हिन्द-युग्म की ओर से सभी भारतीयों को 63वीं स्वतंत्रता दिवस की बधाइयाँ। आज हम इस अवसर पर आपके लिए लेकर आये हैं ढेर सारी कविताएँ। हिन्द-युग्म लगभग 38 महीने पहले शुरू हुआ था। हिन्द-युग्म के संग्रहालय में बहुत सी ऐसी रचनाएँ हैं जो अब भी ताज़ी हैं। चिंताएँ स्थाई हो गई हैं। आशा है हमारी यह प्रस्तुति आप पसंद करेंगे-
स्वाधीनता दिवस, स्वतंत्रता दिवस, ६१वीं आज़ादी दिवस पर हिन्द-युग्म की विशेष प्रस्तुति
दुनिया में हर जगह, भारतीय अपनी आज़ादी का जश्न मना रहे हैं। हिन्द-युग्म भी अपने कविता पृष्ठ पर अपने तरीके से स्वाधीनता दिवस का जश्न मना रहा है। १५ अगस्त के दिन १५ कविताएँ लेकर हाज़िर है। भारत विभिन्नता में एकता का देश है। हमने भी इस विशेष अंक में आज़ादी के कविता के १५ भिन्न-भिन्न रंग शामिल किये हैं। इस अंक में पूर्वी भारत से भी एक लिखने वाली हैं, पश्चिम से भी कोई है, उत्तर तो हिन्दी की दुनिया है, दक्षिण की भी कवयित्री शामिल हैं। कवयित्री हरकीरत कलसी 'हकी़र' गुवाहाटी आसाम में रहती हैं, तो वहीं कवयित्री सी आर॰ राजश्री कोयमबटूर से हैं। देवेन्द्र वाराणसी, मयंक नोएडा, विवेक पाण्डेय भोपाल से, विवेक रंजन और विदग्ध जबलपुर, वहीं संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी नागौर राजस्थान, तो सुधी जयपुर से हैं। विद्याधर दुबे कानपुर से, प्रदीप मानोरिया मध्य प्रदेश, निशिकांत नोएडा, वीनस केसरी इलाहाबाद तो प्रदीप पाठक नई दिल्ली से हैं। मतलब अनन्त रंगों में से १५ रंग आज हमने अपने पृष्ठ पर सजाएँ हैं। आज इस अंक के लिए चित्रकार राजेश तिवारी ने एक चित्र भी बनाकर भेजा है। शेष आपकी टिप्पणियों के विविध रंगों का इंतज़ार रहेगा।
स्वतन्त्रता दिवस पर विशेष
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2. ऑरकुट के लिए कोड को सीधे स्क्रेपबुक में पेस्ट करें। 3. ईमेल सिग्नेचर के लिए ईमेल सेटिंग में जाकर 'सिग्नेचर' के HTML विकल्प में उपर्युक्त कोड पोस्ट करें। विज़न २०२० हरी नीली लाल पीली बड़ी बड़ी तेज़ रफ्तार मोटरें और उनके बीच दबा, सहमा, डरा सा आम आदमी
हरे भरे लहराते बड़े बड़े पेडो के नीचे बिखरी पन्निया बारिश की प्रदुषण धुली बूँदें आँखों से बरसती
सड़क पर चाय के ठेले पर वही बुढ़िया और चाय पहुचता वही छोटू
स्कूल से निकलता अल्हड, मस्त किल्कारिया भरता बचपन और पास ही सड़क पर भीख मांगते नन्हे, असमय बड़े हो चुके छोटे बच्चे
पाँच सितारा अस्पताल का उद्घाटन करते प्रधान मंत्री की तस्वीर को घूरती सरकारी अस्पताल में बिना इलाज मरे शिशु की लाश
और इन सबको कर उपेक्षित विकास के दावो की होर्डिंग निहारता मैं मन में दृढ़ करता चलता विश्वास की हाँ २०२० में हम विकसित हो ही जाएँगे दिल को बहलाने को ग़ालिब...........
