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कहाँ होंगे ललतू गोंड़


युवा कवि रामजी यादव अपनी कविताओं में अपने पूर आक्रोश और ज़मीनी चेतना के साथ उपस्थित होते हैं। कविता को अपना हथियार समझने वाले रामजी अपनी कविताओं में लगातार उन वर्गों, विषयों, लोगों को छूते हैं जो कवियों-लेखकों के लिए कभी विषय नहीं बन पाये और बने भी तो अपनी पूरी जीवटता और त्रासदी के साथ पेश नहीं हो पाये। प्रस्तुत कविता ललतू गोंड़ भी एक प्रतीक है साज़िश के शिकार लाखों पथरकटों, मज़दूरों और हाशिये पर ठेल दिये गये शोषितों का। ललतू गोंड़ कविता अपने हर विस्तार और संकुचन में समाज की व्यवस्था से सीधा सवाल करती है। ऐसी कविताओं से आप बाँसुरी का मीठा स्वर नहीं पा सकते बल्कि इतिहास में सर्वहारों द्वारा चले कुदालों, छेनी-हथौड़ों का चीत्कार हमारे कानों में पिघलता है।

कहाँ होंगे ललतू गोंड़

अठारह साल से नहीं जानता
अठारह साल से और पीछे अठारह साल
दीखते थे ललतू गोंड़ दूर से
जब कभी आते थे सील कूटने

साढ़े चार फुट की सांवली धज
केश छोड़ गए थे कपार
बस रह गए थे खोपड़ी के किनारे पर
जैसे कटहल कोई हथेली पर
छिला जाता हुआ कड़ुआ तेल से चमकता रहता
पेशानी याद है लाल्तू गोंड़ की
मोटी-मोटी नसें और बल से फूली हुई
एक जगह ठीहा जमाकर बैठ जाते थे ललतू
घर-घर से सिलें और लोढ़े हो जाते थे जमा

दादी, माँ, बुआ, चाची या कोई और
लिए कटोरा भर तरकारी और
जौ, बाजरा या मकई की कई रोटियां
रख जातीं ललतू गोंड़ के पास
और चच्चा कहते ---पाओ बुढ़ऊ खोराकी
निकालो छेनी--हथौड़ी भर जोर
फांको पसर भर सुर्ती


ललतू गोंड़ गरिआने लगते चच्चा को
वे चच्चा के चच्चा थे पद में
यह हरित क्रांति से पहले की बात थी
तब हमारे खेतों में गेहूं नहीं बोया जाता था

यह आदमी के पसीने और परिश्रम से
पत्थर के रिश्ते की बात थी
यह उस लय की बात थी जो संगीत की तरह उठती
और चिन्गारिओं की तरह चमकती
यह उस आवेग और कविता की बात थी
जो सिल पर बिंदियाँ बनाती जाती थी लगातार
और शब्द निकलते थे ललतू गोंड़ की हंफरी के रूप में

उस दोपहरी में सारीं सिलों से पत्थर की गंध निकलती
और फैल जाती वातावरण में
जैसे फैली होती है धूल, गरीबी और तकलीफ
पथरकटों के जीवन के आर-पार
जैसे पसरी रहती है घृणा जातिसमाजों में
और रिसती रहती है लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी

जहाँ बिजली न पहुँची होगी
और एक भी घर में नहीं होगी
मिक्सी
जहाँ दाल होगी सम्पन्नता की निशानी
और पुदीना अमलोल धनिया मिर्ची
अधपके टमाटर या आम की गुठली की चटनी भी
बहुत मुश्किल से मयस्सर होगी
जीवन चलाने के लिए
क्या वहाँ अब भी होंगे ललतू गोंड़?

क्या अपने असंतोष को पी गये होंगे
बीड़ी की तरह
खा गये होंगे इच्छाएँ
जैसे मक्के की रोटी खाते थे चाव से
क्या उनके जीवन की सारी पगडंडियाँ
गईं होंगी सिर्फ़ पत्थरों की ओर
और भाषा में महज़ पहाड़ से टकराने के शब्द होंगे
भारत के किस भूगोल में होंगे ललतू?

मैं लगातार सोचता हूँ कि
गोंडा या गोंडवाना से
क्या रिश्ता हो सकता है ललतू का
अगर ब्रह्मा से नाता है ब्राह्मणों का
क्या ललतू गोंड़ की रियासत थी गोंडा
और गोंडवाना की गद्‍दी पर बैठी थी
उनकी परनानी की भतीजी
गोंदिया में कितनी ज़मीन थी ललतू की

ललतू गोंड़ का राज्य कैसे छिन गया उनसे
और छेनी-हथौड़ी आई हाथ में
पत्थर से निकलीं चिंगारियाँ या घट्ठे बन गए
उनका सत्य
एक सम्मानित नागरिक से शूद्र
और स्वतंत्र मनुष्य से सर्वहारा होने तक
कितने किलोमीटर तक चला होगा इतिहास
टूटी होगी कितनी तलवारें
गढ़ा गया होगा कितना झूठ

