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सितुही भर समय


शहर और गाँव की घड़ी एक साथ नहीं चलती। दोनों की रफ्तार अलग-अलग है। बचपन और जवानी की घड़ी भी अपनी-अपनी रफ़्तार पकड़ लेती है। प्रमोद कुमार तिवारी की यह कविता कुछ ऐसा ही बयान करती है-

सितुही भर समय

प्रमोद कुमार तिवारी की अन्य कविताएँ

  1. ठेलुआ

  2. दीदी

  3. भीड़

होते थे पहले कई-कई दिनों के एक दिन
माँ के बार-बार जगाने के बाद भी
बच ही जाता, थोड़ा-सा सोने का समय
कन्यादान किए पिता की तरह
आराम से यात्रा करता सूरज।

चबेना ले भाग जाते बाहर
घंटों तालाब में उधम मचा,
बाल सुखा, लौटते जब चोरों की तरह
तो लाल आखें और सिकुड़ी उंगलियाँ
निकाल ही लेतीं चुगली करने का समय।

कुछ किताबों के मुखपृष्ठ देख
फिर से निकल जाते खेलने के काम पर
गिल्ली डंडा, ओल्हा-पाती, कंचे, गद्दील
जाने क्या-क्या खेलने के बाद भी
कमबख्त बच ही जाता समय
मार खाने के लिए।
कितना इफरात होता था समय
कि गणित वाले गुरुजी की मीलों लंबी घंटी
कभी छोटी नहीं हुई।
..................

अब सूरज किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह
धड़धड़‌ाते हुए गुजर जाता है
माँ पुकारती रह जाती है प्रसाद लेकर
और हम भाग जाते हैं बस पकड़ने
ऑफिस पहुँचने पर आती है याद
कि आज फिर भूल गया पत्नी को गले लगाना

काश गुल्लक में
जमा कर पाते कुछ खुदरा समय।
मुसीबत के समय निकाल
बगैर हाँफे चढ़ जाते बस पर।
स्कूल जाते गिल्ली डंडा पर हाथ आजमाने की तरह
ऑफिस जाते पूछ लेते मुन्नी से
उसकी गुड़िया की शादी की खबर

हुमच के ‘बौराए’ पिछवाड़े वाले आम को देख
एक मिनट हम भी बौरा लेते।
बेतहासा साइकिल चलाते, ऑफिस भागते दोस्त से कहते
अबे! ये ले पाँच मिनट, चल अब चाय पीते हैं।

काश! सितुही भर समय निकाल
ले लेते एक नींद का झोंका
झोंवेफ में होते सपने
सपने, जिन पर नहीं होता अधिकार
किसी और का।

प्रमोद कुमार तिवारी

बकलोल और हँसलोल महँगी


हिन्दी कविताओं में गाँव सहज रूप से बहुत कम मौज़ूद दिखता है। शहर की तरफ़ विस्थापित आज के साहित्यकार अपने गाँवों की जो तस्वीर, जो संवेदनाएँ और परिवेश खींचते हैं, वह उनके गाँवों का वर्तमान नहीं, बल्कि उनके बचपन के गाँव हैं। अतः हमारी कलमों से भारत की आत्मा के बहुत से सोये तथा जगे लोग बच जाते हैं। परंतु रामजी यादव की कविताओं में ये ही पात्र के रूप में शामिल हैं।

महँगी

किसी के श्राद्ध में नहीं गए महंगी
लेकिन हर जात-धरम के प्यासे तपे पैदल पंड़हरु को
अपने लोटे से पानी पिलाया
और एक भेली गुड़ भी दिया
हाल-चाल पूछा हँसकर सुर्ती मलते हुए
फिर बढ़ा दिया हथेली और बची तो खुद फाँक गए

जिये बिना पत्थर के और फूल की ज़रूरत न थी
महँगी ने जीवन में कभी राम का नाम न लिया
अल्लाह की ज़रूरत न पढ़ी
और वाहे गुरु के बारे में जानते न थे
जो दावा करता है
कि एक ओंकार करता-पुरख निर्भय निर्बेर को
मेरी नज़र से देखो मैं ही जानता हूँ उसे

महँगी चराते थे बकरियाँ
और मज़ाक ज़रूर करते थे
आते-जाते लोगों से
किसी का भारी बोझ देखते तो
उतारकर सुस्ताने को कहते थे
एक लोटा पानी और गुड़ भी थमाने को तत्पर थे

