करे
यह उभरती जा रही महँगाई!
--मनालिनी काणे
महँगाई हाय ये महँगाई
मार गयी हमें ये महँगाई
कितने अच्छे थे गाव में
हल चलाते थे धूप और छाव में
कैसी ये शामत आई जो हमें शहर
ले आई
ला दिया घरवालो से जुदाई
महँगाई हाय ये महँगाई
मार गई हमें ये महँगाई
कितने भरे फार्म
फार्म भरते -भरते आंखे हो गई नम
घर के सामने नौकरी लगने के उम्मीद हो गई कम
क्या करें शहर आ गए हम
यहाँ भी था बेरोजगारी
महँगाई हाय ये महँगाई
मार गई हमें ये मेहेंगाई
कितनी अच्छी जिंदगी जीते थे
आराम से दो वक्त की रोटी खाते थे
अचानक कीमतों की बाढ़ आई
मुसीबतों का तूफान लायी
छोड़ दी पढाई शहर की
और पैर बढाई
महँगाई हाय ये महँगाई
मार गई हमें ये महँगाई
--राजेश राय 
रोज बढ़ जाती हैं ज़ालिम कीमतें
क्या खरीदूँ और किसका नाम दूँ
।
हर कदम मँहगाई का दानव खड़ा
कैसे अपने दिल को मैं आराम दूँ।
आरजुएँ दफ्न होकर रह गईं
भूख को अब किस कुँए में डाल दूँ
रिश्ते-नाते भी हुए बेज़ान से
ज़ेब में कौड़ी नहीं जो बाँट दूँ
हैं सजे बाज़ार छाई रौनकें
एक चादर इनपे लाओ डाल दूँ।
आँख में चुभती हैं लाखों ख्वाइशें
दर्द इनका आँसुओं में ढ़ाल दूँ।
जल रहा है देश इसकी आग में
अब शुभी किसको यहाँ इल्ज़ाम दूँ।
--शोभा महेन्द्रू
मैं दिन भर जूझती मरूँगी
बचत करूँगी
पर.....
एक ही वार से
मेरी कमर तोड़ देगी मँहगाई
कोई भी सरकार
आई या गई
मेरे घर पर उससे
कोई फर्क नहीं पड़ा
क्योंकि....
किसी ने भी
मेरे बारे में नहीं सोचा
अमीर या गरीब होती
तो ठीक था
मध्यम वर्ग की तो हालत
लगातार बदतर होती जारही है
कोई निष्कर्ष -
कभी ना मिल पाएगा
ढर्रा शुरू से ही बिगड़ा है
अब क्या सुधरेगा
कौन पहली बार है
मुझे तो मार खाने की
आदत सी पड़ गई है
जिन्होने मँहगाई के झण्डे को
और ऊँचा किया
आओ मिलकर
करें धन्यवाद उनका
--सविता दत्ता
कोटिल्य भूले
वस्तु विनिमय छोडा
विश्व बैंक का अंकुश डाला
छतरी तोडी
चद्दर फाडा
भ्रष्टाचारी छत्र संभाला
भेडिया राजा
भेड़ रियाया
भीड़ भ्रामरी अकेले ताला
दिन दल्ले
रात पतुरिया
जिस्म जख्म अस्तित्व छाला
बकरी भगाई
चरखा तोडा
वैश्वीकरण का हाथी पाला
किया उत्सर्जन
तब चिल्लाये
हाय महंगाई मार डाला
.
--विनय के जोशी 
सच कड़वा होता है-
करैले-सा
कुछ कहते हैं-
नीम चढे करैले-सा।
नीम!
करैला!
फायदेमंद होते हैं
सेहत के लिए,
स्वाद!
आप शराब पीते हैं, ना!
स्वाद होता है?
करैला, नीम
अमूमन सस्ते होते है,-
हमारी, आपकी जेब के वास्ते..
दाम चढ जाता है
आफ सीजन में,
खपत कम हो जाती है तब।
लेकिन
सच!
करैला नहीं होता,
ना हीं नीम,
ना हीं आता है कभी
आफ सीजन,
फिर भी
होता है कड़वा
और महँगा कई गुणा.......
इसलिए
महँगाई यथार्थ नहीं-
यथार्थ है
सबब और मंशा।
रही बात सच की
तो
दिमागी गोदामों में
सालों से पड़ा
सड़ा
अधमरा सच
और कैसा होगा........!!!!
--विश्व दीपक 'तन्हा'