क्या इसीलिए इतिहास में मिलते हैं
केवल लुटेरों के नाम
कि सच कहने की हिम्मत नहीं थी इतिहासकारों में
क्यों नहीं दर्ज़ हुआ ललतू गोंड़ का नाम इतिहास में

कहीं हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सोमनाथ, खजुराहो
अजंता और कोणार्क को
रचा तो नहीं था उन्होंने ही
और मेहनताने में उन्हें दे दिया नगर निकाला
क्यों मौन है इतिहास

ब्राह्मणों की दरिद्रता और गरीबी से तकलीफ़ग्रस्त
मेरे समय के प्रखर विद्वानों के पैमाने पर
कहाँ मौज़ूद होंगे ललतू गोंड़

जो आरक्षण को महदूद करना चाहते हैं
दस-बीस वर्ष
क्या उन्हें पता होगा
कि ललतू गोंड़ के घर से कोई बच्चा
जाता होगा कि नहीं
सुबह-सुबह स्कूल

क्या आरक्षण की मलाई खाने वाले
यह बता सकते हैं
कि उनके एजेंडे में कहाँ होंगे
ललतू गोंड़।।

एक पलड़े में 80 फीसदी हिन्दुस्तान तो दूसरे में 20 प्रतिशत


युवा कवि अवनीश गौतम ने 'आज़ादी के साठ बरस' कविता के माध्यम से हिन्दुस्तान की त्रासदी की जो तस्वीर खींची थी, एक ऐसी ही और उससे भी अधिक भयावह तस्वीर रामजी यादव की प्रस्तुत कविता के माध्यम से-

न्याय की देवी

तुम बैठती क्यों नहीं हो न्याय की देवी!
मैं देख रहा हूँ तुम्हारे हाथ में थमा हुआ तराजू
तुम्हें पीड़ा पहुँचा रहा है
तुम्हारे चेहरे पर स्पष्ट झलकती है थकन
फिर भी तुम बैठना क्यों नहीं चाहती
आखिर क्या विवशता है

इस देश का हर संवेदनशील आदमी
यहाँ रहते हुए शर्मिंदा होने को विवश है
आखिर तुम क्यों नहीं शर्मिदा हो पा रही हो

माना कि तुम्हारी आँख पर बाँध दी गई है पट्टी
लेकिन तुम्हारे कान तो खुले हुए हैं
जिनमें हत्या, बलात्कार और आगजनी से पीड़ितों की चीखें
कराहें और सिसकियाँ तो पड़ती होंगी
याकि तुम भी यह मान चुकी हो कि यह सब होने के लिए है

न्याय की देवी!
गाँधारी ने भी बाँध ली थी पट्टी
अंधे पति की विवशता से घबराकर
या अपने पुत्रों के अन्याय से आँख बचाने हेतु
जिन पर इतनी ममता थी गाँधारी को
कि अन्याय के प्रतीक पुत्र को वज्र-सी काया दे दी


लोग तुम्हें एक औरत की तरह संवेदनशील मानते हैं
और तुम मुट्ठी भर लोगों के हाथ का खिलौना हो
यह किसकी त्रासदी है

इस सदी के बीतने से पहले ही ओरत ने
अपनी मुक्‌ति की घोषणा कर दी है
वह उन विशेषणों को नोच कर फेंक रही है
जो उसके स्त्रीपन को हरने के औजार थे
उसने यह सच मान लिया
कि सृजन से पहले
अभी बहुत कुछ ध्वस्त करना ज़रूरी है
लेकिन तुम इतनी जड़ हो चुकी हो कि अपनी आँख की
पट्टी तक खोलने को अशक्त हो

क्या तुम देखना नहीं चाहती हो न्याय की देवी!
कि न्यायमूर्ति से लेकर सिपाही तक
हर तरह का जरायमपेशा फ़र्ज़ के नाम पर करते जा रहे हैं
वे जनाते हैं कि कौन डाकू है
किसने किया बलात्कार और कौन जेब काट रहा है सरेआम
वे सबकुछ देख रहे हैं
कौन किसकी हत्या कर रहा है
और कौन रास्ता बताने के नाम पर आँखों में धूल झोंक रहा है
तुम्हारी तरह उनकी आँखों पर पट्टी नहीं बँधी है
बल्कि कइयों ने पावर के चश्मे तक लगा रखे हैं
फिर भी वे तुम्हारे अंधेपन का सहारा लेकर
सबूत जुटाने का ढोंग कर रहे हैं

क्या मतलब है!
उनके सबकुछ जानते हुए अनजान बने रहने का
और तुम्हारा आँख पर पट्टी बाँधे खड़ी रहने का