एक हाथ में लोकतंत्र के सपने दूसरे में बारूदी छर्रे! बोलिए-हिप-हिप हुर्रे! एक तरफ़ भूखे एहसास; दूसरी तरफ कसाई! जी हाँ, आपने भी सही जगह बस्ती बसाई! पेट में उगते हैं मौसम, चूल्हे में सुबह-शाम! बाकी जिंदगी तो होती है, सड़कों पर तमाम | आस्तीनों में पलते हैं दोस्त, म्यानों में मिलते हैं संबंध! मखमल के हैं संबोधन, लेकिन टाट के हैं पैबंद! पर, मेरे वैचारिक सहचरो! वोट देते ही रटने लगो- संविधानी मंत्र! वरना फिर किस तरह बचेगा लोकतंत्र! और अगर लोकतंत्र नहीं रहा तो तुम्हारा पेट और चूल्हा कहाँ जाएगा?
अभी-अभी बम के धमाको़ से चीख़ उठा है शहर बच्चे, बूढे,जवान खून से लथपथ अनगिनत लाशों का ढेर इस हृदय विदारक वारदात की कहानी कह रहा है
ओह! यह कैसी आजा़दी है जो घोल रही है मेरे और तुम्हारे बीच खौ़फ, आग और विष का धुआँ? हमारे होठों पे थिरकती हंसी को समेटकर दुबक गई है किसी देशद्रोही की जेब में
और हम चुपचाप देख रहे हैं अपने सपनों को अपने महलों को अपनी आकांक्षाओं को बारूद में जलकर राख़ में बदलते हुए.
मेरा यह मानना है मेरा भारत सब दशों से महान है। नहीं है ऐसा कोई अन्य देश, युगों बीतने पर भी वैसा ही है परिवेश, विभिन्नता में एकता के लिए, प्रसिद्ध है हर प्रदेश, प्रेम, अहिंसा, भाईचारे का जो है देता संदेश। मेरा यह मानना है मेरा भारत सब देशों से महान है। ऋषि-मुनियों की जो है तपोभूमि, कई नदियों से भरी है ये पुण्य भूमि, प्रकृति का है मस्त नजारा यहाँ, छोड़ इसे जाए हम और अब कहाँ मेरा यह मानना है मेरा भारत सब देशों से महान है, जाति, धर्म का है जहाँ अनूठा संगम, देशभक्ति की लहर में, भूल जाते सब गम, देश के लिए मर मिटने को सब है तैयार, अरे दुनिया वालों, हम है बहुत होशियार, न छेड़ो हमें, कासर नहीं है हम खबरदार, अपनी माँ को बचाने, लेगें हम भी हथियार। मेरा यह मानना है मेरा भारत सब देशों से महान है
१५ अगस्त १९४७ में भारत का पानी चमक उठा व्यापक विप्लव मुख मुद्रा पर अनल यज्ञ सा दमक उठा जननी बोली पुत्रों जागों समय गया सब सोने में रवि दावानल सुलग गया भारत के कोने -कोने में कायर जीवन जीवन क्या है लगा भाल पर ले रोली सैनिक आगे बढ़कर कर दे इस जीवन की तू होली बंगाल जगा पंजाब उठा ,उठ सैनिक दल ललकार उठे भारत के विशुधर काले भर मस्ती में फुफकार उठे देश वही है ,गौरवशाली जिसमें नाहर बसते हैं फांसी पर चढ़ने से पहले एक बार जो हस्ते हों आज हो गया देश आजाद देकर खुशहाली हो चले गए इस खुशहाली को रखना है कायम चाहे फिर से एक बार होना पड़े न्योछावेर आओ आज करें एक प्रतिज्ञान देश के मान ओउर अभिमान की हम करेंगे सुरक्षा १५ आगस्त सैन्तालिश को जो तिरंगा लहराया है वही तिरंगा लाल किले पर फहरा है फहराएंगे जय हिंद
विश्व एकता के सम्मुख ना सोचो अपने प्राण की। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।