ज़रूर किसी दिन
ईसा मसीह अपना सलीब लिए जाते दिखते उधर से
तो महंगी उसे उतरवा देते
और गुड़ पेश करते कि
लो भाई खाओ, पियो पानी और
इस लकड़ी को बनाओ किसी मुफलिस की
झोंपड़ी का थून्ह-बंड़ेरा
बहुत हो गया- कहाँ-कहाँ लेकर फिरोगे
अब कुछ बात करो, बताओं तुम्हें दुनिया में कोई चाहता है?
और हँसने लगते महँगी के साथ बेचारे ईसा मसीह भी
हँसलोल तो इस कदर थे महँगी कि
लगता था हिला देंगे बनारस
बतियाते ऐसे भोले भाव से कि पक्के बकलोल हों

नब्बे साल की चन्नर की माई
रोती मिलीं एक दिन
कहते हुए दुख कि एक टुकड़ा रोटी नहीं है मेरे लिए
आज अपाढ़ (बोझ) हो गई हूँ मैं बचवा!
महँगी बोले- अरे बुढ़िया! कहाँ कम है रोटी!
कहाँ कम है गुड़! कहाँ कम है पानी!
कम हो गई हैं तो तेरी खुशियाँ
गायब है तेरी हँसी और सबकुछ हो गया छूमंतर

अच्छा चल एक वचन दे अभी
कि रोएगी नहीं कभी भी
एक वादा कर तुरंत और निभा उसे
कि रोई है जीवन भर तुझे दुख मिला था
लेकिन हँसते हुए मरना जब मरना
वादा कर और निभा इसे देख भूलना मत
ले गुड़ खा, पानी पी पेट भर और सुस्ता ले!

और एक दिन हँसी बुढ़िया मंत्रबिद्ध
कि अब रूकूँगी नहीं
बुलावा है मेरे राम का
सुनती हूँ बार-बार आती है आवाज़
जल्दी करो, जल्दी करो

दौड़ पड़े बेटा-बेटी, नाती-पोते
पतोह-नतोह, गोतिया-दयदा
खिलाओ रे बर्फी, पिलाओ रे पानी
माई की इच्छा पूरी करो सब
यह इतना हँसती है जैसे स्वर्ग ही जायेगी सीधे
पूछो-पूछो कि खाने का मन है कुछ
पेड़ा, रसगुल्ला, मालपुआ कि जलेबी!
दाँत तो झर गये ऐसे ही चुभलाएगी

बुढ़िया सिधारी भी तीन माह बाद
और हँसती रही जब तब मौका लगा
जैसे हँसती हो दुनिया के दस्तूर पर
पाखंड पर, निर्मता और दोहरेपन पर हँसती हो
बाकी रहा सामिराज चन्नर का
एक माई नहीं रही बाकी
बाकी रही इज्जत कि
हँसते सिधारी थी माई
बहुत खुश थी!

छोड़ गए भारी दौलत श्यामभूषण सिंह
सो तेरही शानदार हो, शान के मुताबिक हो
जहाँ-तहाँ मिला स्वर्ग का मोखा (छेद)
ठूँसी गई वहीं सामग्री
कपड़े-लत्ते, सिक्के चाँदी के
मोबाइल फोटो वाला पक्के उन्नीस हज़ार का
झर हर-पुरहर महापातर लोटा फटफटिया से
महँगी से बताने लगा श्राद्ध की महिमा

महँगी उबासी ले बोले, पंडितऊ!
स्वर्ग में हिया से माल! तोशक, तकिया, रजाई
गद्दा, खटिया, मचिया, अनवन जिनिस
तो हियाँ का दिक्कत रही शमभूषणा के?
बैकुंठ में ई मामूली जिनिस भी नहीं है
भिखमंगे की झोपड़ी है क्या बैकुंठ!
हुआं से बार-बार करेगा मोबाइल मँगाएगा रुपया
तो ले क्यों न गया दो-चार लाख
हुआं बैंक भी नहीं है क्या
और टॉवर न होगा तो कैसे पकड़ेगा मोबाइल?
जवाब नहीं बना महापातर से तो एक्सीलेटर दबाया जोर से

महँगी और जोर से हँसे - जहाँ खटिया न हो
बिस्तर न हो, चावल यहीं से भिजवाना हो
उस बैकुंठ काहे जाऊँगा मैं
उससे अच्छा तो यहीं हूँ
चराता रहूँगा बकरियाँ।

कवि- रामजी यादव

पंडीजी, नाम तो बस नाम होता है


कहते हैं कि कविता के केंद्र में आम आदमी होता हैं। लेकिन कुछ कविताएँ आम आदमी से भी पीछे की पाँत में खड़े लोगों की बात करती हैं। इनकी सोच, सामाजिक स्थिति और इनको समझने की साफ दृष्टि कुछ कविताओं में होती हैं। युवा कवि प्रमोद कुमार तिवारी कविता की उसी जमीन पर शब्दों के बीज़ डालते हैं। हिन्द-युग्म के प्रारम्भिक कवि मनीष वंदेमातरम् की कविताओं (जैसे- इस फागुन ज़रूर से ज़रूर आना, सनीचरी, बुचईया, मेरे गाँव की एक और बात, इस साल गाँव में बाढ़ आयी है, इस साल गाँव में 'रमलील्ला' नहीं हुई) में हम जिस गाँव-देहात की बातों की गंध सूँघते आये हैं, लगभग वैसे ही एक कविता आज हम आपको पढ़वा रहे हैं।