वे भी सबकुछ जानते थे
जिन्होंने यह संविधान बनाया जिसकी ओट में तुम खड़ी हो
कि अस्सी फ़ीसदी हिन्दुस्तान बड़ा गरीब देश है
और उसके पास रोटी, रोशनी और रिहायश नहीं है
जिसे पाने में बीस फ़ीसदी हिन्दुस्तान बाधा की तरह
खड़ा रहेगा उसके सामने
अब न्याय और आदमियत का यही तकाज़ा है कि
बीस हिन्दुस्तान का अस्तित्व मिटा दिया जाय
निकाल दिया जाय जैसे कैंसरग्रस्त हिस्सों को निकाला जाता है शरीर से
ताकि एक पूरा हिन्दुस्तान बन सके

लेकिन उन्होंने अस्सी फ़ीसदी हिन्दुस्तान को
कुत्ता बनाकर रखने के कायदे रचे
ऐसे बंदोबस्त किए कि अस्सी फीसदी हिन्दुस्तान
की रीढ़ दुहरी रहे हमेशा
और बीस फ़ीसदी की ख़ुशहाली के पौधे लगाये उन्होंने
उन्होंने बीस फीसदी लोगों को अधिकार दिया कि वे
अस्सी फ़ीसदी हिन्दुस्तान पर गोलियाँ चला सकते हैं
उन्होंने ही तुम्हारी आँख पर पट्टी बाँधकर
बीस फ़ीसदी हिन्दुस्तान की सेवा में सौंप दिया था

न्याय की देवी!
स्त्रियाँ अब जाग रही हैं
मुक्ति के गीतों में सुरे-बेसुरे ढंग से शामिल हो रही हैं वें
जान गई हैं वें कि
सृजन से पहले बहुत कुछ ध्वस्त करना है ज़रूरी
कि सुरों की तराश से ज्यादा ज़रूरी है गले की ताक़त
दिलों का दर्द, नारों की समझ
और उठने, चलने की बेचैनी
तब तुम्हारी ओर निगाहें उठना स्वभाविक है

न्याय की देवी!
कुछ कहना पड़ेगा तुम्हें अब
वरना दो स्तनों और एक योनि लेकर पैदा हुई
जीवन भर लुटेरों और आदमखोरों के हाथों प्रताड़ित
स्त्री के नाम पर कलंक मानी जाओगी तुम।

बकलोल और हँसलोल महँगी


हिन्दी कविताओं में गाँव सहज रूप से बहुत कम मौज़ूद दिखता है। शहर की तरफ़ विस्थापित आज के साहित्यकार अपने गाँवों की जो तस्वीर, जो संवेदनाएँ और परिवेश खींचते हैं, वह उनके गाँवों का वर्तमान नहीं, बल्कि उनके बचपन के गाँव हैं। अतः हमारी कलमों से भारत की आत्मा के बहुत से सोये तथा जगे लोग बच जाते हैं। परंतु रामजी यादव की कविताओं में ये ही पात्र के रूप में शामिल हैं।

महँगी

किसी के श्राद्ध में नहीं गए महंगी
लेकिन हर जात-धरम के प्यासे तपे पैदल पंड़हरु को
अपने लोटे से पानी पिलाया
और एक भेली गुड़ भी दिया
हाल-चाल पूछा हँसकर सुर्ती मलते हुए
फिर बढ़ा दिया हथेली और बची तो खुद फाँक गए

जिये बिना पत्थर के और फूल की ज़रूरत न थी
महँगी ने जीवन में कभी राम का नाम न लिया
अल्लाह की ज़रूरत न पढ़ी
और वाहे गुरु के बारे में जानते न थे
जो दावा करता है
कि एक ओंकार करता-पुरख निर्भय निर्बेर को
मेरी नज़र से देखो मैं ही जानता हूँ उसे

महँगी चराते थे बकरियाँ
और मज़ाक ज़रूर करते थे
आते-जाते लोगों से
किसी का भारी बोझ देखते तो
उतारकर सुस्ताने को कहते थे
एक लोटा पानी और गुड़ भी थमाने को तत्पर थे

ज़रूर किसी दिन
ईसा मसीह अपना सलीब लिए जाते दिखते उधर से
तो महंगी उसे उतरवा देते
और गुड़ पेश करते कि
लो भाई खाओ, पियो पानी और
इस लकड़ी को बनाओ किसी मुफलिस की
झोंपड़ी का थून्ह-बंड़ेरा
बहुत हो गया- कहाँ-कहाँ लेकर फिरोगे
अब कुछ बात करो, बताओं तुम्हें दुनिया में कोई चाहता है?
और हँसने लगते महँगी के साथ बेचारे ईसा मसीह भी
हँसलोल तो इस कदर थे महँगी कि
लगता था हिला देंगे बनारस
बतियाते ऐसे भोले भाव से कि पक्के बकलोल हों

नब्बे साल की चन्नर की माई
रोती मिलीं एक दिन
कहते हुए दुख कि एक टुकड़ा रोटी नहीं है मेरे लिए
आज अपाढ़ (बोझ) हो गई हूँ मैं बचवा!
महँगी बोले- अरे बुढ़िया! कहाँ कम है रोटी!
कहाँ कम है गुड़! कहाँ कम है पानी!
कम हो गई हैं तो तेरी खुशियाँ
गायब है तेरी हँसी और सबकुछ हो गया छूमंतर

अच्छा चल एक वचन दे अभी
कि रोएगी नहीं कभी भी
एक वादा कर तुरंत और निभा उसे
कि रोई है जीवन भर तुझे दुख मिला था
लेकिन हँसते हुए मरना जब मरना
वादा कर और निभा इसे देख भूलना मत
ले गुड़ खा, पानी पी पेट भर और सुस्ता ले!

