मई महीने का यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता का आयोजन कई मायनों में नया रहा। एक तो यह कि इस महीने रु 5500 तक की पुस्तकें देने की उद्घोषणा की गई। वहीं इसमें 56 प्रतिभागियों ने भाग लिया। इससे पहले फरवरी 2008 की प्रतियोगिता में 58 कवियों ने भाग लिया था। सुखद बात यह भी रही कि इस अंक में बहुत से कवियों ने पहली बार भाग लिया।
इस नाते हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ी कि हम अच्छी कविताओं का चयन कर पायें। यूनिकविता के स्तर की 10 कविताएँ चुन पायें। हिन्द-युग्म कहता आया है कि शीर्ष 10 कविताओं का स्थान निर्धारण इसके लिए बहुत मुश्किल होता है। इस बार इसी तरह की मुश्किल तब आई जब प्रथम तथा दूसरे स्थान की कविताओं का प्राप्तांक लगभग बराबर हो गया। इस बार कुल 8 जजों से निर्णय कराया गया। पहले चरण में 4 जज और अंतिम चरण में भी चार जज रखे गये। पहले चरण से 32 कविताओं को चुनकर अंतिम चरण के निर्णायकों को भेजा गया। अंतिम चरण के निर्णायकों द्वारा दिये गये अंकों के साथ पिछले चरण के औसत अंकों को भी जोड़ा जाता है और यह महा-औसत निकालकर कविताओं का स्थान निर्धारण किया जाता है। ग़ौरतलब है कि किसी भी जज को न तो दूसरे जज के बारे में कुछ ज्ञात होता है और नहीं रचनाओं के रचनाकार के बारे में ही।
इस प्रकार जब अंक तालिका बनाई गई तो शीर्ष 2 कविताओं में बहुत छोटा अंतर था। फिर हमने दोनों चरणों के स्थानों की तुलना करके कवि दिबेन की कविता 'कृष्ण और द्रिपदी' को यूनिकविता चुना। साथ ही साथ यह भी तय किया कि बेशक हम दूसरे स्थान के रचनाकार को पहले स्थान वाला पुरस्कार नहीं दे पायेंगे, लेकिन जून के महीने में ही एक अन्य कविता प्रकाशित करने का अवसर ज़रूर देंगे।
जून माह के विजेता कवि यानी यूनिकवि दिबेन की एक कविता 'मछली रानी' पिछले महीने भी प्रकाशित हो चुकी है।

दिबेन सिंह का परिचय बस इतना है कि 13 अक्टूबर 1955 को मुज़फ़्फ़नगर (उ॰प्र॰) में इनका जन्म हुआ। दिबेन की कहानियों की तीन पुस्तकें, दो उपन्यास तथा कविताओं की एक पुस्तक (काँच के ताजमहल) प्रकाशित हो चुके हैं। एम॰ए॰, एल॰एल॰बी॰ तथा वनस्पति विज्ञान में बी॰एसी॰ की आदि की पढ़ाई कर चुके दिबेन इन दिनों बहादुरगढ़ (हरियाणा) में रहते हैं।
पुरस्कृत कविता- कृष्ण और द्रौपदीतंग अंधेरी बंद कोठरियों में
सिसकती- घुटती रही सुबकियां और
कंठ में दबी चीख,
नहीं रहे कृष्ण भी अब निर्बल के मीत
द्रौपदी का करना अपमान
बन गई दुश्शासन की रोज-रोज की बात
.......और द्रौपदी?
