शहर और गाँव की घड़ी एक साथ नहीं चलती। दोनों की रफ्तार अलग-अलग है। बचपन और जवानी की घड़ी भी अपनी-अपनी रफ़्तार पकड़ लेती है। प्रमोद कुमार तिवारी की यह कविता कुछ ऐसा ही बयान करती है-
सितुही भर समय
होते थे पहले कई-कई दिनों के एक दिन
माँ के बार-बार जगाने के बाद भी
बच ही जाता, थोड़ा-सा सोने का समय
कन्यादान किए पिता की तरह
आराम से यात्रा करता सूरज।
चबेना ले भाग जाते बाहर
घंटों तालाब में उधम मचा,
बाल सुखा, लौटते जब चोरों की तरह
तो लाल आखें और सिकुड़ी उंगलियाँ
निकाल ही लेतीं चुगली करने का समय।
कुछ किताबों के मुखपृष्ठ देख
फिर से निकल जाते खेलने के काम पर
गिल्ली डंडा, ओल्हा-पाती, कंचे, गद्दील
जाने क्या-क्या खेलने के बाद भी
कमबख्त बच ही जाता समय
मार खाने के लिए।
कितना इफरात होता था समय
कि गणित वाले गुरुजी की मीलों लंबी घंटी
कभी छोटी नहीं हुई।
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अब सूरज किसी एक्सप्रेस ट्रेन की तरह
धड़धड़ाते हुए गुजर जाता है
माँ पुकारती रह जाती है प्रसाद लेकर
और हम भाग जाते हैं बस पकड़ने
ऑफिस पहुँचने पर आती है याद
कि आज फिर भूल गया पत्नी को गले लगाना
काश गुल्लक में
जमा कर पाते कुछ खुदरा समय।
मुसीबत के समय निकाल
बगैर हाँफे चढ़ जाते बस पर।
स्कूल जाते गिल्ली डंडा पर हाथ आजमाने की तरह
ऑफिस जाते पूछ लेते मुन्नी से
उसकी गुड़िया की शादी की खबर
हुमच के ‘बौराए’ पिछवाड़े वाले आम को देख
एक मिनट हम भी बौरा लेते।
बेतहासा साइकिल चलाते, ऑफिस भागते दोस्त से कहते
अबे! ये ले पाँच मिनट, चल अब चाय पीते हैं।
काश! सितुही भर समय निकाल
ले लेते एक नींद का झोंका
झोंवेफ में होते सपने
सपने, जिन पर नहीं होता अधिकार
किसी और का।
प्रमोद कुमार तिवारी