और एक दिन हँसी बुढ़िया मंत्रबिद्ध
कि अब रूकूँगी नहीं
बुलावा है मेरे राम का
सुनती हूँ बार-बार आती है आवाज़
जल्दी करो, जल्दी करो

दौड़ पड़े बेटा-बेटी, नाती-पोते
पतोह-नतोह, गोतिया-दयदा
खिलाओ रे बर्फी, पिलाओ रे पानी
माई की इच्छा पूरी करो सब
यह इतना हँसती है जैसे स्वर्ग ही जायेगी सीधे
पूछो-पूछो कि खाने का मन है कुछ
पेड़ा, रसगुल्ला, मालपुआ कि जलेबी!
दाँत तो झर गये ऐसे ही चुभलाएगी

बुढ़िया सिधारी भी तीन माह बाद
और हँसती रही जब तब मौका लगा
जैसे हँसती हो दुनिया के दस्तूर पर
पाखंड पर, निर्मता और दोहरेपन पर हँसती हो
बाकी रहा सामिराज चन्नर का
एक माई नहीं रही बाकी
बाकी रही इज्जत कि
हँसते सिधारी थी माई
बहुत खुश थी!

छोड़ गए भारी दौलत श्यामभूषण सिंह
सो तेरही शानदार हो, शान के मुताबिक हो
जहाँ-तहाँ मिला स्वर्ग का मोखा (छेद)
ठूँसी गई वहीं सामग्री
कपड़े-लत्ते, सिक्के चाँदी के
मोबाइल फोटो वाला पक्के उन्नीस हज़ार का
झर हर-पुरहर महापातर लोटा फटफटिया से
महँगी से बताने लगा श्राद्ध की महिमा

महँगी उबासी ले बोले, पंडितऊ!
स्वर्ग में हिया से माल! तोशक, तकिया, रजाई
गद्दा, खटिया, मचिया, अनवन जिनिस
तो हियाँ का दिक्कत रही शमभूषणा के?
बैकुंठ में ई मामूली जिनिस भी नहीं है
भिखमंगे की झोपड़ी है क्या बैकुंठ!
हुआं से बार-बार करेगा मोबाइल मँगाएगा रुपया
तो ले क्यों न गया दो-चार लाख
हुआं बैंक भी नहीं है क्या
और टॉवर न होगा तो कैसे पकड़ेगा मोबाइल?
जवाब नहीं बना महापातर से तो एक्सीलेटर दबाया जोर से

महँगी और जोर से हँसे - जहाँ खटिया न हो
बिस्तर न हो, चावल यहीं से भिजवाना हो
उस बैकुंठ काहे जाऊँगा मैं
उससे अच्छा तो यहीं हूँ
चराता रहूँगा बकरियाँ।

कवि- रामजी यादव

गिद्धः मिलेंगे कहाँ और बैठेंगे कहाँ- सोचने की बात है


आज पूरी दुनिया पर्यावरण दिवस मना रही है। यह दिवस प्रत्येक वर्ष 5 जून को 1972 से लगातार पर्यावरण के प्रति सजग रहने के लिए मनाया जाता है। भारत में गिद्ध पक्षी का विशेष तरह का पर्यावरणीय महत्व रहा है। पिछले 5-6 वर्षों से उन्हें कहीं देखा गया हो, यह भी कह पाना मुश्किल हो रहा है। यह पूरी दुनिया के पर्यावरण के लिए बहुत अच्छे लक्षण नहीं हैं। आज हम तीन कविताओं के माध्यम से गिद्धों के विलुप्त होने पर बुद्धिजीवियों की चिंता आपके समक्ष लेकर उपस्थित हैं।

पिछले सप्ताह से आप रामजी यादव की कविताएँ पढ़ रहे हैं। रामजी का गिद्धों से बचपन का याराना था। इनकी बाल-स्मृतियों में गिद्ध उसी तरह से समाये हैं, जैसे कि रोज़ का खाना और सोना। रामजी गिद्धों के गायब होने को हमारी सभ्यता पर एक प्रश्नचिह्न मानते हैं।

गिद्ध

मैंने गिद्धों से हमेशा प्यार किया
और भूल गया कि वे खतरे में हैं

जब भी किसी के
ठहाके की लय का अवरोह सुनता हूँ
बार-बार मुझे गिद्ध याद आते हैं
जैसे खाकर अघाये हों वो
और प्रेमालाप के लिए फुर्सत चाहते हों

