युवा कवि रामजी यादव अपनी कविताओं में अपने पूर आक्रोश और ज़मीनी चेतना के साथ उपस्थित होते हैं। कविता को अपना हथियार समझने वाले रामजी अपनी कविताओं में लगातार उन वर्गों, विषयों, लोगों को छूते हैं जो कवियों-लेखकों के लिए कभी विषय नहीं बन पाये और बने भी तो अपनी पूरी जीवटता और त्रासदी के साथ पेश नहीं हो पाये। प्रस्तुत कविता ललतू गोंड़ भी एक प्रतीक है साज़िश के शिकार लाखों पथरकटों, मज़दूरों और हाशिये पर ठेल दिये गये शोषितों का। ललतू गोंड़ कविता अपने हर विस्तार और संकुचन में समाज की व्यवस्था से सीधा सवाल करती है। ऐसी कविताओं से आप बाँसुरी का मीठा स्वर नहीं पा सकते बल्कि इतिहास में सर्वहारों द्वारा चले कुदालों, छेनी-हथौड़ों का चीत्कार हमारे कानों में पिघलता है।
कहाँ होंगे ललतू गोंड़
अठारह साल से नहीं जानता
अठारह साल से और पीछे अठारह साल
दीखते थे ललतू गोंड़ दूर से
जब कभी आते थे सील कूटने
साढ़े चार फुट की सांवली धज
केश छोड़ गए थे कपार
बस रह गए थे खोपड़ी के किनारे पर
जैसे कटहल कोई हथेली पर
छिला जाता हुआ कड़ुआ तेल से चमकता रहता
पेशानी याद है लाल्तू गोंड़ की
मोटी-मोटी नसें और बल से फूली हुई
एक जगह ठीहा जमाकर बैठ जाते थे ललतू
घर-घर से सिलें और लोढ़े हो जाते थे जमा
दादी, माँ, बुआ, चाची या कोई और
लिए कटोरा भर तरकारी और
जौ, बाजरा या मकई की कई रोटियां
रख जातीं ललतू गोंड़ के पास
और चच्चा कहते ---पाओ बुढ़ऊ खोराकी
निकालो छेनी--हथौड़ी भर जोर
फांको पसर भर सुर्ती
ललतू गोंड़ गरिआने लगते चच्चा को
वे चच्चा के चच्चा थे पद में
यह हरित क्रांति से पहले की बात थी
तब हमारे खेतों में गेहूं नहीं बोया जाता था
यह आदमी के पसीने और परिश्रम से
पत्थर के रिश्ते की बात थी
यह उस लय की बात थी जो संगीत की तरह उठती
और चिन्गारिओं की तरह चमकती
यह उस आवेग और कविता की बात थी
जो सिल पर बिंदियाँ बनाती जाती थी लगातार
और शब्द निकलते थे ललतू गोंड़ की हंफरी के रूप में
उस दोपहरी में सारीं सिलों से पत्थर की गंध निकलती
और फैल जाती वातावरण में
जैसे फैली होती है धूल, गरीबी और तकलीफ
पथरकटों के जीवन के आर-पार
जैसे पसरी रहती है घृणा जातिसमाजों में
और रिसती रहती है लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी
जहाँ बिजली न पहुँची होगी
और एक भी घर में नहीं होगी
मिक्सी
जहाँ दाल होगी सम्पन्नता की निशानी
और पुदीना अमलोल धनिया मिर्ची
अधपके टमाटर या आम की गुठली की चटनी भी
बहुत मुश्किल से मयस्सर होगी
जीवन चलाने के लिए
क्या वहाँ अब भी होंगे ललतू गोंड़?
क्या अपने असंतोष को पी गये होंगे
बीड़ी की तरह
खा गये होंगे इच्छाएँ
जैसे मक्के की रोटी खाते थे चाव से
क्या उनके जीवन की सारी पगडंडियाँ
गईं होंगी सिर्फ़ पत्थरों की ओर
और भाषा में महज़ पहाड़ से टकराने के शब्द होंगे
भारत के किस भूगोल में होंगे ललतू?
मैं लगातार सोचता हूँ कि
गोंडा या गोंडवाना से
क्या रिश्ता हो सकता है ललतू का
अगर ब्रह्मा से नाता है ब्राह्मणों का
क्या ललतू गोंड़ की रियासत थी गोंडा
और गोंडवाना की गद्दी पर बैठी थी
उनकी परनानी की भतीजी
गोंदिया में कितनी ज़मीन थी ललतू की
ललतू गोंड़ का राज्य कैसे छिन गया उनसे
और छेनी-हथौड़ी आई हाथ में
पत्थर से निकलीं चिंगारियाँ या घट्ठे बन गए
उनका सत्य
एक सम्मानित नागरिक से शूद्र
और स्वतंत्र मनुष्य से सर्वहारा होने तक
कितने किलोमीटर तक चला होगा इतिहास
टूटी होगी कितनी तलवारें
गढ़ा गया होगा कितना झूठ
क्या इसीलिए इतिहास में मिलते हैं
केवल लुटेरों के नाम
कि सच कहने की हिम्मत नहीं थी इतिहासकारों में
क्यों नहीं दर्ज़ हुआ ललतू गोंड़ का नाम इतिहास में
कहीं हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, सोमनाथ, खजुराहो
अजंता और कोणार्क को
रचा तो नहीं था उन्होंने ही
और मेहनताने में उन्हें दे दिया नगर निकाला
क्यों मौन है इतिहास
ब्राह्मणों की दरिद्रता और गरीबी से तकलीफ़ग्रस्त
मेरे समय के प्रखर विद्वानों के पैमाने पर
कहाँ मौज़ूद होंगे ललतू गोंड़
जो आरक्षण को महदूद करना चाहते हैं
दस-बीस वर्ष
क्या उन्हें पता होगा
कि ललतू गोंड़ के घर से कोई बच्चा
जाता होगा कि नहीं
सुबह-सुबह स्कूल
क्या आरक्षण की मलाई खाने वाले
यह बता सकते हैं
कि उनके एजेंडे में कहाँ होंगे
ललतू गोंड़।।




मैंने गिद्धों से हमेशा प्यार किया
तनावर दरख्त झुक गए हैं
13 अगस्त 1963 को वाराणसी में जन्मे रामजी यादव अपनी शिक्षा-दीक्षा पूरी करने के बाद राजनैतिक संगठनों के साथ काम करने लगे। पत्रकारिता का चस्का लगा, दिल्ली आ गये और डाक्यूमेंट्री फिल्मों के निर्माण में जुट गये। 'समय की शिला पे', 'एक औरत की अपनी यादें', 'सफ़रनामा', 'गाँव का आदमी', 'पैर अभी थके नहीं', 'द कास्ट मैटर्स', 'पानीवालियाँ', 'खिड़कियाँ हैं, बैल चाहिए' जैसी उल्लेखनीय वृत्तचित्रों का निर्माण किया। 60 से अधिक असंपादित डाक्यूमेंट्रियाँ बनाई हैं, उसे पूरा करना शेष है। इन दिनों दैनिक भास्कर, नई दुनिया, अमर उजाला जैसे अखबारों के लिए स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। इनकी साहित्यिक यात्रा भी लम्बी है। बहुत सी कहानियाँ कथादेश, हंस, नया ज्ञानोदय जैसी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। 'अथकथा-इतिकथा' नाम का उपन्यास भी पूरा कर लिया है। कविताएँ भी लगातर लिख रहे हैं। आलोचना भी हाथ आजमा चुके हैं।