तम को धर से दूर करो अब पट खोलो किवाड़ की। सीमाओं को खत्म करो अब बात करो ना बाड़ की।। ना हो विषमता ना हो बन्धन ना हो सीमायें जिसमें। मिल जुल कर प्रयास करो उस नव युग के निर्माण की।।
बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।
अब तो त्याग करो श्रंखला विजयों के अभियान की। ध्वनियां तुम तक भी पहुचेगी मानवता के गान की।। साथ हमारे अगर तुम्हे भी शान्ति दूत बन पाना है, बन्द करो अब पूजा तुम भी भाले और कृपाण की।। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।। अहंकार को छोड़ो कुछ ना कीमत है अभिमान की। हिल मिल कर अब तुम भी सोचो मानव के सम्मान की।। लालच में तुम फंसे रहोगे ना इसमें कुछ रक्खा है, कोशिश करके देखो राहें पाओगे निर्वाण की।। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।
नहीं सुनाओ अब तुम गाथा मानव के संहार की। दिल में ज्योति जलाओ तुम भी प्यार भरे संसार की।। जब तुमको है ये लगता सब जीवन एक समान है, फिर क्यों अलग उपाय हो करते अपने जीवन त्राण की।। बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।
करेंगे एक और संघर्ष आओ करें संकल्प इस स्वाधीनता दिवस पर, करेंगे एक और संघर्ष पाने को स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से जिसने जगह बनाई है स्कूल से लेकर संसद तक में अधिकारी शिकायतकर्ता का ही करते हैं उत्पीड़न दौलत जुटाते हैं करके पड़पीड़न केवल काम नहीं चलेगा झण्डा फहराने से कब तक काम कराते रहोगे नजराने से जिस स्वतंत्रता की खातिर दिए थे प्राण जांबाजों ने आज उसी देश को लूट लिया झूठ को कला समझने वाले कलाबाजों ने आओ हम हाथ मिलायें, अनुशासन की जंजीरों को भी चटकायें भ्रष्ट अधिकारी हो या नेता, या फिर उनका हो प्रणेता, कानून तो उनकी मुठ्ठी में है, सच्चा कानून तो जन-हित है, जिसकी खातिर तोड़कर सारी जंजीरे आओ उनको मजा चखाये स्वाधीनता को बचाना है तो भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम चलायें उन्होंने स्वतंत्रता की वेदी पर किये थे प्राण निछावर अपने स्वार्थों को छोड़ कोई भी मूल्य चुकाने को होना होगा तैयार तभी हम स्वतंत्रता के होंगे सच्चे हकदार अन्यथा यह नाटक है बेकार आओ करें संकल्प इस स्वाधीनता दिवस पर, करेंगे एक और संघर्ष पाने को स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से।
दरिया में बहा दो रंजिश सब अब अमन की कुछ बात हो जाये मेरे देश में खुशहाली हो बस इत्मिनान से मुलाकात हो जाये एक अनोखी ख्वाहिश सी सजी जमीन है फ़ुर्सत से अब माटी के पहलू से कुछ नई फ़सल-सौगात हो जाये जब सारे अरमान देख लिये क्यों अपने प्यारे खफ़ा हुए आज मिली आज़ादी में फ़िर ईद-मिलन दस्तूर हो जाये मैं सब्र में आज डूबा हूँ कुछ दूर चलके रोया हूँ वजूद को अपने ढूँढू हर दम मैं फ़िर कहीं जाके खोया हूँ
रेत के घरोंदो को छोड़ो अब टूटे सपनों को खोजो मेरे साथ चलो,नई आवाज़ लिये आज फिर एक ख्वाब एक उम्मीद हो जाये..