मेरी नानी के द्वार पर खड़ा
यह विशाल पीपल वृक्ष
अब खो चुका है अपनी हरीतिमा
जैसे गिद्धों ने अपना अस्तित्व खो दिया है
इतना बीड़र है यह पीपल आज कि
एक-एक टहनी गिन सकता हूँ
लेकिन एक भी निशान बाकी नहीं है गिद्धों का

मेरी स्मृतियों में नानी के प्यार की तरह सुरक्षित है
यह (वह) विशाल हरा-भरा पीपल
जब बसंत आता था तो झर जाते थे बूढ़े पत्ते
और कल्ले फूटते थे नए-नए
निकलती जाती थीं ललछौंह पत्तियाँ

छत पर चादर में मुँह डुबाए हम
ढकेल देना चाहते थे सुबह को थोड़ा और पीछे
चिल्लाती थी नानी- उठो रे सौं
करो दतुअन-कुल्ला, देखो कहाँ आया घाम
तब चादर हम और तान लेते थे
कि लो! हम गहरी नींद में हैं
पर धूप तो धूप है नींद में घुस जाती थी
और आप से आप सरक जाती थी चादर गर्दन के नीचे
और दिखाई पड़ता था पीपल जैसे रेखिया उठान
कोई नौजवान खड़ा हो

नई-नई पत्तियों पर रेंगती और फिसलती थी धूप
और संकोच से सेनुराभ हो उठती थीं पत्तियाँ
आह! वहीं पर देखा मैंने सौन्दर्य
उन्हीं से जाना फिदा होना
वहीं से सीखा कि प्यार में रंग फना हो जाता है दोनों का

ऊपर आराम फरमाते जटायु और संपाती के नात-नतेरुआ
हम मिचमिचाते हुए आँखें पूरे होश में आने से
पहले बरबराते
ससुर ई अबहीं लोग हियां बैठे के मुजरा लेते हैं
कि तभी दो डैने पसरते हवा में
और काँप उठता वायुमंडल
फिर एक और ज़रा ऊँचा उड़ता हुआ फिर एक और..........
हम गिनते थे गिद्धों को और शाम को मिलाते थे गिनती
कोई नया आता तो हम उसे पाहुन समझते

गायब हो गये हैं गिद्ध एक-एक कर
जैसे गायब हो गये हैं
मेरे जीवन के भोले और सुन्दर दिन
जैसे गायब हुई चली जाती है जवानी
लेकिन बुढ़ापे की तरह भी कहीं आते नहीं दिखते गिद्ध
अकबका गया हूँ जैसे किसी हाइवे पर
कोई ज़रूरी चीज़ खो आया हूँ दूर कहीं

गायब हो गए हैं गिद्ध
अब डरता हूँ किसी को गाली देने से
अचक्के में किसी धूर्त और मक्कार को कहीं गिद्ध न कह बैठूँ
डरता हूँ कि कोई चालाक गिद्ध की तरह न लग जाय
यह सरासर अपमान होगा गिद्धों का
गायब हो गए हैं गिद्ध कि अब
उदाहरण भी अकेला और उदास कर जाते हैं मुझे

डाँटती थी मामी- अरे! बस अढ़ाई फुलके
कैसे चलोगे जिंदगी की हराई
एक बाँव में ही थक जाओगे तुम तो
बिल्कुल गीध की तरह लजाधुर हो बौरहा!
सात-आठ रोटी खा के जब तक न होगे अडड्ड
कैसे बुद्धि बनेगी मजबूत और बुझेगी न्याव-अन्याव
गीध भी तो कटा आया पंखा और लड़कर गिरा धरती पर
कि थाली में एक ओर रोटी डाल देती मामी

क्या लिया गिद्धों ने दुनिया से!
एक मछली तक न खाया चुराकर
न झपट्टा मारा तालाब में
केवल मरे जानवर खाए मिले जहाँ कहीं
जैसे त्याज्य हो बाकी सब
जैसे सहस्राब्दियों ने ओढ़ ली हो जिम्मेदारी
पर्यावरण को साफ रखने की
और इसी में आनंद पाने लगे हों
ऐसे में कहाँ पता रहा होगा कि आदमी का लालच
कितना विषैला हो चुका है?
और अपनी ही प्रतिबद्धता की भेंट
चढ़ते चले गये होंगे एक-एक कर

किसी के चेहरे पर शिकन नहीं देखता हूँ
नहीं पाता हूँ कहीं अपराध बोध
कि मारा है गिद्धों को किसने
सभी छिपा रहे हैं अपने ज़ुर्म
और घाव दिखा रहे हैं एक-दूसरे को अपने
कोई शै है ऐसी जिससे मुँह चुरा रहे हैं सभी
वही कि जिसने सभी को अमानवीय बना छोड़ा है