द्रौपदी इस सबकी हो गई अभ्यस्त
क्योंकि उसके पति
बनवास में ही नहीं अब केबिनेट में भी हैं
मैंने भी अपने भीतर बैठे विदुर की हत्या कर दी है
इसके बदले में उन्होंने मुझे दिया है
रोटी का आश्वासन
और मेरी अवैध संतानों को पेंशन
वी आई पी लोगों की
अवैध संतानें वैध करार दे दी गई हैं
तुम कुंती से कह देना
कि कर्ण को नदी में न बहाए।
प्रथम चरण मिला स्थान- तीसरा
द्वितीय चरण मिला स्थान- प्रथम
पुरस्कार और सम्मान- शिवना प्रकाशन, सिहोर (म॰ प्र॰) की ओर से रु 1000 के मूल्य की पुस्तकें तथा
प्रशस्ति-पत्र। जून माह के अन्य दो सोमवारों की कविता प्रकाशित करनवाने का मौका।
इनके अतिरिक्त हम जिन अन्य 9 कवियों की कविताएँ प्रकाशित करेंगे तथा उन्हें हम राकेश खंडेलवाल की पुस्तक 'अंधेरी रात का सूरज' की एक-एक प्रति भेंट करेंगे, उनके नाम हैं-
सत्यप्रसन्न
अखिलेश कुमार श्रीवास्तव
आलोक उपाध्याय 'नज़र इलाहाबादी'
उमेश पंत
मुहम्मद अहसन
रवि मिश्रा
जितेन्द्र दवे
श्यामली त्रिपाठी
निर्मला कपिला
इस बार एक और बात बहुत ध्यान देने वाली है कि जजों को कुछ कविताएँ इतनी पसंद आईं कि उन्होंने उन्हें लगभग बराबर अंक दिये। यही कारण है कि शीर्ष 10 के बाद हमारे पास 10 और ऐसी कविताएँ हैं जिनका औसत प्राप्तांक दशमलव के दूसरे या तीसरे स्थान में कम या अधिक है। इसलिए हम निम्नांकित कवियों की कविताएँ भी प्रकाशित करेंगे।
स्वप्निल कुमार 'आतिश'
ऋतु सरोहा
रवि कांत 'अनमोल'
किरण सिन्धु
अम्बरीष श्रीवास्तव
दीपाली "आब"
प्रदीप वर्मा
संगीता सेठी
मनु "बे-तक्ख्ल्लुस"
उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 30 जून 2009 तक अनयत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।इस बार पाठकों में मोहम्मद अहसन ने हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा, हाँ यह ज़रूर है कि ये देवनागरी में लिखने में हिचकिचाते रहे या यूँ कह लें कि परेशानी महसूस करते रहे। खैर हम इसे अपनी ही असफलता मानेंगे कि अपने यूनिपाठक को देवनागरी टंकण में अभी तक दक्ष न कर सके।
यूनिपाठक- मोहम्मद अहसन
पढ़ने, लिखने, साहित्य, कला, प्रकृति भ्रमण आदि में रुचि रखने वाले मुहम्मद अहसन वर्तमान में भारतीय वन सेवा के लखनऊ क्षेत्र के मुख्य वन संरक्षक हैं। इनका चिंतन प्रकृति, पर्यावरण, प्रेम, जीवन के मूलभूत सत्य, सामाजिक तनाव इत्यादि की अनुभूतियों के साथ मिलकर जहाँ काव्य के रूप में सामने उभर कर आता है वहीं दूसरी ओर वह अनेकों प्रकार के शौक व हॉबियों के बालिक हैं। मूलरूप से बाराबंकी के रहने वाले हैं और अपनी जड़ों पर गर्व अनुभव करते हैं।
पुरस्कार और सम्मान- राकेश खंडेलवाल के कविता-संग्रह
'अधेरी रात का सूरज' की एक प्रति तथा प्रशस्ति-पत्र।
इनके अतिरिक्त
संगीता पुरी ने भी हिन्द-युग्म को खूब पढ़ा। हम इन्हें भी यह पुस्तक भेंट करेंगे।
जो पाठक लगातार पढ़ रहे हैं और यूनिपाठक का पुरस्कार जीत चुके हैं वे वार्षिक हिन्द-युग्म पाठक सम्मान के प्रतिभागी बनते जा रहे हैं। इसलिए पढ़ने में कोई कसर न छोड़ें।
हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें।
मनोज भावुक
डा. अनिल चड्डा
समीर गुप्ता
डॉ.योगेन्द्र मणि
ज्योत्स्ना पाण्डेय
आलोक गौड़
अभिषेक ताम्रकार “अभि”
ममता गुप्ता
मधुछन्दा चक्रवर्ती
शेली खत्री
ओम प्रभाकर भारती
हिमांशु कुमार पाण्डेय
अनु बंसल
मंजू गुप्ता
केशव कुमार कर्ण
गौरव शर्मा 'लम्स'
पूजा अनिल
सौरभ कुमार
पृथ्वीपाल रावत
संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
सोनिया उपाध्याय
शारदा अरोरा
अजय कुमार उपाध्याय
सुधीर परवाना "बेजान"
तरुण सोनी तन्वीर
स्तुति नारायण
अजित गुप्ता
डॉ॰ संजय अग्रवाल
शन्नो
सीमा सिंघल
राजेश बिस्सा
स्वरन सरीन
दिनेश "दर्द"
संजय सेन सागर
कुलदीप यादव
धीरेन्द्र सिंह
जितेन्द्र कुमार दीक्षित
फ़कीर मो॰ घोसी