हमको प्यारा है भारत, हमारा वतन सारी दुनियां का सबसे सुहाना चमन। हम है पंछी, ये गुलषन यहॉ बैठ मन चैन पाता, सजाता नये नित सपन ।। इसकी माटी में खुषबू है, एक आब है जैसा कष्मीर दो-आब, पंजाब है। सारी धरती उगलती है सोना रतन सब भरे खेत-खलिहान, मैदान वन।। आदमी में मोहब्बल है, इन्साफ है खुली बातें है, जजबा है, दिल साफ है। मन हिमालय से ऊंचा, जो छूता गगन चाहते दिल से सब अंजुमन में अमन।। पंछियों की भले हों कई टोलियॉं रूप रंग मिलते-जुलते है औं बोलियॉं फितरतों में फरक फिर भी है एक मन सबको प्यारा है खुद से भी ज्यादा चमन।। क्यारियॉं भी यहॉं है कई रंग की जिनमें किसमें है फूलों के हर रंग की एकता ममता समता की ले पर चलन सबमें बहता मलय का सुगंधित पवन।। इसकी तहजीब का कोई सानी नहीं जो पुरानी है फिर भी पुरानी नहीं मुबारिक यहॉं का ईद-होली मिलन इसकी शोभा यही है ये गंगोजमन।।
युग बदल गया और फ़िर चरखे का चक्र चला ,फ़िर काला शासन ढकने चला श्वेत खादी खूंखार शासको की खूनी तलवारों से ,बापू ने हंसकर मांगी अपनी आजादी जो चरण चल पड़े आजादी की राहों पर,वो रुके न क्षणभर ,धुप,धुआं,अंगारों से उठ गया तिरंगा एक बार जिसके कर में,वो झुका न तिल भर गोली की बौछारों से
इसीलिए ध्वजा पर पुष्प चढाने से पहले , तुम शीश चढ़ने वालों का सम्मान करो II आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए , आजादी के परवानो का सम्मान करो
कितने बिस्मिल ,आजाद सरीखे सेनानी ,इस पुण्य पर्व से पहले ही बलिदान हुए जब अवध और झाँसी पे थे गोले बरसे ,तो मन्दिर ,मस्जिद साथ- साथ वीरान हुए जलियांबाग में जिनका नरसंहार हुआ ,वो इसी तिरंगे को फहराने आए थे जिनके प्रदीप बुझ गए गए अधूरी पूजा में,वो इसी निशा में ज्योत जलाने आए थे
तलवार उठाने से पहले तुम इसीलिए मिट जाने वालों का गौरव गान करो || आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए , आजादी के परवानो का सम्मान करो||
दलितों को मिला स्वराज्य इसी स्वर्णिम क्षण में,सदियों से खोया भारत ने गौरव पाया कट गयी इसी दिन माँ की लौह श्रृंखलाएं,पीड़ित जनता ने फ़िर से सिंहांसन पाया १५ अगस्त है नेता जी का मधुर स्वप्न ,बापू के अमर दीप की गायक वीणा है अंधियारे भारत का ये है सौभाग्य सूर्य , माँ के माथे का सुंदर श्याम नगीना है इसलिए आज मन्दिर जाने से पहले ,तुम राष्ट्र ध्वज के नीचे जन गन गान करो आरती सजाने से पहले तुम इसीलिए ,आजादी के परवानो का सम्मान करो......
सन '५६ में जन्मी आज की युवा पीढी पराधीनताओं की कुंठाओं तथा सभी वास्तविकताओं से अनभिज्ञ ही है हमारी विचार धाराएं एवं स्मृतियाँ स्वतंत्रता को केवल ध्वजारोहण के सन्दर्भ में ले सकीं हैं अथवा इससे अधिक देशभक्ति भावनाओं से ओत-प्रोत कुछ क्षण जो समय के साथ साथ या उस से कहीं पहले अपना अस्तित्व खो देते हैं -और जिसके साथ ही समाप्त हो जाता है - सद्भावनाओं से प्रेरित एक ज्वार ज्वार जिसे कभी चन्द्र रूपी देश प्रेम की सौम्यता ने जन्मा था सागर की फेनिल लहरों में खोकर अपने जन्म दाता के अस्तित्व को नकार रहा है सोचता हूँ - हमारा प्रेम , हमारी भावनाएं , इतनी क्षणिक क्यों हैं ? देश प्रेम -हमारी और आपकी वह उपलब्धि है जिस की सुरक्षा हमारी सजग चेतना का प्रतीक है हमें सजग रहना होगा तभी हम विरासत के इस ऋण से मुक्त रह सकेंगे इस महान स्वतंत्र युग का श्रेय हमारे गौरवपूर्ण इतिहास एवं इसमें जीवंत प्रत्येक कर्मठ मानव को है जो इस भावना के प्रति सदैव क्रियाशील रहा.
गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे || सभी मनाते पर्व देश का आज़ादी की वर्षगांठ है | वक्त है बीता धीरे धीरे साल एक और साठ है || बहे पवन परचम फहराता याद जिलाता जीत रे | गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे || जनता सोचे किंतु आज भी क्या वाकई आजाद हैं | भूले मानस को दिलवाते नेता इसकी याद हैं || मंहगाई की मारी जनता भूल गई ये जीत रे | गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे || हमने पाई थी आज़ादी लौट गए अँगरेज़ हैं | किंतु पीडा बंटवारे की दिल में अब भी तेज़ है || भाई हमारा हुआ पड़ोसी भूले सारी प्रीत रे | गली गली में बजते देखे आज़ादी के गीत रे | जगह जगह झंडे फहराते यही पर्व की रीत रे ||
खादी धोती खादी कुर्ता खादी रुमाल, खादी झोला खादी टोपी रौबदार चाल, बीच बाज़ार घूम रहे थे चाचाजी क्रांतीकारी, पहुँचे मिठाई की दुकान पर जब भुख लगी भारी, डाँट कर बोले- ये तुम मिठाई बना रहे हो ? कुछ खुद खा रहे हो कुछ मक्खियों को खिला रहे हो । . हलवाई - जब रहे आप लोगों की दुआएँ तो क्यों ना हम मिठाई खाए, और ये मक्खियाँ तो स्वतंत्र देश के प्राणी आजाद हैं, ईनके मिठाईयों पर बैठने से इनका और भी बढ जाता स्वाद है, तो आप हीं बताइए इसमें मेरा या फिर मक्खियों का क्या अपराध है, इससे पता चलता है कि मिठाईयाँ अच्छी बनी है, आप आए मेरे दुकान पर किस्मत के धनी है । . ये देखिए ये जलेबी ये बर्फ़ी ये लड्डू और ये रसमलाई है, तो कहिए जनाब क्या देख कर आपकी लार टपक आई है , बोले इसमें सबसे सस्ती कौन है, जनाब जलेबी पहले तो इसे गोल गोल घुमाओ , और खौलते तेल में पकाओ, फिर चासनी में डुबा-डुबा के निकालो औए मज़ा लेते जाओ , तभी टपक पड़ी चाचाजी की लार, और सारी जलेबियाँ हो गई बेकार । हलवाई बोला- अब तो आपको हीं सारी जलेबियाँ खानी पड़ेंगी, अगर ना खा पाए तो दो्गुनी किमत चुकानी पड़ेगी, क्योंकि अगर ना खा पाए तो यह राष्ट्रिय़ मिठाई का अपमान होगा, आपका दुगना भुगतान देश के प्रति छोटा सा बलिदान होगा। जैसे हीं उन्होने एक जलेबी चबाई, दाँतों तले से करकराहट की आवाज़ आई, बोले इसमें तो आ रहा मिट्टी का स्वाद है । . हलवाई-वाह क्या बात है, आप जैसे लोगो को हीं आ सकती जलेबी में देश की मिट्टी की महक है, तभी तो आपकी आँखो में आ गई नयी चमक है, सोचने लगे बेस्वाद जलेबी आखिर ठूसे तो कितना ठूसे, देश भक्ती का चोला भी पहने रहे व धन से नाता भी ना टूटे, मर के खाए और खा खा के मरे, बहुत बुरे फ़ँसे आखीर करें तो क्या करें । . अंत में एक जलेबी बच गई, सोंचे जलेबी गई अगर अंदर तो प्राण जाएंगे बाहर, देश भक्ती के चक्कर में बेमतलब जाएंगे मर, ईज्जत जाए या धन से नाता टूटे, अब न खाउँगा जलेबी जग रुठे या किस्मत फूटे , भारी मन से दिया दोगुना दाम, और तुरन्त भागे बिना किए विश्राम, मुस्कुरा कर बोला हलवाई, देश के सच्चे देश भक्त को , सत सत प्रणाम सत सत प्रणाम ।