गिद्धों के सवाल पर लगातार चुप्पी है
चारों तरफ छाई है वीरानी
अनवरत चला आ रहा है सन्नाटा
चारों तरफ पसर रहा है एक क्रंद्रन
लोगों को पता नहीं है प्रकृति रो रही है चुपचाप
हमारी भाषा में नहीं है पीड़ा और संवेदना
हम भूल गये हैं असहमति और तर्क
और जिंदगी के खिलाफ संकीर्ण नज़रिया है सब तरफ

लड़ाई यहाँ से भी शुरू होनी चाहिए।
-रामजी यादव


मोहम्मद अहसन भारतीय वन सेवा में अधिकारी के तौर पर कार्यरत हैं। जंगल, गाँव, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, नदी-पोखर-तालाब से ये उसी तरह से जुड़े रहे हैं जैसे कि आज का बच्चा कम्प्यूटर और वीडियो गेम से। अहसन पर्यावरण के प्रति सजग रहे हैं। इनका एक संग्रह 'मेरी इक्कीस पर्यावरण कविताएँ' प्रकाशित हुआ है, जिसमें पर्यावरण के प्रति इनकी चिंता व्यापक रूप से दिखलाई पड़ती है। अहसन की कविता 'गिद्ध बैठेंगे कहाँ!' में भी सूक्ष्म तौर पर गिद्धों के गायब होने की ही दास्ताँ हैं, कुछ अन्य कारणों के साथ।

गिद्ध बैठेंगे कहाँ!

तनावर दरख्त झुक गए हैं
पेड़ बूढे गिर रहे हैं;
गिद्ध बैठेंगे कहाँ
और घोंसला अब बनेगा कहाँ

जवां पेड़ों की जमा’अत पस्त है
हौसला हैं पर शाखें नहीं हैं
सिर्फ तने ही तने हैं ,
भाव सारे अनमने हैं
मैं सोचता हूँ
गिद्ध अब बैठेंगे कहाँ !

आसमां बंद है
वायु बोझल है
परवाज़ गिद्धों की होगी कहाँ,
परवाज़ के अंत में
गिद्ध उतरें गे कहाँ, और
बैठेंगे कहाँ !

गाँव में अब डंगर मरते नहीं
या मरते ही दफ़्न हो जाते हैं
किस तरह होती है उन की अंतिम क्रिया
इन सवालों के जवाब अब मिलते नहीं
मैं सोचता हूँ
गिद्ध अब खाएंगे क्या, और
बैठेंगे कहाँ !
-मोहम्मद अहसन


इनकी अगली कविता में पर्यावरण के हर बदलाव की तरह इशारा है और समाधान का निर्देश भी है।

क्यों......???

क्यों बादल टूटा
क्यों नद्दी उबली
क्यों गाँव बहे
क्यों धारे पलटे
क्यों भूमि कटी
क्यों खेत बहे

क्यों पर्वत खिसका
क्यों चट्टान धँसी
क्यों गाँव दबा
क्यों सड़क कटी
क्यों लोग फँसे

क्यों धरती काँपी
क्यों गाँव ढहे
क्यों लोग मरे
क्यों श्मशान पटे

क्यों रेत उड़ी
क्यों तूफ़ान उठे
क्यों बंज़र चीखा
क्यों बीहड़ रोया

क्यों मौसम उलझा
क्यों धरती सूखी
क्यों खेत जले
क्यों फ़सल फुँकी
क्यों भूख उगी

क्यों आग लगी
क्यों जंगल सुलगा
क्यों पशु भागे
क्यों धुँवा उठा
क्यों अम्बर तड़पा

क्यों पेड़ कटे
क्यों जंगल सिसका
क्यों सोते सूखे
क्यों खेती बैठी
क्यों बाग़ कटे
क्यों पुरवे उजड़े
क्यों शहर उगा

क्यों झीलें सूखीं
क्यों पंक्षी भागे
क्यों मेढक दुबके
क्यों कछुवे सहमे

क्यों विष बरसा
क्यों मछली तड़पीं
क्यों ज़हर घुला
क्यों गिद्ध मरे

कुछ तुम सोचो !
कुछ मैं सोचूँ !
-मोहम्मद अहसन

फ्रीलांसर का दर्द


पिछली बार रामजी यादव की पिछली कविता में हमने प्रेम की कुछ नई छवियाँ देखी थी। आज मैं उनकी जो कविता आपके लिए लाया हूँ, उसमें आज का समय क़ैद है। इस कविता में दिल्ली जैसे शहर में अपने लिए रोटी, अपनी शर्तों पर जुगाड़ते एक फ्रीलांसर के दर्द कहीं-कहीं कलात्मकता से तो कहीं-कहीं कथात्मकता उजागर हुए है।

'फ्रीलांसर'

फ्रीलांसर होना
विजेताओं के बीच
एक लगातार हारते हुए सैनिक की तरह से गुजरना है।

बचना उतना ही सम्भव है
जितना उस कबूतर का
उस जगह से बच पाना संभव है
जब वह बाजों के बीच से गुजरता है
भागना भी उतना ही संभव है
जितना घर से भाग सकता है कोई घर की तलाश में