ठेलुआ

प्रमोद कुमार तिवारी

21-09-76 को कैमूर जिला (बिहार) के परसियां गांव में जन्म।
गांव से निकल कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बीएचयू और जेएनयू (8 साल) में समय बिताया जहाँ पढ़ाई कम आवारागर्दी ज्यादा।
शास्त्रीय संगीत, पत्रकारिता और भोजपुरी में गहरी रुचि, कई वर्ष इनको दिया।
भोजपुरी की पहली साप्ताहिक समाचार पत्रिका द संडे इंडियन के भोजपुरी संस्करण को स्थापित करने में सहयोग। भोजपुरी और हिंदी की तमाम पत्रिकाओं में पिछले 10 वर्षों से रचनाएं प्रकाशित और आकाशवाणी तथा दिल्ली दूरदर्शन से प्रसारित।
लफ़्ज (उपसंपादक), विभोर (उपसंपादक), मीडिया-मंत्र (कंटेंट हेड) और इतिहास बोध पत्रिकाओं से लंबा जुड़ाव।
सम्मान- नवोदित लेखक सम्मान, हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार।
सृजनात्मक लेखन के लिए हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा दो बार सम्मानित।
राष्ट्रीय स्तर के कविता के मंच पर अनेक कार्यक्रम।
संप्रति- द संडे इंडियन में संपादकीय डेस्क प्रमुख के रूप में कार्यरत एवं भाषा एवं साहित्य पर स्वतंत्र-कार्य।
मेरा एक दोस्त था
नहीं है
नहीं-नहीं था
खैर छोड़िए, पता नहीं
था या है
पर जब हम साथ होते
तो फुर्र से उड़ जाता समय
हर खेल में बनाता उसे गोंइया
जब आसमान से बातें करती उसकी गुल्ली
तो देता अपने काल्पनिक मूछों पर ताव।
सुख से ज्यादा दुख का साथी
फ़सल मेरी गाय बर्बाद करती
डांट सुनता वो
ईख उखाड़ता मैं
मालिक उसे मारता।
उस समय मैं सातवीं में था जब
ससुराल से आई खास मिठाई दी थी उसने
मिठाई के भीतर से शानदार अठन्नी निकली थी,
मिठाई से भी मीठी।

उसका नाम मुझे पसंद न था,
कभी-कभी मैं पूछता, उसके नाम का मतलब
वह सिर्फ़ इतना बताता- नाम तो बस नाम है
बहुत पूछने पर कहता
जैसे घूर-फेंकना है, बेचुआ है, कमरुआ है
वैसे ही ठेलुआ है
काफी शोध के बाद पता चला
माँ ने उसका नाम ‘रामलाल’ रखा था
पर वह सिर्फ़ और सिर्फ़ ठेलुआ था
ज्यादा से ज्यादा ‘मुसना’ का बेटा ठेलुआ।
उसे ठेलुजी कहना कुछ ऐसा
जैसे ठाकुर हुंकार सिंह के सिर पर गोबर की खाँची रखना
या परमेसर मिसिर की गंगाजली में मूस का तैरना

शायद आपने भी महसूसा हो
शहर की घड़ियां गावों से बहुत तेज दौड़ती हैं
कुछ दिनों बाद जब गांव लौटा तो
सड़कें चमकदार और चेहरे धूसर हो चले थे।
दोस्त मिला रास्ते में
संकोच के साथ पहली बार किया नमस्ते,
यंत्रवत उठे थे उसके हाथ
गौर किया मैंने दोस्त कहीं नहीं था
ठेलुआ ने तिवारीजी को सलाम ठोंका था

पूछा, कैसे हो?
कुछ ज्यादा ही परिपक्व आखों से देखते हुए बोला
अच्छा हूँ जी
पता चला,
बनारस में रिक्शा खींच रहा है उसकी जिन्दगी
ठाट से।
बच्चे?
दो हैं जी, दो भगवान के पास चले गए,
अच्छे हैं
बड़का बहुत होशियार है
सेठ के यहाँ तेजी से काम सीख रहा है
और छुटकी तो घर का सारा काम देख लेती है,
नाम क्या हैं उनके?
गबरा और टुनिया
इन नामों का मतलब?
क्या पंडीजी आप भी!
नाम तो बस नाम होता है?

--प्रमोद कुमार तिवारी