घुटने छिले बस यूँ कि
जैसे खीरा छीलता है कोई
और नमक लगाता है अच्छी तरह
लेकिन कहाँ पहुँचा
कहीं इस दिल्ली की भीड़ में
खोपड़ी के नीचे टँकी दो आँखें
और बत्तीस दाँत हैं
सारी दुनिया
वहीं कहीं खो गया हूँ मैं

हर कोई लिए हुए है
सहानुभूति की बर्छी
नफ़रत की ढाल
और लालच की दूरबीन
और ढूँढ़ता है मुझे ही

मैं फ्रीलांसिंग का मतलब
दीवानगी लगाए बैठा हूँ
वे चाहते हैं
एक पॉजीटिव समीक्षा अपने नए संकलन पर
मैं सूली मानता हूँ अपनी मंजिल
वे रम की बोतल को सच समझ बैठे हैं

कितना विपर्यय पसरा है हमारे बीच
कि एक दाना नहीं है
मेरे लिए इस अर्थव्यवस्था में
मंजिल नहीं है कोई
जो अच्छी लगे मुझे
चारों तरफ फैला यह बेशर्म समय
क्या बीतना भूल गया है!

निर्लज्जता की हद तक
साफ है यह आकाश
भर जाएग कभी तारों से
पटी हुई हैं जैसे अकादमियाँ
बोरियत भरे संकलनों, जन विरोधी योजनाओं
और लूट-खसोट की गोपनीय फाइलों से
गंधा रहा है जैसे साहित्य
बूढ़े छिछोरों, झूठों, कायरों, मक्कारों और चापलूसों से

अकेला हूँ वैसे मैं कि
नियति है यह मेरी
जानता था कि फ्रीलांसर होना
पूरी जिंदगी गुजार देना है दोस्त के बगैर

रामजी यादव की प्रेम कविता


जैसाकि मैंने वादा किया था कि मैं समय-समय पर ऐसी कविताओं से भी रूबरू करवाता रहूँगा जो इसी कालखंड में लिखी जा रही हैं, लेकिन उनके रचनाकारों का संबंध इंटरनेट से थोड़ा का कम जुड़ा है। कई बार अपने दृष्टि-फ़लक को फैलाने में इन रचानाओं की भूमिका अहम हो जाती है।

पिछले सप्ताह इस शृंखला में आपने युवा कवयित्री अंजना बख्शी की कविताएँ पढ़ी। हरेप्रकाश उपाध्याय की कविताओं से भी हम हाल में ही जुड़े। ऐसे ही एक कवि हैं रामजी यादव।

13 अगस्त 1963 को वाराणसी में जन्मे रामजी यादव अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी करने के बाद राजनैतिक संगठनों के साथ काम करने लगे। पत्रकारिता का चस्का लगा, दिल्ली आ गये और डाक्यूमेंट्री फिल्मों के निर्माण में जुट गये। 'समय की शिला पे', 'एक औरत की अपनी यादें', 'सफ़रनामा', 'गाँव का आदमी', 'पैर अभी थके नहीं', 'द कास्ट मैटर्स', 'पानीवालियाँ', 'खिड़कियाँ हैं, बैल चाहिए' जैसी उल्लेखनीय वृत्तचित्रों का निर्माण किया। 60 से अधिक असंपादित डाक्यूमेंट्रियाँ बनाई हैं, उसे पूरा करना शेष है। इन दिनों दैनिक भास्कर, नई दुनिया, अमर उजाला जैसे अखबारों के लिए स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। इनकी साहित्यिक यात्रा भी लम्बी है। बहुत सी कहानियाँ कथादेश, हंस, नया ज्ञानोदय जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। 'अथकथा-इतिकथा' नाम का उपन्यास भी पूरा कर लिया है। कविताएँ भी लगातर लिख रहे हैं। आलोचना भी हाथ आजमा चुके हैं।

हिन्द-युग्म पर बहुत सी प्रेम कविताओं को अलग-अलग मौकों पर आप पढ‌़ते आये हैं। प्रेम की एक अलग ही छवि रामजी यादव की 'प्रेम' कविता में आपको देखने को मिलेगी।

'प्रेम'

अक्सर मैं सोचता हूँ क्या ज़रूरत थी
महिवाल को दूर देश से आने की चिनाब की ओर

फरहाद पगले को तस्वीर बनाने को किसने कहा था
शीरीं का
और उसकी आँखों में इस कदर डूब जाने का
कि निकल न सका जीवन भर

आशनाई तो चंद्रमोहन विश्नोई भी करते हैं
पहले चाँद मोहम्मद बन जाते हैं फिर गायब होकर
वही बन जाते है जो थे
और फिजाएँ यूँ ही बदहवास
बदलती रहती हैं रोज़-ब-रोज़

प्रेम एक ऐसा पारदर्शी आकाश है
कि सिर कटाओ तो रंगीन बना देता है
हवा, पानी, धरती, समाज, देश, घर, राजनीति
अर्थव्यवस्था, जंगल, पहाड़, नदी, समुन्दर और भाषा को
नहीं तो संगीन बनते देर नहीं लगती दुनिया
प्रेम में एक बूँद चालाक होकर तो देख लो!

प्रेम तिरोहित होने का नाम है
गोया सभ्यता की ओर बढ़ाते लोग पत्थरों में
बदल गए हों
मनुष्यता के सबक भूलते चले गए हों
याद नहीं रहता सौन्दर्य, राग बेसुरे हुए जाते हों
भंग होती जाती है एकाग्रता
और जीवन में आती-जाती है अलाय-बलाय सामग्री
समझ में नहीं आता कुछ कि क्या मतलब है दुनिया का
इतने अकेले और अलफनंग होते हैं अपने आप में लोग

पहले विचार मरते हैं
फिर वियाग्रा चली आती है दिमाग में
और लोग क्या समझते हैं?
बिंदास होकर कंडोम बोलने से वे
सच के करीब पहुँच जाएँगे?

मैं जानता हूँ वे बहुत दूर
बहुत देर बाद देखेंगे अपने आपको भी
एकदम निराश और कुछ न छोड़ पाने की कुंठा
लिए
तरसते हुए जीवन को पल-पल
न लौटना मुमकिन, न मौत के सामने ठट्ठा
मारने की हिम्मत
इतना कमज़र्फ़, इतना कमज़ोर, इतना लाचार
बनाती हैं सभ्यताएँ

दोस्त! केवल प्रेम खड़ा है ऐसी हर सभ्यता के
खिलाफ़

क्या तुमने बासी रोटी को कुतर-कुतर
खाया है प्रेम में
पानी को आहलाद की तरह पीया है
यूँ हाथ फड़फड़ाकर उड़ जाने के सपने देखे हैं
पहाड़ को दो टुकड़ों में काट देने की हिम्मत
पाई है अपने अंदर
क्या किसी की दो आँखें चमकती हैं तुम्हारी आत्मा में
अगर महरूम हो तुम इन सबसे तो देखना ध्यान से
कहीं तुम्हारे भीतर कोई तालिबानी तो नहीं बैठा है
तुम्हें केसरिया रंग तो नहीं पसंद आता
तुम पीछे तो नहीं भाग रहे शाश्‍वतता के नाम पर
तुम देश को माँ समझते हुए पितृसत्ता का झंडा तो
नहीं उठाए हुए हो

एक बार सोचना चुपचाप
कि प्रेम ही क्यों तोड़ता दीवारें सारी
जाति की, धर्म की, अमीरी की, गरीबी की, रंग की
रूप की, उम्र की, जन्म की, देश की
मटियामेट क्यों कर देता है प्रेम ही हर बार

तुम दाम्पत्य में प्रेम का गेमेक्सीन छिड़कते हो
और सोचते हो कि ठीक हो गया सबकुछ
मर गए नफरत के कीटाणु
लेकिन तुम हद से हद एक चौकन्ने पति हो
सकते हो
ध्यान से देखो
अभी भी तुम्हारी पत्नी को विश्वास नहीं है तुम पर

एक दिन थमाओ उसे एक गिलास पानी
दबाओ उसके पाँव और सहलाओ सिर
और खोल दो जुल्फ़ें
महसूस करो कि तुम सदियों से जानते हो उसे
लेकिन एक संवाद न हुआ अब तक

ठीक है अभी पूछ लो हाल-चाल उसका
हवा के रंग पूछो उससे और क्या वह जानती है
उड़ान के बारे में

पोछा लगाओ ठीक से
ध्यान रखना कोने-अंतरे का
बेसिन में पड़े बर्तन धो दो
यूँ नाक-भौं मत सिकोड़ो
इनमें से ज्यादातर तुम्हारे ही जूठे हैं
और सब्जी ठीक से काटो
भात कच्चे ही मत उतार देना
दूध में नमक न पड़ जाय कहीं

मैं जानता तुम्हारा प्रेम पहुँचेगा किस मुकाम पर
हो सकता है तुम नकली मर्यादाओं के पत्थर ढोते
पुरुष न रह जाओ
हो सकता है वह डरी हुई स्त्री न रहे
प्रेम में इंसान हो जाती है स्त्री

प्रेम में निर्भय होता है समाज
निर्भय होती हैं लड़कियाँ
एक सम्पत्तिशील और बर्बर समाज
भर जाता है रचनात्मकता से
प्रेम में गोल नहीं होतीं आँखें
जैसे छिछोरों और दृश्य रतिकों की होती हैं
प्रेम में रस भर आता है उनमें
और वे भरोसे से दीप्त हो उठती हैं

प्रेम एक मिट्टी है जैसे वह होती है
चाक पर रखे जाने के ठीक पहले।